Hindi Crime Story: खूनी चाहत

Hindi Crime Story: गीता को पाने के बाद वारिस की नजर दयारानी की करोड़ों की संपत्ति पर थी, जो उस की मौत के बाद गीता को मिलने वाली थी. इस के लिए उस ने जो चाल चली, क्या वह ठीक थी?

उस दिन सुबह के तकरीबन 7 बजे गीता की आंखें खुलीं तो घर में सन्नाटा पसरा था. जबकि रोजाना उस के उठने से पहले ही दयारानी उठ चुकी होती थीं. वह जल्दी उठती थीं और उन के उठते ही लोगों का आनाजाना शुरू हो जाता था, जिस से घर में चहलपहल शुरू हो जाती थी. लेकिन उस सुबह घर में निहायत खामोशी छाई थी. दयारानी अभी तक सो रही हैं, यह उस के लिए हैरानी की बात थी. मन में सवाल आए तो उस के कदम दयारानी के बैडरूम की ओर बढ़ गए. कमरे का दरवाजा खुला था. वह अंदर पहुंची और जैसे ही उस की नजरें बिस्तर पर पड़ीं, वह चीख पड़ी. दयारानी का शरीर खून में डूबा बिस्तर पर पड़ा था.

गीता की चीख सुन कर घर में मौजूद दयारानी की शिष्या शमा भाग कर उस के पास आ गई. कमरे के अंदर का नजारा देख कर उस का भी हाल गीता जैसा ही हुआ. उन की चीखें सुन कर आसपास के लोग भी भाग कर आ गए थे. कुछ लोगों ने दयारानी को हिलाडुला कर देखा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उन की मौत हो चुकी थी. अब लोगों की जुबान पर एक ही सवाल था कि आखिर घर के अंदर घुस कर दयारानी को किस ने इस तरह बेरहमी से मार डाला? गीता दहाडे़ मार कर रो रही थी, ‘‘पता नहीं किस ने ऐसा कर डाला? ऊपर वाला उसे कभी माफ नहीं करेगा.’’

वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. उसी के आधार पर कोतवाली प्रभारी धर्मेंद्र यादव पुलिस बल के साथ दयारानी के घर आ पहुंचे. पता चला कि किसी ने 55 वर्षीया दयारानी की गोली मार कर हत्या कर दी थी. गोली उन के सिर में मारी गई थी. मामला गंभीर था. कोतवाली प्रभारी ने घटना की सूचना एसएसपी धर्मेंद्र सिंह को भी दे दी थी. उन के निर्देश पर कुछ ही देर में एसपी (सिटी) डा. अजयपाल शर्मा और सीओ (सिटी) अनिल यादव भी आ गए थे. दयारानी किन्नर थीं. वह गाजियाबाद में गऊशाला फाटक के पास कैला रोड पर अपने मकान में रहती थीं. उस मकान में कुल 4 लोग रहते थे. एक किन्नर दयारानी, दूसरी उन की भतीजी गीता, तीसरी उन की शिष्या शमा और चौथा गीता का 6 वर्षीय बेटा सन्नी.

दयारानी शहर के लिए एक चर्चित नाम थीं. वह सामाजिक कार्य करती रहती थीं. इस के अलावा वह लोकसभा, विधानसभा और मेयर पद के लिए चुनाव भी लड़ चुकी थीं. उन की हत्या की खबर फैलने से उन के घर के बाहर अच्छाखासा जमावड़ा लग गया था. पुलिस ने गीता और शमा को सांत्वना दे कर पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि रात करीब साढ़े 8 बजे खाना खाने के बाद वे दोनों अपनेअपने कमरों में सोने चली गई थीं. इस के बाद क्या हुआ, उन्हें मालूम नहीं. जांच में पुलिस ने घर का सारा कीमती सामान सुरक्षित पाया था. इस से साफ जाहिर हो रहा था कि हत्या लूटपाट के लिए कतई नहीं की गई थी.

दयारानी का बैडरूम घर के मुख्य दरवाजे के बराबर में था. कमरे में 2 दरवाजे और एक खिड़की थी. खिड़की पर लोहे की ग्रिल और जाली लगी थी, जबकि उस के लकड़ी के पल्ले खुले थे. कमरे का एक दरवाजा सड़क की ओर खुलता था, जबकि दूसरा घर के अंदर की ओर. सड़क की ओर खुलने वाला दरवाजा और मुख्य दरवाजा बंद था. सड़क से सटी ऊंची दीवार थी और दूसरी ओर से रेलवे लाइन गुजरती थी. ऐसे में सवाल यह उठता था कि जब बाहर से कोई आया नहीं तो दयारानी को गोली किस ने मारी.

एक्सपर्ट ने दयारानी के सिर के गोली के घाव को देख कर बताया कि गोली न ज्यादा नजदीक से मारी गई थी और न ज्यादा दूर से. गोली सिर के बीच में लगी थी. पुलिस ने जब कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि दयारानी को गोली सड़क की ओर खुलने वाली खिड़की से निशाना साध कर मारी गई थी, जिस से जाली में करीब एक इंच का छेद हो गया था. अब साफ हो गया कि हत्यारों ने उन्हें सड़क की ओर से निशाना बनाया था. गरमी की वजह से दयरानी खिड़की के पल्ले खोल कर सोती थीं. यह बात गीता ने पुलिस को बताई थी. गीता ने यह भी बताया था कि शाम को 3 लड़के दयारानी से मिलने आए थे. वे कौन थे, यह वह नहीं जानती थी.

चूंकि दयारानी के पास इस तरह लोगों का आनाजाना लगा रहता था, इसलिए उस ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. हैरानी की बात यह थी कि गोली चलने की आवाज किसी ने नहीं सुनी थी. न घर वालों ने, न बाहर वालों ने. घर में मौजूद गीता और शमा को भी हत्या का पता सुबह लगा था. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई कर के दयारानी के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और गीता की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इस हत्या से किन्नर समुदाय में हड़कंप मच गया था. उन्होंने रोष जताते हुए पुलिस से हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग की.

यह 3 जुलाई, 2015 की रात की वारदात थी, जिस का पता 4 जुलाई की सुबह चला था. शाम तक दयारानी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. उन्हें गोली 315 बोर के तमंचे से मारी गई थी. रिपोर्ट के अनुसार हत्या 11 से 12 बजे के बीच की गई थी. सब से बड़ी बात यह थी कि किसी ने गोली चलने की आवाज नहीं सुनी थी. गोली की आवाज न सुनाई पड़ने के पीछे पुलिस को एक वजह यह लग रही थी कि दयारानी जिस मकान में रहती थीं, उस के पास से रेलवे लाइन गुजरती थी.

आशंका थी कि गोली उस समय चलाई गई होगी, जब वहां से ट्रेन हार्न बजा कर गुजर रही होगी. पुलिस ने उस समय गुजरने वाली ट्रेन के बारे में पता किया तो पता चला कि उस बीच वहां से करीब 15 ट्रेनें गुजरी थीं. इस का मतलब दयारानी की हत्या फूलपू्रफ प्लानिंग के तहत की गई थी. उन का कातिल कौन था, अब यह पता करना पुलिस को मुश्किल लग रहा था. दयारानी आर्थिक रूप से काफी संपन्न थीं. उन के नाम करोड़ों की संपत्ति थी. पुलिस को हत्या की कोई वजह समझ में नहीं आ रही थी. दयारानी के घर के बाहर सीसीटीवी कैमरा लगा था. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग और दयारानी के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में ले लिया.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो उस में रात साढ़े 11 बजे 3 लोगों की परछाईयां नजर आईं. कैमरे की जद से बचने के लिए उन्होंने दीवार के किनारे का सहारा लिया था. कुछ देर बाद एक मोटरसाइकिल जाती हुई नजर आई थी, जिस में सिर्फ बैक लाईट नजर आ रही थी. पुलिस को उस में कोई चेहरा व मोटरसाइकिल का नंबर नजर नहीं आया. अगले दिन दयारानी हत्याकांड सुर्खियां बन गया. एसपी (सिटी) डा. अजयपाल शर्मा के निर्देशन में हत्याकांड के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में कोतवाली प्रभारी धर्मेंद्र यादव, एसआई शिवराज सिंह, हेडकांस्टेबल वीर सिंह, कांस्टेबल प्रवीण कुमार, संजय सिंह, पंकज सिंह, उदयवीर सिंह, इरफान खान, विपिन कुमार व विवेक भारद्वाज को शामिल किया गया.

इस पुलिस टीम ने आसपास के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि दयारानी का स्वभाव बहुत अच्छा था. वह हमेशा हर किसी की मदद के लिए तैयार रहती थीं. उन की किसी से रंजिश भी नहीं थी. इसी पूछताछ में पुलिस को एक अहम जानकारी यह मिली कि उन की भतीजी गीता का किसी लड़के से प्रेम संबंध चल रहा था. कुछ महीने पहले वह उस के साथ घर से भाग भी गई थी, लेकिन थोड़ी कोशिश के बाद दयारानी उसे खोज लाई थीं.

पुलिस ने गीता के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि उस के मातापिता गाजियाबाद के ही डासना गेट इलाके में रहते थे. दयारानी चूंकि वर्षों पहले किन्नर समाज का हिस्सा बन गई थीं, इसलिए अलग रहने लगी थीं. उन्हें गीता से लगाव था. गीता का विवाह दिल्ली के भजनपुरा में रहने वाले भीम सिंह से हुआ था. वह उस के 3 बच्चों की मां बनी, लेकिन एक साल पहले गीता का अपने पति से विवाद रहने लगा था. विवाद ज्यादा बढ़ा तो गीता पति का घर छोड़ कर दयारानी के पास आ कर रहने लगी. दयारानी को चूंकि अपनों की कमी हमेशा खलती थी, इसलिए उन्होंने गीता को अपने पास रख लिया.

6 महीने पहले गीता का भीम सिंह से तलाक हो गया. दोनों के बीच जो समझौता हुआ, उस के अनुसार गीता के 2 बच्चों को भीम सिंह ने अपने पास रख लिया और एक बेटे सन्नी को उस ने गीता को सौंप दिया. सन्नी दयारानी की आंखों का तारा बन गया था. दयारानी के यहां आने के बाद गीता का किसी युवक से प्रेम हो गया था. गीता उस के साथ घर छोड़ कर चली गई थी, जिस से दयारानी बेहद खफा थीं. पुलिस को लगा कि कहीं दयारानी की हत्या प्रेमप्रसंग में बाधा बनने की वजह से तो नहीं हुई? अगर ऐसा हुआ तो गीता भी षडयंत्र में शामिल हो सकती थी.

पुलिस ने शक के आधार पर गीता से गहराई से पूछताछ की. इस पूछताछ में उस ने प्रेमप्रसंग से ले कर उस युवक के साथ कोर्टमैरिज करने की बात तो बेहिचक स्वीकार कर ली, लेकिन हत्या में किसी तरह से हाथ होने से इनकार कर दिया. पुलिस ने दयारानी के साथसाथ गीता के मोबाइल नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. दयारानी के नंबर की काल डिटेल्स से तो कुछ खास हासिल नहीं हुआ, लेकिन गीता के नंबर की काल डिटेल्स से एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह घंटों बातें किया करती थी. घटना वाली रात 11 बजे तक उस नंबर पर उस की बातें हुई थीं. इस के बाद पुलिस ने गीता से उस नंबर के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह नंबर उस के प्रेमी वारिस का है.

इस बीच पुलिस को अपने मुखबिर से पता चल गया था कि घटना वाली रात उसी इलाके के रहने वाले नदीम को दयारानी के घर के आसपास 2 लड़कों के साथ घूमते देखा गया था. पुलिस ने सीसीटीवी में भी 3 युवकों को देखा था. पुलिस ने शक के आधार पर नदीम को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू की. नदीम कोई पेशेवर अपराधी तो था नहीं. वह पुलिस के सवालों में उलझ गया और दयारानी की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. नदीम के बताए अनुसार दयारानी की हत्या की पूरी योजना गीता के प्रेमी वारिस ने तैयार की थी. इस के बाद वारिस ने नदीम के अलावा दयारानी के पूर्व कार ड्राइवर समीर के साथ मिल कर हत्या की थी.

पुलिस ने तुरंत नया बसअड्डा से वारिस को भी गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन समीर पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो गया था. पुलिस ने दोनों से विस्तृत पूछताछ की तो दयारानी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह उन के प्रेम में बाधक बनने, गीता को हासिल करने का जुनून और करोड़ों की संपत्ति के लालच की कहानी थी. दयारानी किन्नर थीं. इसे वह कुदरत की मरजी समझती थीं. लेकिन उन का स्वभाव अच्छा था. यही वजह थी कि किन्नर समाज के लोग ही नहीं, स्थानीय लोग भी उन्हें पसंद करते थे. दयारानी की प्रबल इच्छा थी कि वह समाज के लिए कुछ करें. शायद इसीलिए सामाजिक कामों में हिस्सा लेने के साथसाथ वह राजनीति में भी आने की कोशिश कर रही थीं.

राजनीति में आ कर वह जनता की सेवा करना चाहती थीं. इसीलिए सन 2009 में उन्होंने बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने गाजियाबाद सीट से लोकसभा चुनाव निर्दलीय प्रत्याक्षी के रूप में भी लड़ा था. हालांकि वह चुनाव हार गई थीं. दयारानी के कुछ काम ऐसे थे, जो उन की अलग पहचान बनाए हुए थे. गरीबों की मदद के अलावा वह स्थानीय लोगों के बिजलीपानी जैसे मुद्दे भी उठाती रहती थीं. इन कामों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक सामाजिक संस्था भी बना रखी थी. उन्हें ले कर सन 2011 में 7 मिनट 27 सेकंड की एक ‘मैं हिजड़ा हूं’ नामक डाक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी थी. इस फिल्म में उन के अच्छे कामों को दिखाया गया था.

इस फिल्म को मीडिया फेस्ट मंथन में बेस्ट डाक्यूमेंट्री अवार्ड भी मिला था. दयारानी राजनीति के जरिए लोगों की सेवा करना चाहती थीं, इसलिए सन 2012 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ना चाहा था, लेकिन उन का नामांकन रद्द हो गया था. अब वह 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थीं. एक साल पहले गीता का अपने पति से विवाद हुआ तो वह रहने के लिए दयारानी के पास आ गई. दयारानी ने अपनी कार चलाने के लिए समीर को बतौर ड्राइवर नौकरी पर रखा हुआ था. समीर का एक दोस्त था वारिस. वह भी कैलाभट्टा इलाके में रहता था और कबाड़ी का काम करता था.

समीर की ही वजह से वारिस भी दयारानी के घर आने लगा था. इसी आनेजाने में उस की मुलाकात गीता से हुई तो दोनों एकदूसरे के दिल में उतर गए. इस के बाद गीता और वारिस की मोबाइल पर बातें होने लगीं. वारिस शातिर किस्म का युवक था. उस की नजर दयारानी की प्रौपर्टी पर थी. दयारानी गीता को अपने वारिस के तौर पर मानती थीं. यह बात वारिस को पता चल गई थी. वक्त के साथ गीता की मुलाकातों का दौर शुरू हो गया. समीर को गीता और वारिस के संबंधों का पता था, लेकिन दयारानी इस सब से अंजान थीं.

कुछ महीने बाद गीता का पहले पति से तलाक हो गया तो वारिस को खुशी हुई. उस ने गीता से वादा किया कि वह विवाह कर के उसे हमेशाहमेशा के लिए अपनी बना लेगा. गीता भी यही चाहती थी, लेकिन यह बात वह दयारानी से बताने से डर रही थी. आखिर एक दिन वह चुपचाप घर से निकल गई. यह 4 महीने पहले की बात है. गीता अपने साथ करीब 25 लाख रुपए के आभूषण ले गई थी. दयारानी को जब इस की जानकारी हुई तो उन्होंने वारिस के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. घर से भागने के बाद गीता ने वारिस से कोर्ट में विवाह कर लिया था. आखिर 2 महीने बाद दयारानी ने गीता को खोज निकाला.

दयारानी उस की इस हरकत से काफी नाराज थीं. उस के बेटे सन्नी को चूंकि वह काफी चाहती थीं, इसलिए उन्होंने गीता को माफ कर के अपने पास रख लिया था. गीता ने कोर्टमैरिज वाली बात दयारानी से छिपा ली थी. गीता को उन्होंने अपने पास इस हिदायत के साथ रखा था कि अब वह वारिस से बिलकुल नहीं मिलेगी और वह उन के घर भी नहीं आएगा. गीता के बाहर घूमनेफिरने पर भी दयारानी ने रोक लगा दी थी. दयारानी को जब पता चला कि उन के ड्राइवर समीर को गीता और वारिस के प्रेम संबंधों से ले कर भागने तक की जानकारी थी और वह कार से गीता और वारिस को घुमाने भी ले जाता था तो उन्होंने इस पर न सिर्फ उसे फटकार लगाई, बल्कि नौकरी से भी हटा दिया.

दूसरी ओर गीता पर बंदिशें लग जाने की वजह से वारिस उस से मिल नहीं पाता था, इस बात से वह दयारानी से काफी नाराज था. दोनों मिल भले नहीं पाते थे, लेकिन मोबाइल से उन की बातें होती रहती थीं. वारिस की समझ में आ गया था कि दयारानी के जीतेजी वह गीता के साथ नहीं रह सकेगा. उसे डर लग रहा था कि कहीं गीता दोबारा न अपने पति से संबंध जोड़ ले. उस की नजर गीता और दयारानी की दौलत पर थी. इस बात को ले कर वह अकसर परेशान रहता था. जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने मन ही मन दयारानी को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. उस ने इस के बाद समीर से कहा, ‘‘भाई समीर, मैं गीता को किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकता, क्योंकि मैं उस के बिना जिंदा नहीं रह सकता.’’

वारिस की बात सुन कर समीर अफसोस जाहिर करते हुए बोला, ‘‘दयारानी अब तुम्हें उस से बिलकुल नहीं मिलने देगी, इसलिए तुम उसे भूल जाओ.’’

‘‘ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता. मैं ने एक ऐसा रास्ता खोल निकाला है, जिस से मैं गीता को ही नहीं, दयारानी की सारी दौलत भी पा सकता हूं.’’

‘‘कौन सा रास्ता है, जरा मैं भी तो जानूं.’’ समीर ने उस की तरफ देख कर पूछा तो वारिस ने कहा, ‘‘मैं दयारानी को ही रास्ते से हटाने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘लेकिन ऐसा कर के तुम भी तो नहीं बचोगे.’’

‘‘मुझे तुम्हारा साथ चाहिए. हम अपना काम इतनी सफाई से करेंगे कि हमारा कोई कुछ नहीं कर पाएगा.’’

समीर कुछ पलों के लिए सोच में डूब गया. नौकरी से निकाले जाने के कारण वह भी दयारानी से मन ही मन खार खाए बैठा था. इसलिए वह वारिस का साथ देने को तैयार हो गया. उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘दयारानी के मरने के बाद उस की सारी दौलत गीता को मिलेगी. तुम उस के पति हो, इसलिए तुम ऐश करोगे. मुझे क्या मिलेगा? उस में मुझे भी हिस्सा चाहिए.’’

वारिस तो पहले से ही इस बारे में सोचे बैठा था. उस ने वादा कर लिया. रुपयों का लालच दे कर उन्होंने इस काम में अपने एक अन्य परिचित नदीम को भी शामिल कर लिया. नदीम राजनगर में मुर्गामीट की दुकान चलाता था और कैलाभट्टा में ही रहता था. बातचीत तय होने के बाद वारिस ने 315 बोर के एक तमंचे का इंतजाम किया. उस की गीता से रोजाना बातें होती थीं, लेकिन उस ने अपने इस खतरनाक इरादे को कभी उस पर जाहिर नहीं होने दिया. 3 जुलाई की रात तकरीबन 10 बजे तीनों मोटरसाइकिल से दयारानी के घर के पास पहुंच गए.

समीर ने चूंकि दयारानी के यहां कई सालों तक नौकरी की थी, इसलिए उसे पता था कि वह जिस कमरे में सोती हैं, उस की एक खिड़की सड़क की ओर खुलती है. उन्होंने वहीं से उन्हें निशाना बनाने का फैसला किया. जब वे पहुंचे थे तो दयारानी के घर के पास की परचून की दुकान खुली थी. वे दुकान बंद होने का इंतजार करने लगे. उसी बीच वारिस ने गीता से मोबाइल पर रोज की तरह बात की. 11 बजे दुकान बंद होने के बाद सीसीटीवी कैमरे की जद से बचने के लिए दीवार के सहारे वे खिड़की तक पहुंचे. उन्होंने जाली से अंदर झांक कर देखा तो दयारानी सो रही थीं.

गोली की आवाज से आसपास के लोग इकट्ठा हो सकते थे. इसलिए वे ट्रेन के आने का इंतजार करने लगे. ट्रेन के हौर्न के शोर में गोली चलाने से किसी को कुछ पता नहीं चल सकता था. वारिस खिड़की पर तमंचा रख कर दयारानी के सिर को निशाना बना कर ट्रेन के आने का इंतजार करने लगा. जैसे ही ट्रेन का हौर्न बजा, उस ने गोली चला दी. गोली मार कर तीनों भाग खड़े हुए. अगले दिन हत्या का पता चलने पर समीर और वारिस पूरी तरह से अंजान बन कर अफसोस जाहिर करते रहे. पुलिस ने सबूत के तौर पर तीनों के मोबाइल की लोकेशन भी निकलवा ली है. वारिस के कब्जे से 315 बोर का वह तमंचा भी बरामद कर लिया है, जिस से हत्या की गई थी.

इस के अलावा उस के पास से एक चाकू भी बरामद किया गया है. इस के बाद पुलिस ने समीर को गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया. जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

Suspense Story: जहरीलों निगाहों का निशाना

Suspense Story: प्रगट मसीह ने सुमन से शादी सिर्फ इसलिए की थी, क्योंकि उस की मां के पास लाखों का मकान था. इस के बाद प्रगट ने उस मकान को हासिल करने के लिए ऐसा क्या किया कि उसे जेल जाना पड़ा?

‘‘सा हब, मेरे बेटे को ढूंढ दीजिए. मैं गरीब विधवा औरत हूं, मेरे बेटे के सिवाय मेरा कोई और सहारा नहीं है.’’ कृष्णा नामक एक विधवा औरत ने थाना सदर के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी मरांडो के प्रभारी बलबीर सिंह के पास जा कर गुहार लगाई. कृष्णा के साथ समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह भी थे, जो ग्राम प्रधान भी थे. चौकीप्रभारी ने पूरी बात विस्तार से बताने के लिए कहा तो कृष्णा ने बताया कि वह न्यू गुरु तेगबहादुर नगर के मकान नंबर 15 में रहती है. काफी समय पहले उस के पति मगट सिंह की मृत्यु हो चुकी है. उस की 2 संताने हैं, एक 32 वर्षीय बेटा वीर सिंह, दूसरी 28 वर्षीया बेटी सुमन. 7 साल पहले सुमन की शादी प्रगट मसीह के साथ हुई थी.

कृष्णा ने आगे बताया, ‘‘मेरे घर पर केवल मैं और मेरा बेटा वीर सिंह ही रहते थे. 27 जुलाई, 2014 को वीर सिंह कोल्डड्रिंक पीने के लिए गली के कोने तक गया. उस के बाद लौट कर नहीं आया. मैं ने उस की तलाश उन जगहों पर कर ली है, जहां उस के मिलने की संभावना थी. इसलिए साहब, आप से निवेदन है कि आप मेरे बेटे को ढूंढने में मेरी मदद करें.’’

यह 28 जुलाई, 2014 की बात है. चौकीप्रभारी बलबीर सिंह ने समाजसेवक सरदार प्रगट सिंह और कृष्णा देवी के बयान के आधार पर वीर सिंह की गुमशुदगी दर्ज कर के उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन वह किसी नतीजे पर पहुंच पाते इस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उन की जगह चौकी का प्रभार एएसआई निशान सिंह ने संभाला. निशान सिंह ने गुमशुदा वीर सिंह के फोटो की कौपी सभी थानों को भेज दी. लुधियाना व निकटवर्ती शहर के थानों को वीर सिंह का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज करवा दिए गए. इस के बावजूद वीर सिंह का कोई सुराग नहीं मिला.

निशान सिंह ने वीर सिंह के पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन के अनुसार वीर सिंह सीधासादा मंदबुद्घि इंसान था. अब तक की गई तफ्तीश से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि वीर सिंह का अपहरण नहीं हुआ था. ऐसे में एक संभावना यह बनती थी कि मंदबुद्धि होने की वजह से वह खुद ही कहीं चला गया हो. इस के अलावा एक संभावना यह भी थी कि कहीं किसी दुश्मनी की वजह से किसी ने उसे न उठा लिया हो. बहरहाल, निशान सिंह ने समाजसेवक प्रगट सिंह से इस बारे में बात की तो एक नई बात यह पता चली कि लापता होने वाले दिन वीर सिंह अपने बहनोई प्रगट मसीह के साथ बाइक पर बैठ कर कहीं जाते देखा गया था. मोहल्ले में की गईं पूछताछ के दौरान एक प्रौपर्टी डीलर ने यह भी बताया कि कृष्णा देवी अपना मकान बेचना चाहती थीं.

इस बारे में निशान सिंह ने जब कृष्णा से पूछा तो उस ने इस बात से इनकार करते हुए बताया कि उस ने अपना मकान बेचने की बात कभी नहीं की. हां, उस का दामाद प्रगट मसीह उस पर मकान बेचने के लिए दबाव जरूर डाल रहा था. यहां तक कि उस का बेटा वीर सिंह भी इस बात का विरोध कर रहा था. इन 2 लोगों के बयानों से इस केस की जांच को नई दिशा मिल गई. निशान सिंह का शक विश्वास मे बदलने लगा. उन्होंने प्रगट मसीह की तलाश काररवाईं तो वह घर से फरार मिला. इस के बाद पुलिस ने उस की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी. आखिर कई महीनों की मेहनत के बाद 25 मार्च, 2015 को प्रगट मसीह को मलेरकोटला रोड से गिरफ्तार कर लिया गया. उस से पूछताछ के बाद निशान सिंह ने उस की निशान देही पर गांव लोहारा में दबिश दे कर उस के साथी निर्मल सिंह उर्फ मिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद हुई पूछताछ के दौरान दोनों ने हर अपराधी की तरह अपने आप को निर्दोष बताया, लेकिन जब निशान सिंह ने थोड़ी सख्ती की तो दोनों की जुबान खुल गई. अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रगट मसीह ने जो कहानी बताई, वह प्रेम और विश्वास में धोखा देने वाले एक धूर्त इंसान की शर्मनाक कहानी थी. मगट सिंह व उन की पत्नी कृष्णा देवी निहायत ही शरीफ और सीधेसादे लोग थे. उन की 2 संतानें थीं, बेटा वीर सिंह और बेटी सुमन. वीर सिंह मंदबुद्धि था. उसे पागल कहना बेईमानी होगी, क्योंकि वह जो भी काम करता था, उसे भले ही धीरेधीरे करे, लेकिन काफी सोचविचार कर करता था. मगट सिंह ने दोनों बच्चों की पढ़ाई का पूरा खयाल रखा. उस वक्त वह पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में लिपिक थे. घरपरिवार अच्छे से चल रहा था.

सन 2001 में मगट सिंह अपनी नौकरी से रिटायर हो गए. रिटायरमेंट में उन्हें अच्छाखासा पैसा मिला. उन पैसों से उन्होंने गिल गांव की हरगोविंद कालोनी में 100 गज का प्लौट खरीद कर अपना मकान बना लिया. फिलहाल इस मकान की कीमत लाखों में है. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक एक सुबह सैर करते समय प्रगट सिंह फिसल कर गिर गए. उन की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई. वह बिस्तर पर पड़ गए. उन का चलनाफिरना बंद हो गया. वक्त का पहिया ऐसा उल्टा घूमा कि उन्होंने एक बार बिस्तर पकड़ा तो फिर वह उन की मौत के बाद ही छूट पाया. उन की मौत के बाद कृष्णा देवी ने अकेले ही अपने दम पर बच्चों की परवरिश की. मंदबुद्धि होने के कारण वीर सिंह ज्यादा नहीं पढ़ सका, इसलिए कृष्णा ने उसे मशीन का काम सीखने पर लगा दिया.

कृष्णा की बेटी सुमन जवान हो चुकी थी. उसी दौर में उस की मुलाकात प्रगट मसीह से हुई. दरअसल सुमन को पास वाले गांव में अपनी किसी सहेली के विवाह समारोह में जाना था. वह मेन रोड पर खड़ी हो कर आटो का इंतजार कर रही थी. सर्दियों के दिन थे, ऊपर से हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. काफी इंतजार के बाद भी उसे कोई साधन नहीं मिला. बारिश की वजह से सुमन के कपड़े भीगने लगे थे कि तभी सुमन के पास एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक प्रगट मसीह था. उस ने सुमन से बड़ी शालीनता से कहा, ‘‘आइए, मैं आप को छोड़ देता हूं.’’

संकोचवश सुमन ने एक बार तो मना कर दिया, पर मौसम का मिजाज और प्रगट मसीह की शालीनता देख कर उस ने बात मान ली. वह कार में बैठ गई. प्रगट मसीह ने उसे उस की सहेली के गांव पहुंचाया ही नहीं, बल्कि अगले दिन सहेली के घर से वापस भी ले आया. प्रगट मसीह के इस व्यवहार से सुमन काफी प्रभावित हुई. इस मुलाकात के बाद रास्ते में आतेजाते कहीं न कहीं प्रगट मसीह सुमन को दिखाई देने लगा. दोनों मिलते तो 2-4 बातें भी हो जातीं. सुमन भी धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होने लगी. फिर जल्दी ही वह दिन भी आ गया जब एक दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों की रोजाना कहीं न कहीं मुलाकातें होने लगीं. जल्दी ही दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. सुमन की मां कृष्णा इस के पक्ष में नहीं थी, वह उस की शादी अपनी बिरादरी में करना चाहती थी, किसी ईसाई के साथ नहीं. लेकिन सुमन हर हाल में प्रगट मसीह से ही शादी करना चाहती थी. अंतत: उस ने मां से विद्रोह कर के अप्रैल, 2007 में प्रगट मसीह के साथ कोर्टमैरिज कर ली. दरअसल, कहानी वह नहीं थी, जो प्रत्यक्ष में दिखाई दे रही थी. हकीकत में प्रगट मसीह लोहरा गांव निवासी पाल सिंह का बेटा था. वह बचपन से ही आवारा और आपराधिक प्रवृत्ति का था, वह बिना हाथपैर हिलाए खूब पैसा कमाना चाहता था. युवा होते ही उस ने आवारा दोस्तों की एक मंडली बना ली थी और उन के साथ शराबजुआ चोरीचकारी आदि करता रहता था.

सुमन से उस की मुलाकात इत्तफाक से नहीं, बल्कि सोचीसमझी योजना के तहत हुई थी. प्रगट ने कालोनी के बसस्टौप पर सुमन को खड़ी देखा था. उस ने अपने दोस्तों से जब उस के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘गुरु, यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि इस की मां विधवा है. भाई मंदबुद्धि और इन का मकान लाखों रुपए का है. अगर इस चिडि़या को जाल में फांस लो तो समझो लाखों रुपए का मकान तुम्हारा.’’

बस, उसी दिन से वह सुमन को अपने जाल में फांसने की योजना बनाने लगा. सुमन अपनी सहेली की शादी में पास के गांव जाएगी, यह बात प्रगट मसीह को पहले ही पता लग गई थी. इसीलिए वह सुमन को लिफ्ट देने और उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए अपने एक दोस्त की कार मांग लाया था. बहरहाल, सुमन से शादी होने के बाद प्रगट मसीह सुमन के घर पर ही रहने लगा. जबकि यह बात न सुमन को अच्छी लगती थी और न उस की मां को. इस बात को ले कर घर में क्लेश शुरू हो गया. धीरेधीरे झगड़ा इतना बढ़ा कि मजबूरन प्रगट मसीह को अपनी ससुराल छोड़ कर अपने घर लोहारा जाना पड़ा.

समय अपनी गति से चलता रहा. इसबीच एकएक कर सुमन 5 बच्चों की मां बन गई. प्रगट मसीह को जब भी मौका मिलता, वह अपनी सास कृष्णा देवी पर दबाव डालता कि वह यह मकान बेच कर चंडीगढ़ रोड पर मकान ले ले. पर कृष्णा उस की बातों में कभी नहीं आई. इस के बावजूद प्रगट ने इलाके के कई प्रौपर्टी डीलरों को मकान बेचने के लिए कह रखा था. प्रगट मसीह और सुमन की शादी को लगभग 7 साल हो चुके थे. मकान हथियाने के जिस मकसद से प्रगट सुमन से शादी की थी, वह अभी तक पूरा नहीं हुआ था. आखिर उस ने अपना मकसद पूरा करने के लिए एक योजना बनाई. अपनी योजना में उस ने अपने दोस्त निर्मल सिंह उर्फ मिठू को भी शामिल कर लिया था. निर्मल पेंटर का काम करता था. प्रगट ने योजना पूरी होने के बाद उसे एक लाख रूपए देने का वादा किया था.

अपनी योजना को अंजाम देने के लिए प्रगट ने 28 जुलाई, 2014 की तारीख तय की और निर्मल के साथ घात लगा कर अपनी ससुराल वाली गली के नुक्कड़ पर बैठ गया. उस समय शाम का वक्त था और वह जानता था कि उस का साला इस वक्त टहलने और कोल्डड्रिंक पीने गली से निकल कर रोड तक आता है. वीर सिंह जैसे ही दुकान पर कोल्डड्रिंक पी कर मुड़ा, प्रगट मसीह ने उसे आवाज दे कर रोक लिया और घुमाने के बहाने बाइक पर बैठा कर नहर की ओर चल दिया. बाइक प्रगट मसीह खुद चला रहा था. बीच में वीर सिंह और पीछे निर्मल सिंह बैठा था. रास्ते में बाइक रोक कर प्रगट मसीह ने शराब खरीद ली.

घवदी नहर पर आगे जा कर प्रगट मसीह ने बाइक रोक ली उस के बाद वहीं बैठ कर तीनों ने शराब पी. वीर सिंह को नशा हो गया तो निर्मल सिंह की मदद से उस ने अंगोछे से वीर सिंह का गला घोंट कर उस की हत्या कर दी. तत्पश्चात दोनों ने मिल कर उस की लाश नहर में फेंक दी और वापस लौट आए. किसी को उस पर शक न हो, इस के लिए वह अपनी सास व प्रधान के साथ मिल कर वीर सिंह की तलाश का नाटक करता रहा. एएसआई निशान सिंह ने प्रगट मसीह और निर्मल सिंह के बयान दर्ज कर के दोनों को 25 मार्च, 2015 को मैडम अमनदीप कौर की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान दोनों अभियुक्तों की निशानदेही पर मृतक वीर सिंह का पर्स, आधार कार्ड, अंगोछा और बाइक बरामद कर ली गई.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर 27 मार्च, 2015 को दोनों को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला भेज दिया गया. चूंकि अब वीर सिंह की हत्या हो चुकी थी, इसलिए अपहरण की धारा 365 के साथ हत्या की धारा 302, 201, 34 और जोड़ दी गईं. एएसआई निशान सिंह ने नहर में बड़ी दूर तक जाल डलवा कर वीर सिंह की लाश तलाशने का प्रयास किया, पर कथा लिखे जाने तक लाश बरामद नहीं हो सकी थी. शायद पानी के तेज बहाव के कारण लाश दूर तक चली गई थी. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Real : मोबाइल चार्जर बना हथियार, बेटे ने मां-बाप की ली जान

Crime Story Real : पहली पत्नी की मौत के बाद रवि ने सुमन से अंतरजातीय विवाह कर लिया था. रवि के मातापिता ने इस विवाह को स्वीकार नहीं किया. इतना ही नहीं उन्होंने अपनी संपत्ति रवि के बजाय छोटे बेटे के बच्चों को देने की जिद पकड़ ली. फिर संपत्ति पाने के लिए रवि ने ऐसी खूनी साजिश रची कि…

11 जून, 2021 की शाम करीब सवा 6 बजे गाजियाबाद के लोनी में बलराम नगर के डी- ब्लौक में रहने वाला रवि ढाका अपनी दुकान से घर लौटा. उस ने गली में मकान के आगे अपनी बाइक खड़ी की. उस ने बाइक की चाबी निकाली. और चाबी के छल्ले में अपने दाएं हाथ की तर्जनी उंगली डाल कर छल्ला घुमाते हुए अपने घर के मेन गेट से अंदर आगे बढा. उस ने महसूस किया कि घर एकदम शांत और सुनसान पड़ा था. वैसे अकसर जब वह इसी समय पर घर वापस आया करता था तो उस के पिता सुरेंद्र सिंह ढाका टीवी पर तेज आवाज में न्यूज देखते हुए मिला करते थे.

टीवी की आवाज मेन गेट तक सुनाई देती थी. लेकिन उस दिन न तो कोई टीवी की आवाज आ रही थी और न ही उस के मातापिता के बात करने की कोई गूंज सुनाई दे रही थी. इन सब चीजों के बारे में अपने मन में सवाल उठाते हुए, वह बेफिक्र अंदाज में ग्राउंड फ्लोर पर उस कमरे की ओर आगे बढ़ा, जहां उस के मातापिता रहते थे. कमरे में घुसने से पहले ही उसे टीवी का रिमोट दरवाजे के बाहर नीचे जमीन पर टूटा पड़ा मिला. जिस की बैटरियां वहीं पड़ी थीं. यह देख कर रवि ने सोचा कि शायद मम्मी पापा के बीच कुछ नोकझोंक हुई है. तभी तो इतना सन्नाटा पसरा हुआ है.

उस ने वह रिमोट और बैटरियां उठाईं और उस रिमोट में बैटरियां सेट करते हुए कमरे की दहलीज पर ही पहुंचा था कि तभी उस की नजर कमरे में पहुंची. और उस कमरे का दृश्य देख कर वह सन्न रह गया. कमरे का सारा सामान अस्तव्यस्त था. कमरे की अलमारी खुली हुई थी और उस के पिता सुरेंद्र सिंह ढाका पलंग और जमीन के सहारे पड़े थे. ‘बाबा’ कहते हुए उस की चीख निकली. अपने पिता को इस हालत में देख कर रवि इतनी जोर से चिल्लाया कि गली के अन्य लोगों तक उस की आवाज पहुंच गई. जिस से कुछ ही देर में उस के घर के बाहर कई लोग पहुंच गए.

रवि को मां दिखाई नहीं दे रही थीं, इसलिए वह बिना देरी के ग्राउंड फ्लोर से निकल कर कमरे से सटी सीढि़यों से भागता हुआ पहली मंजिल पर मौजूद कमरे में पहुंचा. वहां उस की मां संतोष देवी की लाश बिस्तर पर पड़ी मिली. उन के गले में फोन चार्जर का तार लपेटा हुआ था. मां की लाश देख रवि एकदम से हैरान रह गया. उस की आंखों से आंसुओं की धार बहनी शुरू हो गई. रोतेबिलखते हुए उस ने मां के गले में लिपटे हुए चार्जर के तार को निकाला. इस के बाद वह रोता हुआ सीढि़यां उतर कर घर के बाहर निकल गया. घर के मेन गेट पर लोगों की भीड़ रवि की चीख सुन कर पहले से ही जमा थी. रवि को इस हाल में देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘रवि क्या हुआ जो तुम रो रहे हो?’’

रवि के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. मोहल्ले के लोगों के सवालों का जवाब देते हुए वह रोते हुए बोला, ‘‘मेरे मांबाबा को किसी ने मार दिया. घर का सामान सारा बिखरा पड़ा है. ये कैसे हो गया.’’

यह सुनते ही कुछ लोग रवि के घर में उत्सुकतावश घुसे कि आखिर यह कैसे हो गया. घर में उन्होंने भी जब सुरेंद्र सिंह और उन की पत्नी को मृत अवस्था में देखा तो वह भी आश्चर्यचकित रह गए. फिर उन्हीं में से एक व्यक्ति ने इस की सूचना लोनी बौर्डर थाने में फोन कर के दे दी. सूचना पा कर थोड़ी देर में थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. मौकाएवारदात को पुलिस ने बारीकी से परखा. ग्राउंड फ्लोर पर रवि ढाका के पिता सुरेंद्र सिंह ढाका की लाश थी और पहली मंजिल पर उस की मां संतोष देवी की लाश पड़ी थी. दोनों ही कमरों में घर का सामान बिखरा हुआ था. दोनों ही कमरों की अलमारियों के दरवाजे खुले थे. देख कर लग रहा था कि हत्याएं लूट के मकसद से की गई हैं.

थानाप्रभारी ने इस बारे में रवि व अन्य लोगों से पूछताछ की. इस के बाद लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस दोहरे हत्याकांड की जांच की शुरुआत थानाप्रभारी ने रवि को थाने बुला कर की. उन्होंने उस से घर में चोरी हुए सामान के बारे में पूछा. लेकिन रवि बता नहीं सका कि घर में क्याक्या सामान चोरी हुआ है. इस के बाद उन्होंने उस से उस की दिनचर्या के बारे में पूछा. तब रवि ने बताया, ‘‘सर, मैं एक कंपनी के लिए कलेक्शन एजेंट का काम करता हूं और साथ में हमारी परचून की दुकान भी है. मैं रोजाना सुबह 6 बजे से 9 बजे तक पहले अपनी दुकान खोलता हूं. उस के बाद वहीं से औफिस के लिए निकल जाता हूं.

‘‘दोपहर को एकदो घंटों के लिए मैं घर आता हूं. फिर शाम को कुछ देर दुकान खोले रखने के बाद रात को वापस घर आ जाता हूं.’’

कुछ देर बाद वह फिर बोला, ‘‘सर, मैं आज दोपहर को घर वापस नहीं आया था बल्कि औफिस से अपनी दुकान चला गया था. कुछ देर दुकान में बैठने के बाद मैं अपनी दुकान के ऊपर बने कमरे में चला गया, जहां मैं ने अपने दोस्तों के साथ ताश खेला और जब शाम को 6 बज गए तो मैं वहां से घर के लिए निकल गया.’’

थानाप्रभारी मदनपाल सिंह ने इस केस से जुड़े कुछ और सवाल रवि से पूछे फिर उसे थाने से घर भेज दिया. एक तरफ पुलिस की एक टीम रवि से पूछताछ कर रही थी तो वहीं दूसरी टीम रवि के घर के आसपास के लोगों से इस मामले में पता कर रही थी. पुलिस की तीसरी टीम रवि की दुकान के आसपास के लोगों से तहकीकात कर रही थी. इसी तरह से पुलिस की कई टीमें एक ही समय पर इस मामले को सुलझाने में लगी थीं. रवि ने अपने बयान में यह कहा था कि वह दोपहर को औफिस से दुकान आ गया था, जब पुलिस ने दुकान के आसपास रहने वाले लोगों से इस बात की पुष्टि की तो उन्होंने दोपहर को दुकान के खुले होने से साफ इनकार कर दिया.

वहीं रवि के घर के आसपास के लोगों ने पुलिस को बताया कि रवि का अकसर अपने मातापिता के साथ झगड़ा होता रहता था, ये झगड़ा या तो पैसों को ले कर होता था या संपत्ति को ले कर या फिर रवि की पत्नी सुमन को ले कर होता था. इस के अलावा पड़ोसियों से यह भी पता चला कि रवि अकसर शराब पी कर घर आता था, जो उस के माता पिता को बिलकुल भी पसंद नहीं था. एएसपी इरज राजा ने सुरेंद्र सिंह ढाका और संतोष देवी के शव गौर से देखे तो उन्होंने पाया कि दोनों शव अकड़े हुए थे, जोकि सामान्य रूप से मृत्यु के 8 से 10 घंटों बाद ही होता है. उन्होंने फोरैंसिक टीम की सहायता से यह पता लगा लिया कि इस हत्या को सुबह 10 बजे के आस पास ही अंजाम दिया गया था.

उधर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी हत्या का समय अनुमान किए गए समय के आसपास ही बताया गया था. यह सभी जानकारी पुलिस के लिए बहुत जरूरी साबित हुई और पुलिस के शक के रडार पर अब रवि आ गया था. अगले दिन मृतकों के दाह संस्कार के बाद जब रवि अपने घर वापस पहुंचा ही था की उसे पुलिस ने फोन कर फिर से थाने आने के लिए कहा. वह जल्दी से नहाया और फटाफट कपड़े पहन कर अपने घर पर सभी कमरों में ताला लगा कर थाने जाने के लिए निकल गया. थाने पहुंचने के बाद पुलिस ने उस के वारदात वाले दिन दुकान न खोलने, उस के घर पर उस के मातापिता के साथ झगड़ा होने, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतकों की हत्या का समय सुबह के समय होने इत्यादि चीजों को ले कर उस से सवाल किए.

इन सवालों को सुन कर रवि बुरी तरह से हकला गया. वह डरते हुए और हकलाते हुए पुलिस के इन सवालों के जवाब देने लगा. उस की आंखों से आंसू टपकने लगे. जब थानाप्रभारी द्वारा उस पर दबाव बनाया गया तो रवि ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. हत्या का जुर्म स्वीकार करने के बाद पुलिस ने तसल्ली से उसे एक शांत कमरे में बैठाया और उस से हत्या करने की वजह और उस ने किस तरह से इस घटना को अंजाम दिया, उस के बारे में पूछताछ की. इस के बाद उस ने अपने मातापिता की हत्या करने की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

70 वर्षीय सुरेंद्र सिंह ढाका गाजियाबाद के लोनी में एक पौश इलाके बलराम नगर में रहते थे. मूलरूप से बागपत उत्तर प्रदेश के रहने वाले सुरेंद्र ढाका कई साल पहले ही गाजियाबाद में रहने लगे थे. उन के साथ इस घर में उन की पत्नी संतोष देवी और 2 बेटों का परिवार रहता था. सुरेंद्र सिंह ढाका का परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था. सुरेंद्र सिंह की इलाके में परचून की दुकान थी और वह लोगों को ब्याज पर पैसा देने का काम किया करते थे. उन की पत्नी संतोष देवी स्वास्थ्य विभाग में एएनएम के पद से रिटायर थीं. बड़े बेटे रवि ढाका उर्फ नीलू की शादी साल 2009 में हो गई थी. लेकिन शादी के साल भर बाद ही रवि के साथ उस की पत्नी का अकसर झगड़ा होना शुरू हो गया था. कभी पैसों को ले कर तो कभी रिश्तों को ले कर.

रवि और उस की पत्नी के बीच झगड़े बढ़ने लगे. वे दोनों एकदूसरे के साथ किसी तरह से एडजस्ट कर के रह रहे थे. अंत में साल 2014 में रवि और उस की पहली पत्नी के बीच तलाक हो गया. तलाक के बाद रवि की मुसीबतें बढ़ने लगीं. उस को अपनी जिंदगी बड़ी मुश्किल लगने लगी. और इसी बीच उस की मुलाकात सुमन देवी से हुई. सुमन रवि के गांव बागपत की ही रहने वाली थी. कुछ समय में एक दूसरे को जानने के बाद उन दोनों के बीच प्यार हो गया और रवि ने बिना अपने मातापिता को बताए सुमन से साल 2016 में शादी कर ली. इस बात से रवि के मातापिता सुरेंद्र और संतोष देवी बड़े खफा हुए. उन की नाराजगी इस बात से ज्यादा थी कि रवि की दूसरी पत्नी सुमन देवी उन की बिरादरी की नहीं थी.

उसी दिन से रवि के मातापिता उस से खीझने लगे थे. वे उसे बातबात पर टोकते थे, छोटी से छोटी बात पर रवि और उस की पत्नी सुमन से झगड़े किया करते थे, वे उन्हें बातबात पर ताने दिया करते थे.  इस तरह से कुछ समय गुजरने के बाद साल 2019 में सुरेंद्र सिंह के छोटे बेटे गौरव ढाका की एक सड़क हादसे में मौत हो गई. गौरव ढाका की शादी हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे भी थे. इस मौत का भार ढाका परिवार के लिए सहन कर पाना बेहद मुश्किल था क्योंकि गौरव के दोनों बच्चे बेहद छोटे थे. ऐसी स्थिति को देखते हुए रवि के माता पिता का झुकाव गौरव की पत्नी और उस के बच्चों के प्रति ज्यादा हो गया था, जिस का होना स्वाभाविक भी था. गौरव की पत्नी और बच्चों की देखभाल का जिम्मा उन्होंने उठा लिया था.

सुरेंद्र और संतोष देवी गौरव की पत्नी और बच्चों के लिए हमेशा तैयार रहते थे. लेकिन वहीं दूसरी ओर रवि, उस की पत्नी और उस के बच्चे को वे दरकिनार किया करते थे. ऐसे ही एक दिन जब रवि की बरदाश्त करने की क्षमता पार हो गई तो उस दिन उस का उस के पिता के साथ झगड़ा हो गया. उसी दौरान उस के पिता ने सभी घर वालों की मौजूदगी में ये ऐलान कर दिया कि उन की संपत्ति का पूरा हिस्सा वह गौरव की पत्नी और उस के बच्चों के नाम कर देंगे. यह सुन कर रवि ने भी गुस्से और आवेश में अपने पिता से कह दिया कि यदि वह ऐसा करेंगे तो वह ऐसा हरगिज होने नहीं देगा.

उस दिन से ही रवि ने हर छोटी बात पर अपने मांबाप से झगड़ना शुरू कर दिया. घर में झगड़े इतने आम होने लगे की गलीमोहल्ले में ढाका परिवार के बारे में बच्चेबच्चे को मालूम हो गया कि यहां हर दिन झगड़ा होता है. रवि पहले भी शराब पी कर घर आता था लेकिन अब वह हर दिन नशे में धुत हो कर अपने मातापिता से झगड़ा करता. कभी परचून की दुकान में पैसों के हिसाब को ले कर, कभी संपत्ति को ले कर, कभी अपनी पत्नी से की शादी को ले कर. घर में फैली अशांति को देखते हुए रवि की मां संतोष का रुख उस के प्रति नरम होना भी शुरू हो गया था. लेकिन उस के पिता सुरेंद्र उस से हमेशा नाराज ही रहते थे.

जब कभी उस के पिता की रवि से बहस होती तो वह बातबात में संपत्ति गौरव के बच्चों के नाम कर देने की धमकी दिया करते थे. ऐसे ही एक दिन कोरोना की दूसरी लहर के बाद प्रदेश में लौकडाउन हटाया गया तो रवि ने अपनी पत्नी सुमन को उस के मायके भेज दिया. घर में सिर्फ रवि, उस के पिता सुरेंद्र और उस की मां संतोष ही रह गए थे. हत्या के ठीक एक दिन पहले रवि का फिर से अपने मांबाप के साथ झगड़ा हो गया. झगड़े के बाद रात को सोते समय रवि ने अंत में अपने मांबाप को जान से मार देने की प्लानिंग कर डाली.  हर दिन की तरह वह 11 जून की सुबह 6 बजे दुकान पर गया और 9 बजे घर वापस आया. उस की मां ने उस के लिए खाना परोसा और वह पहली मंजिल पर नहाने चली गईं. उस के पिता ग्राउंड फ्लोर पर सोफे पर बैठ कर टीवी देख रहे थे.

रवि ने खाना खाया और अपने प्लान के अनुसार उस ने बिस्तर पर पड़ा गमछा अपना हाथमुंह पोछने के लिए उठाया. गमछा ले कर कमरे में टहलते हुए वह सोफे के पास उस जगह पर जा कर खड़ा हो गया, जहां उस के पिता अपनी आंखें टीवी पर गड़ाए बैठे थे. देखते ही देखते रवि ने एक पल में गमछे को अपने पिता के गले में पीछे से डाला और अपनी पूरी ताकत के साथ गमछा को ऐंठ कर कस कर खींच दिया. ऐसे में वह चिल्ला भी नहीं पाए और खुद को बचाने के के लिए वह सोफे से उठ कर बिस्तर की ओर जा कर गिर गए. लेकिन रवि ने अपने पिता का गला नहीं छोड़ा, रवि के दिमाग में बस एक ही चीज घूम रही थी, वह थी उस के पिता की संपत्ति.

कुछ देर बाद बिस्तर पर जब सुरेंद्र सिंह ढाका सांस लेने में असमर्थ हो गए और उन्होंने हलचल करनी छोड़ दी तब आहिस्ता से रवि ने गमछे को ढीला छोड़ा. जब वह अपने पिता की हलचल बंद होते देखा तो गले से गमछा निकाल कर पिता के शव के पास ही रख दिया. उस ने अपने कान पिता की नाक के पास ले जा कर क्रौस चेक किया कि कहीं अभी भी जान तो नहीं बची. जब उसे पूरा यकीन हो गया तो वह पसीने में लथपथ हो कर ऊपर पहली मंजिल पर अपनी मां संतोष देवी की हत्या करने के लिए आगे बढ़ा और सीढि़यां चढ़ते हुए कमरे में दाखिल हुआ. संतोष देवी ने नहाने के बाद बिस्तर पर लेटे हुए अपनी आंखें बंद कर के, एक तरफ से अपने बाल लटका रखे थे ताकि उन के बाल जल्दी से सूख जाएं.

रवि के कदमों की आहट इतनी हलकी थी की उस की मां के कानों तक कोई आवाज ही नहीं पहुंची. रवि कमरे में दाखिल हुआ और दरवाजे से सटे सौकेट में लगे फोन के चार्जर को उस से बाहर निकाला. फोन चार्जर की तार को उस ने डबल कर के एक फंदा बनाया और बिस्तर पर लेटी अपनी मां के गले में उसे डाल कर ठीक वही किया, जो उस ने कुछ देर पहले अपने पिता के साथ किया था. कुछ देर में उस की मां की सांसों ने भी उन का साथ छोड़ दिया. उस ने चार्जर की तार को वहीं अपनी मां के गले में ही रहने दिया. उस ने अपनी मां के गले और कानों में पहने सोने के आभूषण निकाल लिए.

मांबाप की इस तरह से निर्मम हत्या करने के बाद रवि ढाका फिर से नीचे अपने पिता के कमरे में आया और अपने प्लान के अनुसार उस ने एकएक कर घर का सामान इधरउधर बिखेर दिया. टीवी का रिमोट भी फेंका, जिस से उस की बैटरियां बाहर निकल गईं. उस ने अलमारी का ताला खोला जिस में उसे 15 हजार रूपए नकद मिले और करीब 5 लाख की एक एफडी मिली. उस ने तुरंत उन्हें निकाला और घटनास्थल को अस्तव्यस्त कर अपने घर से चुपचाप काम के लिए निकल गया. उस के घटनास्थल को अस्तव्यस्त करने के पीछे एक ही कारण था कि कोई भी उस पर शक न करे और हत्या को लूटपाट और चोरी की लगे.

वह अपने औफिस से काम निपटा कर दोपहर को घर नहीं लौटा. उस ने सोचा कि इस बीच कोई दूसरा व्यक्ति उस के घर जाएगा और इस हत्या की खबर उसे सुनाएगा, जिस से उस पर किसी तरह का कोई शक नहीं होगा. इसलिए वह जब दोपहर को अपने औफिस से लौटा तो दुकान खोलने के बजाय दुकान के ऊपर बने कमरे में शाम के 6 बजे तक अपने दोस्तों के साथ ताश खेलता रहा. अंत में जब उस ने देखा कि उसे घर पर आने के लिए किसी का फोन नहीं आया तो वह हार मान कर अपने घर खुद निकल गया. जहां पर पहुंचने के बाद उस ने वो सारा ड्रामा किया, जो उस ने सोचा हुआ था.

यह सब कुछ कुबूल करने के बाद संपत्ति के लालच में अपने मातापिता की हत्या करने वाला रवि ढाका पुलिस हिरासत में हैं. पुलिस की टीम ने घटना के महज 24 घंटे के अंदर ही अभियुक्त को धर दबोचा.  पुलिस ने रवि ढाका से पूछताछ करने के बाद उसे कोर्ट में पेश किया जहां से उसे जेल भेज दिया. Crime Story Real

Suspense Story in Hindi : संपत्ति के लालच में दामाद ने ससुर की सुपारी देकर कराई हत्या

Suspense Story in Hindi : शैलेंद्र कुमार सिन्हा एसबीआई में मैनेजर थे. वह अपने दामाद पवन को बेटे की तरह ही मानते थे. लेकिन पवन ने अपनी सलहज यानी सिन्हा दंपति की बड़ी बहू निभा को फांस कर उस से कोर्टमैरिज कर ली. इस के बाद इन दोनों ने सासससुर की संपत्ति पाने के लिए रिश्ते का ऐसा कत्ल किया कि…

एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवक तेजी से सरपट दौड़ रही सफेद रंग की स्कौर्पियो कार का दूर से पीछा कर रहे थे. ओवरटेक कर के बाइक जैसे ही स्कौर्पियो के समानांतर आई, बाइक के पीछे बैठे नकाबपोश ने स्कौर्पियो को लक्ष्य बना कर उस के दाएं हाथ पर गोली मार दी. गोली लगते ही स्कौर्पियो के ड्राइवर के हाथ से स्टीयरिंग छूट गया और कार लहराते हुए डिवाइडर से जा टकराई. तभी घायल ड्राइवर ने कार का दरवाजा खोला. वह कार से निकल कर भागने ही वाला था कि तभी वह बाइक सवार बदमाश उस के करीब जा पहुंचे और उस से पूछा, ‘‘कार में पीछे बैठा बैंक मैनेजर शैलेंद्र ही है न?’’

दर्द से कराह रहे ड्राइवर ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. तभी हथियारबंद नकाबपोेश बदमाश ने कार में पिछली सीट पर बैठे बैंक मैनेजर शैलेंद्र के पास पहुंच कर सिर में एक और सीने में 2 गोलियां उतार दी. इस के बाद वह हवा में असलहा लहराते हुए आराम से निकल गए. जिस समय यह घटना घटी थी, उस समय सुबह के 8 बजे थे. राष्ट्रीय राजमार्ग होने के बावजूद सड़क पर सन्नाटा पसरा था. सड़क पर खून से लथपथ युवक को दर्द से कराहता देख कर कुछ बाइक वाले वहां रुके तो ड्राइवर ने उन से मदद मांगी और 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना पुलिस को देने का अनुरोध किया.

ड्राइवर ने अपना नाम अनिल बताया और कहा कि बदमाशों ने कार में बैठे उस के मालिक को भी गोली मारी है. यह घटना बिहार के नालंदा जिले की फतुहा थाना क्षेत्र के भिखुआचक राष्ट्रीय राजमार्ग पर 5 जून, 2021 को सुबह 8 बजे के करीब घटी थी. इस के बाद भीड़ में से एक व्यक्ति ने 100 नंबर पर फोन कर घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. सूचना मिलते ही फतुहा थाने के थानाप्रभारी मनोज कुमार सिंह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. कार चालक अनिल डिवाइडर के किनारे बैठा दर्द से कराह रहा था. उस के दाएं हाथ से खून लगातार बह रहा था. कार में पिछली सीट पर खून से लथपथ रिटायर्ड बैंक मैनेजर शैलेंद्र कुमार सिन्हा की लाश पड़ी हुई थी.

क्राइम सीन देख कर ऐसा लग रहा था कि बदमाश ने शैलेंद्र को करीब से गोली मारी थी. छानबीन में पुलिस को मौके से 7.65 एमएम का एक खोखा कार में से बरामद हुआ था. साक्ष्य के तौर पर पुलिस ने खोखे को अपने कब्जे में ले लिया. इस बीच थानाप्रभारी मनोज कुमार ने एसपी (ग्रामीण) कांतेश कुमार मिश्र और एसएसपी उपेंद्र कुमार शर्मा को इस घटना की जानकारी दे दी थी. घटना की जानकारी मिलते ही दोनों  पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए. एक बात पुलिस अधिकारियों को खटक रही थी कि बदमाशों ने चालक को क्यों छोड़ दिया? उस की हत्या क्यों नहीं की? कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं है?

गोली लगने से चालक अनिल की हालत बिगड़ती जा रही थी. इसलिए पुलिस ने उसे जल्द से जल्द जिला हौस्पिटल भेज दिया ताकि उस के जरिए बदमाशों तक आसानी से पहुंचा जा सके. शैलेंद्र कुमार की हत्या का वही एक चश्मदीद गवाह था. ड्राइवर से हुई पूछताछ बेहतर इलाज के बाद चालक अनिल के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हुआ तो उसी शाम 3 बजे के करीब थानाप्रभारी मनोज कुमार सिंह बयान लेने जिला अस्पताल पहुंचे, जहां वह भरती था.

‘‘कैसे हो अनिल? अब कैसा फील कर रहे हो?’’ थानाप्रभारी मनोज कुमार ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘सर, पहले से बेहतर हूं और अच्छा महसूस कर रहा हूं.’’ अनिल ने बताया.

‘‘अच्छा बताओ कि यह कैसे और क्या हुआ था?’’

‘‘साहब, मैं कार चला रहा था कि तभी साइड से अचानक एक गोली आ कर मेरे हाथ में लगी. गोली लगते ही कार की स्टीयरिंग मेरे हाथ से छूट गई और कार डिवाइडर से जा टकराई. फिर बाइक पर पीछे बैठे नकाबपोश बदमाश ने मुझ से पूछा कि कार में बैठा क्या शैलेंद्र यही है. मैं ने हां कह दिया. मेरे हां कहते ही उस बदमाश ने साहब को गोलियों से भून डाला और फरार हो गए.’’ अनिल बोला.

‘‘ओह! बाइक पर कितने बदमाश थे.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, 2.’’ उस ने बताया.

‘‘दोनों बदमाशों में से किसी का चेहरा याद है तुम्हें?’’ उन्होंने अगला सवाल किया.

‘‘नहीं, साहब. कैसे चेहरा देखता, जब दोनों के चेहरे नकाब से ढके थे.’’ अनिल बोला.

‘‘ओह!’’ थानेदार मनोज कुमार ने एक लंबी सांस छोड़ी, ‘‘अच्छा, यह बताओ तुम आ कहां से रहे थे?’’

‘‘नालंदा के गड़पर स्थित प्रोफेसर कालोनी से आ रहे थे. साहब के छोटे बेटे मनीष गुवाहाटी से पटना आ रहे थे. उन्हें ही रिसीव करने साहब को ले कर पटना जा रहा था कि…’’ कह कर अनिल रोने लगा.

‘‘तुम्हारे साहब के घर में कौनकौन रहता है और तुम्हारे यहां आने की जानकारी किस किस को थी?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब के साथ मेमसाहब और उन का बड़ा बेटा पीयूष रहते हैं. पीयूष दिव्यांग हैं. मेम साहब और पीयूष बाबा के अलावा किसी को भी इस की जानकारी नहीं थी.’’ उस ने बताया.

‘‘ठीक है. अभी तो मैं चलता हूं बाद में आ कर फिर तुम से मिलूंगा.’’

थानेदार मनोज कुमार सिंह ड्राइवर अनिल उर्फ धर्मेंद्र से पूछताछ कर वहां से थाने लौट आए थे. इधर शैलेंद्र कुमार की हत्या की जानकारी मिलते ही उन के घर में कोहराम छा गया था. मृतक शैलेंद्र कुमार की पत्नी सरिता देवी का रोरो कर बुरा हाल था. ससुर की हत्या की जानकारी जैसे ही दामाद पवन कुमार को हुई, वह भागाभागा मोर्चरी पहुंचा, जहां पोस्टमार्टम के बाद लाश मोर्चरी में रखी हुई थी. गुवाहाटी से पटना आ रहे बेटे मनीष को रास्ते में ही फोन से पिता की हत्या की जानकारी दे दी गई थी, इसलिए वह भी सीधा मोर्चरी पहुंच गया था. इस बीच में पुलिस ने मनीष की तरफ से 2 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

बेटा, दामाद और रिश्तेदारों ने मिल कर शैलेंद्र कुमार का गंगा के किनारे श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया और अपनेअपने घरों को लौट आए. फिर मनीष जीजा पवन के साथ गड़पर प्रोफेसर कालोनी देर रात घर पहुंचा. बेटे को देख कर मां की आंखें फफक पड़ीं तो मनीष भी खुद को रोक नहीं पाया. मां को रोता देख उस की आंखें बरस पड़ीं. रोतेरोते दोनों एकदूसरे को हिम्मत दे रहे थे. पलभर के लिए वहां का माहौल एकदम से गमगीन हो गया था. दामाद पवन कुमार कुछ देर वहां रुका. उस ने सास और साले को समझाया और फिर रामकृष्णनगर, पटना अपने किराए के कमरे पर वापस लौट गया.

किसी अपने के शामिल होने का शक अगले दिन थानाप्रभारी मनोज कुमार सिंह हत्या की गुत्थी सुलझाने और जानकारी लेने के लिए गड़पर प्रोफेसर कालोनी में स्थित मृतक शैलेंद्र कुमार के आवास पहुंचे. घर में वैसे ही मातम छाया हुआ था. घर का गमगीन माहौल देख कर थानाप्रभारी का मन द्रवित हो गया. वह यह समझ नहीं पा रहे थे कि बैंक मैनेजर की पत्नी से कैसे पूछताछ करें, लेकिन ड्यूटी तो ड्यूटी होती है. उसे पूरा तो करना ही था. उन्होंने मृतका की पत्नी सरिता देवी से हत्या के संबंध में कुछ जरूरी सवाल पूछे. सरिता देवी के जवाब से इंसपेक्टर मनोज कुमार सिंह को ऐसा कहीं नहीं लगा कि उन की किसी से कोई दुश्मनी थी.

उन के जवाब से एक बात साफ हो गई थी कि पूर्व बैंक मैनेजर शैलेंद्र कुमार की हत्या सुनियोजित तरीके से की गई थी. निश्चित ही उन का कोई ऐसा अपना था, जिसे उन की गतिविधियों के बारे में पलपल की जानकारी थी. उसी अपने ने बदमाशों के साथ मुखबिरी का खेल खेला और उन की जान ले ली. सरिता देवी से पूछताछ करने के बाद विवेचनाधिकारी मनोज सिंह थाने वापस लौट आए थे. रास्ते भर में वे यही सोच रहे थे कि आखिर वह कौन हो सकता है, जिस ने मुखबिर की भूमिका निभाई होगी और उन की हत्या से किस का क्या लाभ हुआ होगा? हत्या की गुत्थी एकदम से उलझती चली जा रही थी. इस के सुलझाने का एक आखिरी रास्ता काल डिटेल्स ही बचा था.

7 जून को पुलिस को मृतक शैलेंद्र की काल डिटेल्स मिल गई थी. विवेचनाधिकारी सिंह ने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो उस में एक नंबर ऐसा भी मिला, जिस से काफी बातचीत हुई थी. पुलिस ने मृतक की पत्नी से उस नंबर के बारे में जानकारी मांगी तो वह नंबर मृतक के दामाद पवन कुमार का निकला. विवेचनाधिकारी सिंह की नजरों में पता नहीं क्यों पवन संदिग्ध रूप में चढ़ गया था. फिर उन्होंने पवन के बारे में सरिता देवी से जानकारी ली. सास सरिता देवी ने उन्हें दामाद पवन के बारे में जो जानकारी दी, सुन कर वह चौंक गए थे. पता चला कि पवन ने अपनी पत्नी सृष्टि के होते हुए अपने बड़े साले पीयूष की पत्नी निभा से प्रेम विवाह कर लिया था. यही नहीं, एक मोटी रकम को ले कर ससुर शैलेंद्र और दामाद पवन के बीच कई महीनों से रस्साकशी चल रही थी.

दरअसल, बिहारशरीफ रेलवे स्टेशन के पास एक 5 कट्ठे की जमीन थी. वह जमीन शैलेंद्र कुमार को पसंद आ गई थी. दामाद पवन ने उन्हें वह जमीन दिलवाने की हामी भी भर दी थी. दामाद के जरिए वह 60 लाख में जमीन का सौदा भी पक्का हो गया था. जमीन मालिक को कुछ पैसे एडवांस दिए जा चुके थे और 17 जून को जमीन का बैनामा छोटे बेटे मनीष के नाम होना तय हो गया था. इसी दौरान शैलेंद्र की हत्या हो गई. काल डिटेल्स से मिला सुराग खैर, पुलिस ने पवन के मोबाइल नंबर को सर्विलांस में डाल दिया और मुखबिरों को भी उस के पीछे लगा दिया ताकि उस की गतिविधियों के बारे में सहीसही पता लग सके.

अंतत: पवन वह गलती कर ही बैठा, जिस की संभावना पुलिस को बनी हुई थी. उस गलती के बिना पर पुलिस ने पवन को उस के रामकृष्णनगर स्थित घर से धर दबोचा और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस ने पवन से कड़ाई से पूछताछ करनी शुरू की तो पवन एकदम से टूट गया और ससुर की हत्या का जुर्म कुबूल करते हुए कहा, ‘‘हां सर, मैं ने ही सुपारी दे कर ससुर की हत्या कराई है. मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं पैसों के लालच में आ कर अंधा हो गया था. मुझे माफ कर दीजिए.’’ कह कर वह रोने लगा था.

‘‘तुम्हारे इस काम में और कौनकौन थे या फिर तुम ने यह सब अकेले ही किया?’’ विवेचनाधिकारी मनोज कुमार ने सवाल किया.

‘‘साहब, मेरे इस गुनाह में मेरी दूसरी पत्नी निभा, छोटा भाई टिंकू और शूटर अमर शामिल थे.’’ उस ने बताया.

‘‘ठीक है तो ले चलो सभी गुनहगारों के पास.’’

इस के बाद पुलिस पवन को कस्टडी में ले कर रामकृष्णनगर पहुंची और उस की पत्नी निभा तथा छोटे भाई टिंकू को गिरफ्तार कर लिया. उसी दिन कंकड़बाग के अशोकनगर कालोनी से शूटर अमर को भी गिरफ्तार कर लिया गया. तीनों आरोपियों ने भी अपने जुर्म कुबूल कर लिए. उस के बाद इस हत्या की जो कहानी सामने आई, बेहद चौंकाने वाली थी, जहां पैसों के लालच में अंधे हुए दामाद ने कई रिश्तों का कत्ल कर दिया था. पढ़ते हैं इस कहानी को, जो ऐसे सामने आई है—

60 वर्षीय शैलेंद्र कुमार सिन्हा मूलत: बिहार के नालंदा जिले के गड़पर प्रोफेसर कालोनी के रहने वाले थे. उन के परिवार में कुल 5 सदस्य थे. पत्नी सरिता देवी और 2 बेटे पीयूष व मनीष और एक बेटी सृष्टि. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. भौतिक सुखसुविधाओं का ऐसी कोई चीज नहीं थी जो उन के घर में मौजूद न हो. उस पर से वह खुद भारतीय स्टेट बैंक के मैनेजर थे. मैनेजर के पोस्ट की अच्छीभली तनख्वाह थी उन की. जिंदगी बड़े मजे से कट रही थी. शैलेंद्र का बड़ा बेटा पीयूष दिव्यांग था. वह पूरी तरह से चलफिर नहीं सकता था. बेटे की हालत देख कर उन के कलेजे में टीस उठती थी.

छोटा बेटा मनीष हृष्टपुष्ट और तंदुरुस्त था, शरीर से भी और दिमाग से भी. पढ़ने में वह अव्वल था. अपनी योग्यता और काबिलियत की बदौलत मनीष की बैंक में नौकरी लग गई थी और वह असम के गुवाहाटी में तैनात था. शैलेंद्र ने समय रहते दोनों बेटों की शादी कर दी थी. जिम्मेदारी के तौर पर एक बेटी बची थी शादी करने के लिए, सो उस के लिए भी वह योग्य वर की तलाश कर रहे थे. के बीच में बात चला दी कि बेटी के योग्य कोई अच्छा वर मिले तो बताएं. रिश्तेदारों के बीच से पटना का रहने वाला पवन कुमार का रिश्ता आया. पवन राजधानी पटना की पौश कालोनी में कोचिंग सेंटर चलाता था. कोचिंग से उस की अच्छीखाई कमाई हो जाया करती थी.

बैंक मैनेजर शैलेंद्र को यह रिश्ता पसंद आ गया. उन्होंने बेटी सृष्टि की शादी पवन से कर के अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर दिया. पवन कुमार 2 भाई थे. दोनों भाइयों में पवन बड़ा था और टिंकू कुमार छोटा. दोनों में पवन सुंदर और बेहद समझदार था. अपनी मेहनत की बदौलत वह कोचिंग से इतना कमा लेता था कि अपना खर्च निकालने के बाद कुछ बैंक बैलेंस बना लिया था. खैर, शैलेंद्र को यह रिश्ता पसंद आ गया और उन्होंने बेटी सृष्टि की शादी पवन से कर दी. एक प्रकार से पवन के कंधों पर ससुराल की देखरेख की जिम्मेदारी भी आ गई थी. वह ऐसे कि बड़ा साला पीयूष दिव्यांग था. छोटा साला मनीष परिवार ले कर नौकरी पर गुवाहाटी में रहता था.

घर पर बचे सासससुर. उन की देखरेख के लिए एक व्यक्ति की जरूरत रहती थी, सो दामाद पवन सास और ससुर की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता था. दामाद के इस व्यवहार से सासससुर दोनों बहुत खुश रहते थे. वैसे भी बिहार की यह परंपरा है बेटी और दामाद घर के मालिक होते हैं. सास और ससुर बेटी और दामाद की सलाहमशविरा के बिना कोई काम नहीं करते थे. कोई भी काम होता तो वे दामाद से रायमशविरा लिए बिना नहीं करते थे. बारबार ससुराल आनेजाने से बड़े साले पीयुष की पत्नी निभा, जो रिश्ते में सलहज लगती थी, दोनों के बीच खूब हंसीठिठोली होती थी.

पवन ने सलहज से कर ली शादी हंसीठिठोली होती भी कैसे नहीं, उन का तो रिश्ता था ही मजाक का. मजाक का यह रिश्ता दोनों के बीच में कब प्रेम के रिश्ते में बदल गया, न तो पवन जान सका और न ही निभा. यह रिश्ता प्रेम तक ही कायम नहीं रहा, बल्कि यह जिस्मानी रिश्ते में बदल गया था और पहली पत्नी के रहते पवन ने सलहज निभा से कोर्टमैरिज कर ली और उसे ले कर पटना में रहने लगा था. दामाद की करतूतों की भनक जब सासससुर को लगी तो उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. दामाद पवन ने काम ही ऐसा किया था. जिस थाली में उस ने खाया था, उसी में छेद कर दिया था. और तो और सृष्टि का जीवन भी बरबाद कर दिया था. बेटी की जिंदगी को ले कर मांबाप चिंता के अथाह सागर में डूब गए थे.

शैलेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन का दामाद ऐसी करतूत करेगा कि उन का समाज में उठनाबैठना तक मुहाल हो जाएगा. इतना होने के बावजूद उन्होंने बेटी को यही सीख दी कि कुछ भी हो जाए, अपने हक के लिए लड़ना. वहां से कायरों की तरह भागना मत. बेचारी सीधीसादी सृष्टि करती भी क्या, किस्मत पर रोने के सिवाय. खैर, होनी को कौन टाल सकता है, जो होना है उसे हो कर रहना है. अपनी किस्मत की लकीर समझ कर सृष्टि ससुराल में जीवन काटने लगी थी. इधर पवन सलहज से पत्नी बनी निभा को साथ ले कर पटना में रहने लगा था. अब पवन और निभा की नजरें ससुराल की करोड़ों की संपत्ति पर जम गई थीं.

पवन और निभा दोनों को पता था कि इसी साल फरवरी में ससुर शैलेद्र कुमार सिन्हा नौकरी से रिटायर हो जाएंगे. रिटायरमेंट के दौरान उन्हें लाखों रुपए मिलने वाले हैं. ससुर के जीवन भर की कमाई पर दोनों की गिद्ध दृष्टि जम गई थी और उन रुपयों को हासिल करना उन का मकसद बन गया था. कैसे और क्या करना है, यह उन्होंने पहले से ही योजना बना ली थी. इस योजना में पवन ने अपने छोटे भाई टिंकू को भी शामिल कर लिया था. ससुर के हड़पे 60 लाख रुपए फरवरी, 2021 में बैंक मैनेजर शैलेंद्र कुमार सिन्हा नौकरी से रिटायर हुए. उन्हें जीपीएफ और ग्रैच्युटी आदि मिला कर 70-80 लाख रुपए मिले थे. उन रुपयों से वह छोटे बेटे के लिए किसी वीआईपी एरिया में जमीन खरीदना चाहते थे और जमीन की तलाश में वह जुट भी गए थे.

उसी दौरान कहीं से इस की जानकारी पवन को हो गई थी कि ससुरजी छोटे साले के लिए जमीन खरीदने की फिराक में हैं. पवन ससुर शैलेंद्र से मिला और उन्हें भरोसा दिलाया कि बिहारशरीफ रेलवे स्टेशन के पास एक अच्छी और कीमती जमीन है. वह कीमती जमीन उस के जानपहचान वाले की है. देखना चाहें तो उसे देख लें. जमीन पसंद आने पर बात आगे बढ़ाई जाएगी, नहीं तो कोई बात नहीं. दामाद की बात उन्हें पसंद आ गई. उन्होंने दामाद से जमीन दिखाने की बात कही तो उस ने वह जमीन दिखा दी. वह जमीन उन्हें पसंद आ गई.

बातचीत भी हो गई. 60 लाख रुपयों में वह फाइनल हो गया और शैलेंद्र ने एकमुश्त रकम दामाद को दे दी. 60 लाख की रकम देख कर पवन की नीयत बदल गई. शैलेंद्र ने पवन से कह दिया था कि जमीन की रजिस्ट्री छोटे बेटे मनीष के नाम होगी. ससुर को झांसे में रख पवन ने विश्वास दिया कि वह जैसा चाहते हैं वैसा ही होगा. लेकिन इधर उस के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. पवन जमीन मालिक को 60 लाख में से कुछ रुपए दे कर बाकी के रुपए डकार गया. शैलेंद्र रजिस्ट्री बेटे के नाम पर करने के लिए बारबार दामाद पर दबाव बना रहे थे जबकि वह ऐसा करने वाला नहीं था. वह तो रुपए डकार गया था.

ससुर शैलेंद्र के दबाव बनाने से पवन घबरा गया था. वह समझ गया था कि उसे छोड़ने वाले नहीं हैं अगर जमीन की रजिस्ट्री मनीष के नाम पर नहीं की तो. इस मुसीबत से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता बचा है ससुर को रास्ते से हटाने का. फिर क्या था उस के साथ दूसरी पत्नी निभा और उस का छोटा भाई टिंकू पहले से थे ही. सो उन्होंने इस खतरनाक योजना में साथ देने के लिए भी हामी भर दी. इस बीच लौकडाउन लग गया. लौकडाउन लगने की वजह से सभी काम बंद पड़े थे. मई के महीने में थोड़ी ढील मिली तो ससुर ने फिर दबाव बढ़ाया कि जमीन की रजिस्ट्री जल्द से जल्द करा दे. आखिरकार मामला 60 लाख रुपए का है. तो उस ने ससुर को बताया कि 17 जून को रजिस्ट्री होगी, समय से छोटे साले मनीष को बुला लीजिएगा.

इधर, पवन ने ससुर को रास्ते से हटाने के लिए अपने छोटे भाई टिंकू के जरिए कांट्रैक्ट किलर अमर को 1 लाख की सुपारी दे दी. जिस में पेशगी के तौर 40 हजार रुपए शूटर अमर को दे दिए और बाकी रकम काम पूरा होने के बाद देनी तय हुई. उस के बाद से टिंकू और अमर दोनों शैलेंद्र की रेकी करने लगे कि वह कब और कहां जाते हैं? किस से मिलते हैं? एक हफ्ते की रेकी में जारी जानकारी दोनों ने जमा कर ली. बस घटना को अंजाम देना शेष था. 5 जून, 2021 को छोटा बेटा मनीष गुवाहाटी से पटना आने वाला था. यह जानकारी पवन को हो गई थी. उस ने घटना को अंजाम देने के लिए इसी दिन को अच्छा समझा और इस की पूरी जानकारी शूटर अमर को दे दी.

5 जून, 2021 की सुबह करीब पौने 8 बजे शैलेंद्र बेटे को रिसीव करने गड़पर से कार से पटना के लिए निकले. कार में वह पीछे बैठे थे और ड्राइवर अनिल उर्फ धर्मेंद्र गाड़ी चला रहा था. कार जैसे ही फतुहा हाइवे पहुंची तो टिंकू शूटर अमर को अपनी बाइक पर पीछे बैठा कर कार का पीछा करने लगा और थोड़ी देर बाद उस ने कार को ओवरटेक कर के ड्राइवर अनिल की हाथ में गोली मार मार कर कार रोकवाई. ड्राइवर से शैलेंद्र के बारे में कन्फर्म होने के बाद शूटर अमर ने 3 गोलियां मार कर पूर्व बैंक मैनेजर शैलेंद्र कुमार की हत्या कर दी और मौके से दोनों फरार हो गए.

बहरहाल, पुलिस को शुरू से ही इस में करीबियों के शामिल होने का शक था और हुआ भी वही. पवन को हिरासत में ले कर जब पूछताछ हुई तो परदा उठ गया और चारों आरोपी पवन, निभा, टिंकू और अमर गिरफ्तार कर लिए गए. पुलिस ने शूटर अमर की निशानदेही पर उस के पास से एक अदद देशी पिस्टल, एक जिंदा कारतूस, एक बाइक और एक स्कूटी और 3 मोबाइल फोन और सिम बरामद किए. कथा लिखे जाने तक चारों आरोपी जेल में बंद थे. पुलिस उन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी में जुटी थी. जेल की सलाखों के पीछे पहुंचने के बाद पवन को अपने किए पर पश्चाताप हो रहा था. Suspense Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

ऐसी बेटी किसी की न हो

ऐसी बेटी किसी की न हो – भाग 3

प्रिंस और सोनिया की जुगलबंदी

दरअसल प्रिंस और सोनिया अब एकदूसरे को पसंद करने लगे थे लेकिन सोनिया समझ गई थी कि उसे इतनी कमाई नहीं होती कि वह उस के खर्चे लंबे समय तक उठा सके. लेकिन सोनिया के दिल्ली में मातापिता के पास रहने के दौरान भी प्रिंस अकसर सोनिया से मिलने के लिए दिल्ली आता जाता रहता था. सोनिया ने अपने मातापिता को बताया कि वे जल्द ही शादी करने वाले हैं.

कुछ समय बाद ही प्रिंस को उस के घर आतेजाते ये बात पता चल चुकी थी कि दोनों भाई परिवार से अलग हैं और छोटी बेटी हरजिंदर कौर के सोनिया के पति से संबंध हो जाने के बाद उस के मातापिता के पास केवल सोनिया ही थी, जो उस मकान की हकदार थी. उस 100 वर्गगज के मकान की कीमत लगभग 70-80 लाख रुपए थी. इसलिए प्रिंस ने सोनिया के दिमाग में यह बात डाल दी कि अगर वह अपने मातापिता से इस मकान को अपने नाम करा ले तो वे दोनों शादी कर के दिल्ली में इवेंट मैनेजमेंट कंपनी खोल कर आगे की जिंदगी चैन से बसर कर सकते हैं.

सोनिया को भी उस की बात पसंद आई. सोनिया ने अपने मातापिता से घर को उस के नाम पर करने के लिए कहा तो पिता बुरी तरह भड़क गए. कहने लगे क्या हुआ जो मेरे दूसरे बच्चे मेरे साथ नहीं रहते. अरे ये मेरी मेहनत की कमाई से बनाई गई प्रौपर्टी है, इस पर उन सब का भी बराबर का अधिकार है. जब तक मैं जिंदा हूं, इस पर किसी एक का अधिकार नहीं हो सकता.

कई बार बात करने के बाद भी गुरमीत सिंह और जागीर कौर मकान को सोनिया के नाम ट्रांसफर करने के लिए राजी नहीं हुए. अपने सपने में मातापिता को बाधक बनता देख कर सोनिया के दिमाग में उन के लिए खुराफाती खयाल आने लगे.

जब उस ने देख लिया कि पिता प्रौपर्टी उस के नाम नहीं करेंगे तो उस ने सब से पहले पिता के संदूक से उस प्रौपर्टी के पेपर चुरा लिए. बाद में उस ने प्रिंस की मदद से उन दस्तावेजों को जालसाजी कर के अपने नाम करवा लिया. फिर उन दोनों ने तिलकनगर के प्रौपर्टी डीलर बिट्टू से इस प्रौपर्टी को बिकवाने के लिए बात की तो उस ने जल्द ही एक तय रकम में इस प्रौपर्टी को बिकवाने का वादा किया.

इस दौरान प्रिंस के बहकावे में आ कर उस ने तय कर लिया कि अगर उन्हें मातापिता की संपत्ति हथियानी है तो उन की हत्या करनी पड़ेगी. बस यह खयाल आते ही उन्होंने इस की प्लानिंग शुरू कर दी. संयोग से मौका भी जल्द ही मिल गया. अपने पिता की मौत हो जाने के कारण 10 फरवरी, 2019 को जागीर कौर पंजाब के जालंधर स्थित अपने मायके चली गई थीं. पिता गुरमीत सिंह के घर में अकेले होते ही सोनिया ने प्रिंस से बात की और कहा कि पापा घर में अकेले हैं. मौका अच्छा है, तुम जल्दी दिल्ली आ जाओ.

प्रिंस समझ गया कि अकेले यह काम उस के वश का नहीं है. लिहाजा उस ने लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन में रहने वाले 2 परिचितों रिंकू और दिवाकर से बात की. दोनों लूट, चोरी व डकैती करते थे.  प्रिंस ने दोनों को 50 हजार रुपए दिए और साथ देने के लिए राजी कर लिया. जिस के बाद प्रिंस 21 फरवरी को रिंकू व दिवाकर के साथ दिल्ली में सोनिया के घर पहुंच गया.

पहले पिता को लगाया ठिकाने

उस के घर पहुंचने से पहले ही सोनिया ने रात को अपने पिता को दी गई चाय में नींद की गोलियां पिला कर बेसुध कर दिया. फिर प्रिंस ने उन दोनों के साथ मिल कर गुरमीत की गला घोंट कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद उस ने उन की लाश घर में रखे एक लाल रंग के सूटकेस में भरी और गुरमीत सिंह की मोटरसाइकिल पर प्रिंस व रिंकू सूटकेस रख कर सैयद नांगलोई नाले में फेंक आए.

सोनिया के लिए अच्छी बात यह थी कि पिता की खैरखबर लेने वाला कोई नहीं था. कई दिन ऐसे ही गुजर गए. इसी बीच जागीर कौर ने सोनिया को फोन कर के बताया कि वह 2 मार्च को दिल्ली लौटेगी.

यह सूचना सोनिया ने अपने प्रेमी प्रिंस को दे दी. जागीर कौर 2 मार्च की रात को दिल्ली लौट आईं. जागीर कौर ने घर आते ही सोनिया से अपने पति गुरमीत सिंह के बारे में पूछा, तो सोनिया ने जवाब दिया कि उन की तबीयत खराब है और वह अस्पताल में भरती हैं.

जागीर कौर ने पूछा कि ऐसा उन्हें क्या हुआ जो अस्पताल में भरती करना पड़ा.

‘‘मम्मी, अचानक उन्हें हार्ट अटैक हुआ था. मैं ने आप को फोन कर के इसलिए खबर नहीं दी कि आप और परेशान हो जाएंगी क्योंकि नानाजी की मौत पर आप पहले से दुखी थीं.’’ सोनिया ने बताया.

‘‘कल मैं अस्पताल चलूंगी.’’ जागीर कौर बोलीं.

‘‘ठीक है मम्मी, कल मैं आप को पापा के पास ले कर चलूंगी.’’ सोनिया ने मां से कहा. इस के बाद सोने से पहले सोनिया ने उन्हें पीने के लिए चाय दी और उस में उसी तरह नशे की गोलियां मिला दीं जैसे पिता को बेसुध करने के लिए चाय में मिलाई थीं.

चाय पीते ही जागीर कौर पर मूर्छा छा गई और वह गहरी नींद सो गईं. 2 मार्च को प्रिंस रिंकू के साथ लखनऊ से दिल्ली आ चुका था. सोनिया द्वारा फोन करने पर प्रिंस रिंकू को ले कर सोनिया के घर पहुंच गया. वहां पहुंच कर प्रिंस और रिंकू ने उसी तरह गला दबा कर जागीर कौर को भी मार दिया जैसे गुरमीत सिंह को मारा था. उन के शव को ये लोग उस दिन घर में ही रखे रहे.

अगले दिन शाम को प्रिंस व रिंकू नांगलोई के बाजार से एक रैक्सीन का बड़ा ब्रीफकेस खरीद लाए और शाम को जागीर कौर का शव उस में भर कर उसी बाइक पर रखा और सैयद नांगलोई नाले तक ले गए. उन्होंने उसी जगह पर जागीर कौर के शव से भरे सूटकेस को भी फेंक दिया, जहां गुरमीत सिंह के शव को फेंका था. बाद में उन्होंने गुरमीत सिंह की मोटरसाइकिल पश्चिम विहार के एक मौल की पार्किंग में खड़ी कर दी. प्रिंस दीक्षित अगली सुबह रिंकू के साथ लखनऊ चला गया.

4 मार्च, 2019 की सुबह गुरमीत की छोटी बेटी ने जब अपनी मां को फोन किया तो उन का फोन बंद मिला. क्योंकि उसे पता था कि मां 2 मार्च की रात को दिल्ली वापस लौटी होंगी, इसलिए वह उन की कुशलता का समाचार लेना चाहती थी.

जब मां का फोन बंद मिला तो हरजिंदर कौर ने सोनिया को फोन कर के मां से बात कराने को कहा. तब सोनिया ने बताया कि मां अभी दिल्ली नहीं पहुंची हैं. यह सुन कर हरजिंदर परेशान हो उठी.

कई दिनों से उस के पिता का फोन भी बंद आ रहा था. हरजिंदर को लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. लिहाजा उस से रुका नहीं गया और वह 4 मार्च की दोपहर को पिता के घर निलोठी एक्सटेंशन पहुंच गई. वहां मां और पिता दोनों ही नहीं थे. पूछने पर सोनिया भी कोई सही जवाब नहीं दे सकी कि वे कहां हैं.

जालंधर में ननिहाल फोन करने पर यह बात साफ हो चुकी थी कि मां तो 2 मार्च की सुबह ही वहां से दिल्ली के लिए चली गई थीं. हरजिंदर समझ गई कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. क्योंकि उसे यह भी पता था कि सोनिया मम्मीपापा पर पिछले कुछ महीनों से मकान को अपने नाम पर कराने का दबाव बना रही थी. लिहाजा उस ने 4 मार्च को ही निहाल विहार थाने में अपने मातापिता की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी.

हालांकि हरजिंदर कौर ने गुमशुदगी दर्ज कराते समय निहाल विहार थाने की पुलिस से साफ कहा था कि उस के मातापिता की गुम होने के पीछे उस की बहन सोनिया व उस के प्रेमी प्रिंस दीक्षित का हाथ हो सकता है. लेकिन पुलिस ने हरजिंदर की शिकायत पर गंभीरता से न तो जांच की और न ही कोई काररवाई की.

इस दौरान जब मातापिता दोनों की हत्या हो गई तो सोनिया व प्रिंस तिलक नगर के प्रौपर्टी डीलर बिटटू पर मकान को जल्द बिकवाने का दबाव बनाने लगे. वे दोनों हत्या के बाद प्रौपर्टी बेच कर कहीं दूर भागने की फिराक में थे.

जब पुलिस ने नांगलाई के नाले से पहले जागीर कौर फिर उन के पति गुरमीत सिंह  के शव बरामद कर जांचपड़ताल शुरू की और सोनिया व प्रिंस फरार मिले तो उन के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगाया गया.

पुलिस ने इसी आधार पर बिट्टू को थाने ला कर पूछताछ की और पता किया कि वे दोनों उस से किस लिए बातचीत कर रहे थे. तभी पता चला कि दोनों उस से पिता के मकान को बेचने के लिए लगातार बात कर रहे थे. उसी दौरान पुलिस ने सोनिया व प्रिंस को पकड़ने के लिए एक चाल चली.

उस ने सोनिया और प्रिंस को एक साथ एक ही जगह बुलवाने के लिए प्रौपर्टी डीलर बिट्टू से दोनों को फोन करवाया कि प्रौपर्टी को खरीदने का एक ग्राहक मिल गया है, जो उन से मिल कर एक साथ सारी रकम दे कर डील करने में रुचि रखता है.

बस इसी के बाद सोनिया व प्रिंस ने आपस में फोन पर बात की. प्रिंस उस वक्त लखनऊ में था और सोनिया दिल्ली में ही कहीं छिपी थी. दोनों ने बिट्टू को खरीदार के साथ नांगलोई के दिलेर मेहंदी फार्म के पास मिलने का वक्त दे दिया. लखनऊ से दिल्ली आ कर प्रिंस 10 मार्च की रात जैसे ही फार्महाउस के पास पहुंचा तो वहां प्रौपर्टी के खरीदार के रूप में पुलिस पहुंच गई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

सोनिया के हाथ में मातापिता की प्रौपर्टी तो नहीं आई, लेकिन वह जेल की सलाखों के पीछे जरूर पहुंच गई और उस ने अपना नाम एक ऐसी बेटी के रूप में दर्ज करवा लिया, जिस ने संपत्ति की खातिर अपने ही जन्मदाताओं को मौत के घाट उतार दिया.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों से हुई पूछताछ पर आधारित

ऐसी बेटी किसी की न हो – भाग 2

चूंकि मामला दोहरे हत्याकांड का था, लिहाजा जिले के डीसीपी सेजू पी. कुरुविला ने हत्यारों को पकड़ने के लिए एक बड़ी टीम का गठन कर दिया. इस टीम के सुपरविजन की जिम्मेदारी उन्होंने एडीशनल डीसीपी राजेंद्र सागर को सौंपी और औपरेशन की कमांड संभालने का जिम्मा एसीपी विनय माथुर को दिया.

विशेष टीम में पश्चिम विहार (वेस्ट) थाने के एसएचओ मुकेश कुमार, एडीशनल एसएसओ मनोज भाटिया, निहाल विहार थाने के एसएचओ धर्मपाल सिंह, एसआई रितुराज, एएसआई अनिल कुमार, महावीर, राजेंद्र सिंह, राजबीर, धनराज, हैडकांस्टेबल कृष्ण राठी, सुभाष, रजनीश, कांस्टेबल संदीप, अनिल, नवीन, नवीन यादव, वीरेंद्र, अमित, सुनील और महिला कांस्टेबल दिव्या को शामिल किया गया.

पुलिस की एक टीम सोनिया व उस के प्रेमी प्रिंस के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकाल कर उस के फोन के सर्विलांस के काम में जुटी तो दूसरी टीम को उस से मिली जानकारी के आधार पर आरोपियों की धरपकड़ का जिम्मा सौंपा गया.

संभावना बेटी के हत्यारी होने की

पुलिस टीम ने जब मृतका जागीर कौर व उन के पति गुरमीत सिंह के घर के आसपास लगे कुछ सीसीटीवी कैमरों की जांचपड़ताल करनी शुरू की तो कुछ सीसीटीवी कैमरों से ऐसी फुटेज भी मिल गई, जिस से साफ हो गया कि सोनिया और प्रिंस ही इस दोहरे हत्याकांड के जिम्मेदार हैं.

पुलिस टीम ने सर्विलांस की मदद से लखनऊ से ले कर दिल्ली तक अपना जाल बिछा दिया, क्योंकि प्रिंस लखनऊ का ही रहने वाला था. ताबड़तोड़ छापेमारी और पुलिस की घेराबंदी का नतीजा यह निकला कि 10 मार्च, 2019 की रात को पुलिस ने बाहरी दिल्ली इलाके में दिलेर मेहंदी फार्महाउस के पास से सोनिया और उस के प्रेमी प्रिंस को गिरफ्तार कर लिया.

दोनों को गिरफ्तार कर जब थाने लाया गया और पूछताछ की गई तो पता चला, इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए प्रिंस ने लखनऊ के भाड़े के 2 हत्यारों रिंकू और दिवाकर की भी मदद ली थी. पता चला कि दोनों हत्यारों को उस ने 50 हजार रुपए दिए थे.

दोनों सुपारी किलर रिंकू और दिवाकर लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन के रहने वाले थे. प्रिंस से पूछताछ के बाद पुलिस ने रिंकू और दिवाकर के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए और (वेस्ट) थाने के एएसआई राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में पुलिस की टीम को दोनों की गिरफ्तारी के लिए लखनऊ रवाना कर दिया.

इधर अगली सुबह यानी 31 मार्च को सोनिया और प्रिंस दीक्षित को अदालत में पेश कर मनोज भाटिया ने 10 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया. दूसरी तरफ एएसआई राजेंद्र सिंह की टीम ने 11 मार्च की रात को ही दोनों आरोपियों रिंकू और दिवाकर को लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन से गिरफ्तार कर लिया.

अगली सुबह तक राजेंद्र सिंह की टीम उन दोनों को ले कर दिल्ली आ गई. उन्हें भी अदालत में पेश कर 10 दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. चारों आरोपियों को आमनेसामने बैठा कर जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की तो पूरा सच सामने आ गया और पूरे हत्याकांड की सारी कडि़यां जुड़ती चली गईं, जिसे सुन कर हर आदमी यही कह सकता है कि ऐसी बेटी किसी की न हो.

मूलरूप से दिल्ली के रहने वाले गुरमीत सिंह की शादी जालंधर की रहने वाली जागीर कौर से हुई थी. जागीर कौर और गुरमीत सिंह के 4 बच्चे हैं. गुरमीत सिंह पेशे से लकड़ी के ठेकेदार थे. वह अपने परिवार के साथ दीपक विहार, निलोठी एक्सटेंशन स्थित अपने मकान में रहते थे.

उन के 4 बच्चों में 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. गुरमीत का बड़ा बेटा अमरजीत सिंह अपने परिवार के साथ दुबई में रहता है और वहीं सेटल है. जबकि छोटे बेटे ने दूसरे धर्म की लड़की से प्रेम विवाह कर लिया था, जिसे उन्होंने घर से निकाल दिया था, जिस के बाद उन के परिवार में बस 2 बेटियां ही रह गई थीं. बड़ी बेटी दविंदर कौर उर्फ सोनिया और छोटी हरजिंदर कौर.

सोनिया की शादी सन 2011 में फरीदाबाद में रहने वाले सुरेंद्र से हुई थी. लेकिन सुरेंद्र एक सीधासादा व्यापारी था, जबकि सोनिया पढ़ीलिखी और चंचल स्वभाव की महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. दोनों के विचार नहीं मिले तो उन के बीच अनबन रहने लगी. यही कारण रहा कि एक साल पूरा होतेहोते सोनिया का सुरेंद्र से आपसी सहमति से तलाक हो गया और वह अपने मातापिता के घर आ गई.

पहली शादी भले ही असफल हो गई थी लेकिन मातापिता को बेटी का घर में बैठना गवारा नहीं था. लिहाजा उन्होंने उसी साल निहाल विहार में रहने वाले करुण शर्मा से उस की दूसरी शादी कर दी.

दरअसल करुण शर्मा जो एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था, उस से सोनिया की जानपहचान खुद ही हुई थी. दोनों के बीच जल्द ही घनिष्ठता बढ़ गई और इसी के बाद सोनिया ने मातापिता को यह बात बताई. इस के बाद दोनों की शादी कर दी गई.

दूसरी शादी भी नहीं टिकी सोनिया की

शादी के 5 साल तक दोनों की गृहस्थी ठीकठाक चली. इस बीच सोनिया ने 2 बच्चों एक बेटी और एक बेटे को जन्म दिया. लेकिन 2 साल पहले यानी सन 2017 में उस ने अपने पति का घर छोड़ दिया. यहां तक कि वह दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ कर मायके में आ गई. इस का भी एक अहम कारण था.

दरअसल, जब सोनिया अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी तो उस दौरान उस की छोटी बहन हरजिंदर कौर उस की तीमारदारी करने के लिए उस के घर आई थी. हरजिंदर कौर सुंदर भी थी और जवान भी. लिहाजा पत्नी के बिस्तर पर होने के कारण पति करुण शर्मा का उस की तरफ झुकाव हो गया था.

2-3 महीने में हालात ऐसे हो गए कि हरजिंदर कौर तथा करुण शर्मा के बीच संबंध हो गए. जल्द ही यह राज सोनिया को पता चल गया. दूसरे बच्चे को जन्म देने के बाद जब सोनिया ने हरजिंदर को घर भेज दिया तो उस के बाद भी दोनों का मिलनाजुलना जारी रहा. कभी करुण उस से मिलने मातापिता के घर चला जाता तो कभी वह उसे बाहर बुला कर उस से मिलताजुलता.

अब करुण के लिए बीवी से ज्यादा साली प्यारी हो गई थी. एक साल होतेहोते दोनों के संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए कि सोनिया का आए दिन इस बात को ले कर अपने पति और बहन के साथ झगड़ा होने लगा. आखिर एक दिन तंग आ कर सोनिया दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ कर हमेशा के लिए घर छोड़ कर अपने मातापिता के घर आ गई.

सोनिया मातापिता के पास क्या आई कि हरजिंदर उस के बच्चों की देखभाल के नाम पर करुण शर्मा के घर में आ कर रहने लगी. कुछ समय बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. इस घटना के बाद से ही सोनिया का रिश्तेनातों से विश्वास उठने लगा. उस ने तय कर लिया कि अब वह जीवन में सिर्फ अपने लिए जिएगी.

मातापिता के घर आ कर सोनिया के सामने अपनी जिंदगी को पालने का संकट था. लिहाजा उस ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी. इस दौरान जौब पोर्टल से इवेंट मैनेजमेंट का काम करने वाले लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन निवासी प्रिंस दीक्षित का मोबाइल नंबर सोनिया को मिला. उस ने इवेंट मैनेजमेंट के लिए सोशल मीडिया पर महिला एग्जीक्यूटिव की जौब का विज्ञापन दिया हुआ था. उस नंबर पर बात कर के सोनिया प्रिंस से मिलने लखनऊ गई.

वहां प्रिंस को जब पता चला कि सोनिया पहले पति से तलाक के बाद दूसरे पति को बिना तलाक दिए छोड़ चुकी है तो उसे लगा कि खूबसूरत सोनिया को अगर वह अपने साथ रख ले तो उस का धंधा ही नहीं चलेगा, बल्कि औरत के बिना जिंदगी के अधूरेपन की कमी भी दूर हो जाएगी.

दरअसल प्रिंस ने भी अपनी पत्नी को छोड़ रखा था. लिहाजा प्रिंस ने उसे अपने यहां नौकरी ही नहीं दी बल्कि अपने घर में रहने के लिए एक कमरा भी दे दिया. दोनों ही अधूरेपन की जिंदगी जी रहे थे. फिर ऐसे हालात बने कि दोनों के बीच जल्द ही जिस्मानी संबंध भी बन गए. लेकिन कुछ समय बाद सोनिया दिल्ली आ गई क्योंकि उस ने कहा था कि वह दिल्ली में रह कर ही उस के इवेंट के लिए क्लाइंट देखा करेगी.

ऐसी बेटी किसी की न हो – भाग 1

8 मार्च, 2019 की रात के करीब साढ़े 8 बजे का वक्त था. बाहरी दिल्ली के निहाल विहार थाने के 2 सिपाही  मोटरसाइकिल पर गश्त करते हुए सैय्यद नांगलोई के पास बहने वाले नाले के किनारे बनी सड़क से गुजर रहे थे. तभी एक राहगीर दौड़ते हुए आ कर उन की बाइक के सामने खड़ा हो गया. मजबूरी में पुलिस वालों को मोटरसाइकिल रोकनी पड़ी.

बाइक पर पीछे बैठा सिपाही झुंझलाते हुए नीचे उतरा और उस राहगीर को झिड़कते हुए बोला,  ‘‘ओ भाई, क्या इरादा है मरना चाहता है क्या, जो इस तरह भाग कर बाइक के सामने आ गया.’’

‘‘नहीं सर, न तो मैं मरना चाहता हूं और न ही ऐसा कोई इरादा है. बस आप को एक सूचना देनी थी इसलिए आप लोगों को देख कर दौड़ता चला आया.’’ राहगीर ने अपनी उखड़ी सांस को नियंत्रित करते हुए सफाई दी.

राहगीर की बात सुन कर सिपाही का गुस्सा शांत हो गया. उस ने जिज्ञासा दिखाते हुए राहगीर से पूछा, ‘‘सूचना…कैसी सूचना… क्या हुआ?’’

‘‘सर, उस नाले में एक बड़ा सा सूटकेस पड़ा है. ऐसा लगता है कि उस में कोई संदिग्ध चीज है.’’ राहगीर ने कहा.

उस की बात सुन कर दोनों सिपाही बाइक को वहीं खड़ी कर के राहगीर के साथ उस जगह पहुंचे, जहां नाले में सूटकेस तैर रहा था.

दोनों सिपाहियों ने देखा, एक लाल रंग का सूटकेस नाले के दूसरे किनारे पर तैर रहा था. लेकिन वह इलाका उन के थाना क्षेत्र में नहीं आता था. वह थाना पश्चिम विहार (वेस्ट) के क्षेत्र में था, इसलिए कांस्टेबल ने उसी समय फोन कर के पश्चिम विहार (वेस्ट) थाने को सूचना दे दी.

सूचना चूंकि पुलिस की तरफ से मिली थी, इसलिए खबर मिलते ही एसएचओ मुकेश कुमार, इंसपेक्टर (एटीओ) मनोज भाटिया के साथ मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सूटकेस को नाले से बाहर निकाल कर खुलवाया तो उस में एक महिला का सड़ा गला शव मिला. उन्होंने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के अलावा अपने उच्चाधिकारियों को भी लाश मिलने की सूचना दे दी.

कुछ ही देर में क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम वहां पहुंच गई. टीम ने लाश को सूटकेस से बाहर निकलवा कर जांच शुरू कर दी. वह शव किसी अधेड़ उम्र की महिला का था, जिस का मुंह काफी सूजा हुआ था. ऐसा लग रहा था जैसे उस शव को वहां पड़े कई दिन गुजर चुके हों, क्योंकि शव पानी में पड़े रहने के कारण काफी सड़ चुका था.

महिला के शव पर औरेंज कलर का कुरता व ब्राउन रंग की सलवार थी. वह जुराब पहने हुए थी, मगर पांव में चप्पल नहीं थीं. उस की बाजू में हरे रंग के कपड़े में एक ताबीज बंधा था और गले में रुद्राक्ष की माला थी. उसी दौरान एडीशनल डीसीपी राजेंद्र सागर और एसीपी विनय माथुर भी वहां पहुंच गए. उन्होंने भी लाश का मुआयना किया.

जिस तरह से अधेड़ महिला का शव मिला था, उसे देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि महिला की हत्या कहीं और की गई होगी और बाद में उस के शव को यहां ला कर डाला गया होगा.

फिलहाल सब से बड़ी चुनौती यह थी कि महिला की पहचान कैसे हो. क्योंकि वहां ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से महिला की शिनाख्त हो सके. पश्चिम विहार (वेस्ट) थाने के अधिकारियों ने अपने स्टाफ को आसपास की कालोनियों में भेज कर वहां रहने वाले कुछ लोगों को बुलाया ताकि महिला के शव की पहचान हो सके. लेकिन इस पूरी कवायद में कोई सफलता नहीं मिली. लिहाजा पुलिस ने शव के फोटोग्राफ्स खिंचवा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिया.

पश्चिम विहार (वेस्ट) थाने लौट कर एसएचओ मुकेश कुमार ने अज्ञात के खिलाफ भादंसं की धारा 302 और 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच का जिम्मा इंसपेक्टर मनोज भाटिया को सौंप दिया.

मनोज भाटिया ने मुकदमे की जांच मिलने के बाद उसी रात सब से पहले यह पता लगाने का काम शुरू कर दिया कि आखिर मृतका है कौन. उन्हें शक था कि अगर उस महिला का शव यहां पड़ा है तो हो सकता है कि उस के परिवार वालों ने उस की गुमशुदगी दर्ज करवाई हो. लिहाजा उन्होंने अपने स्टाफ के साथ जिपनेट नेटवर्क को खंगालना शुरू कर दिया. दरअसल, इस नेटवर्क पर दिल्ली ही नहीं, दूसरे राज्यों में मिली लावारिस लाशों और गुमशुदा लोगों की जानकारी दर्ज रहती है.

करीब 3 घंटे की कवायद के बाद इंसपेक्टर मनोज भाटिया को गुमशुदगी के एक ऐसे मामले की रिपोर्ट मिल गई, जिस में दर्ज हुई महिला की तसवीर उस महिला की लाश से काफी हद तक मिलती थी. लापता महिला का नाम जागीर कौर (47) था. गुमशुदगी की ये सूचना निहाल विहार थाने में लिखी गई थी.

जागीर कौर निहाल विहार थाने के दीपक विहार, निलोठी एक्सटेंशन के मकान नंबर 22 में रहती थी. सूचना जागीर कौर की बेटी हरजिंदर कौर ने दर्ज कराई थी. इस रिपोर्ट से यह भी पता चला कि जागीर कौर के पति गुरमीत सिंह (52) भी लापता हैं.

रहस्य खुलने लगा

इंसपेक्टर मनोज भाटिया ने निहाल विहार थाने में फोन कर के जागीर कौर व गुरमीत सिंह की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराने वाली हरजिंदर कौर का फोन नंबर हासिल कर लिया. मनोज भाटिया ने रात में ही हरजिंदर कौर को फोन कर के सैय्यद नांगलोई के नाले से अधेड़ महिला की लाश बरामद करने की जानकारी दी. उन्होंने शव की पहचान करने के लिए हरजिंदर कौर से संजय गांधी अस्पताल पहुंचने को कहा.

अगले एक घंटे के भीतर हरजिंदर कौर संजय गांधी अस्पताल पहुंच गई. तब तक इंसपेक्टर मनोज भाटिया भी वहां पहुंच गए. उन्होंने जब हरजिंदर कौर को महिला का शव दिखाया तो उस ने देखते ही शव की पहचान अपनी मां जागीर कौर के रूप में कर दी.

शव की पहचान होते ही मनोज भाटिया ने राहत की सांस ली. अब उन्हें लगने लगा कि हत्या की गुत्थी जल्द ही सुलझ जाएगी. उसी वक्त हरजिंदर कौर ने कहा कि अगर उस की मां का शव नाले में मिला है तो उस के पिता का शव भी वहां आसपास ही मिलना चाहिए क्योंकि उसे पूरा शक है कि उन की भी हत्या हो चुकी होगी.

इस के बाद इंसपेक्टर मनोज भाटिया ने थाने की एक और टीम को तत्काल सैय्यद नांगलोई नाले की तरफ रवाना किया और खुद भी हरजिंदर कौर को ले कर उसी तरफ रवाना हो गए.

पुलिस टीम ने रात में ही नाले के उसी एरिया में सर्च औपरेशन शुरू किया, जिस का परिणाम ये निकला कि 2 घंटे बाद नाले में रैक्सीन का एक और काला सूटकेस बरामद हुआ. उस सूटकेस को खुलवाया तो उस में भी एक शव बरामद हुआ. ये शव एक सिख का था और बुरी तरह सड़ चुका था.

लेकिन उस के शरीर पर लिबास व पहनावे को देख कर हरजिंदर कौर ने पहचान लिया. यह शव उस के पिता गुरमीत सिंह का ही था. नाले से एक और शव की सूचना मिलने के बाद तमाम बड़े अधिकारी एक बार फिर घटनास्थल पर पहुंचे और फोरैंसिक, क्राइम टीम को फिर से मौके पर बुलाया गया.

शव की शिनाख्त, जांचपड़ताल के बाद गुरमीत सिंह के शव को भी पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल भेज दिया गया. तब तक 9 मार्च की सुबह के भोर का उजाला हो गया था. दूसरा शव मिलने के बाद पुलिस ने हत्या का एक और मुकदमा दर्ज कर लिया. इस की जांच का जिम्मा थाने की महिला इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन डोमिका पूर्ति को सौंपा गया.

हरजिंदर कौर ने इस शव की शिनाख्त अपने पिता गुरमीत सिंह के रूप में की, इसलिए जब इंसपेक्टर डोमिका पूर्ति ने हरजिंदर कौर से पूछताछ की तो उस ने साफ आरोप लगाया कि उस के मातापिता की हत्या उस की बड़ी बहन दविंदर कौर उर्फ सोनिया ने अपने प्रेमी राजकुमार दीक्षित उर्फ विक्रम उर्फ प्रिंस दीक्षित के साथ मिल कर की होगी. उस ने यह भी बताया कि उस की बहन सोनिया और प्रिंस के बीच पिछले एक साल से लिवइन रिलेशन चले आ रहे हैं.

पूछताछ में हरजिंदर कौर ने यह भी बताया कि सोनिया मातापिता के साथ ही रहती थी. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस की एक टीम तत्काल उस ठिकाने पर रवाना कर दी गई, जहां सोनिया रहती थी. मगर वहां ताला लटका मिला. साफ हो गया कि इस वारदात को सोनिया ने ही अंजाम दिया है, क्योंकि वह लापता थी.