Patna Kidnapping Case : हसीना के हसीन ख्वाब

Patna Kidnapping Case. एक होटल में रिसैप्शनिस्ट अनामिका ने 2 करोड़ रुपए हासिल करने के लिए उसी होटल के मालिक मोहन खंडेलवाल के बेटे शिवम के अपहरण की फूलप्रुफ योजना बनाई. पति व अन्य लोगों के साथ शिवम का अपहरण भी कर लिया, लेकिन… 

शाम के करीब साढ़े 7 बजे का वक्त था. मोहन कुमार खंडेलवाल पटना स्थित अपने होटल में ही थे तभी उन के मोबाइल पर एक काल आई. वह काल एक अनजान नंबर से आई थी. जिस तरह वह अन्य काल्स को रिसीव करते थे, उसी तरह उस को भी रिसीव करते हुए जैसे ही हैलो कहा तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘तुम्हारे बेटे शिवम का कार सहित अपहरण कर लिया है.’’

शिवम उन का 14 साल का बेटा था, जो पटना के बीरचंद पटेल रोड स्थित न्यू पटना क्लब में टेनिस खेलने जाता था. कार उन का ड्राइवर गिरीश पाठक चला कर ले जाता था. बेटे के अपहरण की बात सुन कर मोहन कुमार के तो जैसे होश ही उड़ गए. अपहर्त्ता बेटे को कोई हानि न पहुंचा सकें इसलिए वह बड़ी ही विनम्रता से बोले, ‘‘आप मेरे बेटे को छोड़ दीजिए, बदले में आप मुझ से जो भी मांगेंगे, मैं दे दूंगा.’’

‘‘हमें 2 करोड़ रुपए चाहिए. पैसों का इंतजाम करने के लिए कल दोपहर 2 बजे तक का वक्त दिया जाता है. तुम तब तक पैसों का इंतजाम कर लो और अगर तुम ने पैसे नहीं दिए या फिर कोई चालाकी दिखाने की कोशिश की तो तुम बेटे से हाथ धो बैठोगे.’’ अपहर्त्ता ने चेतावनी दी.

‘‘मैं पैसे दे दूंगा लेकिन बेटे को कुछ नहीं कहना. हमें बेटे से बात तो करा दो ताकि हमें कुछ तसल्ली आ जाए.’’ मोहन कुमार विनम्रता से बोले. बेटे की आवाज सुनने के लिए वह फोन को कान से चिपकाए रहे.

कुछ देर बाद उन के कान में बेटे की आवाज आई, ‘‘हां पापा, मैं अंकल के कब्जे में हूं.’’

बेटे की आवाज से उन्हें महसूस हुआ कि जैसे वह डरासहमा हुआ है. उन्होंने बेटे को हिम्मत बंधाते हुए कहा, ‘‘बेटा, घबराना मत. तुम बहुत जल्दी आ जाओगे.’’

इस से पहले कि वह और कुछ कहते दूसरी ओर से फोन डिसकनेक्ट हो गया. उन्होंने कई बार हैलोहैलो कहा. इस के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो जिस नंबर से उन के फोन पर काल आई थी, काल बैक किया लेकिन फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

उस नंबर को उन्होंने कई बार डायल किया लेकिन स्विच्ड औफ होने की वजह से वह नहीं मिल सका. उन्होंने अपने ड्राइवर गिरीश पाठक को फोन लगाया लेकिन उस का फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा था. अपहरण शिवम का हुआ है तो ड्राइवर का फोन बंद क्यों है? अपहर्त्ताओं ने क्या उसे भी अपने काबू में कर रखा है या वह उन के चंगुल से बाहर है. यह बात वह समझ नहीं पा रहे थे.

मोहन कुमार खंडेलवाल की घबराहट बढ़ गई. वह होटल से सीधे कौशल्या एस्टेट स्थित अपने घर पहुंचे. उन्होंने सब से पहले पत्नी से पूछा, ‘‘शिवम टेनिस खेलने के लिए घर से कितने बजे निकला था?’’

‘‘रोज की तरह वह शाम सवा 4 बजे निकला था. मगर क्या हुआ उसे? आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं?’’ पत्नी ने पूछा.

न चाहते हुए भी मोहन कुमार को बेटे के अपहरण की बात पत्नी को बतानी पड़ी. बेटे के अपहरण की खबर सुनते ही पत्नी रोने लगीं. तब मोहन कुमार ने उन्हें समझाते हुए भरोसा दिलाया कि उन की अपहर्त्ता से बात हो चुकी है. जल्द से जल्द बेटे को उन के पास से ले आएंगे.

जिस टेनिस क्लब में शिवम प्रैक्टिस करने जाता था, मोहन खंडेलवाल ने फोन से उस क्लब के संचालक से संपर्क किया तो पता चला कि शिवम आज क्लब में पहुंचा ही नहीं था. इस का मतलब यह हुआ कि घर से क्लब जाते समय ही शिवम का अपहरण कर लिया था.

उन्होंने रात करीबन साढ़े 8 बजे फोन से पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मनु महाराज से बात कर बेटे के अपहरण की बात बता दी. साथ ही जिस फोन नंबर से उन के पास फिरौती के लिए फोन आया था, वह फोन नंबर भी उन्हें बता दिया. यह 7 फरवरी, 2014 की बात है.

मामला अपहरण का था इसलिए एसएसपी ने तुरंत तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों की 3 टीमें बनाईं. तीनों टीमों के निर्देशन की जिम्मेदारी एसपी सिटी जयंत कांत को सौंपी गई.  एक पुलिस टीम शहर पुलिस उपाधीक्षक (सिटी) ममता कल्याणी की अगुवाई में बनी थी. एसएसपी के कहने पर मोहन खंडेलवाल एसपी सिटी जयंत कांत से मिले और उन्हें बेटे के अपहरण की कहानी बता दी. मोहन खंडेलवाल से बात करने के बाद एसपी सिटी ने शहर कोतवाली में अपहरण का केस दर्ज करा दिया.

मोहन खंडेलवाल ने पुलिस को बताया कि उन का ड्राइवर गिरीश पाठक ही सैंट्रो कार बीआरओ 1वी 8578 से शिवम को न्यू पटना क्लब ले जाता था और शाम 7 सवा 7 बजे वह टेनिस खेल कर घर लौट आता था. उन्होंने यह भी बताया कि शिवम के अपहरण के बाद ड्राइवर का फोन बंद है. इसलिए उन्होंने आशंका जताई कि शायद गिरीश पाठक ने ही अपने साथियों के साथ मिल कर शिवम का अपहरण कर लिया है.

जिस नंबर से फिरौती की काल आई थी, पुलिस ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. जांच से यह पता चला कि वह फोन नंबर कर्नाटक का है और वह प्रदीप पाठक के नाम से लिया गया है. लेकिन फिरौती की काल करते समय वह सिम दूसरे आईएमईआई नंबर वाले फोन में डाला गया था.

पुलिस की तीनों टीमें आईएमईआई नंबर और फोन नंबर के सहारे रात भर जांच को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटी रहीं. पुलिस को यह पता लग चुका था कि जिस समय अपहर्त्ता ने मोहन खंडेलवाल को फिरौती की काल की थी, उस समय उस के फोन की लोकेशन बिहार के ही भोजपुर जिले के नजदीक धनुपुरा गांव की थी.

एक पुलिस टीम पटना में मुख्य जगहों पर लगे सीसीटीवी और एएनपीआर कैमरों की फूटेज खंगालने लगी. एएनपीआर कैमरे शहर के मुख्य चौराहे पर लगे थे. इन कैमरों से वाहनों की नंबर प्लेट भी पढ़ी जा सकती है. पुलिस के पास खंडेलवाल की सैंट्रो कार का नंबर था इसलिए वह इन कैमरों से यह जानने की कोशिश करने लगी कि वह सैंट्रो कार किस तरफ गई है?

उधर बेटे की चिंता में खंडेलवाल दंपति को भी रात भर नींद नहीं आई. बीचबीच में वह पुलिस को फोन कर के यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि पुलिस को अपहर्त्ताओं और बेटे के बारे में कोई जानकारी मिली कि नहीं. पुलिस से उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिल रहा था.

सुबह होते ही पुलिस की टीमें धुनुपुरा गांव चली गईं और अपने तरीके से बच्चे के बारे में पता लगाने लगीं. इसी दौरान पुलिस सर्विलांस टीम से खबर मिली कि जिस फोन नंबर से खंडेलवाल से फिरौती की रकम मांगी गई थी, वह नंबर कुछ देर के लिए दूसरे फोन में डाला गया था. वह फोन वही था जिस में कर्नाटक वाला यही नंबर रेग्युलर यूज किया जाता था.

वह फोन कुछ देर के लिए औन होने पर पुलिस का काम आसान हो गया. इस से पुलिस को उस की लोकेशन पता चल गई. उस की लोकेशन धनुपुरा के पास इब्राहीमनगर की  थी. इब्राहीमनगर में पुलिस टीमों ने घरघर जा कर सर्चिंग शुरू कर दी. तभी सुबह 6 बजे एक मकान में 2 युवक और अपहृत शिवम मिल गया. शिवम के हाथपैर बंधे हुए थे और उस का मुंह भी कपड़े से बंधा था.

शिवम को सहीसलामत बरामद करने की बात जांच टीम ने एसएसपी को बता दी. बाद में बात मोहन खंडेलवाल को भी बता दी गई. बेटे को अपहर्त्ताओं के चंगुल से छुड़ाने पर खंडेलवाल दंपति की खुशी का ठिकाना न रहा. वे तुरंत कोतवाली पहुंच गए.

पुलिस ने जिन 2 युवकों को हिरासत में लिया था, उन्होंने अपने नाम अभिषेक सिंह और प्रदीप पाठक बताए थे. दोनों युवकों से पूछताछ करने के लिए पुलिस गिरफ्तार कर के उन्हें कोतवाली ले आई.

अभिषेक और प्रदीप पाठक से पूछताछ करने पर पता चला कि शिवम के अपहरण की साजिश खंडेलवाल के होटल में काम करने वाली युवती अनामिका और उस के पति गिरीश पाठक ने रची थी.

मोहन खंडेलवाल ने भी बेटे के अपहरण में गिरीश पाठक पर शक जताया था. गिरीश और उस की पत्नी अनामिका पिछले 2 दिनों से अपनी ड्यूटी पर भी नहीं आ रहे थे और उन के फोन भी स्विच्ड औफ थे. पुलिस ने भी दोनों मास्टर माइंड की तलाश शुरू कर दी, लेकिन उन का पता नहीं लगा.

केवल 14 घंटे के अंदर अपहृत बच्चे के सहीसलामत बरामद के अलावा 2 अपहर्त्ता भी गिरफ्तार किए जा चुके थे. यही पुलिस की बड़ी उपलब्धि थी. अभियुक्त अभिषेक और प्रदीप पाठक से विस्तार से पूछताछ की गई तो शिवम के अपहरण की दिलचस्प कहानी सामने आई.

बिहार की राजधानी पटना शहर में कौशल्या एस्टेट के रहने वाले मोहन कुमार खंडेलवाल का शहर में एग्जिवेशन रोड पर एक होटल था. इस के अलावा उन के कई और बिजनैस भी थे. इस की वजह से उन की गिनती शहर के अच्छे बिजनैसमैनों में थी. उन का एक बेटा था शिवम. वह सेंट जोसफ हाई स्कूल में कक्षा 9वीं में पढ़ता था.

14 वर्षीय शिवम को पढ़ाई के साथ टेनिस खेलने का शौक था. बेटे की रुचि को देखते हुए मोहन खंडेलवाल उस की प्रतिभा बढ़ाना चाहते थे. अच्छे खिलाड़ी बनने के गुर सीखने के लिए शिवम पटना के बीरचंद पटेल रोड पर स्थित न्यू पटना क्लब जाने लगा. वहां  वह ढाईतीन घंटे टेनिस की प्रैक्टिस करता था.

खंडेलवाल ने बेटे को क्लब ले जाने और वहां से घर लाने के लिए अपने ड्राइवर गिरीश पाठक की ड्यूटी लगा रखी थी. गिरीश ही सैंट्रो कार से शिवम को शाम 4 बजे क्लब ले जाता और उस के प्रैक्टिस करने के बाद 7-सवा 7 बजे घर लाता था.

गिरीश पाठक खंडेलवाल के होटल में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी करने वाली अनामिका का पति था. अनामिका पटना के ही थाना जगनपुर के ककरबाग के रहने वाले दिलीप कुमार की बेटी थी. वह वहां पर एक डेयरी चलाते थे.

अनामिका अपने 2 भाइयों के बीच अकेली बहन थी. इसलिए परिवार में वह सब की दुलारी थी. इंटरमीडिएट पास करने के बाद उस ने मोहन खंडेलवाल के होटल में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली.

खंडेलवाल के यहां गिरीश पाठक नाम का एक युवक ड्राइवर था जो भोजपुर जिले के कचनत गांव में रहने वाले देवेंद्रनाथ पाठक का बेटा था. मोहन खंडेलवाल को जब वह उन के होटल ले जाता तो फुरसत में रिसैप्शनिस्ट अनामिका से बात करता था. हमउम्र होने की वजह से दोनों खूब बातें करते थे. धीरेधीरे उन के बीच बातों का दायरा बढ़ता गया और वे एकदूसरे को चाहने लगे.

दिनोंदिन उन का प्यार बढ़ने लगा. हालात यहां तक पहुंच गए कि अलगअलग जाति होने के बावजूद उन्होंने शादी करने का फैसला ले लिया. फिर घर वालों की मरजी के खिलाफ गिरीश पाठक और अनामिका ने जनवरी 2013 में प्रेम विवाह कर लिया.

शादी के बाद दोनों ही पटना में किराए पर कमरा ले कर रहने लगे. चूंकि दोनों ही कमा रहे थे इसलिए उन की गृहस्थी ठीकठाक चल रही थी. वे एक बड़े बिजनैसमैन मोहन खंडेलवाल के यहां नौकरी करते थे. खंडेलवाल के ठाठबाट देख कर उन के मन में भी ऐश की जिंदगी गुजारने की लालसा होती थी, मगर जितनी पगार उन्हें मिलती थी उस से उन की महत्त्वाकांक्षाएं पूरी होने वाली नहीं थीं. ऐसा क्या करें, जिस से उन के पास भी अकूत संपत्ति हो जाए, इसी बात पर वे विचार करते थे.

इसी दौरान उन के दिमाग में विचार आया कि जिस खंडेलवाल के यहां वे नौकरी कर रहे हैं, क्यों न उन के बेटे शिवम का किडनैप कर लिया जाए. क्योंकि वह पैसे वाले हैं इसलिए शिवम की फिरौती पर उन्हें मोटा पैसा मिलने की उम्मीद थी. शिवम को क्लब तक गिरीश ही छोड़ने जाता था इसलिए उस का किडनैप भी आसानी से होने की उम्मीद थी.

गिरीश पाठक ने जल्दी से मालदार होने का उपाय तो खोज लिया लेकिन जो काम कर के अपनी तमन्ना पूरी करनी चाहते थे, वह काम इतना आसान नहीं था. उस ने इस योजना में अपने ताऊ के बेटे प्रदीप पाठक को शामिल करने का फैसला कर लिया.

प्रदीप पाठक भोजपुर जिले के ही थाना पीटो का रहने वाला था. वह बंगलुरु में एक ट्रैवल एजेंसी में ड्राइवर था. गिरीश की प्रदीप से फोन पर बात होती रहती थी. प्रदीप भी अपनी नौकरी से खुश नहीं था, वह भी जल्दी मोटे पैसे कमाना चाहता था.

29 जनवरी, 2014 को गिरीश ने उसे एक काम में मोटा पैसा कमाने का लालच दे कर पटना आने को कहा. प्रदीप ने उस से काम के बारे में जानना चाहा तो गिरीश ने कह दिया कि काम के बारे में वह पटना आने पर ही बताएगा.

पहली फरवरी, 2014 को प्रदीप बंगलुरु से पटना आ गया और मीठापुर बस स्टैंड के नजदीक अपने भाई विनय पाठक के मकान में ठहर गया. फोन कर के उस ने गिरीश को अपने आने की सूचना दी तोवह उस के कमरे पर ही पहुंच गया.

गिरीश ने उसे बिजनैसमैन मोहन खंडेलवाल के 14 वर्षीय बेटे शिवम के अपहरण कर मोटी फिरौती वसूलने की योजना बताई. अच्छे पैसे मिलने की उम्मीद में प्रदीप ने हामी भर दी.

वे इस गेम को सुरक्षापूर्वक खेलना चाहते थे. गिरीश चाहता था कि उन के साथ कोई ऐसा शख्स और शामिल हो जाए जो दबंग टाइप का हो. तब प्रदीप ने अभिषेक सिंह को शामिल करने का सुझाव दिया जो सीआरपीएफ की बटालियन नंबर 197 में नौकरी करता है. उस की पोस्टिंग सारंदा (झारखंड) में थी.

अभिषेक सिंह जिला भोजपुर के गड़हवी गांव के रहने वाले संतोष सिंह का बेटा था. आरडीएम हाईस्कूल में पढ़ते समय अभिषेक ने प्रदीप पाठक के यहां किराए पर कमरा लिया था. वहां रहने के दौरान ही उस की प्रदीप से दोस्ती हो गई. कभीकभी गिरीश भी प्रदीप पाठक के यहां आता था इसलिए वह भी अभिषेक सिंह को जानता था. बाद में अभिषेक की सीआरपीएफ में नौकरी लग गई. नौकरी लग जाने के बाद भी प्रदीप की अभिषेक से फोन पर बात होती रहती थी.

प्रदीप जब पटना आ गया तो उस ने मिलने के लिए अभिषेक को बुलाया. दोस्त के कहने पर अभिषेक पटना आ गया तो प्रदीप ने उस से बिजनैसमैन के बेटे का अपहरण करने के बारे में बात की. पैसों के लालच में अभिषेक भी उन की योजना में शामिल हो गया. फिर गिरीश, अनामिका, प्रदीप और अभिषेक ने योजना को अंजाम देने की रूपरेखा बनाई. उन्होंने हथियार वगैरह का इंतजाम भी कर लिया.

गिरीश ने प्रदीप और अभिषेक से कहा, ‘‘शाम करीबन 4 बजे शिवम को टेनिस खेलने के लिए सफेद रंग की सैंट्रो कार नंबर बीआर ओ 1वी 8578 से ले जाता हूं. जैसे ही मैं क्लब से थोड़ी पहले डबल ब्रेकर पर पहुंचूंगा, कार धीमी कर दूंगा. तुम लोग वहां पहले से ही तैयार रहना. कार धीमी होते ही गेट खोल कर कार में बैठ जाना.’’

7 फरवरी, 2014 को गिरीश पाठक शिवम को सैंट्रो कार से क्लब की ओर ले कर रवाना हुआ. अभिषेक और प्रदीप पाठक पहले से ही डबल ब्रेकर के पास खड़े हो गए थे. जैसे ही गिरीश डबल ब्रेकर के पास पहुंचा तो अपने साथियों को देख कर उस ने कार धीमी कर ली.

कार के पिछले गेटों के लौक उस ने पहले से ही खोल रखे थे. कार धीमी होते ही प्रदीप और अभिषेक कार के पिछले गेट खोल कर अंदर बैठ गए. शिवम ने अंजान लोगों को गाड़ी में चढ़ते देखा तो वह चौंक गया. इस से पहले कि शिवम उन से कुछ कहता, प्रदीप और अभिषेक ने तमंचा दिखा कर उसे डरा दिया. गिरीश कार तेज गति से चलाते हुए प्रदीप के भाई विनय पाठक के मकान पर ले गया.

मकान की चाबी प्रदीप के पास ही थी. उस ने ताला खोला और शिवम को डराधमका कर एक कमरे में बंद कर दिया. कार उन्होंने उसी मकान में खड़ी कर दी थी. प्रदीप के पास बंगलुरु का एयरसेल कंपनी का सिम था. गिरीश ने उस से वह सिम ले कर अपने मोबाइल फोन में डाला और शाम साढ़े 7 बजे शिवम के पिता मोहन खंडेलवाल को फोन कर के शिवम के अपहरण की जानकारी दी और 2 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी. उस ने उस समय शिवम की उस के पिता से बात करा दी ताकि उन्हें बेटे के अपहरण होने का विश्वास हो जाए.

खंडेलवाल से बात करने के बाद उस ने एयरसेल का सिम निकाल कर प्रदीप को दे दिया और कहा कि वह इसे फोन में न डाले. गिरीश बहुत शातिरदिमाग था वह खुद को सेफ रखना चाहता था. इसलिए वह शिवम के साथ कमरे पर नहीं ठहरना चाहता था.

उस ने अभिषेक और प्रदीप से बहाना बनाते हुए कहा, ‘‘अभीअभी मेरी पत्नी का फोन आया है वह आरा आई हुई है. मैं उसे होटल में ठहरा कर रात में ही यहां आने की कोशिश करूंगा. नहीं तो सुबह जरूर आ जाऊंगा.’’ इतना कह कर गिरीश पाठक वहां से चला गया.

अगले दिन गिरीश को किसी तरह पता चल गया कि पुलिस शिवम को सरगर्मी से तलाश रही है तो वह पत्नी अनामिका को ले कर पटना से रफूचक्कर हो गया.

प्रदीप और अभिषेक को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने विनय के मकान से ही मोहन खंडेलवाल की कार भी बरामद कर ली. इस के बाद पुलिस ने अनामिका और गिरीश पाठक की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए दोनों अभियुक्त प्रदीप पाठक और अभिषेक सिंह को 8 फरवरी, 2014 को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. लेकिन फरार मास्टरमाइंड गिरीश और अनामिका का पता नहीं लग सका. पटना पुलिस उन्हें हर संभावित जगहों पर खोजती रही. कई महीने की खोजबीन के बाद भी उन का कोई सुराग नहीं मिला.

इसी बीच पटना पुलिस को सूचना मिली कि अभियुक्त गिरीश पाठक और उस की पत्नी अनामिका दिल्ली में कहीं छिपे हुए हैं. घटना के दोनों मास्टर माइंडों को खोजने में पटना पुलिस ने दिल्ली पुलिस से सहयोग मांगा.  पुलिस आयुक्त बी.एस. बस्सी ने यह जांच क्राइम ब्रांच को करने के आदेश दिए.

क्राइम ब्रांच के डीसीपी भीष्म सिंह ने एसीपी के.पी.एस. मल्होत्रा के निर्देशन में एक पुलिस टीम बनाई. इस टीम में इंसपेक्टर सुनील कुमार, एसआई रविंद्र तेवतिया, निर्भय सिंह राणा, हेडकांस्टेबल ईश्वर सिंह, कुसुम पाल, अजय शर्मा, विक्रम दत्त, ईद मोहम्मद, कांस्टेबल मोहित कुमार, मनोज, प्रेमपाल, सुरेंद्र, उदयराम, अंजू आदि को शामिल किया गया.

टीम के पास केवल गिरीश पाठक का मोबाइल नंबर और फोटोग्राफ था. इन के सहारे उसे तलाशना किसी चुनौती से कम नहीं था. पुलिस टीम ने उस के फोन को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन वह स्विच्ड औफ आ रहा था.

इतनी बड़ी दिल्ली में फोटो के सहारे उसे ढूंढना आसान नहीं था. पुलिस ने दिल्ली के बड़े सभी रेलवे स्टेशनों और अंतरराज्यीय बसअड्डों पर अपने मुखबिरों को लगा दिया. पुलिस ने मुखबिरों को अभियुक्त गिरीश पाठक का फोटो दे दिया था ताकि वे उसे पहचान सकें.

12 जून 2014 को आखिर क्राइम ब्रांच को सफलता मिल ही गई. एक मुखबिर ने सूचना दी कि फोटो में दिखने वाली सूरत का एक आदमी एक औरत के साथ सराय कालेखां बस टर्मिनल पर खड़ा है. मुखबिर की खबर पा कर पुलिस टीम तुरंत सराय कालेखां बस टर्मिनल पहुंच गई और उस आदमी और उस के साथ खड़ी औरत से पूछताछ की तो उन्होंने अपने नाम गिरीश पाठक और अनामिका हैं.

क्राइम ब्रांच औफिस ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने पटना के बिजनैसमैन मोहन खंडेलवाल के बेटे शिवम के अपहरण की सारी कहानी उगल दी. चूंकि वे दोनों अभियुक्त पटना पुलिस के वांटेड थे इसलिए दिल्ली पुलिस ने उन की गिरफ्तारी की खबर  पटना पुलिस को दे दी.

दोनों अभियुक्तों को 12 जून, 2014 को साकेत कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अनु अग्रवाल के समक्ष पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

वांटेड अभियुक्तों की गिरफ्तारी की सूचना पर पटना पुलिस 14 जून को दिल्ली पहुंच गई और कोर्ट में उक्त दोनों अभियुक्तों को ट्रांजिट रिमांड पर दिए जाने की अर्जी पेश की. कोर्ट ने उन की अर्जी को मंजूर कर लिया. फिर पटना पुलिस अभियुक्त गिरीश पाठक और अनामिका को ट्रांजिट रिमांड पर पटना ले गई.

पटना कोतवाली में दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने शिवम के अपहरण की साजिश रचने से ले कर अपहरण करने की कहानी बता दी. पूछताछ के बाद उन्हें पटना के न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.      Patna Kidnapping Case

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

—  2014 में प्रकाशित

Crime News : अपहर्त्ताओं ने व्यापारी के बेटे को अगवा कर मांगी 2 करोड़ की फिरौती

Crime News : अपहर्त्ताओं ने व्यापारी मुकेश लांबा के एकलौते बेटे आदित्य उर्फ आदि का अपहरण कर 2 करोड़ की मांग की. ताज्जुब की बात यह रही कि पुलिस के मुस्तैद रहते हुए भी अपहर्त्ता फिरौती की रकम ले गए. इसी तरह के और भी अनेक ऐसे सवाल रहे जो पुलिस काररवाई पर अंगुली उठा रहे हैं.

शाम को करीब 6 बजे का समय रहा होगा. सुमन रसोई में शाम का खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. सब्जी बनाने के लिए उसे जीरा चाहिए था. जीरा खत्म हो गया था. सुमन ने रसोई से ही बेटे आदित्य को आवाज दी, ‘‘आदि बेटे, किराने वाले की दुकान से जीरा ला दो.’’

13 साल का आदि उस समय मोबाइल पर गेम खेल रहा था. मां की आवाज सुन कर उसे झुंझलाहट हुई. उस ने ड्राइंगरूम से ही मां को आवाज दे कर कहा, ‘‘मम्मी, दीदी को भेज दो. मैं खेल रहा हूं.’’

अपने कमरे में पढ़ रही रितु ने छोटे भाई आदि की आवाज सुन ली. उस ने कहा, ‘‘मम्मी, मैं पढ़ रही हूं. यह मोबाइल में गेम खेल रहा है. इसे ही भेज दो.’’

‘‘बेटे आदि, तुम ही दुकान पर जा कर मुझे जीरा ला दो.‘‘ सुमन ने रसोई से बाहर निकल कर उसे 50 रुपए का नोट देते हुए कहा. आदि मना नहीं कर सका. उस ने मां से पैसे लिए और घर से निकल गया. किराने वाले की दुकान उन के घर के पास ही थी. वे घर के राशन की चीजें उसी से लाते थे. आदि उस किराना की दुकान पर पहुंचा ही था कि उधर से गुजरती एक स्विफ्ट कार वहां रुकी. कार में सवार लोगों ने आदि को इशारे से अपने पास बुला कर कहा, ‘‘बेटे, यहां आसपास ही मुकेश लांबा रहते हैं, क्या आप को पता है, उन का घर कहां है?’’

मुकेश लांबा का नाम सुन कर आदि बोला, ‘‘वे तो मेरे पापा हैं.’’

‘‘अरे तुम मुकेश के बेटे हो.’’ कार में सवार एक आदमी ने आदि की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘बेटे हम आप के पापा के दोस्त हैं. हमें अपने घर ले चलो.’’

पापा के दोस्त होने की बात सुन कर आदि ने कहा, ‘‘चलो, मैं आप को घर ले चलता हूं.’’ यह कह कर आदि पैदल ही कार के आगे चलने लगा. आदि को पैदल चलते देख कार में सवार एक आदमी ने खिड़की से बाहर सिर निकाल कर उसे आवाज दे कर कहा, ‘‘बेटे, तुम हमारे साथ कार में ही बैठ जाओ.’’

वैसे तो आदि का मकान वहां से 2-3 सौ मीटर दूर ही था. फिर भी आदि उन के साथ कार में पीछे की सीट पर बैठ गया. कार में कुल 3 लोग थे. इन में एक कार चला रहा था. एक आगे की सीट पर और एक आदमी पीछे की सीट पर बैठा हुआ था. वे तीनों मास्क लगाए हुए थे. इसलिए उन के चेहरे साफ नजर नहीं आ रहे थे. आदि भी पीछे की सीट पर बैठ गया. आदि के बैठते ही आगे बैठे आदमी ने कार चला रहे अपने साथी से कहा, ‘‘यार, मुकेश के घर चल रहे हैं, तो कुछ मिठाई ले चलते हैं.’’ इस बात पर पीछे बैठे उन के साथी ने भी सहमति जताई.

आदि क्या कहता, वह चुप रहा. वे लोग कार में आदि को साथ ले कर काफी देर इधरउधर घूमते रहे. उधर आदी जीरा ले कर घर नहीं पहुंचा तो सुमन बुदबुदाने लगी, ‘‘पता नहीं ये लड़का कहां किस से बातें करने में लग गया. मैं सब्जी बनाने को बैठी हूं और यह नजाने कहां रुक गया. कम से कम जीरा तो मुझे दे कर चला जाता.’’

उधर वह लोग मिठाई की दुकान ढूंढने के बहाने कार को घुमाते रहे. बीच में मिठाइयों की कई दुकानें आईं, लेकिन उन्होंने मिठाई नहीं खरीदी. आखिर आदि ने उन से पूछ ही लिया कि अंकल आप को मिठाई खरीदनी है, तो कहीं से भी खरीद लो. मुझे घर जाना है. मम्मी ने मुझ से घर का कुछ सामान मंगाया है. मम्मी इंतजार कर रही होंगी.

‘‘लड़के, तू ज्यादा चपरचपर मत कर. चुपचाप बैठा रह.’’ कार में आगे की सीट पर बैठे आदमी ने उस से कहा, तो आदि सहम गया. उसे कुछ अनहोनी की आशंका हुई, लेकिन 13 साल का वह बालक क्या कर सकता था. पीछे बैठे आदमी ने उसे आंखें दिखाईं, तो वह सहम गया. कार के शीशे भी बंद थे. रात का अंधेरा भी घिर आया था. कुछ देर बाद कार सुनसान रास्ते पर एक मकान के आगे जा कर रुकी. कार से उतर कर वे तीनों आदमी आदि को भी उस मकान में ले गए. एक आदमी ने आदि से उस की मां और पापा के मोबाइल नंबर पूछे. आदि ने दोनों के नंबर उन्हें बता दिए.

शाम को करीब 7 बजे एक आदमी ने आदि की मां सुमन को मोबाइल पर काल कर कहा, ‘‘हम ने तुम्हारे बेटे का अपहरण कर लिया है. उसे जीवित देखना चाहती हो, तो 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो.’’

फोन सुन कर सुमन सन्न रह गई. वह काल करने वाले से बोली, ‘‘तुम कौन हो? मेरा बेटा कहां है?’’

‘‘तुम्हारा बेटा हमारे पास ही है. तुम पैसों का इंतजाम कर लो.’’ यह कह कर उस आदमी ने फोन काट दिया. दूसरी तरफ से सुमन हैलो.. हैलो.. ही करती रह गई. बेटे आदि के अपहरण और 2 करोड़ रुपए मांगने की बात सुन कर सुमन रोने लगी. घर पर आदि के पापा मुकेश लांबा भी नहीं थे. सुमन ने रोतेरोते फोन कर उन्हें बेटे का अपहरण होने की बात बताई. मुकेश तुरंत घर पहुंचे. उन्होंने पत्नी सुमन से सारी बातें पूछीं कि कैसे क्याक्या हुआ? आदि कहां गया था? अपहर्त्ताओं ने क्या कहा है? सुमन ने पति को सारी बातें बता दीं. यह बात 15 अक्तूबर, 2020 की है.

घटना मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर की है. शहर के धनवंतरी नगर में दुर्गा मंदिर के पास रहने वाले मुकेश लांबा माइनिंग विस्फोटक का काम करते थे. पहले वह ट्रांसपोर्ट का काम करते थे. मुकेश का कारोबार अब ठीकठाक चल रहा था. जिंदगी मजे से गुजर रही थी. घर में किसी बात की कमी नहीं थी. परिवार में कुल 4 लोग थे. मुकेश, उन की पत्नी सुमन, बड़ी बेटी रितु और छोटा बेटा आदित्य. आदित्य को प्यार से घर के लोग आदी कहते थे. बेटा और बेटी दोनों पढ़ते थे. बेटे आदि के अपहरण की बात जान कर मुकेश परेशान हो गए. अपहर्त्ता कौन थे, यह भी पता नहीं था. वे 2 करोड़ रुपए मांग रहे थे. भले ही मुकेश का कारोबार अच्छा चल रहा था, लेकिन 2 करोड़ की रकम कोई मामूली थोड़े ही थी.

वे सोचने लगे कि क्या करें और क्या नहीं करें. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था. आदि के अपहरण का पता चलने के बाद से पत्नी और बेटी के आंसू नहीं रुक पा रहे थे. मुकेश इसी बात पर सोचविचार कर रहे थे कि रात करीब 8 बजे उन के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने तुरंत काल रिसीव कर कहा, ‘‘हैलो.’’

दूसरी तरफ से धमकी भरी आवाज आई, ‘‘मुकेश, हम ने तुम्हारे बेटे का अपहरण कर लिया है. बेटे को जिंदा देखना चाहते हो तो 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो. ध्यान रखना पुलिस को सूचना दी, तो तुम्हारा बेटा जिंदा नहीं बचेगा.’’

‘‘तुम कौन हो? मेरा बेटा कहां है और उस से मेरी बात कराओ?’’ मुकेश ने घबराई हुई आवाज में काल करने वाले से एक साथ कई सारे सवाल पूछे.

‘‘हम बहुत खतरनाक लोग हैं. तुम्हारा बेटा हमारे पास ही है, उस से बात भी करा देंगे. लेकिन तुम कल तक पैसों का इंतजाम कर लो.’’ काल करने वाले ने यह कह कर फोन काट दिया. पहले सुमन और इस के बाद मुकेश के पास आए फोन से यह साफ हो गया था कि आदि का अपहरण हो गया है. लेकिन यह पता नहीं चला था अपहर्त्ता कौन हैं? वे 2 करोड़ रुपए की रकम मांग रहे थे, जो मुकेश की हैसियत से बहुत ज्यादा थी. काफी सोचविचार के बाद मुकेश ने पुलिस को सूचना देने का फैसला किया और जबलपुर के संजीवनी नगर पुलिस थाने पहुंच कर उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

बच्चे के अपहरण और 2 करोड़ की फिरौती मांगने का पता चलने पर पुलिस अधिकारी धनवंतरी नगर में मुकेश लांबा के घर पहुंचे और घर वालों से पूछताछ कर बालक आदि की तलाश में जुट गए. दूसरे दिन 16 अक्तूबर को मुकेश के मोबाइल पर अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया. उन्होंने उस से रकम के बारे में पूछा. मुकेश ने उन से कहा कि उस के पास 2 करोड़ रुपए नहीं हैं. वह मुश्किल से 8-10 लाख रुपए का इंतजाम कर सकता है. अपहर्त्ताओं ने कहा कि 2 करोड़ नहीं दे सकते, तो कुछ कम दे देना लेकिन 8-10 लाख से कुछ नहीं होगा. हम तुम्हें शाम को दोबारा फोन करेंगे, तब तक पैसों का इंतजाम कर लेना.

मुकेश ने अपहर्त्ताओं से हुई सारी बातें पुलिस को बता दीं. पुलिस ने उस मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया, जिस नंबर से मुकेश के पास अपहर्त्ताओं का फोन आया था. अपहर्त्ताओं ने तब तक 3 बार फोन किए थे. ये फोन एक ही नंबर से किए गए थे. उसी दिन शाम को चौथी बार अपहर्त्ताओं का मुकेश के मोबाइल पर फिर फोन आया. मुकेश ने मिन्नतें करते हुए कहा कि मुश्किल से 8 लाख रुपए का इंतजाम हुआ है. ये पैसे तुम ले लो और मेरे बेटे को लौटा दो. मुकेश ने कहा कि बेटे से मेरी एक बार बात तो करा दो. मुकेश के अनुरोध पर अपहर्त्ताओं ने आदि से उस की बात कराई. मोबाइल पर आदि रोतीबिलखती आवाज में कह रहा था, ‘‘पापा, इन की बात मान लो. ये लोग बहुत खतरनाक हैं, मुझे मार डालेंगे.’’

बेटे की आवाज सुन कर मुकेश को कुछ संतोष हुआ. मुकेश के काफी गिड़गिड़ाने पर अपहर्त्ता 8 लाख रुपए ले कर आदि को छोड़ने पर राजी हो गए. अपहर्त्ताओं ने मुकेश को उसी रात जबलपुर में पनागर से सिरोहा मार्ग पर एक जगह नाले के पास पैसों का बैग रख आने को कहा और यह भरोसा दिया कि पैसे मिलने के आधे घंटे बाद बच्चे को तुम्हारे घर के पास छोड़ देंगे. अपहर्त्ताओं के 8 लाख रुपए लेने पर राजी हो जाने पर मुकेश को उम्मीद की कुछ किरण नजर आई. वह सोचने लगे कि यह बात पुलिस को बताए या नहीं. सोचविचार के बाद उन्होंने तय किया कि पुलिस को बताने में ही भलाई है, क्योंकि बेटे की वापसी का पुलिस को बाद में पता चलेगा, तो वे कई तरह के सवाल पूछेंगे. इसलिए मुकेश ने अपहर्त्ताओं से हुई सारी बात पुलिस को बता दी.

पुलिस अधिकारियों ने आपस में बातचीत कर फैसला किया कि मुकेश को 8 लाख रुपए एक बैग में ले कर तय जगह पर भेजा जाए. इस दौरान पुलिस दूर से निगरानी करती रहेगी. अपहर्त्ता जब पैसों का बैग लेने आएंगे, तो उन्हें वहीं से पकड़ लिया जाएगा. उस रात तय समय और तय जगह पर मुकेश ने 8 लाख रुपयों से भरा बैग रख दिया. कहा जाता है कि इस दौरान आसपास पुलिस निगरानी कर रही थी. इस के बावजूद अपहर्त्ता पैसों का वह बैग ले गए और पुलिस को कुछ पता नहीं चल सका. इधर, पैसों का बैग तय जगह पर छोड़ आने के बाद मुकेश और उस के घरवाले आदित्य के घर लौटने का इंतजार करते रहे. हरेक आहट पर उन की नजरें घर के गेट पर टिक जातीं.

घर में मौजूद एक भी आदमी सो नहीं सका. पूरी रात बेचैनी से गुजर गई, लेकिन आदि नहीं आया. मुकेश समझ नहीं पा रहे थे कि बेटा आदि वापस क्यों नहीं आया? अपहर्त्ताओं ने अपना वादा क्यों नहीं निभाया? क्या अपहर्त्ताओं को 8 लाख रुपए कम लगे या उन्होंने आदि को मार डाला? 17 अक्तूबर को आदित्य का अपहरण हुए तीसरा दिन हो गया था. पैसे भी चले गए थे और बेटा भी वापस नहीं आया तो मुकेश अपहर्त्ताओं के मोबाइल नंबर पर काल करने की कोशिश करते रहे, लेकिन वह नंबर नहीं मिल रहा था. मुकेश के साथ उन की पत्नी और बेटी मायूस हो गए. उन की आंखों से आंसू सूखने का नाम ही नहीं ले रहे थे. अब तो केवल अपहर्त्ताओं के फोन पर ही उम्मीद टिकी हुई थी.

पुलिस को भी मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लेने के बावजूद अपहर्त्ताओं का पताठिकाना नहीं मिल पाया था. अधिकारियों को इस बात पर भी ताज्जुब हो रहा था कि अपहर्त्ता मौके पर मौजूद पुलिस वालों को चकमा दे कर रकम से भरा बैग ले कर कैसे और कब निकल गए? जांचपड़ताल में मिले कुछ सुराग के आधार पर पुलिस ने 17 अक्तूबर की रात एक शराब की दुकान के पास 3 लोगों को नशे की हालत में पकड़ा. इन में राहुल उर्फ मोनू विश्वकर्मा, मलय राय और करण जग्गी शामिल थे. ये तीनों जबलपुर के अधारताल थाना इलाके के महाराजपुर के रहने वाले थे. पुलिस ने इन से सख्ती से पूछताछ की, तो आदित्य के अपहरण का मामला खुल गया. पूछताछ के दौरान पुलिस अधिकारियों को उस समय गहरा झटका लगा, जब राहुल और मलय ने बताया कि आदि को अपहरण के दूसरे ही दिन यानी 16 अक्तूबर को ही मार दिया था.

आदि को मारने का कारण रहा कि उस ने एक अपहर्त्ता राहुल को मास्क हटने पर पहचान लिया था. राहुल मुकेश लांबा को अच्छी तरह जानता था और उन के घर कई बार आजा चुका था. अपहर्त्ताओं ने 16 अक्तूबर को मुकेश से आदि की जो बात कराई थी, वह मोबाइल में रिकौर्ड की हुई थी. आदि को वे उस से पहले ही मार चुक थे. अपहर्त्ताओं की निशानदेही पर पुलिस ने 18 अक्तूबर, 2020 को पनागर के पास जलगांव नहर से आदि का शव बरामद कर लिया. उस के मुंह पर गमछा बंधा हुआ था. शव बरामद होने के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों का अधारताल इलाके में जुलूस निकाला.

उसी दिन पुलिस हिरासत में मुख्य आरोपी राहुल विश्वकर्मा की तबियत बिगड़ गई. पुलिस ने उसे अस्पताल में भरती कराया, लेकिन कुछ समय बाद ही उस की मौत हो गई. आरोपियों से पुलिस की पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

राहुल और मलय दोस्त थे. राहुल मोबाइल इंजीनियर था. वह एक मोबाइल की दुकान पर काम करता था. वह मौका मिलने पर लूट, चोरी आदि भी करता था. मलय भी अपराधी किस्म का युवक था. वह भी चोरीलूट जैसे अपराध करता था. लौकडाउन में कामधंधे बंद होने से इन दोनों के सामने भी पैसों का संकट आ गया. राहुल पर पहले से ही लोगों की उधारी चढ़ी हुई थी. लौकडाउन में कर्ज और बढ़ गया. परेशान राहुल ने मलय के साथ मिल कर कोई बड़ा हाथ मारने की योजना बनाई. राहुल ने उसे बताया कि वह धनवंतरी नगर के रहने वाले माइनिंग कारोबारी मुकेश लांबा को जानता है. उन के पास मोटी दौलत है. वह कई बार उन के घर भी आजा चुका है. उन के बेटे का अपहरण कर मोटी रकम वसूली जा सकती है.

मलय को यह बात जंच गई. दोनों ने सोचविचार के बाद इस योजना में अपने एक अपराधी दोस्त करण जग्गी को भी शामिल कर लिया. तीनों ने योजना बना कर मुकेश लांबा के घर की रैकी करनी शुरू की. इस के लिए राहुल ने अपने दोस्त से जरूरी काम के लिए कार मांग ली थी. 15 अक्तूबर, 2020 की शाम जब वे तीनों स्विफ्ट कार से मुकेश के घर की रैकी करने आए तो राहुल को आदित्य नजर आ गया. उन्होंने उसी समय उन्होंने आदी का अपहरण कर लिया. योजना के तहत ही राहुल व मलय ने आदि के अपहरण से 3 दिन पहले 12 अक्तूबर को बेलखाडू में एक आदमी से मोबाइल लूटा था.

इसी मोबाइल नंबर से वे मुकेश लांबा और उस की पत्नी को फोन कर फिरौती मांगते रहे. चूंकि राहुल मोबाइल इंजीनियर था, इसलिए उस ने उस मोबाइल में ऐसी कारस्तानी कर दी कि पुलिस उस की लोकेशन ट्रेस नहीं कर पा रही थी. 16 अक्तूबर को राहुल के चेहरे से मास्क हट गया तो आदि ने उसे पहचान लिया और कहा कि अंकल आप तो हमारे घर आतेजाते हो. आदि की ये बातें सुन कर राहुल और उस के साथियों ने सोचा कि पैसा ले कर इसे छोड़ दिया तो यह हमें पकड़वा देगा. इसलिए उन्होंने उसी दिन गमछे से गला घोंट कर आदि की हत्या कर दी. इस के बाद जलगांव नहर में उस का शव फेंक आए.

अपराधी इतने शातिर रहे कि आदि की हत्या के बाद भी उस के पिता से फिरौती मांगते रहे. हत्या से पहले उन्होंने आदि की आवाज मोबाइल में रिकौर्ड कर ली थी. यही रिकौर्डिंग अपहर्त्ताओं ने 16 अक्तूबर को मुकेश को सुनवाई थी. राहुल और मलय 16 अक्तूबर की रात पुलिस को चकमा दे कर पनागर मार्ग पर नाले के पास मुकेश की ओर से रखे गए 8 लाख रुपए का बैग भी ले गए. अगले दिन उन्होंने अपने तीसरे साथी करण से कहा कि बच्चा भाग गया. इस कारण पैसा नहीं मिल सका. यह झूठ बोल कर राहुल और मलय ने 8 लाख रुपए का आपस में बंटवारा कर लिया.

आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने 7 लाख 66 हजार रुपए और अपहरण व शव फेंकने के काम ली गई 2 कार, एक बाइक और एक स्कूटी जब्त कर ली. इस के अलावा 12 अक्तूबर को लूटे गए मोबाइल सहित 2 अन्य मोबाइल भी बरामद कर लिए. मुख्य आरोपी 30 वर्षीय राहुल की पुलिस हिरासत में तबीयत बिगड़ने और बाद में अस्पताल में मौत हो जाने के मामले में सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए. 3 डाक्टरों के पैनल ने प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रैट उमेश सोनी की मौजूदगी में राहुल के शव का पोस्टमार्टम किया. इस दौरान वीडियोग्राफी भी कराई गई.

पोस्टमार्टम के बाद मजिस्ट्रैट ने राहुल के बड़े भाई सोनू विश्वकर्मा और दूसरे घर वालों के बयान दर्ज किए. राहुल का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया. राहुल के भाई का कहना था कि पुलिस ने कानून अपने हाथ में लिया और पिटाई से उस की मौत हुई. आदि के अपहरण-मौत के मामले में पुलिस पर लापरवाही के आरोप लगे हैं. तमाम सूचनाएं दिए जाने के बावजूद पुलिस अपहर्त्ताओं की लोकेशन ट्रेस नहीं कर सकी. अपराधी पुलिस की मौजूदगी में ही फिरौती के 8 लाख रुपए ले गए. आदि को तलाश करने के बजाय पुलिस उस के अपहरण के दूसरे दिन जबलपुर आए डीजीपी की अगवानी में जुटी रही.

इस वारदात के विरोध में 18 अक्तूबर को धनवंतरी नगर व्यापारी संघ और महाराणा प्रताप मंडल के नेताओं ने मार्केट बंद कर सांकेतिक धरना प्रदर्शन भी किए. मासूम आदि की मौत से उस के घर की सारी खुशियां छिन गई हैं. पिता की भविष्य की उम्मीदें चकनाचूर हो गईं. मां सुमन रात को सोते हुए बैठ जाती है और उसी समय बेटे के लिए दहाड़ें मार कर रोती है. बहन रितु अब किसे राखी बांधेगी? एक अपराधी तो चला गया. हालांकि उस की मौत के कारणों की जांच हो रही है. लेकिन दूसरे अपराधियों को कानून क्या सजा देगा. Crime News

अमीर बनने की चाहत

अमीर बनने की चाहत – भाग 4

29 नवंबर को रविवार था. जयकरन को मैच खेलने जरूर आना था. इसी दिन उन्होंने जयकरन का अपहरण करने का फैसला कर लिया. उन्होंने सोच लिया कि जयकरन को वे अपने किड्स स्कूल के क्वार्टर में ही ले जाएंगे. उस दिन किड्स स्कूल भी बंद था, इसलिए जयकरन को उन्होंने वहां रखने की सोची. रोजाना की भांति वे जयकरन से मिले. जयकरन दोपहर में क्रिकेट खेल कर घर जाने लगा तो दीपक ने उसे अपने पास बुलाया, “जयकरन, आओ हमारे साथ. अभी 20 मिनट में वापस आते हैं.”

“कहां जा रहे हो भैया?”

“अभी थोड़ा घूम कर आते हैं. हमें किसी से पैसे लेने हैं. साथ ही घूमना भी हो जाएगा. आज तो वैसे भी संडे है. तुम भी फ्री हो.” संदीप ने बात घुमाते हुए कहा.

जयकरन उन पर भरोसा करता था. वैसे भी वह बच्चा था. आने वाले खतरे से अनजान जयकरन उन के साथ कार में बैठ गया. इत्तफाक से उन्हें किसी ने नहीं देखा. दीपक उसे ले कर सीधे स्कूल के अंदर क्वार्टर पर पहुंचा. कमरे में पहुंचते ही दीपक व संदीप अपनी असलियत पर आ गए.

जयकरन को दहशतजदा करने के लिए उन्होंने उसे पीटना शुरू कर दिया और उसे बता दिया कि पैसे के लिए उन्होंने उस का अपहरण किया है. जयकरन ‘भैया…भैया’ करता रहा, लेकिन उन्होंने डरेसहमे जयकरन के हाथपैर बांध दिए. उस का मोबाइल छीन कर उन्होंने स्विच्ड औफ कर दिया. अनीता घर पहुंची तो यह देख कर उन्होंने विरोध किया.

तब दीपक मां से दुव्र्यवहार पर उतर आया, “इस मामले में बहस मत करो मां, वरना इस के साथ तुम्हें भी गोली मार दूंगा. मैं यह सब करने के लिए मजबूर हूं. बस तुम लोग एक 2 दिन चुपचाप रहो.”

बेटे के इस रवैए से अनीता भी घबरा गई. दीपक ने सब से छोटे भाई आयुष को डरधमका दिया. जयकरन को घर में छोड़ कर दोनों सोसाइटी चले गए. वहां जयकरन की ढूंढ़ मची तो वे भी ङ्क्षचतित हो कर उसे खोजने का ढोंग करने लगे. उधर रात में बिट्टू ने जयकरन को खाना खिलाया. जयकरन का मन तो नहीं था, लेकिन डर की वजह से उस ने खाना खा लिया.

अगली सुबह संदीप व दीपक स्कूल स्थित घर आ गए. दीपक ने जयकरन को धमकाते हुए समझाया, “एकदो दिन में हम तुम्हारी बात तुम्हारे पापा से कराएंगे.”

“ज…ज…जी भैया.” दहशत में आए जयकरन ने डर से हां में हां मिलाई.

“पता है क्या कहोगे?ï” दीपक ने पूछा तो जयकरन ने इनकार में गरदन हिलाई. इस पर दीपक ने उसे समझाया, “तुम कहना कि पापा अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो इन लोगों को 2 करोड़ रुपए दे दो, वरना ये लोग मुझे मार डालेंगे.”

“भैया, जैसा आप कहोगे, मैं वैसा ही कह दूंगा.” जयकरन ने डर कर जवाब दिया.

उस दिन सोमवार था. स्कूल भी खुलना था. जयकरन शोर न मचाए, इस के लिए दीपक ने नाश्ता करा कर उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. यह इंजेक्शन दीपक ने अपने एक दोस्त के माध्यम से 500 रुपए में खरीदा था. पुलिस मोबाइल के जरिए उन्हें पकड़ न सके, इसलिए उन्होंने अपने मोबाइल का इस्तेमाल नहीं किया.

बिट्टू को फिरौती के लिए फोन करने के लिए जयकरन का मोबाइल ले कर 15 किलोमीटर दूर भेजा गया. वहां से 2 करोड़ की फिरौती का फोन कर के वह वापस आ गया. बिट्टू से फोन कराना इसलिए जरूरी था, क्योंकि जयकरन के घर वाले दीपक व संदीप की आवाज पहचानते थे. तीनों ने तय कर लिया था कि उन्होंने फिरौती की रकम की शुरुआत 2 करोड़ से की है तो सौदेबाजी होने पर करोड़ तो मिल ही जाएंगे.

इस से भी ज्यादा खतरनाक योजना उन्होंने यह बनाई कि रकम मिलते ही वे जयकरन की हत्या के बाद लाश को हरिद्वार ले जा कर ठिकाने लगा देंगे. जयकरन चूंकि उन्हें पहचानता था, इसलिए उसे जिन्दा छोडऩा उन के लिए खतरनाक था. हरिद्वार में दीपक का एक चाचा रहता था. दीपक ने उसे भी फोन कर के इशारों से अपनी बात समझा दी थी.

रकम मिलने तक वह जयकरन को इसलिए जिन्दा रखना चाहते थे, ताकि विश्वास दिलाने के लिए उस के घर वालों से उस की बात कराई जा सके. उन्होंने यह भी सोच लिया था कि यदि रकम नहीं मिली तो भी जयकरन को मार देंगे. दोनों ही सूरतों में जयकरन का मरना तय था.

उधर फिरौती का फोन पहुंचते ही सोसायटी में पुलिस की गतिविधियां बढ़ गईं. शाम तक उन्होंने मौके की नजाकत परखने का निर्णय लिया. उन्हें दोबारा शाम को फोन करना था, इसलिए इंतजार करने लगे. इन लोगों ने अपनेअपने मोबाइल औफ कर लिए थे. उन्हें उम्मीद थी कि पुलिस जयकरन का मोबाइल दूसरी जगह इस्तेमाल करने की वजह से धोखा खा कर दिशा भटक जाएगी, लेकिन उन तक नहीं पहुंच पाएगी, यह उन की अपनी सोच थी. शक की बिनाह पर वह शिकंजे में आ गए.

उधर पूछताछ के बाद स्कूल संचालिका व आरोपियों की मां को छोड़ दिया गया. स्कूल में क्या कुछ चल रहा था, रिचा सूद वाकई इस से पूरी तरह अंजान थीं. पुलिस ने अपहरण में प्रयुक्त कार भी बरामद कर ली. अगले दिन यानी 1 दिसंबर को प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस ने संदीप को डिस्चार्ज करा लिया.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अपने से बड़ी उम्र के युवकों से दोस्ती करने की आदत ही जयकरन को भारी पड़ गई थी. वहीं दीपक, संदीप व बिट्टू ने राह से भटकने के बजाय मेहनत की राह अपना कर जिंदगी को संवारने की कोशिश की होती तो उन का भविष्य चौपट होने से बच जाता.

कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में थे और उन की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस दीपक के चाचा की तलाश कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अमीर बनने की चाहत – भाग 3

इंसान की ख्वाहिशें आसमान को छूती हों तो उसे अपनी प्रगति बहुत छोटी नजर आती है. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह अपने काम से संतुष्ट नहीं था. उस के पास अपनी एक सैकेंड हैंड कार थी. इसी दौरान उस की दोस्ती संदीप से हो गई. संदीप मूलरूप से मेरठ जनपद के कस्बा लावड़ का रहने वाला था और गाजियाबाद में किराए पर रहता था. वह एक इंस्टीट्यूट में बच्चों को कोङ्क्षचग देता था. वह भी अमीर बनने के सपने देखता था.

2 इंसानों की सोच यदि समान हों तो उन के ताल्लुकात गहरे होते देर नहीं लगती. दीपक व संदीप की दोस्ती भी वक्त के साथ गहरा गई. दोनों जब भी साथ बैठते, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की बात करते. दीपक अपनी प्लेसमेंट एजेंसी खोलना चाहता था. जबकि संदीप की ख्वाहिश थी कि उस का अपना कोङ्क्षचग सैंटर हो. इन कामों के लिए मोटी रकम चाहिए थी, लेकिन दोनों में से किसी के पास पैसा नहीं था. कमउम्र में ही वे बड़ी महत्वाकांक्षाओं के शिकार थे.

एक दिन दोनों साथ बैठे तो दीपक बोला, “कभी हमारे भी सुनहरे दिन आएंगे क्या?”

“इतना सीरियस क्यों है भाई, यह तो इंसान के अपने हाथ में है.” संदीप ने शांत लहजे में कहा तो दीपक मन मसोसते हुए बोला, “अपने हाथ में होता तो कब का बड़ा आदमी बन जाता. कभीकभी मन करता है कि कोई बड़ा हाथ मार कर एक ही झटके में जिंदगी संवार दूं.”

“अब की है तूने काम की बात. सोचता तो मैं भी यही हूं. तू कहे तो कुछ ऐसा करें, जिस से सारे संकट जड़ से मिट जाएं.”

संदीप ने कहा तो दीपक बोला, “दोनों मिल कर कुछ बड़ा प्लान करते हैं. इस शहर में बड़ेबड़े रईस हैं, वे किस काम आएंगे.”

“वे क्या हमें आ कर पैसा देंगे?” संदीप ने पूछा.

“बिलकुल देंगे, लेने का हुनर आना चाहिए.”

“मतलब?”

“इतना भोला भी मत बन, अरे जब हम किसी के जिगर के टुकड़े को कब्जे में लेंगे, तो वह खुद ही तो आ कर पैसा देगा.”

दीपक का आशय समझते ही संदीप की आंखों में चमक आ गई.

“ठीक है, कुछ ऐसा प्लान करते हैं कि किसी का अपहरण कर के मोटी रकम वसूल कर ली जाए.”

“इस के लिए हमें बहुत सोचना होगा.” संदीप ने कहा.

उस दिन के बाद दोनों का फितरती दिमाग सरपट दौडऩे लगा. अगले कुछ दिनों में ही दोनों ने किसी रईस आदमी के बच्चे का अपहरण करने की योजना बना ली. दोनों इस काम को बेहद चतुराई से करना चाहते थे. वे क्राइम के सीरियलों और ऐसी फिल्मों के शौकीन थे, जिन की पटकथा पुलिस को चौंका देने वाली होती थी. शहर के बारे में उन्हें अच्छी जानकारी थी.

उन दोनों ने अपने शिकार की तलाश के लिए वीवीआईपी सोसाइटी का चुनाव कर लिया. योजना के तहत उन्होंने अगस्त महीने में वहां फ्लैट किराए पर ले लिया. इस दौरान दोनों अपना कामधंधा छोड़ कर भविष्य के सपने बुनने लगे. उन के पास अब आमदनी का कोई जरिया नहीं था. दोनों कमउम्र में ही अंजाम की परवाह किए बिना गलत राह पर चल निकले थे.

संदीप अपने घर से आजाद था, जबकि दीपक अपनी मां के नियंत्रण से बाहर था. सोसायटी में रहते हुए उन्होंने अपने सौफ्ट टारगेट की तलाश शुरू कर दी. वे घूमतेफिरते और मैदान में जा कर बच्चों का क्रिकेट देखते और उन के साथ खुद भी क्रिकेट खेलते. जयकरन को क्रिकेट का जुनून था. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त क्रिकेट में ही बीतता था. जयकरन किशोर था, लेकिन वह अपने से बड़ी उम्र के लडक़ों से भी दोस्ती करने का इच्छुक रहता था.

क्रिकेट के मैदान में ही उस की मुलाकात दीपक व संदीप से हुई. इस के बाद उन की अकसर बातेंमुलाकातें होने लगीं. कुछ ही दिनों में बातोंबातों में दोनों ने जयकरन का फैमिलीग्राउंड जान लिया. उम्र का बड़ा फांसला होने के बावजूद तीनों दोस्त बन गए.

दीपक व संदीप को जयकरन सब से अच्छा शिकार लगा. उन्हें लगा कि उस के पिता शेयर कारोबारी हैं और मां डाक्टर, इसलिए वे मुंहमांगी मोटी रकम दे देंगे. इस बात को दिमाग में रख कर उन्होंने जयकरन से मेलजोल बढ़ाया और बाद में उस के सहारे उस के घर में भी एंट्री कर ली.

अपनी मीठीमीठी बातों और भोलेपन के नाटक से उन्होंने विवेक व अमिता से भी मुलाकात कर ली. कालोनी के अन्य लोगों से भी वे घुलमिल कर रहते थे. वे नहीं चाहते थे कि उन पर किसी को जरा भी शक हो. दरअसल वे अपना काम पूरी प्लानिंग के साथ करना चाहते थे. कुछ इस तरह की पुलिस उन की परछाईं भी न छू सके.

दीपक व संदीप की नजरों में सोसाइटी के यूं तो कई बच्चे थे. लेकिन उन्होंने मन ही मन सोच लिया कि जयकरन को विश्वास में ले कर आसानी से उस का अपहरण किया जा सकता है. दोनों ने विचारविमर्श कर के तय कर लिया कि एक दिन वे जयकरन का अपहरण कर के उस के पिता से फिरौती की मोटी रकम वसूल करेंगे. वे इस बारे में दिनरात सोचते रहते थे.

बड़ा भाई किसी आदर्श की तरह होता है. दीपक को भी मेहनत, लगन और ईमानदारी की ङ्क्षजदगी से अपने छोटे भाइयों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था, लेकिन हुआ इस का उलटा. उस ने बिट्टू को भी अपनी प्लानिंग बता कर उसे अपने साथ मिला लिया.

इस दौरान उन्होंने एक बदमाश के माध्यम से 3 अवैध पिस्तौलों का इंतजाम भी कर लिया. दीपक ने अपने मोबाइल पर वाट्सएप का एक ग्रुप बना रखा था, जिस में जयकरन व कालोनी के कुछ अन्य किशोर भी शामिल थे. दीपक ने यह सब भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने के लिए किया था.

अमीर बनने की चाहत – भाग 2

इस सनसनीखेज मामले की जांच में तत्परता दिखाना बहुत जरूरी था. क्योंकि अपहर्ता जयकरन को नुकसान पहुंचा सकते थे. दोपहर होतेहोते पुलिस को जयकरन के मोबाइल की काल डिटेल्स भी मिल गई. उस से पता चला कि उस की अंतिम लोकेशन दिल्ली-मेरठ रोड स्थित औद्योगिक क्षेत्र में थी. इस के बाद मोबाइल बंद हो गया था.

जबकि जयकरन के मोबाइल से फिरौती के लिए जो काल की गई थी, वह वहां से करीब 15 किलोमीटर दूर गालंद क्षेत्र से की गई थी. मोबाइल से सिर्फ एक वही काल हुई थी. इस के बाद मोबाइल बंद कर दिया गया था. इस का मतलब अपहर्ता बेहद चालाक थे. उन्होंने फिरौती के लिए न सिर्फ जयकरन के फोन का इस्तेमाल किया था, बल्कि स्थान भी बदल दिया था. संदिग्ध गतिविधियों के चलते पुलिस ने दीपक को रडार पर ले लिया.

उस के मोबाइल की जांच से पता चला कि वह मोदीनगर क्षेत्र का रहने वाला था. जांच के दौरान यह बात भी पता चली कि वह अपनी मां के साथ राजनगर स्थित छोटे बच्चों के रौयल किड्स प्ले स्कूल में रहता था. उस की मां चूंकि स्कूल में ही कर्मचारी थी, इसलिए इस परिवार को स्कूल में रहने के लिए जगह मिली हुई थी.

पुलिस को दीपक के 2 और नजदीकियों के ठिकाने पता चले. इन में एक था संदीप. उस के मोबाइल की लोकेशन जयकरन के मोबाइल की लोकेशन से मैच हो रही थी. संदीप के बारे में पुलिस तत्काल कोई खास जानकारी नहीं जुटा सकी. शक में मजबूती आते ही पुलिस सतर्क हो गई. अगर दीपक ही अपहर्ता था तो यह भी संभव था कि उस ने जयकरन को स्कूल स्थित घर पर ही छिपा कर रखा हो.

पुलिस अधिकारियों ने आपस में विचारविमर्श कर के अविलंब स्कूल में दबिश डालने का निर्णय लिया. एसपी अजयपाल शर्मा के नेतृत्व वाली टीम रौयल किड्स स्कूल पहुंची. उस वक्त दोपहर के 3 बजे थे. स्कूल के बच्चों की छुट्टी हो चुकी थी. अचानक पुलिस को वहां आया देख स्कूल की संचालिका रिचा सूद सकते में आ गईं. पुलिस को दीपक की मां अनीता भी वहीं मिल गईं. दीपक के बारे में पूछताछ करने पर वह बुरी तरह घबरा गईं.

“दीपक कहां है?” पुलिस ने पूछा.

“घर पर.” बताते हुए उस ने स्कूल कैंपस में पीछे की तरफ इशारा कर के बताया. वहां क्वार्टर बना हुआ था. पुलिस दनदनाती हुई वहां पहुंची तो वहां पहुंचते ही वह हुआ, जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. घर के अंदर से अचानक गोलियां चलनी शुरू हो गईं.

संभवत: क्वार्टर में मौजूद लोगों को अपनी घेराबंदी का अंदाजा हो गया था. इस पर पुलिसकॢमयों ने भी हथियार थाम कर पोजीशन ले ली. कुछ मिनटों तक दोनों तरफ से रुकरुक कर कई राउंड गोलियां चलीं. इस से आसपास के क्षेत्र में दहशत फैल गई और लोग एकत्र हो गए. पुलिसकॢमयों की निगाहें क्वार्टर पर जमी थीं. तभी ट्रैक सूट पहने एक युवक ने तेजी से क्वार्टर का दरवाजा खोला और बिजली जैसी फुरती से फायरिंग करता हुआ भागा. पुलिस ने उसे चेतावनी दी, “रुक जाओ, वरना गोली मार देंगे.”

युवक ने एक पल के लिए पीछे पलट कर देखा और फिर भागने लगा. इस पर पुलिस ने एक गोली उस के बाएं पैर पर दाग दी. गोली लगते ही वह नीचे गिर गया. उस के गिरते ही पुलिसकॢमयों ने उसे घेर लिया. पुलिस को उम्मीद थी कि वह दीपक होगा, लेकिन उस ने अपना नाम संदीप बताया.

“जयकरन कहां है?” जवाब में उस ने घर की तरफ इशारा कर दिया. पुलिस हथियार तान कर घर के अंदर दाखिल हुई, तो भौचक्की रह गई. पिस्टल से लैश 2 और युवक वहां मौजूद थे. लेकिन वह घबराए हुए थे. जयकरन एक कोने में बैठा थरथर कांप रहा था. उस के हाथपैर बंधे हुए थे.

पुलिस ने दोनों युवकों को गिरफ्त में ले कर जयकरन को बंधनमुक्त कराया. अपहर्ताओं को गिरफ्तार कर के जयकरन को सकुशल बरामद करना पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी थी. मौके से गिरफ्तार किए गए दोनों युवकों में एक दीपक व दूसरा उस का छोटा भाई बिट्टू था. उन के कब्जे से पुलिस ने तीन पिस्टल, उन के मोबाइल व जयकरन का मोबाइल भी बरामद कर लिया. बेटे की बरामदगी की सूचना पर विवेक महाजन और उन की पत्नी भी मुठभेड़स्थल पर आ गए. जयकरन बहुत डरासहमा था. इस बीच पुलिस घायल युवक संदीप को अस्पताल ले गई.

पुलिस दीपक व बिट्टू को थाने ले आई. पुलिस ने डरीसहमी स्कूल संचालिका रिचा सूद, दीपक की मां अनीता और उस के सब से छोटे भाई आयुष को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस द्वारा गिरफ्तार युवकों व घायल संदीप से विस्तृत पूछताछ की गई तो राह से भटके युवाओं द्वारा रचित अपराध की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

दीपक का प्लेसमेंट एजेंसी का कमीशन पर आधारित काम था. उस के परिवार में मां अनीता के अलावा उस के छोटे भाई बिट्टू व आयुष थे. दीपक के पिता की वर्षों पहले मृत्यु हो गई थी. अनीता मेहनती और हिम्मती महिला थीं. उन्होंने परिवार को चलाने के लिए छोटीमोटी नौकरियां कर के बेटों को इस उम्मीद में पढ़ायालिखाया कि वे जिम्मेदारियां उठा कर घर को संभाल लेंगे. लेकिन इंसान सोचता कुछ है और होता कुछ और है.

अनीता ने आॢथक तंगियां भी देखी थीं और जमाने की कठोरता भी. वह मोदीनगर की भूपेंद्र कालोनी में रहती थीं. बाद में उन्होंने रौयल किड्स स्कूल में नौकरी कर ली थी. स्कूल परिसर में ही बने क्वार्टर में उन के रहने का भी इंतजाम हो गया तो वह तीनों बेटों के साथ वहां चली आईं. वहां आ कर दीपक ने एक कंपनी में कमीशन के आधार पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह काम उसे छोटा लगता था.

अमीर बनने की चाहत – भाग 1

उत्तर प्रदेश के जनपद गाजियाबाद के पौश इलाके राजनगर एक्सटेंशन की वीवीआईपी सोसाइटी में 30 नवंबर, 2015 की सुबह हडक़ंप मचा हुआ था. इस की वजह वह थी कि इस सोसाइटी में रहने वाले कारोबारी विवेक महाजन का बेटा रहस्यमय ढंग से गायब हो गया था. दरअसल उन का 13 वर्षीय बेटा जयकरन 29 नवंबर की दोपहर सोसाइटी में ही बने मैदान में खेलने के लिए गया था.

इसी बीच वह लापता हो गया था. जब वह शाम तक घर नहीं पहुंचा तो घर वालों को चिंता हुई. चिंता के बादल तब और गहरे हो गए, जब यह पता चला कि जयकरन का मोबाइल भी स्विच्ड औफ है. परिचितों और जयकरन के दोस्तों के यहां भी उस की खोजबीन की जा चुकी थी. लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं लग पा रहा था. थकहार कर विवेक महाजन ने स्थानीय थाना सिंहानी गेट में बेटे की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस ने उन्हें नातेरिश्तेदारों के यहां खोजबीन करने की सलाह दे कर जयकरन का फोटो और हुलिया नोट कर लिया था.

विवेक महाजन के परिवार में पत्नी अमिता के अलावा 2 ही बच्चे थे, बेटी संस्कृति और बेटा जयकरन. अमिता पेशे से डाक्टर थीं, उन का अपना नैचुरोपैथी क्लिनिक था. जयकरन शहर के ही एक पब्लिक स्कूल में कक्षा 8 में पढ़ रहा था. उस के लापता होने से अनहोनी की आशंकाएं जन्म ले रही थीं. पूरी रात जयकरन का इंतजार होता रहा. लेकिन न तो वह आया और न ही उस के मोबाइल पर संपर्क हो सका. चिंताओं के बीच किसी तरह रात बीत गई. 30 नवंबर की सुबह सूरज की रेशमी किरणों से नई उम्मीदों का उजाला तो हुआ, लेकिन महाजन परिवार की उदासी और परेशानी ज्यों की त्यों बनी रही.

करीब सवा 10 बजे अमिता के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने बुझे मन से मोबाइल की स्क्रीन को देखा तो उस पर जयकरन का नंबर डिस्प्ले हो रहा था. उन्होंने झट से फोन का बटन दबा कर के कान से लगाया, “ह…ह…हैलो जयकरन बेटा, कहां है तू?”

“घबराओ नहीं डाक्टर साहिबा, जयकरन हमारे पास सलामत है.” किसी अनजबी की आवाज सुन कर अमिता के दिल की धडक़नें बढ़ गईं और आवाज गले में अटक सी गई, “अ…अ…आप कौन, मेरा बेटा कहां है? उस से मेरी बात कराइए.” अमिता ने कहा.

लेकिन फोन करने वाला ठंडे लहजे में बोला, “इतनी भी क्या जल्दी है, बेटे से बात करने की. अभी एक ही रात के लिए तो दूर हुआ है. बाई द वे वह बिल्कुल ठीक है. हम पूरा खयाल रख रहे हैं उस का.”

कुछ पल रुक कर उस ने आगे कहा, “रही हमारी बात तो इतना बताना ही काफी है कि आप लोग फटाफट 2 करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो. जैसे ही 2 करोड़ दे दोगे, बेटा तुम्हें मिल जाएगा.”

यह सुन कर अमिता के होश उड़ गए. वह समझ गईं कि उन के बेटे का अपहरण हुआ है. वह गिड़गिड़ाईं, “देखो प्लीज, तुम मेरे बेटे को छोड़ दो.”

उन की बेबसी पर फोनकर्ता ने पहले ठहाका लगाया, फिर वह कठोर लहजे में बोला, “कहा तो है छोड़ देंगे. तुम रकम का इंतजाम करो. हम तुम्हें दोबारा फोन करेंगे.” थोड़ा रुक कर वह आगे बोला, “और हां, पुलिस को फोन करने की गलती कतई मत करना, वरना तुम्हारा बेटा टुकड़ों में मिलेगा.”

“तुम लोग गलत कर रहे हो. हम पर रहम करो, प्लीज मेरे बेटे को छोड़ दो.”

अमिता ने कहा तो दूसरी ओर से फोन कट गया. उन्होंने काल बैक की, लेकिन तब तक मोबाइल फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

जयकरन के अपहरण की बात से महाजन परिवार में कोहराम मच गया. सोसाइटी के लोग भी एकत्र हो गए. विवेक महाजन ने इस की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस विभाग तुरंत हरकत में आ गया. मामला एक हाईप्रोफाइल कारोबारी के बच्चे के अपहरण का था, लिहाजा कुछ ही देर में थानाप्रभारी रणवीर ङ्क्षसह विवेक महाजन के घर पहुंच गए. बाद में एसएसपी धर्मेंद्र यादव, एसपी (सिटी) अजयपाल शर्मा व सीओ विजय प्रताप यादव भी वहां आ गए.

यह बात पूरी तरह साफ हो गई थी कि जयकरन का अपहरण फिरौती के लिए किया गया था. अपहर्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. ऐसे में पुलिस के सामने जयकरन को बचाना बड़ी चुनौती थी. मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा व डीआईजी आशुतोष कुमार ने सतर्कता के साथ अविलंब काररवाई निर्देश दिए.

एसएसपी धर्मेंद्र यादव ने जयकरन की सकुशल रिहाई के लिए एसपी अजयपाल शर्मा के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम में थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच के प्रभारी अवनीश गौतम व उन की टीम को भी शामिल किया गया.

इस बीच पुलिस ने जयकरन की गुमशुदगी को अपहरण में तरमीम कर के अज्ञात अपहर्ताओं के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया था. पुलिस ने जयकरन का मोबाइल नंबर ले कर सॢवलांस पर लगा दिया. पुलिस को उम्मीद थी कि सीसीटीवी की मदद से संभवत: कोई ऐसा सुराग मिल जाएगा, जिस से यह पता चल जाएगा कि जयकरन को कालोनी के बाहर कब और कैसे ले जाया गया. लेकिन पुलिस की यह उम्मीद तब टूट गई, जब पता चला कि वीवीआईपी सोसाइटी में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हैं.

इस बीच पुलिस इतना अंदाजा जरूर लगा चुकी थी कि जयकरन के अपहरण में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ है, जिसे वह पहले से जानता रहा होगा. क्योंकि अगर उसे जबरन ले जाया गया होता तो शोरशराबा होता या घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी मिल जाता.

पुलिस ने जयकरन के घर वालों और अन्य लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई ऐसा सुराग नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस आगे बढ़ पाती. पुलिस ने जयकरन के दोस्तों और सोसाइटी के संदिग्ध लोगों के बारे में पूछताछ की तो एक चौंकाने वाली जानकारी मिली. एक व्यक्ति ने बताया, “सर, 2 लडक़े हैं जो अब नहीं दिख रहे. वे दोनों जयकरन के दोस्त भी हैं.”

“कौन हैं वे?” पुलिस अधिकारी ने पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया, “दीपक और संदीप. दोनों सोसाइटी में ही किराए पर अकेले रहते हैं. रात और सुबह 9 बजे तक तो दोनों यहीं पर थे, लेकिन अब नहीं दिख रहे हैं.”

यह पता चलने पर पुलिस उन दोनों के फ्लैट पर पहुंची, लेकिन वहां ताला लटका हुआ था. इस से पुलिस को उन पर थोड़ा शक हुआ. उन के बारे में ज्यादा कोई कुछ नहीं जानता था. बस इतना ही पता चला कि वे दोनों 2 महीने पहले ही सोसाइटी में रहने के लिए आए थे. दोनों बहुत मिलनसार थे और बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते थे. जयकरन को चूंकि क्रिकेट का बहुत शौक था, इसलिए उस की उन से अच्छी जानपहचान थी.

“वे दोनों काम क्या करते थे?”

“नहीं पता सर.”

पुलिस के शक की सूई उन दोनों के इर्दगिर्द घूमने लगी. तभी एक युवक ने अपना मोबाइल आगे बढ़ाते हुए कहा, “यह देखिए सर, दीपक का फोटो.” फोटो पर नजर पड़ते ही एसपी अजयपाल शर्मा चौंके. उस में दीपक अपने हाथ में अवैध पिस्टल लिए हुए था. दरअसल दीपक ने वह फोटो व्हाट्सएप ग्रुप में खुद ही पोस्ट की थी. पुलिस ने पहली नजर में ही ताड़ लिया कि पिस्टल अवैध थी. इस से पुलिस का शक उन दोनों पर और भी बढ़ गया. पुलिस ने पूछताछ कर के दीपक का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया.