UP News: फरजी आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम लोगों से कितनी मोटी ठगी कर रहा था, इस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस ने मोटी सैलरी पर पीए और असिस्टेंट रख रखा था. साथ ही अत्याधुनिक हथियारों वाली सिक्योरिटी भी लगा रखी थी. 2 लग्जरी गाडिय़ां हमेशा उस के साथ चलती थीं. एक गरीब परिवार का युवक गौरव क्यों बना फरजी आईएएस और कैसे करता था करोड़ों रुपए की ठगी?

बिहार में स्थित सीतामढ़ी की एक अलग पहचान है. इसी जिले के मेहसौल के वार्ड नंबर 37 में किसान चलितर राम अपनी पत्नी जहरी देवी और 5 बेटों राजकुमार राम, हरिकिशोर राम, राजकिशोर राम, गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम और राजनंदन राम के साथ एक झोपड़ी में रहते थे. वह मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. वक्त, हालात और गरीबी की आग में तप कर पांचों बच्चे बड़े हुए.

चलितर राम के पांचों बेटों में चौथे नंबर का बेटा ललित अपने सभी भाइयों से बेहद अलग स्वभाव का था. जिस गरीबी में वह पल कर बड़ा हुआ था, समाज की चकाचौंध से उस की आंखें चौंधिया जाती थीं. जब वह सड़कों पर दौड़ती चमचमाती कारों, चमचमाती बाइक्स, आलीशान और शानदार बिल्डिंग और लोगों की अमीरी में जीने की लग्जरी जिंदगी देखता था तो उस के सीने पर सांप लोट जाता था. अपने बारे में वह सोचता कि वह अमीर के घर में पैदा हुआ होता तो वह भी अच्छेअच्छे कपड़े पहनता, बढिय़ा खाना खाता, चमचमाती कारों में सैर करता और नोट पानी की तरह बहाता.

ललित के दिलोदिमाग पर गरीबी का गहरा असर हुआ और उस ने ठान लिया कि बड़ा हो कर वह इतना पैसा कमाएगा कि उस की कई पुश्तों तक गरीबी कभी नजदीक नहीं आएगी. सुख की मखमली चादर पर चैन की नींद जीवन भर सोएगा. उस के बाद से ललित अपने जीवन को संवारने में जुट गया. तब वह बहुत छोटा था. ललित छोटा ही था, लेकिन बहुत चालाक और बेहद शार्प दिमाग वाला था. इसी उम्र में कहीं सुना था कि शिक्षा विभाग के जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) की तनख्वाह के अलावा उस की ऊपरी आमदनी इतनी होती है कि उस की पूरी तनख्वाह वैसे के वैसे ही बची रहती है.

उस के दिमाग पर इस विचार ने इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उस ने पढ़लिख कर शिक्षा विभाग का डीआईओएस बनने का सपना दिलोदिमाग में बैठा लिया था. उस दिन के बाद से ललित अपने लक्ष्य को पाने के लिए जीतोड़ मेहनत करने लगा और खूब मन लगा कर पढ़ाई करता था, जबकि उस के चारों भाई पापा के साथ मेहनतमजदूरी कर के परिवार का सहयोग करने में जुटे हुए थे. बेटे को पढ़ता देख चलितर राम भी उसे पढ़ाने में पानी की तरह पैसे बहाने लगे थे. ताकि उसे अपने सपने और अपने लक्ष्यों को हासिल करने में कोई दिक्कत न हो.

ललित ने साइंस साइड से पढ़ाई जारी रखी. इंटरमीडियट में वह अव्वल मार्क लाया. बीएससी में मैथ्स ले कर पढ़ाई शुरू की. युवा ललित के सपने आसमान जैसा बड़ा आकार लेने लगे थे. यारदोस्तों का दायरा बढऩे लगा था, उसी के अनुसार उस के जेब खर्चे भी बढऩे लगे थे. पापा की कमाई इतनी नहीं थी कि उसे पढ़ानेलिखाने के साथसाथ फिजूलखर्ची के लिए उसे अलग से पैसे दें. उन्हें तो उस के अलावा परिवार को भी देखना था.

छात्रा से की शादी

जब भी ललित पापा से जेब खर्च के लिए ज्यादा पैसे मांगता तो वह अपनी मजबूरी का रोना रो देते थे. गौरव कुमार को तो सिर्फ पैसों से मोहब्बत थी. घर से जब उस की जरूरतें पूरी नहीं हुईं तो उस ने साल 2017 में घर छोड़ दिया और बांका जिल में रहने लगा. इसी बीच वह रीगा थानाक्षेत्र के रामनगरा की रहने वाली पूजा नाम की लड़की को ले कर भाग गया था. दरअसल, ट्यूशन पढ़ाते हुए ललित को अपनी छात्रा पूजा से प्यार हो गया था और पूजा को अपने कलयुगी गुरु से. दोनों बालिग हो चुके थे और एकदूसरे से शादी भी करना चाहते थे.

पूजा जानती थी कि उस के फेमिली वाले इतनी आसानी से ललित को अपना दामाद नहीं बनाएंगे. दोनों ही अलगअलग जाति से थे, इसीलिए उन्होंने भाग कर अपना घर बसाने का फैसला किया था और भाग कर शादी करने के बाद वे बांका में रहने लगे. पूजा के पापा ने रीगा थाने में ललित के खिलाफ बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज कराया. यह गौरव कुमार उर्फ ललित के खिलाफ यह पहला मुकदमा था. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने बांका से ललित और पूजा दोनों को हिरासत में ले कर कोर्ट में पेश किया.

फ्री कोचिंग का पांसा

चूंकि दोनों बालिग थे और न्यायालय के सामने साथ रहने की अपनी इच्छा जाहिर की तो न्यायालय ने उन्हें साथ रहने की इजाजत दे दी थी. बाद में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा कर यह मुकदमा समाप्त कर दिया था. ललित ने गलत रास्ते पर चलने लिए बांका में पहला कदम रखा था. शार्प दिमाग और मीठीमीठी बातें करने वाला तो वह पहले से था ही, उस ने लोगों को शिकार बनाने के लिए गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और कोचिंग देने की योजना बनाई थी.

यह योजना चल निकली तो प्रति छात्र से मात्र 30 रुपए ले कर कोचिंग शुरू किया और लोगों का विश्वास जीतने के लिए उस ने आदित्य-50 नाम से कोचिंग और ललित वेलफेयर एसोसिएशन नाम से एक संस्था खोल ली. ललित लोगों को दिखाना चाहता था कि वह समाज के लिए कुछ करना चाहता है, लेकिन उस की योजना कुछ और ही थी. जिस आदित्य-50 नाम से कोचिंग खोल लिया था, वहां गरीब परिवार के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था.

फिर पटना के शिक्षा विभाग में उस ने अपनी अच्छी पकड़ बना ली थी और मुफ्त कोचिंग के नाम पर विभाग से एक लैटर भी जारी करा लिया था. इन लैटर का इस्तेमाल कर उस ने अपने कोचिंग सेंटर में दाखिले के लिए जिले के सरकारी स्कूलों में प्रवेश परीक्षा तक आयोजित करानी शुरू कर दी थी. छात्रों को भरोसा दिलाने के लिए मैट्रिक और इंटरमीडियट के मेधावी छात्रछात्राओं को समयसमय पर सम्मानित भी करता रहा. जब उसे यह अहसास हो गया कि यहां के लोग उस पर अंधा विश्वास करने लगे हैं तो उस ने अपना असली काम करना शुरू किया, जो उस का मकसद था.

ललित लोगों को नौकरी दिलाने, बीएड कराने और विभिन्न कोर्सों में एडमिशन कराने का खेल खेल कर लोगों से पैसे लेने लगा. इसी दौरान राजेश नाम के एक छात्र को नौकरी दिलाने के नाम पर उस से 2 लाख रुपए लिए. महीनों बीत जाने के बाद भी जब राजेश को ललित की ओर से कोई माकूल जवाब नहीं मिला तो उसे गुरु ललित पर शक हो गया. वह अपने रुपए उस से वापस मांगने लगा तो ललित रुपए लौटाने में आनाकानी करने लगा.

राजेश को यह समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ गुरु ललित ने धोखा किया है. वह सीधा थाने पहुंच गया और अपनी आपबीती सुना कर कोतवाली में मुकदमा दर्ज करा दिया. जालसाजी और धोखाधड़ी का  मुकदमा दर्ज होते ही ललित के होश उड़ गए. सामने अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा कि जीवन में वह कभी सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. उस के बाद पत्नी को साथ ले कर एक मई, 2022 की आधी रात में वह वहां से फरार हो गया. पुलिस जांच में पता चला कि बांका से उस ने करीब ढाई करोड़ रुपयों की ठगी की है.

जांच में यह पता चला कि उस ने अपने करीबियों तक को नहीं छोड़ा था. जिस मकान में वह किराए पर रहता था, उस के मालिक से भी 12 लाख की ठगी की थी. इस के बाद ललित भूमिगत हो गया और एक साल तक गायब रहा. इसी दौरान उस ने अपने साले अभिषेक कुमार सिंह से संपर्क साधा. शातिर गौरव कुमार उर्फ ललित जानता था कि उस का साला अभिषेक सौफ्टवेयर इंजीनियर है. कंप्यूटर की उसे अच्छी जानकारी है. अगर उसे अपने गिरोह में शामिल कर ले तो ठगी के धंधे में चार चांद लग जाएगा और धंधा भी खूब चलेगा.

साला बना हमराज

फरारी के दौरान ललित परिवार सहित सीतामढ़ी आया और किराए का कमरा ले कर रहने लगा. इसी बीच उस ने साले अभिषेक से संपर्क साधा. अभिषेक पहले तो उस से मिलने से इंकार करता रहा, लेकिन उस ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों में उलझा कर उस के उज्ज्वल भविष्य और लाखों रुपए की इनकम के सुनहरे सपने दिखा कर अपनी ओर खींच लिया. बहनोई का साथ देने के लिए वह तैयार हो गया.

दरअसल, गौरव अपनी कार्ययोजना को असल दिखाने के लिए जालसाजों से मिल कर उन्हें मोटी रकम दे कर फरजी दस्तावेज बनवाता था, लेकिन जब से उसे पता चला था कि जो काम वह जालसालों से मिल कर कराता है. वह काम कंप्यूटर के एआई से शतप्रतिशत कराया जा सकता है और उस पर जल्द किसी को शक भी नहीं हो सकता. तभी से वह साले अभिषेक से मिलने के लिए बेताब हो गया था. साले से मिलने के बाद उस ने अपने पूरे नेटवर्क को अच्छी तरह समझाया कि जो भी ठगी के धंधे में कमाई होगी, उस में से आधाआधा दोनों बांट लेंगे.

ललित साले की मदद से इस की टोपी उस के सिर और उस की टोपी इस के सिर पहना कर करोड़पति बन गया था. उस की लाइफस्टाइल बदल चुकी थी. महंगे कपड़े पहनना, लजीज खाना खाना, होटलों में रंगरलियां मनाना, चमचमाती कार में सैर करना, ऐपल कंपनी के महंगे 2 मोबाइल हाथों में ले कर घूमना और फेसबुक पर सुंदर लड़कियों से चैटिंग करना उस की आदत बन गई थी.

ललित की झोली में जब करोड़ों रुपए आ गए तो उस ने अपने सपने को जीवंत रूप देने के लिए एक फरजी रूपरेखा तैयार की. उस का सपना जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) से आईएएस बनना था, लेकिन बांका जिले में जब उस पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज हुआ था, तब से उस का सपना धरा का धरा रह गया था. वह जानता था कि इस जन्म में उस का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता. तो क्यों न इसी चोले को पहन कर एक फरजी आईएएस बन कर सामने आऊं? उस की इस योजना पर साले अभिषेक ने भी हां में हां मिला दी थी.

ठगी की दुकान चलाने के लिए ललित को अपने साले अभिषेक जैसे एक और राजदार की जरूरत थी, जो उस के गुनाहों की कुंडली को अपनी आस्तीन में छिपा कर रख सके. उस के धोखाधड़ी और जालसाजी की इमारत को बुलंदियों तक पहुंचाने में मददगार साबित हो सके, कभी पकड़ा जाए तो राज को अपने सीने में दफना सके, सच न उगले.

गौरव कुमार उर्फ ललित किशोर राम के साले अभिषेक सिंह का एक ऐसा दोस्त था, जो उस का हमराज ज्यादा और दोस्त कम था. उस का नाम परमानंद गुप्ता था. वह गोरखपुर जिले के गोरखनाथ थानाक्षेत्र का रहने वाला था. अभिषेक और परमानंद के बीच में दांतकाटी रोटी जैसी दोस्ती थी. अकूत पैसों के लालच की चाशनी में डुबो कर अभिषेक ने अपने गिरोह में उसे भी शामिल कर लिया था. गौरव कुमार ने अपने मुखौटे के ऊपर एक और मुखौटा पहन लिया. अब उस ने ललित किशोर राम नाम को भूतकाल के गर्भ में दफना दिया और आईएएस गौरव कुमार सिंह के रूप में नया अवतरण लिया.

इस के लिए उस ने अपने साथ बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों से लैस बौडीगार्ड, 2 सफेद कलर की लग्जरी गाडिय़ां, 2 मंहगे आईफोन के साथ अपने स्टेटस को मेनटेन रखने के लिए हर महीने करीब 5 लाख रुपए पानी की तरह बहाने का फैसला लिया, ताकि लोगों को लगे कि वह सचमुच एक आईएएस अधिकारी बन गया है.

बना फरजी आईएएस

झूठ, मक्कारी, बेइमानी, हरामखोरी, ठगी और व्यभिचारी की दुकान सजाने के एक साल बाद यानी साल 2023 में ललित किशोर राम, अपने नाम को दफना कर आईएएस गौरव कुमार सिंह के रूप में प्रकट हुआ तो उस के हावभाव और लग्जरी लाइफस्टाइल को देख कर हर कोई हैरान रह गया था. सभी के मुख से यही निकलता था उस ने जो सपना देखा था, अपनी कड़ी मेहनत और लगन से हासिल कर लिया. आखिरकार उस के आईएएस बनने का सपना पूरा हो ही गया.

ललित उर्फ गौरव के आईएएस अधिकारी बनने पर उस के नातेरिश्तेदार और यारदोस्त गर्व से फूले नहीं समाए थे. जो कल तक चलितर राम की गरीबी पर तरस खा रहे थे, आज वही गौरव जैसे होनहार अफसर बनने पर उस की एक झलक पाने के लिए लालायित हो रहे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस दिखावे के मुखौटे के पीछे का सच क्या है. जिसे वह एक आईएएस अफसर समझ रहे थे, वह एक बड़ा ठग था.

बहरहाल, महाठग और चरित्रहीन गौरव कुमार ने अपनी लाइफस्टाइल इतनी चमकदार बना दी थी कि कोई भी उसे आईएएस अधिकारी समझने में देर नहीं करता था. जब चलता कीमती ब्रांडेड कपड़े पहनता, 2-2 लग्जरी गाडिय़ों और बड़ी संख्या में प्राइवेट गार्ड के साथ चलता, महंगे होटलों में ठहरता, लोगों से मिलता और पटना की रहने वाली अपनी एक गर्लफ्रेंड के साथ रात भर होटलों में अय्याशी करता था. बात 15 अप्रैल, 2025 की है. ललित उर्फ गौरव पटना के जिस होटल में ठहरा था, उसी होटल में मोकामा के एक बड़े ठेकेदार मुकुंद माधव भी किसी जरूरी काम से आ कर ठहरे हुए थे. वह सरकारी विभाग से ठेका लेते थे और करोड़ों कमाते थे.

होटल के बाहर बड़ी संख्या में चमचमाती लग्जरी कारों और अत्याधुनिक हथियारों से लैस बड़ी संख्या में सुरक्षा गार्डों को देख कर मुकुंद माधव हैरान रह गया था. उस से जब रहा नहीं गया, तब उस ने होटल के मैनेजर से पूछा था कि यहां कोई वीआईपी परसन आया है क्या, बड़ी संख्या में जहांतहां सुरक्षा गार्ड तैनात हैं?

ऐसे फंसा ठेकेदार

उसी दौरान मुकुंद माघव को पता चला कि इसी होटल में एक आईएएस अधिकारी रुके हुए हैं और अपने मातहतों से मीटिंग ले रहे हैं. यह जान कर पता नहीं क्यों ठेकेदार मुकुंद बहुत प्रभावित हुआ और उन से मिलने की अपनी इच्छा जाहिर की. बातचीत के दौरान ही पता चला कि साहब के पर्सनल असिस्टेंट अभिषेक कुमार हैं. मुकुंद किसी तरह अभिषेक से मिला और मिल कर साहब से मीटिंग कराने की अपनी इच्छा जाहिर की. उस ने कहा कि आप की मीटिंग साहब से जरूर करा देंगे, लेकिन थोड़ा वक्त देना होगा आप को, क्योंकि साहब अभी मीटिंग ले रहे हैं. मीटिंग से फारिग होते ही आप की मुलाकात उन से करा दूंगा.

मुकुंद माधव इस पर रजामंद हो गया और गौरव साहब से मिलने के लिए इंतजार करने लगा. काफी इंतजार के बाद वह मौका उसे मिल ही गया, जिस के लिए वह बेताब था. मीटिंग खत्म होतेे ही गौरव ने असिस्टेंट अभिषेक को फोन किया और उसे अंदर बुलाया तो अभिषेक उसे ले कर गौरव के पास गया और परिचय कराते हुए कहा, ”साहब, ये मुकुंद माधवजी हैं, पेशे से एक ठेकेदार हैं और सरकारी विभागों के ठेके लेते हैं, आप से मिलने के लिए काफी बेताब थे.’’

”ठीक है, आप बाहर जाइए मैं मुकुंद साहब से मिल ले रहा हूं.’’ गौरव का आदेश पाते ही अभिषेक कमरे से बाहर निकल गया और इशारे से सामने खड़े मुकुंद माधव को सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया तो वह बेहद खुश हुआ और इधरउधर देख कर बड़े फख्र के साथ सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

”तो आप क्या करते हैं, मुकुंद साहब. कुछ अपने बारे में बताएं?’’ गौरव ने मुकुंद से सवाल किया.

”सर, मैं पेशे से एक ठेकेदार हूं. सरकारी विभागों के टेंडर लेता हूं, निर्माण का कार्य कराता हूं.’’ सहज हो कर मुकुंद ने जबाव दिया.

”कितना कमा लेते होगे?’’

”क्या सर, क्यों मजाक कर रहे हैं. आप तो जानते ही हैं ठेकेदार की दुकान चलती ही कहां है? अफसरों को कमीशन देने के बाद जैसेतैसे दालरोटी का जुगाड़ हो जाता है, कहां कमाई होती है इस में.’’

”अरे मुकुंद साहब, कहां करोड़ 2 करोड़ के ठेके के चक्कर में पड़े हैं, मैं आप को केंद्र सरकार का 450 करोड़ रुपए का ठेका दिलवाता हूं. ऐसे ठेके तो मेरे कोई चाहने वाला भी नहीं पूछता है. आप बाहर की दुनिया में निकलो, यहां रुपए हवा में तैर रहे हैं, उन्हें पकड़ो.’’

”आप का मतलब नहीं समझा सर. बुरा न मानें तो मैं ये कहना चाहता हूं कि अपनी बात विस्तार से कहें तो कुछ समझ में बात आती?’’

”अरे भई, क्यों परेशान हुए जा रहे हो आप. मिलते रहना, बात भी समझ में आ जाएगी और काम भी खूब दिखेगा. अभी मुजफ्फरपुर से मीटिंग ले कर लौट रहा हूं. अफसरों को राइट टाइम कर के आ रहा हूं. काम के प्रति ये अफसर बहुत मनमानी करते हैं, थोड़ी छूट

क्या दे दो, इन्हें सिर पर सवार हो कर तांडव करने की आदत सी हो जाती है, इसलिए समयसमय पर इन्हें राइट टाइम करना होता है.’’

”ठीक सर.’’ मुकुंद माधव ने सपाट जवाब दिया, ”कैसे मुलाकात हो सकती है आप से?’’

”जब चाहो मिल सकते हो, मैं अपने पीए से बोल देता हूं वो आप को मेरा पर्सनल मोबाइल नंबर दे देगा, फोन कर के जब चाहो, आ कर मिल सकते हो.’’

”ओके सर.’’ मुसकरा कर मुकुंद ने जवाब दिया, ”मैं पीए साहब से नंबर ले लेता हूं और फिर जब भी मिलना होगा तो फोन कर के मिलने आ जाऊंगा.’’

ठेकेदार मुकुंद माधव तथाकथित आईएएस गौरव से मिल कर बहुत खुश था. उसे तो अपने ऊपर यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई ऐसा भी अधिकारी होगा, जो दूसरों के बारे में ऐसा सोचता होगा. उस दिन के बाद से मुकुंद माधव गौरव का मुरीद हो गया. इधर शातिर गौरव थोड़ी देर के बातचीत से मुकुंद माधव के बारे में पूरी जानकारी ले ली थी और जान चुका था पार्टी मोटा आसामी है, रुपए उगलेगा. उसे अपने ठगी के बोतल में कैद कर रखना होगा, इस के लिए उसे जो भी जुगत करना पड़े, वह सब करेगा. उस दिन के बाद से गौरव और मुकुंद माधव की नजदीकियां और बढ़ती गईं.

इस बीच में गौरव ने अपनी ठगी का नेटवर्क बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश तक फैला लिया था. ज्यादातर उस का समय गोरखपुर के गुलरिहा थाना क्षेत्र के झुंगिया लाला कालोनी में बीतता था. इसी इलाके में 25 हजार रुपए के रेंट पर 3 बीएचके का एक शानदार फ्लैट लिया था और पत्नी पूजा व दोनों बच्चों के साथ रहता था. कालोनीवासी फरजी आईएएस गौरव के रुतबे और ठाठबाट से बेहद प्रभावित थे.

उन्हें जान कर बड़ी खुशी हो रही थी कि उन के पड़ोस में एक आईएएस अधिकारी रहता है, जिस के प्रभाव से कालोनी का कायाकल्प हो गया था. मुश्किल से मुश्किल काम यूं चुटकियों में करा देता था. ये सब कुछ ललित किशोर राम उर्फ गौरव कुमार सिंह की सोचीसमझी रणनीति के तहत हो रहा था. उस का सोचना था कि ठगी की यह दुकान बहुत दिनों तक यूं नहीं चलती रहेगी, एक न एक दिन   भांडा फूटना ही है, तब पुलिस की पकड़ से बचने के लिए यहीं शरण लेनी होगी.

 

उस ने लखनऊ की पौश कालोनी आशियाना में 50 लाख रुपए में 2 बीएचके का शानदार फ्लैट ले रखा था और फेसबुक के जरिए गोरखपुर में 3 और लड़कियों को अपनी गर्लफ्रेंड बनाए हुए था. तीनों गर्लफ्रेंडों को लंबीलंबी सब्जबाग दिखा कर, यहांवहां होटलों में घुमा कर उन्हें प्रैगनेंट कर दिया था. वो भोलीभाली लड़कियां उसे आईएएस समझ के उस के साथ बिस्तर गरम करने को तैयार हो गई थीं और अपना जीवन उस महाठग को सौंप बैठी थीं. इधर, शातिर गौरव मुकुंद माधव को अपने जाल में फांसने के लिए 450 करोड़ का ठेका दिलाने का जाल फेंका. उसे विश्वास की बोतल में उतारने के लिए उस ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के माध्यम से फरजी 450 करोड़ रुपए के टेंडर का पेपर तैयार कर के उस के वाट्सऐप पर भेजा.

एक अखबार की कटिंग भी भेजी. उस में 450 करोड़ रुपए के टेंडर के बारे में विज्ञप्ति दी हुई थी. यह देख कर उस की खुशियों का ठिकाना ही नहीं रहा. और वह टेंडर पाने के लिए गौरव के पीछे पड़ गया. गौरव तो यही चाहता था कि यह आसामी मेरे चंगुल में किसी तरह फंस जाए. गौरव ने टेंडर पाने के बदले उस से कुछ चढ़ावा चढ़ाने के लिए कहा तो वह आसानी से तैयार हो गया और उस ने पहली किस्त के तौर पर एक करोड़ रुपए कैश दिया.

यही नहीं 4-5 महीने में उस ने उसे करीब 5 करोड़ दे दिए. इस के साथ ही उस ने लग्जरी गाडिय़ां, ड्राइवर और दूसरे राज्य से निजी गार्ड भी इस ने गौरव के लिए दिलाए थे. इसी दौरान एक दिन की बात है. ठेकेदार मुकुंद माधव गौरव से मिलने शहर के लग्जरी होटल गया. देर रात होटल में एक 20 वर्षीय खूबसूरत युवती आई. होटल के सभी लोग उसे देखने लगे. वह भी ठगा सा उसे देखता रह गया. वह सीधी गौरव के कमरे में दाखिल हुई. वह युवती उस की गर्लफ्रेंड थी. तब गौरव ने उस से झूठ बोला और कहा कि वह उस की बहन की बेटी है. किसी काम से वह मिलने आई है. फिर वह वहां से उठा और गर्लफ्रेंड को ले कर दूसरे कमरे में चला गया और पूरी रात अपने कमरे बाहर नहीं आया.

अगली सुबह मुकुंद माधव, फिर उस से मिलने होटल आया तो उस के साथ के एक गार्ड ने उस गर्लफ्रेंड को ‘भाभी’ कह कर आपस में मजाक किया. इस के बाद सभी गार्ड आपस में हंसने लगे. यह सुन कर मुकुंद को बड़ा अजीब लगा. और उसे शक भी हुआ कि ये कैसा मजाक कर रहे हैं, फिर वह यह सोच कर चुप रह गया कि बड़े लोग हैं, उन के लिए यह आम बात होती है, मेरे से क्या लेनादेना. मेरे को तो मेरा काम होने से मतलब है. उस के बाद वह बिना मिले ही वहां से चला गया.

एसडीएम को पीटा

इस दौरान एक घटना और घटी थी. फरजी आईएएस गौरव अपना लावलश्कर ले कर भागलपुर जिले में विद्यालय निरीक्षण करने पहुंच गया था. वहां से निरीक्षण कर के वापस पटना लौट रहा था तो उसी इलाके के एक एसडीएम से उस की टक्कर हो गई. एसडीएम साहब उस से सवाल कर बैठे कि आप कौन हैं? कहां से आ रहे हैं? आप किस बैच के आईएएस हैं?

इतना सुुनना था कि गौरव का पारा आसमान पर चढ़ गया और उस ने आव देखा न ताव एसडीएम साहब के गाल पर 2 थप्पड़ जड़ दिए और कहा, ”दो टके के एसडीएम तुम्हारी इतनी मजाल कि एक आईएएस अधिकारी से उस की नियुक्ति के बारे में सवाल करे. हटो मेरे रास्ते से वरना ऐसी जगह तुम्हारा ट्रांसफर करवा दूंगा, जहां एक बूंद पानी के लिए तरह जाओगे, समझे.’’

उस के बाद गौरव अपने काफिले के साथ रवाना हो गया और एसडीएम साहब चुपचाप वहां से खिसक लिए और अपनी इज्जत बचाने के लिए किसी से भी इस का जिक्र तक नहीं किया.

धीरेधीरे साल बीत गया. न तो मुकुंद माधव को टेंडर मिला और न ही गौरव उसे अपनी बातों से संतुष्ट ही कर पा रहा था. तब उसे गौरव पर शक गहरा गया. उसे अपने साथ ठगे जाने का अहसास हुआ तो उस ने सामान्य तरीके से अपने रुपए वापस करने का दबाव बनाया, तब गौरव उसे अपनी गीदड़भभकियों से डरा कर चुप कराना चाहता था, लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया और बाद में रुपए लौटा देने का वायदा किया. इसी बीच नवंबर 2025 में बिहार में चुनाव होना तय हुआ तो प्रशासन सख्त हुआ और हवाला के जरिए आने वाले रुपयों पर नजर रखी जाने लगी.

बात 7 नवंबर, 2025 की सुबह लगभग सवा 7 बजे की है. गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर दिल्ली से चल कर वैशाली (बिहार) को जाने वाली सुपरफास्ट एक्सप्रैस वैशाली आ कर रुकी थी. थर्ड एसी बोगी में एक काले रंग की बड़ी अटैची ले कर मुकुंद माधव सवार हो गया था. वह गौरव से रुपए ले कर गोरखपुर से मुजफ्फरपुर जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ था. उसी समय जीआरपी इंसपेक्टर अनुज कुमार सिंह अपने हमराहियों के साथ ट्रेन में रुटीन चैक करने के लिए अंदर प्रवेश किए.

इंसपेक्टर अनुज के साथ खोजी कुत्ता भी था, जो जांच में उन की मदद करता था. जैसे ही कोच में घुसे तो सीट के नीचे उन्हें काले रंग की बड़ी अटैची दिखी. बोगी में सवार यात्रियों से उस अटैची के बारे में पूछा तो किसी ने भी नहीं कहा कि वो अटैची मेरी है. लेकिन सीट पर सामने बैठे मुकुंद माधव के माथे पर पसीना चुहचुहा उठा और वह थरथर कांपने लगा तो इंसपेक्टर अनुज को उस पर शक हुआ और उस से सवाल कर बैठे, ”क्या बात है आप इतना घबराए हुए क्यों हो? यह अटैची आप की है क्या और इस में क्या है?’’

इंसपेक्टर अनुज के किसी भी सवाल का उस ने उत्तर नहीं दिया तो उन्होंने अटैची सहित उस से नीचे उतरने को कहा. हमराही अटैची और मुकुंद माधव को ले कर ट्रेन से नीचे उतरे और सीधा जीआरपी थाने पहुंचे. अटैची बहुत भारी थी. थाने पहुंच कर इंसपेक्टर ने अपने हमराहियों से उसे खोलने के लिए आदेश दिया. अटैची खुली तो उसे देख कर सब की आंखें चौंधियां गईं. अटैची 500-500 के नोटों से भरी पड़ी थी.

रुपयों को ले कर पुलिस उस से पूछताछ करने लगी कि इस में कितने रुपए हैं और इन रुपयों को ले कर कहां जा रहे थे? इस पर उस ने जवाब दिया कि ये रुपए उस के एक दोस्त ने दिए हैं. इन्हें ले कर बिहार के मुजफ्फरपुर जा रहा था. इस बाबत उस से रसीद मांगी गई तो उस ने अपने पास रसीद न होने की बात कह कर अपनी लाचारी व्यक्त कर दी. पुलिस मुकुंद माधव के जवाब से संतुष्ट नहीं थी और सूचना आयकर विभाग को दे दी गई. आयकर विभाग के अधिकारी अपने साथ रुपए गिनने वाली 2 मशीनें ले कर आए और रुपयों की गिनती शुरू हुई. घंटों की गिनती में 99 लाख 90 हजार रुपए सामने आए.

ठीकठीक जवाब न देने पर पुलिस ने रुपए तो जब्त कर ही लिए, साथ ही साथ जेल भी भेज दिया. जेल जाने से पहले उस ने पुलिस को इतना जरूर बताया था कि उसे ये रुपए आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह ने दिए थे, जो गुलरिहा में रहते हैं. इस घटना के करीब 3 सप्ताह बाद गोरखपुर में एक ठेकेदार फरजी टेंडर के साथ पकड़ा गया. जब पुलिस ने उस से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने भी आईएएस गौरव कुमार सिंह का नाम लिया था कि उन्हीं के द्वारा टेंडर के सारे पेपर उपलब्ध कराए गए थे. उस के मुंह से यह सुन कर पुलिस चौंक गई.

पुलिस ने गौरव सिंह के बारे में पता लगाया तो आईएएस गौरव सिंह का कहीं किसी बैच में नाम आया ही नहीं. तो पुलिस अधिकारियों को उस पर शक हो गया. चूंकि मामला एक आईएएस अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए डायरेक्ट उस पर हाथ नहीं डाला जा सकता था, इसलिए गोरखपुर के अधिकारियों ने जांच कराने का फैसला लिया. एसएसपी राजकरन नैय्यर ने एसपी (सिटी) अभिनव त्यागी को आईएएस गौरव सिंह के बारे में गोपनीय जांच कर के रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए.

एसपी (सिटी) ने गौरव के बारे जांच के लिए लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (एलआईयू) विभाग को नामित किया. जांच का आदेश मिलते ही एलआईयू विभाग सक्रिय हो गया और आगे की काररवाई में जुट गया. इसी बीच गोरखपुर की रहने वाली एक अन्य प्रेमिका ने एसएसपी को एक शिकायती पत्र सौंपा. उस ने भी फरजी आईएएस गौरव सिंह के खिलाफ प्रेम के जाल में फांस कर गर्भवती बना कर मुंह मोड़ लेने की शिकायत की थी.

इधर एक महीने में एलआईयू विभाग ने आईएएस गौरव कुमार सिंह के खिलाफ जांच कर के रिपोर्ट एसएसपी राजकरन नैय्यर को सौंप दी थी. जांच रिपोर्ट पढ़ कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई थी. आईएएस गौरव कुमार सिंह नाम का कोई भी आईएएस अधिकारी अस्तित्व में था ही नहीं. लोग जिसे आईएएस समझ रहे थे, वह बिहार के सीतामढ़ी जिले का रहने वाला महाठग था, जिस के शिकार करीब 40 लोग बन चुके थे और करोड़ों रुपए की ठगी कर चुका था. जिस में बिहार के मोकामा के रहने वाले ठेकेदार मुकुंद माधव को उस ने सब से ज्यादा चूना लगाया था.

पीए, सहायक अरेस्ट

7 दिसंबर, 2025 को मुकुंद माधव गौरव से मिलने उस के आवास गुलरिहा पहुंचा तो गेट पर ताला जड़ा मिला और वह परिवार सहित गायब था. फिर मुकुंद माधव गुलरिहा थाने पहुंचा और अपने ठगे जाने की लिखित तहरीर सौंपी. इधर जांच में साबित हो ही गया था कि गौरव कुमार सिंह कोई आईएएस अधिकारी नहीं, बल्कि एक महाठग है.

पुलिस ने बीएनएस की विविध धाराओं- 204, 205, 319(2), 318(4), 338, 336(3), 340(4), 351(3), 61(2), 316(2) के तहत गौरव कुमार सिंह और उस के 2 साथियों अभिषेेक सिंह व परमानंद गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई. मुकदमा दर्ज होते ही वह भूमिगत हो गया था, लेकिन पुलिस अपनी अथक मेहनत से 9 दिसंबर, 2025 को सुबह के समय गुलरिहा से उसे गिरफ्तार करने में सफल हो गई थी. उस की निशानदेही पर पीए बना उस का साला अभिषेक सिंह और सहायक परमानंद गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया था.

फरजी आईएएस गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम को गिरफ्तार करते ही पुलिस ने उस के दोनों मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिए. दोनों फोन की जांच की गई तो उस के फोन में 4 गर्लफ्रेंड होने और उन से बातचीत करने के प्रमाण मिले थे. उसी से पता चला कि 4 में से 3 गर्लफ्रेंड प्रैग्नेंट थीं. यही नहीं, उस ने 5 महीने पहले अपने मोबाइल फोन का सारा डाटा डिलीट कर साक्ष्य मिटा दिए थे, ताकि पकड़े जाने पर पुलिस उस की सच्चाई तक कभी पहुंच न सके.

पूछताछ में उस ने बताया था कि वह पिछले कई सालों से यह धंधा कर रहा था. पुलिस ने उस के घर से कई फरजी दस्तावेज बरामद किए. इन दस्तावेजों को एआई के माध्यम से एडिट कर के तैयार किया गया था. 60 हजार रुपए तनख्वाह पाने वाला साला अभिषेक ही उस का पीए बन कर यह दस्तावेज तैयार करता था. तलाशी के दौरान घर से 2 लाख 96 हजार 500 रुपए नकद बरामद किए. फरजी आईएएस गौरव कुमार सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसी दिन शाम को एसएसपी राजकरन नैय्यर ने पुलिस लाइन स्थित वाइट हाउस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर केस का खुलासा किया.

इस के बाद तीनों आरोपियों को अदालत में पेश कर गोरखपुर मंडलीय कारागार, बिछिया भेज दिया. कथा लिखे जाने तक फरजी आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम के खिलाफ जांच जारी थी. जांच में रोजाना नएनए कारनामे उजागर हो रहे हैं. एसएसपी राजकरन नैय्यर ने लोगों से अपील की है यदि कोई भी व्यक्ति गौरव से ठगी का शिकार बना है तो उस की शिकायत पुलिस से कर सकता है. उस का नाम और पता गुप्त रखा जाएगा. UP News

 

 

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...