Noida News : प्यार में फंसाया फिर किया अपहरण और मांगी 70 लाख की फिरौती

Noida News : गौरव हलधर डाक्टरी की पढ़ाई करतेकरते प्रीति मेहरा के जाल में ऐसा फंसा कि जान के लाले पड़ गए. डा. प्रीति को गौरव को रंगीन सपने दिखाने की जिम्मेदारी उस के ही साथी डा. अभिषेक ने सौंपी थी. भला हो नोएडा एसटीएफ का जिस ने समय रहते…

एसटीएफ औफिस नोएडा में एसपी कुलदीप नारायण सिंह डीएसपी विनोद सिंह सिरोही के साथ बैठे किसी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. तभी अचानक दरवाजा खुला और सामने वर्दी पर 3 स्टार लगाए एक इंसपेक्टर प्रकट हुए. उन्होंने अंदर आने की इजाजत लेते हुए पूछा, ‘‘मे आई कम इन सर.’’

‘‘इंसपेक्टर सुधीर…’’ कुलदीप सिंह ने सवालिया नजरों से आगंतुक की तरफ देखते हुए पूछा.

‘‘यस सर.’’

‘‘आओ सुधीर, हम लोग आप का ही इंतजार कर रहे थे.’’ एसपी कुलदीप सिंह ने सामने बैठे विनोद सिरोही का परिचय कराते हुए कहा,  ‘‘ये हैं हमारे डीएसपी विनोद सिरोही. आप के केस को यही लीड करेंगे. जो भी इनपुट है आप इन से शेयर करो फिर देखते हैं क्या करना है.’’

कुछ देर तक उन सब के बीच बातें होती रहीं. उस के बाद कुलदीप सिंह अपनी कुरसी से खड़े होते हुए बोले, ‘‘विनोद, मैं एक जरूरी मीटिंग के लिए मेरठ जा रहा हूं. आप दोनों केस के बारे में डिस्कस करो. हम लोग लेट नाइट मिलते हैं.’’

इस बीच उन्होंने एसटीएफ के एएसपी राजकुमार मिश्रा को भी बुलवा लिया था. कुलदीप सिंह ने उन्हें निर्देश दिया कि गौरव अपहरण कांड में अपहर्त्ताओं को पकड़ने में वह इस टीम का मार्गदर्शन करें. एसपी के जाते ही वे एक बार फिर बातों में मशगूल हो गए. सुधीर कुमार सिंह डीएसपी विनोद सिरोही और एएसपी मिश्रा को उस केस के बारे में हर छोटीबड़ी बात बताने लगे, जिस के कारण उन्हें पिछले 24 घंटे में यूपी के गोंडा से ले कर दिल्ली के बाद नोएडा में स्पैशल टास्क फोर्स के औफिस का रुख करना पड़ा था. इस से 2 दिन पहले 19 जनवरी, 2021 की बात है. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एसपी शैलेश पांडे के औफिस में सन्नाटा पसरा हुआ था. क्योंकि मामला बेहद गंभीर था और पेचीदा भी.

पड़ोसी जिले बहराइच के पयागपुर थाना क्षेत्र के काशीजोत की सत्संग नगर कालोनी के रहने वाले डा. निखिल हलधर का बेटा गौरव हलधर गोंडा के हारीपुर स्थित एससीपीएम कालेज में बीएएमएस प्रथम वर्ष का छात्र था. वह कालेज के हौस्टल में रहता था. गौरव 18 जनवरी की शाम तकरीबन 4 बजे से गायब था. इस के बाद गौरव को न तो हौस्टल में देखा गया न ही कालेज में. 18 जनवरी की रात को गौरव के पिता डा. निखिल हलधर के मोबाइल फोन पर रात करीब 10 बजे एक काल आई. काल उन्हीं के बेटे के फोन से थी, लेकिन फोन पर उन का बेटा गौरव नहीं था.

फोन करने वाले ने बताया कि उस ने गौरव का अपहरण कर लिया है. गौरव की रिहाई के लिए आप को 70 लाख रुपए की फिरौती देनी होगी. जल्द पैसों का इंतजाम कर लें, वह उन्हें बाद में फोन करेगा. डा. निखिल हलधर ने कालबैक किया तो फोन गौरव ने नहीं, बल्कि उसी शख्स ने उठाया, जिस ने थोड़ी देर पहले बात की थी. डा. निखिल ने बेटे से बात कराने के लिए कहा तो उस ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘‘डाक्टर, लगता है सीधी तरह से कही गई बात तेरी समझ में नहीं आती. तू क्या समझ रहा है कि हम तुझ से मजाक कर रहे हैं? अभी तेरे बेटे की लेटेस्ट फोटो वाट्सऐप कर रहा हूं देख लेना उस की क्या हालत है.

और हां, एक बात कान खोल कर सुन ले, यकीन करना है या नहीं ये तुझे देखना है. यह समझ लेना कि पैसे का इंतजाम जल्द नहीं किया तो बेटा गया तेरे हाथ से. ज्यादा टाइम नहीं है अपने पास.’’

अभी तक इस बात को मजाक समझ रहे निखिल हलधर समझ गए कि उस ने जो कुछ कहा, सच है. कुछ देर बाद उन के वाट्सऐप पर गौरव की फोटो आ गई, जिस में वह बेहोशी की हालत में था. जैसे ही परिवार को इस बात का पता चला कि गौरव का अपहरण हो गया है तो सब हतप्रभ रह गए. निखिल हलधर संयुक्त परिवार में रहते थे. उन के पूरे घर में चिंता का माहौल बन गया. बात फैली तो डा. निखिल के घर उन के रिश्तेदारों और परिचितों का हुजूम लगना शुरू हो गया. डा. निखिल हलधर शहर के जानेमाने फिजिशियन थे, शहर के तमाम प्रभावशाली लोग उन्हें जानते थे. उन्होंने शहर के एसपी डा. विपिन कुमार मिश्रा से बात की.

उन्होंने बताया कि गौरव गोंडा में पढ़ता था और घटना वहीं घटी है, इसलिए वह तुरंत गोंडा जा कर वहां के एसपी से मिलें. डा. निखिल हलधर रात को ही अपने कुछ परिचितों के साथ गोंडा रवाना हो गए. 19 जनवरी की सुबह वह गोंडा के एसपी शैलेश पांडे से मिले. शैलेश पांडे को पहले ही डा. निखिल हलधर के बेटे गौरव के अपहरण की जानकारी एसपी बहराइच से मिल चुकी थी. डा. निखिल हलधर ने शैलेश पांडे को शुरू से अब तक की पूरी बात बता दी. एसपी पांडे ने परसपुर थाने के इंचार्ज सुधीर कुमार सिंह को अपने औफिस में बुलवा लिया था. क्योंकि गौरव जिस एससीपीएम मैडिकल कालेज में पढ़ता था, वह परसपुर थाना क्षेत्र में था.

सारी बात जानने के बाद एसपी शैलेश पांडे ने कोतवाली प्रभारी आलोक राव, सर्विलांस टीम के इंचार्ज हृदय दीक्षित तथा स्वाट टीम के प्रभारी अतुल चतुर्वेदी के साथ हैडकांस्टेबल श्रीनाथ शुक्ल, अजीत सिंह, राजेंद्र , कांस्टेबल अमित, राजेंद्र, अरविंद व राजू सिंह की एक टीम गठित कर के उन्हें जल्द से गौरव हलधर को बरामद करने के काम पर लगा दिया. एसपी पांडे ने टीम का नेतृत्व एएसपी को सौंप दिया. पुलिस टीम तत्काल सुरागरसी में लग गई. पुलिस टीमें सब से पहले गौरव के कालेज पहुंची, जहां उस के सहपाठियों तथा हौस्टल में छात्रों के अलावा कर्मचारियों से जानकारी हासिल की गई. नहीं मिली कोई जानकारी मगर गौरव के बारे में पुलिस को कालेज से कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी.

इंसपेक्टर सुधीर सिंह डा. निखिल हलधर के साथ परसपुर थाने पहुंचे और उन्होंने निखिल हलधर की शिकायत के आधार पर 19 जनवरी, 2021 की सुबह भादंसं की धारा 364ए के तहत फिरौती के लिए अपहरण का मामला दर्ज कर लिया. एसपी शैलेश पांडे के निर्देश पर इंसपेक्टर सुधीर कुमार सिंह ने खुद ही जांच की जिम्मेदारी संभाली. साथ ही उन की मदद के लिए बनी 6 पुलिस टीमों ने भी अपने स्तर से काम शुरू कर दिया. चूंकि मामला एक छात्र के अपहरण का था, वह भी फिरौती की मोटी रकम वसूलने के लिए. इसलिए सर्विलांस टीम को गौरव हलधर के मोबाइल की काल डिटेल निकालने के काम पर लगा दिया गया.

मोबाइल की सर्विलांस में उस की पिछले कुछ घंटों की लोकेशन निकाली गई तो पता चला कि इस वक्त उस की लोकेशन दिल्ली में है. पुलिस टीमें यह पता करने की कोशिश में जुट गईं कि गौरव का किसी से विवाद या दुश्मनी तो नहीं थी. लेकिन ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली. गौरव और उस से जुड़े लोगों के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर ले लिया गया था. पुलिस की टीमें लगातार एकएक नंबर की डिटेल्स खंगाल रही थीं. गौरव के फोन की लोकेशन संतकबीर नगर के खलीलाबाद में भी मिली थी. पुलिस की एक टीम बहराइच तो 2 टीमें खलीलाबाद व गोरखपुर रवाना कर दी गईं. खुद इंसपेक्टर सुधीर सिंह एक पुलिस टीम ले कर दिल्ली रवाना हो गए.

20 जनवरी की सुबह दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने सर्विलांस टीम की मदद से उस इलाके में छानबीन शुरू कर दी, जहां गौरव के फोन की लोकेशन थी. लेकिन अब उस का फोन बंद हो चुका था इसलिए इंसपेक्टर सुधीर सिंह को सही जगह तक पहुंचने में कोई मदद नहीं मिली. इस दौरान गोंडा में मौजूद गौरव के पिता डा. निखिल हलधर को अपहर्त्ता ने एक और फोन कर दिया था. उस ने अब फिरौती की रकम बढ़ा कर 80 लाख कर दी थी और चेतावनी दी थी कि अगर 22 जनवरी तक रकम का इंतजाम नहीं किया गया तो गौरव की हत्या कर दी जाएगी.

दूसरी तरफ जब गोंडा एसपी शैलेश पांडे को पता चला कि दिल्ली पहुंची पुलिस टीम को बहुत ज्यादा कामयाबी नहीं मिल रही है तो उन की चिंता बढ़ गई. अंतत: उन्होंने एसटीएफ के एडीजी अमिताभ यश को लखनऊ फोन कर के गौरव अपहरण कांड की सारी जानकारी दी और इस काम में एसटीएफ की मदद मांगी. अमिताभ यश ने एसपी शैलेश पांडे से कहा कि वे अपनी टीम को नोएडा में एसटीएफ के औफिस भेज दें. एसटीएफ के एसपी कुलदीप नारायण गोंडा पुलिस की पूरी मदद करेंगे.

पांडे ने दिल्ली में मौजूद इंसपेक्टर सुधीर सिंह को एसटीएफ के एसपी कुलदीप नारायण से बात कर के उन के पास पहुंचने की हिदायत दी तो दूसरी तरफ एडीजी अमिताभ यश ने नोएडा फोन कर के एसपी कुलदीप नारायण सिंह को गौरव हलधर अपहरण केस की जानकारी दे कर गोंडा पुलिस की मदद करने के निर्देश दिए. यह बात 20 जनवरी की दोपहर की थी. गोंडा कोतवाली के इंसपेक्टर सुधीर सिंह नोएडा में एसटीएफ औफिस पहुंच कर एसपी एसटीएफ कुलदीप नारायण सिंह तथा डीएसपी विनोद सिरोही से मिले.

विनोद सिरोही बेहद सुलझे हुए अधिकारी हैं. उन्होंने अपनी सूझबूझ से कितने ही अपहरण करने वालों और गैंगस्टरों को पकड़ा है. उन्होंने उसी समय अपहर्त्ताओं को दबोचने के लिए इंसपेक्टर सौरभ विक्रम सिंह, एसआई राकेश कुमार सिंह तथा ब्रह्म प्रकाश के साथ एक टीम का गठन कर दिया. काल डिटेल्स से मिले सुराग अपराधियों तक पहुंचने का सब से बड़ा हथियार इन दिनों इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस है. एसटीएफ की टीम ने उसी समय गौरव के फोन की सर्विलांस के साथ उस की सीडीआर खंगालने का काम शुरू कर दिया. गौरव के फोन की काल डिटेल्स खंगाली तो उस में एक ऐसा नंबर मिला, जिस में उस के फोन पर कुछ दिनों से एक नए नंबर से न सिर्फ काल की जा रही थी, बल्कि यह नंबर गौरव की कौन्टैक्ट लिस्ट में ‘माई लव’ के नाम से सेव था.

दोनों नंबरों पर 5 से 18 जनवरी तक 40 बार बात हुई थी और हर काल का औसत समय 10 से 40 मिनट था. इस नंबर से गौरव के वाट्सऐप पर अनेकों काल, फोटो, वीडियो का भी आदानप्रदान हुआ था. इस नंबर के बारे में जानकारी एकत्र की गई तो यह नंबर दिल्ली के एक पते पर पंजीकृत पाया गया. लेकिन जब पुलिस की टीम उस पते पर पहुंची तो पता फरजी निकला. जब इस नंबर की लोकेशन खंगाली गई तो पुलिस टीम यह जान कर हैरान रह गई कि 18 जनवरी की दोपहर से शाम तक इस नंबर की लोकेशन गोंडा में हर उस जगह थी, जहां गौरव के मोबाइल की लोकेशन थी.

पुलिस टीम समझ गई कि जिस के पास भी यह नंबर है, उसी ने गौरव का अपहरण किया है. पुलिस टीमों ने इसी नंबर की सीडीआर खंगालनी शुरू कर दी. पता चला कि यह नंबर करीब एक महीना पहले ही एक्टिव हुआ था और इस से बमुश्किल 4 या 5 नंबरों पर ही फोन काल्स की गई थीं या वाट्सऐप मैसेज आएगए थे.   एसटीएफ के पास ऐसे तमाम संसाधन और नेटवर्क होते हैं, जिन से वह इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस के माध्यम से अपराधियों की सटीक जानकारी एकत्र करने के साथ उन की लोकेशन का भी सुराग लगा लेती है. एसटीएफ ने रात भर मेहनत की. जो भी फोन नंबर इस फोन के संपर्क में थे, उन सभी की कडि़यां जोड़ कर उन की मूवमेंट पर नजर रखी जाने लगी.

रात होतेहोते यह बात साफ हो गई कि अपहर्त्ता नोएडा इलाके में मूवमेंट करने वाले हैं. वे अपहृत गौरव को छिपाने के लिए दिल्ली से किसी दूसरे ठिकाने पर शिफ्ट करना चाहते हैं. बस इस के बाद सर्विलांस टीमों ने अपराधियों की सटीक लोकेशन तक पहुंचने का काम शुरू कर दिया और गोंडा पुलिस के साथ एसटीएफ की टीम ने औपरेशन की तैयारी शुरू कर दी. 21 जनवरी की देर रात गोंडा पुलिस व एसटीएफ की टीमों ने ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे जीरो पौइंट के पास अपना जाल बिछा दिया. पुलिस टीमें आनेजाने वाले हर वाहन पर कड़ी नजर रख रही थीं. किसी वाहन पर जरा भी संदेह होता तो उसे रोक कर तलाशी ली जाती. इसी बीच एक सफेद रंग की स्विफ्ट डिजायर कार पुलिस की चैकिंग देख कर दूर ही रुक गई.

उस गाड़ी ने जैसे ही रुकने के बाद बैक गियर डाल कर पीछे हटना और यूटर्न लेना शुरू किया तो पुलिस टीम को शक हो गया. एसटीएफ की टीम एक गाड़ी में पहले से तैयार थी. पुलिस की गाड़ी उस कार का पीछा करने लगी जो यूटर्न ले कर तेजी से वापस दौड़ने लगी थी. देखते ही पहचान लिया गौरव को मुश्किल से एक किलोमीटर तक दौड़भाग होती रही. आखिरकार नालेज पार्क थाना क्षेत्र में एसटीएफ की टीम ने डिजायर कार को ओवरटेक कर के रुकने पर मजबूर कर दिया. खुद को फंसा देख कार में सवार 3 लोग तेजी से उतरे और अलगअलग दिशाओं में भागने लगे. एसटीएफ को ऐसे अपराधियों को पकड़ने का तजुर्बा होता है. पीछा करते हुए एसटीएफ तथा गोंडा पुलिस की दूसरी टीम भी वहां पहुंच चुकी थी.

पुलिस टीमों ने जैसे ही हवाई फायर किए, कार से उतर कर भागे तीनों लोगों के कदम वहीं ठिठक गए. पुलिस टीमों ने तीनों को दबोच लिया. उन्हें दबोचने के बाद जब पुलिस टीमों ने स्विफ्ट डिजायर कार की तलाशी ली तो एक युवक कार की पिछली सीट पर बेहोशी की हालत में पड़ा था. इंसपेक्टर सुधीर सिंह युवक की फोटो को इतनी बार देख चुके थे कि बेहोश होने के बावजूद उन्होेंने उसे पहचान लिया. वह गौरव ही था. पुलिस टीमों की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि अभियान सफल हो गया था. पुलिस टीमें तीनों युवकों के साथ गौरव व कार को ले कर एसटीएफ औफिस आ गईं.

इंसपेक्टर सुधीर सिंह ने गौरव के पिता डा. निखिल व एसपी गोंडा शैलेश पांडे को गौरव की रिहाई की सूचना दे दी. वे भी तत्काल नोएडा के लिए रवाना हो गए. गौरव के अपहरण में पुलिस ने जिन 3 लोगों को गिरफ्तार किया था, उन में से एक की पहचान डा. अभिषेक सिंह निवासी अचलपुर वजीरगंज, जिला गोंडा के रूप में हुई. वही इस गिरोह का सरगना था और फिलहाल बाहरी दिल्ली के बक्करवाला में डीडीए के ग्लोरिया अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 310 में किराए पर रहता था. डा. अभिषेक सिंह पेशे से चिकित्सक था और नांगलोई-नजफगढ़ रोड पर स्थित राठी अस्पताल में काम करता था.

उस के साथ पुलिस ने जिन 2 अन्य लोगों को गिरफ्तार किया, उन में नीतेश निवासी थाना निहारगंज, धौलपुर, राजस्थान तथा मोहित निवासी परौली, थाना करनलगंज गोंडा शामिल थे. जब उन तीनों से पूछताछ की गई, तो अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प थी.  डा. अभिषेक सिंह ने गौरव का अपहरण करने के लिए हनीट्रैप का इस्तेमाल किया था. यानी गौरव को पहले एक खूबसूरत लड़की के जाल में फंसाया गया था. जब गौरव खूबसूरती के जाल में फंस गया तो उस का फिरौती वसूलने के लिए अपहरण कर लिया गया.

मूलरूप से गोंडा के अचलपुर का रहने वाला डा. अभिषेक सिंह 2013-2014 में बेंगलुरु के राजीव गांधी यूनिवर्सिटी औफ हेल्थ साइंस से बीएएमएस की पढ़ाई करने के बाद जब अपने शहर लौटा तो उस के दिल में बड़े अरमान थे. डाक्टरी के पेशे से बहुत सारी कमाई करने और बड़ा सा बंगला बनाने के सपने देखे थे. लेकिन कुछ समय बाद ही ये सपने चकनाचूर होने लगे. अच्छी नौकरी नहीं मिली तो बन गया अपराधीउसे गोंडा के किसी भी अस्पताल में ऐसी नौकरी नहीं मिली, जिस से अच्छे से गुजरबसर हो सके. छोटेछोटे अस्पतालों में नौकरी करने के बाद तंग आ कर डा. अभिषेक 2018 में दिल्ली आ गया. यहां कई अस्पतालों में नौकरी करने के बाद वह सन 2019 में नजफगढ़ के राठी अस्पताल में नौकरी करने लगा.

हालांकि इस अस्पताल में उसे पहले के मुकाबले तो अच्छी तनख्वाह मिलती थी, लेकिन इस के बावजूद वह अपनी जिंदगी से संतुष्ट नहीं था. इसी दौरान डा. अभिषेक की दोस्ती उसी अस्पताल में काम करने वाली एक लेडी डाक्टर प्रीति मेहरा से हो गई. प्रीति भी बीएएमएस डाक्टर थी. खूबसूरत और जवान प्रीति प्रतिभाशाली थी. उस के दिल में भी अपना अस्पताल बनाने की महत्त्वाकांक्षा पल रही थी. लेकिन इस सपने को पूरा करने में समर्थ नहीं होने के कारण अक्सर मानसिक परेशानी से घिरी रहती थी. जब अभिषेक से उस की दोस्ती हुई तो लगा कि वे दोनों एक ही मंजिल के मुसाफिर हैं. दोनों की दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गई.

दोनों के सपने भी एक जैसे थे, लाचारी भी एक जैसी थी. लेकिन सपनों को पूरा करने की धुन दोनों पर सवार थी. पिछली दीपावली पर नवंबर, 2019 में जब अभिषेक अपने घर गोंडा गया तो उस की मुलाकात अपनी बुआ के बेटे रोहित से हुई. बुआ की शादी बहराइच के पयागपुर इलाके में हुई थी. रोहित भी पयागपुर में ही रहता था. रोहित की जानपहचान मोहित सिंह से भी थी. मोहित सिंह गोंडा में रहने वाले अभिषेक के दोस्त राकेश सिंह का साला था. मोहित दिल्ली के करोलबाग की एक दुकान में काम करता है. रोहित भी मोहित को जानता है. रोहित व मोहित दोनों की जानपहचान एससीपीएम कालेज गोंडा से आयुर्वेदिक चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे गौरव हलधर से थी.

दोनों ही गौरव के अलावा उस के परिवार के बारे में भी अच्छी तरह से जानते थे. अभिषेक जब दीपावली पर अपने घर गया तो पयागपुर से बुआ का बेटा रोहित उस के घर आया हुआ था. रोहित के सामने अभिषेक का दर्द छलक गया. शराब पीने के बाद उस ने रोहित से यहां तक कह दिया कि अगर उसे चोरी, डाका या किसी का अपहरण भी करना पड़े तो वह पीछे नहीं हटेगा. अभिषेक की बात सुनते ही रोहित का माथा ठनक गया. पहले तो उस ने अभिषेक को समझाना चाहा. लेकिन अभिषेक नहीं माना और बोला भाई बस तू एक बार किसी ऐसे शिकार के बारे में बता दे, जिस से मेरा सपना पूरा करने के लिए रकम मिल सकती हो.

अभिषेक नहीं माना तो रोहित ने उसे गौरव हलधर के बारे में बताया और उस के पूरे परिवार की जानकारी भी दे दी. रोहित ने अभिषेक को बताया कि डा. निखिल हलधर का बेटा गौरव गोंडा में ही फर्स्ट ईयर की पढ़ाई कर रहा है. अगर किसी तरीके से उस का अपहरण कर लिया जाए तो फिरौती के रूप में बड़ी रकम मिल सकती है. डा. अभिषेक ने जब डा. प्रीति मेहरा को गौरव का अपहरण करने की अपनी योजना के बारे में बताया तो उस ने नाराजगी नहीं जताई बल्कि खुश हुई और उस ने ही अपनी तरफ से सुझाव दिया कि गौरव का अपहरण करने में वह खुद उस की मदद करेगी.

प्रीति ने अभिषेक को बताया कि एक जवान लड़के का अगर अपहरण करना हो तो किसी जवान लड़की को उस के सामने चारा बना कर डाल दो, वह खुदबखुद उस जाल में फंस जाएगा. अभिषेक से उस ने गौरव का नंबर देने के लिए कहा तो अभिषेक ने उसे रोहित से गौरव का नंबर ले कर दे दिया. इस के बाद डा. प्रीति मेहरा ने एक रौंग नंबर के बहाने गौरव को काल कर बातचीत का सिलसिला शुरू कर दिया. पहली ही बार में बात करने के बाद गौरव उस के जाल में फंस गया और दोनों का एकदूसरे से परिचय कुछ ऐसा हुआ कि उस दिन के बाद वे दोनों एकदूसरे से बात करने लगे.

प्रीति मेहरा वीडियो काल के जरिए जब गौरव से बात करती तो कई बार गौरव को अपने नाजुक अंग दिखा कर अपने लिए उसे बेचैन कर देती. दरअसल, साजिश के इस मुकाम तक पहुंचने से पहले डा. अभिषेक ने इसे अंजाम देने के लिए कुछ लोगों को भी अपने साथ जोड़ लिया था. करोलबाग में कपड़े की दुकान पर काम करने वाले मोहित को जब अभिषेक ने गौरव का अपहरण करने की योजना बताई और उस से मदद मांगी तो मोहित ने अभिषेक को अपने एक दोस्त  नितेश से मिलवाया. दरअसल, नितेश व मोहित एक ही जिम में व्यायाम करने के लिए जाते थे. इसीलिए दोनों के बीच दोस्ती थी. नितेश इंश्योरेंस कराने का काम करता था.

इंश्योरेंस के साथ वह लोगों के बैंक में खाते खुलवाने से ले कर उन्हें लोन दिलाने का काम करता था. इसीलिए फरजी आईडी से ले कर जाली आधार कार्ड व पैन कार्ड बनाने में उसे महारथ हासिल थी. मोहित ने उसे मोटी रकम मिलने का सब्जबाग दिखा कर अपहरण की इस वारदात में अपने साथ मिला लिया. इस के बाद नितेश ने 3 आईडी तैयार कीं और उन्हीं आईडी के आधार पर उस ने 3 सिमकार्ड खरीदे. फरजी आईडी से खरीदे गए तीनों सिम कार्ड डा. प्रीति मेहरा, डा. अभिषेक व मोहित ने अपने पास रख लिए. डा. प्रीति ने तो अपने सिम कार्ड का इस्तेमाल गौरव हलधर से दोस्ती करने के लिए शुरू कर दिया. लेकिन अभिषेक व मोहित ने अपहरण करने से चंद रोज पहले ही अपने सिम कार्ड का इस्तेमाल किया था.

प्रीति मेहरा ने गौरव को अपने प्रेमजाल में इस तरह फंसा लिया कि वह उस के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार था. जब सब ने यह देख लिया कि शिकार जाल में फंसने का तैयार है तो प्रीति ने गौरव को वाट्सऐप मैसेज दिया कि वह 18 जनवरी को उस से मिलने गोंडा आ रही है. रोहित भी उस समय दिल्ली आया हुआ था. दिल्ली से स्विफ्ट डिजायर कार ले कर डा. अभिषेक, डा. प्रीति मेहरा, मोहित, रोहित व नितेश गोंडा पहुंच गए. गोंडा पहुंचने से पहले रोहित बहराइच में ही उतर गया. इधर गोंडा पहुंच कर डा. प्रीति ने एक राहगीर से किसी बहाने फोन ले कर गौरव को मिलने के लिए फोन किया और उस के कालेज से एक किलोमीटर दूर एक जगह पर बुलाया.

प्रीति मेहरा का रंगीन वार प्रीति के मोहपाश में फंसा गौरव वहां चला आया. गौरव को प्रीति ने अपने साथ कार में बैठा लिया, जहां बैठे बाकी अन्य लोगों ने उसे दबोच कर नशे का इंजेक्शन दे दिया. इस के बाद वे गोंडा से चल दिए. उन की योजना गौरव को संतकबीर नगर के खलीलाबाद में रहने वाले सतीश के घर पर छिपाने की थी. वे वहां पहुंच भी गए, लेकिन बाद में इरादा बदल दिया और कुछ ही देर में कार से दिल्ली के लिए रवाना हो गए. 18 जनवरी की रात को ही दिल्ली पहुंच गए. रास्ते में गाजियाबाद के पास उन्होंने गौरव के फोन से गौरव के पिता निखिल को फिरौती के लिए पहला फोन कर 70 लाख की फिरौती की मांग की.

इसके बाद उन्होंने गौरव को अभिषेक के बक्करवाला स्थित डीडीए फ्लैट में छिपा दिया. नितेश या मोहित उसे खाना देने जाते थे और डा. अभिषेक व प्रीति उसे लगातार नशे के इंजेक्शन देते थे ताकि वह होश में आ कर शोर न मचा दे. उन लोगों ने कई बार गौरव के साथ मारपीट भी की. इधर रोहित ने जब गोंडा व बहराइच में गौरव के अपहरण कांड को ले कर छप रही खबरों के बारे में अभिषेक को बताया कि पुलिस की एक टीम दिल्ली में गौरव की तलाश कर रही है तो अभिषेक ने गौरव को अपने फ्लैट से कहीं दूसरी जगह रखने की योजना बनाई.

इसीलिए डा. अभिषेक मोहित व नितेश के साथ 21 जनवरी की रात को गौरव को बेहोशी का इंजेक्शन दे कर उसे कार से ले कर ग्रेटर नोएडा जा रहा था, तभी पुलिस ने सर्विलांस के जरिए उन की लोकेशन का पता लगा कर उन्हें दबोच लिया. नितेश के पिता व गोंडा पुलिस के नोएडा पहुंचने के बाद एसटीएफ ने उन्हें  गोंडा पुलिस के हवाले कर दिया. इधर पुलिस को जब इस में रोहित व सतीश नाम के 2 और लोगों के शामिल होने की खबर लगी तो गोंडा पुलिस की टीम ने दबिश दे कर उसी रात रोहित व सतीश को भी गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की खबर पा कर डा. प्रीति फरार हो चुकी थी. उस की तलाश में एसटीएफ और गोंडा पुलिस ने कई जगह छापे मारे, लेकिन वह पुलिस की पकड़ में नहीं आई. गोंडा पुलिस ने प्रीति की गिरफ्तारी पर 25 हजार के इनाम की घोषणा की थी. जिस के बाद गोंडा पुलिस ने 1 फरवरी को प्रीति को उस के गांव धौर जिला झज्जर, हरियाणा से गिरफ्तार कर लिया. मूलरूप से हरियाणा की प्रीति मेहरा वर्तमान में दिल्ली के प्रेमनगर में रहती थी. फिलहाल सभी आरोपी न्यायिक हिरासत में जेल में हैं. कैसी विडंबना है कि सालों की मेहनत के बाद डाक्टर बनने वाले अभिषेक व प्रीति अपने अधूरे ख्वाब को पूरा करने के लिए शार्टकट से पैसा कमाने के चक्कर में जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए.

डीजीपी ने फिरौती के लिए हुए अपहरण कांड का खुलासा कर आरोपियों को गिरफ्तार करने वाली गोंडा पुलिस की टीम को पुरस्कृत करने की घोषणा की है.

—कथा पुलिस की जांच, पीडि़त व अभियुक्तों के बयान पर आधारित

 

Bollywood News : प्रियंका चोपड़ा ने अक्षय, शाहरुख और सलमान को पछाड़कर मारी बाज़ी

Bollywood News : कुछ समय पहले तक फिल्म इंडस्ट्री पर खान मंडली यानि शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान की सलतनत थी, लेकिन बौलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान का मार्केट आजकल इसलिए ठंडा चल रहा है, क्योंकि पिछले कई सालों से उन की कोई सफल फिल्म नहीं आई. इस बीच इस ग्रुप में सेंध लगाई है अक्षय कुमार ने, जो खान मंडली से आगे नहीं, बहुत आगे निकल गए हैं. इस की वजह है उन का अनुशासन, मेहनत, काम के प्रति लगन और प्रतिबद्धता. खास बात यह है कि पिग्गी चोप्स यानि प्रियंका चोपड़ा ने अक्षय, शाहरुख और सलमान को पीछे छोड़ दिया है.

प्रियंका चोपड़ा ने 2000 में मिस वर्ल्ड का ताज पहनने के बाद 2002 में अपने सफर की शुरुआत तमिल फिल्म ‘थामीजान’ से की थी, जिस में उन के हीरो विजय थे. फिर 2003 में उन का प्रवेश बौलीवुड में हुआ सन्नी देओल के साथ, फिल्म थी ‘द हीरो: लव स्टोरी ए स्पाई’. इस के बाद प्रियंका ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. लेकिन उन्हें चर्चित और फिल्म दर्शकों की चहेती बनाया 2004 में आई सलमान खान और अक्षय कुमार अभिनीत ब्लौक बस्टर फिल्म ‘मुझ से शादी करोगी’ ने. प्रियंका चोपड़ा ने दर्जनों फिल्मों में काम किया, लेकिन उन की 2006 में आई ‘कृष’ 2013 में आई ‘कृष 3’, 2008 में ‘फैशन’, 2012 में ‘बर्फी’ और 2015 में आई

‘बाजीराव मस्तानी’ सुपरहिट फिल्में रहीं. चर्चित फिल्में तो कई थीं. नेशनल अवार्ड सहित उन्हें दर्जनों अवार्ड मिले. 2015 से 2018 तक प्रियंका ने एबीसी सीरियल क्वांटिको की 5 सीरीज में लीड रोल किया, जिस के बाद हौलीवुड में उन के पैर जम गए. इसी बीच उन्होंने हौलीवुड के कई टाक शो होस्ट किए. 2019 में प्रियंका ने ‘द ग्लोबल सिटीजन मूवमेंट डौक्यूमेंट सीरीज’ में काम किया. हौलीवुड में उन्होंने ‘बेवाच’, ‘ए किड लाइक जैक’, ‘इज नौट इट रोमांटिक’, ‘वी कैन बी हीरोज’ और 2021 में आने वाली फिल्म ‘मेट्रिक्स 4’ वगैरह कीं.

गीतसंगीत और टाक शो इस से अलग हैं. इसी बीच 1 दिसंरबर, 2018 को प्रियंका ने उम्र में अपने से छोटे निक जोनस से शादी कर ली थी जो हौलीवुड में गीतसंगीत से जुड़े थे. एक कंपनी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार अगस्त से अक्तूबर की तिमाही में प्रियंका चोपड़ा की ब्रैंड वैल्यू सब से ज्यादा होती है. कंपनी ने सब से ज्यादा ट्रेडिंग फिल्म स्टार्स की तिमाही एनालिसिस पेश की है. इस के लिए कंपनी ने अगस्त से अक्तूबर 2020 के बीच 26 भारतीय फिल्म स्टार्स के सोशल मीडिया प्रेजेंस और डिजिटल एंगेजमेंट का विश्लेषण किया. रिपोर्ट के अनुसार फौलोअर्स और सोशल मीडिया एंगेजमेंट का अगर रुपए में आंकलन करें तो प्रियंका की ब्रैंड वैल्यू 265 करोड़ रुपए है. 260 करोड़ ब्रैंड बैल्यू के साथ दूसरा नंबर अक्षय कुमार का है और तीसरा सलमान खान का जिन की ब्रैंड वैल्यू 252 करोड़ रुपए है.

चौथा नंबर दीपिका पादुकोण का है, जिन की ब्रैंड वैल्यू 211 करोड़ है, जबकि 209 रुपए की ब्रैंड वैल्यू के साथ शाहरुख पांचवे नंबर पर हैं. प्रियंका बहुमुखी प्रतिभा हैं, वह गाती भी हैं, लिखती भी हैं. एक्टिंग तो उन का पेशा है ही. फिलहाल वह हौलीवुड फिल्म ‘टैक्सट फौर यू’ में कार्यरत हैं, जिस की शूटिंग लंदन में चल रही है.

 

Bollywood News : दीपिका पादुकोण को छोटे से रोल करने के लिए मिले 14 करोड़

Bollywood News : दीपिका पादुकोण बौलीवुड की नंबर वन हीरोइन हैं. वह फिल्मों में हीरोइन की भूमिका के लिए फीस भी उसी तरह लेती हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे पैसे के लिए कोई भी ऐरीगैरी फिल्म में काम करने लगें. उन की फिल्में भी उन्हीं के स्तर की होती हैं. आजकल दीपिका फिल्म ‘83’ को ले कर चर्चाओं में हैं. वजह यह कि फिल्म में उन का छोटा सा रोल है, महत्त्वहीन सा. लेकिन इतने ही रोल के लिए उन्होंने 14 करोड़ रुपए लिए हैं. बता दें कि फिल्म ‘83’ क्रिकेट इतिहास के लीजैंड कपिल देव और उन की क्रिकेट टीम द्वारा 1983 में जीते गए क्रिकेट वर्ल्ड कप पर आधारित है.

इस फिल्म में कपिल देव की भूमिका में रणवीर सिंह हैं और दीपिका कपिल देव की पत्नी रूमी देव की भूमिका में. वर्ल्ड कप जीतने की कहानी में कपिल की पत्नी का ज्यादा बड़ा रोल हो नहीं सकता था.  बहरहाल, 200 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ‘83’ तैयार है और इसी साल क्रिसमस पर रिलीज होगी. रिलाइंस इंटरटेनमेंट और फैंटम फिल्म के बैनर पर बनी ‘83’ के डायरेक्टर हैं कबीर खान. कपिल देव की भूमिका के अलावा मोहिंदर अमरनाथ की भूमिका साकिब सलीम ने निभाई है तो सुनील गावस्कर की भूमिका में ताहिर राज भसीन नजर आएंगे. हालांकि यह फिल्म अब तक रिलीज हो जानी चाहिए थी लेकिन कोविड 19 यानी कोरोना की वजह से रिलीज नहीं हो सकी.

लीजैंड क्रिकेटर कपिलदेव की कप्तानी में सन 1983 में भारतीय क्रिकेट ने लंदन के लौर्ड्स स्टेडियम में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता था, तब भारत के क्रिकेट प्रेमियों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था. लौर्ड्स में कप्तान कपिल देव जब दोनों हाथों में थामी ट्रौफी सिर पर रखे हुए थे और उन के पास खड़े मोहिंदर अमरनाथ ट्रौफी को हाथ लगाए हुए थे, तो पूरी क्रिकेट टीम खुशी से झूम रही थी. जिन लोगों ने टीवी स्क्रीन पर यह पल देखा होगा, वे जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे.

रिलाइंस इंटरटेनमेंट ने सितंबर 2017 में फिल्म ‘83’ को बनाने की घोषणा एक इवेंट में की थी. इसी के मद्देनजर फरवरी 2019 में तय हो गया कि फिल्म के डायरेक्टर कबीर खान होंगे. फिल्म को रियल्टी के करीब लाने के लिए कबीर खान के साथ बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर अमिया देव को जोड़ा गया क्योंकि अपने पिता की छोटीबड़ी बातों आदतों के बारे में उन से बेहतर कोई नहीं जान सकता था. फिर अप्रैल 2019 में धर्मशाला में प्रैक्टिस के लिए कैंप लगाया गया, जिसे पूर्व क्रिकेटर बलविंदर संधू ने गाइड किया. इस के बाद ही लंदन में फिल्म की शूटिंग हुई. बहरहाल, अब नए पुराने क्रिकेट प्रेमी 1983 के उस यादगार पल को अपनी आंखों से परदे पर देख पाएंगे.

 

 

Bollywood News : कंगना रनौत और उद्धव में टकराव, हीरोइन का 48 करोड़ का औफिस भी गिरा दिया

Bollywood News :  कंगना रनौत एक अच्छी एक्ट्रैस होने के साथसाथ निडर, बेबाक और जुझारू महिला हैं. उन के शब्दबाणों से घायल शिवसेना के नेता इतने विचलित हुए कि उन्हें अपशब्द तो कहे ही, साथ ही ठाकरे सरकार ने बदला लेने के लिए अपनी पावर का गलत इस्तेमाल कर के उन का 48 करोड़ का औफिस भी गिरा दिया. लेकिन कंगना…

16 साल की उम्र में घर छोड़ देने वाली कंगना रनौत मुंबई आ कर यूं ही इतनी बड़ी एक्ट्रेस नहीं बन गईं. इस के लिए उन्होंने कई साल अभावों में गुजारे. दिल्ली में मौडलिंग और थिएटर के नाटकों में हिस्सा ले कर गुजरबसर की. जब लगा दिल्ली में भविष्य नहीं है तो उन्होंने मुंबई की राह पकड़ी. वहां उन्होंने मौडलिंग करते हुए आशा चंद्रा के ड्रामा स्कूल में प्रशिक्षण लिया. इस के बाद कंगना के सामने कांटों भरी राह थी, जिस पर चलते हुए उन्होंने फिल्मी दुनिया के सैकड़ों रंग देखे, जिन में ज्यादातर बदरंग थे. अंतत: अभावों में रह कर भी उन्हें अपने टैलेंट के बूते पर फिल्म मिली और वह हीरोइन बन गईं.

उन की पहली फिल्म थी ‘वो लम्हे’ जिस में उन के अपोजिट थे शाइनी आहूजा. कंगना की दूसरी फिल्म थी ‘गैंगस्टर’ जो भट्ट कैंप ने बनाई थी, जिस में हीरो थे इमरान हाशमी और शाइनी आहूजा. सन 2006 में आई इन दोनों ही फिल्मों के लिए कंगना को जी सिने और फिल्मफेयर के बेस्ट फीमेल डेब्यू अवार्ड मिले. इस के बाद कंगना को फिल्म इंडस्ट्री में पहचाना भी जाने लगा और उन्हें काम भी मिलने लगा. प्रियंका चोपड़ा अभिनीत मधुर भंडारकर की फिल्म ‘फैशन’ में कंगना को दिल्ली की एक मौडल गीतांजलि नागपाल की भूमिका निभाने को मिली, जिस की ड्रग्स की वजह से मौत हो गई थी.

इस भूमिका को रियल बनाने के लिए कंगना अपने कर्ली बाल कटवा कर गंजी हो गई थीं. ‘फैशन’ 2009 में रिलीज हुई और इस के लिए कंगना को नैशनल अवार्ड मिला. अगले चंद सालों में कंगना रनौत बौलीवुड की पहली पंक्ति की हीरोइनों में गिनी जाने लगीं. उन के पास काम की कोई कमी नहीं रही. कंगना को बुलंदियों पर पहुंचाया उन की फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ और इसी की दूसरी कड़ी ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ ने. 2014 में आई कंगना की फिल्म ‘क्वीन’ ने रिकौर्ड तोड़ते हुए कंगना को सचमुच फिल्म इंडस्ट्री की क्वीन बना दिया था. इसी सब की बदौलत कंगना को 3 बार नैशनल अवार्ड मिला.

कंगना पतलीदुबली भले ही थीं, लेकिन थीं दबंग. किसी से न डरने वाली. कंगना जुझारू थीं और कदमकदम पर ठोकरें खाने के बाद इस मुकाम तक पहुंची थीं. अपने साथ कुछ गलत होते देख वह अड़ जाती थीं, इसलिए फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें पंगा गर्ल कहना शुरू कर दिया था. वैसे तो कंगना ने तमाम लोगों से पंगे लिए, लेकिन उन की दबंगई तब मुखर हो कर सामने आई जब उन्होंने रितिक रोशन की फिल्म ‘काइट्स’ के समय की एक बात पर रितिक रोशन और उन के पिता राकेश रोशन को खुला चैलेंज दिया. आखिर इस मामले में रितिक और उन के पिता राकेश रोशन को ही हथियार डालने पड़े.

उसी दौरान कंगना ने करण जौहर जैसे बड़े निर्माता को भी नहीं छोड़ा. कंगना ने करण जौहर पर भाईभतीजावाद का आरोप लगाया. करण ने पलटवार किया भी, लेकिन कंगना न तो डरने वालों में थीं और न पीछे हटने वालों में. उन्होंने दोटूक कह दिया, ‘करण होंगे बडे़ फिल्ममेकर, मुझे नहीं करना उन की फिल्मों में काम. एक फिल्म उंगली में काम किया, जो फ्लौप हो गई.’ सभी बड़े सितारे, निर्मातानिर्देशक ट्विटर पर हैं, लेकिन कंगना ट्विटर पर नहीं थीं. हालांकि वह अपनी बहन रंगोली और अपनी टीम के औफिशियल एकाउंट के जरिए अपनी बात रखती रहती थीं.

सुशांत सिंह की मृत्यु के बाद फिल्म इंडस्ट्री पर नेपोटिज्म के आरोप लगने शुरू हो गए और लोग भाईभतीजावाद को सुशांत की आत्महत्या का कारण बताने लगे. इस से भुक्तभोगी कंगना को लगा कि उन्हें भी अपनी बात रखनी चाहिए. बस, कंगना ने अपना एकाउंट बना कर ट्विटर पर आने का फैसला कर लिया. आखिर 22 अगस्त को वह अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर आ गईं. उन्होंने अपनी पहली ही पोस्ट में लिखा कि सुशांत मामले में मैं ने सोशल मीडिया की ताकत देखी, इसलिए मैं ने ट्विटर पर आने का फैसला किया. इस के बाद कंगना ने सुशांत का पक्ष लेते हुए फिल्म इंडस्ट्री के भाईभतीजावाद की कमजोर नस पर हाथ रख दिया. उन के निशाने पर करण जौहर भी थे. लेकिन इस बार करण ने पलटवार नहीं किया.

बाद में जब एनसीबी की जांच में ड्रग्स ऐंगल सामने आया तब भी कंगना ने अपनी ट्विटर वार जारी रखी. क्योंकि वह फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की पैठ को जानती हैं. कंगना की ट्विटर वार  कंगना ने बौलीवुड के कुछ लोगों को मूवी माफिया बताते हुए मुंबई पुलिस पर भी वार किया जो सुशांत की मौत से संबंधित जरूरी जांच नहीं कर रही थी. इतना ही नहीं, कंगना ने एनसीबी को बौलीवुड में ड्रग्स लेने वालों और सप्लाई करने वालों के नाम भी बताने को कहा. कंगना ने यहां तक कहा कि वह अगर कमजोर होतीं तो सुशांत की तरह कभी की आत्महत्या कर चुकी होतीं. उन का साफ कहना था कि मुंबई में आउटसाइडर से भेदभाव वाला बरताव किया जाता है. जब यह सब चल रहा था, तब कंगना मनाली स्थित अपने नए घर में थीं.

कंगना की दिलेरी और बेबाक बयानबाजी जगजाहिर है. यही वजह थी कि कंगना ने जब सुशांत की आत्महत्या पर सवाल उठाए तो मीडिया ने उन की आशंकाओं को पूरा महत्त्व दिया, सब से पहले कंगना ने ही आउटसाइडर की बात को सही ठहराते हुए अपना अनुभव सुशांत से रिलेट किया. इसी दौरान उन्होंने महेश भट्ट जैसे सीनियर फिल्मकार पर भी खुलेआम अंगुली उठाई. यह अलग बात है कि रिया वाले मामले में मीडिया महेश भट्ट का नाम पहले ही सार्वजनिक रूप से ले चुका था. सुशांत के मामले में कंगना रनौत ने शुरू से ही जिस उग्र तेवर के साथ बयान दिए, वह बौलीवुड के दिग्गजों को रास नहीं आए. लेकिन कंगना तो कंगना हैं, सब से अलग, बेबाक, जिंदादिल और निडर. उन्हें न तो फिल्ममेकर्स की परवाह है और न बौलीवुड में काम मिलने की. वह अन्य हीरोइनों की तरह बनीबनाई लीक पर चलने वालों में भी नहीं हैं.

उन्होंने तो अपने रास्ते भी खुद बनाए और अपनी मंजिल भी खुद ही निर्धारित की. रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से प्रेरित कंगना ने फिल्म ‘मणिकर्णिका: द क्वीन औफ झांसी’ में लक्ष्मीबाई का चरित्र निभाया ही नहीं वरन अपने अंदर हर बाधा को पार करने का हौसला, जज्बा और जुनून भी पैदा किया. कैसे मिली वाई श्रेणी सुरक्षा मुंबई पुलिस की हालत और महाराष्ट्र सरकार की कमजोरी को देख कंगना ने ट्विटर पर मुंबई की तुलना पीओके से कर दी. हालांकि उन का आशय कुछ और था, शिवसेना के नेताओं ने इसे किसी और रूप से लिया. यह 3 सितंबर की बात है. बस फिर क्या था, वाकयुद्ध में शिवसेना कंगना के सामने आ खड़ी हुई. मुंबई में कंगना के खिलाफ प्रदर्शन हुए, जिन में महिलाएं भी थीं. इन प्रदर्शनों में कंगना के पोस्टर जलाए गए, उन के फोटो को चप्पलों से पीटा गया.

बात तब बिगड़ी जब शिवसेना नेता और शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के सर्वेसर्वा संजय राउत ने कंगना को हरामखोर कहा. कंगना ने पलटवार किया तो शिवसेना सरकार और कंगना आमनेसामने आ गए. हालांकि संजय राउत ने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने कंगना को नौटी कहा था. लोगों ने गलत मतलब निकाल लिया. इसी दरमियान संजय राउत ने कंगना को धमकी दी कि हिम्मत है तो मुंबई आ कर दिखाए. कंगना तो कंगना ठहरी, मजबूत इच्छाशक्ति वाली. उन्होंने ऐलान कर दिया कि वह 9 सितंबर को मुंबई पहुंचेंगी, जो रोक सकता है रोक ले. साथ ही यह भी कि मुंबई किसी के बाप की नहीं है.

कंगना ने मुंबई जाने की घोषणा कर दी थी तो उन्हें जाना ही था. खतरे के मद्देनजर वह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मिलीं. कुछ दिन पहले कंगना के मनाली वाले घर के बाहर रात में कुछ लोगों ने फायरिंग की थी, तब मुख्यमंत्री ने उन्हें 2 सुरक्षाकर्मी दिए थे. कंगना ने इस बार भी मुख्यमंत्री के सामने अपना पक्ष रखा तो जयराम ठाकुर ने अपनी रिकमेंडेशन केंद्र सरकार को भेजी. इसी आधार पर गृहमंत्री अमित शाह के आदेश पर कंगना रनौत को 7 सितंबर को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दे दी गई, जिस में 2 कमांडो, 2 पीएसओ सहित 11 सुरक्षाकर्मी थे. यह बात शिवसेना सरकार को पता चली तो उस ने केंद्र सरकार की आलोचना शुरू कर दी. अभी तक शिवसेना सरकार यही सोचे बैठी थी कि कंगना शायद ही आए.

लेकिन जब कंगना का आना तय हो गया तो महाराष्ट्र सरकार ने बदले की भावना से बीएमसी को आगे कर दिया. बीएमसी ने 8 सितंबर को कंगना के औफिस में छापा मारा, साथ ही गेट पर नोटिस चिपका दिया कि 24 घंटे में काररवाई होगी. 9 सितंबर को कंगना जब मनाली से मुंबई के लिए रवाना हुईं तो महाराष्ट्र सरकार कट्टर दुश्मनों की तरह बदला लेने पर उतर आई. उधर कंगना ने चंडीगढ़ से मुंबई के लिए उड़ान भरी और इधर बीएमसी बुलडोजर ले कर कंगना के पालीहिल स्थित औफिस पर जा पहुंची. फलस्वरूप कंगना के मुंबई पहुंचने से पहले ही उन का पालीहिल वाला ‘मणिकर्णिका’ औफिस गिरा दिया गया. कंगना ने करीब 48 करोड़ रुपए लगा कर यह औफिस बड़े मन से बनवाया था और रानी झांसी के नाम पर इस का नाम मणिकर्णिका रखा था.

उन के औफिस को तोड़ने के पीछे कारण बताया गया कि इस में कुछ अवैध निर्माण था और इस के लिए बीएमसी द्वारा कंगना को 2 साल पहले नोटिस दिया गया था. यहां स्पष्ट कर दें कि बीएमसी ने कंगना का अवैध निर्माण ही नहीं गिराया था, बल्कि वहां मौजूद महंगी चीजों को भी तहसनहस कर दिया था. हालांकि पालीहिल में ही कई ऐसे औफिस हैं जिन में अवैध निर्माण हुए हैं और उन्हें 2 साल पहले नोटिस भी दिए गए हैं. सवाल यह था कि कंगना का औफिस तोड़ने के लिए 9 तारीख ही क्यों चुनी गई. यह खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली बात थी. कंगना एयरपोर्ट पर हो रहे प्रदर्शनों की परवाह न कर के पूरी सिक्योरिटी में अपने घर पहुंची. घर टूटने का जैसा दर्द सब को होता है, कंगना को भी हुआ.

वह अपनी सिक्योरिटी के साथ अपना टूटा औफिस देखने गईं. लौट कर उन्होंने एक वीडियो रिकौर्ड कर के वायरल कर दिया. वीडियो में उन्होंने सीधा वार महाराष्ट्र सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे पर किया. सरकार पर सीधा वार वीडियो में कंगना ने कहा, ‘उद्धव ठाकरे, तुझे क्या लगता है मूवी माफिया के साथ मिल, मेरा घर तोड़ कर तूने मुझ से बहुत बड़ा बदला ले लिया. आज मेरा घर टूटा है, कल तेरा घमंड टूटेगा. ये वक्त का पहिया है, याद रखना, हमेशा एक जैसा नहीं रहता.’  इस संबंध में शिवसेना ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा और टिप्पणी करने को ले कर कंगना के खिलाफ विक्रोली और दिंडोशी 2 थानों में रिपोर्ट दर्ज कराई. साथ ही महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि कंगना के खिलाफ ड्रग्स से संबंधित रिपोर्ट दर्ज करा कर जांच कराई जाएगी.

आश्चर्य की बात यह कि एक राज्य का गृहमंत्री होते हुए भी देशमुख ने इस का आधार बताया अध्ययन सुमन के कई साल पहले के एक इंटरव्यू को, जिस में उन्होंने कंगना पर तथाकथित रूप से ड्रग देने की बात कही थी. शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ और संजय राउत कंगना पर अमर्यादित टिप्पणियां करते रहे और कंगना और ज्यादा उग्र हो कर ट्विटर पर जवाब देती रहीं, बिना डरे, बिना शिवसेना के डर के. जब तक कंगना मुंबई में रहीं, तब तक मीडिया भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत और रिया को भूली रही.  5 दिन मुंबई में रह कर 14 सितंबर को कंगना अपने घर मनाली लौट गईं. क्योंकि औफिस टूट जाने की वजह से वह काम तो कर नहीं सकती थीं. बहरहाल, कंगना और शिवसेना की लड़ाई अभी जारी है.

कंगना सब से अलग हैं, बिना किसी से डरे वह अपनी राह खुद चुनती हैं. कंगना कहती हैं, ‘मैं क्षत्राणी हूं. न किसी से डरूंगी, न झुकूंगी. तब तक लड़ती रहूंगी, जब तक मेरा सिर न कट जाए. एक बात और, मैं किसी भी लड़ाई को शुरू नहीं करती. हां, खत्म मैं ही करती हूं.’  फिलहाल कंगना का ट्विटर वार फिल्म इंडस्ट्री पर भारी पड़ रहा है. हालांकि जया बच्चन द्वारा संसद में उठाए गए फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम करने की बात पर कंगना ने जो ट्वीट किया, वह गलत था. उन्हें ट्विटर पर ऐसी बातें नहीं लिखनी चाहिए थी. लेकिन कंगना तो कंगना हैं, कहां अच्छेबुरे की सोचती हैं. हालांकि संसद में जया बच्चन की कही बातें भी बेमानी साबित हुईं, क्योंकि बौलीवुड में अब ड्रग्स से जुड़े जो बडे़बड़े नाम सामने आ रहे हैं, उन्होंने कंगना की बात को सही साबित कर दिया है.

 

Film Story : थिएटर और फिल्मों में श्रीराम लागू का सफर

Film Story :  डा. श्रीराम लागू पेशे से ईएनटी सर्जन थे, लेकिन उन का अभिनय पेशे पर भारी रहा. सौम्य व्यक्तित्व के मालिक श्रीराम लागू ने थिएटर और कुछ फिल्मों में ऐसा दमदार अभिनय किया, जिसे भुला पाना संभव नहीं है. डा. श्रीराम लागू…

1980 में प्रदर्शित बी.आर. चोपड़ा निर्देशित फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में सब से चुनौतीपूर्ण भूमिका डाक्टर श्रीराम लागू के हिस्से में आई थी. इस फिल्म में वे जीनत अमान और पद्मिनी कोल्हापुरे के बलात्कार के आरोपी राज बब्बर के वकील थे. ‘इंसाफ का तराजू’ 80 के दशक की सर्वाधिक चर्चित और हिट फिल्मों में से एक थी, क्योंकि बलात्कार पर इस से पहले कोई ऐसी फिल्म नहीं बनी थी, जो समाज में हलचल मचा कर उसे इस संवेदनशील मुद्दे पर नए सिरे और तरीके से सोचने मजबूर कर दे. कारोबारी राज बब्बर 2 बहनों का बलात्कार करता है और उसे बचाने का जिम्मा लेते हैं क्रिमिनल लायर मिस्टर चंद्रा यानी श्रीराम लागू. इस फिल्म के अदालती दृश्य काफी वास्तविक और प्रभावी बन पड़े थे.

जिरह में बचाव पक्ष का वकील कैसेकैसे घटिया और बेहूदे सवाल पीडि़ता से पूछता है, यह श्रीराम लागू ने परदे पर जितने प्रभावी ढंग से उकेरा था, वह शायद ही कोई दूसरा कलाकार कर पाता. कटघरे में खड़ी जीनत अमान से यह पूछना कि बलात्कार के वक्त आरोपी के हाथ कहां थे, कंधों पर या जांघों पर और आप ने अपने बचाव में क्याक्या किया, जैसे दरजनों सवाल अदालतों का वीभत्स और कड़वा सच तब भी थे, आज भी हैं. बचाव पक्ष के वकील अपने मुवक्किल को बचाने की हरमुमकिन कोशिश करते हैं. बलात्कार के मामलों में वकील की हरमुमकिन कोशिश होती है कि किसी भी तरह अदालत में यह साबित कर दें कि जो हुआ वह बलात्कार नहीं बल्कि सहमति से किया गया सहवास था. इस के बाद उस के नामी मुवक्किल को बदनाम और ब्लैकमेल करने की गरज से पीडि़ता हाय हाय करती अदालत आ पहुंची है.

फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में जीनत अमान की दयनीयता पर श्रीराम लागू की क्रूरता भारी पड़ी थी. अलावा इस के इस फिल्म का यह डायलौग भी खूब चर्चित हुआ था कि अगर कोई चश्मदीद गवाह होता तो बलात्कार होता ही क्यों. खैर, यह हिंदी फिल्म थी, इसलिए अंत सुखद ही हुआ. लेकिन श्रीराम लागू ने अपने किरदार को जिस तरह से अंजाम दिया, वही उन की वह खूबी थी जिस के लिए वे आज तक याद किए जाते हैं और अब पुणे में निधन के बाद तो खासतौर से किए जा रहे हैं. 80 से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में विभिन्न शेड्स में अभिनय करने बाले श्रीराम लागू पेशे से ईएनटी सर्जन थे और मराठी थिएटर का जानामाना नाम थे.

मामूली शक्लसूरत वाले श्रीराम लागू की एक्टिंग की अपनी एक अलग स्टाइल थी, जिसे बदलने की कोशिश उन्होंने कभी नहीं की, ठीक वैसे ही जैसे उन सरीखे दूसरे कई चरित्र अभिनेताओं ने नहीं की. इन में खास नाम इफ्तिखार, जगदीश राज, ओम प्रकाश, असित सेन, केष्टो मुखर्जी, उत्पल दत्त और ए.के. हंगल के हैं. ये तमाम कलाकार चार दशकों तक एक से ही नजर आए और हर भूमिका में दर्शकों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया भी. सतारा से मुंबई महाराष्ट्र के सतारा में जन्मे 92 वर्षीय श्रीराम लागू ने पढ़ाई पुणे और मुंबई से की. ईएनटी सर्जन बनने के बाद प्रैक्टिस करने लगे. कालेज के दिनों में उन्होंने स्टेज पर एक्टिंग की, जो सराही भी गई. थिएटर तो उन की सांस में था.

कुछ साल बतौर डाक्टर वे दक्षिण अफ्रीका में भी रहे लेकिन जब भारत वापस आए तो बचपन से मन में दबीकुचली इस ख्वाहिश को और ज्यादा नहीं टरका पाए कि फिल्मों में काम किया जाए, जिस पर उन के मातापिता कभी राजी नहीं हुए थे. उस वक्त श्रीराम लागू की उम्र 42 साल थी. जाहिर है इस अधेड़ावस्था में उन्हें कोई हीरो वाले रोल तो मिलते नहीं, लिहाजा वे खामोशी से चरित्र अभिनेता बन गए. गंभीरता और परिपक्वता उन के चेहरे पर हमेशा पसरी रहती थी, जिस के चलते वे दूसरे कलाकारों से अलग हट कर दिखते थे. शायद डाक्टरी के पेशे ने उन्हें ऐसा बना दिया था. हालांकि फिल्मों में काम हासिल करने के लिए उन्हें कोई स्ट्रगल नहीं करना पड़ा, लेकिन बतौर चरित्र अभिनेता उन  की पहचान सन 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘घरौंदा’ से मिली. गुलजार की लिखी इस कहानी में बढ़ते शहरीकरण के साइड इफेक्ट और बिल्डर्स की ठगी और बेइमानियां दर्शाई गईं थीं.

अमोल पालेकर और जरीना वहाब प्यार करते हैं लेकिन मुंबई में उन के पास घर नहीं है. फिल्म ‘घरौंदा’ में उन की इस कशमकश को बेहद खूबसूरत तरीके से दिखाया था. एक घर हासिल करने के लिए जरीना वहाब अमोल पालेकर के कहने पर अपने बूढ़े लेकिन रईस बौस मिस्टर मोदी यानी श्रीराम लागू से शादी कर लेती है. लेकिन शादी के बाद उस के भारतीय संस्कार उसे पति को धोखा देने से रोकते हैं और वह उस से ही प्यार करने लगती है. अमोल पालेकर बेचारा हाथ मलता रह जाता है. फिल्म का गाना,  ‘दो दीवाने शहर में रात में और दोपहर में आशियाना ढूंढते हैं…’ खूब बजा था और आज भी शिद्दत से सुना और गुनगुनाया जाता है.

इस फिल्म के आखिरी दृश्य में श्रीराम लागू को हार्ट अटैक आता है, जिसे उन्होंने इतने जीवंत तरीके से जिया था कि हाल में बैठे दर्शकों को वे सचमुच में मरते से लगे थे. फिल्म समीक्षकों ने इस दृश्य को जबरदस्त करार दिया था. मिस्टर मोदी के किरदार के बाबत श्रीराम लागू को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था. घरौंदा की जबरदस्त कामयाबी के बाद भी उन्हें उल्लेखनीय रोल नहीं मिले, लेकिन कई भूमिकाओं को उन्होंने अपने अभिनय के दम पर उल्लेखनीय बना दिया. इन में से एक है प्रकाश मेहरा निर्देशित और अमिताभ बच्चन अभिनीत 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘लावारिस’, जिस ने बौक्स औफिस पर हाहाकार मचा दिया था. लावारिस फिल्म में श्रीराम लागू की भूमिका दूसरे कलाकारों के मुकाबले काफी छोटी थी. वे लावारिस हीरो के पिता बने थे, जो दिनरात शराब के नशे में धुत अपने सौतेले बेटे को गलियां देता रहता है.

यादगार किरदार गंगू गनपत का यह किरदार अनूठा था जिस में में वह बारबार एक खास अंदाज में हरामी, कुत्ता और नाली के कीड़े जैसी गालियां बकता है. तब अमिताभ बच्चन का कैरियर और शोहरत दोनों अपने चरम पर थे पर श्रीराम लागू गंगू गनपत को जीते उन के सामने बिलकुल नहीं लड़खड़ाए थे. इस फिल्म के डायलौग कादर खान ने लिखे थे, जिन्होंने पहली बार नाजायज औलाद की जगह नाजायज बाप शब्द का प्रयोग किया था. इस छोटी सी भूमिका में श्रीराम लागू ने जान डाल दी थी और हैरत की बात यह है कि व्यक्तिगत जीवन में वे शराब और सिगरेट जैसे नशे से परहेज करते थे. फिर 2 साल बाद आई निर्देशक सावन कुमार टांक की फिल्म ‘सौतन’ जिस के संवाद जानेमाने साहित्यकार कमलेश्वर ने लिखे थे.

राजेश खन्ना, टीना मुनीम, पद्मिनी कोल्हापुरे, प्रेम चोपड़ा और प्राण सरीखे नामी सितारों के सामने श्रीराम लागू के पास करने को कुछ खास नहीं दिख रहा था. लेकिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद दर्शकों और फिल्मी पंडितों ने एक सुर में माना था कि श्रीराम लागू ने गोपाल के किरदार में अपनी प्रतिभा से जान डाल दी है. इस फिल्म में वे पद्मिनी कोल्हापुरे के पिता बने थे. दरअसल, यह भूमिका ऐसे अधेड़ गरीब दलित की थी, जिस की परित्यक्ता बेटी पर रईसों ने चारित्रिक लांछन लगा रखा है. एक दयनीय दलित पिता के इस रोल को दर्शकों ने खूब सराहा था तो इसलिए कि यह पात्र और श्रीराम लागू का अभिनय दोनों वास्तविकता के काफी नजदीक थे.

दूसरी कई फिल्मों में वे छोटीमोटी भूमिकाओं में दिखे, लेकिन अधिकांश में उन्हें अभिनय प्रतिभा दिखाने का मौका नहीं मिला और इस का अफसोस भी उन्हें कभी नहीं रहा. 1982 में सुभाष घई की फिल्म ‘विधाता’ में वे खलनायक बने थे, पर दर्शकों ने उन्हें इस रूप में ज्यादा पसंद नहीं किया. हालांकि हास्य को छोड़ कर उन्होंने बेहद सहज तरीके से तमाम भूमिकाएं निभाईं इसीलिए वे फिल्म इंडस्ट्री में एक सहज कलाकार माने जाते थे जो आमतौर पर पब्लिसिटी से दूर रहता था. 90 के दशक में वे हिंदी फिल्मों में न के बराबर दिखे और जिन में दिखे, वे सब की सब सी ग्रेड की फिल्में थीं.

हिंदी फिल्मों से ज्यादा पहचान उन्हें मराठी थिएटर और सिनेमा से मिली ‘पिंजरा’, ‘सिंहासन’ और ‘सामना’ उन की यादगार मराठी फिल्में हैं. नट सम्राट वह पहला नाटक है, जिस की भूमिका के लिए वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे. इस के लेखक विष्णु वामन शिरवाडकर को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. इस नाटक में श्रीराम लागू ने गणपत बेलवलकर की भूमिका निभाई, जिसे मराठी थिएटर में मील का पत्थर माना जाता है. इस नाटक से ताल्लुक रखती दिलचस्प बात यह किंवदंती है कि गणपत बेलवलकर का रोल इतना कठिन है कि जिस किसी  कलाकार ने भी इसे निभाना चाहा, वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया. इस रोल को करने के बाद खुद श्रीराम लागू भी हार्ट अटैक की गिरफ्त में आ गए थे. शायद इसीलिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए नट सम्राट ही कहा.

लगता ऐसा है कि व्यावसायिक सिनेमा के फेर में पड़ कर वे थिएटर से दूर होते चले गए, हालांकि इस बात को उन्होंने एक इंटरव्यू में बेमन से नकारा था, लेकिन अपनी आत्मकथा ‘लमन’, जिस का मतलब माल ढोने वाला होता है, में उन का यह दर्द झलका था. समाजसेवी अन्ना हजारे से वे खासे प्रभावित थे. उन की पत्नी दीपा भी नामी कलाकार रही हैं. हिंदी फिल्मों से श्रीराम लागू को नाम और पैसा तो खूब मिला, लेकिन वह पहचान नहीं मिल पाई, जिस के वह हकदार थे और जिंदगी भर उस के लिए बैचेन भी रहे. शायद ऐसे ही मौकों के लिए मशहूर शायर निदा फाजली ने यह गजल गढ़ी होगी, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता…’

 

 

Bollywood Crime : न हीरोइन बनी न फिल्म मिली, पूर्व CM की बेटी से करोड़ों की ठगी

Bollywood Crime : फिल्म स्टार बनने के सपने में लोग अकसर लाखों गंवा बैठते हैं, लेकिन स्टार नहीं बनते. अलबत्ता ठगी के शिकार जरूर बन जाते हैं.

ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड के पूर्व CM रमेश पोखरियाल निशंक की बेटी आरुषि निशंक के साथ सामने आया है. आरुषि ने मुंबई के 2 प्रोड्यूसर पर ₹4 करोड़ की ठगी करने और धमकी और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया है. यह मामला देहरादून में दर्ज कराया गया है.

कैसे हुई ठगी

आरुषि निशंक फिल्मों (Bollywood Crime) के निर्माण और अभिनय के क्षेत्र में काम करती हैं. आरुषि ने कहा है कि 2 प्रोड्यूसर ने धोखा दे कर भारी रकम ठग लिया है. आरुषि के अनुसार दोनों प्रोड्यूसर उन के घर आ कर खुद को प्रोडक्शन लिमिटेड का प्रोड्यूसर बताते हुए दावा किया कि हम फिल्म ‘आंखों की गुस्ताखियां’ बना रहे हैं. इसलिए हमें एक अभिनेत्री की जरूरत है.

रोल करने के चक्कर में आरुषि झांसे में आ गई और 9 अक्तूबर को एक एमओयू साइन कर दिया. अगले ही दिन 10 अक्तूबर, 2024 को आरुषि से ₹2 करोड़ ले लिए गए. इस के बाद आरुषि से अलगअलग तरह से दबाव डाला गया और नएनए बहाने बना कर 19 नवंबर, 2024 और 27 व 30, अक्तूबर को कुल ₹4 करोड़ वसूल लिए गए.

इनवेस्टमैंट का लालच

आरुषि ने आरोप लगाते हुए यह भी बताया कि दोनों प्रोड्यूसरों ने ₹5 करोड़ देने पर न केवल रोल देने का वादा किया, बल्कि फिल्म मुनाफे का 20% हिस्सा देने का भी वादा किया और साथ ही अगर रोल पसंद नहीं आया तो संतुष्ट भी किया कि उन के द्वारा दी गई पूरी रकम का 15% ब्याज सहित वापस कर दिया जाएगा.

न रोल दिया न ही पैसे

आरुषि ने आरोप लगाते हुए कहा कि प्रोड्यूसरों न तो प्रमोशन किया, न ही स्क्रिप्ट फाइनल की और अंत में मुझे फिल्म (Bollywood Crime) से बाहर निकाल दिया. इस के बाद जब आरुषि ने पैसे मांगे तो कहा कि भारत में शूटिंग पूरी हो गई है अब यूरोप में जारी है और उन की जगह दूसरी अभिनेत्री को ले लिया गया है. इतना ही नहीं, आरुषि ने कहा कि सोशल मीडिया पर मुझे अपमानित किया गया है. प्रोड्यूसरों ने अपनी फिल्म के साथ सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया जिस में आरुषि की जानबूझ कर तसवीर हटा दी गई और उन का नाम भी नहीं दिया गया. आरुषि ने कहा कि असली फोटो में मैं भी शामिल थी.

यहां तक ही नहीं, जब आरुषि ने पैसे वापस मांगे तो उन्हें और उन के परिवार वालों को जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। बदनाम करने और झूठे केस में फंसाने की बात करने लगे.

पुलिस ने दर्ज किया मामला

आरुषि ने दोनों प्रोड्यूसरों के खिलाफ धोखाधड़ी, मानसिक उत्पीड़न, धमकी और अपराधिक षड़यंत्र और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज कराया गया है. आरुषि ने जल्द से जल्द आरोपी प्रोड्यूसरों के खिलाफ काररवाई करने की मांग की है और साथ में ही ₹4 करोड़ वापस दिलाने की मांग की है. एसपी सिटी, देहरादून प्रमोद कुमार ने बताया कि मामला दर्ज कर जांच जारी है, जिस के बाद आगे की काररवाई की जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।