Suicide Case: रेप व प्रताड़ना में कब तक पिसती डा. मानवी

Suicide Case: सरकारी डौक्टरों का काम केवल मरीजों का इलाज करना ही नहीं होता, बल्कि उन्हें पुलिस के लिए भी काम करना होता है. जैसे कि गिरफ्तार आरोपियों को फिटनैस सर्टिफिकेट देना, उन का मैडिकल करना आदि. सतारा की लेडी डौक्टर मानवी मुंडे ने पुलिस के अनुसार काम नहीं किया तो उन का जीना ऐसे मुश्किल हो गया कि…

सतारा की डौक्टर मानवी मुंडे अकसर रात को अस्पताल के अपने आवास की छत पर खड़ी हो कर आसमान में सितारों को ताकते हुए यह सोचती थी कि इन के पीछे कहीं उस की भी मंजिल होगी. उस के लिए डौक्टर बनना आसान नहीं था. महाराष्ट्र के बीड़ जिले के एक साधारण परिवार में पैदा हुई मानवी के फेमिली वालों को हमेशा से ही उस से बड़ी उम्मीद रही थी. पापा तो शुरू से कहते रहे थे कि उन की बेटी डौक्टर बनेगी और लोगों को नया जीवन देगी.

…और मानवी ने पापा का वह सपना पूरा भी किया. सरकारी मैडिकल कालेज में पढ़ाई पूरी करने के बाद ग्रामीण इलाके में सेवा देने के लिए संविदा पर उसे 2 साल के लिए महाराष्ट्र के सतारा जिले की फलटण तहसील के उपजिला अस्पताल में नौकरी मिली. विनम्र, गंभीर और हर वक्त मदद के लिए तैयार रहने वाली मानवी से मरीज खुश रहते थे.

सरकारी डौक्टरों का काम केवल मरीजों का इलाज करना ही नहीं होता, बल्कि उन्हें अकसर पुलिस मामलों में गिरफ्तार हुए आरोपियों के मैडिकल, फिटनैस सर्टिफिकेट और पोस्टमार्टम की ड्यूटी भी संभालनी पड़ती है. इस में एक ओर जहां उन्हें अपना डौक्टरी का फर्ज निभाना होता है यानी जांच के बाद फिट और अनफिट घोषित करना होता है, वहीं दूसरी ओर उन पर कुछ ताकतवर लोगों का उलटेसीधे यानी गलत रिपोर्ट देने का दबाव भी होता है.

ऐसे ही दबावों के बीच मानवी अपना फर्ज निभा रही थी. उसे क्या मालूम था कि जिसे उस ने जीवन की खुशी माना था, वही अस्पताल, वही जगह, वही दुनिया जो उसे जीवन देने का हौसला देती थी, एक दिन उस के जीवन पर विपरीत प्रभाव डालेगी. धीरेधीरे उस के आसपास ऐसा दायरा बनता गया, जिस में हर तरफ अविश्वास, डर और अपमान था. उस के साथ काम करने वाले कुछ लोग उस पर पैनी नजर रखते थे. शुरुआत में तो उस ने इस सब को नजरअंदाज किया, लेकिन धीरेधीरे उस पर उन ताकतवर लोगों का गलत काम के लिए दबाव बढ़ता गया.

उस ने कई बार अपने करीबी दोस्तों को बताया भी कि उसे लगता है कि कोई उस के पीछे पड़ा है. उस की तकलीफ देख कर उस पर हंसता है. उस के दोस्त उसे तसल्ली देते कि वह चिंता न करे, वह बहुत बहादुर है. एक दिन सब ठीक हो जाएगा. लेकिन किसी की बहादुरी भी कब तक उसे बचा सकती है? जब लोग उस के पीछे ही पड़ गए हों तो कैसे उस का सब कुछ ठीक होगा?

आरोपी सबइंसपेक्टर गोपाल बदने

धीरेधीरे एक आदमी उस की जिंदगी में जहर घोलता गया. वह था एक सबइंसपेक्टर, जिस का नाम था गोपाल बदाने. एक वरदीधारी, जिसे लोगों की रक्षा करनी चाहिए, आरोपों के अनुसार उस ने ही मानवी के भरोसे, उस के शरीर और उस की मानवीय गरिमा को भंग कर दिया. आरोप के अनुसार, उस ने लगातार उस का यौनशोषण किया, 4 बार उस के साथ दुष्कर्म किया.

बढ़ रहा था उत्पीडऩ पर उत्पीडऩ

डा. मानवी मुंडे ने कोशिश की थी कि वह इंसाफ तक पहुंचे. उस ने पुलिस अधिकारियों से लिखित शिकायतें कीं, लेकिन उन शिकायतों ने उसे राहत देने के बजाय उस की मुश्किलें बढ़ा दीं. जिस की शिकायत की जाती हो, अगर वही पुलिस में ताकत रखता हो तो सच अकसर फाइलों में दब कर रह जाता है. यही मानवी के साथ भी हुआ. उस की शिकायतें फाइलों में दब कर रह गईं. लोगों की मदद करने वाली मानवी को मदद मिलने के बजाय उस के खिलाफ झूठी कहानियां गढ़ी जाने लगीं कि जो कुछ भी हुआ, उस की इच्छा से हुआ, वही उस के पीछे पड़ी थी. उस ने शादी का प्रस्ताव रखा था. उस ने शादी से मना कर दिया तो उसी का बदला ले रही है.

डा. मानवी मुंडे के दिन तो अस्पताल में मरीजों से घिरे रहते थे, लेकिन रात होते ही वह अकेली पड़ जाती थी. उस के फोन पर धमकी भरे मैसेज आते थे. उस से कहा जाता था कि अगर उस ने किसी से कुछ कहा तो उस की नौकरी, उस की इज्जत और उस का पूरा जीवन बरबाद कर दिया जाएगा. उस ने कई बार रोते हुए सोचा कि जब पुलिस ही डराती है तो वह कहां और किस के पास जाए? दूसरा नाम जो मानवी की जिंदगी में एक और चोट बन कर आया था, उस का नाम था प्रशांत बनकर, जो मकान मालिक का बेटा था. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर था. उस पर मानवी ने मानसिक उत्पीडऩ, लगातार परेशान करने और ब्लैकमेल करने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे.

एक तरफ पुलिस वरदी का डर, दूसरी तरफ बदनाम किए जाने की धमकी. आदमी ऐसे ही टूटता है. मगर मानवी अभी भी पूरी तरह नहीं टूटी थी. वह जीना चाहती थी. पर लोग उस के पीछे पड़ गए थे. उसी बीच एक सांसद उस के पीछे पड़ गया. उस के अपने गलत काम थे, जिन्हें वह मानवी से करवाना चाहता था. जबकि मानवी करना नहीं चाहती थी. उस ने फोन पर तो धमकी दी ही, अपने 2 लोगों को अस्पताल भेज कर उसे बदनाम करने, नौकरी से निकलवाने की धमकी दिलवाई.

जब मानवी को कहीं से कोई राहत नहीं मिली तो उस ने अपनी परेशानी, अपने दर्द को स्याही से कागज पर उतारना शुरू किया. हर परेशान करने वाले शब्द, हर तकलीफदेह यादों को कागज पर उतारने लगी. लेकिन जैसा अकसर होता आया है, उस की वह दर्द भरी आवाज कहीं किसी को सुनाई नहीं दी. उस की चिट्ठियों, उस की शिकायतों और उस के दर्द को जांच में उपयुक्त नहीं माना गया.

उस के पिता को उस की इन बातों की भनक लग गई थी. उन के बारबार पूछने पर भी पिता परेशान होंगे, यह सोच कर उस ने कभी पूरी बात उन से नहीं बताई. पर एक बार उस ने कहा जरूर था कि ‘बाबा, मुझे बचा लो.’

यह सुन कर पिता अवाक रह गए थे कि कौन सी ऐसी मुसीबत है, जो उन की जैसी बहादुर डौक्टर बेटी को इतना डरा रही है? वह बेटी के लिए कुछ कर पाते, तब तक सब खत्म हो चुका था. मानवी का मनोबल धीरेधीरे खत्म हो रहा था. डौक्टर होते हुए भी वह समझ नहीं पा रही थी कि उस की अपनी मानसिक ताकत इतनी डगमगा क्यों रही है. रातों की नींद गायब, दिन का चैन गायब. अस्पताल में ड्यूटी से लौटते समय वह अकसर चौराहे पर रुक जाती, जहां से रास्ता या तो घर की तरफ जाता था या होटल की तरफ.

घर यानी परिवार, प्यार, सुरक्षा और होटल यानी अकेलापन और डर. फिर भी वह अकसर होटल की ओर चली जाती थी, क्योंकि उसे लगता था कि अगर वह घर गई तो उन लोगों का खतरा कहीं उस के घर वालों तक न पहुंच जाए. डर कभीकभी इंसान को गलत जगहों पर भी सुरक्षित महसूस कराता है. 23 अक्तूबर, 2025 की रात भी वह होटल चली गई थी. समय लगभग 9 बजे का था. उस ने रिसैप्शन के रजिस्टर में एंट्री की और कमरे की चाबी ली. कमरा नंबर, सब के लिए बस एक नंबर, लेकिन उस के लिए शायद उस नंबर का वह कमरा आखिरी ठिकाना था.

कमरे में घुसते ही उस ने दरवाजा बंद कर अंदर से लौक कर दिया. उस ने मोबाइल निकाला, कुछ मैसेज टाइप किए, पर भेजे नहीं. शायद उसे उम्मीद थी कि कोई तो समझ लेगा. शायद कोई आ जाए और उसे कोई रोक ले. पर फोन स्क्रीन फिर से ब्लैक हो गई, किसी का कोई मैसेज नहीं आया. कमरे की दीवार पर एक आईना लगा था. उस ने खुद को उस में निहारा. सफेद कोट भले न पहना हो, पर उसे लगा जैसे उस की पहचान अब भी उसी कोट में कैद है, दूसरों को बचाने वाली एक जिम्मेदार. पर वह खुद को क्यों नहीं बचा पा रही है?

हथेली पर लिखा सुसाइड नोट

उस ने मेज की दराज खोली. अंदर एक रजिस्टर रखा था. उस ने पेन उठाया और रजिस्टर के 4 पेजों पर अपनी प्रताडऩा की कहानी लिखी. इस के बाद वह अपने ही हाथ की हथेली पर लिखने लगी. वह एकएक अक्षर के साथ रोती रही, कांपती रही, लेकिन अपनी व्यथा और व्यथा देने वालों के बारे में लिखती रही. क्योंकि उसे पता था कि अब उस की आवाज को दबाया नहीं जा सकेगा. उस की हथेली उस की व्यथा का सबूत बनने जा रही थी. उस ने उसे प्रताडि़त करने वालों में एसआई गोपाल बदाने, मकान मालिक के बेटे प्रशांत बनकर और उस सांसद के बारे में भी लिख दिया था, जिस के 2 पीए अस्पताल आ कर उसे धमकी दे गए थे. हथेली पर ही नहीं, रजिस्टर के 4 पेजों पर अपना दर्द, अपने साथ हुए रेप, प्रताडऩा और डाले जाने वाले अनैतिक दबाव की पूरी कहानी आंसुओं के साथ उतार दी.

उस ने हथेली और रजिस्टर के उन 4 पेजों पर लिखा था कि उसे गलत मैडिकल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए मजबूर किया जा रहा था. बिना कोई मैडिकल जांच के ही मैडिकल फिटनैस सर्टिफिकेट बनाने के लिए सबइंसपेक्टर गोपाल बदने और कुछ राजनेता उस पर दबाव डाल रहे थे. ऐसे ही किसी मामले में डा. मानवी से किसी आरोपी का मैडिकल सर्टिफिकेट बनाने के लिए कहा जा रहा था. मानवी ने फरजी मैडिकल सर्टिफिकेट बनाने से मना कर दिया था. उस के बाद सांसद के 2 पीए उस के अस्पताल में घुस आए थे और उस से बदतमीजी से बात करने के साथ कहा था कि सांसद उस से बहुत नाराज हैं. सांसद से जबरदस्ती बात कराई. मानवी ने सांसद से भी फरजी मैडिकल सर्टिफिकेट बनाने से इनकार कर दिया तो उन्होंने देख लेने की धमकी दी.

मानवी ने आगे लिखा कि फिटनैस सर्टिफिकेट मैडिकल जांच के बाद ही जारी किया जाता है. आरोपी की हालत गंभीर थी. उस ने ड्यूटी के दौरान उसे दाखिल किया था. एक सबइंसपेक्टर ने जानबूझ कर उसे छुट्टी न देने का झूठा आरोप लगा कर अस्पताल के अंदर उस से बहस की, गालियां देते हुए उसे देख लेने की धमकी दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक में गड़बड़ी करने का उस पर दबाव डाला जाता था. एसआई गोपाल बदने, जिस पर डौक्टर के साथ दुष्कर्म करने का आरोप है, उस ने मकान मालिक के सौफ्टवेयर इंजीनियर बेटे प्रशांत बनकर के साथ मिल कर उसे मानसिक तौर पर प्रताडि़त कराया. प्रशांत की गोपाल और बाकी पुलिस वालों से नजदीकी थी. वह मानवी पर मकान खाली करने के लिए दबाव बना रहा था.

एकएक शब्द लिखते हुए मानवी शायद यह कह रही थी कि अगर उस की आवाज नहीं सुनी जा रही है तो उस की हथेली बोल देगी, जो सभी के कानों में काफी दिनों तक गूंजती रहेगी. समय अपनी गति से बीत रहा था. कमरा शांत था और शहर अपनी रफ्तार में भाग रहा था. लेकिन मानवी के भीतर जो युद्ध चल रहा था, वह आखिरी युद्ध था, जिस का निर्णय हो कर ही रहेगा. सुबह रिसैप्शन ने फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. सफाई वाले ने दरवाजा खटखटाया, फिर भी दरवाजा नहीं खुला. तब होटल स्टाफ ने दूसरी चाबी से दरवाजा खोला तो डौक्टर हमेशा के लिए शांत मिली. वह पंखे से लटकी थी.

पुलिस को सूचना दी गई. थाना पुलिस इस घटना की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को देने के साथ होटल पहुंच गई थी. थोड़ी ही देर में फोरैंसिक टीम के साथ सतारा के एसपी तुषार दोषी, डिप्टी एसपी भी पहुंच गए. मानवी की लाश उतरवाई गई. लाश उतारते समय ही पुलिस वालों की नजर मानवी की हथेली पर चली गई.

लाश उतारने के बाद हथेली में जो लिखा था, उसे पढ़ कर पुलिस चौंकी. वह एक तरह से सुसाइड नोट था. इस के बाद कमरे की तलाशी में 4 पेज का एक और सुसाइड नोट मिला. उसे पढ़ कर पुलिस ने एसआई गोपाल बदने के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और दुष्कर्म का मुकदमा तथा प्रशांत बनकर के खिलाफ मानसिक रूप से परेशान कर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. प्रशांत को तो उस के घर से 25 अक्तूबर को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि एसआई गोपाल बदने फरार हो गया था.

मानवी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इसी के साथ शुरू हुई पुलिसिया काररवाई. पुलिस की सूचना पर मानवी के फेमिली वाले सतारा पहुंच गए थे. पिता और चाचा का कहना था कि सिस्टम ने उन की बेटी को मौत के घाट उतार दिया. वह जीना चाहती थी, लेकिन स्वार्थी लोगों ने उसे जीने नहीं दिया.

क्यों नहीं मिला जीते जी न्याय

प्रशांत तो गिरफ्तार हो ही चुका था, पुलिस के बढ़ते दबाव के कारण 26 अक्तूबर, 2025 को एसआई गोपाल बदने ने भी फलटण ग्रामीण थाने में आत्मसमर्पण कर दिया था. कोल्हापुर संभाग की आईजी सुनील फुलारी ने गोपाल बदने को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया था. पुलिस ने उसे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय में पेश कर 30 अक्तूबर तक की पुलिस रिमांड पर लिया. फिर उस से इस केस के संबंध में विस्तार से पूछताछ की.

डा. मानवी मुंडे की आत्महत्या ने सतारा ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा किसी को छोड़ा नहीं जाएगा. न्याय होगा. पर न्याय हमेशा देर से ही क्यों होता है? अगर पहले न्याय हो गया होता तो मानवी को मौत को क्यों गले लगाना पड़ता? यह सब इतना दुखद था कि सुनने वाला हर आदमी यह सोचने पर मजबूर है कि जब एक डौक्टर को यह सब झेलना पड़ सकता है तो एक आदमी की क्या बिसात है?

डौक्टर के साथियों ने उस के कमरे में रखी चीजें समेटते समय उस के नोटबुक के बीच वह पेज भी पाया, जिस में उस ने कई महीने पहले लिखा था कि ‘अगर न्याय मांगना गलत है तो मैं गलत हूं. अगर आवाज उठाना गुनाह है तो मैं गुनहगार हूं.’

डौक्टरों ने बांह पर काला फीता बांध कर मानवी की मौत का विरोध करते हुए न्याय की मांग की है. मानवी के चचेरे भाई के अनुसार, मानवी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मदद मांगने की कोशिश की थी, लेकिन कोई मदद नहीं मिली. उस ने 2-3 बार शिकायत दर्ज कराई थी. एसपी और डीएसपी को लेटर लिखने के बावजूद कोई काररवाई नहीं हुई. उस ने लेटर में लिखा था कि अगर उसे कुछ हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा. उस ने अस्पताल में सुरक्षा की कमी की भी बात कही थी. उस ने डिप्टी एसपी को फोन भी किया था. उन्होंने कहा था कि वह उसे कौलबैक करेंगे, लेकिन फिर उधर से कोई कौल नहीं आई.

सतारा की एडिशनल एसपी वैशाली कडूसकर ने कहा कि अगर उस महिला डौक्टर की शिकायत पर समय रहते काररवाई की गई होती या उस ने खुद किसी को अपने साथ हो रहे अत्याचारों के बारे में बताया होता तो शायद आज उस की जान बच सकती थी. डा. मानवी की मौत के बाद सोशल मीडिया पर भी आवाजें उठने लगी हैं. लोग लिख रहे हैं कि जब इस तरह के लोग भी सुरक्षित नहीं हैं तो किस पर भरोसा किया जाए? सितारों को निहारने वाली मानवी का नाम अब मोमबत्तियों से लिखा जाने लगा था.

डा. मानवी मुंडे की मौत के बाद सरकार हरकत में आई, पुलिस पर दबाव बढ़ा तो सबइंसपेक्टर गोपाल बदने को भी गिरफ्तार किया गया और प्रशांत को भी. लेकिन अब यह सब उस के लिए क्या मायने रखता था? सब को बचातेबचाते मानवी खुद के लिए न्याय तक हासिल नहीं कर सकी. उस की मौत शायद उस आखिरी प्रयास का परिणाम थी, जब उस ने सोचा होगा कि अब कोई रास्ता नहीं बचा है. लेकिन क्या सच में रास्ता नहीं था या रास्ते बंद कर दिए गए थे. इंसान जब अकेला पड़ जाता है तो एक आवाज बहुत जरूरी होती है. वह होती है, ‘मैं हूं न.’

यही आवाज देने वाला डा. मानवी मुंडे को नहीं मिला. उस रात जब पुलिस ने जांच में उस के मोबाइल को देखा तो उस में कई अधूरे मैसेज मिले थे. एक मैसेज था कि ‘अगर मैं बच गई तो सब बताऊंगी मुझे मत छोडऩा.’ आत्महत्या अकसर एक पल का फैसला नहीं होती. यह कई दिनों, महीनों, सालों की चोटों का परिणाम होती है.

मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया है कि उस के साथ न्याय होगा. किसी को बख्शा नहीं जाएगा. यह कहने की बातें हैं. अगर उसे न्याय मिला होता तो वह मौत को गले क्यों लगाती? एसआई गोपाल बदने और प्रशांत बनकर को भले जेल हो जाए, पर डा. मानवी मुंडे अब जी तो नहीं सकती. Suicide Case

—डा. मानवी मुंडे बदला हुआ नाम है.

 

दरोगा की टेढ़ी सोच

प्रियंका को जल्दीजल्दी तैयार होता देख उस की मां चित्रा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आज कहीं जल्दी जाना है क्या, जो इतनी  जल्दी उठ कर तैयार हो गई?’’

‘‘हां मम्मी, परसों जो मैडम आई थीं, जिन्हें मैं ने अपने फोटो, आई कार्ड और सीवी दिया था, उन्होंने बुलाया है. कह रही थीं कि उन्होंने अपने अखबार में मेरी नौकरी की बात कर रखी है. इसलिए मुझे टाइम से पहुंचना है.’’

प्रियंका ने कहा तो चित्रा ने टिफिन में खाना पैक कर के उसे दे दिया. प्रियंका ने टिफिन अपने बैग में रखा और शाम को जल्दी लौट आने की बात कह कर बाहर निकल गई.   कुछ देर बाद प्रियंका के पापा जगवीर भी अपने क्लीनिक पर चले गए तो चित्रा घर के कामों में व्यस्त हो गई. उस दिन शाम को करीब साढ़े 5 बजे जगवीर सिंह के मोबाइल पर उन के साले ओमदत्त का फोन आया.

ओमदत्त ने उन्हें बताया, ‘‘जीजाजी, मेरे फोन पर कुछ देर पहले प्रियंका का फोन आया था. वह कह रही थी कि बच्चू सिंह ने अपने बेटे राहुल और कुछ बदमाशों की मदद से उस का अपहरण करवा लिया है और वह अलीगढ़ के पास खैर इलाके के वरौला गांव में है.’’

ओमदत्त की बात सुन कर जगवीर सिंह की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. उन्होंने जैसेतैसे अपने आप को संभाला और क्लीनिक बंद कर के घर आ गए. तब तक उन का साला ओमदत्त भी उन के घर पहुंच गया था. मामला गंभीर था. विचारविमर्श के बाद दोनों गाजियाबाद के थाना कविनगर पहुंचे और लिखित तहरीर दे कर 25 वर्षीया प्रियंका के अपहरण की नामजद रिपोर्ट दर्ज करा दी.

जगवीर सिंह सपरिवार गोविंदपुरम गाजियाबाद में किराए के मकान में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी चित्रा के अलावा 3 बच्चे थे—बेटी प्रियंका और 2 बेटे पंकज व तितेंद्र. उन का बड़ा बेटा पंकज एक टूर ऐंड ट्रैवल कंपनी की गाड़ी चलाता था, जबकि छोटा तितेंद्र सरकारी स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा था.

जगवीर सिंह ने 7 साल पहले प्रियंका की शादी गुलावठी के धर्मेंद्र चौधरी के साथ कर दी थी. धर्मेंद्र एक ट्रैवल एजेंसी में काम करता था. शादी के 1 साल बाद प्रियंका एक बेटे की मां बन गई थी, जो अब 6 साल का है. आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से जगवीर अपने बच्चों को अधिक पढ़ालिखा नहीं सके. उन का छोटा सा क्लीनिक था, जहां वह बतौर आरएमपी प्रैक्टिस करते थे. यही क्लीनिक उन की आय का एकमात्र साधन था.

प्रियंका शहर में पलीबढ़ी महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. शादी के बाद गांव उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा. इसी को ले कर जब पतिपत्नी में अनबन रहने लगी तो प्रियंका ने पति से अलग रहने का निर्णय ले लिया और बेटे सहित धर्मेंद्र का घर छोड़ कर मातापिता के पास गाजियाबाद आ गई. जगवीर सिंह की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब थी. बेटे सहित प्रियंका के मायके आ जाने से उन के पारिवारिक खर्चे और भी बढ़ गए.

किसी भी मांबाप के लिए यह किसी विडंबना से कम नहीं होता कि उन की बेटी शादी के बाद भी उन के साथ रहे. इस बात को प्रियंका अच्छी तरह समझती थी. इसलिए वह अपने स्तर पर नौकरी की तलाश में लग गई. काफी खोजबीन के बाद भी जब उसे कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली तो उस ने एक मोबाइल शौप पर सेल्सगर्ल की नौकरी कर ली.

मोबाइल शौप पर काम करते हुए प्रियंका की मुलाकात तरुण से हुई. तरुण चढ़ती उम्र का अच्छे परिवार का लड़का था. पहली ही मुलाकात में तरुण आंखों के रास्ते प्रियंका के दिल में उतर गया. बातचीत हुई तो दोनों ने अपनाअपना मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे दिया. इस के बाद दोनों प्राय: रोज ही एकदूसरे से फोन पर बातें करने लगे. जल्दी ही मिलनेमिलाने का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों एकदूसरे को दिन में कई बार फोन और एसएमएस करने लगे. जब समय मिलता तो दोनों साथसाथ घूमते और रेस्टोरेंट वगैरह में जाते. धीरेधीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती गईं.

तरुण के पिता बच्चू सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंसपेक्टर थे और गाजियाबाद के थाना मसूरी में तैनात थे. जब तरुण और प्रियंका के संबंध गहराए तो उन दोनों की प्रेम कहानी का पता बच्चू सिंह को भी लग गया.   उन्होंने जब इस बारे में तरुण से पूछा तो उस ने बेहिचक सारी बातें पिता को बता दीं. प्रियंका के बारे में भी सब कुछ और यह भी कि वह उस से शादी की इच्छा रखता है. उधर प्रियंका भी तरुण से शादी का सपना देखने लगी थी.

बेटे की प्रेमकहानी सुन कर बच्चू सिंह बहुत नाराज हुए. उन्होंने तरुण से साफसाफ कह दिया कि वह प्रियंका से दूर रहे, क्योंकि एक तलाकशुदा और एक बच्चे की मां कभी भी उन के परिवार की बहू नहीं बन सकती. इतना ही नहीं, उन्होंने प्रियंका को भी आगे न बढ़ने की सख्त चेतावनी दी. प्रियंका और अपने बेटे की प्रेम कहानी को ले कर वह तनाव में रहने लगे.

बच्चू सिंह ने प्रियंका और तरुण को चेतावनी भले ही दे दी थी, पर वे जानते थे कि ऐसी स्थिति में न लड़का समझेगा न लड़की. इसी वजह से उन्हें इस समस्या का कोई आसान हल नहीं सूझ रहा था. आखिर काफी सोचविचार कर उन्होंने प्रियंका को समझाने का फैसला किया.

बच्चू सिंह ने प्रियंका को समझाया भी, लेकिन वह शादी की जिद पर अड़ी रही. इतना ही नहीं, ऐसा न होने पर उस ने बच्चू सिंह को परिवार सहित अंजाम भुगतने की धमकी तक दे डाली. अपनी इस धमकी को उस ने सच भी कर दिखाया.

1 मार्च, 2013 को उस ने थाना कविनगर में बच्चू सिंह, उन की पत्नी, बेटे राहुल, नरेंद्र, प्रशांत और रोबिन के खिलाफ धारा 376, 452, 323, 506 व 406 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया, जिस में उस ने घर में घुस कर मारपीट, बलात्कार और 70 हजार रुपए लूटने का आरोप लगाया. बलात्कार का आरोप लगने से बच्चू सिंह के परिवार की बड़ी बदनामी हुई.

इस मामले में बच्चू सिंह का नाम आने पर उन का तबादला मेरठ के जिला बागपत कर दिया गया. मामला चूंकि एक पुलिसकर्मी से संबंधित था, सो इस सिलसिले में गंभीर जांच करने के बजाय विभागीय जांच के नाम पर इसे लंबे समय तक लटकाए रखा गया.

जबकि दूसरे आरोपियों के खिलाफ कानूनी काररवाई की गई. उधर बच्चू सिंह के खिलाफ कोई विशेष काररवाई न होते देख प्रियंका ने उन के बड़े बेटे राहुल और उस के दोस्त के खिलाफ 17 जून, 2013 को छेड़खानी व मारपीट का एक और मुकदमा दर्ज करा दिया. इस से बच्चू सिंह का परिवार काफी दबाव में आ गया.

2-2 मुकदमों में फंसने से बच्चू सिंह और उन के परिवार को रोजरोज कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे थे. इसी सब के चलते 31 नवंबर, 2013 को प्रियंका घर से गायब हो गई. प्रियंका के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होने पर थानाप्रभारी कविनगर ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी सबइंसपेक्टर शिवराज सिंह को सौंप दी. शिवराज सिंह प्रियंका द्वारा दर्ज कराए गए पिछले 2 केसों की भी जांच कर रहे थे. उन्होंने पिछले दोनों केसों की तरह इस मामले में भी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं ली.

दूसरी ओर प्रियंका के मातापिता लगातार थाने के चक्कर लगाते रहे. उन्होंने डीआईजी, आईजी और गाजियाबाद के एसपी, एसएसपी तक सभी अधिकारियों को अपनी परेशानी बताई . लेकिन किसी भी स्तर पर उन की कोई सुनवाई नहीं हुई. इसी बीच अचानक थानाप्रभारी कविनगर का तबादला हो गया. उन की जगह नए थानाप्रभारी आए अरुण कुमार सिंह.

अरुण कुमार सिंह ने प्रियंका के अपहरण के मामले में विशेष दिलचस्पी लेते हुए इस की जांच का जिम्मा बरेली से तबादला हो कर आए तेजतर्रार एसएसआई पवन चौधरी को सौंप कर कड़ी जांच के आदेश दिए. पवन चौधरी ने जांच में तेजी लाते हुए इस मामले में उस अज्ञात नामजद महिला पत्रकार के बारे में पता किया, जिस ने लापता होने वाले दिन प्रियंका को नौकरी दिलाने के लिए बुलाया था.

छानबीन में यह भी पता चला कि उस महिला का नाम रश्मि है और वह अपने पति के साथ केशवपुरम में किराए के मकान में रहती है. यह भी पता चला कि वह खुद को किसी अखबार की पत्रकार बताती है. पवन चौधरी ने रश्मि का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से यह बात साफ हो गई कि 31 नवंबर को उसी ने प्रियंका को फोन किया था.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने 18 फरवरी, 2014 को रात साढ़े 12 बजे रश्मि और उस के पति अमरपाल को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया. थाने पर जब दोनों से पूछताछ की गई तो पहले तो पतिपत्नी ने पुलिस को बरगलाने की कोशिश की, लेकिन जब उन के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वे टूट गए. मजबूर हो कर उन दोनों ने सारा राज खोल दिया. पता चला कि प्रियंका की हत्या हो चुकी है.

रश्मि और उस के पति अमरपाल के बयानों के आधार पर 19 फरवरी को सब से पहले सिपाही विनेश कुमार को गाजियाबाद पुलिस लाइन से गिरफ्तार किया गया. इस के बाद उसी दिन इस हत्याकांड के मास्टरमाइंड बच्चू सिंह को टटीरी पुलिस चौकी, बागपत से गिरफ्तार कर गाजियाबाद लाया गया.

थाने पर जब सब से पूछताछ की गई तो पता चला कि बच्चू सिंह प्रियंका द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों से बहुत परेशान रहने लगे थे. इसी चक्कर में उन का तबादला भी बागपत कर दिया गया था. यहीं पर बच्चू सिंह की मुलाकात उन के साथ काम करने वाले सिपाही राहुल से हुई.

राहुल अलीगढ़ का रहने वाला था. बच्चू सिंह ने अपनी समस्या के बारे में उसे बताया. राहुल पर भी अलीगढ़ में एक मुकदमा चल रहा था, जिस के सिलसिले में वह पेशी पर अलीगढ़ आताजाता रहता था. राहुल का एक दोस्त विनेश कुमार भी पुलिस में था और गाजियाबाद में तैनात था. विनेश जब एक मामले में अलीगढ़ जेल में था तो उस की मुलाकात एक बदमाश अमरपाल से हुई थी.

विनेश ने अमरपाल की जमानत में मदद की थी. इस के लिए वह विनेश का एहसान मानता था. बच्चू सिंह ने राहुल और विनेश कुमार के माध्यम से अमरपाल से प्रियंका की हत्या का सौदा 2 लाख रुपए में तय कर लिया. योजना के अनुसार अमरपाल ने इस काम के लिए अपनी पत्नी रश्मि की मदद ली. उस ने रश्मि को प्रियंका से दोस्ती करने को कहा.  उस ने प्रियंका से दोस्ती गांठ कर उसे विश्वास में ले लिया.

रश्मि को जब यह पता चला कि प्रियंका को नौकरी की जरूरत है तो उस ने खुद को एक अखबार की पत्रकार बता कर प्रियंका को 30 नवंबर, 2013 की सुबह फोन कर के घर से बाहर बुलाया और बसअड्डे ले जा कर उसे अमरपाल को यह कह कर सौंप दिया कि वह अखबार का सीनियर रिपोर्टर है और अब आगे उस की मदद वही करेगा.

अमरपाल प्रियंका को बस से लालकुआं तक लाया, जहां पर रितेश नाम का एक और व्यक्ति मोटरसाइकिल लिए उस का इंतजार कर रहा था. तीनों उसी बाइक से ले कर देर शाम अलीगढ़ पहुंचे.वहां से वे लोग खैर के पास गांव बरौला गए. तब तक प्रियंका को शक हो गया था कि वह गलत हाथों में पहुंच गई है. जब एक जगह बाइक रुकी तो प्रियंका ने बाथरूम जाने के बहाने अलग जा कर अपने मामा को फोन कर के अपनी स्थिति बता दी.

बाद में जब इन लोगों ने एक नहर के पास बाइक रोकी तो प्रियंका ने भागने की कोशिश भी की. लेकिन वह गिर पड़ी. यह देख अमरपाल और रितेश ने उसे पकड़ लिया और उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. हत्या के बाद इन लोगों ने प्रियंका की लाश नहर में फेंक दी और अलीगढ़ स्थित अपने घर चले गए. इस हत्याकांड में बच्चू सिंह के बेटे राहुल की भी संलिप्तता पाए जाने पर पुलिस ने अगले दिन उसे भी गिरफ्तार कर लिया.

इस हत्याकांड में नाम आने पर सिपाही राहुल फरार हो गया था, जिसे पुलिस गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही थी. पूछताछ के बाद सभी गिरफ्तार अभियुक्तों को अगले दिन गाजियाबाद अदालत में पेश किया गया, जहां से रश्मि, बच्चू सिंह, विनेश कुमार और तरुण को जेल भेज दिया गया. जबकि अमरपाल को रिमांड पर ले कर प्रियंका की लाश की तलाश में खैर इलाके का चक्कर लगाया गया.

लेकिन वहां पर लाश का कोई अवशेष नहीं मिला. पुलिस ने उस इलाके की पूरी नहर छान मारी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. रिमांड अवधि पूरी होने पर अमरपाल को भी डासना जेल भेज दिया गया. फिलहाल सभी अभियुक्त डासना जेल में बंद हैं.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित