Delhi Medicine Scam : 650 करोड़ के भ्रष्टाचार से हेल्थ विभाग की सेहत खराब

Medicine Scam. दिल्ली स्वास्थ्य विभाग में 650 से 700 करोड़ रुपए का घोटाला उजागर होने पर प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है. फरजी दस्तावेजों, नियमों की अनदेखी और टेंडरों में बड़े पैमाने पर हेरफेर कर के सरकारी खजाने को चूना लगाया गया. स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के नाम पर किए गए इस महाघोटाले ने न सिर्फ पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरी व्यवस्था को ही कटघरे में ला खड़ा किया है.

किसी भी सरकार को संचालित करने के लिए औक्सीजन कहां से मिलती है? अर्थात सरकार को चलाने और जन कल्याण की योजनाओं को लागू करने के लिए पैसा कहां से आता है? इस का सीधा सा जवाब होगा कि जनता से मिलने वाले टैक्स से.

जी हां, भारत में केंद्र और राज्य सरकारों की आय का मुख्य स्रोत टैक्स से मिलने वाला पैसा होता है, जिसे मुख्य रूप से 2 भागों—प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर में बांटा गया है. केंद्र और राज्य सरकारें मिल कर ये कर वसूलती हैं, जिस से देश का विकास और सिस्टम संचालित होता है.

जो टैक्स सीधे जनता से और कंपनियों की आय के मुनाफे पर लगाया जाता है वो ‘प्रत्यक्ष करÓ होता है जैसे इनकम टैक्स, कारपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स. जबकि अप्रत्यक्ष कर वो होता है, जो वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है और उपभोक्ता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुकाया जाता है.

जैसे वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, सीमा शुल्क, स्थानीय कर, स्टांप ड्यूटी, प्रौपर्टी टैक्स, एक्साइज टैक्स और विभिन्न तरह के लाइसेंस और अनुमति देने पर लिया जाने वाला शुल्क. इन सभी तरह के टैक्स से होने वाली इनकम से ही सरकार का खजाना भरता है.

इस के बदले सरकार सड़कें, स्कूल, अस्पताल बनाती है. साथ ही ऐसी सभी जनकल्याणकारी योजनाओं में टैक्स के पैसे को खर्च करती है, जो उस की प्राथमिकता में होती हैं.

अब मान लीजिए कि भारीभरकम टैक्स वसूलने के बावजूद अगर सरकार व सिस्टम में बैठे अधिकारी और कर्मचारी आप को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं देने में लापरवाही बरतते हैं या इन सुविधाओं की आड़ में भ्रष्टाचार करें तो यही माना जाएगा कि सरकार के प्रशासनिक तंत्र में घुन लग चुका है. क्योंकि आप टैक्स तो दे रहे हैं, लेकिन आप को टैक्स के पैसे से दी जाने वाली सुविधाएं या तो मिल नहीं रहीं या मिल भी रही हैं तो इस तरह कि उस की आड़ में सिस्टम से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी अपनी जेबें गर्म कर रहे हैं.

दिल्ली में लोगों की सेहत को चुस्तदुरुस्त रखने वाले स्वास्थ्य विभाग में पिछले दिनों ऐसा ही मामला सामने आया, जहां पाया गया कि इस विभाग के एक बड़े हिस्से में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है.

घोटाले की शुरुआत

दरअसल, दिल्ली में 650 करोड़ से 700 करोड़ का मैडिकल और दवा खरीद का एक ऐसा घोटाला सामने आया, जो सरकारी तिजोरी को चूना लगाने और जनता की सेहत के साथ बड़े खिलवाड़ करने की कहानी है. इस घोटाले की जांच अब एंटी करप्शन ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी कर रही है.

इस घोटाले की शुरुआत दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में दवाओं और मैडिकल उपकरणों की खरीद करने वाली सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (सीपीए) से होती है, जो डायरेक्टरेट जनरल औफ हेल्थ सर्विसेज (डीजीएचएस) के अधीन आती है. अगस्त, 2025 में डा. वत्सला अग्रवाल दिल्ली डीजीएचएस की चीफ बनी थी.

एक साल का कार्यकाल पूरा होतेहोते स्वास्थ्य विभाग में सरेआम आरोप लगने लगे कि उस के आने के बाद व्यक्तिगत अस्पतालों से खरीद की पावर छीन कर पूरी तरह सीपीए को दे दी गई है और खरीद नियमों को बदल दिया गया है.

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता को स्वास्थ्य विभाग में तैनात कुछ अफसरों ने मई, 2026 में अलगअलग शिकायतें दे कर स्वास्थ्य विभाग की खराब सेहत के बारे में बताया था.

मुख्यमंत्री को बताया गया था कि हेल्थ विभाग की खरीद प्रक्रिया में जबरदस्त गड़बडिय़ां हो रही हैं.

सीएम को अपने करीबी लोगों से जानकारी मिली कि टेंडर प्रक्रिया में नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया है. तब सीएम ने अधिकारियों से चर्चा के साथसाथ मुख्य सचिव से भी चर्चा की.

शिकायतों के बाद सीएम रेखा गुप्ता ने आखिरकार स्वास्थ्य विभाग के विजिलेंस विभाग को इस की जांच करने की जिम्मेदारी सौंप दी. मुख्यमंत्री ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए और मामले की नियमित समीक्षा और निगरानी के आदेश भी दिए.

जांच प्रक्रिया प्रभावित न हो, इसलिए सीएम ने सब से पहले उन सभी अधिकारियों के दूसरी जगह ट्रांसफर किए, जिन के नाम इस मामले में सामने आ रहे थे. फिर जांच शुरू हुई.

घेरे में डा. रंगा और डा. वत्सला

विजिलेंस विभाग ने जांच शुरू की तो जो सच सामने आना शुरू हो गया, जिसे जान कर विजिलेंस विभाग भी सन्न रह गया. क्योंकि जांच के दौरान सीपीए के तत्कालीन प्रभारी डा. विनोद कुमार रंगा 4 दिनों तक औफिस ही नहीं पहुंचे. दूसरी ओर, तत्कालीन डीजीएचएस डा. वत्सला अग्रवाल भी अस्पताल में भरती हो गई. बाद में अपनी पोस्टिंग बदले जाने को चुनौती देते हुए वह कैट में पहुंच गई.

विजिलेंस की जांच में पाया गया कि डीजीएचएस ने किसी पारदर्शी टेंडर के ‘आपातकालीन जरूरतÓ दिखा कर करीब 400 करोड़ की दवाएं और उपकरण सीधे खरीदे लिए. टेंडर की शर्तें इस तरह बदली गईं कि सिर्फ चुनिंदा सप्लायरों को ही इस का फायदा पहुंचे. यानी नियम व शर्तों को कुछ खास ही सप्लायर पूरा कर सकें.

इन सप्लायरों से सामानों को बाजार कीमत से 3 से 5 गुना महंगे दामों पर खरीदा गया.

मसलन पोर्टेबल एक्सरे मशीन की बाजार कीमत करीब 10 लाख रुपए थी, लेकिन इन्हें 33 लाख रुपए प्रति मशीन के हिसाब से खरीदा गया. अस्पताल की चादरें 150 रुपए  की थीं, लेकिन सामान्य चादर को 450 रुपए में बिल किया गया. 2 से ढाई रुपए की कीमत वाला ओआरएस का पैकेट सरकारी फाइलों में 15 रुपए का दिखाया गया. जिस सर्जिकल सामान की कीमत 20 से 25 करोड़ रुपए थी, उस के लिए सरकारी खजाने से 100 करोड़ चुकाए गए.

विजिलेंस विभाग ने मात्र 10 दिनों में अपनी जांच रिपोर्ट से मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को अवगत कराते हुए बताया कि दवा और उपकरणों की खरीद से संबधित कुछ रिकौर्ड गायब कर दिए गए हैं और जीइएम पोर्टल पर टेंडर, भुगतान और खरीद प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद दस्तावेजों में गड़बड़ी सामने आ रही है.

भारीभरकम गड़बड़ी और संदिग्ध अफसरों के नाम सामने आने के बाद उन्होंने जांच रिपोर्ट के आधार पर विजिलेंस विभाग को तत्काल बीएनएस कानून के तहत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत इस की एफआईआर कराने के निर्देश दिए.

तेज जांच के आदेश

शिकायत मिलने के बाद दिल्ली एंटी करप्शन विभाग के संयुक्त आयुक्त विक्रमजीत सिंह ने 2 जून, 2026 को इस मामले में पहली एफआईआर दर्ज कर एक विशेष जांच टीम गठित कर जांच शुरू करा दी. चूंकि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने तेज जांच के आदेश दिए थे,  इसलिए एसीबी ने जांच को तेज कर दिया.

एसीबी ने कुछ ठोस सबूत जुटाए और 19 जून, 2026 को सब से पहले इस मामले में केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) के पूर्व प्रमुख एवं हेल्थ औफ औफिस विनोद कुमार रंगा को गिरफ्तार किया गया.

रंगा से पूछताछ शुरू हुई तो उस ने एक के बाद एक कई राज उगलने शुरू कर दिए. पूछताछ में सामने आया कि दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में हुआ घोटाला करीब 650 से 700 करोड़ रुपए का है. इस में दवा एवं चिकित्सा उपकरण खरीदने के नाम पर जबरदस्त घोटाला हुआ है.

भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने रंगा से पूछताछ और हासिल किए गए साक्ष्यों के आधार पर 27 जून, 2026 को पूर्व महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं (डीजीएचएस) डा. वत्सला अग्रवाल और डिप्टी कंट्रोलर (फाइनेंस) नीरज चोपड़ा को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों अधिकारियों को राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश कर पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया गया.

जांच एसीबी ने उन से टेंडर मंजूरी, वित्तीय अनुमोदन, भुगतान प्रक्रिया और खरीद संबंधी निर्णयों की परतदरपरत जांच शुरू कर दी.

इस दवा घोटाले में डा. वत्सला अग्रवाल की भूमिका शुरू से ही संदिग्ध नजर आ रही थी.

दरअसल, दिल्ली सरकार के अस्पतालों में मैडिकल उपकरणों और अन्य सामानों की खरीदारी सीपीए के जरिए की जाती है और यह विंग डीजीएचएस के अंदर आती है. डा. वत्सला के डीजीएचएस रहते हुए 18 मई को विजिलेंस ने छापेमारी की और इस छापेमारी के 3 दिन बाद 21 मई को उसे इस पद से हटा दिया गया. इस काररवाई के खिलाफ डा. वत्सला सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) पहुंची और कैट ने उस के तबादले के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी.

ट्रांसफर और सस्पेंशन

इस के बाद, पहली जून को एक नया और्डर जारी कर डा. वत्सला को जीटीबी अस्पताल ट्रांसफर कर दिया गया और उसी दिन दिल्ली सरकार ने सीपीए से 40 लोगों का ट्रांसफर किया था, जिस में 10 डौक्टर, 19 पैरामैडिकल स्टाफ और 10 प्रशासनिक स्टाफ शामिल थे. इस के अलावा 12 मैडिकल औफिसर सीपीए में तैनात किए गए.

इस के बाद 9 जून को वत्सला अग्रवाल को सस्पेंड कर दिया गया.

डा. वत्सला अग्रवाल और नीरज चोपड़ा की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में कई अन्य अधिकारियों के भी जांच में शामिल होने की जानकारी सामने आ रही थी, जिस के बाद उन अफसरों को भी नोटिस भेजे गए.

एसीबी के सामने 100 से अधिक डौक्टरों और अधिकारियों को जांच के दायरे में लिया जा चुका था, जिन में सब से बड़ी संख्या डौक्टरों की थी. कई सरकारी अस्पतालों से रेकौर्ड जुटाए गए और संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की जाने लगी.

एसीबी की जांच में संदिग्ध भूमिका सामने आने के बाद दिल्ली सरकार ने 5 फार्मासिस्टों और 2 सीपीए अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड कर दिया.

एसीबी जांच में यह पता लगाने में जुटी थी कि सीपीए को भेजी गई दवाओं, उपकरणों और अन्य स्वास्थ्य सामग्री की मांग वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप थी भी या नहीं. इस के लिए अस्पतालों से भेजे गए मांग पत्रों, उपलब्ध स्टौक, वास्तविक खपत और बाद में की गई खरीद का मिलान किया जाने लगा, क्योंकि जांच को इस पहलू पर भी केंद्रित किया गया था कि कहीं आवश्यकता से अधिक या कथित रूप से बढ़ाचढ़ा कर मांग भेज कर खरीद को प्रभावित तो नहीं किया गया.

जब्त किए दस्तावेज

जांच शुरू करने के दौरान शकरपुर स्थित सीपीए कार्यालय से बड़ी संख्या में दस्तावेज और रिकौर्ड जब्त किए गए थे. हालांकि कई महत्त्वपूर्ण टेंडरों से जुड़ी फाइलें नहीं मिली थीं. इन में सी आर्म मशीन, पोर्टेबल एक्सरे मशीन, एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, दवाओं तथा लिनेन सामग्री की खरीद से जुड़े दस्तावेज शामिल बताए गए हैं.

दवा एवं चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले की जांच में एसीबी को स्टौक औडिट में केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) के माध्यम से हुई खरीद और सरकारी अस्पतालों के रिकौर्ड का मिलान मेल नहीं खा रहा था. सब से बड़ी चुनौती यह पता लगाना था कि जिन दवाओं और उपकरणों का भुगतान किया गया, वे वास्तव में अस्पतालों तक पहुंचे भी या नहीं, उन का स्टौक दर्ज किया गया या नहीं, उन का उपयोग मरीजों के उपचार में हुआ या नहीं. इन में से किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिल पा रहा था.

एसीबी की जांच में फोकस अब केवल यह देखने तक सीमित नहीं कि टेंडर किसे मिला और भुगतान किसे हुआ, बल्कि यह भी पता लगाया जाने लगा कि जिन सामानों की खरीद दिखाई गई, उन का भौतिक अस्तित्व क्या है

यदि सामान अस्पतालों तक पहुंचा तो उस का उपयोग किस विभाग में हुआ और उस का कितना स्टौक बचा है.

एसीबी अब स्वास्थ्य विभाग में हुई पूरी खरीद प्रक्रिया की पूरी सप्लाई चेन की जांच कर रही थी. खरीद आदेश, सप्लाई और्डर, डिलीवरी चालान, निरीक्षण रिपोर्ट, अस्पतालों के स्टौक रजिस्टर, वितरण रिकौर्ड, उपयोग का ब्यौरा और भुगतान संबंधी दस्तावेजों का एकदूसरे से मिलान किया.

कई सरकारी अस्पतालों से मूल रिकौर्ड तलब किए गए, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि खरीद और वास्तविक आपूर्ति के बीच विसंगति कहां पर है.

जांच के दौरान कई अस्पताल भी दायरे में आ गए. जीबी पंत अस्पताल में 15 करोड़ से अधिक की अनियमितताओं के आरोपों की जांच भी इसी का हिस्सा है. लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में 17.70 करोड़ रुपए के टेंडर को ले कर अनियमितताओं की जांच शुरू हो गई, जबकि गुरु तेग बहादुर अस्पताल में दवा और उपकरण खरीद से जुड़े दस्तावेजों की भी पड़ताल होने लगी.

जांच के दौरान सरकारी अस्पतालों में वर्षों से निष्क्रिय पड़े चिकित्सा उपकरणों की अस्पताल वार सूची तैयार की जाने लगी. उन के उपयोग की स्थिति का विवरण मांगे जाने से जांच को नई तेजी मिल गई. इस जांच का सब से महत्त्वपूर्ण चरण अब भौतिक सत्यापन था.

इसी कारण पूरे खरीद तंत्र की चरणबद्ध तरीके से जांच होने लगी. इस से यह उजागर हो सकेगा कि 650 करोड़ के दवा व उपकरण खरीद घोटाले का दायरा केवल सीपीए तक सीमित था या इस की कडिय़ां सरकारी अस्पतालों के भीतर तक फैली हुई थीं.

राजीव रंगीला हुआ फरार

इस बड़े वित्तीय हेरफेर में जांच का दायरा अब केंद्रीय खरीद एजेंसी तक सीमित नहीं रह गया था. इस की जद में बहुत से अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ निजी कंपनियां आ चुकी थीं. इसी को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (इडी) ने भी मनी लौंड्रिंग (पीएमएलए) के तहत केस दर्ज कर लिया और जांच शुरू दी.

ईडी का फोकस मनी ट्रेल पर था और यह पता लगाया जाने लगा कि सरकारी भुगतान किन कंपनियों, खातों और अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचा.

एसीबी की जांच में शुरुआती दौर में ही सामने आया कि इस घोटाले का मास्टरमाइंड और मुख्य आरोपी राजीव रंगीला है. जो दिल्ली की एक लोकल अदालत से किसी दूसरे मामले में अग्रिम जमानत ले कर देश छोड़ कर भागने में सफल रहा था.

अब तक की जांच में यह भी सामने आया कि करोड़ों की घूस और भ्रष्टाचार के इस घोटाले की सब से हैरान करने वाली कहानी का सब से मुख्य किरदार कौन्ट्रैक्टर और फार्मास्युटिकल ट्रेडर राजीव कुमार रंगीला है. राजीव रंगीला ने ही इस सौदे को पक्का करने के लिए अधिकारियों में लगभग 300 करोड़ की घूस बांटी थी.

मतलब साफ था कि घूस की रकम अधिकारियों में बंटी. इसीलिए ईडी ने संदेह की जद में आए सभी अधिकारियों के बैंक खातों उन के खर्च के ब्यौरे यहां तक कि उन के बच्चे कहां पढ़ रहे हैं, उन के खरचे और दूसरे व्यवसाय व संपत्तियों के विवरण जुटाने शुरू कर दिए.

एसीबी ने राजीव रंगीला के एक भाई से पूछताछ की तो पता चला कि राजीव गिरफ्तारी से बचने के लिए जर्मनी चला गया है. राजीव रंगीला के फरार होने के कारण एसीबी ने उस की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी के साथ उस के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी करा दिया.

एसीबी ने जब राजीव रंगीला के बारे में छानबीन शुरू की तो पता चला कि राजीव अरोड़ा ही राजीव कुमार रंगीला के नाम से मशहूर था. दवाओं का सप्लायर होने के साथ वह राजनीति से भी जुड़ा रहा था.

वह मूलरूप से हरियाणा के करनाल जिले में इंद्री का रहने वाला है. उस ने 2014 में करनाल जिले की इंद्री विधानसभा सीट से बतौर  निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में उसे 12,830 वोट मिले और वह पांचवें स्थान पर रहा.

लेकिन पिछले कुछ सालों में राजीव रंगीला ने अपने राजनीतिक और नौकरशाही में बने घनिष्ठ संबधों के कारण पूरी तरह अपने कारोबार में पांव पसार दिए थे.

वह मैडिकल उपकरण और दवाइयों की सप्लाई करने वाली कंपनियों, डायरेक्टोरेट जनरल औफ हेल्थ सर्विसेज (डीजीएचएस) और सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (सीपीए) के अधिकारियों के बीच अहम कड़ी के रूप में काम करता था. इसीलिए एसीबी और ईडी अब रंगीला ब्रदर्स, गिरफ्तार अधिकारियों और उन के करीबियों के बैंक खाते, वित्तीय लेनदेन, संपत्तियों और कंपनियों में संभावित हिस्सेदारी की जांच करने में जुट गई. हाल ही में किन रिश्तेदारों या सहयोगियों के नाम पर संपत्तियां खरीदी गईं और उन के लिए पैसा कहां से आया, इस की भी जांच शुरू हो गई है.

साथ ही, जिन कंपनियों को दवाइयों, सर्जिकल सामान और मैडिकल उपकरणों की सप्लाई के बड़े और्डर मिले थे, उन के निदेशकों, साझेदारों और लाभार्थियों का रिकौर्ड भी खंगाला जाने लगा.

एसीबी और ईडी ने दवा सप्लायर राजीव अरोड़ा उर्फ राजीव रंगीला ब्रदर्स से जुड़े नेटवर्क की पड़ताल तेज कर दी. मैडिकल सामान की सप्लाई करने वाली कंपनियों, बिचौलियों और खरीद प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बीच संबंधों की कडिय़ां इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

सब से हैरानी की बात यह है कि जब दवा घोटाले की जांच आंतरिक विजिलेंस ने शुरू की तो राजीव रंगीला को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया गया था, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ. इस के बाद जांच एजेंसी एसीबी ने उस के संभावित ठिकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और उस से जुड़े लोगों के यहां भी तलाशी अभियान चलाया, लेकिन तब तक वह फरार हो चुका था. क्योंकि उस की गिरफ्तारी के बाद ही खरीद प्रक्रिया और वेंडर नेटवर्क से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा हो सकता है.

राजीव रंगीला की जड़ें स्वास्थ्य विभाग में कितनी गहरी थीं और उस के भ्रष्टाचार का नेटवर्क कितना व्यापक था, इस का अंदाजा भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) की ओर से मामले से जुड़ी अदालत में एसीबी के बयान से ही लगाया जा सकता है.

नौकर निकला डायरेक्टर

एसीबी ने कोर्ट को बताया कि जिन कंपनियों को करोड़ों रुपए के सरकारी ठेके मिले, उन में से एक कंपनी का निदेशक विभाग के ही एक डौक्टर का घरेलू कर्मचारी (नौकर) है,  जबकि दूसरी कंपनी का पंजीकृत कार्यालय महज 20 वर्गमीटर के छोटे से भूखंड पर संचालित पाया गया. इस के बावजूद इन्हीं कंपनियों को करोड़ों रुपए के खरीद आदेश जारी किए गए और लगातार भुगतान भी होता रहा.

एसीबी ने अदालत को बताया कि इन कंपनियों का वास्तविक संचालन मुख्य आरोपित राजीव अरोड़ा उर्फ राजीव रंगीला करता था. जांच के दायरे में एफ मेड डिवाइसेज, टेक्नोक्रेट्स, आशी सर्जिकल्स, राजश्री और एम. साहिब एंड संस सहित कई फर्में हैं.

आरोप है कि इन्हीं कंपनियों के माध्यम से दवाओं, सर्जिकल सामग्री, पोर्टेबल एक्सरे मशीनों, ओआरएस, चादरों और अन्य चिकित्सा सामग्री की खरीद में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं की गईं.

इन कंपनियों के माध्यम से 200 करोड़ रुपए से अधिक के वित्तीय लेनदेन हुए, जिन की पड़ताल की जा रही है. एसीबी और ईडी इन कंपनियों के बैंक खातों, डिजिटल लेनदेन, अर्जित चलअचल संपत्तियों और वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करने में जुटी है.

इस घोटाले में सब से बड़ी चुनौती अब यह पता लगाना है कि जिन दवाओं और उपकरणों का भुगतान किया गया, वे वास्तव में अस्पतालों तक पहुंचे भी या नहीं? उन का स्टौक दर्ज किया गया या नहीं? उन का उपयोग मरीजों के उपचार में हुआ या नहीं? इन में से किसी भी सवाल का जवाब कथा संकलन तक नहीं मिल पाया और ये सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि ज्यादातर दस्तावेज या तो गायब कर दिए गए या उन्हें नष्ट कर दिया गया.

खरीद व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने पर विचार

सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (सीपीए) के जरिए दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मैडिकल उपकरणों और दवाओं की खरीददारी में करोड़ों का कथित घोटाला उजागर होने और कई अधिकारियों की मिलीभगत सामने आने के बाद मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सख्त रुख अपनाया है. एक तरफ जहां सरकार के प्रमुख विभागों में लंबे समय से तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले किए जा रहे हैं, वहीं अब सरकार अपने खरीद सिस्टम में भी बड़े बदलाव लाने की तैयारी कर रही है.

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दवाइयों और मैडिकल उपकरणों की खरीद से जुड़े करीब 650 करोड़ के कथित घोटाले की जांच अब नए चरण में पहुंच गई है. एंटी करप्शन ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय अब सिर्फ टेंडर और खरीद प्रक्रिया की जांच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह भी पता लगाया जा रहा है कि कथित गड़बडिय़ों से किसे आर्थिक फायदा हुआ, पैसा किन रास्तों से गुजरा और उस से किस के नाम पर संपत्तियां बनाई गईं.

जानकारी के मुताबिक, टेंडर, अलौटमेंट और खरीद प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए सरकार अब कई अन्य राज्यों में खरीद प्रक्रिया के सिस्टम का अध्ययन कर रही है.

सरकार का मानना है कि सिस्टम को पूरी तरह सेंट्रलाइज्ड या डीसेंट्रलाइज्ड करने के बजाय एक ऐसा कंबाइंड सिस्टम बनाया जाए, जिस से खरीद प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर पारदर्शिता भी लाई जा सके और टेंडर कौल करने से ले कर प्रोक्योरमेंट तक का सारा काम समयबद्ध तरीके से पूरा हो सके.

इस के लिए स्टेट लेवल पर किसी नई एजेंसी के गठन की संभावनाओं को भी तलाशा जा रहा है, जो सभी सरकारी विभागों और एजेंसियों के लिए खरीदारी कर सके.

अब घोटाला उजागर होने के बाद हुई काररवाई का मकसद प्रशासनिक तंत्र को संदेश देना था कि सरकार में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार बरदाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे उस का राजनीतिक असर ही क्यों न पड़े और अगर कोई उस में शामिल पाया जाता है तो उसे बिलकुल भी बख्शा नहीं जाएगा.

चेतावनी नजरअंदाज न होती तो टल सकता था दवा घोटाला 

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में सामने आए 650 करोड़ रुपए के दवा एवं उपकरण खरीद घोटाले की जांच के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है. कहा जा रहा है कि वर्ष 2024 में मिले संकेतों पर समय रहते सख्त काररवाई होती तो जालसाजों की 2026 में 650 करोड़ के घोटाले करने की हिम्मत ही नहीं पड़ती.

विभागीय दस्तावेज बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की खरीद और आपूर्ति व्यवस्था में घपलेघोटाले को ले कर आशंकाएं नई नहीं थीं. 30 जनवरी, 2024 को एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने दीनदयाल उपाध्याय (डीडीयू) अस्पताल के स्टोर प्रभारी को नोटिस जारी कर विभिन्न चिकित्सा सामग्रियों की खरीद और आपूर्ति से जुड़े मूल रिकौर्ड तलब किए थे.

नोटिस में उल्लेख है कि स्वास्थ्य विभाग की विजिलेंस शाखा की ओर से जांच के लिए भेजे गए सामानों के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए थे.

दस्तावेज बताते हैं कि 2024 में डीडीयू अस्पताल में अधोमानक दवा व सामग्री आपूर्ति के साथ 70 लाख रुपए की दवा चोरी का मामला भी सामने आया था. इस में स्टोर इंचार्ज और सिक्योरिटी इंचार्ज निलंबित हुए थे.

तब आरोप लगे थे कि दवा चोरी की शिकायत ही झूठी है, दवा आपूर्ति हुई ही नहीं थी. जांच में मामला खुलने का डर सताया तो दवा चोरी का स्वांग रच दिया गया. हालांकि जांच में इस की अधिकारिक पुष्टि नहीं की गई.

इस मामले में 30 जनवरी, 2024 को एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने डीडीयू अस्पताल के स्टोर प्रभारी को नोटिस जारी कर विभिन्न चिकित्सा सामग्रियों की खरीद और आपूर्ति से जुड़े मूल रिकौर्ड तलब किए थे.

स्वास्थ्य विभाग की विजिलेंस शाखा द्वारा लिए गए कुछ नमूने परीक्षण में असफल पाए गए थे. इन में बैंडेज, कौटन, सर्जिकल ग्लव्स, हैंड सैनिटाइजर, इन्फ्यूजन सेट, कौटन गाज और सर्जिकल मास्क जैसी सामग्री शामिल थी.

यानी एक ओर दवा चोरी का मामला सामने आया, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों को आपूर्ति की गई चिकित्सा सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे. इन घटनाओं ने स्वास्थ्य विभाग की खरीद और आपूर्ति प्रणाली की पारदर्शिता, गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी तंत्र पर उस समय गंभीर प्रश्न खड़े किए थे.

अब वर्ष 2026 में दर्ज एफआईआर में दवाओं, सर्जिकल सामग्री और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में घोटाले, टेंडर शर्तों में हेरफेर, चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं को लाभ पहुंचाने, खरीद दरों में भारी अंतर और सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं.

अब स्वास्थ्य विभाग में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि यदि 2024 में सामने आए मामलों के बाद खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता परीक्षण, स्टौक सत्यापन, रिकौर्ड प्रबंधन और जवाबदेही व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाता तो 650 करोड़ के घोटाले को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ा जा सकता था.

इसे ले कर पुराने मामलों, शिकायतों और वर्तमान जांच के बीच संभावित संबंधों की भी पड़ताल किए जाने की मांग दबी जुबान में उठाई जा रही है. Medicine Scam

—रिपोर्ट एसीबी की जांच और सरकार की काररवाई पर आधारित

Uttarakhand Crime: होमगार्ड वरदी घोटाला डिप्टी कमांडेंट सस्पेंड

 Uttarakhand Crime: 2 बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित, उत्तराखंड और पूरे देश में इंस्टाग्राम अकाउंट पर ‘सिंगर इन खाकी’ नाम से मशहूर सिंगर और उत्तराखंड होमगार्ड सेवा में निदेशक होमगार्ड (डिप्टी कमांडेंट जनरल) अमिताभ श्रीवास्तव पर वरदी घोटाले का गंभीर आरोप लगा है. आखिर कौन हैं अमिताभ श्रीवास्तव और क्या है उत्तराखंड का बहुचर्चित होमगार्ड वरदी घोटाला?

उत्तराखंड राज्य की पहचान के कुछ प्रमुख स्तंभ हैं. इसे आध्यात्मिक केंद्र भी कहा जाता है. यहां पर हिंदुओं के 4 प्रमुख धाम केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री स्थित हैं. उत्तराखंड अपनी ऊंची हिमालय चोटियों, ग्लेशियरों और फूलों की घाटी के लिए भी जाना जाता है. यहां का ऋषिकेश शहर विश्व की योग राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है. उत्तराखंड भारत की नदियों गंगा और यमुना का उद्गम स्थल भी है. इन्हीं सभी विशेषताओं के लिए उत्तराखंड को मुख्यरूप से ‘देवभूमि’ के रूप में भी जाना जाता है.

24 जनवरी, 2026 को जब प्रदेश के होमगार्ड एवं सिविल डिफेंस डिपार्टमेंट में होमगाड्र्स के लिए वरदी सामग्री की खरीद प्रक्रिया में 2 करोड़ रुपए के घोटाले की खबर सामने आई तो पूरे उत्तराखंड में हड़कंप सा मच गया था. यह बड़ा घोटाला वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान होमगाड्र्स की वरदी सामग्री की खरीद में अनियमितताओं से संबंधित था.

इस में तत्कालीन होमगाड्र्स एवं सिविल डिफेंस डिपार्टमेंट के निदेशक (डिप्टी कमांडेंट जनरल) अमिताभ श्रीवास्तव पर सीधासीधा आरोप लगाया गया था कि होमगार्ड की वरदी, जूते, जैकेट और डंडे जैसी सामग्रियों को बाजार दर से लगभग 3 गुना अधिक दाम पर खरीदा गया था, जिस से सरकारी खजाने को करीब 2 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. उत्तराखंड के गृह सचिव शैलेश बगौली के अनुसार, इस गंभीर मामले में 15 दिन पहले कमांडेंट जनरल होमगार्ड का पत्र उन्हें प्राप्त हुआ था, जिस में बताया गया था कि होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कई गंभीर अनियमितताएं की थीं.

गृह सचिव के अनुसार इस वित्तीय घोटाले की विस्तृत जांच के लिए शासन स्तर के अधिकारियों की एक विशेष टीम का गठन कर जांच शुरू कर दी गई है. इस मामले में होमगार्ड के कमांडेंट जनरल डा. पी.वी.के. प्रसाद ने दोषी अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज कराने, 2 करोड़ रुपए की रिकवरी कराने के साथसाथ दोषी अधिकारी अमिताभ श्रीवास्तव को बरखास्त करने की रिपोर्ट भी शासन को भेजी है.

पटवारी भरती घोटाला

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद सब से पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती घोटाला माना जाता है, जो पूर्व और दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (2002-2007) के कार्यकाल में शुरुआती वर्षों में हुआ था. यह घोटाला मुख्यरूप से वर्ष 2002 में सामने आया था, इस में राजस्व विभाग में पटवारियों की भरती में बड़े पैमाने पर धांधली और भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे.

उत्तराखंड राज गठन के बाद पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती का माना जाता है जो दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में हुआ था. 

यह नवगठित राज्य के प्रशासनिक ढांचे पर पहला बड़ा दाग माना गया. इस मामले में पौड़ी के एक वरिष्ठ नौकरशाह (ब्यूरोक्रेट) की सेवाएं 2002 में ही समाप्त कर दी गई थीं. घोटाले की जांच के बाद कई नियुक्तियों को संदिग्ध पाया गया और प्रशासनिक स्तर पर काररवाई की गई. हालांकि समय गुजरने के साथसाथ यह मामला राजनीतिक आरोपोंप्रत्यारोपों में उलझ कर रह गया.

स्टर्डिया भूमि घोटाला

यह मामला वर्ष 2010 में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के मुख्यमंत्री काल के दौरान सामने आया था. ऋषिकेश के वीरभद्र रोड पर स्थित 50.47 एकड़ जमीन 1960 में स्टर्डिया कैमिकल्स लिमिटेड को कैल्शियम कार्बोनेट फैक्ट्री लगाने को दी गई थी. इस में विवाद की वजह तब बनी, जब 1990 के दशक में फैक्ट्री बंद हो गई और कंपनी को बीमार घोषित कर दिया गया. इस के बाद इस औद्योगिक भूमि को स्टर्डिया डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (एक बिल्डर कंपनी) को हस्तांतरित कर दिया गया.

इस में यह आरोप लगाया गया कि औद्योगिक उपयोग के लिए आवंटित इस बेशकीमती जमीन का उपयोग बदल कर इसे आवासीय और व्यावसायिक कौंप्लेक्स बनाने की गलत अनुमति दी गई और आवश्यक शुल्क में भी काफी भारी छूट दी गई, जिस के कारण सरकारी खजाने को कथित तौर पर 400 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. इस के बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस हाउसिंग प्रोजेक्ट को रद्ïद कर दिया था और सरकार को इस जमीन को वापस अपने कब्जे में लेने का आदेश जारी किया.

बढ़ते विवाद और अदालती आदेशों के बाद राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के लिए जस्टिस बी.सी. कांडपाल की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया, लेकिन चौतरफा दबाव के बाद तत्कालीन बीजेपी सरकार ने कंपनी को दी गई रियायतों और अनुमतियों को आखिरकार नोटिस जारी किया था. बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के मुख्यमंत्री काल (2009-2011) के दौरान जल विद्युत परियोजनाओं के आवंटन में कथित अनियमितताओं का मामला भी उत्तराखंड में काफी चर्चित रहा था.

उत्तराखंड राज गठन के बाद पहला और चर्चित घोटाला पटवारी भरती का माना जाता है जो दिवंगत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में हुआ था. 

इस में सरकार पर यह आरोप था कि सरकार ने वर्ष 2010 की शुरुआत में लगभग 56 लघु जल विद्युत परियोजनाओं का आवंटन निजी कंपनियों को नियमों को ताक पर रख कर किया था. इस में विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि आवंटन में ‘सेल्फ आइडेंटिफाइड’ रूट का गलत इस्तेमाल किया गया. यह भी आरोप लगाया गया कि कंपनी की वित्तीय क्षमता की जांच किए बिना और उचित नीलामी प्रक्रिया का पालन किए बिना आवंटन किया गया, जिस से सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान हुआ.

चौतरफा राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद जुलाई 2010 में निशंक सरकार ने खुद ही इन 56 परियोजनाओं के आवंटन को रद्द कर दिया था.

एनएच-74 घोटाला

यह मुख्य घोटाला कांग्रेस पार्टी की हरीश रावत सरकार (2014-2017) के कार्यकाल के दौरान सामने आया था. यह घोटाला वर्ष 2011 से 2016 के बीच सितारगंज से हरिद्वार के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग-74 के चौड़ीकरण के दौरान हुआ. इस में कृषि भूमि को अवैध रूप से अकृषि (सेक्शन 43) दिखा कर मुआवजे की राशि को 8 से 10 गुना तो कहीं पर 20 गुना तक बढ़ा दिया गया था.

जिम कार्बेट की पाखरो रेंज में पर्यावरणीय भ्रष्टाचार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत और तत्कालीन डीएफओ किशन चंद की भूमिका की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत’ का उल्लंघन बताया था

इस घोटाले की जांच में लगभग 300 से 500 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितता पाई गई थी. इस में आरोपी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारी, राजस्व विभाग के कर्मचारी, किसान और बिचौलिए सामने आए थे. इस मामले में 2 वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पंकज कुमार पांडेय और चंद्रेश यादव को सितंबर 2018 में निलंबित किया गया था, हालांकि बाद में क्लीन चिट दे दी गई. इस घोटाले में 8 पीसीएस अधिकारी और 20 से अधिक राजस्व अधिकारियों को निलंबित या गिरफ्तार किया गया था.

सीबीआई ने इस मामले में जांच की और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लांडिंग के तहत केस दर्ज किया. जून, 2025 में ईडी ने वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी दिनेश प्रताप सिंह के ठिकानों पर छापेमारी कर 24.70 लाख रुपए नकद व अन्य दस्तावेज बरामद किए. गिरफ्तारी के डर से कई किसानों और भूस्वामियों ने अनुचित तरीके से प्राप्त अतिरिक्त मुआवजे की राशि प्रशासन को वापस करना शुरू कर दी थी. अभी भी इस केस में ईडी की छापेमारी जारी है, जिस में नए सबूत जुटाए जा रहे हैं.

जिम कार्बेट घोटाला

उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट नैशनल पार्क को कौन नहीं जानता, लेकिन इस नैशनल पार्क की पाखरों रेंज में हुआ घोटाला देश के सब से चर्चित पर्यावरणीय और प्रशासनिक भ्रष्टाचारों में से एक रहा है. इस में नियमों को ताक पर रख कर अवैध निर्माण और जंगलों के अवैध कटान का गंभीर आरोप है. इस में टाइगर सफारी प्रोजेक्ट के नाम पर केवल 163 पेड़ों को काटने की अनुमति मिली थी, लेकिन जांच में पाया गया कि यहां पर 6 हजार से भी अधिक पेड़ अवैध रूप से काट दिए गए थे.

दूसरा गंभीर आरोप यह था कि बिना किसी वित्तीय या वैधानिक स्वीकृति के कंक्रीट के अवैध भवन, गेस्टहाउस और सड़कों का अवैध रूप से निर्माण कराया गया था. इस गंभीर घोटाले में लगभग 215 करोड़ रुपए के फंड के दुरुपयोग और मनी लांड्रिंग के आरोप लगे. इस घोटाले में उच्चतम न्यायालय ने पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत और तत्कालीन डीएफओ किशन चंद की भूमिका की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘सार्वजनिक विश्वास के सिद्धांत’ का उल्लंघन बताया.

सीबीआई इस मामले में सितंबर 2023 से जांच कर रही है. सीबीआई ने इस मामले में 5 अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन से अनुमति मांगी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नवंबर 2025 को निर्देश दिया कि पार्क के भीतर सभी अवैध कंक्रीट संरचनाओं को 3 महीने के भीतर ढहा दिया जाए और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई की जाए. ईडी ने मनी लांड्रिंग की जांच करते हुए डीएफओ रहे किशन चंद की 31.8 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है और चार्जशीट भी दाखिल कर दी है.

इस मामले में पूर्व वनमंत्री हरक सिंह रावत के ठिकानों पर फरवरी, 2024 में ईडी ने छापेमारी की और हाल ही में जनवरी 2026 में ईडी ने इस मामले से जुड़ी करोड़ों की संपत्ति भी अटैच की है.

पेपर लीक घोटाला

उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) पेपर लीक घोटाला मुख्यरूप से 2025 की स्नातक स्तरीय भरती परीक्षा में हुई धांधली से जुड़ा हुआ है. 21 सितंबर, 2025 को आयोजित स्नातक स्तरीय भरती परीक्षा जिस में 416 पदों के लिए आवेदन किए गए थे, इसी दौरान हरिद्वार के एक केंद्र से प्रश्नपत्र के 3 पन्ने वाट्सऐप पर वायरल हो गए थे. इस की जांच में यह बात सामने आई कि मुख्य आरोपी खालिद मलिक ने परीक्षा हौल से अपने मोबाइल फोन के जरिए प्रश्नपत्र की फोटो खींची और अपनी बहन साबिया को भेजी. यह प्रश्नपत्र इस के बाद टिहरी की असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन चौहान को भेजा गया, जिन्होंने प्रश्नों को हल कर के वापस भेजा था.

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (बाएं) स्टिंग औपरेशन केवल उत्तराखंड राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित रहा था. यह स्टिंग औपरेशन उमेश कुमार (दाहिने- समाचार प्लस चैनल के तत्कालीन सीईओ और वर्तमान में खानपुर से निर्दलीय विधायक) द्वारा किया गया था.

इस के बाद भारी विरोध प्रदर्शनों के बाद यूकेएसएसएससी ने 11 अक्तूबर, 2025 को इस परीक्षा को निरस्त कर दिया और घोषणा की थी कि अगले 3 महीनों के भीतर यह परीक्षा पुन: आयोजित की जाएगी. इस के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी की सिफारिश पर यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने इस मामले में अक्तूबर 2025 के अंत में आधिकारिक रूप से अपनी जांच शुरू की थी. इस प्रकरण में अब तक मुख्य मास्टरमाइंड खालिद मलिक और उस की बहन साबिया को गिरफ्तार किया जा चुका है.

असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन चौहान को सीबीआई नवंबर 2025 में गिरफ्तार कर चुकी है. पुराने पेपर लीक मामलों के आरोपी रहे हाकम सिंह को भी इस साजिश में संलिप्तता के संदेह में गिरफ्तार किया जा चुका है. इस प्रकरण में ड्यूटी पर लापरवाही बरतने के आरोप में सेक्टर मजिस्ट्रैट के.एन. तिवारी और 2 पुलिसकर्मियों को भी निलंबित किया जा चुका है. प्रदेश सरकार ने राज्य में कड़ा नकल विरोधी कानून (एंटी चीटिंग एक्ट) लागू कर दिया है, जिस के तहत दोषियों को उम्रकैद और करोड़ों रुपए के जुरमाने का प्रावधान किया गया है.

रावत स्टिंग औपरेशन

उत्तराखंड का बहुचर्चित मुख्यमंत्री हरीश रावत स्टिंग औपरेशन केवल उत्तराखंड राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित रहा था. यह स्टिंग औपरेशन 2016 के राजनीतिक संकट से जुड़ा हुआ है, जब कांग्रेस के 9 विधायकों ने बगावत कर दी थी. इस प्रकरण में एक वीडियो सार्वजनिक रूप से सामने आया था, जिस में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत कथित तौर पर अपनी सरकार बचाने के लिए बागी विधायकों को रिश्वत के तौर पर (करीब 5 से 7 करोड़ रुपए) देने और ‘हौर्स ट्रेडिंग’ (विधायकों की खरीदफरोख्त) की बात स्पष्ट रूप से करते नजर आए थे.

इस मामले के सामने आने के तुरंत बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से हुए शक्ति परीक्षण (फ्लोर टेस्ट) में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने बहुमत साबित कर दिया और उन की सरकार फिर से बहाल हो गई थी. यह स्टिंग औपरेशन उमेश कुमार (समाचार प्लस चैनल के तत्कालीन सीईओ और वर्तमान में खानपुर से निर्दलीय विधायक) द्वारा किया गया था. इस वीडियो को कांग्रेस के बागी विधायकों में से हरक सिंह रावत ने सार्वजनिक किया था.

यह मामला अभी भी पूरी तरह से निस्तारित नहीं हुआ है और सीबीआई अभी भी इस प्रकरण की जांच कर रही है. सीबीआई ने सितंबर 2025 में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को एक और नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए तलब किया था. यह गंभीर मामला अभी भी अदालत और जांच एजेंसी के बीच लंबित है. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इसे राजनीति से प्रेरित बताते हैं और उन्होंने अपने बयानों में कहा भी है कि चुनाव नजदीक आते ही उन्हें नोटिस थमा दिए जाते हैं.

पकड़ में आया घोटाला

डा. पी.वी.के. प्रसाद (पालोली वेंकट कृष्ण प्रसाद) भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के एक अत्यंत विनम्र, कर्मठ, वरिष्ठ और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं. डा. पी.वी.के. प्रसाद मूलरूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं और वह 1995 बैच के उत्तराखंड कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. 8 जनवरी, 2025 से वह उत्तराखंड के कमांडेंट जनरल (होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा) के पद पर कार्यरत हैं.

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बौलीवुड के चर्चित कलाकारों के साथ तथा किसी अवसर पर अपनी गायिकी का जलवा बिखेरते अभिताभ श्रीवास्तव

दिसंबर 2014 में उन्हें उत्तराखंड का पहला आईजी (जेल) नियुक्त किया गया था. वह उत्तराखंड के विभिन्न जिलों, पिथौरागढ़ आदि में एसपी के रूप में सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने एडीजी सीबीसीआईडी और एडीजी पीएसी जैसे प्रमुख पदों पर भी कार्य किया है. डा. पी.वी.के. प्रसाद को अपनी सख्त छवि और पारदर्शी कार्यशैली के रूप में भी जाना जाता है. उन की विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 2021 में प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है.

डा. पी.वी.के. प्रसाद ने होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा विभाग का कार्यभार संभालने के बाद वरदी खरीद की फाइलों की समीक्षा की तो उन का माथा ठनका कि वरदी के दाम तो काफी ऊंची दर पर खरीदे गए थे. उन्होंने पाया कि वित्तीय वर्ष 2024-25 एक करोड़ रुपए की वरदी और सामग्री को लगभग 3 करोड़ रुपए के ऊंचे दामों पर खरीदा गया था.

उस के बाद जब वर्ष 2025-26 के लिए उसी महंगी दर पर टेंडर जारी किए गए तो उन्होंने बाजार भाव और टेंडर दरों में भारी अंतर देखा. इसी अंतर पर कमांडेंट जनरल को संदेह हो गया और उन्होंने तुरंत टेंडर निरस्त कर दिए और इस पर जांच के आदेश दे दिए. जब बाजार से कोटेशन मंगाए गए तो घोटाले की पूरी तसवीर ही साफ हो गई. बाजार भाव और टेंडर की राशि को देख कर सब की आंखें खुली की खुली रह गई थीं. होमगार्ड के सिपाही का लकड़ी का डंडा जोकि बाजार भाव में 130 रुपए का था, उसे 375 रुपए में खरीदा गया था.

होमगार्ड के 500 रुपए के जूते 1500 रुपए में खरीदे गए थे. पैंट शर्ट जोकि बाजार भाव में 1200 रुपए की थी, उस वरदी को 3000 रुपए में खरीदा गया था. 500 रुपए की जैकेट को 1580 रुपए में खरीदा गया था. बाजार भाव और खरीद मूल्य के बीच का अंतर इतना बड़ा था कि भ्रष्टाचार की पुष्टि हो गई. जांच टीम की रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि यह घोटाला अकेले किसी एक व्यक्ति का नहीं था, बल्कि ठेकेदार और अधिकारियों की मिलीभगत से किया गया था.

कमांडेंट जनरल डा. पी.वी.के. प्रसाद ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंपी, जिस में डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव की संलिप्तता का उल्लेख किया गया था. डा. पी.वी.के. प्रसाद की सिफारिश पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया.

कौन हैं अमिताभ

उत्तराखंड और देश में ‘सिंगर इन खाकी’ नाम से मशहूर पूर्व डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव होमगार्ड का विवादों से पुराना नाता रहा है. अमिताभ श्रीवास्तव जो होमगार्ड सेवा में डिप्टी कमांडेंट जनरल के पद पर थे, उन पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अपनी निजी गाड़ी पर पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) स्तर के स्टार और चिह्न लगाए थे. यह विवाद मुख्यरूप से उन के पद और उन के अनुरूप मिलने वाले आधिकारिक विशेषाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा था.

नियमों के अनुसार, होमगार्ड और नागरिक सुरक्षा सेवा के अधिकारियों के लिए रैंक और गाड़ी पर चिह्नï लगाने का अलग से प्रावधान किया गया है. उन पर आरोप लगा था कि वह खुद को पुलिस के डीआईजी के समान दर्शा रहे थे, जोकि सेवा नियमावली के खिलाफ था. उच्च अधिकारियों जैसे कमांडेंट जनरल के सरकारी वाहनों के आगे और पीछे काली प्लेट पर एक 5 कोने का सफेद धातु का स्टार लगाया जाता है. वाहन के बोनट पर लालकाले रंग में राज्य सरकार के मोनोग्राम के साथ झंडा लगाने का प्रावधान है. इस का आकार पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के वाहन पर लगाए जाने वाले झंडे के समान होता है.

मोटर वाहन अधिनियम 1988 और सेना/पुलिस के विभिन्न आदेशों के अनुसार, किसी भी अधिकारी को अपनी निजी गाड़ी पर विभाग का नाम (जैसे होमगाड्र्स), पद का नाम या सरकारी प्रतीक चिह्न लगाने की अनुमति नहीं है. उत्तराखंड होमगार्ड के पूर्व डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘सिंगर इन खाकी’ के नाम से जाना जाता है. वह अपनी सुरीली गायकी के लिए काफी प्रसिद्ध रहे हैं.

अमिताभ श्रीवास्तव का संगीत के प्रति जुनून काफी पुराना रहा है और वह काफी लंबे समय से मंचों पर अपनी गायकी का प्रदर्शन करते रहे हैं. उन की शैली रोमांटिक और भावुक गाने की रही है, उन्होंने 15 अगस्त, 2024 को अपना पहला आधिकारिक कवर सांग रिलीज किया था. अमिताभ श्रीवास्तव का पहला ओरिजिनल गाना ‘दुआ न दो’ रिलीज हो चुका है. अगस्त 2025 उन का नया गाना ‘ये बारिश’ गीत उन सभी के लिए एक खूबसूरत सौगात है, जो अपने पुराने प्यार की यादों में खोए रहते हैं.

सोशल मीडिया पर अमिताभ श्रीवास्तव काफी ऐक्टिव भी रहते हैं और अकसर अपने गाने के वीडियो शेयर करते रहते हैं. ऐसा पहली बार सामने आया था कि वह किसी बड़े बैनर के तहत गाना गा रहे थे. इस के अतिरिक्त निलंबित डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को वर्ष 2017 में मेधावी सेवा के लिए ‘राष्ट्रपति होमगार्ड पदक’ और जनवरी 2023 मे विशिष्ट सेवा के लिए ‘राष्ट्रपति होमगार्ड पदक’ से भी सम्मानित किया जा चुका है.

घोटाले में छिपे हैं राज

इधर इस प्रकरण के सामने आने के बाद होमगार्ड के डिप्टी कमांडेंट जनरल अमिताभ श्रीवास्तव को निलंबित भी कर दिया गया है. अब इस निलंबन के बाद कई सवाल सामने आ कर खड़े हो गए हैं, जिन का जबाब अभी भी एक पहेली सी बना हुआ है. अब मीडिया और जनता के सामने सवाल तैर रहे हैं कि होमगार्ड विभाग में वरदी घोटाला सच है या फिर कोई गहरी साजिश है? उत्तराखंड अधिप्राप्ति नियमावली में 5 लाख से अधिक मूल्य की समस्त सामग्रियों की अधिप्राप्ति हेतु शासकीय पद्धति का पालन करना सभी इकाइयों के लिए अनिवार्य किया गया है.

अब सवाल यह उठता है कि ई टेंडर निकालने की लिखित स्वीकृति विभागाध्यक्ष द्वारा दी जाती है तो यह पता चला कि इस केस में भी ऐसा ही हुआ था. बात यह है कि क्या ई टेंडर को लोग अधिप्राप्ति पोर्टल और 2 समाचार पत्रों में निकाला जाता है. ई टेंडर में इन्हीं निविदादाताओं के प्रकरणों पर विचार किया जाता है, जिन के द्वारा उस में प्रतिभाग किया गया था. पता चला है कि यहां पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि क्या तकनीकी और वित्तीय निविदा मूल्यांकन रिपोर्ट को मूल्यांकन समीक्षा समिति के सभी सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर भी किए जाने का प्रावधान है? यहां पर इस केस में भी ऐसा ही हुआ भी था.

इस प्रकरण में गोपनीय जांच का उजागर होना भी सवाल के घेरे में है. साथ ही इस की वजह से विभाग, शासन और सरकार की छवि भी कहीं न कहीं धूमिल भी हुई है. अब यह बात भी उठ रही है कि यदि सरकार के मुखिया इस मामले की जांच कुछ बड़े ईमानदार छवि वाले अधिकारियों की एसआईटी बना कर कराएं तो उस से और भी कई अन्य काले सच उजागर हो सकते हैं. Uttarakhand Crime

 

UP News: तमाशा इंजीनियर की लाइव मौत का

UP News: खुद को उत्तर प्रदेश का ‘शो-विंडो’ कहने वाला गौतमबुद्धनगर (नोएडा) आपदा के समय कितना असहाय है, युवराज मेहता की मौत ने ये साबित कर दिया. करीब 2 घंटे तक रेस्क्यू मिशन के नाम पर चले ड्रामे के दौरान तो जिला प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी मौके पर पहुंचा और ही नोएडा प्राधिकरण का. पुलिस, एनडीआरएफ और दमकल विभाग के जो कर्मचारी मौके पर पहुंचे भी, वे सिर्फ तमाशबीन बने रहे और बल्कि उन की लापरवाही ने इंजीनियर की मौत को ऐसा लाइव शो बना दिया कि…

गलगोटिया कालेज से 2022 में बीटेक की पढ़ाई करने वाले 27 साल के युवराज मेहता मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले थे. वह पढ़ाई में शुरू से ही अच्छे थे. पढ़ाई के बाद युवराज मेहता गुरुग्राम स्थित डनहमबी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. डनहमबी एक जानीमानी डेटा साइंस और कस्टमर एनालिटिक्स कंपनी है, जो दुनिया भर में रिटेल और टेक्नोलौजी सेक्टर में काम करती है.

युवराज की मम्मी का 2 साल पहले देहांत हो गया था. युवराज की बहन ब्रिटेन में रहती हैं. वह भी शादी के बाद ब्रिटेन में ही जा कर बसने की योजना बना रहे थे. उन के पिता राजकुमार मेहता भी एक कंपनी में नौकरी करते थे. नौकरी लगने के बाद युवराज पहले वह गाजियाबाद में रहते थे. वहां से वह रोजाना मेट्रो के जरिए गुरुग्राम स्थित अपने औफिस आतेजाते थे. मेट्रो कनेक्टिविटी होने की वजह से उन का सफर आसान था, लेकिन नवंबर 2024 में वह ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आ कर रहने लगे.

ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होने के बाद चूंकि वहां से सीधे कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट या मेट्रो जैसा साधन नहीं था, इसलिए वह अपनी नई ब्रिजा कार से ही गुरुग्राम आनेजाने लगे. 16 जनवरी, 2026 की रात के करीब 12 बज रहे थे. युवराज अपनी कंपनी से शिफ्ट खत्म होने के बाद कुछ देर दोस्तों से गप्पें लड़ाने के बाद अपनी कार द्वारा गुरुग्राम से ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित अपने घर की तरफ निकले.

उस वक्त रात के करीब 12 बज रहे थे, जब युवराज की कार नोएडा के सेक्टर 150 में 90 डिग्री कोण वाली मोड़ पर पहुंची. उस समय दिल्ली एनसीआर में सुबह और शाम के समय घने कोहरे का प्रकोप चल रहा था. युवराज भी इसी घने कोहरे की वजह से उस बाउंड्री वाल को नहीं देख पाए, जो सड़क के मोड़ पर बनी थी. कार की स्पीड भी थोड़ी ज्यादा थी, जिस से उन की कार उस मामूली से सीमेंटिंड रेलिंग को तोड़ती हुई पानी से भरे गहरे गड्ढे में जा गिरी.

एक ही क्षण में युवराज को अहसास हो गया कि वह कार समेत सड़क के किनारे बने पानी से भरे बेसमेंट के लिए बनाए गए गड्ढे में जा गिरे हैं. दरअसल, यह सब कुछ ही सेकेंडों में हो गया था. कार के भीतर पानी तेजी से भरने लगा. युवराज ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला. शीशा तोडऩे की कोशिश की, लेकिन उस पल जान जाने के डर से उस के हाथ कांप गए. ताकत होते हुए भी हिम्मत जवाब दे रही थी.

युवराज पूरी ताकत से चीखेचिल्लाए, लेकिन उन की आवाज कार के भीतर ही दबी रह गई. किसी तरह हिम्मत जुटा कर सनरूफ खोला और कार की छत पर आ गए. मौत के उस पल में उन्हें अपने पापा की याद आई. कांपते हाथों से पापा को फोन किया. बस इतना कहा, ‘मैं गड्ढे में फंस गया हूं, जल्दी आइए. कार धीरेधीरे डूब रही है.’

पानी तेजी से युवराज को अपनी चपेट में ले रहा था. आंखों के सामने फेमिली वालों और दोस्तों के चेहरे तैरने लगे. लगा कि अब जिंदगी नहीं बचेगी. कुछ ही देर में पापा राजकुमार मेहता सड़क के पास पहुंच गए. उन्हें करीब 20 मिनट लगे. वह जोरजोर से चीखने लगे. पानी में डूबते युवराज को लगा कि अब मदद आ जाएगी. युवराज ने मोबाइल की टौर्च जलाई ताकि पापा को उन की लोकेशन दिख जाए. लेकिन मदद सिर्फ सड़क तक आई थी, गड्ढे के अंदर नहीं उतरी. युवराज बेबस और असहाय सा मौत को करीब आते हुए मदद का इंतजार करता रहा. कार और नीचे धंसती जा रही थी. जैसेतैसे युवराज कार की छत पर इधर से उधर पहलू बदलता रहा. कार की छत से ही वो ‘हेल्प…हेल्प’ चीखते हुए मदद की गुहार लगाने लगा.

चूंकि राजकुमार मेहता ने डायल 112 पर फोन कर दिया था, इसलिए थोड़ी ही देर में पुलिस और दमकलकर्मी व उस के बाद एसडीआरफ के कर्मचारी भी पहुंच गए. युवराज की उम्मीद फिर जागी, सोचा अब तो बच ही जाऊंगा. लेकिन यही उन की सब से बड़ी भूल थी. उन्हें पानी में डूबते हुए कुछ आकृतियां दिखीं. वे सब लोग ऊपर खड़े थे. लेकिन नीचे उतरने को कोई तैयार नहीं था. पानी करीब 70 फुट गहरा था. ‘जोखिम है,’ कह कर सरकारी एजेंसियों के अधिकारी व कर्मचारी संसाधन आने का इंतजार करते रहे. रस्सी आई… मगर इस में काफी देर हो गई. उपकरण देर से पहुंचे और वक्त हाथ से निकलता चला गया.

वह सड़क, जिस पर न बैरिकेड था, न चेतावनी बोर्ड, न लाल झंडी, वहां युवराज की मौत इस की गवाह बन रही थी. पूरा सिस्टम मौके पर था, लेकिन संवेदना नहीं थी. तिलतिल कर के मौत युवराज के करीब आ रही थी और लंबे इंतजार के बाद उन की उम्मीद भी डूबने लगी थी. क्योंकि पानी उन की छाती तक आ चुका था, सांसें टूटने लगीं और आवाज गले में अटकने लगी थी. जब तक वह पूरी तरह पानी में डूब नहीं गया, तब तक सड़क पर वह उम्मीद और हसरतभरी नजरों से देखते रहे. नाकारों की भीड़ के बीच युवराज के पापा खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और हृदयविदारक चीखों के साथ वहां खड़े सिस्टम से जुड़े लोगों से हाथ जोड़ कर कहते रहे, ‘सर, कुछ तो कीजिए.’

वरदीधारी लोग, सरकारी गाडिय़ां और एक ऐसा सिस्टम जो फाइलों में तो तेज है, लेकिन इंसान को बचाने के लिए पानी में उतरने से डरता है, वह सिर्फ यही कहता रहा, ‘सर, पानी बहुत गहरा और ठंडा है. भीतर बहुत से सरिए भी हैं.’ राजकुमार मेहता को उस वक्त लगा कि काश! उस सड़क पर पहले ही बैरिकेड लगा होता. काश! उस गड्ढे को ढक दिया गया होता. काश! सिस्टम हादसे से पहले जागा होता तो उन का बेटा जिंदा पानी भरे गड्ढे में न होता. मदद सामने थी, लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे उन के बेटे की जिंदगी हार गई.

कुछ देर बाद जब पानी भरे बेसमेंट से चीखनेचिल्लाने और मदद की पुकार करने वाली आवाजें आनी बंद हो गईं तो राजकुमार मेहता को अहसास हो गया कि अब बेटा उन से दूर जा चुका है.

तमाशबीन सिस्टम

युवराज करीब 2 घंटे तक संषर्ष करते रहे, सिस्टम वहां खड़ा हो कर देखता भी रहा, इस के बाद बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. जब ये सारी कवायद चल रही थी, उस वक्त एक फूड कंपनी का डिलीवरी बौय मुनेंद्र जरूर गाडिय़ों व लोगों की भीड़ देख कर वहां रुका था. जब मुनेंद्र को पता चला कि एक युवक गाड़ी समेत उस पानी भरे बेसमेंट में डूब गया है तो उस ने एसडीआरएफ वालों से लाइफ सेविंग जैकेट ले कर उस पानी भरे गड्ढे में छलांग लगाई थी. उस ने करीब आधा घंटा प्रयास भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

राजकुमार मेहता ने तब तक अपने कुछ रिश्तेदारों और पहचान वालों को फोन कर दिया तो वे भी मौके पर आ गए, लेकिन वहां खड़ा सिस्टम का कोई भी इंसान दिन निकलने से पहले उन की मदद नहीं कर सका. सुबह करीब 6 बजे सुबह रेस्क्यू औपरेशन शुरू हुआ. तब करीब एक घंटे बाद युवराज की डैडबौडी को बाहर निकाला जा सका. चूंकि दिन का उजाला हो चुका था. युवराज की मौत का मामला इस दौरान सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिली और उन्होंने घटना की वीडियो क्लिप बना कर उसे सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर दिया.

चूंकि ये मामला नालेज पार्क थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस ने दुर्घटना का मामला दर्ज कर लिया और शव को पेास्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन राजकुमार मेहता व उन के साथ जुटे लोग तब तक समझ चुके थे कि युवराज की मौत सिर्फ हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई हत्या है. लिहाजा उन्होंने पुलिस को नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की तहरीर दे कर मुकदमा दर्ज करने जिद पकड़ ली.

संयोग से दिन चढ़तेचढ़ते युवराज की मौत का मामला तूल पकडऩे लगा था. मुनेंद्र नाम के उस डिलीवरी बौय का बयान भी सोशल मीडिया की सुर्खी बन चुका था, जिस ने पूरे सरकारी तंत्र की मौजूदगी के बावजूद खुद जान पर खेल कर युवराज को बचाने का असफल प्रयास किया था. पुलिस महकमा समझ गया कि उन से भूल हुई है, लिहाजा उच्चाधिकारियों का निर्देश मिलने पर नालेज पार्क पुलिस ने आननफानन में बीएनएस की धारा में गैरइरादतन हत्या की धारा 105, लापरवाही से मौत 106(1) और जीवन को खतरे में डालने वाले कार्य की धारा 125 को जोड़ कर उन 2 बिल्डरों को नामजद कर दिया, जिन की जमीन पर बेसमेंट की खुदाई के बाद ये पानी भरा था.

दूसरी तरफ युवराज के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया. उसी दिन कुछ फेमिली वालों, सोसाइटी के लोगों व युवराज के मित्रों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन 17 जनवरी, 2026 की शाम होतेहोते युवराज की मौत का मामला नोएडा शहर से निकल कर देशव्यापी स्तर पर मीडिया की सुर्खी बन चुका था. चारों तरफ हाइटेक कहे जाने वाले नोएडा के प्रशासन, शहर के सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और मामले पर उस की चुप्पी को ले कर लताड़ लगाई जाने लगी.

यह घटना जरूर साधारण थी, लेकिन इस ने पूरे सरकारी तंत्र पर इतने सवाल खड़े कर दिए थे कि उन का जवाब देने के लिए सरकार को ही डैमेज कंट्रोल के लिए सामने आना पड़ा.

एसआईटी जुटी जांच में

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसी शाम को इस दुघर्टना पर स्वत:संज्ञान लेते हुए एक 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया, जिस की कमान मेरठ जोन के एडीजी (पुलिस) भानु भास्कर को सौंपी गई. एसआईटी में मेरठ मंडल के आयुक्त भानु गोस्वामी को भी शामिल किया गया. सीएम ने एसआईटी को निर्देश दिया कि 5 दिनों में जांच कर यह पता लगाया जाए कि इस में किन सरकारी विभागों की लापरवाही रही, किन अधिकारियों की संवेदनहीनता के कारण युवराज की जान गई.

हालांकि पुलिस ने विशटाउन और लोटस ग्रीन नाम के जिन 2 बिल्डरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी, उस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार को उसी रात गिरफ्तार कर अपनी पारदर्शिता को स्पष्ट करने की कोशिश की. अगले दिन फरीदाबाद के लोटस ग्रीन बिल्डर से जुड़े डाइरेक्टर रवि बंसल व सचिन कर्णवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. हादसे के दूसरे ही दिन नोएडा अथौरिटी के सीईओ एम. लोकेश को उन के पद से हटा दिया गया और उन की जगह करुणेश कुमार को नया सीईओ बना दिया गया.

इतना ही नहीं, अथौरिटी के एक जूनियर इंजीनियर गौरव को बरखास्त कर शासन ने डैमेज कंट्रोल करने की भी कोशिश की, लेकिन तब तक इतने सवाल खड़े हो चुके थे कि प्रशासन का कोई भी अंग आरोपों की जद में आए बिना बच नहीं सका. सरकार की तरफ से एसआईटी गठन के बाद मीडिया ने भी युवराज की मौत के मामले में समानांतर जांच शुरू कर दी और आए दिन नए तरह के सवाल उठाए जाने लगे थे.

सब से पहला सवाल तो नोएडा की डीएम मेधा रूपम को ले कर ही खड़ा होने लगा था, जो एसडीआरफ या एनडीआरएफ के काम काज को नियंत्रित करने वाले आपदा प्रबंधन ग्रुप की चेयरमैन होती है. उत्तर प्रदेश के महत्त्वपूर्ण जिले गौतमबुद्ध नगर की कमान संभालने वाली आईएएस अधिकारी मेधा रूपम के बारे में चर्चा होने लगी कि उन्होंने हादसे के बाद न तो कोई संवेदनशीलता दिखाई, न ही किसी की जिम्मेदारी तय की.

चूंकि डीएम मेधा रूपम के फादर ज्ञानेश कुमार वर्तमान में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर तैनात हैं, इसलिए उन्हें बचाने की कवायद होने लगी. सोशल मीडिया पर डीएम मेधा रूपम के प्रति नाराजगी जाहिर की जाने लगी. एसआईटी की जांच शुरू होते ही युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले ने पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया. एसआईटी ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए नोएडा अथौरिटी के अधिकारियों से ले कर पुलिस और फायर ब्रिगेड तक को लपेटे में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने मौके से अहम सबूत जुटाने शुरू कर दिए. नोएडा पुलिस के साथ नोएडा अथौरिटी के अधिकारी भी एसआईटी के साथ कोऔर्डिनेशन करने लगे.

लोग युवराज मेहता की मौत के मामले में गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे. उन का कहना था कि अगर उस ने पुलिस को काल न कर के अपने दोस्तों को बुलाया होता तो शायद युवराज की जान बच सकती थी. घटना के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि रात 12:20 बजे पहली पीसीआर मौके पर पहुंची, कुछ देर बाद दूसरी पीसीआर भी आ गई. इस बीच युवराज के पापा भी मौके पर पहुंच गए थे. दोनों पीसीआर में 10 से 12 पुलिसकर्मी मौजूद थे, लेकिन उन के पास न तो रस्सा था और न ही कोई जरूरी रेस्क्यू उपकरण.

युवराज मेहता की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम ने कई बार घटनास्थल का मुआयना किया और दरजनों लोगों के साथ संबंधित विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए. जिस के बाद संबंधित प्लौट के दोनों बिल्डर अभय कुमार और निर्मल सिंह के कारपोरेट औफिस को पुलिस ने सील कर दिया. एसआईटी को यह भी पता चला कि जिस प्लौट पर इस बेसमेंट की खुदाई कर पानी भरा छोड़ दिया गया था, वह स्पोट्र्स सिटी घोटाले का हिस्सा है. इसी प्लौट को विशटाउन बिल्डर ने खरीदा था और सीबीआई स्पोट्र्स सिटी घोटाले की पहले से जांच कर रही है.

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल नोएडा स्पोट्र्स सिटी घोटाले की जांच सीबीआई और ईडी को सौंपने का आदेश दिया था. इस केस में सीबीआई ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी, जिस की जांच सीबीआई कर रही है. इसी प्रकार कंपनी के निदेशक निर्मल सिंह, विदुर भारद्वाज, सुरप्रीत सिंह सूरी, नोएडा प्राधिकरण के अज्ञात अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था. इस में लोटस ग्रीन के साथसाथ इस की लगभग 24 सब लीज वाली कंपनियों को भी जोड़ा गया है.

जिस निर्माणाधीन साइट पर भरे पानी में डूब कर युवराज की मौत हुई, वह स्पोट्र्स सिटी के प्लौट नंबर-2 (ए-3) का हिस्सा है. वह भूखंड लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने नोएडा प्राधिकरण से प्राप्त किया था. वर्ष 2020 में विशटाउन प्लानर्स ने इसे लोटस ग्रीन से खरीदा, जिस में लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन की भी शेयर होल्डिंग है. इस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार की 32.20 फीसदी, संजय कुमार की 27.30 फीसदी, मनीष कुमार, आंचल बोहरा की 3.5 फीसदी और निर्मल कुमार (लोटस ग्रीन) की 30 फीसदी है.

वास्तव में, यह प्लौट एक कंसोर्टियम का हिस्सा है. सेक्टर 150 का प्लौट नंबर 2 (ए 3) कुल 27,185 वर्गमीटर क्षेत्र का है, जिस का भू उपयोग स्पोट्र्स सिटी लेआउट में व्यावसायिक निर्धारित है. हिस्सेदारी के हिसाब से सभी लोग इस मामले के आरोपी हैं.

इस प्लौट को लीड डेवलपर लोटस ग्रीन ने विज टाउन प्लानर्स नामक बिल्डर कंपनी को सबडिवीजन करा कर सौंपा था. वर्ष 2017 में इस के लिए एक नक्शा भी प्राधिकरण से स्वीकृत करवाया गया था. बिल्डर ने इसे मौल जैसा शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की योजना बनाई और फिर बेसमेंट के लिए खुदाई भी शुरू कर दी. बाद में संशोधित नक्शे का आवेदन दिया गया, लेकिन प्राधिकरण ने मई 2022 में इसे खारिज कर दिया. कारण बताया कि भूमि पर प्रो शौप्स (खेल सामग्री दुकानें) और फूड बेवरेज की दुकानों की अनुमति है, न कि पूर्ण शौपिंग कौंप्लेक्स की. इस के बाद बिल्डर ने साइट पर कोई आगे काम नहीं किया.

नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को बताया कि बिल्डर अपने लेआउट के मुताबिक एक मौल जैसी संरचना बनाना चाहता था. एसआईटी के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि अखिर किस वजह से बेसमेंट के लिए गहरा गड्ढा खोद कर उसे भरा नहीं गया? जांचपड़ताल में इस का भी जवाब मिल गया.

करोड़ों का हुआ खनन

दरअसल, नोएडा सेक्टर 150 के इस बेसमेंट से अरबों रुपए का अवैध खनन कर रोजाना 200 डंपर रेत निकाली गई थी. अवैध खनन पर निगरानी की सीधी जिम्मेदारी खनन विभाग की है, जबकि नोएडा अथौरिटी की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस के आवंटित प्लौट पर निर्माण कार्य बिल्डिंग बायलौज के अनुसार हो. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी देखना होता है कि पर्यावरण नियमों के तहत काम हो रहा हो. अवैध जलदोहन को भी रोकना होता है.

बेसमेंट के लिए जमीन के अंदर से करीब 2 साल तक पानी निकाल कर सीवर में बहाया गया. लिहाजा इस प्रोजेक्ट के एक तरफ यमुना और दूसरी तरफ हिंडन नदी होने के बावजूद जमीन का जलस्तर नीचे चला गया और आसपास मौत के कुएं बना कर छोड़ दिए गए. इस के बावजूद किसी ने समय रहते काररवाई नहीं की. बेसमेंट के नाम पर जमीन को इतना खोखला कर दिया गया कि बाद में वहां निर्माण कार्य भी नहीं हुआ. न तो सुरक्षा घेरा लगाया गया, न चेतावनी बोर्ड.

यही गड्ढा 16 जनवरी, 2026 की रात युवराज मेहता की मौत का कारण बना, जब उन की कार पानी से भरे गहरे गड्ïढे में गिर गई. हादसे के बाद अब अधिकारियों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. सेक्टर 150 ही नहीं, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में सैकड़ों ऐसे प्लौट हैं, जहां इसी तरह बेसमेंट के नाम पर खनन कर गड्ïढे छोड़ दिए गए हैं. इन में से कई गड्ïढे आबादी और सड़कों के बेहद करीब हैं, जहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. यह प्लौट नोएडा अथौरिटी ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन को आवंटित किया था, जिसे बाद में अन्य डेवलपर्स को बेच दिया गया.

हालांकि नियमों के तहत यहां सीमित खुदाई की अनुमति होती है, लेकिन इस से कहीं अधिक गहराई तक खनन किया गया. यहां बेहतरीन गुणवत्ता की बालू निकली, जिसे खुलेआम बेचा गया. लोगों का कहना है कि रोजाना करीब 200 डंपर रेत इस प्रोजेक्ट से बाहर भेजी जाती थी. उस समय एक डंपर की कीमत करीब 15 हजार रुपए थी, जिसे बाजार में लगभग दोगुने दाम पर बेचा जाता था. यह सिलसिला एक से डेढ़ साल तक चला और करीब 70 फीट तक जमीन खोद दी गई.

युवराज की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी को 5 दिन की जांच के दौरान नोएडा अथौरिटी और पुलिस ने अपने जवाब सौंप दिए. अथौरिटी ने करीब 150 और पुलिस ने 450 पेज की रिपोर्ट में सारे फैक्ट शामिल किए. इस जवाब में घटनाक्रम, काररवाई, ड्यूटी रोस्टर, कंट्रोल रूम रिकौर्ड, काल डिटेल, रेस्पांस टाइम को रखा गया है. चश्मदीद मुनेंद्र व उस के परिवार के बयान भी लिए गए.

युवराज की गड्ढे में डूबने से हुई मौत के मामले में कई पेंचीदे पहलू हैं. एसआइटी ने जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है, जिस में एसडीआरएफ, नोएडा अथौरिटी, नोएडा पुलिस, दमकल विभाग, जलकल विभाग, प्रदूषण विभाग और परियोजना विभाग जैसे कई महकमे निशाने पर आए, जिन की लापरवाही से मौत का ये गड्ढा खुदा था. लेकिन देखना होगा कि शासन इस रिपोर्ट पर संज्ञान ले कर क्या काररवाई करता है.

डेथ जोन हैं खुले नाले

सेक्टर 150 में हाल ही में एक इंजीनियर की खुले तालाब में डूबने से हुई मौत ने न केवल सुरक्षा दावों की पोल खोली है, बल्कि स्पोट्र्स सिटी परियोजना के नाम पर चल रहे अरबों के खेल को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. यह हादसा उस स्थान पर हुआ है, जिसे कागजों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्पोट्र्स हब बनना था, लेकिन असलियत में वह प्रशासनिक लापरवाही और बिल्डर की धोखाधड़ी का खूनी दलदल बन चुका है. 300 एकड़ में फैली इस स्पोट्र्स सिटी की कहानी 3सी ग्रुप के मुखिया निर्मल सिंह से शुरू होती है. आरोप है कि निर्मल सिंह ने कौडिय़ों के भाव जमीन आवंटित कराई और फिर उसे 24 अन्य बिल्डरों (सबलेसी) को बेच कर गायब हो गया.

जमीन गिरवी रख कर करोड़ों का कर्ज लिया गया, जिसे चुकाने के बजाय डकार लिया गया. हालत यह है कि बैंक का कर्ज, फ्लैट खरीदारों का पैसा और प्राधिकरण का बकाया सब कुछ मुकदमों के जाल में फंसा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिल्डरों ने एक बार फिर स्पोट्र्स सिटी का संशोधित मास्टर प्लान नोएडा अथौरिटी को सौंपा है. अब इसे बोर्ड बैठक में निर्णय के लिए रखा जाएगा. हालांकि, इस हादसे के बाद इस योजना को मंजूरी मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है. स्पोट्र्स सिटी में व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने की कोशिशें नई नहीं है. साल 2022 में नोएडा अथौरिटी ने विशटाउन प्लानर्स के संशोधित लेआउट को सिरे से खारिज कर दिया था.

कंपनी ने खेल सुविधाओं के बजाय दुकानें और फूड आउटलेट्स के लिए भारीभरकम एफएआर का प्रस्ताव रखा था, जो स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक था. स्पोट्र्स सिटी के मूल ब्रोशर के अनुसार, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए केवल 0.5 प्रतिशत क्षेत्र ही आवंटित था, लेकिन बिल्डरों ने खेल को दरकिनार कर इस प्रोजेक्ट को शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की हर मुमकिन कोशिश की. इतना ही नहीं, शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के बड़ेबड़े दावों के बीच एक ऐसी डरावनी हकीकत सामने आई है, जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है.

जनपद में खुले नाले और असुरक्षित तालाब भी अब लोगों के लिए डेथ जोन साबित हो रहे हैं. पुलिस रेकौर्ड के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 सालों में 11 मौतें सीधे तौर पर खुले नालों में गिरने और डूबने की वजह से हुई है. हैरानी की बात यह है कि सड़कों के किनारे बहते ये नाले खुलेआम मौत को दावत दे रहे है, लेकिन संबंधित विभाग गहरी नींद में सोए हुए हैं. न तो इन नालों को ढका गया है और न ही इन के किनारों पर सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई गई है.

जांच में सामने आया है कि कई हादसों में लोग बाइक चलाते समय संतुलन बिगडऩे या मोबाइल पर बात करते वक्त पैर फिसलने से इन गहरे नालों में जा गिरे हैं. नोएडा के सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत के बाद नोएडा प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब जांच शुरू की तो 65 ब्लैक स्पाट्स की पहचान की गई. इन में 50 ब्लैक स्पाट्स बिल्डरों को 5 दिनों के अंदर सुधारने होंगे, वरना उन पर भारी जुरमाना किया जाएगा. बाकी 15 ब्लैक स्पाट्स प्राधिकरण खुद 15 दिनों में ठीक करेगा. अब इन पर कितना अमल होगा, ये देखने वाली बात है या फिर किसी नए हादसे का इंतजार होगा.

इस के अलावा जलभराव की समस्या रोकने को 20 गांवों में ड्रेनेज व्यवस्था बेहतर की जाएगी और पूरे नोएडा का विस्तृत सर्वेक्षण होगा. इस का आदेश नोएडा प्राधिकरण के नए सीईओ कृष्णा करुणेश ने जारी किया है.  बता दें कि कि युवराज की मौत से पहले भी गड्ढों व नालों में गिरने से कई लोगों की मौत हो चुकी है. 18 दिसंबर, 2024 को सेक्टर 73 सर्फाबाद गांव में एक व्यक्ति बाइक सहित नाले में जा गिरा, जहां नाले में भरे पानी में डूबने की वजह से उस की मौत हो गई थी.

इस से पहले पहली अक्तूबर, 2024 को सेक्टर 126 के पास एक्सप्रैसवे सर्विस रोड पर एक तेज रफ्तार बुलेट नाली में जा गिरी, जिस से बाइक पर सवार 3 युवकों में से एक की मौत हो गई. 28 सितंबर, 2024 को भी सेक्टर 52 स्थित खुले नाले में टहलने निकले एक युवक की अचानक गिर कर डूबने से मौत हो गई थी.

मेरे बेटे को बेबस छोड़ दिया गया पिता राजकुमार मेहता

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद मेरा बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा. उसे बचाने का पर्याप्त समय था लेकिन बचाव दल ने लापरवाही दिखाई. मेरे बेटे को भगवान भरोसे छोड़ दिया. अगर ठीक से प्रयास किया जाता तो उसे आसानी से बचाया जा सकता था. सेक्टर-150 के टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आयोजित हुई शोक सभा में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता के पिता राज कुमार मेहता ने भीगी आंखों और टूटे दिल से मनोहर कहानियां के समक्ष अपनी ये व्यथा व्यक्त की. उनकी आवाज में दर्द और आक्रोश दोनों थे.

उन्होंने कहा कि हम युवराज को न्याय नहीं दिला सकते क्योंकि वह अब वापस नहीं आ सकता. अब वे यह चाहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में लापरवाही बतरने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए. यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई दूसरा युवराज इस तरह की त्रासदी का शिकार न हो. राज कुमार बोले, ‘प्रशासनिक लापरवाही ने मेरे बेटे की जान ले ली. मैं उन सभी का आभारी हूं जिन्होंने हमारी आवाज बुलंद की, हमें ताकत दी और इस विषय को सही दिशा दी. बेटे की मौत ने मुझे तोड़ दिया, लेकिन समाज, मीडिया और जनता ने मुझे संभाला. सभी ने मिलकर इस लापरवाही को देश और सरकार तक पहुंचाया.’

उन्होंने डिलीवरी बॉय मोनिंदर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उसने किसी की परवाह किए बगैर नाले में छलांग लगाई. मेरे बेटे को बचाने की कोशिश की. उन्होंने घटना का संज्ञान लेते हुए एसआईटी गठित करने पर यूपी सरकार का भी आभार जताया. इस शोकसभा के दौरान सांसद डॉ. महेश शर्मा, दादरी विधायक तेजपाल नागर, भाजपा जिलाध्यक्ष अभिषेक शर्मा और एडीसीपी ग्रेनो सुधीर कुमार समेत बड़ी संख्या में सोसाइटी निवासी मौजूद थे. ग्रेटर नोएडा में सोसाइटी के क्लब हाउस में आयोजित सभा की युवराज की शोक सभा के दौरान परिजन, युवराज के दोस्त, पड़ोसी भी पहुंचे. इस दौरान सभी की आंखें नम दिखी.

शोक सभा के दौरान लोगों ने सवाल किया कि जिले में पुलिस के अधीन ही डायल-112, पीसीआर, दमकल, ट्रैफिक पुलिस आदि की टीम आती है. इसी तरह प्राधिकरण के वर्क सर्किल प्रबंधक, ट्रैफिक सेल के जिम्मेदारों और जिला प्रशासन के अधीन आने वाले खनन विभाग, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग आदि के जिम्मेदार भी युवराज की मौत पर खामोश है.

जिला प्रशासन भी ये स्पष्ट नहीं कर पाया कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ से संपर्क करने में देरी क्यों हुई. शोक सभा में गुस्से में भरे लोगों के सवाल थे कि अगर सभी विभाग मिलकर काम करते तो शायद युवराज जिंदा होगा. शोक सभा में आए लोगों ने प्रशासन के रेस्क्यू औपरेशन और समय-समय पर आपदा प्रबंधन के लिए होने वाली मॉकड्रिल को भी दिखावटी और नाटक बताया.

सिस्टम से ज्यादा जांबाज तो गरीब मुनेंद्र निकला

नोएडा के सेक्टर 150 में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले में एक तरफ पूरा सिस्टम था, जो एक बेगुनाह की मौत का तमाशा मूकदर्शक बन कर देखता रहा तो वहीं एक गरीब परिवार में जन्मा डिलवरी बौय मुनेंद्र है, जिस ने अपनी जान की बाजी लगा कर युवराज को बचाने का प्रयास किया. मुनेंद्र इस हादसे में चश्मदीद गवाह भी है. सेक्टर 150 स्थित गढ़ी में रहने वाले बिहार के समस्तीपुर निवासी मुनेंद्र ने बताया कि वह डिलीवरी बौय का काम करता है. 16 जनवरी की रात वह करीब पौने 2 बजे घटनास्थल पर पहुंचा. 2 मिनट के अंदर ही उस ने फैसला कर लिया कि वह पानी के अंदर जाएगा. वहां मौजूद टीम से पानी में जाने की बात कही तो वे लोग घबरा गए.

मुनेंद्र बचपन से तैरना जानता है. मौके पर मौजूद टीम ने उसे सेफ्टी जैकेट दी, जिसे पहन कर वह पानी में उतरा. करीब 40 मिनट तक पानी में रहने के दौरान भी वह युवराज को नहीं खोज सका. जबकि बाहर खड़े लोगों और युवराज के पिता को उम्मीद थी कि शायद मुनेंद्र का प्रयास सफल होगा. युवराज को बचाने के लिए वह अपनी जान की बाजी लगा कर पानी में उतरा था. अफसोस कि वह उन की जान नहीं बचा सका. युवराज का कहना है कि अगर वह 5 मिनट पहले आ गया होता या प्रशासन की मौजूद टीम ने लापरवाही न बरती होती तो युवराज हम सब के बीच होते.

युवराज चिल्ला रहे थे और बारबार यही कह रहे थे कि मुझे बचा लो. मुनेंद्र ने बताया कि वह एक बेहद गरीब परिवार से है, लेकिन बावजूद इस के वह अपनी जान की परवाह किए बगैर करीब 40 मिनट तक ठंडे और गहरे पानी में युवराज को खोजने की कोशिश करते रहे. पानी बेहद ठंडा था, वहां पर कोई रोशनी नहीं थी. इस के बावजूद उस ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार पुलिस के सामने बारबार युवराज को बचाने की कोशिश कर रहा था.

मुनेंद्र के मुताबिक घटना के अगले दिन पुलिस उसे अपने साथ ले गई. उस के साथ करीब 5 घंटे तक पूछताछ की. फिर उसे यह कह कर छोड़ दिया कि किसी के सामने कोई भी सच बात मत बताना, लेकिन मुनेंद्र ने इंसानियत दिखाते हुए उस रात जो देखा, सब कुछ मीडिया के सामने बता दिया. जब उस ने शासनप्रशासन और पुलिस की पोल खोली तो पुलिस ने उस से कहा कि अपना बयान बदल दो, लेकिन वह लगातार सच बोलता रहा.

इस पूरी घटना में बिल्डर की गिरफ्तारी के बाद मुनेंद्र को इस बात का डर लगने लगा कि कहीं बिल्डर उस के खिलाफ कोई गलत कदम न उठा ले. उसे लगने लगा कि ऐसे लोग जो पहले से ही लापरवाह हैं, अपने को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए उस ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए पुलिस से गुहार लगाई.

वह अपने घर को छोड़ कर कुछ शुभचिंतकों के पास रहने लगा. उस ने नौकरी तक छोड़ दी. उसे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगने लगा. लेकिन मुनेंद्र की बहादुरी और सच का साथ देने के संकल्प से ही शायद युवराज को इंसाफ मिलने का दरवाजा खुल रहा है, क्योंकि एसआईटी के समक्ष उसी की गवाही से जांच दल व्यवस्था की लापरवाही के ठोस नतीजे तक पहुंच सका.

व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है शासन को सौंपी गई एसआईटी जांच रिपोर्ट

नोएडा के सेक्टर 150 में बिल्डर के निर्माणाधीन इमारत के कई फुट गहरे गड्ïढे में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार डूबने से हुई मौत के मामले में गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. यह गहन जांच 7 दिन तक चली है, जिस में सैकड़ों दस्तावेजों की पड़ताल और लगभग 30 अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई. इस के बाद यह अंतिम रिपोर्ट तैयार की गई.

यह रिपोर्ट प्रशासनिक सिस्टम की गंभीर चूक की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट में बचाव दल की चूक को स्वीकार करते हुए प्राधिकरण, एसडीआरएफ, दमकल, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है. अब प्रदेश सरकार के निर्णय का इंतजार है. अगर सब कुछ ईमानदारी से हुआ तो रिपोर्ट के आधार पर बड़े स्तर पर सख्त काररवाई हो सकती है.

योगी सरकार द्वारा युवराज की मौत के बाद स्वत:संज्ञान लेते हुए गठित की गई 3 सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) भानु भास्कर को सौंपा था. टीम में मेरठ मंडल के मंडलायुक्त भानुचंद्र गोस्वामी और लोक निर्माण विभाग के चीफ इंजीनियर अशोक कुमार द्विवेदी बतौर सदस्य एसआईटी में शामिल रहे.

नोएडा प्राधिकरण, पुलिस और जिला प्रशासन ने एसआईटी को करीब 550 पन्नों का विस्तृत लिखित बयान सौंपा था. इस में जलभराव की पहले से मिली सूचना, स्टार्म वाटर ड्रेनेज की योजना, कंट्रोल रूम का संचालन, ड्यूटी चार्ट, कौल रिकौर्डिंग्स, बचाव कार्यों का प्रतिक्रिया समय और घटनास्थल पर तैनात अधिकारियों की भूमिकाओं का पूरा ब्यौरा दर्ज है. टीम ने सभी दस्तावेजों की जांचपड़ताल कर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल किया. जांच के दौरान सब से बड़ा सवाल यह उठा कि युवराज को बाहर निकालने में करीब 4 घंटे क्यों लगे.

एसआईटी को पता चला कि हादसे के तुरंत बाद शुरुआत के समय में बचाव तंत्र पूरी तरह से सक्रिय नहीं हुआ. एसडीआरएफ, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की गंभीर कमी बनी रही. कंट्रोल रूम से समय रहते निर्देश जारी नहीं हुए और घटनास्थल पर मौजूद टीमें स्थिति की गंभीरता न समझ सकीं. रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि हादसे वाले प्लौट पर जल निकासी की स्थाई व्यवस्था पहले ही प्रस्तावित थी, मगर वह केवल कागजों पर रह गई.

प्लौट आवंटन से ले कर हादसे तक ड्रेनेज सिस्टम पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. एसआईटी ने उस दौरान तैनात वरिष्ठ अधिकारियों, जूनियर इंजीनियरों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी को जांच के केंद्र में रखा है. एसआईटी रिपोर्ट में लापरवाही करने वाले करीब 20 अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम साफतौर पर दर्ज हैं. रिपोर्ट मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद इस का गहन अध्ययन करेंगे. अनुमान है कि दोषियों के खिलाफ निलंबन, विभागीय जांच के अलावा आपराधिक केस दर्ज करने के आदेश जारी हो सकते हैं. युवराज मेहता की मौत अब केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गई है.

एसआईटी रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि सही समय पर योजना, निगरानी और रेस्क्यू सिस्टम सक्रिय होता तो यह मौत टाली जा सकती थी. फिलहाल सभी की नजर अब प्रदेश सरकार के निर्णय पर टिकी है. UP News

 

Rajasthan News: एसी बस बनी 22 यात्रियों की चिता

Rajasthan News: जैसलमेर से जोधपुर जाने वाली नई एसी बस 4 दिन पहले ही सड़क पर उतरी थी. चलने के कुछ देर बाद ही धमाके के साथ उस में इतनी विकराल आग लगी कि 22 यात्री भस्म हो गए और 16 गंभीर रूप से घायल हो गए. आखिर ऐसी क्या वजह रही, जो यह बस एक श्मशान बन गई?

मंगलवार, 14 अक्तूबर, 2025 को अपराह्नï 3 बजे जैसलमेर से जोधपुर के लिए एक निजी बस 57 सवारियां ले कर रवाना हुई. बस जैसलमेर से मात्र 12 किलोमीटर दूर थईयात गांव के वार म्यूजियम के पास पहुंची ही थी कि अचानक उस के पिछले हिस्से से धुआं उठने लगा. बस की बैटरी में शौर्ट सर्किट होने से एसी की गैस फैल गई और बस में भीषण आग लग गई. कुछ ही देर में आग ने विकराल रूप रूप ले लिया. बस की बनावट संकरी थी तथा इमरजेंसी गेट केवल पीछे की ओर था, जबकि दोनों ओर होना आवश्यक था. नई बस में एसी की गैस पूरी भरी हुई थी. बस में फायर सेफ्टी उपकरण नहीं थे. अगर सेफ्टी उपकरण मौजूद होते तो आग पर काबू पाया जा सकता था.

बस में आग लगते ही गेट लौक हो गया, जिस से यात्री बस में ही फंस गए और यात्रियों में चीखपुकार मच गई. बस के अंदर फंसे लोग जान बचाने के लिए चीखते रहे, साक्षात मौत को सामने खड़ा देख कई यात्रियों ने खिड़कियों के कांच तोड़ कर कूदने की कोशिश की. बंबरों की ढाणी जैसलमेर निवासी पीर मोहम्मद ने चलती बस से पत्नी और साली को खिड़की से बाहर फेंक दिया, मगर उस के दोनों बच्चे डबल डेकर बस की ऊपर वाली सीट पर जिंदा जल गए. इसी तरह एकां गांव, रामदेवरा निवासी महिपाल सिंह भी झुलसने के बावजूद खिड़की से कूद गया. इस तरह कुछ लोग ही खिड़की से बाहर कूद सके.

ड्राइवर शौकत ने बस में आग लगी देखी तो बस को रोकने की कोशिश की, मगर विफल रहा. करीब 700 मीटर तक आग लगी बस चलती रही. ड्राइवर ने बस का गेट खोलना चाहा, मगर गेट लौक हो गया था. इस कारण ड्राइवर बस रोक कर नीचे कूद गया. बस में बम फटने जैसी तेज आवाज सुन कर थईयात गांव के कोजराज सिंह अपने पेट्रोल पंप से स्टाफ के साथ बस की तरफ दौड़ पडे.

पेट्रोल पंप के पास शराब के गोदाम के लोगों को भी कोजराज सिंह ने साथ में लिया और जलती बस के पास पहुंचे. आर्मी एरिया से गुजर रहे एक पानी के टैंकर को देख कर थईयात गांव के लोगों ने देखा तो कैंट एरिया का ताला तोड़ कर बाहर निकाला और आग बुझाने का प्रयास किया. आग इतनी तेज थी कि बस धूधू कर जलती रही. बस में जिंदा जल रहे लोगों की चीखपुकार सुनाई दे रही थीं.

प्रशासन और बचाव टीम क्यों पहुंची देर से

कोजराज सिंह ने फोन द्वारा घटना की सूचना 108 नंबर पर एंबुलेंस को दे दी थी. वार म्यूजियम के सामने जलती बस को सेना के लोगों ने देखा तो वे तत्काल जेसीबी ले कर मौके पर पहुंचे और आर्मी ने जेसीबी की मदद से बस का गेट तोड़ा और फंसे लोगों को बाहर निकाला. प्रत्यक्षदर्शियों के सामने बस में लोग जिंदा जल रहे थे, मगर वे लोग कुछ कर नहीं पा रहे थे. खिड़कियों से कूदे लोग जले हुए सड़क पर पड़े कराह रहे थे. वे कह रहे थे कि हमें अस्पताल ले जाओ. हमें बचा लो.

मगर दुर्भाग्य की बात यह कि फोन पर सूचना देने के 50 मिनट बाद एंबुलेंस, अग्निशमन गाडिय़ां और पुलिस प्रशासन के लोग पहुंचे, जबकि जैसलमेर जिला मुख्यालय से घटनास्थल मात्र 12 किलोमीटर दूर था. यदि सूचना मिलते ही अगर फायर ब्रिगेड की गाडिय़ां 10 मिनट में पहुंच जातीं तो शायद कुछ लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती थी.

खैर, हमेशा से यही होता रहा है. जैसलमेर में एसी स्लीपर बस में आग लगने की घटना ने हर किसी को झकझोर दिया. घटनास्थल का दृश्य बहुत ही हृदयविदारक था. जलती हुई बस के पास शुरुआत में जो लोग पहुंचे तो उन को केवल आग की लपटों के बीच जलते लोगों का चीत्कार सुनाई दे रही थी, वहां का दृश्य देख कर उन की भी रूह कांप उठी. अंदर से सिर्फ चीखने व चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. लोग जैसेतैसे बस से निकलना चाह रहे थे, लेकिन वे इतने ज्यादा झुलस गए थे कि चाहते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहे थे. मदद के लिए पहुंचे लोग भी उन की कोई सहायता नहीं कर पाए.

देखते ही देखते बस में से आवाजें आनी बंद हो गईं. मतलब साफ था कि कई लोगों ने दम तोड़ दिया था. वे जिंदा जल गए थे. सूचना देने के पौन घंटा बाद जब जैसलमेर का पुलिस प्रशासन नींद से जागा और घटनास्थल पर पहुंचा, तब तक बस जल कर खाक हो चुकी थी. जिला कलेक्टर प्रतापसिंह नाथावत, एडीएम परसा राम, एसपी शिवहरे, फायर ब्रिगेड की गाडिय़ां, एंबुलेंस एवं पुलिस टीम ने घटनास्थल पर आ कर बस की आग बुझाई.

हादसा बहुत बड़ा था, यह घटनास्थल पर आने के बाद जिला प्रशासन को पता चला. तब और एंबुलेंस मंगवाई गईं. बारीबारी से एंबुलेंस मौके पर पहुंचीं और घायलों को तत्काल जैसलमेर के सब से बड़े सरकारी अस्पताल श्री जवाहिर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल की स्थिति यह थी कि वहां न तो पर्याप्त डाक्टर थे और न ही जरूरी संसाधन. घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद जोधपुर रेफर कर दिया गया, जोकि करीब 300 किलोमीटर दूर है.

तुरंत ही एंबुलेंसों के लिए ग्रीन कारिडोर बनाया गया, ताकि तत्काल जोधपुर पहुंच सकें. 16 घायलों को गंभीर हालत में जोधपुर रेफर किया गया था. इन में से एक घायल ने रास्ते में दम तोड़ दिया. बस अग्निकांड में झुलसे 16 लोगों को अलगअलग गाडिय़ों से ग्रीन कारिडोर बना कर जैसलमेर से जोधपुर ले जाया गया. पहली एंबुलेंस रात करीब साढ़े 8 बजे महात्मा गांधी अस्पताल पहुंची. फिर रात सवा 10 बजे तक सभी घायलों को जोधपुर अस्पताल पहुंचाया गया.

15 घायलों में से 9 की हालत गंभीर थी. ये लोग 40 से 90 फीसदी तक झुलसे हुए थे. आधा दरजन घायलों को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया. बाकी घायलों को औक्सीजन पर लिया गया. बस अग्निकांड की सूचना पहले ही एमजीएच और एमडीएम अस्पताल एवं जोधपुर जिला पुलिस एवं प्रशासन को दी जा चुकी थी. जोधपुर के तमाम प्रशासनिक अधिकारी सारी तैयारी कर के पहले से खड़े थे. जैसे ही घायलों को ले कर गाडिय़ां पहुंचीं, उन का तत्काल इलाज शुरू कर दिया गया. इधर बस अग्निकांड की खबरें व सोशल मीडिया पर जलती बस, बस में से कूदते जले पीडि़तों की फोटो और वीडियो वायरल होते ही कोहराम सा मच गया. जो लोग 3 बजे की इस बस में जैसलमेर से सवार हुए थे, उन के परिजन अनहोनी की आशंका से कांप उठे.

लोग तत्काल जैसलमेर के श्री जवाहिर अस्पताल पहुंचे, वे अपने परिजनों को घायलों में तलाशने लगे. अफरातफरी का माहौल था. जैसलमेर के सैकड़ों लोग अस्पताल में जमा हो गए थे. किसी को तो अपना परिजन घायल हालत में मिला. मगर कई लोगों का कोई अतापता नहीं था. जैसलमेर जिला पुलिस की तमाम टीमें घटनास्थल एवं अस्पताल में मौजूद थीं, जो लोग इस बस में जोधपुर, पोकरण, लाठी, सेतरावा, बासनपीर, बंबरों की ढाणी, चांपला जाने के लिए सवार हुए थे, उन में से कई लोगों के मोबाइल 14 अक्तूबर को दोपहर बाद सवा 3 बजे से बंद आ रहे थे.

बस हादसे की खबर सुन कर के.के. ट्रेवल्स की इस बस में सवार लोगों को परिजनों ने कौल किए तो मोबाइल बंद मिले. ऐसे में तमाम लोग पुलिस थाना सदर जैसलमेर से संपर्क कर अपने परिजनों के बारे में पूछने लगे. घायलों के बारे में तो पुलिस ने बता दिया. मगर कई लोग लापता थे. यानी ये सभी लोग बस में जिंदा जल गए थे. पुलिस भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं थी.

बस में वार म्यूजियम के पास धमाका सा हुआ और बस वहीं रुक गई. बस में सवार लोगों ने सोचा कि एक्सीडेंट हुआ है. धमाके के साथ ही बस में धुआं फैल गया था. किसी को समझ में आता, उस से पहले बस आग का गोला बन गई. जब तक लोग माजरा समझे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मगर कुछ लोग इमरजेंसी खिड़की से जली अवस्था में नीचे कूद गए.

जो ऊपर की स्लीपर सीट पर बैठे थे, वे जल कर मर गए. जो लोग बस से कूदे, वे भी जले हुए थे. जैसलमेर जोधपुर हाइवे पर यह घटना घटी थी. हाइवे पर गाडिय़ों की आवाजाही थी. जैसे ही लोगों ने बस को जलते देखा, उन में से कई लोगों ने 108 एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड पुलिस कंट्रोल रूम, थाना सहर, थाना कोतवाली जैसलमेर को घटना की जानकारी दी. तब तक पुलिस प्रशासन को पता नहीं था कि इतना बड़ा हादसा हो गया है. मगर लोगों के फोन पर फोन आने लगे, तब प्रशासन जागा और घटनास्थल पर 4 बजे पहुंचा.

सहायता करने के बजाए वीडियो बना रहे थे लोग

जो लोग जलती बस से नीचे कूदे, वे भी झुलसे हुए थे. वे लोगों से अस्पताल ले जाने की गुहार कर रहे थे. मगर लोग वीडियो बनाने में मस्त थे. यहां पर इंसानियत व उन का जमीर शायद मर चुका था. तभी तो दर्द से कराहतेतड़पते घायलों को वे अस्पताल ले जाने के बजाय कह रहे थे कि एंबुलेंस आ रही है. बस में से झुलसा हुआ महिपाल सिंह चल कर एक कार में पिछली सीट पर जा बैठा तो कार ड्राइवर ने उसे गाड़ी से नीचे उतार दिया. तभी एक बाइक अमीन खान नामक युवक वहां पर पहुंचा और उस ने वीडियो बना रहे लोगों को दुत्कार लगाते हुए घायल महिपाल सिंह को बाइक पर बिठा कर अस्पताल पहुंचाया.

खैर, बस की आग बुझाने के बाद जब बस की बौडी 4 घंटे बाद ठंडी हुई, तब बस में सीटों पर चिपके जल कर राख हुए 19 शव बस से बाहर निकाले गए. इन शवों की पहचान करना बड़ा ही मुश्किल काम था, क्योंकि शव पूरी तरह जल चुके थे. बस से उतार कर शवों को पोटलियों में बांध कर एक लाइन में रखा गया तो देखने वालों की रुह कांप गई. सफेद कपड़ों में लपेट कर रखे इन शवों की दुर्दशा जिस ने भी देखी, उस की आंखें नम हो गईं. बस अग्निकांड की घटना की सूचना पर जैसलमेर जिला कलेक्टर प्रताप सिंह नाथावत घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने बस हादसे पर दुख जताते हर पीडि़त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की. जिला प्रशासन ने हेल्पलाइन नंबर जारी किए.

बस में सवार 16 घायलों को जोधपुर रैफर किया गया था, उन का विवरण इस प्रकार है— महिपाल सिंह (20 वर्ष), भोमाराम (22 वर्ष), यूनुस (8 वर्ष), इकबाल (33 वर्ष), फिरोज (40 वर्ष), भागाबाई (59 वर्ष), मनोज भाटिया, पीर मोहम्मद (60 वर्ष), जीवराज (15 वर्ष), इमितिजा (30 वर्ष), रफीक (22 वर्ष), लक्ष्मण (22 वर्ष), उबेदुल्ला (50), विशाखा (32 वर्ष), आशीष (45 वर्ष). एक घायल हुसैन (79 वर्ष) निवासी जावेध की रास्ते में मौत हो गई. वहीं एक घायल को प्राइवेट अस्पताल में जोधपुर में भरती करवाया गया था.

समय से मदद मिलती तो बच जातीं कई जानें

अग्निकांड की जानकारी मिलने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्रसिंह खींवसर जैसलमेर घटना की रात 10 बजे घटनास्थल का जायजा लेने पहुंचे और प्रशासन को उचित निर्देश दिए. उन्होंने रात सवा 11 बजे महात्मा गांधी अस्पताल जा कर हादसे का शिकार हुए लोगों के हाल जाने और हरसंभव मदद देने का वादा किया. उधर, बस हादसे पर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने एक्स पर पोस्ट कर हादसे पर शोक प्रकट किया. जैसलमेर बस हादसे में प्रधानमंत्री राहत कोष से मृतकों के परिवार को 2 लाख रुपए और घायलों को 50 हजार की आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है.

बस हादसे में जिंदा जले सभी 19 शवों को सेना की गाड़ी से जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल भिजवाया गया. मरने वालों की पहचान के लिए उन के 2 परिजनों से डीएनए सैंपल ले कर शवों की पहचान की जानी थी. इस के लिए महात्मा गांधी अस्पताल जोधपुर के काटेज संख्या 4 और 5 में और जैसलमेर स्थित जवाहिर अस्पताल के ट्रामा सेंटर में विशेष व्यवस्था की गई. डीएनए सैंपल के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए.

बस हादसे में मारे गए लोगों की पहचान के लिए जैसलमेर जिला प्रशासन ने कवायद शुरू कर दी है. जोधपुर से डीएनए और फोरैंसिक टीम जैसलमेर पहुंची. बस हादसे का शिकार हुए यूनुस (8 वर्ष) पुत्र पीर मोहम्मद ने बुधवार 15 अक्तूबर को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. वह हादसे में 70 प्रतिशत झुलस गया था. उस के मम्मीपापा और अन्य परिजन भी गंभीर रूप से झुलसे थे और इलाज जारी था. इस से पहले जैसलमेर से जोधपुर लाते समय जावंध, जैसलमेर निवासी हुसैन (79 वर्ष) की भी रास्ते में मौत हो गई थी. दोनों शव परिजन को सौंप दिए. मासूम यूनुस के दम तोड़ते ही बस अग्निकांड में मरने वालों की संख्या बढ़ कर 21 हो गई थी.

यूनुस और हुसैन के शव परिजनों को सौंप दिए गए थे. जबकि 19 शव मोर्चरी में पहचान का इंतजार कर रहे थे. विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक अजय शर्मा ने बताया और जोधपुर एफएसएल की टीमें रिपोर्ट जल्द से जल्द तैयार करने में जुटी हैं, ताकि परिजन अपनों को अंतिम विदाई दे सकें. गांधी अस्पताल जोधपुर मोर्चरी के बाहर हवा भारी थी… वो हवा जिस में चीखें घुल गई थीं, सिसकियां जम गई थीं. गांधी अस्पताल की बर्न यूनिट से निकलते परिजनों की आंखों में उम्मीद नहीं, सिर्फ प्रतीक्षा है, ‘हमें बस अपनों के शव दे दो. 2 दिन निकाल लिए, रात कैसे काटेंगे?’ ये शब्द उन सभी मृतकों के परिजनों के थे, जो बस हादसे में बुरी तरह जल कर दुनिया को अलविदा कह चुके थे.

डीएनए मिलने पर परिजनों को शव सौंपे जाने थे. तब तक मृतकों के परिजनों को इंतजार करना था. हां, यह बात दीगर है कि जिन घरों के दीपक दीपावली से पहले बुझ गए थे, वहां पर मातम पसरा था. जैसलमेर, लवारन, बंबरों की ढाणी, जावंध, झलारिया, कोटड़ी, लाठी, बासनपीर, चांपला गांवों के लोग बस हादसे में काल का ग्रास बने थे, जहां पर सिर्फ चीखें और रुदन था. 15 अक्तूबर, 2025 को बस हादसे का शिकार हुए मृतक राजेंद्र सिंह चौहान (पत्रकार) के भाई चंदन सिंह चौहान और जैसलमेर जिले के लाठी गांव निवासी मृतक गोपीलाल दरजी के भाई जगदीश दरजी ने थाना सदर जैसलमेर में के.के. ट्रेवल्स बस के मालिक तुराब अली और बस के ड्राइवर शौकत खान के खिलाफ मामला दर्ज कराया. मामला दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू की.

जैसलमेर जिला एसपी अभिषेक शिवहरे के निर्देश पर एसआईटी की टीम बनाई गई. एसआईटी टीम ने नामजद आरोपियों तुराब अली और शौकत खान को 16 अक्तूबर, 2025 को जोधपुर से गिरफ्तार कर लिया और सदर थाने ला कर पूछताछ की.

4 दिन पहले ही उतरी थी बस सड़क पर

आरोपी बस मालिक तुराब अली और ड्राइवर शौकत खान ने पुलिस पूछताछ में बताया कि जैसलमेर में आग का गोला बनी बस घटना से 14 दिन पहले ही खरीदी थी. के.के. ट्रेवल्स की इस बस का पहली अक्तूबर, 2025 को ही रजिस्ट्रेशन हुआ था. 9 अक्तूबर को आल इंडिया रूट का परमिट मिला, इस के बाद जैसलमेर-जोधपुर रूट पर इसे शुरू किया गया. बस को शुरू हुए 4 दिन ही हुए थे. जैसलमेर से चौथा फेरा ही था. नौन एसी से एसी में मोडिफाइड की गई यह बस स्लीपर एयर कंडिशनर थी, जिस में 20+26 सीटें थीं. इस में 20 स्लीपर और 26 सिटिंग सीटें थीं.

जैसलमेर से 14 अक्तूबर को दिन में 3 बजे रवाना हुई थी, तब 40 सवारियां बैठी थीं. इस के बाद कुछ सवारियां बीच रास्ते में बैठीं. फिटनैस और इंश्योरेंस हाल ही में हो रखा था. परिवहन विभाग का नियम है कि बसों को मोडिफाइड नहीं कर सकते, लेकिन नियमों का ताक पर रख कर इस बस को मोडिफाई कर दिया और इमरजेंसी गेट ही नहीं रखा. ज्यादा सवारियों को बिठाने के लिए निजी बस संचालक दिन में भी स्लीपर बस चला रहा था. अन्य निजी बस संचालक भी इस बस की तरह स्लीपर बसें दिन में चला रहे हैं. ऐसे में ज्यादा सवारियां मिलती हैं तो एकएक स्लीपर में 4 से 5 सवारी को बिठा देते हैं.

परिवहन विभाग के अक्तूबर 2015 के एक परिपत्र के अनुसार स्लीपर कोच बस की यात्रा शाम 6 बजे के बाद शुरू होनी चाहिए और सुबह 8 बजे से पहले खत्म होनी चाहिए. जबकि जैसलमेर में हुए सब से बड़े हादसे की शिकार स्लीपर बस दोपहर 3 बजे रवाना हुई थी. इस के अलावा बस में ज्यादा स्लीपर व सीटें बनाने के चक्कर में बीच में मुश्किल से डेढ़ से 2 फीट की गली थी. जगह इतनी संकरी होने से 2 आदमी एक साथ निकलना भी मुश्किल रहता है. इस के अलावा बस की आंतरिक सज्जा के लिए लाइटिंग, मोबाइल चार्ज करने की सुविधा और हर स्लीपर सीट पर परदे लगा दिए जाते हैं. जगहजगह एलईडी व रोप लाइट भी लगी थीं. यह सब हादसे की वजह बने.

सिस्टम की अनदेखी के चलते एसी स्लीपर बस यात्रियों के लिए लाक्षागृह बन गई. इस बस में भी अन्य बसों की तरह इमरजेंसी गेट की जगह सीटें बना दी गई थीं. एक ही गेट था. इस के बाद भी भ्रष्ट प्रशासन की मिलीभगत से इसे चलाने की परमिशन मिल गई. नियमानुसार ऐसी बसों में 2 इमरजेंसी गेट होने ही चाहिए. इस के अलावा अधिकतर बसों की तरह इस बस में भी अग्निशमन यंत्र तक नहीं था. बस चालक और कंडक्टर भी इस बस के हिसाब से ट्रेंड नहीं होते. दूसरी सब से बड़ी लापरवाही, एसी बसों की विंडो ग्लास से कवर होती है. शीशों पर टफन ग्लास होना चाहिए, ताकि हादसे के समय तोड़ा जा सके. लेकिन पैसा बचाने के लिए लेमिनेटेड ग्लास लगा दिया जाता हैं.

ऐसे में आपातकालीन स्थिति में विंडो का ग्लास पूरी तरह से नहीं टूटता है. साथ ही फायर सिस्टम लगा होना चाहिए, मगर हादसे वाली बस में फायर सिस्टम नहीं था. यात्रियों के साथ छत पर लगेज ले कर बसें चलती हैं. राज्य सरकार ने बस हादसे की जांच के लिए 5 सदस्यीय एसआईटी टीम बनाई. इस टीम ने 16 अक्तूबर को जैसलमेर पहुंच कर जांच शुरू की. जांच टीम ने घटनास्थल एवं बस का निरीक्षण किया, जिस में कई गंभीर लापरवाहियां सामने आईं. टीम के अनुसार बस की बौडी निर्धारित लंबाई से अधिक बढ़ाई गई थी, जिस से बस भारी हो गई थी. सब से बड़ी चूक यह पाई गई कि इमरजेंसी गेट के आगे 2 सीटें बना दी गई थीं, जिस से आपात स्थिति में यात्री बाहर नहीं निकल पाए. बस के पीछे जो एग्जिट गेट था, वह इतना छोटा था कि बस में आग लगने के बाद खुल ही नहीं पाया.

बस के इंटीरियर में भी सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी. टीम ने बताया कि बस के अंदर ज्वलनशील मटेरियल का प्रयोग किया गया था, जैसे कि खिड़कियों और स्लीपर के आगे लगे परदे. यही वजह रही कि आग बस के अंदर तेजी से फैली, जबकि बस के टायर और नीचे का हिस्सा ज्यादा नहीं जला. जांच में यह भी सामने आया कि बस में पटाखे और सजावट का सामान मौजूद था, लेकिन वे आग में नहीं जले. इस से यह संकेत मिला कि आग संभवत: किसी और वजह से लगी. जांच अधिकारी इस दिशा में भी संभावित कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं.

बस हादसे के बाद राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बस बौडी निर्माण और फिटनैस प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुरक्षा मानकों की सख्त पालना की जाएगी. जो भी औपरेटर या निर्माता नियमों की अनदेखी करते पाए जाएंगे, उन के खिलाफ कठोर काररवाई की जाएगी. बस में फायर डिटेक्शन सिस्टम होना जरूरी. हर स्लीपर कोच में फायर डिटेक्शन और सप्रेशन (एफडीएसएस) लगाना जरूरी. यह सिस्टम एआईएस-135:2016 मानकों के अनुसार होना चाहिए. फायर डिटेक्शन सिस्टम बस में आग लगने की शुरुआती स्थिति में ही अलार्म बजाता है. खुद आग को नियंत्रित करता है.

संयुक्त शासन सचिव ओ.पी. बुनकर के नेतृत्व में आई टीम ने जांच की और 17 अक्तूबर को जयपुर लौट गई. टीम जांच रिपोर्ट सरकार को देगी. राज्य सरकार ने बस हादसे की तकनीकी जांच पुणे (महाराष्ट्र) की एक स्वतंत्र संस्था सेंट्रल इंस्टीट्यूट औफ रोड ट्रांसपोर्ट (सीआईआरटी) को सौंपी हैं. सीआईआरटी की टीम शुक्रवार 17 अक्तूबर की शाम जैसलमेर पहुंची और मौके का निरीक्षण किया. टीम अब विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट तैयार कर राज्य सरकार को सौंपेगी. सीआईआरटी पुणे की टीम जैसलमेर बस अग्निकांड के हादसे की वजह, किस की लापरवाही क्या कमियां रहीं, किस की जिम्मेदारी थी, इन बिंदुओं पर काम करेगी और राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी. बौडी बनाने वाली कंपनियों की भी जांच की जाएगी.

राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि भविष्य में जैसलमेर जैसी घटनाएं न दोहराई जाएं, इस के लिए बस निर्माण करने वाली कंपनियों की भी जांच की जाएगी. इस के लिए एक विशेष मौनिटरिंग कमेटी गठित की है, जो उन वर्कशाप्स और फैक्ट्रियों का निरीक्षण करेगी, जहां बसों की बौडी बनाई जाती है. हादसे में जिस के.के. ट्रेवल्स की स्लीपर बस में आग लगी थी, उस कंपनी के यार्ड का निरीक्षण परिवहन विभाग की टीम ने किया. वहां कुल 66 बसें खड़ी मिली, जिन में से 35 बसों की जांच अब तक पूरी की जा चुकी है, इन में से 10 बसों में बौडी निर्माण से जुड़ी गंभीर खामियां पाई गई हैं, जिन्हें वाल्यूशन के तहत बनाया गया बताया जा रहा है और वे जांच के घेरे में हैं.

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने बस अग्निकांड में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को 10 लाख रुपए, जिस परिवार के 3 या अधिक लोगों की मृत्यु हुई, उस परिवार को 25 लाख रुपए, गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को 2 लाख रुपए और मामूली रूप से घायल प्रत्येक व्यक्ति को एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की. इस भयावह बस हादसे को लोग भूल नहीं सकेंगे. भविष्य में जब भी जैसलमेर बस हादसे की चर्चा होगी, लोगों के मष्तिष्क में रुह कंपा देने वाला यह मंजर घूमने लगेगा. अब सवाल यही है कि इस तरह के हादसे रोकने के लिए सरकार ईमानदारी से क्या कोई कदम उठाएगी? Rajasthan News

 

 

Short Kahani in Hindi : फौजा सिंह प्रेरणा की मिसाल

Short Kahani in Hindi : यदि किसी भी शख्स के पास हिम्मत और जज्बा है तो वह कामयाबी के मुकाम तक जरूर पहुंच सकता है. यही सब कर दिखाया फौजा सिंह ने. उम्रदराज होने के बावजूद उन्होंने मैराथन दौड़ कर दुनिया में कामयाबी का परचम बुलंद कर दिया. 114 साल के होने के बावजूद वह पूरी तरह से फिट थे, लेकिन एक हादसे में गुजरने के बाद वह प्रेरणा की ऐसी मिसाल बन गए कि…

दुनिया के सब से उम्रदराज मैराथन धावक फौजा सिंह की जालंधर में सड़क हादसे में 14 जुलाई, 2025 को मौत हो गई. वह घर के बाहर टहल रहे थे. इसी दौरान उन्हें एक कार ने टक्कर मार दी, जिस से वह घायल हो गए. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां पर इलाज दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया. फौजा सिंह को ‘टर्बन टोरनाडो’, ‘रनिंग बाबा’, ‘सिख सुपरमैन’ भी कहा जाता था.

वह अपने 2 बेटों के साथ पंजाब के जिला जालंधर के गांव व्यास पिंड में ही रहते थे. यहां पर ही उन का सन 1911 में जन्म हुआ था. फौजा सिंह भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक थे. वह आजकल जालंधर में ही आए हुए थे. उन के जीवन की कहानी कुछ अजीब है. बचपन में वह 5 साल तक चलफिर नहीं सकते थे. उन के पैर बहुत कमजोर थे. फिर धीरेधीरे ऐसे चले कि आखिर तक नहीं रुके और पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली. वह अकसर कहा करते थे कि मेरी जिंदगी ने मुझे दौड़ाक बना दिया. इस जिंदगी में बहुत कुछ दिया और मुझ से लिया भी बहुत कुछ. मैं ने अपनी पत्नी, जवान बेटा और बेटी खोए. मैं ने फिर 81 की उम्र में दौडऩा शुरू किया, जो अभी 114 साल की उम्र तक नहीं रुका था.

उन्होंने साल 2000 में मैराथन यात्रा शुरू की थी और 8 दौड़ों में भाग लिया. लंदन मैराथन फौजा सिंह की पहली फुल मैराथन थी, जिसे उन्होंने 6 घंटे 54 मिनट में पूरा किया. 90 से अधिक आयु वर्ग में विश्व के सर्वश्रेष्ठ धावक के पिछले रिकौर्ड को तोड़ा. 2003 टोरंटो वाटरफ्रंट मैराथन को 90+ आयुवर्ग की कैटेगरी में 5 घंटे 40 मिनट में पूरा किया, जो उन का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ था. वर्ष 2013 में 101 साल की उम्र में आखिरी बार उन्होंने हांगकांग मैराथन में भाग लिया था.

फौजा सिंह गांव के नौजवानों को स्पोर्ट की तरफ लाने के लिए प्रेरित करते थे. वह हर स्पोट्र्समैन का दिल से स्वागत करते थे. गांव में वह पहलवानों को खुद पुरस्कार दिया करते थे. वह हमेशा खेलप्रेमियों के प्रेरणास्रोत रहे. वह नौजवानों को नशे से दूर रहने को कहते, वहीं वह सुबह जल्दी उठ कर मैदान में आने को कहते. उन की मृत्यु के बाद उन का पूरा गांव उदास था. विदेश में सिटिजनशिप होने के बावजूद वह अपने देश में रहना पसंद करते थे. बेटों के अलावा फौजा सिंह की 2 बेटियां हैं. बेटियों को वह बहुत प्यार करते थे. दोनों ही बेटियां विदेश में हैं. उन का कहना है कि गांव में उन का स्मारक बनाया जाएगा.

फौजा सिंह के छोटे बेटे हरविंदर सिंह ने बताया कि वह ब्रांडेड कपड़े और जूते पहनते थे. पिता जिस रंग के कपड़े पहनते थे, उसी रंग की पगड़ी और जूते पहनते थे. वह 10 हजार से कम के जूते नहीं पहनते थे. जांच के बाद पुलिस को फौजा सिंह की मौत के समय की सीसीटीवी फुटेज हाथ लग गई.  सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस ने जालंधर के करतारपुर में स्थित दासूपुर गांव के अमृतपाल सिंह ढिल्लो को पकड़ा. उस को कोर्ट में पेश कर रिमांड लिया गया. अमृतपाल कुछ दिन पहले ही कनाडा से लौटा था. टक्कर मारने वाली गाड़ी भी उस से बरामद कर ली गई. हादसे के बाद अमृतपाल अपने गांव नहीं गया था. वह जालंधर तक नहीं आया, बल्कि रास्ते से ही गांव होता हुआ करतारपुर निकल गया था.

प्रारंभिक पूछताछ में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. अमृतपाल ने माना कि वह मुकेरिया साइड से अपना फोन बेच कर लौट रहा था. जब वह व्यास पिंड के पास पहुंचा तो एक बुजुर्ग उन की गाड़ी की चपेट में आ गए. उसे यह नहीं पता था कि बुजुर्ग फौजा सिंह हैं. जब देर तक खबरें आनी शुरू हुईं तो फौजा सिंह की मौत के बारे में पता चला. एक इंटरव्यू में फौजा सिंह ने कहा था कि नशा मत करो, इस से बुरा कुछ भी नहीं. अगर घर पर मैं हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाता तो शायद इतना न कर पाता. मेहनत सब से बड़ी चीज है. सब कुछ आप कर सकते हैं, बस जुनून होना चाहिए. जिंदगी में हमेशा अपनी सोच पौजीटिव रखें.

वह अकसर कहते थे कि कठिनाइयां मुझे प्रेरित करती हैं. कामयाबी के पीछे आप की मेहनत और जज्बा अहम हैं. मुझे बहुत खुशी होती है, जब मुझे पौजीटिव लोग मिलते हैं. चेहरे पर मुसकान ही असल जिंदगी है. फौजा सिंह को 2011 में प्राइड औफ इंडिया की उपाधि से सम्मानित किया, 100वें जन्मदिन पर ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने बधाई संदेश लंदन से भेजा और पेटा अभियान में शामिल होने वाले वह सब से उम्रदराज व्यक्ति थे. फौजा सिंह का जीवन सभी के लिए रोलमौडल था. वह एक मस्त इंसान थे, जो हमेशा खुश रहते थे और दूसरों को खुश रहने को कहते थे.

खुशवंत सिंह ने उन पर एक किताब ‘टर्बंड टोरनाडो’ लिखी, जो लंदन में रिलीज की गई. उन के बेटे हरविंदर ने बताया कि वह दूध के साथ अलसी की पिन्नी खाते थे. पर वह हर रोज दोपहर 2 बजे 7-8 किलोमीटर सैर करते थे. 20 जुलाई, 2025 को फौजा सिंह को यादगार विदाई दी. उन की अंतिम यात्रा में मुख्यमंत्री भगवंत मान अपने काफिले के साथ श्मशानघाट पहुंचे. ग्रंथी सिंह और परिजनों ने अरदास की. पंजाब पुलिस ने गार्ड औफ औनर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी परिजनों के साथ शोक व्यक्त किया.

इस मौके पर अलगअलग पार्टियों के राजनीतिज्ञों के अलावा राज्यपाल गुलाबचंद्र कटारिया भी पहुंचे. सीएम भगवंत मान ने उन के गांव के स्कूल का नाम फौजा सिंह के नाम पर रखने और व्यास पिंड में उन के नाम का स्टेडियम बनवाने की बात कही. Short Kahani in Hindi