Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.
हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.
स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’
उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.
इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.
देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.
तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.
घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.
इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.
उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.
एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.
पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.
लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’
‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.
‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.
‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.
राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.
हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.
नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.
करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.
फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.
इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.
‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.
इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.
करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.
घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’
राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’
‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’
राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.
नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं. यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.
राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’
दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.
नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी 3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.
राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.
यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’
‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.
लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’
नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’
‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’
‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.
खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.
कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.
5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.
जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.
राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.
इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.
वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.
राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है






