Hindi Crime Stories: अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिताने वाले आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू को कुछ मौकापरस्त नेताओं ने बंदूक उठाने को मजबूर किया था, आज वही नेता उस से खौफ खा रहे हैं और सरकार से उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं.

3 सितंबर, 2015 को राजस्थान के जिला नागौर की डीडवाना कोर्ट में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू के खिलाफ चल रहे नानूराम हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. उसे 15 सदस्यीय पुलिस टीम अजमेर जेल से डीडवाना ले कर आई थी. उस के 2 साथी श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड भी उस के साथ थे. कोर्ट में वैसे भी भारी संख्या में पुलिस तैनात रहती थी, लेकिन उस दिन रोज की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही पुलिस तैनात की गई थी.

फैसले की घड़ी आई तो कोर्ट में सन्नाटा छा गया. लेकिन माननीय जज ने सबूतों के अभाव में आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को इस केस से बरी कर दिया था. इस के बाद कोर्ट में मौजूद आनंदपाल सिंह के समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे इतने खुश हुए कि मिठाई मंगा कर न्यायालय परिसर में ही बांटने लगे. वे जो मिठाई बांट रहे थे, उस में से कुछ में उन्होंने नींद की दवा मिला दी थी, जिसे उन्होंने कमांडो सहित वैन में सवार उन 15 पुलिसकर्मियों को खिला दी, जो आनंदपाल सिंह को अजमेर जेल से लाए थे. लेकिन वैन के ड्राइवर को उन्होंने वह नींद की दवा वाली मिठाई नहीं दी थी.

मिठाई खाने के बाद पुलिस वालों ने आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को पुलिस वैन में बिठाया और अजमेर की ओर चल दिए. थोड़ी दूर जाने के बाद पुलिस वालों को नींद आने लगी. पुलिस वालों को ऊंघते देख आनंदपाल सिंह मंदमंद मुसकराया. उसे लगा कि अब उस की योजना सफल होने वाली है. पुलिस वैन जब डीडवाना और परवतसर के बीच गांगवा गांव के पास पहुंची तो सामने से सफेद रंग की एक जीप पुलिस की गाड़ी के सामने इस तरह आ कर रुकी कि पुलिस की गाड़ी आगे न निकल सके.

उस जीप से कुछ लोग उतर कर पुलिस वैन की तरफ लपके. पुलिस टीम जब तक कुछ समझ पाती, जीप में आए लोगों ने गोलियां दागनी शुरू कर दीं. नशीली दवा मिली मिठाई खाने से पुलिसकर्मी अर्धबेहोशी की हालत में थे, इसलिए वे उन का विरोध नहीं कर सके. उन लोगों ने पुलिस पर एके47 जैसे आधुनिक हथियारों से हमला किया था, जिस से 2 कमांडो और ड्राइवर शंभू सिंह घायल हो गए. पुलिस पर हमला कर के वे लोग आनंदपाल सिंह, श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड को पुलिस कस्टडी से छुड़ा ले गए. नशे की हालत में भी परवतसर थानाप्रभारी अनिल पांडे ने जवाबी फायरिंग की थी. एक गोली आनंदपाल सिंह के पैर में लगी थी. घायल आनंदपाल के साथी उसे गाड़ी में बिठा कर ले गए थे.

आनंदपाल सिंह कोई छोटामोटा बदमाश नहीं था. उस पर हत्या, फिरौती, गैंगवार जैसे संगीन मामलों के 28 मुकदमे दर्ज थे. दहशत के पर्याय बने इस बदमाश के अपने 2 साथियों के साथ फिल्मी स्टाइल में पुलिस कस्टडी से फरार होने पर पुलिस अधिकारियों के हाथपैर फूल गए. प्रदेश स्तर के पुलिस अधिकारियों तक जब इस कुख्यात बदमाश के फरार होने की खबर पहुंची तो तुरंत पूरे प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया. नागौर और आसपास के जिलों में नाकाबंदी कर दी गई. हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश से लगती राजस्थान की सीमाओं को भी सील कर दिया गया. मगर आनंदपाल और उस के दोनों साथी पुलिस के हाथ नहीं लगे.

न्यूज चैनलों पर आनंदपाल सिंह के फरार होने बहस होने लगी, पुलिस की निष्क्रियता से संबंधित खबरें चलने लगीं. जो राजनीतिज्ञ आनंदपाल के निशाने पर थे, खौफ खाने लगे. अपनी हिफाजत के लिए वे पुलिस की शरण में जा पहुंचे. उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि कहीं आनंदपाल सिंह उन्हें मार न दे. बदमाशों की गोली से घायल और नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश पुलिसकर्मियों को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में भरती करा दिया गया था. मीडिया इसे पुलिस की मिलीभगत बता रही थी. उस का कहना था कि 3 सितंबर, 2015 को पुलिस जब आनंदपाल को अजमेर जेल से डीडवाना लाई थी तो कई बदलाव किए गए थे. उस की सुरक्षा में केवल 15 पुलिसकर्मी ही तैनात थे, जिस में केवल 2 ही कमांडो थे.

जबकि इस के पहले जब भी आनंदपाल को पेशी पर लाया जाता था, 30 पुलिसकर्मियों के साथ एक दरजन कमांडो तैनात होते थे. आखिर इस बार उस की सुरक्षा में कमी क्यों की गई? इस पर सवाल उठ रहे थे. पुलिस की जो टीमें आनंदपाल की तलाश में लगी थीं, वे इस बात की भी जांच कर रही थीं कि पिछले दिनों आनंदपाल से जेल में मिलने कौनकौन आया था. लेकिन पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इतना खूंखार अपराधी जेल में मोबाइल और फेसबुक कैसे चला रहा था? और तो और पेशी के दौरान अदालत में भी आनंदपाल से संदिग्ध लोग मिलते रहते थे.

वह जेल से ही अपना गिरोह चला रहा था. सब कुछ जानते हुए भी पुलिस उस से कुछ नहीं कहती थी. वह बीकानेर जेल में था, तब उस के पास बंदूक तक पहुंच गई थी. यह जेल प्रशासन की मिलीभगत के बिना कैसे संभव हो सकता था. इस से साफ लगता है कि आनंदपाल को जेल में खुली छूट मिली थी. कुछ महीने पहले आनंदपाल का छोटा भाई रूपेंद्र सिंह चुरू जेल से पैरोल पर बाहर आया तो ऐसा गायब हुआ कि पुलिस उसे आज तक नहीं खोज पाई है. आनंदपाल या उस की गैंग के सदस्यों को पेशी पर लाने और वापस जेल तक ले जाने के दौरान पुलिस की गाडि़यां एस्कौर्ट करती थीं, इस के अलावा संबंधित थानों की पुलिस भी रास्ते की पहले से मौनिटरिंग करती थी. उन रास्तों पर नाकाबंदी भी रहती थी. अगर 3 सितंबर को भी इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था होती तो आनंदपाल को छुड़ाने आए बदमाश पहले ही कहीं न कहीं पकड़ लिए जाते.

आनंदपाल का इलाके में कितना प्रभाव था, इस का पता इसी बात से चलता है कि सन 2012 में जब वह गिरफ्तार किया गया था, तब उसे जब भी जेल से डीडवाना, चुरू, बीकानेर या नागौर की अदालतों में लाया जाता था, उस की गैंग के सदस्य निजी वाहनों से पुलिस वैन के आगेपीछे चलते थे. मीडिया द्वारा जब इस बात की जानकारी तत्कालीन एसपी लक्ष्मण गौड़ को हुई तो उन्होंने 2 वाहनों को पकड़ा. तब उन लोगों ने सफाई में कहा था कि उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे खुद आनंदपाल की सुरक्षा करते हैं.

जांच के बाद पुलिस अधिकारियों को पता चला है कि पुलिस जब भी आनंदपाल को जेल से कोर्ट लाती थी, पुलिसकर्मियों के लिए चायपानी और खानेपीने की व्यवस्था वही करता था. आखिर पुलिस उस पर आंख मूंद कर इस तरह विश्वास क्यों करती थी. मीडिया ने पुलिस पर यह भी आरोप लगाया है कि आनंदपाल के फरार होने के बाद भी पुलिस ने ढिलाई बरती. पुलिस के पास अत्याधुनिक हथियार थे, फिर भी आनंदपाल के साथी उसे ले उड़े. उस के फरार होने के करीब एक घंटे बाद पुलिस के बड़े अधिकारी सक्रिय हुए. आखिर ऐसा क्यों हुआ.

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी बड़े राजनेता ने अपने किसी दुश्मन को ठिकाने लगवाने के लिए पूरी योजना के तहत आनंदपाल सिंह को फरार कराया हो. बहरहाल आनंदपाल के फरार होने की कहानी किसी हिंदी फिल्म की कहानी जैसी है. जुर्म की दुनिया में कदम रखने के बाद आनंदपाल चंद सालों में दहशत का पर्याय बन गया था. जब उस ने अपराध की राह पर कदम रखा था, उस के पीछेपीछे उस के 2 छोटे भाई रूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह भी उसी राह पर चल पड़े थे. धीरेधीरे उस के पीछे करीब 300 गुंडों की फौज खड़ी हो गई थी. इस के बाद इन लोगों के कारनामों से आमजनों में खौफ पैदा हो गया तो दूसरे अपराधियों में जलन.

एकएक कर आनंदपाल के ऊपर हत्याएं, लूट, अपहरण और धमकाने के 28 मामले दर्ज हो गए. इस के अलावा तमाम मामले ऐसे थे, जिन की लोगों ने डर की वजह से रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई. आसपास के 5 जिलों में उस का एकछत्र राज स्थापित हो गया. उस के पास अत्याधुनिक हथियारों की खेप जमा हो गई. सन 2012 में जब आनंदपाल गिरफ्तार हुआ था तो उस के पास से एके 47 समेत 6 राइफलों के अलावा एक अमेरिकन कारबाइन और बुलेट प्रूफ जैकेट भी बरामद हुई थी. इस के गुर्गों बिजेंद्र ने भावता में हैडकांस्टेबल फैज मोहम्मद को जब गोली मारी थी, तब पुलिस ने उस के पास से एसएलआर बरामद की थी.

एसएलआर भारतीय सेना के पास होती है. कुचामन, डीडवाना, सीकर और चुरू जिलों में आनंदपाल का ऐसा खौफ था कि व्यापारी उस के नाम से ही फिरौती दे देते थे. इलाके में उस के गैंग का प्रभाव जमने से दूसरे बदमाश उस से दुश्मनी रखने लगे थे. राजू ठेहठ गैंग उस का सब से बड़ा विरोधी गैंग था. पिछले साल बीकानेर जेल में ठेहठ गैंग के लोगों ने आनंदपाल और उस के साथियों पर हमला कर दिया था. इस गैंगवार में आनंदपाल तो बच गया, लेकिन उस का दोस्त बलवीर बानूड़ा मारा गया. ठेहठ गैंग के भी 2 लोगों को गोली लगी थी. बाद में हमला करने वाले ठेहठ गैंग के 2 लोगों की आनंदपाल सिंह ने बीकानेर जेल में उन की ही पिस्तौल से हत्या कर दी थी.

हत्या के बाद आनंदपाल ने उन का सिर बड़े पत्थर से कुचल दिया था. इस घटना के बाद जेल में इतना खौफ पैदा हो गया था कि एक घंटे तक बीकानेर पुलिस भी जेल के अंदर नहीं गई थी. बाद में पुलिस ने काररवाई की थी. 3 साल जेल में रहने के बाद आनंदपाल जमानत पर बाहर आया तो उस ने 12 मार्च, 2015 को गैंगवार, धमकियों और आशंकाओं के बीच मीडिया के सामने बेबाक कह कर सब को चौंका दिया था कि राजनेता अपने फायदे के लिए गैंगवार कराते हैं. जेल में अपने दुश्मनों को मारने के बाद उस के बाहर के दुश्मनों में भी खौफ छा गया था. उन की सांसें हलक में अटक गईं. कौन जाने किस घड़ी आनंदपाल उन का काम तमाम कर दे.

नागौर के तत्कालीन एसपी राघवेंद्र सुहासा ने मई, 2015 में गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा था कि आनंदपाल व राजू ठेहठ खूंखार अपराधी हैं और दोनों में गैंगवार भी है. इसलिए इन के मामलों की सुनवाई वीडियो कौन्फे्रंसिंग के जरिए जेलों से ही करवाई जाए. मगर राजस्थान सरकार के गृह मंत्रालय ने एसपी राघवेंद्र सुहासा के पत्र को गंभीरता से नहीं लिया. आनंदपाल और उस के साथियों की ओर से दी गई नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश हुए 7 पुलिसकर्मियों को 7 सितंबर, 2015 को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. जबकि कमांडो शक्ति सिंह और ड्राइवर शंभू सिंह उपचाररत थे. जो पुलिसकर्मी अस्पताल से डिस्चार्ज हुए थे, उन्हें पूछताछ के लिए नागौर पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.

हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों से जांच अधिकारी ने अलगअलग पूछताछ की. उन्हें घटनास्थल पर भी ले जाया गया. अपने बचाव के लिए उन्होंने मनगढ़ंत कहानी गढ़ते हुए विरोधाभासी बयान दिए. जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दी. इस में सभी को दोषी माना गया है. आईजी मालिनी अग्रवाल ने चालानी गार्ड के तौर पर तैनात ड्राइवर शंभू सिंह, एसआई फूलचंद, कमांडो शक्ति सिंह, राजेंद्र सिंह, जगदीश शर्मा, अर्जुन राम, हरदीप, सुनील, गोपाल, सांवरमल, मुकेश, फोटोग्राफर राजेंद्र को सस्पेंड कर दिया है. इन में ड्राइवर शंभू सिंह के पैरों में और कमांडो शक्ति सिंह की जांघ में गोली लगी थी.

आईजी का कहना है कि प्रारंभिक तौर पर अपराधी की फरारी में इन्हें जिम्मेदार मानते हुए निलंबन की काररवाई की गई है. जांच के बाद इन्हें चार्जशीट दी जाएगी. इन की गिरफ्तारी भी हो सकती है. अगर इन का दोष साबित हो गया तो इन्हें नौकरी से भी बर्खास्त किया जा सकता है.

इस घटना को गंभीरता से लेते हुए 7 सितंबर को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने गृह विभाग एवं पुलिस अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिस में आनंदपाल सिंह की फरारी का मामला छाया रहा. मुख्यमंत्री ने पुलिस की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस आनंदपाल की गिरफ्तारी के लिए तेजी दिखाए. इस बैठक में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं मुखोपाध्याय, डीजीपी मनोज भट्ट सहित इंटैलीजेंस, जेल, कानून व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े अफसर मौजूद थे.

उधर विधायक हनुमान बेनीवाल ने सार्वजनिक निर्माण एवं परिवहन मंत्री यूनुस खान पर आरोप लगाया है कि उन के और आनंदपाल सिंह के बीच गहरे संबंध हैं. वही आनंदपाल का सहयोग करते रहे हैं. इस आरोप पर मंत्री यूनुस खान ने तुनक कर कहा कि उन के आनंदपाल से कोई संबंध नहीं हैं. वह सिर्फ उन के विधानसभा क्षेत्र डीडवाना का रहने वाला है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर हनुमान बेनीवाल इस का कोई सबूत ला दें तो वह राजनीति छोड़ देंगे. मंत्री यूनुस खान ने उलटा आरोप लगाया कि कुख्यात अपराधी आनंदपाल और विधायक हनुमान बेनीवाल में कोई अंतर नहीं है. बेनीवाल पर आनंदपाल सिंह की ही तरह हत्या, डकैती और लूटपाट के आरोप हैं. आनंदपाल की तरह बेनीवाल भी कई बार जेल जा चुके हैं.

बताया जाता है कि आनंदपाल की हिट लिस्ट में हनुमान बेनीवाल का भी नाम है. साथ ही श्रीगंगानगर के कई नेता भी उस के निशाने पर हैं. पुलिस कस्टडी से उस के फरार होने के बाद से ये सभी नेता परेशान हैं. यह इनपुट नागौर पुलिस ने जयपुर मुख्यालय को भेज दी है. इस के बाद मुख्यालय से सभी जिलों में अलर्ट जारी कर दिया गया है. सभी जिलों में सतर्कता बढ़ाने की सख्त हिदायत दी गई है.

सूत्रों के अनुसार, नागौर पुलिस को जेल स्टाफ तथा दूसरे कैदियों से जानकारी मिली थी कि आनंदपाल जेल में अकसर सीकर, नागौर व श्रीगंगानगर के कुछ लोगों का नाम लेता था. वह इन लोगों को अपना बड़ा दुश्मन बताता था और उन्हें खत्म करने के दावे करता था. इस के अलावा सीकर के कुछ व्यापारी व नागौर के कुछ नेता भी उस के निशाने पर बताए जा रहे हैं.

हालांकि पुलिस अधिकारी उस के पुराने रिकौर्ड के आधार पर यह भी कह रहे हैं कि आनंदपाल अमूमन जाटों व पूंजीपतियों को ही अपने टारगेट पर रखता है. आम लोगों को कभी नुकसान पहुंचाने की जानकारी नहीं मिली है. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अभी तो पूरे प्रदेश में हाईअलर्ट के चलते आनंदपाल कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, लेकिन उस के जो 300 गुर्गे हैं, वे अपने बौस के इशारे पर खून की होली खेलने से नहीं चूकेंगे.

आखिर यह आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू कौन है और वह खून की होली क्यों खेलना पसंद करता है? यह जानने के लिए हमें उस के अतीत में जाना होगा. राजस्थान के नागौर जिले में लाडनूं-डीडवाना रोड पर एक छोटा सा गांव है सांवराद, जहां ठाकुर हुकम सिंह चौहान रहते थे. आनंदपाल सिंह इन्हीं का बड़ा बेटा है. घर में सभी उसे पप्पू कहते थे. सीधासादा सरल स्वभाव का पप्पू मांबाप की आंखों का तारा था. गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद उस ने लाडनूं से 12वीं पास किया. इस के बाद वह डीडवाना चला गया, जहां उस ने बीए और बीएड किया. इस के बाद

वह सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया. पढ़ाई के साथ ही वह लाडनूं के गौशाला मार्केट में सीमेंट की दुकान भी चलाता था. इसी बीच चुरू जिला के सुजानगढ़ की राजकंवर से उस की शादी हो गई. वह एक बेटा व 2 बेटियों का बाप भी बन गया. उसी दौरान उस का झुकाव राजनीति की तरफ हो गया.

उस ने सन 1999-2000 में पंचायती राज चुनाव में सांवराद से पंचायत समिति का निर्दलीय चुनाव लड़ा. वह चुनाव जीत गया. इस के बाद उस ने भाजपा से प्रधान का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उस का मुकाबला कांग्रेस से पूर्व केबिनेट मंत्री हरजीराम बुरड़क के बेटे जगन्नाथ बुरड़क से था. दोनों के बीच कांटे की टक्कर थी. तमाम कोशिशों के बावजूद आनंदपाल जगन्नाथ बुरड़क से 2 वोटों से चुनाव हार गया. चुनाव जीतने के बाद जगन्नाथ प्रधान बन गया तो आनंदपाल लाडनूं पंचायत समिति का नेता प्रतिपक्ष बन गया.

नवंबर, 2000 में लाडनूं पंचायत समिति की स्थाई समितियों का चुनाव हुआ. इस चुनाव में विधायक हरजीराम बुरड़क और आनंदपाल के बीच तकरार हुई. तकरार की वजह लादु सिंह घुड़ीला का आवेदन पत्र जमा नहीं करना था. आनंदपाल खंड विकास अधिकारी से आवेदनपत्र जमा करने की जिद कर रहा था. तब विधायक ने खंड विकास अधिकारी रमेशचंद्र द्वारा आनंदपाल, जिला परिषद सदस्य खींवाराम घिंटाला और सुरजन सिंह घिरड़ौदा के खिलाफ सरकारी काम में बांधा डालने का मुकदमा लाडनूं थाने में दर्ज करा दिया. इस मुकदमे की तफ्तीश एएसआई चंद्राराम को सौंपी गई.

फिर अशोक सैनी नाम के व्यक्ति की ओर से आनंदपाल और उस के दोनों छोटे भाइयों के खिलाफ भादंवि की धारा 482 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया. यह मुकदमा संभवतया आनंदपाल को परेशान करने के लिए दर्ज कराया गया था, ताकि वह मुकदमे से डर कर अपने पैर पीछे खींच ले. मामला चूंकि गलत लग रहा था, इसलिए किसान नेता भागीरथ यादव और पूर्व विधायक दीपंकर शर्मा के नाती संजय शर्मा अशोक सैनी को एसपी नागौर गोविंद गुप्ता के पास ले गए.

अशोक सैनी ने एसपी को सारी सच्चाई बता दी. तब एसपी ने एसएचओ लाडनूं को इस मुकदमे में फाइनल रिपोर्ट लगाने के निर्देश दिए. लेकिन दूसरे ही दिन एक और मुकदमा उसी अशोक सैनी के हस्ताक्षर से आनंदपाल वगैरह के खिलाफ दर्ज हो गया. जिस एसपी ने अशोक सैनी वाले मामले में एसएचओ से फाइनल रिपोर्ट लगाने की बात कही थी. इस के बाद आनंदपाल और उस का सहयोग करने वालों पर मुकदमों की झड़ी लग गई.

9 जनवरी, 2001 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सभा में पत्थर फेंकने, 16 जनवरी, 2001 को कोलिया गांव में हुई लूट तथा 11 फरवरी, 2001 को लाडनूं में हुई खेराज की हत्या के मामले में आनंदपाल के खिलाफ रिपोर्टें दर्ज हुईं. धीरेधीरे पप्पू खूंखार डौन आनंदपाल सिंह सांवराद बन गया. आनंदपाल और उस के सहयोगियों के खिलाफ हत्या का जो मामला दर्ज हुआ था, उस के गवाह ने तो यहां तक कहा था कि उसे हत्या के मुकदमे में फंसाने की धमकी दे कर विधायक ने झूठा बयान दिलवा कर आनंदपाल वगैरह को फंसाया था, जबकि वह किसी को नहीं पहचाना था.

इस सब से पप्पू इतना व्यथित हुआ था कि वह खूंखार अपराधों की राह पर चल पड़ा. बस आनंदपाल ने उस के बाद अपने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर हाथ में बंदूक थाम ली थी. वह अपराध के दलदल में दिनबदिन धंसता चला गया था. आनंदपाल ने गरीबों को कभी परेशान नहीं किया. वह शोषितों, मजलूमों की सेवा को अपना परम धर्म समझता है. उसे आम आदमी से कोई शिकवा नहीं है. न ही वह उस वर्ग को परेशान करता है. लूट, डकैती, हत्या सहित दरजन भर से भी ज्यादा मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस को भी आनंदपाल की तलाश है.

आनंदपाल ने जब बंदूक उठाई थी तो धड़ाधड़ उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने लगे थे. पुलिस आनंदपाल को तलाश रही थी, मगर वह कहां हाथ आने वाला था. वह आंधी की तरह आता था और हत्या, लूट या डकैती को अंजाम दे कर तूफान की तरह चला जाता था. सांप के जाने के बाद पुलिस उस की लकीर पीटती रहती थी. पुलिस की नाक में आनंदपाल ने दम कर रखा था. आखिर आनंदपाल सिंह को पकड़ने का जिम्मा दबंग पुलिस अधिकारियों को सौंपा गया.

जयपुर पुलिस, एसओजी और एटीएस की संयुक्त टीमों ने फागी कस्बे के पास मोहब्बतपुरा गांव से आनंदपाल को गिरफ्तार कर लिया था. इस के कब्जे से एके 47 राइफल सरीखे खतरनाक हथियार, आटोमैटिक मशीन गन, बम और बुलेटप्रूफ जैकेट बरामद की गई. बता दें कि सरकारी सुरक्षा बलों के पास ही एके 47 राइफलें पाई जाती हैं.

अपराध जगत में आनंदपाल का जन्म वर्ष 2006 में हुआ था. उस ने डीडवाना में जीवनराम गोदारा नाम के छात्र नेता की गोलियों से भून कर हत्या कर दी थी. जीवनराम कालेज आतीजाती लड़कियों से छेड़छाड़ करता था. उस की इन हरकतों से छात्राएं परेशान थीं. वह बदमाश था, इसलिए उस से पंगा लेने की किसी में हिम्मत नहीं थी. जीवनराम की हरकतें बढ़ीं तो उसे समझाया गया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए, मगर वह बाज नहीं आया. मदन सिंह राठौड़ नाम के एक शख्स ने उस की हरकतों पर अंकुश लगाने की हिम्मत की तो जीवन ने पत्थरों से कुचल कर सरेआम उस की हत्या कर दी थी.

आनंदपाल को यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उस ने जीवनराम गोदारा की गोलियों से भून कर हत्या कर दी. जीवनराम गोदारा की हत्या के अलावा आनंदपाल के नाम डीडवाना में ही 13 मामले दर्ज हैं, जहां 8 मामलों में कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित किया हुआ था. सीकर के गोपाल फोगावट हत्याकांड को भी आनंदपाल ने ही अंजाम दिया था.

गोदारा और फोगावट की हत्या करने का मामला समयसमय पर विधानसभा में गूंजता रहा था. आनंदपाल के जुर्म की फेहरिस्त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब भी उस ने किसी को मौत के घाट उतारा, वह मुद्दा सरकार के लिए जवाब का विषय बन गया. सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, विपक्ष लचर कानून व्यवस्था और पनपते शराब माफियाओं के नाम पर सरकार को निशाने पर लेता रहा.

बीकानेर जेल में हुई गैंगवार को ले कर विधानसभा में खूब हंगामा हुआ था. आनंदपाल को ले कर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही. 29 जून, 2011 को आनंदपाल ने सुजानगढ़ में भोजलाई चौराहे पर गोलियां चला कर 3 लोगों को घायल किया था. उसी दिन गनौड़ा में शराब ठेके पर सेल्समैन के भाई की हत्या के आरोप में भी आनंदपाल का हाथ होने की बात सामने आई थी.

शेखावटी में अपराध के कभी 3 चेहरे हुआ करते थे. ये चेहरे थे— आनंदपाल सिंह, राजू ठेहठ और बलवीर बानूड़ा. अब 2 ही चेहरे बचे हैं. बलवीर बानूड़ा की हत्या के बाद आनंदपाल और राजू ठेहठ. अब इन दोनों में तनातनी चल रही है. राजू की गैंग में करीब 200 लोग हैं. उस पर भी 25 से ज्यादा केस दर्ज हैं. 8 अगस्त, 2013 को एटीएस ने उसे असम से पकड़ा था. वह अलवर जेल में बंद है.

राजू ठेहठ की अपराध की कहानी शुरू होती है 1997 से. तब बलवीर बानूड़ा और राजू ठेहठ दोस्त हुआ करते थे. दोनों शराब के धंधे से जुड़े थे. लेकिन सन 2005 में हुई एक हत्या ने दोनों दोस्तों के बीच दुश्मनी की दीवार खड़ी कर दी. शराब के ठेके पर बैठने वाले सेल्समैन विजयपाल की राजू ठेहठ से किसी बात पर कहासुनी हो गई. विवाद इतना बढ़ा कि राजू ने अपने साथियों के साथ मिल कर विजयपाल की हत्या कर दी. विजयपाल रिश्ते में बलवीर का साला लगता था. विजयपाल की हत्या से दोनों दोस्तों में दुश्मनी शुरू हो गई. बलवीर ने राजू के गैंग से निकल कर अपना अलग गिरोह बना लिया. बाद में वह आनंदपाल की गैंग में जा मिला. आनंदपाल का वह घनिष्ठ दोस्त बन गया. 15 फरवरी, 2012 को बलवीर गिरफ्तार हुआ था.

पिछले साल राजू ठेहठ के आदमियों ने बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल व बलवीर बानूड़ा पर हमला किया. जेल में हुए इस हमले से आनंदपाल को बचाने के चक्कर में बलबीर मारा गया. पुलिस का कहना है कि राजू ठेहठ पर गोलियां बरसाने वाला सुभाष मुंड वही है, जो हाल ही में आनंदपाल के साथ पुलिस कस्टडी से फरार हुआ है. बलबीर पर 16 केस दर्ज थे. पुलिस सूत्रों के अनुसार, आनंदपाल के गैंग में अनुराधा नाम की एक युवती भी शामिल थी. अनुराधा बड़े व्यापारियों के अपहरण का प्लान बना कर उन से फिरौती वसूलती थी. आरोप है कि इसी साल 9 अप्रैल, 2015 को अनुराधा ने सीकर के व्यापारी विनोद सर्राफ का अपहरण करवाया था. 22 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

कंप्यूटर ग्रैजुएट अनुराधा उर्फ अनुराग महला सीकर में कमोडिटी मार्केट का काम करती थी. उस की पढ़ाई दिल्ली और पिलानी में हुई थी. कहा जाता है कि कमोडिटी मार्केट में घाटा होने पर उस ने अपराध की दुनिया में कदम रखा. पहले वह जेल में राजू ठेहठ से मिली, लेकिन राजू ने अनुराधा को अपनी गैंग में शामिल करने से मना कर दिया. इस के बाद वह जेल में ही आनंदपाल से मिली और बताया कि वह उस के गैंग में काम करना चाहती है. आनंदपाल उसे इनकार नहीं कर सका. आनंदपाल और बलबीर बानूड़ा ने सब से पहले राजू ठेहठ के करीबी गोपाल फोगावट की हत्या की थी. दुश्मनी का खेल ऐसा चला कि पिछले 10 सालों में शेखावटी में 15 से ज्यादा हत्याएं हुईं. जेल तक में दोनों गैंगों के बीच गोलियां चलीं.

आनंदपाल की फरारी के बाद एक बार फिर से गैंगवार की आशंका पैदा हो गई है. पुलिस एड़ीचोटी  का जोर लगा रही है, मगर आनंदपाल उस की गिरफ्त से कोसों दूर है. आनंदपाल को मौकापरस्त राजनेताओं ने बंदूक उठाने पर मजबूर कर दिया, नहीं तो आज वह ऐसा खूंखार अपराधी नहीं होता. वह भी अपने बीवीबच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहा होता. आनंदपाल सिंह और उस के साथियों श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड की फरारी के बाद पुलिस ने थाना परवतसर में उन पर एक केस और दर्ज कर लिया है. पुलिस ने शुरुआत में आनंदपाल सिंह का सुराग देने वाले को 1 लाख रुपए और श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड का सुराग देने वाले को 50-50 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा के पैंफ्लेट चिपका दिए हैं.

इस के बावजूद अब तक राजस्थान पुलिस को आनंदपाल और उस के साथियों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला है. राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ने आनंदपाल के ऊपर घोषित इनाम की धनराशि एक लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दी है. अब देखना यह है कि यह घोषणा कोई रंग लाती है या नहीं? बहरहाल, उस के निशाने पर रहने वाले राजनेताओं व अन्य विरोधियों की नींद उड़ी हुई है. लोगों में अब यही चर्चा है कि पता नहीं आनंदपाल का अगला निशाना कौन होगा? Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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