Hindi Kahani: राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. वह दिन में अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. दोनों का प्रेम अमर था. लेकिन सुलतान अलाउद्दीन ने छिताई पर नजर डाली तो सब कुछ गड़बड़ा गया. इस के बावजूद दोनों मिल कर ही रहे.
सुलतान अलाउद्दीन खिलजी बुरी तरह फंस गया था. उसे गुमान नहीं था कि यादव राजा रामदेव की दासियां इतनी तेज हैं कि उड़ती चिडि़यों को पहचान ही नहीं लेतीं, जमीन से उन के कान भी काट लेती हैं. अलाउद्दीन अपना नाम सुन कर भागना चाहता था, मगर वह औरत जो दासी मालूम पड़ती थी, उस से अधिक फुर्तीली निकली. उस ने अपनी कमर में बंधी कमंद को भागने वाले पर निशाना लगा कर फेंका. भागने वाला कमंद में फंस कर रह गया. उस की मुश्कें कस चुकी थीं और वह अपनी कमर में एक ओर बंधे नेजे को निकाल नहीं पा रहा था.
तब तक वह औरत एकदम रूबरू आ खड़ी हुई. बोली, ‘‘कटारी मेरे पास भी है बादशाह सलामत. हथियार मत इस्तेमाल कीजिए वरना पछताइएगा. मैं जरा भी आवाज दूंगी तो हमारे सिपाही दौड़े आएंगे. आप के इस तरह पकड़े जाने पर आप की फौज को भागने का रास्ता न मिलेगा, जान लीजिए.’’
अलाउद्दीन खूब अच्छी तरह जानता था कि वह चालाक औरत एकदम सही कह रही थी. उस के पकड़े जाते ही लड़ाई का पासा पलट जाएगा. चाहे बाद में दिल्ली की फौज उसे छुड़ा ले, इस राज्य को नूस्तनाबूद कर दे, मगर उस पर जो धब्बा लग जाएगा, वह फिर न मिटेगा. यह भी हो सकता है कि राजा रामदेव उसे हाथियों से कुचलवा दें या भयानक खाई में फेंकवा दें. वह एकबारगी सिहर उठा. उस ने अपनी हेकड़ी में अकेले इधर आ कर कितनी बड़ी गलती की है. राघो (राघव) चेतन से अलाउद्दीन का प्रस्ताव सुन कर राजा रामदेव का उबल पड़ना बिलकुल वाजिब था.
राघव ने मना किया था कि वह सांप के बिल में न घुसे. मगर सुलतान को अपनी सूझबूझ और बहादुरी पर कुछ ज्यादा ही इत्मीनान हो गया था. अब वह क्या कर सकता था, सिवाय गिड़गिड़ाने के. न जाने यह शैतान की खाला क्या गुल खिलाएगी?
चापलूसी और चालाकी में अदाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप तो बेकार नाराज हो रही हैं. मैं तो शिकार करने आया था. सोचा, कोई परिंदा है. इसी वास्ते लपका था. बताइए, मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूं?’’
उस दासी ने, जिस का नाम मैनरूह था, जवाब दिया, ‘‘सेवा तो हमारे महाराज आप को बताएंगे. मैं क्या बताऊंगी? बस, अब आप चले चलिए चुपचाप.’’
बड़ी आजिजी से अलाउद्दीन बोला, ‘‘बड़ी बी, आप खामखा नाराज हो रही हैं. शाम हो रही है. मुझे नमाज पढ़ना है. आप जानती हैं. मशहूर है, मैं दीन ईमान का पाबंद और मजहबी सुलतान हूं. मैं इस वक्त खजाने के साथ तो नहीं आया. मगर मेरा ईमान मेरे साथ है. मैं आप को रानी बना दूंगा. जितनी चाहिए, दौलत मैं आप को दे दूंगा. गले का हार बतौर इत्मीनान अभी दे दूंगा. बस मुझे आजाद कर दीजिए.’’
दासी मैनरूह ने सख्ती से उत्तर दिया, ‘‘सुलतान, माफ करना, जिस इंसान को जिस चीज की भूख होती है, उसे वही हर कदम पर याद आती है. आप के पास अगर सही मायने में दौलत होती तो आप मुझे यह लालच न देते. मेरे महाराज ने आज तक किसी को इस तरह का लालच नहीं दिया, क्योंकि देवगिरि देवताओं और ऋषियों का बसाया है. यहां जीने वाली ताउम्र रानी रहती है. मुझे क्या कमी है, जो आप मुझे देंगे? आप को महाराज के सामने जरूर ले जाऊंगी. वही न्याय करेंगे.’’
अलाउद्दीन एकदम घबरा उठा. उसे यह अंदाज हो गया था कि यह दासी गरीब हो या न हो, मगर अपने मजहब में और अपने स्वामी राजा रामदेव में विश्वास रखती है. उस ने चट दूसरा पासा फेंका, ‘‘आपा जान, आप ने मेरी बात समझी नहीं. मैं आप को आप के ईमान से रत्ती भर नहीं डिगाना चाहता. आप सोचिए, एक बहन के जरिए एक सुलतान को बेबस बना कर दरबार में पेश किया जाए तो क्या उस के लिए यह डूब मरने की बात नहीं है? मैं इसी तालाब में कूद कर जान दे दूंगा, मगर अपनी शान में हरगिज बट्टा नहीं लगने दूंगा. आप मुझे जिंदगी नहीं दे सकतीं, तो क्या? आप मेरी मौत नहीं रोक सकतीं. अगर ऐसा हो गया तो आप को आप की सौगंध है, आप हमेशा अपने पाप में झुलसती रहेंगी. एक मजहबी सुलतान को आप ने बिना लड़े या चेतावनी दिए धोखे से पकड़ लिया है.’’
मैनरूह एक बार कांप गई. अगर अलाउद्ीन तालाब में कूद पड़ा, या उस ने हीरा चूस लिया या सीने में छुरी घोंप ली और मर गया तो इस का पाप किसे लगेगा? उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘नहीं नहीं, तुम हमारे महाराज का भेद लेने यहां आए थे. मैं पेश कर दूंगी. वही तुम्हारा न्याय करेंगे.’’
अलाउद्दीन के मन में उम्मीद जगी. बोला, ‘‘अगर मुझे भेद लेने के लिए आना होता तो खुद अकेले बिना तलवार क्यों आता? मैं तो आप लोगों के ईमान को जानता हूं. आप कभी किसी निहत्थे को नहीं छुएंगे. यह आप के धरम का कौल है. भेद लेने के वास्ते मैं भेष बदल कर अपने लोगों को भेजता. मैं तो बस चिडि़यों का शिकार करता हुआ यहां आया था. आप ने देखा होगा बड़ी बी.’’
मैनरूह बोली, ‘‘मैं तो बस यही जानती हूं कि आप का न्याय अब हमारे महाराज करेंगे.’’
अलाउद्दीन ऐसे उछला, जैसे वह कमंद सहित लहराते तालाब में कूद जाएगा. कहने लगा, ‘‘बस, मैं ने जान लिया. मेरी जिंदगी आज तक की थी. मेरी मौत का पाप आप के सिर. अलविदा.’’
मैनरूह फिर घबराई. बोली, ‘‘सुलतान, आप उतावले क्यों हैं? मैं महाराज के पास ले चलती हूं.’’
अलाउद्दीन रुआंसा हो कर बोला, ‘‘अगर महाराज के सामने जा सकता तो आप से दया की भीख क्यों मांगता? आप को अपनी बहन बनाया. आप अपने बड़े भाई की इज्जत को खाक मत कीजिए. आप यही चाहती हैं कि मैं घेरा उठा लूं. मैं अपनी फौज ले कर यहां से चला जाऊंगा.’’
मैनरूह चाहती तो यही थी. खुद महाराज रामदेव भी यही चाहते थे. मगर मैनरूह महाराज की प्रजा ही नहीं थी, बल्कि राजकुमारी छिताई की दासी भी थी. सब से बढ़ कर वह एक औरत होने से उस की पीड़ा को जानती थी. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘बहन बनाया है तो यही मेरी इच्छा नहीं है. इस से भी बड़ी इच्छा है. वह पूरी होनी हो तो बताऊं.’’
अलाउद्दीन के बहुत आग्रह करने पर उस ने कहा, ‘‘राजकुमारी छिताई मेरी बेटी की तरह है. आप भी उसे अपनी बेटी मानिए और दोस्ती कर के तब आदर से जाइए.’’
अलाउद्दीन एकदम आसमान से गिरा. छिताई ही नहीं मिली तो इस जद्दोजहद से क्या हासिल? तो भी वह आजाद तो होना ही चाहता था. उस का खून खौल रहा था. मगर किसी तरह इस खूसट औरत को टालना भी था. उस ने कहा, ‘‘जब तुम कहती हो तो इस में कौन सी मुश्किल है. मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं.’’
मैनरूह अलाउद्दीन से भी चालाक निकली. दृढ़ता से बोली, ‘‘बादशाह, इस में एतबार की तो नहीं, इत्मीनान की बात है. आप उस मसजिद की ओर रूबरू हो कर कुरान पाक की कौल ले कर कहिए कि छिताई को मैं अपनी बेटी मानता हूं. तभी मैं हुजूर को छोड़ पाऊंगी.’’
अलाउद्दीन दांत पीस कर रह गया. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई. अंधेरा होता जा रहा था. चारों तरफ वे परिंदे हौसले से बोल रहे थे, जिन का शिकार करने वह आया था. लगा, जैसे वे उस की बेबसी पर कलरव कर रहे हों. क्यों वह इस शहर की चहारदीवारी में आया? उसे क्या मालूम था कि यादव राजा रामदेव तो सीधा है, मगर उस के कारकुन बाज की मानिंद चालाक हैं. वह इस एकांत बाग में चिडि़यों का शिकार खेलने लगा. शिकार के बजाय शैतान की खाला गले पड़ी, जिसे इसलाम के सब कायदेकानून मालूम हैं. अगर इस ने इस वक्त राजा रामदेव के सामने उसे खड़ा कर दिया तो बेशक वह उस के सर को कलम करा देगा.
अपनी लड़की के बारे में राघव चेतन की बात सुन तो वह बिफर रहा होगा. सुलतान ने हड़बड़ा कर मसजिद की तरफ मुंह किया और बोला, ‘‘मैं अपने रसूल व कुरान पाक की कसम उठाता हूं, मैं हमेशा छिताई को अपनी बेटी की मानिंद मानूंगा.’’
यह सुन कर मैनरूह बहुत खुश हुई. उस ने झुक कर सलाम किया और सविनय अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगते हुए सुलतान के बंधन खोल दिए. आजाद होते ही एक बार फिर अलाउद्दीन का खून खौल उठा. उस के जी में आया, कमर के नेजे को निकाल कर अभी इस औरत को मार डाले. मगर उस ने अपने को रोका. अगर यह एक बार भी चीखी तो दर्जनों लोग आ कर अलाउद्दीन को पकड़ लेंगे. अगर न भी चीख पाए तो उस के खून के कुछ धब्बे उस के कपड़ों पर पड़ेंगे, जिस से बादशाह फिर खतरे में पड़ सकता है. किले की घेरेबंदी में होने से तमाम चौकसी चारों तरफ होगी. खून का घूंट पी कर सुलतान बोला, ‘‘बड़ी बी, आप ने वही किया, जो आप का फर्ज था. अब आप मुझे महफूज बाहर निकलने में मदद कीजिए.’’
मैनरूह ने फिर क्षमा मांगी. बोली, ‘‘आप ने मुझे बहन कहा तो मेरा कर्तव्य है कि मैं आप की सहायता करूं. बस आप कुछ बोलिएगा नहीं. मुझे सब पहचानते हैं. मुझे कोई कुछ नहीं बोलेगा.’’
मैनरूह चलने लगी. पीछे चलते सुलतान को फिर नेजे का खयाल कौंधा. मगर उस ने मन मार लिया. उल्टे उस ने एक मोती की माला निकाली और मैनरूह को नजर करनी चाही. मगर उस सजग दासी ने कान पकड़ कर कहा, ‘‘हुजूर, आप ने मुझे बहन का रिश्ता बख्शा, मुझे और कुछ नहीं चाहिए.’’
बारबार कहने पर भी दासी ने स्वीकार नहीं किया. बोली, ‘‘जब आप दिल्ली बुलाएंगे तो ले लूंगी.’’
सचमुच मैनरूह का सब अदब कर रहे थे. उस ने गेट खुलवाया. शहर के फाटक से बाहर होते ही अलाउद्दीन जो भागा तो उस ने अपनी छावनी में जा कर ही दम लिया. वहां उस की खोज हो रही थी. उस शाम जो गुजरी, उस ने ताउम्र किसी के सामने उस का खुलासा नहीं किया. उस ने इस बात का बारबार शुक्र अदा किया कि पकड़ लिए जाने पर भी मैनरूह ने उस की बिना किसी को कानोंकान खबर हुए रिहाई करा दी थी.
जब अलाउद्दीन ने खापी लिया तो राघव चेतन लौट आया. बादशाह को बाखैरियत देख कर उस की जान में जान आई. उस की आपबीती बहुत खराब थी. राजा रामदेव आपे से बाहर हो गया था. किसी म्लेच्छ को कन्यादान करना उस की कल्पना के बाहर था. तो भी उस ने दूत के नाते राघव चेतन को जाने दिया था. दूतियां उस के बाद लौटीं. उन्होंने बताया कि औरों की तरह रामदेव के रनिवास में भी सब मरने को तैयार हैं, परंतु मुसलमानों के हाथ में पड़ने को नहीं. चित्तौड़ में पद्मिनी के जौहर और रणथंभौर में राजपूतों के बलिदान को वह भूला नहीं था. जब छिताई नहीं मिलनी है तो घेरा डालने से क्या फायदा? देवगिरि को लूटने का काम तो वह बरसों पहले ही कर चुका था. सोते समय वह सारी बातों पर विचार करने लगा.
कई साल हो गए. उस ने पहलेपहल नुसरत खां को सेनापति बना कर देवगिरि को खूब लूटा था. फिर वह राजा रामदेव को भी दोस्ती का लालच दे कर दिल्ली ले गया था. बीती बातें उस के मन में कौंध रही थीं…
पराजय की चिंता में राजा रामदेव ने दौलत देने में कसर नहीं की थी. अलाउद्दीन रामदेव को मोहरा बना कर दक्खिन की अकूत दौलत, जो दक्खिनी राजाओं के पास थी, हासिल करना चाहता था. रामदेव बूढ़ा हो रहा था, सोचता था कि अलाउद्दीन से आश्रय पा कर वह पड़ोसी राजाओं को दबा सकेगा. अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपने सिपहसालार उलूम खां को राजा के स्वागत में भेजा था और दरबार में खूब आवभगत की थी.
दरबार के स्वागतसत्कार, ठाठबाट और रागरंग में 3 साल बीत गए. रामदेव को पता ही नहीं चला. जब देवगिरि से रानी का दूत आया तो उसे होश हुआ. राजकुमारी छिताई समय के साथ सयानी होती जा रही है. राजा के अनुरोध को अलाउद्दीन मान गया. विदाई के समय राजा ने देवगिरि के राजप्रासाद को सज्जित कराने की दृष्टि से एक चित्रकार की मांग की, क्योंकि दिल्ली के महलों में चित्रकारी देख कर वह प्रफुल्लित हुआ था. सुलतान ने अपना खास चित्रकार साथ भेजा. लौट कर राजा ने जब बेटी को देखा तो चौंका. 3 साल में ही राजकुमारी कितनी यौवन संपन्न हो गई थी.
राजा ने पुराने भवनों के साथ नए प्रासाद का भी निर्माण करा कर पौराणिक ग्रंथों के विविध प्रसंगों को अपनी इच्छा से चित्रित कराया. चित्रकार नए चित्रों में नए रंग भरता तथा नई आकृतियां अंकित करता रहता था. मन में बसे चित्रों की छवि को वह तूलिका के जादू से अधिक ललित, जीवंत एवं मनोहर बना कर प्रस्तुत कर देता था. एक दिन वह तन्मय हो कर चित्र बना रहा था कि उस की दृष्टि पार्श्व के द्वार पर गई. दमकते सौंदर्य तथा छलकते यौवन की साक्षात स्वामिनी खड़ी थी. उस ने बहुत सुंदरता को सिरजा था, मगर आज विधाता की इस चपल, नवल तथा विरल सृष्टि को निहार कर चकित रह गया था. जिस तन्मयता से वह चित्र की सृष्टि में लीन था, उतना ही वह लालित्य की देवी उस क्षणक्षण संवरती कृति को निहारने में खोई थी.
जैसे ही चित्रकार का ध्यान भंग हुआ और उस ने पीछे देखा, वैसे ही वह सुंदरी जल में फिसलती मीन की तरह अंतराल में विलीन हो गई. चित्रकार के मन में उस अनुपम सौंदर्य को चित्रित करने की लालसा घर कर गई. चित्रकार को यह आभास हो गया था कि वह राजकुमारी छिताई थी. चित्रकार दरबार के साथ ही अंत:पुर में भी चित्र बना रहा था. अतएव उस ने फिर से उस दमकते सौंदर्य का दर्शन कर लिया और इस बार उस ने पूरी सजगता से चुपचाप छिताई की छवि अपनी तूलिका से उतार ली और चित्र को अपने पास रख लिया.
इस बीच राजा ने बेटी हेतु वर की तलाश जारी रखी. उस ने पुत्री का विवाह द्वारसमुद्र के राजा भगवान नारायण के पुत्र राजकुमार सौंरसी के साथ निश्चित कर दिया. चित्रांकन का कार्य समाप्त होने के पश्चात विवाह का मंडप सजाया गया और विवाह कार्य सकुशल संपन्न हो गया. राजकुमारी पति के साथ डोली में ससुराल चली गई. चित्रकार भी पुरस्कार पा कर और अपने स्वामी हेतु उपहार ले कर दिल्ली चला गया. कुछ ही दिनों बाद प्रिय पुत्री के बिना घर सूना पा कर राजा रामदेव ने छिताई को बुला लिया. छिताई और सौंरसी, दोनों देवगिरि आ गए. वैभव और दुलार की कमी न थी. युवक सौंरसी रात्रि में छिताई के साथ रमण करता और दिन में ऊबने लगता तो आखेट के लिए निकल जाता.
राजा रामदेव दामाद को अनजाने क्षेत्र में अकेले जाने से रोकते थे. मगर नवयौवन के अल्हड़पन में सौंरसी परवाह नहीं करता था. एक दिन मृग के पीछे घोड़ा दौड़ाता वह जंगल में घुस गया. मृग आश्रय पा कर एक आश्रम में घुस गया. आश्रमवासी बाहर निकल आए और दयावश राजकुमार से मृग को छोड़ देने का अनुरोध किया. राजकुमार जोश में था. उस ने हिरण को नहीं छोड़ा. तब उस आश्रमवासी ने कुपित हो कर कहा, ‘‘जैसे तुम ने मृगी को दुखी किया है, उसी प्रकार तुम जिस स्त्री के मोह में पड़े हो, वह दूसरे पुरुष के वश में पड़ेगी और तुम दुख भोगोगे.’’
सुन कर सौंरसी अवाक रह गया. उस के प्रार्थना करने पर आश्रमवासी बोले, ‘‘तुम पश्चाताप करोगे तो तुम्हारा दुख दूर होगा.’’
सौंरसी लौट तो आया मगर उस का मन शंकित रहने लगा. उस ने आखेट पर जाना एकदम बंद कर दिया. इस से छिताई और राजा प्रसन्न रहने लगे. राजकुमार को बचपन से संगीत से लगाव था. अब दिन में वह अपनी वीणा ले कर बैठ जाता और छिताई जहां भी होती, वीणा का स्पंदन सुनते ही हिरणी की तरह खिंच आती. सौंरसी ने अपनी प्रणयिनी छिताई को वीणा सिखाना शुरू किया. धीरेधीरे संगीत ने उन की संगति में ऐसा माधुर्य घोल दिया कि लययुक्त स्वरलहरियां उन के एकांत की निर्विघ्न साधना बन गईं. सुख के ये सरकते दिन आनंद के नित नूतन सोपान बनते चले गए.
उधर चित्रकार जब काम पूरा कर के दिल्ली पहुंचा तो उस ने राजा रामदेव के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए राजा के उपहार बादशाह अलाउद्दीन को दिए. अलाउद्दीन ने अपने मित्र की प्रशंसा की. एक दिन अवसर पा कर चित्रकार ने एकांत में संजो कर बनाए और रखे गए राजकुमारी छिताई के चित्र को सम्राट अलाउद्दीन को दिखाया.
बादशाह एकटक उसे निहारते हुए कल्पना के नवीन संसार में विलुप्त हो गया. उस ने तय कर लिया कि ऐसी सुकुमारी सुंदरी कन्या का भोग अवश्य करना चाहिए. वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आक्रमण किस बहाने किया जाए क्योंकि अपनी खुशी से तो अपनी ब्याहता कन्या अथवा पत्नी न राजा रामदेव दे पाते और न सौंरसी. जब उसे पता चला कि सौंरसी और छिताई देवगिरि में हैं तो उसे लगा कि देवगिरि पर इस समय आक्रमण से जहां छिताई मिलेगी, वहीं फिर से दौलत हासिल होगी.
अत: उस ने प्रकट में बहाना बनाया कि उसे अपने मित्र राजा रामदेव को देखे बहुत दिन हो गए हैं और वह उन्हें लड़की के ब्याह पर बधाई देगा. इस बहाने के कारण उसे राजा ने बीच में रोकने का प्रयास नहीं किया. वह देवगिरि आया और राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया. राजा कुछ समझ न सका. परंतु देवगिरि दुर्ग की दुर्गमता के आगे अलाउद्दीन की एक न चली. अत: अब अलाउद्दीन ने छिताई को उसे सौंपने पर घेराबंदी उठाने की शर्त पेश की तो राजा ही नहीं, पूरी प्रजा इस अपमान पर भड़क उठी.
परिणामस्वरूप युद्ध छिड़ गया. सौंरसी वहां फंस गया था और विशेष क्रोध में था. अत: उस के नेतृत्व में देवगिरि के वीर आतताई पर टूट पड़े. अनेक वीर मारे गए. अलाउद्दीन के साधन बड़े थे और वह दूसरे स्थानों से सेना मंगा कर क्षति को पूरी कर लेता था. इसलिए देवगिरि सेना बारबार आक्रमण कर के भी विजयी नहीं हो पाती थी. परंतु जैसे आज देवगिरि दुर्ग की रक्षा व्यवस्था 7 सौ वर्षों के बाद भी रोमांचित कर देती थी, उसी तरह उस समय भी वह अपराजेय थी. इस से अलाउद्दीन पूरी कोशिश के बावजूद जीत न सका.
महीने पर महीने बीत रहे थे. किले में रसद और सैन्य बल की प्रतिदिन कमी होती जा रही थी. अतएव राजा ने विचार प्रकट किया कि सौंरसी और छिताई को किसी तरह सुरक्षित निकाल कर और निश्चिंत हो कर अत्याचारी अलाउद्दीन पर टूट पड़ा जाए. पहले तो सौंरसी रणक्षेत्र से हटने को कतई तैयार न था. उसे उस शाप की भी याद थी कि दुर्ग से बाहर निकलते ही कहीं छिताई आक्रामकों के हाथ न पड़ जाए. परंतु जब उसे सैनिकों की कमी बताई गई तो वह इस शर्त पर अकेले बाहर जाने को तैयार हो गया कि वह अपने राज्य द्वारसमुद्र जा कर वहां की सेना लाएगा और बाहरभीतर दोनों तरफ से अलाउद्दीन पर जोरदार आक्रमण किया जाएगा.
सौंरसी को भेष बदलना पड़ा था. उस ने अपने सारे राजकीय शृंगार छिताई को सौंप दिए. तरुण पतिपत्नी एकदूसरे पर मर मिटने की कसम खाते हुए विलग हुए. जब तक नीचे उतरता हुआ सौंरसी दिखाई दिया, छिताई देखती रही. फिर सिसकते हुए उस ने अपने भी सारे आभूषण उतार दिए और तपस्विनी का जीवन जीने लगी. कई दिनों बाद जब सुलतान को सौंरसी के निकल जाने की खबर मिली तो वह आशंकित हो गया कि कहीं छिताई भी उस के साथ फुर्र न हो गई हो. अलाउद्दीन को यह भी उम्मीद बंधी कि सौंरसी के चले जाने से वृद्ध राजा लाचार हो गया होगा. अत: उसे पुरानी दोस्ती की याद दिला कर छिताई मांग ली जाए.
इस से दोस्ती स्थाई हो जाएगी. छिताई के दुर्ग में होने का सही पता करने के लिए महिला गुप्तचर भेजे गए. जब इत्मीनान हो गया तो अलाउद्दीन ने विशेष कुटनी दूतियों को छिताई के पास भेजा जो उसे सौंरसी से विमुख कर के सुलतान की तरफ ललचा सकें. लेकिन दूतियां छिताई पर कोई प्रभाव न डाल सकीं. वे यह खबर ले आईं कि छिताई प्रतिदिन राम सरोवर आती है. अलाउद्दीन को चित्तौड़ और रणथंभौर में सौंदर्य के प्रति अपनी आसक्ति को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिला था. अत: यहां वह विशेष सजग था.
सुलतान ने अपने एक ब्राह्मण दरबारी राघव चेतन को छिताई सौंपने के आग्रह के साथ राजा रामदेव को समझाने भेजा. ब्राह्मण होने से यह अंदेशा नहीं था कि दूत राघव चेतन का वध होगा. साथ ही अलाउद्दीन ने दूतियों को हिंदू साध्वी का रूप बना कर भेजा जो छिताई को फिर से राजी करें. अलाउद्दीन ने अपनी एक योजना मन में बना ली थी. उसे छिताई को देखे बिना चैन नहीं था. अतएव राघव चेतन के सेवक के रूप में वह खुद परकोटे के भीतर प्रवेश कर गया. राघव चेतन दरबार में गया. दूतियां रनिवास की ओर गईं. सुलतान रामसरोवर में छिताई के दर्शन करने आने की प्रतीक्षा करने लगा. आसपास का वातावरण रमणीय था और तरहतरह के पंछी जलक्रीड़ा कर रहे थे. सुलतान ने समय बिताने के लिए पंछियों का शिकार करना शुरू कर दिया, जिस में वह इतना रम गया कि जब छिताई सखियों सहित आई तो वह जान न सका.
पंछियों के आर्तनाद तथा बेबस कलरव से आकृष्ट हो कर छिताई तो दर्शन कर के चली गई, किंतु मैनरूह को उस ने कारण पता लगाने भेजा. मैनरूह ने सुलतान को छिताई की बेटी मानने की ईमान से कौल उठाने की बात मनवा कर मुक्त किया. सुलतान ने घेरा उठा लिया और लौटने की तैयारी करने लगा.
मैनरूह ने पूरी घटना राजा रामदेव को बता दी. वह प्रसन्न हुआ कि मुसीबत टली. उस ने दासी की खूब प्रशंसा की. जलने वाले हर दरबार में होते हैं. सौंरसी की अनुपस्थिति में जो प्रधान सेनापति थे, उन्होंने इस में भी अलाउद्दीन शासक की कोई चाल बताई. उन्होंने कहा कि दासी की बातों पर विश्वास कर के वे अलाउद्दीन की पकड़ में आ जाएंगे. उन्होंने यहां तक डींग मारी कि जब सुलतान हारने वाला है तो वह शराफत की आड़ में बचना चाहता है. उन्होंने दासी के विरुद्ध काररवाई करने को कहा. यदि वह सचमुच सुलतान था तो उसे किसी भी शर्त पर छोड़ने के बजाय पकड़ कर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए था. अत: या तो दासी झूठी है या सुलतान.
प्रधान सेनापति की बातों से लोग असमंजस में पड़ गए. सचमुच यह अजीब बात थी कि इतना बड़ा सुलतान निपट अकेले वाटिका में आए, फंसे और निकल जाए. प्रधान सेनापति चित्तौड़, गुजरात और रणथंभौर में अलाउद्दीन की मक्कारियों का विवरण देते हुए जोर देने लगे कि सुलतान की यह भी कोई जालसाजी है. अतएव देवगिरि को युद्ध करना चाहिए. अन्य दरबारी भी सशंकित थे. पुराना पापी पाप छोड़ भी दे तो शक उस का पीछा नहीं छोड़ता. सब की आशंका एवं आक्रोश से राजा को कहना पड़ा कि मैनरूह को अलाउद्दीन ने बहन कहा है तो एक बार आजमाइश की जाए. बात सही है तो उस के कहने पर अलाउद्दीन फिर से घेरा डाल दे.
दासी के माध्यम से सुलतान को खबर मिली. सेनापति की आज्ञा से देवगिरि के सैनिकों ने आक्रमण जारी रखा. इस पर सुलतान का क्रोध उबल पडा़. उस ने फिर से मोर्चे बांधे. अबकी बार लड़ाई प्रतिष्ठा की थी. अलाउद्दीन ने अपनी योजना के अनुसार शह दी. छिताई जहां दर्शन के निमित्त आती थी, वह स्थान मुख्य दुर्ग तथा उस की खाई के बाहर था. अलाउद्दीन के कमंद के सहारे उस जगह आहिस्ताआहिस्ता अपने सैनिक उतारे और उन्हें पेड़ों पर छिप कर बैठा दिया. रक्षकों का ध्यान बंटाने के लिए दुर्ग की दूसरी ओर शोरगुल के साथ आग जलवा दी.
दूसरे दिन जब छिताई आई तो अलाउद्दीन के छिपे सैनिक उस की टोली पर टूट पड़े. छिताई के साथ आई 40 दासियां मार डाली गईं. दूसरी तरफ निकटस्थ फाटक पर अलाउद्दीन के सैनिक पूरे वेग से टूट पड़े. छिताई पकड़ ली गई और सुलतान के सामने पेश की गई. छिताई एकदम भावशून्य हो गई थी. सुलतान ने उसे दिलासा दिया कि वह छिताई को बेटी की तरह रखेगा. कह तो दिया मगर छिताई के ललित सौंदर्य को सम्मुख पा कर एक बार सुलतान का चित्त चंचल हो उठा. मगर अपने कौल को याद कर के वह सहम गया.
छिताई के पीछे कुटनियां लगा दी गईं, जो उसे सजनेधजने और पथभ्रष्ट होने के लिए तैयार करें. छिताई ने उन का मर्म समझते ही आंखकान मूंद लिए. अब उस ने खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया. उस ने प्रतिज्ञा की कि उस विधर्मी महल में अनशन कर के वह प्राण त्याग देगी. जब यह खबर बादशाह को मिली तो वह खुद छिताई के पास आया और उसे समझाने की कोशिश की.
छिताई ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया और अपने हठ पर अडिग रही. छिताई का चेहरा बुझ गया और कंचनवत शरीर की कांति मलीन हो गई थी. सुलतान को लगा कि यदि और देर हुई तो छिताई मर जाएगी. तब उस ने छिताई को अपने विश्वस्त राघव के महल में भेज दिया. अलाउद्दीन ने उस की सुरक्षा की इस आशय से अलग व्यवस्था की कि भविष्य में समय बदलने पर उस का मन भी बदल जाए. साथ लाई उस की वीणा भी मन बहलाने के लिए भेज दी.
उधर जब सौंरसी तैयारी के साथ देवगिरि वापस पहुंचा तो उसे छिताई के अपहरण की सूचना मिली. यह आघात वह सहन न कर सका. उस ने दुर्ग, सेना, महल, राजपाट सब त्याग दिया. उस की दशा एक बार तो विक्षिप्त की भांति हो गई. वह जंगल में चला गया और उस ने वैरागी रूप धर लिया. जो मिला, खा लिया और इधरउधर घूमने लगा. वह छिताई की हर ओर खोज करने लगा. अपने असह्य वियोग की करुणा को उस ने वीणा में झंकृत करना आरंभ किया.
संगीत अन्य कलाओं की भांति साधना है जो भावातिरेक में स्वरों को चमत्कार के रूप में प्रकट करता है. भावों की गहनता कला को साधना के सोपानों से सिद्धि के शिखर का स्पर्श करा देती है. जब छिताई की अतृप्त स्मृति को सौंरसी वीणा के विराट सुरों से तृप्त करने का प्रयास करता तो प्रतीत होता जैसे अदृश्य से दृश्य हो रहा हो. एकांत में सौंरसी के वीणा वादन पर पशुपक्षी स्तब्ध हो कर मुग्ध हो जाते. पुष्प झूमने लगते. प्रकृति थिरकने लगती. वैरागी सौंरसी रुकता नहीं था, टोह लेतेलेते मंजिल की ओर बढ़ा जाता था.
वियोगी हृदयों की भी कोई अनजानी आहट होती होगी. भावी प्रेरणावश सौंरसी दिल्ली पहुंच गया. उस ने एक उपवन में डेरा डाला. प्रात: संध्या अथवा जब उस को भावोद्वेग होता, वह वीणा के तार छेड़ देता. तब बटोही थम जाते. पखेरू चित्रलिखित बन जाते और जल का निर्झर संगत करने लगता था.
उधर अलाउद्दीन ने छिताई के पास इस लालसा से वीणा भेज दी थी कि वह जब प्रकृतिस्थ होगी तो मन बहलाएगी. राघव चेतन के महल में वह कुछ संयमित तो हुई, परंतु स्वाभाविक न बन सकी. राघव चेतन की बातों तथा प्रेरक आशावादिता से वह शरीर संरक्षण हेतु कुछ खानेपीने लगी, मगर वीणा को उस ने हाथ नहीं लगाया. यह वही वीणा थी, जिस पर सौंरसी ने उसे वीणा बजाना सिखाया था. वह वीणा को छेड़ती तो न थी, परंतु उसे छोड़ती भी नहीं थी. वह वीणा उसे प्रियतम की सुधि दिलाती रहती थी.
सुलतान छिताई की वीणा सुनना चाहता था. मगर अन्यमनस्का छिताई उन तारों पर अंगुली नहीं रखती थी. अंत में बादशाह की आज्ञा से दिल्ली के प्रसिद्ध वीणावादक गोपाल नायक छिताई को वीणा झंकार की शिक्षा देने हेतु भेजे गए. सुलतान ने वादा किया कि जिस दिन छिताई वीणावादन करेगी, गोपाल नायक को मुंहमांगा ईनाम मिलेगा.
गोपाल नायक ने बारंबार चेष्टा की. गायन और वादन से छिताई में छिपे कलाकार को जगाने की चेष्टा की परंतु सफल न हुए. अलबत्ता दोनों कलाकारों ने एकदूसरे में अंतर्निहित कला को पहचान लिया. परस्पर सहानुभूति भी हुई. गोपाल नायक छिताई की यातना को समझते थे. छिताई कम से कम एक बार वीणा बजा कर उन की प्रतिष्ठा सुलतान की निगाह में बढ़ाना चाहती थी, मगर कर न सकी.
अंत में उस ने वह वीणा स्वयं गोपाल नायक को दे दी. उस ने कहा, ‘‘गुरुजी, इसे रख लीजिए. शायद कभी वे आएंगे तो देख कर पहचान तो लेंगे अपनी वीणा को. फिर वे इसे बजाएंगे अवश्य. जब उन के हाथ से वीणा बजेगी तो कितना ही शोर हो, मैं सो भी रही होऊं तो इस वीणा के सुरों को पहचान कर जान लूंगी.’’
दिल्ली में सौंरसी के वीणा वादन की अलौकिकता की ख्याति बढ़ रही थी. उस ने भी संगीतज्ञ एवं वीणावादक गोपाल की पारंगतता के विषय में सुना. सौंरसी गोपाल नायक के घर गया. गोपाल नायक ने सम्मानपूर्वक अपने कक्ष में बैठाया. वार्ता करते हुए सौंरसी ने वहां छिताई द्वारा प्रदत्त अपनी वीणा देखी तो उसे बजाने की अभिलाषा व्यक्त की. जैसे ही सौंरसी ने उस वीणा के सुर झनझनाए तो वे चिरपरिचित स्वर छिताई के कानों में गूंज उठे.
उसे प्रियतम के आगमन का आभास हो गया. वह भावातिरेक में विह्वल हो उठी. सुलतान की पाबंदियों के चलते वह अपने स्वामी से मिल नहीं सकती थी. गोपाल नायक इस कौशल से वीणा बजाने और सौंरसी के उत्साह से जान गए कि यह युवक छिताई की प्रियतम है. उन्होंने उसे राघव चेतन की मार्फत सुलतान से मिलने की सलाह दी, परंतु छिताई के विषय में कुछ नहीं बताया.
योगी वेश में सौंरसी राघव चेतन से मिला और उन से सुलतान से मिलाने की प्रार्थना की. राघव योगी की वीणा वादन कला तथा व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ. उस ने योगी की भेंट दरबार में सुलतान से कराई. योगी ने बताया कि वह दक्षिण में सिंहल से आया है और उस का सब कुछ दिल्ली के बाहर के उद्यान में छिन गया है. सुलतान को आश्चर्य हुआ, क्योंकि उद्यान में कोई आताजाता न था. फिर योगी के पास ऐसी क्या संपत्ति होगी जो कोई छीनेगा.
योगी की बातें रहस्यमय लगीं तो भी अलाउद्दीन ने उसे परखने की दृष्टि से वीणा बजाने को कहा. योगी ने सिर झुका कर अनुरोध किया कि सुलतान यदि एक बार उद्यान में दरबार लगाएं तो उसे उस का खोया सब कुछ मिल जाएगा. वहीं वह वीणा भी बजाएगा. सुलतान मुसकराया.
उद्यान के सुरम्य वातावरण में दरबार का आयोजन किया गया. सुलतान ने अनुभव किया कि योगी का वीणा वादन शुरू होते ही दिल गुलाब के फूल की तरह खिल उठा. फिजा खुशगवार होने लगी. लगा, जैसे कुदरत ने नींद से जाग कर अंगड़ाई ली हो. पशुपक्षी एकत्रित होने लगे. जब तक वीणा बजती रही, पूरा दरबार, पशुपक्षी, पेड़पौधे सब चुपचाप सुनते रहे. वीणा वादन खत्म होने पर सुलतान बोल उठा, ‘‘मरहबा! क्या खूब!’’
उसे छिताई से अपना वादा याद आया. इस वीणा पर भी यदि छिताई ने वीणा नहीं बजाई तो वह बहरी हो चुकी होगी. उस ने राघव चेतन से छिताई को वीणा सहित बुला लाने का आदेश दिया. जब तक छिताई आ नहीं जाती, उस ने योगी को वीणा बजाने का आदेश दिया. सुलतान ने कहा, ‘‘अगर तुम्हारी वीणा से छिताई की तकलीफ दूर हो जाए तो तुम जो मांगोगे, तुम्हें ईनाम दिया जाएगा.’’
सौंरसी तन्मय हो कर बजाने लगा. दूर से आती हुई छिताई ने जब वीणा की वह चिरपरिचित स्वरलहरी सुनी तो उस का दिल उछलने लगा. छिताई के पांव स्वचालित से उठने लगे. जब उस ने सौंरसी को देखा, तो दाढ़ीमूंछ, केश तथा जोगिया भेष के बावजूद पहचान गई. फिर तो प्रच्छन्न आह्लाद का ज्वार उमड़ आया. मुखमंडल प्रफुल्लता की आभा से दीप्त हो उठा. सारी सभा उस की इस असाधारण मन:स्थिति से प्रमुदित हो उठी.
राघव चेतन ने वीणा निकाली. गोपाल नायक ने उसे ला कर बीच सभा में छिताई के सामने वादन की स्थिति में प्रस्तुत कर दिया. आनंद की उदात्त लहरियां सौंरसी तथा छिताई के मानस में गूंज रही थीं. आंखों के मिलते ही वे एकदूसरे को पहचान ही नहीं गए, बल्कि उन में वियोग का संताप, उलाहना, यातना, सब आनंद में परिवर्तित हो गए. उस आनंद में संगीत सुख की वर्षा बन निर्झर सा फूट पड़ा.
अनजाने में छिताई ने सौंरसी की दी हुई वीणा को उठा लिया. लगा कि वह सुहाग के दिनों की पारंगतता को पुन: प्राप्त कर चुकी है. न जाने कब तक दोनों एकदूसरे की ओर अपलक निहारते हुए वीणा बजाते रहे. पशुपक्षी एकटक उन्हें देख रहे थे. संगीत के ताल पर मोर नाचने लगे. मृग थिरकने लगे. लगता था, जैसे वीणा की स्वर लहरियों से सब अलौकिक हो उठा हो.
धीरेधीरे सौंरसी ने वीणा की गति धीमी की. छिताई ने भी साथ दिया. जब उन्होंने वीणा वादन रोका तो पूरी सभा सन्नाटे से करतल ध्वनि में बदल गई. सुलतान ने छिताई को इतनी उत्फुल्ल कभी नहीं देखा था. छिताई ने वीणा ही नहीं बजाई, उस ने अपनी कला और उल्लास से पूरी सभा को आह्लादित कर दिया था. सुलतान को अपना वादा याद आया. उस ने सौंरसी से पूछा, ‘‘तुम्हारा ईनाम पक्का. बताओ, तुम्हें क्या चाहिए. आज हमें पता चला कि मौसीकी भी एक तरह की इबादत है. और छिताई, हम ने तुम्हारी बारीकियों को भी परखा. गजब का हुनर है तुम दोनों में.’’
सौंरसी बुत बना बैठा रहा. वीणा वैसे ही पकड़े रहा. एकटक सुलतान को देखता रहा. सुलतान ने फिर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘जोगी, बताओ तुम क्या चाहते हो? तुम जो मांगोगे, वह तुम्हें मिलेगा.’’
जोगी ने अदब से सिर झुकाया, मुसकराया. फिर फरमाया, ‘‘मान्यवर, आप मुझे वचन देते हैं?’’
अलाउद्दीन की पारखी नजरों ने परख लिया था कि वे दोनों एकदूसरे के निकट रहे हैं. तुरंत उसे शक हो गया कि यही सौंरसी है. परंतु सभा के सम्मुख वह दो बार पूर्व ही वचन दे चुका था. उस ने बेसाख्ता कह दिया, ‘‘बेशक, हम अपनी बात पर कायम रहेंगे. अपना ईनाम मांगो.’’
जोगी ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे छिताई को ही दान में दे दीजिए.’’
सुलतान कुछ बोले, इस के पहले ही छिताई आर्तस्वर में, जिस में संयोग का आवेग और विरह की विवशता निहित थी, सिसकती हुई अपने पति के चरणों में गिर पड़ी. सुलतान ने एक बार सभा को देखा, फिर राघव चेतन को निहारते हुए बोला, ‘‘पंडित, वो क्या कहते हैं, तुम्हारे मजहब में? हां, कन्यादान. जोगी, तुम चाहे जो भी हो, मैं छिताई को तुम्हें कन्यादान करता हूं.’’
सौंरसी ने उठ कर 3 बार बंदगी की. पूरी सभा में वाहवाह, बाखूब, वल्लाह, आमीन की आवाजें गूंज उठीं. सुलतान ने हंसते हुए फरमाया, ‘‘मगर मैं ने बेटी को तो कुछ दिया ही नहीं. छिताई, बताओ, तुम क्या चाहती हो?’’
कुछ लोग कठोर अलाउद्दीन की इस दरियादिली पर चकित थे. चित्तौड़ और रणथंभौर के किलों को पत्थर के खंडहरों में तब्दील करने वाले अलाउद्दीन ने सब के सामने छिताई को अपनी बेटी पुकारा था. सौंरसी तथा छिताई की तपस्या ने पत्थर को भी पिघला दिया था. संगीत का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था. छिताई ने सिसकते हुए, हाथ जोड़ कर भूमि पर सिर रखा. बोली, ‘‘हे सम्राट, हे पिता, मुझे आप का बस आशीर्वाद चाहिए. आप ने मुझे सब कुछ दे दिया.’’
सौंरसी ने विनयपूर्वक अपना वास्तविक परिचय तथा छिताई को अपनी परिणीता बताया. पूरी सभा इस अद्भुत जोड़ी पर स्नेह की वर्षा करने लगी. अलाउद्दीन ने शाही ढंग से छिताई और सौंरसी की विदाई की. देवगिरि पहुंचने पर दोनों का भव्य स्वागत हुआ. छिताई ने अपने धैर्य से विजय प्राप्त की थी. कुछ दिन वहां रह कर दोनों द्वारसमुद्र चले गए. कोई 5 सौ वर्ष पूर्व कवि नारायण दास ने ‘छिताई वार्ता’ प्रेम काव्य की रचना की थी, जिस का विवरण डाक्टर राजमल वोरा ने अपनी पुस्तक ‘देवगिरि के यादव राजा’ में उल्लिखित किया है. Hindi Kahani
लेखक – जगदीश जगेश






