MP Crime News : बेदर्दी न समझा कोमल दिल की बात

MP Crime News : सैक्स की चाहत के लिए किया गया प्रेम न केवल अनैतिक और विरोध का तानाबाना बुन लेता है, बल्कि प्रेमी युगल को नाजायज और नापाक राह पर ले जाता है. ऐसा ही कुछ 21 वर्षीय रानू मेहर और रामनिवास सोलंकी के साथ हुआ, जिस के बाद…

रामनिवास सोलंकी अपने घर की छत पर अकेला बैठा था. शाम का अंधेरा घिरने में अभी वक्त था. एकदम तन्हाई में डूबा हुआ था. सामने दूर तक गांव का नजारा वहां से दिख रहा था. उस की पतली पगडंडियों पर गाहेबगाहे उस की नजर ठहर जाती थी. वहां इक्कादुक्का लोगों का आनाजाना हो रहा था. उन में अधिकतर गांव की ओर आने वाले ही थे.

अचानक उस की निगाह कंधे से बैग लटकाए एक युवती पर ठहर गई. वह उस की जानीपहचानी थी और गांव से बाहर जाती दिख रही थी. वह उस के बारे में सोचने लगा, ‘रानू मायके कब आई थी? अब कहां जा रही है?…शायद ससुराल?…आई थी तब उस ने मुझे कौल क्यों नहीं की?…पता लगाना होगा कि क्या बात है?’

रामनिवास चाहता तो वहीं से उसे आवाज दे सकता था, लेकिन उस ने अपने मोबाइल से उसे कौल कर दिया. कुछ सेकेंड तक रिंग जाने के बाद कौल डिसकनेक्ट हो गई. उस ने सोचा कि शायद उस का मोबाइल बैग में होगा. उस का अनुमान सही था. देखा युवती कुछ सेकेंड में ही अपने बैग से मोबाइल निकाल चुकी थी.

अगले पल रामनिवास के फोन पर रिंग बजने लगी थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव कर ली.

”हां जानू! तुम कब आई…बताया नहीं… मिले बगैर जा रही हो!’’

”आज ही दिन में आई थी…जल्दी लौटना है…फिर आऊंगी.’’ जवाब देने वाली युवती रानू मेहर रामनिवास के गांव की ही थी. तालाब के दूसरी छोर पर उस का मायका था. उन की पुरानी और गहरी जानपहचान थी. उन के बीच सालों से प्रेम संबंध में ताजगी बनी हुई थी, जबकि युवती पास के ही गांव में ब्याही थी. शादीशुदा हो कर भी उस का दिल और दिमाग रामनिवास के दिल में ही अटका हुआ था.

”तो फिर मिली क्यों नहीं?’’ रामनिवास ने मायूसी से शिकायत की.

”क्या करती मिल कर, तुम मेरी बात मानते ही नहीं.’’

”कैसे मान लूं, तुम अब दूसरे की हो!’’

”चलो, अब फोन काटो,’’ बोलते हुए रानू ने कौल डिसकनेक्ट कर दी.

रानू का अचानक फोन कट जाने पर रामनिवास दुखी महसूस करने लगा. सोचने लगा कि आखिर वह उस से चाहती क्या है? मई की तपिश का महीना था. उस की इच्छा हुई कि तालाब के ठंडे पानी में नहा लिया जाए. इसी के साथ उस के मन में कई तरह के खयाल आते रहे. उन में बारबार रानू का चेहरा भी घूमता रहा. उस के साथ गुजारे गए हसीन लम्हों को याद करने लगा. तालाब में तैरते वक्त उसे याद आया कि कैसे उस ने इसी तालाब में रानू को तैरना सिखाने की पहल की थी.

बात 4 साल पहले की है. बरसात का मौसम था. रामनिवास सोलंकी गांव के तालाब में तैराकी कर रहा था. कुछ देर बाद जब वह तालाब से बाहर निकला, तब उस ने देखा कि उसे गांव की ही लड़की रानू मेहर निहार रही है. वह झेंप गया, लेकिन लड़की बोल पड़ी, ”तुम तो बहुत अच्छा तैरना जानते हो… मुझे भी तैरने का बहुत शौक है.’’

”तो सीख लो, किस ने रोका है.’’

”कैसे सीखूं…कोई लड़की तुम्हारी तरह अच्छी तैराक नहीं है.’’

”मैं सिखा दूं?’’

”हां, तुम सिखा दोगे मुझे तैरना!’’ रानू बोली.

”फीस लगेगी.’’ रामनिवास गमछे से अपना अधनंगा बदन पोंछता हुआ बोला.

”क्या फीस लोगे?’’

”तैराकी सिखाने के बाद बताऊंगा.’’

”बाद में मेरी जान मांग ली तो!’’

”तुम जैसी सुंदर लड़की की भला जान कौन मांगेगा?’’

”तो क्या मांगोगे?’’

”दिल?’’

”चल हट… बड़ा आया दिल लेने वाला!’’ रानू बोलती हुई शरमा गई थी.

”तैरना सीखना है तो बोलो, अभी से ही ट्रेनिंग शुरू कर देता हूं.’’

”हांहां सीखना है न, लेकिन डर लगता है…बाबू को मालूम हो गया तो वह मेरा गला घोंट देगा!’’ रानू आशंका जताती हुई बोली.

”बाबू को मालूम होगा तब न! दोपहर में सिखाऊंगा जब बाबू खेतों पर गए होंगे. चलो आ जाओ… पानी में उतरो.’’

”दूसरे कपड़े ले कर आती हूं.’’ रानू बोल कर अपने घर की ओर दौड़ पड़ी.

कुछ मिनटों में ही रानू पौलीथिन बैग में कपड़े ले कर तालाब के किनारे लौट आई थी. चंचल रानू को संभालता हुआ रामनिवास कमर तक पानी में उतर गया था. उस ने उस के दोनों हाथों को पकड़ कर एक झटके में डुबकी लगाई, जिस के लिए रानू शायद पहले से तैयार नहीं थी. जिस से उस के नाकमुंह में पानी घुस गया था. अपना हाथ छुड़ाती हुई दोनों हथेलियों से नाकमुंह में घुस आए पानी को साफ किया. चेहरा पोंछती हुई बोली, ”ऐसे तो तुम मुझे मार ही डालोगे…सांस नहीं ले पा रही थी.’’

”इतने में घबरा गई…यह तुम्हारा पहला सबक था. उस में पास हो गई…अब अगले स्टेप के लिए तैयार हो जाओ!’’ रामनिवास प्यार से बोला.

”लेकिन अचानक से पानी में डुबो दिया था!’’ रानू बोली. उस का कोई जवाब दिए बगैर रामनिवास ने उस की कमर में हाथ डाला और उसे अपनी दोनों हथेलियों पर उठा लिया. अब उस का चेहरा आसमान की ओर था.

”अपना सिर पानी में डूबने से बचाना है और दोनों पैरों को पानी पर पटकना है…’’

रानू इस निर्देश का पालन करने लगी. कुछ देर बाद रामनिवास ने उसे अचानक छोड़ दिया. तब तक वह और गहरे पानी तक चली गई थी. सीने तक पानी में गिर पड़ी. किसी तरह उस ने खुद को संभाला और रामनिवास से लिपट गई. उसे अजीब सी अनुभूति हुई. किसी मर्द की बाहों में आना 17 साल की रानू का पहला अनुभव था. रामनिवास के लिए भी गीले बदन में रानू को पकड़े रहने का पहला अनुभव था. दोनों कुछ कम पानी में आ गए थे. रामनिवास उस की कमर और पीठ को सहला रहा था, किंतु जल्द ही रानू उस से अलग हो कर पानी से बाहर आ गई. अपने कपड़ों की थैली उठाई और पास की झाड़ी के पीछे चली गई. ओट में जा कर अपने कपड़े बदले और जाने लगी.

कपड़े बदल कर जब वह निकली तो रामनिवास बोला, ”अब और नहीं सीखना है?’’

”आज नहीं.’’ कहती हुई रानू चली गई. उस के जाने के काफी देर बाद तक रानू के शरीर स्पर्श को वह याद करता रहा.

इसी के साथ एक सच यह भी था कि रानू और रामनिवास के दिलों की धड़कनें एकदूसरे के लिए धड़कने लगी थीं.

उस के बाद दोनों का दोपहर में घंटे दो घंटे तक तालाब के पानी में तैरना सीखनेसिखाने का सिलसिला चल पड़ा. वह समय उन के लिए एकदूसरे के साथ पानी में रोमांस करने का भी था. रानू कुछ हफ्ते में ही तैरना सीख चुकी थी. वह रामनिवास की ऐहसानमंद थी कि बगैर कोई फीस दिए उस ने उस से तैरना सीख लिया है. उस के प्रति प्रेम की कोमलता के एहसास से भर गई थी. रामनिवास का भी कमोबेश यही हाल था, लेकिन उस के दिल में प्यार का मतलब रानू की कमसिन देह भर से था. वह उस मौके की ताक में रहने लगा था कि कब रानू उसे अपना सर्वस्व समर्पित कर दे.

जल्द ही उसे वह मौका भी मिल गया. एक दफा जब दोनों एकांत में एकदूसरे की तारीफ करते हुए रोमांस की बातों में मशगूल थे, तब रामनिवास ने अपनी वासना की प्यास बुझाने के लिए रानू को राजी कर लिया था. उस रोज दोनों ने साथ जिएंगे साथ मरेंगे की कसमें भी खाईं. रामनिवास ने रानू के सिर पर हाथ रख कर परिवार और गांव के समाज के विरोध का सामना कर शादी रचाने की सौंगंध ली. उन के बीच महीने 2 महीने नहीं, बल्कि 4 साल तक प्रेम संबंध कायम रहे. हालांकि उन के बारे में गांव में चर्चा भी होने लगी थी, लेकिन कोई खुल कर उन का विरोध नहीं जताता था.

इस दौरान जब भी रानू रामनिवास से मिलती, तब छूटते ही शादी की बात छेड़ देती थी…और फिर उन के बीच एक खटास की भावना भर जाती थी. हालांकि रामनिवास प्रेमिका रानू को शादी का आश्वासन दे कर नई उम्मीद से भर देता था.

इसी बीच दोनों के प्रेम संबंध की सूचना रानू के परिवार तक जा पहुंची. उस के मम्मीपापा रानू के इस व्यवहार से खफा हो गए और वे जल्द से जल्द उस की शादी रचाने की कोशिश में लग गए. पापा ने उस के घर से निकलने पर पाबंदी लगा दी थी. उन का प्रयास सफल हुआ और रानू की शादी पास के गांव गरोठ में रहने वाले एक युवक से कर दी गई. शादी के बाद भी विवाहिता रानू मेहर का दिल रामनिवास सोलंकी में लगा रहा.  वह चाहती थी कि वही उस का जीवनसाथी बने. जबकि रामनिवास गांव और परिवार में अपनी इज्जत बनाए रखना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस के प्यारमोहब्बत के चलते 2 परिवारों के बीच तनाव का महौल कायम हो जाए.

रानू मेहर के मायके में सभी इस बात से निश्चिंत हो गए थे कि रानू का घर बस गया है. उस ने कुंवारेपन में जो गलतियां कीं, अब उस के गांव के रामनिवास से मिलने में किसी को कोई आपत्ति नहीं थी. वह बेरोकटोक रामनिवास के घर चली जाती, उस की फेमिली वालों के साथ हंसीमजाक करती. इसी तरह रामनिवास भी रानू के मायके आने के बाद उस के घर जा कर एक बार जरूर मिल आता या फिर वे अपने पुराने प्रेम को ताजा करने के लिए तालाब के किनारे घंटों समय गुजार लते थे.

दूसरी तरफ रानू मेहर इसी उम्मीद में रहती थी कि एक न एक दिन रामनिवास सोलंकी जरूर उस के साथ शादी रचाएगा. इस उम्मीद के साथ वह अपने गांव आती रहती थी और रामनिवास से शादी करने का दबाव बनाती थी. जबकि वह कई बार उस से कन्नी काट चुका था. उस के रानू से बचने का कारण भी था. बातोंबातों में वह कई बार धमकी भी दे चुकी थी. वह बोल चुकी थी कि अगर उस ने शादी नहीं की, तब पुलिस के पास चली जाएगी. रेप का मुकदमा कर देगी. हालांकि उस ने बात को संभाल लिया और बोली कि वह मजाक कर रही है. ऐसा वह उस के साथ हरगिज नहीं करेगी.

उस रोज तो बात आईगई हो गई थी, लेकिन रामनिवास के दिमाग में रेप में फंसाए जाने की आशंका के कीड़े ने काटना शुरू कर दिया था. यही कारण था कि वह उस से दूरी बनाए रखना चाहता था. वह रानू को भूलने की कोशिश तो कर रहा था, लेकिन जब वह मायके आती थी, तब उस के उस साथ गुजारे हसीन रोमांस की यादें ताजा हो जाती थीं. उस रोज भी वैसा ही कुछ हुआ था, जब रामनिवास छत पर तन्हा बैठा था और उस से मिले बगैर रानू चली गई थी. वह मन मसोस कर रह गया था. उस के ठीक एक हफ्ते बाद ही 25 मई को रानू फिर मायके आई थी. आते ही सीधे रामनिवास को फोन किया. उसे तुरंत मिलने के लिए बुलाया.

उस वक्त रामनिवास गांव से बाहर गया हुआ था. उस ने 2 घंटे बाद आने को कहा, लेकिन रानू ने मिलने की बेसब्री दिखाई और कहा कि घर से बाहर किसी एकांत जगत पर मिलना चाहती है. इस पर रामनिवास ने तालाब के किनारे रात होने पर मिलने को कहा. उस ने समय तय कर लिया और छिप कर आने को कहा.

रानू ने ऐसा ही किया. वह गांव वालों की नजरों से बचती हुई 25 मई, 2025 की रात करीब 10 बजे तालाब के किनारे ओट ले कर बैठ गई. जल्द ही रामनिवास भी वहां पहुंच गया. आते ही मजाक किया, ”जानू! तैरने चलें!’’

”मजाक मत करो, आज में बहुत सीरियस मूड में हूं.’’

”क्यों, क्या बात हुई, पति से झगड़ कर आई हो?’’ रामनिवास बोला.

पति से तो नहीं, लेकिन तुम से जरूर झगडऩे आई हूं.’’ रानू बोली.

उस के बोलने के अंदाज से रामनिवास को लगा कि उस की मजाक का उस ने गंभीरता से जवाब दिया है. वह कुछ पल के सन्न सा रह गया.

”क्यों तुम से नहीं झगड़ सकती? मैं तुम से बहुत नाराज हूं. तुम से बहुत शिकायत है…’’ रानू बिफरती हुई बोली.

”शिकायत? किस बात की?…मेरी बीवी हो जो तुम्हारी शिकायतों को दूर करूं?’’ रामनिवास भी उसी के लहजे में बोला.

”तुम्हारी यही बात मुझे पसंद नहीं आती…मैं तुम्हारी प्रेमिका हूं…पहली प्रेमिका…मैं ने तुम्हें अपना सब कुछ सुपुर्द कर दिया…और तुम कहते हो मैं क्यों तुम्हारी शिकायत सुनूं?’’ रानू बोली.

”यही कहने के लिए बुलाया था?’’

”किस से कहूं अपने दिल की बात?’’

”पति से?’’

”उसे पसंद नहीं करती! तुम को मेरा पति बनना होगा, वरना मैं तूफान मचा दूंगी….अब और बहाना नहीं चलेगा? बहुत हो गया तुम्हारा आश्वासन!’’ रानू मेहर बोले जा रही थी.

”इस तरह से बात करने की जरूरत नहीं है. मेरी भी मजबूरी है. अभी तुम से शादी नहीं कर सकता. मेरा कोई ठोस काम नहीं है. मुझे गांव में ही रहना है. खेती से आमदनी करनी है. अगर कहीं दूसरे शहर में कामधंधा मिल जाए, तब शादी की बात सोची जा सकती है.’’

”आज तुम अपने वादे से भी मुकर गए.’’

”ऐसा ही समझो…इसी में हम दोनों की भलाई है. हम लोग एक ही गांव के हैं. हम लोगों का घर 10-12 घरों  के अंतर पर है. शादी कर हम लोग इसी गांव में कैसे रह पाएंगे? तुम अब शादीशुदा हो. मैं किसी ब्याहता को कैसे अपनी पत्नी बना सकता हूं. तुम्हारे मायके और ससुराल वाले हम पर मुकदमा ठोक देंगे, तब क्या होगा… कोर्टकचहरी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहता.’’ रामनिवास ने अपने मन की बात कह दी. उस ने एक तरह से अपना फैसला ही सुना दिया कि वह अब उस के साथ शादी नहीं कर सकता.

”कोर्टकचहरी के चक्कर में तो ऐसे भी आ जाओगे…उस रोज मजाक में बोली थी, आज वैसा नहीं है…तुम पर रेप का मुकदमा कर दूंगी. सीधे जेल जाओगे.’’ रानू गुस्से में आ गई थी और वहां से जाने के लिए उठ खड़ी हुई थी.

उस की तल्ख बातें सुन कर रामनिवास का दिमाग भन्ना गया था. दिलोदिमाग में तेजाबी तूफान उमडऩे लगा था. उस ने महसूस किया कि उस के हाथपैर बेकाबू हो गए हैं. अगले ही पल रामनिवास के दोनों हाथ रानू मेहर की गरदन को दबोच चुके थे. अचानक इस हमले के लिए रानू तैयार नहीं थी. अपने दोनों हाथों से रामनिवास की पकड़ से मुक्त होने की कोशिश करने लगी, लेकिन उस की बलिष्ठ भुजाओं की मजबूती के आगे असफल रही.

कुछ सेकेंड में ही उस की गरदन झूल गई. उस की मिमियाती आवाज भी बंद हो गई. रामनिवास के हाथों की पकड़ ढीली हुई, तब रानू जमीन पर धड़ाम से गिर पड़ी. सामने गिरी रानू की लाश को रामनिवास ने 2 बार ठोकरें मारी और भुनभुनाया, ”बड़ा आई थी मुझे जेल भेजने…’’

अगले रोज रानू के अचानक लापता हो जाने पर उस के मायके वाले परेशान हो गए. उस के बारे में पता लगाना शुरू किया. उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह कभी भी इस तरह घर से बिना कहे कहीं नहीं जाती थी. गांव वालों से पूछताछ की गई. किसी ने उस के बारे में कुछ नहीं बताया. उस के पापा को बहुत चिंता हुई. उन्होंने रानू की ससुराल वालों से उस की तहकीकात की. उन्होंने उस के ससुराल में नहीं होने की पुष्टि की. उस के पति ने गरोठ थाने पर रानू मेहर की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी. जिस के बाद फेमिली वाले और पुलिस उस की तलाश में जुट गए. रानू के घर से लापता होने के 4 दिन बाद भी कहीं पता नहीं चला.

अचानक 29 मई, 2025 को गांधी सागर जलाशय के बैकवाटर से एक अज्ञात महिला की लाश मिली. पुलिस को शक हुआ कि लाश मृतका रानू मेहर की हो सकती है. लाश की पहचान के लिए पुलिस ने मृतका के घर वालों को बुलाया, लेकिन शव की स्थिति इतनी खराब थी कि वे उसे नहीं पहचान पा रहे थे. इसलिए पुलिस ने फेमिली वालों के डीएनए से मृतका के डीएनए की जांच करवाई. रिपोर्ट आने के बाद मृतका की पहचान हो पाई. पहचान होते ही मृतका के पापा ने गांव के ही रामनिवास सोलंकी पर हत्या की आशंका जताई, क्योंकि रानू के गायब होने के बाद से वह भी गांव से गायब था. पुलिस ने जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार कर उस से सख्ती से पूछताछ की, जिस पर आरोपी ने मृतका की हत्या करना कबूल किया.

आरोपी रामनिवास सोलंकी ने बताया कि रानू मेहर शादीशुदा होते हुए भी उस से शादी कर साथ रहने को कहती थी. जबकि वह अविवाहित था, लेकिन सामाजिक बंधन के चलते उस का रानू से शादी करना संभव नहीं था. इसलिए रानू की जिद से परेशान हो कर उस ने उस की हत्या कर दी. इस के बाद शव को पानी में फेंक दिया था. पुलिस ने आरोपी रामविलास सोलंकी पर हत्या की धाराओं में मामला दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. इस मामले की जांच गरोठ थाने के एसएचओ हरीश मालवीय कर रहे थे. MP Crime News

 

 

Social Story in Hindi : मातापिता कराते हैं बेटियों से देहव्यापार

Social Story in Hindi : लड़की को मातापिता की इज्जत समझा जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश की बांछड़ा जाति में ऐसी परंपरा चली आ रही है कि वहां खुद मातापिता ही बेटी से देहव्यापार कराते हैं. जो लड़की जितने ज्यादा पैसे इस धंधे से कमाती है, उसे उतना ही सम्मान मिलता है. देश और समाज में आए इतने बदलाव के बाद भी यह समाज आखिर बदलाव की धारा में क्यों शामिल नहीं हो रहा?

करीब 3 महीने पहले की बात है. शाम का समय था. रतलाम से मंदसौर नीमच की ओर करीब 7 किलोमीटर का सफर तय हुआ था कि सड़क पर खड़ी जवान लड़कियों को देख कर कौतूहल हुआ. कार की रफ्तार धीमी कर मीलों दूर तक हम यह नजारा देख रहे थे. कुछ ही मील चलने के बाद हम ने एक ढाबे पर कार रोक दी और ढाबे पर खाने का और्डर कर वहीं पड़ी खाट पर बैठ गए. मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे. ढाबे के मालिक जगदीश से जब हम ने सड़क किनारे खड़ी इन लड़कियों के बारे में जानना चाहा तो उन से जो कहानी पता चली, उसे सुन कर जैसे कानों को विश्वास ही नहीं हो रहा था. जगदीश ने बताया कि ये लड़कियां यहां के बांछड़ा समुदाय की हैं, जो अपने जिस्म का सौदा करने रोज ही सड़कों पर उतर आती हैं.

ऐसा नहीं है कि ये लड़कियां चोरीछिपे मजबूरी में इस तरह का धंधा करती हैं, बल्कि इन जवान लड़कियों के मातापिता बड़े शौक से इन से यह घिनौना काम करवाते हैं. कई बार तो मातापिता खुद ही इन के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाते हैं और ये लड़कियां ग्राहकों से शारीरिक संबंध बनाती हैं. सड़कों किनारे पर भड़कीले कपड़ों में सजीधजी लड़कियों को देख कर वाहन की रफ्तार अपने आप ही धीमी हो जाती है. होंठों पर लिपस्टिक का चटख लाल रंग और काजल भरी आंखों से इशारा करती ये लड़कियां ट्रक और कार चलाने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं.

अपनी अदाओं से लोगों को लुभाती जवान लड़कियां दरअसल अपने जिस्म का सौदा करती हैं. जिस्मफरोशी के इस बाजार में रोजाना न जाने कितनी ही लड़कियां चंद सौ रुपयों के लिए अपनी बोली लगाती हैं. जिन लोगों ने महू-नीमच राष्ट्रीय राजमार्ग का सफर किया है, वे कभी न कभी समाज की इन लड़कियों से मुखातिब हो चुके होंगे. भले ही किसी की गाड़ी न रुकी हो, लेकिन सड़क किनारे खड़ी 16-17 साल की उन लड़कियों को जरूर देखा होगा, जो खुले बालों के साथ, कमर मटकाती खुद के बिकने का इंतजार करती हैं.

रतलाम में मंदसौर, नीमच की ओर जाने वाले महू-नीमच राष्ट्रीय मार्ग पर जावरा से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित बगाखेड़ा गांव से बांछड़ा समुदाय के डेरों की शुरुआत होती है. यहां से करीब 5 किलोमीटर दूर हाईवे पर ही परवलिया डेरा स्थित है. इस डेरे में बांछड़ा समुदाय के लगभग 50 परिवार रहते हैं. बांछड़ा समुदाय के परिवार मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के रतलाम, मंदसौर व नीमच जिले में रहते हैं. इन तीनों जिलों के कुल 68 गांवों में इस समुदाय के डेरे बसे हुए हैं. रतलाम जिले में रतलाम, जावरा, आलोट, सैलाना, पिपलौदा व बाजना तहसील, मंदसौर जिले में मंदसौर, मल्हारगढ़, गरोठ, सीतामऊ, पलपुरा, सुवासरा तथा नीमच में नीचम, मनासा व जावद तहसील में इन के डेरे हाईवे के दोनों तरफ देखे जा सकते हैं.

पिछली जनगणना में सरकार को मंदसौर से चौंकाने वाले आंकड़े मिले थे. इस के अनुसार, मदंसौर के 38 गांवों में 1047 बांछड़ा परिवार थे, जिन की कुल आबादी 3435 थी. इन में 2243 महिलाएं और महज 1192 पुरुष थे. यानी पुरुषों के मुकाबले दोगुनी महिलाएं. इसी तरह नीमच जिले के 24 बांछड़ा बाहुल्य गांवों में 1319 बांछड़ा परिवारों में 3595 महिलाएं और 2770 पुरुष पाए गए. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 35 हजार आबादी वाले समुदाय में लगभग 7 हजार महिलाएं वेश्यावृत्ति के काम में लगी हैं, जिन में से करीब 2 हजार नाबालिग हैं. समुदाय में 10 से 12 साल की बच्चियों को अपने मातापिता द्वारा जबरन देह व्यापार में डाल दिया जाता है. एक लड़की के पास एक दिन में 10 से 12 ग्राहक आते हैं. वो एक दिन में करीब 2 हजार रुपए कमा लेती है.

बांछड़ा समुदाय के लोगों के जिस्मफरोशी के इस धंधे में आने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. मंदसौर व नीमच जिला वैसे तो अफीम उत्पादन के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है, इन जिलों की पहचान संयुक्त रूप से बांछड़ा समुदाय के परंपरागत देह व्यापार के कारण भी होती है. बांछड़ा समुदाय की उत्पत्ति कहां से हुई, इस का कुछ लिखित प्रमाण नहीं है. जहां समुदाय के लोग खुद को राजपूत बताते हैं, जो राजवंश के इतने वफादार थे कि इन्होंने दुश्मनों के राज जानने के लिए अपनी महिलाओं को गुप्तचर बना कर वेश्या के रूप में भेजने में संकोच नहीं किया था.

वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले अंगरेज इन्हें नीमच में तैनात अपने सिपाहियों की वासनापूर्ति के लिए राजस्थान से लाए थे. इस के बाद यह नीमच के अलावा रतलाम और मंदसौर में भी फैलते गए. बांछड़ा समुदाय की विशेषता यह है कि यह हमेशा ग्रुप में रहता है, जिन्हें डेरा कहते हैं. इस समुदाय के अधिकतर लोग झोपड़ीनुमा कच्चे मकानों में रहते हैं. इन की बस्ती को सामान्य बोलचाल की भाषा में डेरा कहते हैं. इन के बारे में यह भी कहा जाता है कि मेवाड़ की गद्दी से उतारे गए राजा राजस्थान के जंगलों में छिप कर अपने विभिन्न ठिकानों से मुगलों से लोहा लेते रहे थे.

माना जाता है कि उन के कुछ सिपाही नरसिंहगढ़ में छिप गए और फिर वहां से मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के काडिया चले गए. जब सेना बिखर गई तो उन लोगों के पास रोजीरोटी चलाने का कोई जरिया नहीं बचा, गुजारे के लिए पुरुष राजमार्ग पर डकैती डालने लगे तो महिलाओं ने वेश्यावृत्ति को पेशा बना लिया. ऐसा कई पीढि़यों तक चलता रहा और बाद में यह परंपरा बन गई. बांछड़ा समुदाय के लोग किसी जमाने में खानाबदोश जीवन व्यतीत करते थे. एक गांव से दूसरे गांव भ्रमण कर अपना गुजरबसर करते थे, मगर यह सब अब इतिहास का हिस्सा बन कर रह गया है. गांव के एक बुज़ुर्ग हुकमल बांछड़ा का कहना है, ‘‘बांछड़ा समुदाय में लड़कियों को वेश्यावृत्ति में भेजना हमारी परंपरा का हिस्सा है और यह सदियों से चला आ रहा है.’’

वह एक किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, ‘‘पहले हमारे लोग गांव में नहीं रहते थे. वे एक रात कहीं रुकते थे तो दूसरी रात उन का डेरा कहीं और होता था. एक बार शहर में चोरी हो गई और पुलिस ने हमारे लोगों को पकड़ लिया. तब थानेदार की निगाह हमारी एक लड़की पर पड़ी. लड़की बहुत सुंदर थी. उस ने बोला कि एक रात मुझे इस लड़की के साथ रहने दो और उस के बाद गांव छोड़ कर निकल जाओ.’’

हुकमल बांछड़ा ने आगे कहा, ‘‘उस दिन उस लड़की ने बापदादा की जान बचाई. उस दिन हमारे समाज के लोगों में यह बात बस गई कि लड़कियां जान बचाती हैं. हम लोगों के पुरखों ने चोरीचकारी जैसा कुछ काम नहीं किया था, लेकिन झूठा आरोप लगा दिया गया.

‘‘बस, वहीं से यह कहावत आ निकली कि लड़की जान बचाती है. समाज को लगने लगा कि लड़की किसी भी समस्या का समाधान निकाल लेती है और तब से इस परंपरा की शुरुआत हो गई.’’

इन के देह व्यापार में उतरने की कहानी मुगल सम्राट शाहजहां से भी जुड़ी हुई बताई जाती है. इस कहानी की सत्यता की जांच अब तक नहीं की गई है. फिर भी समुदाय के लोगों का मानना है कि देह व्यापार का काम तभी शुरू हुआ, जब आगरा में ताजमहल बनने का खयाल आया. दरअसल, मुमताज महल की मौत के बाद 1632 में ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ. शाहजहां ने इस काम को पूरा करने के लिए दुनिया भर से सब से अच्छे कारीगरों को जमा किया. मुख्य आर्किटेक्ट उस्ताद अहमद लाहौरी इन मजदूरों को ले कर आए थे. शर्त के अनुसार, वह मजदूर कहीं और काम नहीं कर सकते थे. यानी उन का दिन और रात केवल ताजमहल के निर्माण के लिए थी. ऐसे में मजदूरों का मन लगा रहे, इसलिए नाटक नौटंकी का इंतजाम किया गया.

हर रोज नए करतबबाजों को तलाशना मुश्किल था, इसलिए उस्ताद ने मालवा से बेडि़या, बांछड़ा समाज के लोगों को आगरा के आसपास ही बसा लिया. इस समाज के लोग पहले नाचनेगाने का काम भी करते थे. वहीं पर खेल, तमाशे और संगीत के बीच देह व्यापार की शुरुआत हुई. ताजमहल का निर्माण 21 साल चला, तब तक बेडि़या बांछड़ा समुदाय की एक पीढ़ी गुजर गई. ताजमहल का निर्माण पूरा होने के साथ ही समुदाय के कुछ लोग आगरा में ही बस गए और बाकी मालवा लौट आए. जब वे लौटे तो संगीत को पीछे छोड़ आए थे और साथ आ गया था देह व्यापार.

संगीत कार्यक्रम के लिए जहां ग्राहक तलाशना मुश्किल था, वहीं देह व्यापार में ग्राहकों का तांता लग गया. देखते ही देखते समाज के पुरुषों ने वाद्ययंत्रों से किनारा किया और दलाली के काम में उतर गए. आज मालवा के मंदसौर में इस समाज की मुख्य देहमंडी है. भारत में समाज का एक बड़ा हिस्सा जहां बेटी के जन्म को अभिशाप मानता है और कोख में बेटियों को मारने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनती हैं, वहीं इस समुदाय में बेटी के जन्म होने पर जश्न मनाया जाता है. बांछड़ा जाति की लगभग 200 बस्तियों में समाज की सब से बड़ी लड़की को समुदाय की रीति, रस्म और परंपरा के अनुसार वेश्यावृत्ति का शर्मनाक काम अपनाना ही पड़ता है.

बांछड़ा समुदाय में प्रथा के अनुसार घर में जन्म लेने वाली पहली बेटी को जिस्मफरोशी करनी ही पड़ती है. एकदूसरे को प्रेम करने वाले यदि बालिग हों तो उन्हें विवाह कर जिंदगी भर साथ निभाने की स्वतंत्रता कानून देता है, लेकिन बांछड़ा समुदाय में बालिगों को इस तरह के फैसले लेने का हक नहीं दिया जाता. इस दिशा में कोई एक कदम आगे बढ़ा भी तो फैसले के मुताबिक युवक को अपनी होने वाली पत्नी के परिजनों को बदले में लाखों रुपए चुकाने पड़ते हैं.कहा जाता है कि यह वसूली एक ही बार में इस कारण की जाती है क्योंकि लड़की से देह व्यापार कराने से होने वाली आमदनी विवाह के बाद हमेशा के लिए खत्म हो जाती है. साथ में पंचायत का खर्च भी देना होता है.

25 अप्रैल, 2016 को एक बांछड़ा समुदाय के युवकयुवती ने इसी परंपरा के प्रति विद्रोह करने का साहस दिखाया था. दोनों सीधे तत्कालीन एसपी मनोज कुमार सिंह के सामने पेश हुए और स्पष्ट तौर पर बताया कि युवती से 2 सालों से देह व्यापार कराया जा रहा था. गांव में अपनी ही बिरादरी के युवक से वह शादी करना चाहती थी, तब पंचायत बैठाई गई और युवक से दंडस्वरूप 50 हजार रुपए केवल इस बात के वसूल किए गए कि उस ने शादी के बारे में सोचने की गुस्ताखी क्यों की. इस दंड के बाद उसे सख्त हिदायत भी दी गई कि युवती की तरफ पलट कर देखा तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं. दंड भोगने के बाद युवक खरगोन चला गया, लेकिन युवती इस दलदल से बाहर निकलना चाहती थी. उस ने हिम्मत दिखाई और खरगोन जा कर उस ने युवक के साथ कोर्टमैरिज कर ली.

इस के बाद नीमच एसपी के सामने दोनों पेश हो गए. एसपी ने मामले की गंभीरता समझी और उन्होंने उस नवदंपति को अपने ही गांव में रहने के लिए सुरक्षित व्यवस्था कराई. इस समुदाय के युवा बताते हैं कि अब तक जात में आपसी विवाह जितने भी हुए हैं, अधिकांश में युवकों को 10 से 12 लाख रुपए या इस से अधिक भी वधू मूल्य चुकाना पड़ा है. ताजा हालात यह हैं कि भले ही पढ़ेलिखे नौजवान हैं, लेकिन उन की हालत लाखों रुपए चुकाने जैसी नहीं है, इसलिए वे कुंवारे बैठे हैं. समुदाय के लोग देह व्यापार का पक्ष लेते हुए यहां भी नियमों का हवाला देते हैं. जैसे एक नियम के अनुसार इन महिलाओं या बच्चियों के साथ उन के समाज का कोई भी पुरुष संबंध नहीं बना सकता. यदि ऐसा होता तो उसे समाज से निष्कासित कर दिया जाता है.

यदि वह युवती से शादी करना चाहे तो उसे युवती के पिता को लगभग 15 लाख रुपए का दहेज देना अनिवार्य है. यानी उतनी कमाई, जितनी एक लड़की अपने जीवन में पिता को दे सकती है. शिक्षक योगेश सारवाड़ कहते हैं कि इस समाज ने इस तरह के नियम बनाए हैं कि कोई भी लड़का लड़कियों से शादी न कर सके और वह देह व्यापार के लिए मजबूर हो जाएं. नियम के अनुसार शादीशुदा महिलाएं देहव्यापार नहीं करतीं. यानी जब तक शादी नहीं हुई है वे सार्वजनिक उपभोग की वस्तु हैं और उस के बाद निजी. बांछड़ा समुदाय में ऐसा काम करने वाली औरतों को खिलावड़ी कहा जाता है.

यह महिलाएं अपना जिस्म बेच कर पैसा कमाती हैं, लेकिन समाज में इसे बुरा नहीं माना जाता. बल्कि यहां ऐसी औरतों को सम्मान भी खूब मिलता है और यह लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं. समाज में महिलाओं का रुतबा पुरुषों के मुकाबले ऊंचा होता है. बांछड़ा समुदाय में प्रचलित इस प्रथा ने मन को झकझोर दिया था. सफर के दौरान ही विचार आया कि क्यों न देह व्यापार करने वाली कुछ लड़कियों से मिल कर इस की तह तक पहुंचा जाए. तब हम ने रतलाम के एक पत्रकार मित्र को फोन लगा कर संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि बांछड़ा समुदाय की एक लड़की है, जो इस समुदाय में जागरुकता के लिए काम कर रही है. उन के द्वारा बताए गए ठिकाने पर पहुंच कर हम ने विस्तार से बातचीत की तो देह व्यापार के इस शर्मनाक धंधे की कहानी हमें पता चली.

15 साल की उम्र में जिस्मफरोशी के दलदल में कदम रखने वाली निशा (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उस ने बचपन से अपने आसपास की लड़कियों को यह काम करते हुए देखा था, मगर सोचा नहीं था कि ऐसा समय भी आएगा कि उसे खुद को उन्हीं लड़कियों के साथ सड़क के किनारे पर खड़ा होना पड़ेगा. निशा ने इस काम को करने का ख़ूब विरोध किया था. उस ने घर वालों से कहा था कि वह पढ़ना चाहती है तो उसे मां बापू ने परंपरा की दुहाई दी. फिर भी नहीं मानी तो कहा गया कि तुम्हारी नानी और मां ने भी यही काम किया है. आखिर में दो जून की रोटी का वास्ता दिया गया.

निशा की आंखों के सामने अपने छोटेछोटे भाईबहनों के चेहरे घूमने लगे और घुटने टेकते हुए समझौता कर लिया. निशा भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजर रही थी. उस का दम घुट रहा था और इसी बीच उस ने एक बेटी को जन्म दिया. इसी के बाद निशा ने ठान लिया था कि वह अपनी बेटी को अब इस पेशे में नहीं आने देगी. उस ने कहा, ‘‘गुस्सा आता था. गलत लगता था. तकलीफ होती थी शरीर में. लेकिन मजबूरी के कारण करना पड़ता था. नहीं करते तो खाते क्या. बहुत सारी ऐसी लड़कियां थीं, जिन्हें एड्स की बीमारी भी लग गई. संबंध बनाते समय यह भी डर लगा रहता था कि कहीं गर्भवती न हो जाएं. इस के बावजूद कई लड़कियों के कम उम्र में बच्चे भी हो गए.’’

उस ने बताया कि उसी दौरान उसे एक गैरसरकारी संस्था ‘जन साहस’ के बारे में पता चला. यह संस्था लड़कियों को वेश्यावृत्ति से निकलने में मदद करती है. इस संस्था के लोग बांछड़ा समुदाय की लड़कियों से मिल कर उन्हें समझाते हैं. वह इस संस्था के लोगों से मिली. संस्था ने इस में उस की मदद की और उसे अपने यहां नौकरी भी दे दी. अब निशा अपने समुदाय की दूसरी लड़कियों को कुप्रथा के इस दलदल से निकालने में मदद कर रही है. वह उन से मिलती है और उन्हें शिक्षा से जोड़ने की कोशिश करती है. निशा की कोशिशों से समुदाय की कुछ लड़कियां इस कुचक्र से बाहर आ गई हैं लेकिन अब भी अनेक हैं, जो इस में फंसी हुई हैं.

इस कुप्रथा को खत्म करने की कोशिशों के तहत मध्य प्रदेश सरकार ने इन के पुनर्वास के लिए वर्ष 1993 में जबाली योजना शुरू करने का ऐलान किया गया था. इस योजना के तहत समुदाय के लोगों को जागरूक किया जाना, उन्हें शिक्षा से जोड़ना, कोई काम करने के लिए ट्रेनिंग देना शामिल है. लेकिन निशा का कहना है कि समुदाय की लड़कियों को कुछ रोजगार मिल जाए तो वे इस सब से बाहर निकल सकती हैं. वे कहती हैं, ‘‘कमाने के लिए कुछ है भी नहीं. इसीलिए तो मजबूरी में उन्हें वही काम करना पड़ता है. लड़कियां चाहती भी हैं कि निकल जाएं लेकिन निकल नहीं पाती हैं. क्योंकि दूसरा कोई रास्ता नहीं है न उन के पास.’’

बांछड़ा जनजाति के ही कुछ युवक इस कुप्रथा के खत्म करना चाहते हैं. तभी तो इस जनजाति के ही युवक आकाश चौहान ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर इस परंपरा को बंद करने की अपील की. न्यायालय ने इस संबंध में पुलिस को जरूरी काररवाई करने के आदेश दिए. अब पुलिस इस जनजाति के डेरों पर महीने 2 महीने में दबिश डाल कर इस धंधे में लिप्त लोगों के खिलाफ काररवाई करने की इतिश्री करती है. बांछड़ा समुदाय के लोगों का कहना है कि पुलिस ने अब उन से चौथ वसूलना शुरू कर दिया है. जब पुलिस को पैसा मिलना बंद हो जाता है तो रेड डाल कर लड़कियों व घर वालों को गिरफ्तार कर लेती है. लेकिन कोर्ट से जमानत के बाद लड़कियां फिर से इसी धंधे में जुट जाती हैं.

मध्य प्रदेश पुलिस ने बांछड़ा समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पहल शुरू की है. नीमच और मंदसौर जिलों में युवाओं को पुलिस भरती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. उन्हें विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पाठ्य सामग्री दी जा रही है. इस के अलावा लड़कियों को नर्स की परीक्षा के लिए तैयार किया जा रहा है. समुदाय के युवाओं के निजी कंपनियों में मुफ्त प्रशिक्षण ओर रोजगार के अवसर मुहैया कराने की मुहिम में पहले चरण में 100 युवाओं को नौकरी भी दिलाने में सहायता की. इतनी जागृति फैलाने के बाद भी इस समाज की लड़कियां पूरी तरह जिस्मफरोशी का धंधा नहीं छोड़ रहीं.

अशिक्षा और अंधविश्वास से घिरे बांछड़ा समुदाय की लड़कियों के जिस्मफरोशी की यह परंपरा उस समुदाय के नाकारा पुरुषों के दिमाग की उपज है, जो खुद कोई कामधंधा करने के बजाय महिलाओं के जिस्म का सौदा कर के अपने परिवार का पेट भरते हैं. महिला सशक्तीकरण का ढोल पीटने वाली सरकार की नाकामी का ये जीताजागता उदाहरण है. 21वीं सदी में इस तरह की दकियानूसी परंपराएं समाज के लिए किसी कोढ़ से कम नहीं हैं. Social Story in Hindi

—कथा समुदाय के लोगों से बातचीत और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

Social Stories in Hindi : जल्दी अमीर बनने के लालच में महिला ने बनाया हनीट्रैप गिरोह

Social Stories in Hindi : जल्द अमीर बनने के लिए 22 वर्षीय पायल ने 6 महिलाओं व पुरुषों के साथ एक ऐसा गिरोह बना रखा था जो पैसे वाले लोगों को हनीट्रैप के जाल में फांस कर मोटी रकम वसूलता था. कारोबारी युवक धीरज से मोटी रकम ऐंठने के चक्कर में ये सभी ऐसे फंसे कि…

23 नवंबर, 2020 की सुबह का वक्त था. मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाने के टीआई कमलेश सिंगार को थाने पहुंचे कुछ ही समय हुआ था कि पास के गांव रतनगढ़ से आए 2 लोग मोहन और धीरज ने उन से मिलने की इच्छा जाहिर की. टीआई ने उन दोनों को केबिन में बुला लिया. मोहन की उम्र कोई 40-45 साल थी, जबकि उस के साथ आए युवक धीरज की उम्र मुश्किल से 22 साल रही होगी. मोहन गांव में पंचायत स्तर की राजनीति से जुड़ा होने के कारण तेज था, इसलिए उस ने बिना लागलपेट के टीआई कमलेश सिंगार को साथ आए युवक धीरज के साथ हुई लूट की रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया. लेकिन धीरज इज्जत के डर से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाना चाहता था.

पूरे घटनाक्रम में मोहन भी जुड़ा हुआ था. इसलिए उस ने टीआई कमलेश सिंगार को पूरी घटना से अवगत करा दिया. इस के बाद टीआई ने मोहन की तरफ से एक अज्ञात युवती, 2 महिलाओं और 3 पुरुषों के खिलाफ लूट की रिपोर्ट दर्ज कर ली. 22 वर्षीय अविवाहित धीरज रतनगढ़ का रहने वाला था. संपन्न परिवार के धीरज का बड़ा करोबार था. एक दिन उस के मोबाइल फोन पर किसी अज्ञात नंबर से फोन आया.

‘‘हैलो, कौन?’’ धीरज ने फोन रिसीव करते हुए पूछा.

‘‘आप दिनेशजी बोल रहे हैं?’’ किसी लड़की की मीठी सी आवाज आई.

‘‘जी नहीं, शायद आप ने गलत नंबर मिलाया है,’’ धीरज ने कहा.

‘‘मेरी किस्मत में हमेशा गलत डायलिंग क्यों लिखी है.’’ उस युवती ने गहरी सांस लेते हुए कहा तो धीरज को अजीब लगा.

उस से कुछ बोलते नहीं बना. वह चुप रहा तो उधर से फिर आवाज आई, ‘‘हैलो आप सुन रहे हैं न?’’

‘‘हांहां सुन रहा हूं. लेकिन मैं दिनेश नहीं हूं.’’

‘‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप का नाम दिनेश है या नहीं. मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप ने कम से कम मेरा दर्द तो सुना, वरना इतनी बड़ी दुनिया में मेरा एक भी हमदर्द नहीं है.’’ वह बोली.

‘‘आप ऐसा क्यों सोचती हैं, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.’’ धीरज ने उसे तसल्ली देने वाले अंदाज में कहा.

‘‘पता नहीं कब होगा. मुझे तो लगता है कि सारी प्रौब्लम मेरे लिए ही हैं. मेरे पिता ने मुझे इतना पढ़ायालिखाया, लेकिन कुछ काम नहीं आया. खैर छोड़ो, आप क्यों मेरी कहानी सुन कर अपना समय खराब करेंगे.’’

‘‘अरे नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.’’ धीरज ने जल्दी से कहा. उसे डर था कि कहीं वह फोन न काट दे.

‘‘आप सुनेंगे मेरे दर्द की दास्तान?’’

‘‘जी, बताइए. हो सकता है मैं आप के किसी काम आ सकूं.’’

‘‘तो ठीक है. मैं रात में आप को इसी नंबर पर फोन करूंगी. कहानी लंबी है, फिर रात की तनहाई में किसी अपने के सामने दिल खोल कर रख देने का सुख ही अलग होता है. अच्छा, यह बताओ कि आप की पत्नी तो गुस्सा नहीं करेंगी.’’

‘‘अभी मेरी शादी नहीं हुई है.’’ धीरज ने बताया.

‘‘अरे तो फिर किसी लड़की के दिल पर यूं प्यारभरा हाथ रखना आप ने कहां से सीखा. आप मेरी कहानी सुनने के लिए राजी हो गए तो मुझे लगा जैसे आप अभीअभी मेरे दिल को बहुत हौले से छू कर गुजरे हो.’’ वह बोली.

‘‘आप की शादी हो गई?’’ धीरज ने कुछ हिम्मत कर के पूछा.

‘‘इस तन की तो हो गई लेकिन दिल की नहीं हुई.’’

‘‘क्या मलतब?’’

‘‘मतलब सीधा सा है यार. पति है, इसलिए मेरे शरीर को तो उस ने शादीशुदा बना दिया, लेकिन मेरे दिल को अब तक यह भरोसा नहीं दिला पाया कि वह मेरा पति है. अच्छा कोई आ जाएगा, बाकी बातें मैं रात में बताऊंगी, तुम अपनी तरफ से फोन मत करना मैं खुद कर लूंगी.’’

कहते हुए उस युवती ने काल डिसकनेक्ट कर दी तो धीरज ठगा सा खड़ा रह गया. उस का मन कर रहा था कि काश! अभी रात हो जाए और वह फिर उस युवती की मीठी आवाज सुने.

रात में उस युवती का फोन आ गया. वह बोली, ‘‘क्या कर रहे हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’ धीरज ने कहा.

‘‘धत मैं तो समझी थी कि तुम मुझे याद कर रहे होगे. सच कहूं तो आप से फोन पर बात करने के बाद से मैं लगातार आप को ही याद कर रही हूं.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘शायद इसी को पुराने जन्म का रिश्ता कहते हैं. हो सकता है, पिछले जन्म में आप मेरे रहे हो. इसलिए इस जन्म में भी मिल गए.’’

‘‘हां, हो सकता है.’’ धीरज ने थूक गटकते हुए कहा.

‘‘तो हमारे बीच इस जन्म में ये दूरी क्यों?’’

‘‘सब किस्मत की बात है.’’

‘‘सच कहा आप ने तभी तो नियति ने ऐसे पति के साथ बांध दिया जो दिन भर मेरे ऊपर अपने दिमाग की गरमी निकालता है और रात में अपने तन की. मेरी भावनाओं से तो जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं है. सच कहूं तो मेरा पति रात में तो मुझे केवल मशीन समझता है. आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कहना चाहती हूं.’’

‘‘जी, समझ रहा हूं.’’

‘‘कैसे? आप की तो अभी शादी भी नहीं हुई. कहीं ऐसा तो नहीं कि बिना शादी के ही गर्लफ्रैंड ने ये सब सिखा दिया हो.’’

‘‘मेरी कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं है.’’

‘‘तो मुझे समझ लो.’’

‘‘आप बनोगी मेरी फ्रैंड?’’

‘‘समझो बन गई. सच कहूं, अब आप मिल गए हो तो लगता है कि सब ठीक हो जाएगा. चंद पलों की इस बात में ही आप से मिलने का मन करने लगा है. आप मिलना चाहेंगे मुझ से?’’

‘‘जरूर.’’

‘‘कहां सब के सामने या कहीं अकेले में? ज्यादा परेशान तो नहीं करोगे न मुझे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो ठीक है, मैं 2-4 दिन में तुम से मिलने की कोशिश करती हूं.’’

उस के बाद काफी देर तक वह धीरज से मीठीमीठी बातें करती रही फिर दूसरे दिन फोन करने को कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया. दूसरे दिन धीरज इंतजार करता रहा लेकिन उस का फोन नहीं आया. अगले दिन उस ने बताया कि उसे मौका नहीं मिल पाया, इसलिए फोन नहीं कर सकी. इस बार उस ने अगले दिन धीरज को मल्हारगढ़ बस स्टैंड पर मिलने को कहा. धीरज न केवल राजी हो गया बल्कि उस के बताए समय पर वहां पहुंच भी गया. एकांत की मुलाकात थोड़ी देर में लगभग 22 साल की एक खूबसूरत युवती उस से आ कर मिली और उसे मस्ती करने के नाम पर गाडगिल सागर डैम ले गई. डैम पर एकांत में वह युवती धीरज को अपने साथ शारीरिक संबंध बनाने की दिशा में ले जाने लगी.

लेकिन इस से पहले कि बात ज्यादा आगे बढ़ती, मौके पर 2 महिलाएं और 2 युवक आ कर सीधे धीरज के साथ मारपीट करने लगे. महिलाएं उस पर आरोप लगा रहीं थी कि उस ने उन के परिवार की बहू को बिगाड़ दिया है. वह उस से अकेले में मिल कर शारीरिक संबंध बनाता है. धीरज ने उन के सामने बहुत हाथपैर जोड़े, लेकिन वे उसे थाने ले जा कर बलात्कार का मामला दर्ज करवाने पर अड़े रहे. इसी बीच वहां से एक आदमी गुजरा, जिस ने पूरा मामला सुन कर दोनों पक्षों को समझाया कि थाने जाने से कोई फायदा नहीं है. यहीं आपस में मामला निपटा लो.

इस के लिए युवती के परिवार वालों ने धीरज से 5 लाख रुपए की मांग की. इतना ही नहीं, उन्होंने उसी समय धीरज की जेब में रखे 70 हजार रुपए छीन लिए. धीरज के पास 5 लाख रुपए नहीं थे, इसलिए मामला 3 लाख में सेट हो जाने पर धीरज ने तुरंत अपने दोस्त मोहन को फोन लगा कर 3 लाख रुपया ले कर बुलाया. मोहन ने इस का कारण पूछा, लेकिन धीरज ने कुछ नहीं बताया. इसलिए अंधेरा होने तक मोहन धीरज के बताए स्थान पर पैसा ले कर तो आ गया मगर वह इस बात पर अड़ गया कि जब तक धीरज पैसों की जरूरत का कारण नहीं बताएगा, वह पैसे नहीं देगा.

लड़की और उस के साथियों ने धीरज की मोटरसाइकिल रख कर उसे अकेले ही मोहन के पास भेजा था. किसी तरह की बदमाशी दिखाने पर उन्होंने उसे बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने का डर भी दिखाया था. लेकिन जब मोहन बिना कारण जाने पैसे देने को राजी नहीं हुआ तो धीरज ने उसे पूरी बात बता दी. संयोग से इसी बीच धीरज के पास फिर बदमाशों का फोन आ गया. उन का कहना था कि जल्दी पैसे ले कर आओ वरना वे थाने जा कर मामला दर्ज करवा देंगे. इस पर मोहन ने धीरज के हाथ से फोन छीन लिया और खुद को पुलिस इंसपेक्टर बताते हुए धमकी दी तो बदमाशों ने अपना फोन स्विच्ड औफ कर लिया.

अगले दिन मोहन धीरज को किसी तरह थाने ले कर आया, लेकिन धीरज रिपोर्ट लिखवाने को राजी नहीं हुआ तो मोहन ने अपनी तरफ से रिपोर्ट दर्ज करवा दी. धीरज के साथ घटी लूट की घटना सुन कर टीआई कमलेश सिंगार को एक पुरानी घटना याद आ गई, जिस में इसी तरह से एक औरत ने 70 वर्षीय गांव के मुखिया को अपने जाल में फंसा कर उस से एक लाख 80 हजार रुपए लूट लिए थे. इस से टीआई समझ गए कि यह किसी गिरोह का काम है, जो नियोजित योजना के तहत लोगों को इज्जत का डर दिखा कर लूटने हैं. इसलिए उन्होंने इस गिरोह को खत्म करने के लिए कमर कस ली. अगले दिन टीआई कमलेश सिंगार ने उसी नंबर पर फोन लगाया, जिस से वह युवती धीरज को फोन किया करती थी.

युवती ने टीआई से उन का परिचय पूछा तो इंसपेक्टर सिंगार ने एक दिलफेंक युवक की तरह उस से बातें करते हुए उस के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया कि उस युवती ने ही कुछ दिन पहले उन्हें फोन किया था. चूंकि युवती इस तरह से कई लोगों को फोन लगाती रहती थी, इसलिए वह टीआई कमलेश सिंगार के जाल में फंस गई. टीआई सिंगार को अपना नया शिकार जान कर युवती ने पहले तो उन के साथ काफी अश्लील बातें कीं, फिर अकेले में मिलने की जगह तय कर गिरोह के दूसरे सदस्यों को शिकार पर चलने के लिए बुला लिया. लेकिन उस गिरोह के लोगों को क्या मालूम था कि आज उन का पाला ऐसे पुलिस इंसपेक्टर से पड़ने वाला है जो खुद उन का शिकार करने शिकारी बन कर आया है.

थोड़ी देर में वही स्थिति बन गई जो धीरज के साथ बनी थी. फिर युवती के बाद साथ आए 2 पुरुष और एक महिला ने उन्हें घेरने की कोशिश की. फिर टीआई कमलेश सिंगार की टीम ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सभी से पूछताछ की गई. पूछताछ के बाद 3 और महिलाओं व एक पुरुष को गिरफ्तार किया गया. गिरोह में शामिल 22 साल की युवती पायल सब से ज्यादा तेजतर्रार थी. उस ने एक मुसलिम युवक से शादी की थी. गिरोह के लोग उस की बात मानते थे. उस ने अपने गिरोह से कह रखा था कि जब वह शिकार पर हो तो गिरोह के लोग उस के पास इशारे पर ही आएं. क्योंकि शिकार पसंद आने पर पायल पहले उस युवक के साथ पूरी तरह संबंध बना कर अपना मन भरती थी, बाद में गिरोह की तिजोरी भरने के लिए बाकी सदस्यों को इशारा कर मौके पर बुला लेती थी.

गिरोह की बाकी महिला सदस्य हीराबाई, कुशालीबाई, नाथी उर्फ सुमन भी शिकार करने में माहिर थीं. मल्हारगढ़ पुलिस ने इन महिलाओं के साथ कारूलाल उर्फ करण निवासी गोपालपुरा, गुलाम हैदर उर्फ भयू निवासी रामपुरा और श्यामलाल उर्फ समरथ निवासी सावन को भी गिरफ्तार कर इन के पास से धीरज और रामपुरा निवासी एक अन्य युवक से लूटे गए एक लाख रुपए बरामद किए. गिरोह में जो 6 महिलाएं थीं, उन में से 3 की उम्र 20 से ले कर 24 साल और बाकी की 30-40 और 48 साल थी. ये ग्राहक की उम्र देख कर उस के सामने चारा बना कर डालने के लिए युवती चुनती थीं.

यदि शिकार जवान होता था तो तीनों युवतियों में से किसी एक को चारा बनाया जाता था और अगर शिकार अधेड़ होता तो फिर 30-40 साल वाली महिला सदस्य उस से प्रेमिका बन कर मिलती थीं. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Social Stories in Hindi