Hindi Stories: लड़कियों के प्रति खासकर हसीन लड़कियों के प्रति सभी का रवैया एक जैसा होता है बेरहम और कांटेदार, जो उस हसीना के शरीर पर खराशें डाल देते हैं. ऐसा ही कुछ जरीना के साथ हुआ, जिस की वजह से वह डौली बन गई.
पहले मेरा नाम जरीना था. उन दिनों मेरे बदन पर ढंग के कपडे़ तक नहीं होते थे. हमारे घर में अच्छा खाना नहीं पकता था. लोग मेरे सिर पर सलीके से जमे हुए दुपट्टे और झुकी हुई निगाहों को देख कर मेरे बारे में दकियानूसी होने का फतवा लगा देते थे. कहने का मतलब कि हम बेहद गरीब थे. मैं अपने वालिदैन के साथ मलेर में रहती थी. यह शहर से कुछ फासले पर गरीबों की बस्ती थी. यहां हुकूमत की तरफ से क्वार्टर बना कर अलाट कर दिए गए थे. अब्बा को भी एक 80 गज का क्वार्टर अलाट हो गया था.
घर में हम 6 लोग थे—अब्बा, अम्मी, हम 2 बहनें और 2 भाई. मैं बहनभाइयों में सब से बड़ी थी. मैं समझती हूं कि लड़कियों को सब से बड़ी नहीं होना चाहिए, वरना उन की आधी उम्र दूसरों को समेटते हुए गुजर जाती है. कम से कम गरीब घराने में अव्वल तो लड़कियों की जरूरत ही नहीं होती. अगर हो भी तो तीसरे या चौथे नंबर पर हो. बहरहाल, अब्बा ने हम सब को एक पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया था. जिंदगी बुरीभली गुजर रही थी. अब्बा एक औफिस में काम करते थे. मलेर से शहर का फासला लंबा था, इसलिए अब्बा 5 बजतेबजते घर से औफिस के लिए निकल जाते थे.
मैं ने अपनी कहानी शुरू तो कर दी है, लेकिन यह एक तल्ख कहानी है. अगर आप में हौसला है तो इसे पढ़ें. इस के बाद आप की मरजी है, चाहे गालियां दें या खामोश हो जाएं. लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि इस कहानी के बेशुमार किरदारों में एक आप भी हैं. हां, आप जो एक ट्यूटर हैं, एक दुकानदार हैं, व्यापारी हैं, औफिस में काम करने वाले क्लर्क हैं, मालिक हैं. यह कहानी आप की है, क्योंकि इस समाज को आप ही ने बनाया है. आप चाहे कुछ भी हों, कोई भी हों, इस आईने में अपना चेहरा आप को घिनौना ही नजर आएगा.
हां तो, मैं उस से मुखातिब हो रही हूं, जो रोज स्कूल जाते समय हमारे रास्ते में खड़ा रहता था. उस वक्त हम दोनों बहनें ज्यादा बड़ी नहीं थीं. मेरी उम्र 15 बरस रही होगी और हसीना की 13 बरस. वह खड़ा रहने वाला नौजवान तकरीबन 20 का रहा होगा. वह एक अजीब मिजाज का नौजवान था. उस का गरेबान हमेशा खुला रहता था. बड़ेबड़े बालों को वह तेल लगा कर चिपकाए रखता था. तंग मोरी की पतलून और चारखाने की कमीज में उस का हुलिया बहुत फूहड़ लगता. उस के होंठों के दरम्यान हमेशा एक सिगरेट दबी रहती. वह हम दोनों को देख कर अजीब अंदाज से खंखारता और सीटियां बजाता हुआ पीछेपीछे चलने लगता. हम स्कूल के गेट तक पहुंच जातीं तो वह रफूचक्कर हो जाता. यह उस का रोजाना का काम था. हम दोनों बहनें इस सूरतेहाल से परेशान हो गई थीं.
उन दिनों मुझे जिंदगी के इन पहलुओं के बारे में ज्यादा मालूम नहीं था. घर में रेडियो हुआ करता था. कभीकभी हम नजदीकी सिनेमाघर में जा कर फिल्म देख लिया करती थीं. लेकिन उस जमाने की फिल्में भी बस यूं ही हुआ करती थीं. हम दोनों बहनें अकसर उसी के बारे में बातें करती थीं. हमारी समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है? एक दिन रोशी ने अचानक मुझे अहसास दिला दिया. उस ने यह अहसास इस तरह दिलाया था, जैसे अंधेरे में किसी के हाथों में मशाल दे दी जाए और उस मशाल की रोशनी में उसे सब कुछ दिखाई देने लगे. हुआ यों कि रोशी उस दिन स्कूल में कहीं से एक किताब ले आई थी.
रोशी उम्र में मुझ से 2 बरस बड़ी रही होगी, लेकिन पढ़ती मेरी क्लास में थी. उस ने पीरियड खत्म होते ही किताब मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जरीना, यह देखो, इस में अच्छीअच्छी तसवीरें हैं.’’
मैं किताब देखने लगी. उस में वाकई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें थीं. एक से बढ़ कर एक लिबास पहने हुए. खूबसूरत लिबास पहने हुए खूबसूरत लड़कियां, जिन को देखने से खुशी महसूस होती थी.
‘‘अरे, ये तो वाकई बहुत प्यारीप्यारी लड़कियां हैं.’’ मैं ने कहा.
‘‘हां, हैं तो बहुत प्यारी, लेकिन इन में से कोई भी तुम्हारी तरह नहीं है.’’
‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने चौंक कर किताब बंद कर दी.
‘‘तुम जरा अपने आप को आईने में देखो,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम्हें खुद अहसास हो जाएगा कि तुम कितनी खूबसूरत हो.’’
मेरा दिल जोरजोर से धड़क उठा. क्या मैं वाकई उतनी खूबसूरत हूं? यह अपने को देखने का जज्बा तो हर एक में हुआ करता है. आप किसी बच्चे की भी जरा सी तारीफ कर दें तो वह इठलाइठला कर चलना शुरू कर देता है.
‘‘यह तुम क्या कह रही हो रोशी? पहले तो किसी ने ऐसी बात नहीं कही.’’
‘‘तो क्या हुआ? मैं सच कहती हूं. तुम्हारी वजह से हंगामा होगा, गोलियां चलेंगी. न जाने कितने नौजवान तुम पर मर मिटेंगे.’’
और उस वक्त मुझे अचानक अहसास हो गया कि वह नौजवान रास्ते में क्यों खड़ा रहता है. रोशी ने अनजाने में एक राज से परदा उठाया था, वरना मैं तो अभी तक उलझी हुई थी. मतलब यह था कि मैं बहुत खूबसूरत थी, इसीलिए वह नौजवान मेरे रास्ते में आया करता था. इस राज से परदा हटते ही अजीब किस्म की घबराहट होने लगी. अगर मैं खूबसूरत थी तो फिर उस को क्या? वह कौन होता था, मेरे रास्ते में खड़ा होने वाला? वह दिन स्कूल में बस इसी किस्म की बातें सोचते हुए गुजर गया.
अगले दिन वह नौजवान फिर दिखाई दिया. इस दफा पहली बार मेरे कदम लड़खड़ाए थे, वरना इस से पहले मैं उसे नजरअंदाज कर दिया करती थी. लेकिन आज एक कदम भी उठाना दूभर हो रहा था. मेरी बहन हसीना ने भी मेरी यह हालत महसूस कर ली थी.
‘‘अरे, क्या हो गया बाजी? चलो न. इतना आहिस्ताआहिस्ता क्यों चल रही हो?’’
मैं ने चौंक कर अपनी रफ्तार तेज कर दी. रोज की तरह वह नौजवान स्कूल के गेट से वापस हो गया था.
उस रात मैं ने अम्मी से उस नौजवान की शिकायत कर दी. अम्मी मेरी बात सुन कर बोलीं, ‘‘तुम्हारा वहम होगा जरीना. हो सकता है, उस का भी रास्ता वही हो.’’
‘‘नहीं अम्मी,’’ हसीना मेरी तरफ से बोली, ‘‘वह वाकई हम दोनों के लिए खड़ा रहता है और बाजी को यों घूरघूर कर देखता है कि क्या बताऊं.’’
अम्मी सोच में पड़ गईं. ऐसी बातें सुन कर गरीब मांएं आमतौर पर सोच में मुब्तिला हो जाती हैं, जबकि अमीर मांएं या तो मुसकरा कर बात टाल देती हैं या ऐसे आवारागर्द का फौरी तौर पर बंदोबस्त कर दिया जाता है. लेकिन मेरी अम्मी गरीब थीं, इसलिए सोचने लगीं और उन्होंने पहली बार मुझे ऐसी निगाहों से देखा, जिन की तपिश मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगी थी. उन निगाहों में हैरानी भी थी और खौफ भी. बेटी के हुस्न की तारीफ भी और अंदेशे भी. उन निगाहों ने मुझे बेचैन कर दिया. वहां से उठ कर मैं कमरे में आ गई और कमरे में दाखिल होते ही आईना मेरे सामने था.
वह लकड़ी की अलमारी में लगा हुआ धुंधला सा आईना था. लेकिन उस वक्त वह मेरे वजूद से जगमगा रहा था. मैं ने पहली बार आईने को और आईने ने मुझे इस अंदाज से देखा था. मैं अपने आप पर फिदा होने लगी थी. एक खास किस्म का गुरूर, एक अजीब तरह की खुशी. क्या मैं वाकई इतनी खूबसूरत हूं? दूसरी सुबह वह नौजवान फिर दिखाई दिया. मुझे मालूम नहीं था कि अम्मी ने अब्बा से भी इस का जिक्र कर दिया होगा और न हमें यह मालूम था कि उस सुबह वह उस नौजवान की घात में थे. वह रोज की तरह हमारे पीछेपीछे चला और अब्बा न जाने किस तरफ से हाजिर हो कर उस की राह में आ गए.
उस दिन मुझे मालूम हुआ कि जब बेटी की इज्जत दांव पर हो तो एक दुबलेपतले इंसान में भी कितनी ताकत पैदा हो जाती है. अब्बा ने उस नौजवान को धुन कर रख दिया. यह मामला ऐसा था कि हर शख्स उन का साथ देने पर तैयार हो जाता. इसलिए राह चलते लोगों ने भी अब्बा का साथ दिया और वह नौजवान पिटपिटा कर वहां से चला गया. उस के बाद दोबारा वह दिखाई नहीं दिया.
वह तो फिर कभी मेरे रास्ते में नहीं आया, लेकिन आज मैं उसी से मुखातिब हूं. यह तुम ही थे, जिस ने मेरी जिंदगी के तालाब में पहला कंकड़ फेंका था. पहली बार दायरे बनाए थे, हालांकि तुम उस के बाद कभी दिखाई नहीं दिए. वक्त तुम्हें अपने बाजुओं में समेट कर किस तरफ ले गया, मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुम ने जो कुछ भी किया, वह मुझे अभी तक याद है. और तुम…अब मैं तुम से मुखातिब हूं, तुम जो मेरे ट्यूटर बने थे. दुबलेपतले, चश्मा लगाए एक सभ्य नौजवान.
मैं ने नौवीं में पहुंच कर साइंस ले ली थी. खयाल था कि बड़ी हो कर डाक्टर बन जाऊंगी. आमतौर पर हर गरीब वालिदैन अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के बारे में सोचते हैं या फिर उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते हैं. वैसे उन्हें यह भी मालूम होता है कि इस दुनिया में हजार दूसरे काम भी हैं. बहरहाल मैं साइंस पढ़ रही थी.
मैं जहीन इतनी नहीं कि साइंस को बगैर किसी की मदद से पढ़ सकती और हमारी इतनी हैसियत भी नहीं थी कि हम कोई ट्यूटर रख सकते. एक दिन अब्बा के एक दोस्त ने उन्हें एक ट्यूटर की औफर कर दी. यह ट्यूटर उन के दोस्त का बेटा था.
‘‘भाई, अगर तुम चाहो तो मैं कामरान को तुम्हारे घर भेज दिया करूं.’’
‘‘वह तो ठीक है, लेकिन मैं…’’
‘‘ओहो, तुम से फीस कोई नहीं मांग रहा है. क्या मुझे तुम्हारी हालत मालूम नहीं है? तुम फीस की परवाह मत करो. बस बच्ची की तालीम पर ध्यान दो.’’
इस तरह कामरान ट्यूटर बन कर हमारे घर आने लगा. मैं ने महसूस किया कि मेरी खूबसूरती ने उसे बौखला कर रख दिया था. वह पहली मुलाकात में बस देखता ही रह गया और उस वक्त तक देखता रहा, जब तक अम्मी ने चाय की प्याली ला कर उस के सामने नहीं रख दी. वह खुद भी किसी बहाने से सामने वाली चौकी पर बैठ गईं. उस 80 गज के क्वार्टर में पहले सिर्फ एक कमरा था, कमरे के साथ एक लाइन में किचन, बाथरूम और टायलेट बने हुए थे. लेकिन अब्बा ने दरवाजे के साथ एक छोटा सा कमरा और बनवा लिया था. उन दोनों कमरों के अलावा बाकी सेहन था. मैं उस सेहन में बैठ कर कामरान से पढ़ रही थी. एक चौकी भी उसी सेहन में रखी थी और अम्मी छालियां काटने के बहाने पानदान ले कर उस चौकी पर बैठ गई थीं.
गरीब घरानों की मांएं आमतौर पर इसी अंदाज से ट्यूटर और बेटी के सामने बैठ जाया करती हैं या फिर बहानेबहाने किसी को भी भेजती रहती हैं, जिस से यह मालूम हो सके कि वाकई पढ़ाई हो रही है या मोहब्बत का सबक याद कराया जा रहा है. कामरान ने उस दिन मुझे सिर्फ एक बार गहरी नजरों से देखा था. उस के बाद वह सिर झुकाए पढ़ाता रहा. कुछ देर बाद अम्मी को भी शायद उस की शराफत का अंदाजा हो गया था, इसलिए वह पानदान ले कर वहां से चली गईं. कई दिन बीत गए, अम्मी ने बैठना छोड़ दिया. कामरान अब किसी हद तक मुझ से इधरउधर की बातें कर लेता था. मैं ने महसूस किया कि वह बहुत देर तक मेरे पास बैठा रहता था. हुस्न में बहुत ताकत हुआ करती है.
यह वह जमाना था, जब मुझे अपनी उस ताकत का पूरी तरह ज्ञान हो गया था. आदमी के पास जब कोई दौलत आ जाए तो वह उसे बहुत सावधानी से बचाबचा कर रखता है. वक्त उसे दौलत के इस्तेमाल के तरीके सिखा देता है. मुझे भी यह आ गया था कि मैं किस तरह अपनी इस दौलत से फायदा उठा सकती हूं.
फिर एक दिन कामरान ने एक कदम आगे बढ़ा दिया. बातें वह करता ही था. उस दिन पहली बार मुझ से इजहारे मोहब्बत किया. क्या आप को इस पहली बार के जादू का अंदाजा है? यह ऐसा जादू होता है, जो आंखों के सामने खूबसूरत दृश्यों की चादर तान देता है. कानों में सुरीली घंटियां सी बजने लगती हैं. चेहरे पर चांद प्रकट हो जाता है. कान की लवें तपिश देने लगती हैं.
कामरान ने इजहारे मोहब्बत क्या किया, मेरे अंदर की दुनिया बदल गई. वह मेरी जिंदगी में पहला आदमी था, जिस ने सिर्फ देखते रहने पर संतोष न करते हुए एक कदम आगे बढ़ा दिया था. मैं लहक उठी थी. उस ने बड़े दिलकश अंदाज में कहा था, ‘‘मुझे नहीं मालूम कि मुझे इस किस्म की मोहब्बत करनी चाहिए कि नहीं, क्योंकि मैं तुम्हें पढ़ाने आता हूं. लेकिन जज्बा ऐसा होता है कि किसी बात की परवाह नहीं करता. इश्क अंधा होता है. मैं भी अंधा हो गया हूं. अगर तुम चाहो तो इस अंधे का हाथ थाम सकती हो, वरना हाथ को झटकने का भी अख्तियार है. तुम्हें याद होगा कि मैं ने जब तुम्हें पहली बार देखा तो मेरी क्या हालत हुई थी. जरीना! मैं तुम से मोहब्बत करने लगा हूं…बेपनाह मोहब्बत.’’
उस ने पहली बार मुझे अहसास दिलाया था कि हुस्न सिर्फ देखते रहने के लिए नहीं, बल्कि मोहब्बत करने के लिए हुआ करता है. हम लड़कियां पहली बार की मोहब्बत को नजरअंदाज नहीं करतीं. हर लड़की की जिंदगी में यह ‘पहली बार’ जरूर आता है. लिहाजा मैं भी उस की मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से देने की पाबंद हो गई थी.
अब पढ़ाई के साथसाथ प्यार की बातें भी होने लगीं. इस किस्म की बातों का अपना अलग लुत्फ हुआ करता है. उसे पूरी तरह बयान भी नहीं किया जा सकता. बातें करते हुए डरेडरे अंदाज में इधरउधर देखना, एकदूसरे की खैरियत पूछना, एकदूसरे को अपनी मोहब्बत का बारबार यकीन दिलाते रहना, मौका देख कर एकदूसरे का हाथ थाम लेना, यह सब कुछ होता रहा. लेकिन बात इस से आगे नहीं बढ़ सकी.
इस किस्म की मोहब्बत का कोई साफ मकसद भी नहीं हुआ करता. उस वक्त यह खयाल नहीं होता कि इस सिलसिले को आगे किस तरह बढ़ाया जाए. तनहाई में मुलाकातें किस तरह की जाएं. कुछ लोग थोड़ी हिम्मत कर के अपने वालिदैन से अपना राज कह दिया करते हैं और ज्यादातर लोग खामोश रह कर अपने महबूब या महबूबा की शादी का नजारा करते हैं और बाद में कुछ दिनों तक उस की याद में आंसू बहाते रहते हैं. फिर वे खुद भी जमाने की भीड़ में कहीं गुम हो जाया करते हैं.
हमारी यह कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक बार अम्मी ने मुझे उस से इस किस्म की बातें करते हुए देखसुन लिया और उस दिन बेचारे की छुट्टी कर दी गई. अम्मी का खयाल था कि यह सिलसिला एकतरफा है, यानी वह यह समझ रही थीं कि जो कुछ भी हुआ है, वह उसी मास्टर की तरफ से हुआ है. हर मां अपनी औलाद के लिए इसी किस्म की खुशफहमी में रहती है. उस के बाद कामरान से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी. 1-2 बार मैं ने उस को देखा, लेकिन वह भी दूर से. बहुत उदास नजर आ रहा था. तो कामरान, आज मैं तुम से इसलिए मुखातिब हूं कि तुम ने पूरी तरह मेरे दिल में मोहब्बत के जज्बात जगाए थे.
कामरान के बाद जिंदगी कुछ उदास और बेजार सी हो गई. यह और बात है कि मुझ को अपनी अहमियत का पूरी तरह अंदाजा हो गया था. यह भी अजीब बात थी कि हसीना मेरी तरह हरगिज नहीं थी. देखने वाले मेरे बारे में यह कहा करते थे कि हसीना मेरा नाम होना चाहिए था. हसीना एक आम सी लड़की थी.
फिर वाकयात की रफ्तार में तेजी आ गई. कभीकभी ऐसा होता है कि वाकयात बहुत सुस्त रफ्तार हो जाते हैं. एकएक लम्हा बोझिल होने लगता है और कभीकभी पंख लगा कर उड़ने लगता है. एक दिन अचानक अब्बा का इंतकाल हो गया. घर का एक कोना हमेशा के लिए खाली हो गया. वह कोना मोहब्बत का था, हिफाजत के अहसास का था. उन की मौत के बाद पता चला कि जिंदगी कितनी बेरहम, कितनी दुश्वार है. यह तो रगों से लहू निचोड़ कर रगों को खुश्क कर देती है. हमारे तालीमी खर्चे थे और भूख थी, जो मौत की ही तरह बेरहम हुआ करती है.
मैं उस जमाने में मैट्रिक कर चुकी थी. लेकिन अब्बा के जाते ही तालीम का सिलसिला तोड़ देना पड़ा. इंसान पहले दिन से भूख को तरजीह देता आया है तो भूख की मांग यह थी कि तालीम छोड़ दो. अच्छे लिबास न इस्तेमाल करो और अच्छी जिंदगी से बाज आओ. हम ने यही किया, लेकिन यह भी कब तक चल सकता था?
अब सवाल यह था कि किया क्या जाए? दोनों भाइयों ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी, लेकिन नौकरी इतनी आसानी से कहां मिल सकती थी और वह भी उन को, जिन का बाप एक मामूली हैसियत का इंसान रहा हो और वह मर गया हो.
हम सब सिसकती हुई जिंदगी गुजार रहे थे कि एक दिन एक लंबी सी स्याह कार हमारे दरवाजे पर आ कर रुकी. वह पहला मौका था कि हमारे दरवाजे पर कोई गाड़ी आई थी. दरवाजों की ओट से चेहरे झांकने लगे. बच्चों ने कार के गिर्द घेरा डाल दिया. पूरे मोहल्ले में एक शोर सा बरपा हो गया. हम जल्दी से दरवाजे पर आ गए. गाड़ी से उतरने वाली एक मोटी सी औरत थी, जिस ने कीमती साड़ी पहन रखी थी. उस के हाथों में सोने की चूडि़यां थीं. वह सीधे हमारे दरवाजे आ गई. उस की गाड़ी में एक बावर्दी ड्राइवर बैठा था.
‘‘तुम नसीमा हो न?’’ उस मोटी औरत ने अम्मी की तरफ इशारा किया.
‘‘हां,’’ अम्मी ने जल्दी से अपनी गरदन हिला दी, ‘‘लेकिन आप…’’
‘‘मैं साजिदा हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम मुझे नहीं जानती, लेकिन मैं तुम से अच्छी तरह वाकिफ हूं.’’
अम्मी असमंजस में पड़ गईं, फिर भी उन्होंने एक तरफ हट कर उसे रास्ता दे दिया. वह मोटी औरत नाकभौं चढ़ाई हुई अंदर आ गई. उसे शायद घर से उठने वाली बू पसंद नहीं आई थी या इतने छोटे घर में उस का दम घुट रहा था. अम्मी ने उसे सेहन में रखी हुई चौकी पर बैठा दिया.
‘‘मैं अभी तक आप को पहचान नहीं सकी.’’ अम्मी ने कहा.
अम्मी की बात का जवाब देने के बजाय उस की निगाहें पूरे घर का जायजा ले रही थीं. मैं और मेरे सारे बहनभाई वहीं खड़े थे. मैं उस की निगाहों के अंदाज से शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. वह छोटा सा घर उस की शान के काबिल नहीं था. जिस औरत के पास इतनी शानदार गाड़ी हो, उस का घर भी यकीनन बहुत शानदार होगा. चारों तरफ का जायजा लेने के बाद उस ने अपनी निगाहें मुझ पर गड़ा दीं. मुझे उस की निगाहों से कुछ बेचैनी सी होने लगी थी.
‘‘आप के शौहर के औफिस में शेरवानी साहब काम करते थे. आप ने उन का नाम जरूर सुना होगा?’’
अम्मी को याद आ गया, ‘‘हां हां, याद आया.’’
‘‘मैं उन की बीवी हूं,’’ उस औरत ने बताया, ‘‘मैं तो बहुत दिनों से यहां आने की सोच रही थी, लेकिन फुरसत ही नहीं मिलती थी. आज फुरसत मिली है तो आप लोगों से मिलने चली आई हूं.’’
‘‘आप की बहुत मेहरबानी.’’ अम्मी ने कहा और मेरे एक भाई को कोल्डड्रिंक लाने के लिए दौड़ा दिया.
वह औरत कुछ देर तक बातें करने के बाद चली गई. जातेजाते उस ने हम सब के हाथों पर 100-100 के नोट भी रखती गई. उस की कृपा दृष्टि मुझ पर ज्यादा ही महसूस हो रही थी. मुझे तो यों महसूस हो रहा था, जैसे वह सिर्फ मुझ से ही मिलने आई थी. वह चली तो गई, लेकिन अम्मी को परेशान कर गई. मैं ने महसूस किया कि उस के जाने के बाद वह बहुत देर तक उलझी रही थीं. मैं अम्मी के बाद घर में सब से बड़ी थी, इसलिए मुझे उन की परेशानी पूछने का हक हासिल था.
‘‘मुझे इस औरत का यहां आना अच्छा नहीं लगा.’’ अम्मी बोलीं.
‘‘क्यों? वह तो बहुत अच्छी औरत लग रही थी.’’ मैं ने न जाने क्यों उस की हिमायत की, ‘‘जरा सोचें, हमारे घर में आता ही कौन है और वह भी इतने पैसे वाली औरत…कितनी शानदार गाड़ी थी उस की और उस के हाथों में सोने की चूडि़यां कितनी थीं.’’
‘‘यही तो परेशानी की बात है कि यह सब कुछ जायज नहीं है.’’ अम्मी ने कहा.
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘ओहो, अब तू मुझ से बहस करेगी?’’
‘‘नहीं अम्मी, मैं बहस नहीं कर रही हूं. आप मुझे बताएं न. मैं अब बड़ी हो गई हूं. जब आप ही मुझे अच्छाबुरा नहीं बताएंगी तो कौन बताएगा?’’
‘‘तेरे अब्बा बताया करते थे कि शेरवानी साहब अच्छे आदमी नहीं हैं,’’ अम्मी ने कहा, ‘‘उन के पास बेपनाह दौलत है, जबकि जाहिर है नौकरी से इतनी दौलत कभी नहीं आ सकती.’’
‘‘बस अम्मी, इतनी सी बात? हो सकता है शेरवानी का नौकरी के अलावा और कोई कारोबार हो या जायदाद हो.’’
‘‘अच्छा, अच्छा… अब तू खामोश रह.’’
उस रात मैं और हसीना सोने से पहले उसी की बातें करती रही थीं.
वह खातून एक बार फिर मेरे घर आई. इस बार भी उस के आने से मोहल्ले में हंगामा बरपा हो गया. अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी थीं, लेकिन वह ऐसी औरत थी कि उस ने अम्मी के रवैए का बुरा नहीं माना. उस का ध्यान इस बार भी मुझ पर ही था और जहां तक मेरा सवाल था, मैं उस की दौलत की चमकदमक से प्रभावित हो चुकी थी. उस दिन उस ने एक अजीब हरकत की. उस ने उस वक्त मेरे हाथ में कागज का एक पुरजा थमा दिया, जब अम्मी उस के लिए चाय बनाने गई थीं. वह मुझे कागज देते हुए बोली, ‘‘इस को जल्दी से अपने पास रख लो. इस में मेरा पता है. किसी दिन आ जाना. तुम से जरूरी बात करनी है, लेकिन किसी को पता न चले.’’
मैं ने न जाने क्या सोच कर खामोशी अख्तियार कर ली. मैं ने अम्मी को भी नहीं बताया. अलबत्ता तनहाई में सोचती रही थी कि उस ने मुझे अपने घर क्यों बुलाया है? मैं उस के किस काम आ सकती हूं? मैं तो एक गरीब लड़की हूं और उस के लिए किसी भी तरह फायदेमंद नहीं हो सकती हूं. होना तो यह चाहिए था कि मैं उस की पेशकश को कबूल न करती. मैं ने अम्मी के विश्वास को कभी ठेस नहीं पहुंचाई थी, लेकिन उस की चमकदमक ने मुझे प्रभावित कर रखा था. इस के अलावा मेरे दिल में उत्सुकता भी जाग उठी थी. आखिर मैं ने बहुत सोचविचार के बाद उस के घर जाने का फैसला कर लिया.
अब सवाल यह था कि घर से किस तरह निकलूं. तालीम का सिलसिला खत्म हो चुका था. इसलिए मुझे अम्मी से झूठ बोलना पड़ा. मैं ने अम्मी से किसी सहेली के घर जाने का झूठ बोला था. और यह मेरी जिंदगी का पहला झूठ था. झूठ बोलते हुए शुरूशुरू में थोड़ी सी झिझक होती है, निगाहें झुकी रहती हैं, जुमले टूटटूट जाते हैं. फिर 2-4 बार के बाद यह झिझक खत्म हो जाती है. लहजे में आत्मविश्वास पैदा हो जाता है.
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मैं झिझक रही थी, मेरे जुमले टूट रहे थे, लेकिन अम्मी को कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें मुझ पर विश्वास था. मैं घर से निकल पड़ी. उस औरत का पता मेरी मुट्ठी में दबा हुआ था. वह मेरा पहला सफर था. अब तो यह पता ही नहीं चलता कि मैं कहीं ठहरी हूं या सफर में हूं. बहरहाल, मैं उस के आलीशान मकान में पहुंच गई. उस मकान को देख कर आंखें फटी रह गई थीं. यकीन नहीं आता था कि मकान इतना बड़ा भी होता है. मैं जब मकान में दाखिल हुई तो मेरे जिस्म पर कंपकंपी छाई हुई थी. मैं ने
अब तक अपने हुस्न से दूसरों को सम्मोहित होते देखा था, लेकिन उस वक्त दौलत की ताकत ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. उस मकान में ऐसीऐसी चीजें थीं, जिन को मैं ने ख्वाब में भी नहीं देखा होगा, क्योंकि ख्वाब भी तजुर्बात से पैदा होते हैं. और मुझे कीमती कालीनों, खूबसूरत फानूसों, आरामदेह सोफे वगैरह का कहां तजुर्बा था? वह औरत मेरे साथसाथ चल रही थी. उस ने मुझे पूरे मकान की सैर करवाई. उस के होंठों पर एक ऐसी गहरी मुसकराहट थी, जिस का मतलब उस समय समझ में नहीं आया था. मकान देखने के बाद मैं उस के साथ लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में आ गई.
‘‘चलो, बैठ जाओ,’’ उस ने सोफे की तरह इशारा किया, ‘‘तुम थक गई होगी.’’
मैं चुपचाप बैठ गई. नरमनरम सोफा ऐसा लग रहा था, जैसे ढेर से झाग ने मुझे समेट लिया हो. मेरे जिस्म की कंपकंपी अभी तक कम नहीं हुई थी.
‘‘घर कैसा लगा तुम्हें?’’ उस ने पूछा.
‘‘बहुत अच्छा,’’ मैं ने अटकते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं ने ऐसा घर पहले कभी नहीं देखा था.’’
‘‘अगर तुम चाहो तो यह सब कुछ तुम्हारा हो सकता है.’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘क्या?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उस की तरफ देखा, ‘‘मेरा…यह आप क्या कह रही हैं?’’
‘‘हां तुम्हारा…देखो जरीना, मैं ने एक खास मकसद से तुम्हें यहां बुलाया है, क्योंकि मैं समझती हूं, तुम एक समझदार लड़की हो. यहां जो कुछ देखोगी और सुनोगी, उस का जिक्र किसी से नहीं करोगी. देखो, आज हालात बहुत बदल गए हैं. आज की सब से बड़ी सच्चाई दौलत है. दौलत, जो पेट भर खाने को देती है. दौलत, जो लिबास मुहैया कराती है. दौलत, जो समाज में इज्जत बढ़ाती है. बाकी जो है, सब बकवास है. तुम्हारे हुस्न की मिसाल मिलनी मुश्किल है. लेकिन गरीबी ने तुम्हारा क्या हाल कर दिया है. तुम्हारे खूबसूरत गालों पर भूख ने जर्दी की तह जमा दी है. तुम्हारी खूबसूरत आंखें वीरान होने लगी हैं. तुम्हारा शानदार जिस्म अच्छे लिबास को तरस रहा है. क्या यह सब तुम्हें अच्छा लगता है?’’
‘‘नहीं..,’’ मैं ने अनजाने तौर पर अपनी गरदन हिला दी.
‘‘मैं जानती थी कि तुम्हारा यही जवाब होगा,’’ उस ने कहा, ‘‘आहिस्ताआहिस्ता आने वाली मौत किस को अच्छी लगती है और गरीबी ऐसी ही मौत है. तुम को शायद यह अंदाजा न हो कि मैं ने तुम्हारे यहां सिर्फ तुम्हारी वजह से आनाजाना शुरू किया है. मेरे शौहर शेरवानी ने तुम्हारा जिक्र किया था. मेरे शौहर और तुम्हारे अब्बू एक ही औफिस में काम करते थे. यह नौकरी तो सिर्फ एक आड़ है, वरना मेरे शौहर को नौकरी की कोई जरूरत नहीं है. तो एक दिन शेरवानी तुम्हारे अब्बू के साथ तुम्हारे घर गए थे. वहां उन्होंने तुम्हें देख लिया था. फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे अब्बू का इंतकाल हो गया और मुझे तुम्हारे घर जाने का मौका मिला. मैं यह चाहती थी कि मैं तनहाई में कुछ देर तुम से बातें कर लूं. सो आज मौका मिल गया है.’’
‘‘लेकिन क्यों?’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा. उस वक्त मेरी घबराहट कुछ कम हो गई थी.
‘‘इस सवाल का जवाब तुम्हें आईना देगा. तुम आईने में अपने आप को देख कर सवाल करो. आईने से यह पूछो कि क्या इतनी खूबसूरत आंखें वीरान होने के लिए हैं? क्या यह नायाब जिस्म इसलिए बनाया गया है कि अच्छे लिबास को तरसता रहे? क्या यह तरोताजा चेहरा भूख का सदमा बरदाश्त करने के लिए है? क्या तुम इसलिए हो कि 80 गज के एक घुटन भरे क्वार्टर में अपनी जिंदगी बिता दो? क्या तुम्हारा बेमिसाल हुस्न इसलिए है कि एक मामूली दर्जे का गंदा, कंगाल सा आदमी तुम्हें ब्याह कर ले जाए और तुम उस के गंदे घर में सिसकते हुए सारी जिंदगी गुजार दो? बताओ, क्या तुम्हें अच्छी जिंदगी पसंद नहीं है? क्या तुम यह सब हासिल करना नहीं चाहती, जो इस वक्त तुम्हारे इर्दगिर्द फैला हुआ है?’’
मैं उस की बातों के सम्मोहन में फंस गई थी. उस ने मुझे एक दूसरी किस्म के अहसास में मुब्तिला कर दिया था. इस से पहले लोगों ने यह तो अहसास दिला दिया था कि मैं बेहद हसीन हूं, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया था कि ऐसा हुस्न 80 गज के क्वार्टर में नहीं रहता है. ऐसे हुस्न के लिए एक खूबसूरत मकान और उम्दा फर्नीचर चाहिए. इसलिए मुझे उस की बातें अच्छी लग रही थीं.
‘‘बताओ, क्या तुम यह सब नहीं चाहतीं?’’ उस ने फिर सवाल किया.
‘‘क्यों नहीं चाहती, मैं भी इंसान हूं. मेरी भी ख्वाहिशें हैं.’’ मैं ने कहा.
‘‘शाबाश! असल चीज इरादा है, ख्वाहिश है. अगर इरादा पुख्ता और ख्वाहिश में शिद्दत हो तो सब कुछ हासिल किया जा सकता है.’’
‘‘किस तरह?’’
‘‘हां, इस सवाल का जवाब जरा मुश्किल है, क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारा जमीर जाग उठे. इज्जत वगैरह का खयाल आ जाए और तुम नाराज हो कर चल दो. मुझे मालूम है कि मैं ने अगर बता दिया तो वही होगा, जो मैं कह रही हूं यानी तुम नाराज हो जाओगी, मुझे बुराभला कहोगी, गालियां दोगी, लेकिन मुझे तुम्हारी नाराजगी की परवाह नहीं होगी. मैं बुरा नहीं मानूंगी, क्योंकि शुरूशुरू में ऐसा ही होता है. लेकिन इस घर के दरवाजे एक शानदार भविष्य ले कर तुम्हारे लिए खुले रहेंगे. तुम जब आना चाहो, यहां आ सकती हो.’’
‘‘आप बताएं तो सही, मुझे करना क्या होगा?’’
उस ने जो कुछ बताया, उस ने मेरे पूरे बदन में आग भर दी थी. मैं नहीं कह सकती थी कि वह आग लज्जत दे रही थी या उस की तपिश में तकलीफ हो रही थी. एक अजीब सी हालत थी. अहसास हो रहा था कि शायद मैं ने यहां आ कर गलती की है या शायद कोई गलती नहीं की. आदमी के पास जब एक कीमती शै है तो उसे ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचने का हक हासिल है.
‘‘तो यह है दौलत हासिल करने का तरीका.’’ मैं ने अपनी हैरानी पर काबू पाते हुए पूछा.
‘‘हां, मुझे मालूम है कि इस वक्त तुम्हारी क्या हालत हो रही होगी. हमारे पास जबरदस्ती नाम की कोई चीज नहीं है. यहां सब कुछ अपनी मरजी से हुआ करता है. मैं यह बता दूं कि इस समाज में अच्छाईबुराई नाम की कोई चीज नहीं है. सब बकवास करते हैं. तुम इस मकान में आने वालों को देख लो तो तुम्हारे होश उड़ जाएं. ये वे लोग हैं, जिन के चर्चे अखबारों और रिसालों में होते हैं, जिन की पाकीजगी की कसमें खाई जाती हैं. जिन पर कौम विश्वास करती है. सब यहां आते हैं. रात के अंधेरों में आते हैं और सुबह होने से पहले चले जाते हैं, ताकि उन की पारसाई का भरम कायम रहे.
‘‘तुम इस शहर में इतने खूबसूरत मकान और गाडि़यां देखती हो तो यह सब कहां से आता है? किसी ने हलाल की कमाई से कोई महल नहीं बनवाया है. तुम मुझे किसी एक का नाम बता दो. अब जायज और नाजायज एकदूसरे में गड्डमड्ड हो कर रह गए हैं तो इस मौके का फायदा क्यों न उठा लिया जाए. मैं फिर यह कह रही हूं कि तुम पर जबरदस्ती नहीं कर रही, क्योंकि यह सौदा अपनी खुशी से होता है. तुम घर जाओ और जब तुम्हें जमीर और इज्जत वगैरह बेकार की बातें लगने लगें तो यहां चली आना. यह घर एक शानदार भविष्य के साथ तुम्हारा इंतजार करेगा.’’
मैं वहां से घर आ गई. उस औरत की बातों ने मुझे एक दोराहे पर खड़ा कर दिया था. बरसों की पढ़ाईलिखाई और घर के माहौल ने मुझे यह याद करा दिया था कि मैं ऐसी दौलत, ऐसी जिंदगी पर लात मार दूं. जमीर बहुत आला चीज है. औरत का सब कुछ उस की इज्जत हुआ करती है. लेकिन दूसरी तरफ उस की बातें मुझे अहसास दिला रही थीं कि शायद वह ठीक ही कह रही थी. हो सकता है कि आप को भी यह सब नागवार गुजर रहा हो. आप सोच रहे हों कि मुझे उस औरत को गाली दे कर वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन क्यों?
मेरे घर में फाके होते हैं. हम लोग रूखी रोटी चाय के साथ भिगोभिगो कर खाते हैं तो क्या उस वक्त आप हमारे जमीर की दाद देने के लिए आते हैं? नहीं, आप ऐसा नहीं करते. आप को तो अहसास भी नहीं होता और जब हम अपनी मंजिल तय कर के अपना सफर शुरू कर देते हैं, उस वक्त आप समाज के ठेकेदार बन कर हमारे सामने आ जाते हैं. लेकिन ऐसे ठेकेदार कि हमारे खिलाफ तकरीर करते हुए आप की निगाहें हमारे जिस्मों को तौलती रहती हैं. खैर, तो मैं ने किसी से जिक्र नहीं किया, क्योंकि मुझे उस रास्ते पर सफर नहीं करना था. इस दौरान घर की हालत और भी बिगड़ चुकी थी. भाइयों ने मायूसी के बाद आवारागर्दी शुरू कर दी थी.
एक दिन अम्मी ने अपने दिल पर काबू करते हुए मुझे एक बात बताई, ‘‘बेटी, मेरा दिल तो नहीं चाहता, लेकिन क्या करूं? पेट की आग कम ही नहीं होती. दोनों बेटे तो किसी काम के नहीं रहे. सौ दफा समझा चुकी हूं कि जब अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है तो कोई और काम कर लो. अब भूख और कंगाली बरदाश्त नहीं होती. मोहल्ले में जो अजीम साहब रहते हैं न, वह कल आए थे मेरे पास. बता रहे थे कि उन्होंने तुम्हारे लिए किसी फर्म में नौकरी की बात कर ली है. अभी 7 सौ रुपए मिलेंगे. बाद में तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’
मैं ने तो नौकरी करने का कभी तसव्वुर भी नहीं किया होगा. अम्मी यह क्या कह रही थीं. मैं इनकार भी नहीं कर सकती थी. घर की मजबूरियां मेरे सामने खुली हुई किताब की तरह थीं, लिहाजा मैं ने नौकरी के लिए हामी भर दी. 7 सौ ही सही, उस में रूखीसूखी रोटी तो आ सकती थी. मेरे दोनों भाइयों को जब मेरी नौकरी के बारे में मालूम हुआ तो वे चुप रह गए. और ऐसा होना भी चाहिए. अगर वे ऐतराज करते तो घर का गुजारा कैसे होता?
तीसरे दिन मैं उस फर्म की फैक्ट्री में पहुंच गई. वहां मेरे अलावा और लड़कियां भी थीं. लेकिन वहां मेरा पहुंचना ऐसा था, जैसे आसमान से चांद उतर आया हो या फैक्ट्री में बहार आ गई हो. मैं उन के दरम्यान किसी शहजादी की तरह थी. पैकिंग के कागजात मेरे खूबसूरत हाथों में आ कर जगमगाने लगते थे. मेरे पास हुस्न की जो ताकत थी, उस ताकत ने फैक्ट्री में अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया था और उस फैक्ट्री के 2 आदमी मेरी जिंदगी में दाखिल हो गए. यह मेरे सफर का एक और पड़ाव था. अंदाजा हो गया कि रिश्ते किस झूठ के नाम हैं. असल चीज है हविस और दौलत. जिंदगी में इस के अलावा और कुछ नहीं है. हविस, जो हमेशा मुझ जैसी लड़की के पीछे लगी रहती है और दौलत जिस से रोटी, कपड़ा और मकान खरीदा जा सकता है.
और आज मैं तुम दोनों से भी मुखातिब हूं. तुम राशिद अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक के बेटे थे और इफ्तखार अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक थे. मैं तुम दोनों के दरम्यान एक ऐसी नेमत की तरह थी, जिस को तुम दोनों हासिल करना चाहते थे. खुद बताओ, कहां गया तुम्हारा रिश्ता? बापबेटे का रिश्ता तो बहुत अजीम हुआ करता है. फिर तुम दोनों को क्या हो गया था? तुम दोनों ने मेरी खातिर एकदूसरे से रकाबत तक मोल ले ली थी. पूरी फैक्ट्री तुम दोनों का मजाक उड़ाती थी और मैं बदनाम हुई जा रही थी. तुम दोनों ने बारीबारी से मुझे इतनी सुविधाएं दीं कि मैं खुद को हवाओं में महसूस करने लगी थी.
आज मैं पूछती हूं कि तुम दोनों ने ऐसा क्यों किया? मेरी खातिर तुम्हारे दरम्यान बापबेटे की शिनाख्त क्यों खत्म हो गई थी? क्या हुस्न ऐसा जादू है, जो आंखों पर पट्टियां बांध देता है? वैसे मैं तुम दोनों की शुक्रगुजार हूं. अगर तुम ऐसा न करते तो अब तक मैं और मेरे घर वाले भूख से हलाक हो चुके होते. उस फैक्ट्री में काम करते हुए तीसरा दिन था कि एक औरत ने आ कर बताया कि राशिद अली मुझ से मिलना चाहता है. मैं उस वक्त तक राशिद अली को नहीं जानती थी. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि राशिद अली उस फैक्ट्री के मालिक का बेटा है और फैक्ट्री की देखभाल उसी के जिम्मे है.
मेरी समझ में नहीं आया कि उस ने मुझे क्यों बुलाया है. शायद मेरे काम में कोई कोताही थी या वह मुझे किसी और काम में लगाना चाहता था. बहरहाल मैं उस के साथ हो ली. वह औरत मुझे एक शानदार कमरे में पहुंचा कर वापस चली गई. उस वक्त उस कमरे में सिवाय दौलत के इजहार के और कुछ नहीं था. यह दौलत कैसी चीज थी, जो मुझे प्रभावित करने पर तुली हुई थी. वह मेरे सामने रूप बदलबदल आ रही थी.
मैं उस औफिस को आंखें फाड़फाड़ कर देखती रही. सब कुछ इतना कीमती था कि सिर्फ उसी औफिस में मेरी जिंदगी भर की कमाई से कई गुना ज्यादा रकम लगी हुई थी. मैं अभी उन सब चीजों को देख रही थी कि राशिद कमरे में दाखिल हुआ. वह एक खूबसूरत नौजवान था. अच्छी सूरतशक्ल के बावजूद उस के चेहरे पर एक खास किस्म की अय्यारी का अक्स था. वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. मैं उसे देख कर सिटपिटा गई.
‘‘मैं राशिद अली हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘यह फैक्ट्री मेरी है और मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम मुझे वहां काम करती हुई अच्छी नहीं लग रही थीं.’’
‘‘जी, क्या कहा आप ने?’’
‘‘हां, देखो, मैं बहुत साफ कहने वाला आदमी हूं. अपने दिल में कुछ छिपा कर नहीं रखता. मैं यह कह रहा हूं कि कुदरत ने तुम जैसी हसीना को इसलिए नहीं बनाया कि तुम मामूली से काम करती रहो. तुम्हें तो हुकूमत करने के लिए बनाया गया है.’’
‘‘पता नहीं, आप क्या कह रहे हैं?’’ मैं जल्दी से बोली.
वैसे मैं अच्छी तरह समझ गई थी कि वह क्या कह रहा था. वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था और मेरे पास इस ताकत के अलावा और था ही क्या, गोया उस ने भी मुझे मेरी ताकत का अहसास दिला दिया था. अपने हुस्न की तारीफ सुनते हुए मुझे अच्छा लग रहा था. इस से पहले जो लोग मेरी जिंदगी में आए और जिन्होंने मेरे हुस्न को सराहा था, वे मेरे ही तबके से ताल्लुक रखते थे. लेकिन राशिद अली एक दौलतमंद इंसान था. उस ने न जाने कितने मुल्कों की सैर की होगी. कितनी लड़कियों से उस का वास्ता पड़ा होगा और जब वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था तो इस का मतलब यह था कि मैं वाकई बेहद हसीन थी. राशिद के पास अगर दौलत थी तो मेरे पास हुस्न था. उस कमरे में हम दोनों बराबर के थे.
मैं उस के सामने तन कर खड़ी हो सकती थी. उसे अपनी अहमियत का अहसास दिला सकती थी.
‘‘आप ने मुझे क्यों बुलाया है?’’
‘‘सिर्फ यह कहने के लिए कि तुम आज से पैकिंग नहीं करोगी, बल्कि तुम्हें उस डिपार्टमेंट का इंचार्ज बना दिया गया है,’’ उस ने कहा, ‘‘और वक्त गुजरने के साथसाथ तुम्हारी और भी तरक्की होती रहेगी. मैं जानता हूं कि तुम में कितनी खूबियां हो सकती हैं.’’
मैं ने सोचा, उस से कह दूं कि खूबियां मुझ में नहीं, मेरे हुस्न में हैं. लेकिन गरदन झुका कर खामोश खड़ी रही. उस दिन के बाद से फैक्ट्री में काम करने वाली लड़कियां मुझ से ईर्ष्या करने लगी थीं. यह पहला मौका था कि किसी लड़की को इतनी जल्दी तरक्की मिल गई थी. लेकिन शायद उस फैक्ट्री में मुझ जैसी खूबसूरत लड़की भी पहली बार आई थी. मेरी तनख्वाह फौरी तौर पर 7 सौ से 12 सौ कर दी गई थी.
कुछ दिनों बाद मुझे फिर बुलाया गया. इस बार बेटे ने नहीं, बल्कि बाप ने बुलाया था. बापबेटे में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था. उस ने भी गुफ्तगू की शुरुआत मेरे हुस्न की तारीफ से की थी, लेकिन उस का अंदाज अलग था. उस की उम्र ने उसे होशबंदी सिखा दी थी. इसलिए वह जानता था कि किसी लड़की के लिए किस अंदाज का जाल बिछाना चाहिए.
‘‘मैं तुम्हें देखते ही समझ गया था कि तुम ऐसी लड़की नहीं हो, जो फैक्ट्री में रह कर अपनी जिंदगी तबाह कर दे,’’ उस ने कहा, ‘‘इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम औफिस में आ जाओ. वहां तुम्हारी तरक्की की भी रोशन उम्मीदें हैं.’’
‘‘लेकिन सर, मुझे तो औफिस का कोई काम नहीं आता.’’ मैं ने कहा.
‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ इफ्तखार मुसकरा दिए, ‘‘शुरूशुरू में तो किसी को भी कुछ नहीं आता. आहिस्ताआहिस्ता सब कुछ आ जाता है.’’
फैक्ट्री की लड़कियों ने जब यह खबर सुनी तो मेरे खिलाफ उन के गुस्से की आग और तेज हो गई, लेकिन मुझे उन की परवाह नहीं थी. मैं ने तो अपना सफर शुरू कर दिया था और सफर में कामयाबी की शर्त यह होती है कि न तो पीछे मुड़ कर देखा जाए और न ही झिझक कर पांव रोक दिए जाएं. औफिस में मेरी तनख्वाह 15 सौ रुपए माहवार कर दी गई. हमारे सभी मसले हल हो सकते थे, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सका. औफिस में एक दिन कयामत आ गई. उन दोनों की बीवियां औफिस चली आईं. क्या तमाशा था कि सासबहू दोनों एक ही लड़की से परेशान हो कर औफिस चली आई थीं. मैं सास की भी सौतन हुई जा रही थी और बहू की भी. औफिस में अच्छाखासा हंगामा बरपा हो गया था और उसी दिन मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. मैं आसमान में उड़तेउड़ते अचानक जमीन पर आ गिरी.
घर पहुंची तो मुझ से पहले मेरी बदनामी वहां पहुंच चुकी थी. किसी ने मेरे घर वालों को सूरतेहाल से आगाह कर दिया था. पूरा घर मेरे खिलाफ खड़ा था. खासतौर पर दोनों भाई बहुत नाराज हो रहे थे.
‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ मैं ने उन लोगों से कहा, ‘‘अगर मैं खूबसूरत हूं तो यह खूबसूरती मैं ने अपनी मरजी से तो हासिल नहीं की. मेरा तो सिर्फ इतना कुसूर है कि मैं ने हालात से फायदा उठाते हुए तरक्की करनी चाही थी. इस के अलावा मैं ने कुछ नहीं किया.’’
‘‘लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह हमारी इज्जत और शान के खिलाफ है.’’ एक भाई गुस्से से बोला.
‘‘आप लोग किस इज्जत और शान की बात कर रहे हैं?’’ मैं ने तल्ख हो कर कहा, ‘‘फर्ज करें, अगर मैं फैक्ट्री में काम करती और हर महीने अपनी तनख्वाह ला कर दिया करती और पूरा घर उस तनख्वाह से परवरिश पाता रहता तो क्या इज्जत और शान कायम रहती कि लड़की घर चला रही है, जबकि यह काम मर्दों का है?’’
‘‘लेकिन अब क्या होगा?’’ अम्मी ने परेशान हो कर अपने आप से सवाल किया.
मैं उन की परेशानी के मतलब से वाकिफ हो चुकी थी. उन की परेशानी इसलिए नहीं थी कि मैं बदनाम हो चुकी थी, बल्कि इस परेशानी की वजह यह थी कि नौकरी खत्म होने के बाद गुजारा किस तरह होगा. उस वक्त मुझे अहसास हो रहा था कि गरीबी जब हद से गुजर जाए तो हर वह शख्स काबिलेकबूल हो जाता है, जिस के हाथ में नोट हों, दूसरे हाथ में चाहे हविस की तलवार ही क्यों न हो. यह एक बेरहम हकीकत है और हमें उसे स्वीकार भी कर लेना चाहिए. मैं ने महसूस किया कि उस दिन के बाद से अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी रहने लगी थीं. दोनों भाई भी जराजरा सी बात पर नाराज हो रहे थे. हसीना ने मुंह फुला रखा था.
अम्मी ने अच्छे वक्त के कुछ जेवर बचा रखे थे. उन्हें भी बेच दिया गया. मैं कभीकभी खुद को आईने में देखती तो अपने आप पर तरस आने लगता था. खूबसूरत आंखें जो मुरझाने के लिए नहीं थीं, मुरझाई जा रही थीं. दिलकश रंग फीका पड़ता जा रहा था. कुदरत ने मुझे एक नेमत तो दी, लेकिन अफसोस, मैं उस की हिफाजत नहीं कर पा रही थी. फिर मेरी मुलाकात फिरोज से हो गई. यह मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस के बाद मैं ने किसी से मुलाकात नहीं की. सिर्फ समझौता किया, सौदा किया. वह मेरे अब्बा के किसी दोस्त का लड़का था, जो किसी औफिस में मामूली सा नौकर था. इसलिए उस के जिस्म पर लिबास भी मामूली हुआ करता था. इस के बावजूद वह मुझे पसंद आ गया, क्योंकि पसंदीदगी का अमल हिमाकत से शुरू हो कर शर्मिंदगी पर खत्म हो जाता है.
वह सिर्फ एक बार हमारे घर आया था, लेकिन मुझ से मिलने के बाद उस का आनाजाना शुरू हो गया था. जब उस ने मेरी तरफ मोहब्बत का हाथ बढ़ाया तो मैं न जाने क्यों, उस के बढ़े हुए हाथ को झटक न सकी. कैसेकैसे लोगों ने मुझे हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं ने उस का हाथ कबूल कर लिया था, जो एक मामूली सा क्लर्क था और जिस के जिस्म पर ढंग का लिबास भी नहीं होता था. हम दोनों छिपछिप कर मिलते रहे. मेरा खयाल था कि फिरोज हमारे घर के हालात से आगाह था और वह हम लोगों के लिए सहारा बन जाएगा. हम घंटों एकदूसरे के साथ बैठे पूरी दुनिया को फतह करने की बातें करते रहे. हम ने कैसेकैसे ख्वाब देखे थे. दुनिया की हर लड़की का ख्वाब एक जैसा होता है. एक मोहब्बत करने वाला शौहर, एक छोटा सा घर, उस में शरारतें करते हुए मासूम बच्चे.
फिरोज ने मुझ से कहा था, ‘‘मैं शायद दुनिया का खुशकिस्मततरीन इंसान हूं, क्योंकि मुझे दुनिया की खूबसूरततरीन लड़की से मोहब्बत हो गई है. तुम ने मुझे जिंदा रहने के अंदाज सिखा दिए हैं. देख लेना, मैं तुम्हारी मोहब्बत हासिल करने के बाद कितनी तरक्की करूंगा. औफिस के मालिक ने मुझ से कहा है कि मैं शार्टहैंड सीख लूं तो मेरी तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’
पहली बार मुझे झटका सा लगा. मेरा हुस्न इसलिए नहीं था कि किसी के तनख्वाह के इजाफे पर खुश होता रहे. फिरोज की सोच इस से बुलंद उड़ान नहीं भर सकती थी. मैं ने फिर भी उस से कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं पहली बार मोहब्बत के तजुर्बे से गुजर रही थी. एक दिन फिरोज मुझे अपने एक दोस्त के घर ले गया. उस दोस्त के घर में कोई भी नहीं था. सिर्फ मैं थी और फिरोज. उस दिन पहली बार मेरे गालों पर सुर्खी उमड़ आई. मैं पहली बार एक ऐसी बात से वाकिफ हो गई, जिस से वाकिफ कराने के लिए राशिद अली, इफ्तखार अली और न जाने कितने लोग कोशिश करते रहे थे.
मैं जब फिरोज के साथ उस घर से वापस आई तो अपने आप को हार चुकी थी, लेकिन न जाने क्यों मुझे इत्मीनान सा था. यह इत्मीनान खुद फिरोज ने दिलाया था. उस ने कहा था कि वह बहुत जल्दी मुझे अपना लेगा और मैं खयालों में डूबी अपने घर आ गई. उस वक्त मेरे चलने का अंदाज बदल चुका था. मेरे लहजे में ठहराव पैदा हो गया था. मेरे अंदाजे में एक खास किस्म की खुशी थी. 4-5 दिनों के बाद घर में एक हादसा हो गया. अम्मी गुसलखाने में गिर पड़ी थीं. उन के कूल्हे की हड्डी टूट गई थी.
कंगाली में अगर जुकाम भी हो जाए तो उस का बोझ कंधों पर महसूस होने लगता है और यह तो कूल्हे की हड्डी थी, जिस के इलाज के खर्च इतने थे कि पूरे घर की चीजें फरोख्त हो जातीं. उस वक्त दोनों भाई किसी काम नहीं आ सकते थे, क्योंकि उन के पास सिवाय बेकारी के और कोई काम न था. गरीबों के रिश्तेदार भी कम ही होते हैं या होते ही नहीं हैं. लिहाजा हम कहीं से भी कोई मदद हासिल नहीं कर सकते थे.
उस वक्त मुझे फिरोज का खयाल आया. वही हमारी मदद कर सकता था. वह मेरी मोहब्बत और जिस्म का रखवाला था. उस से कोई तकल्लुफ नहीं था. मोहब्बत के रिश्ते में यही तो एक लुत्फ है कि एकदूसरे से खुल कर बातें कर ली जाती हैं.
मैं फिरोज से मिलने पहुंच गई. वह मुझे घर पर ही मिल गया था और यह इत्तफाक था कि वह घर पर अकेला ही था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर खुशी के रंग दौड़ गए.
‘‘फिरोज, मैं तुम्हारे पास एक बहुत जरूरी काम से आई हूं.’’ मैं ने कहा.
‘‘बताओ, तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है.’’
‘‘मेरी अम्मी गिर गई हैं. कूल्हे की हड्डी फ्रैक्चर हो गई है. तुम किसी भी तरह 5 हजार रुपए का बंदोबस्त कर दो.’’
एक लम्हे के लिए उस के चेहरे पर फीका सा रंग आ कर गुजर गया. वह कुछ सोचने लगा.
‘‘अब क्या सोचने लगे? क्या इतनी रकम नहीं है तुम्हारे पास?’’
‘‘नहीं, बात पैसों की नहीं है.’’
‘‘तो फिर क्या है?’’
‘‘मैं सोच रहा हूं कि तुम ने कुछ देर लगा दी,’’ वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम्हें तो अपने हुस्न की कीमत वसूल करने के लिए बहुत पहले आ जाना चाहिए था.’’
बस, यह वह आखिरी जुमला था, जो जरीना ने सुना था, क्योंकि उस के बाद जरीना ‘डौली’ हो गई थी. जरीना के नकाब को उस ने अपने सिर से उतार फेंका था. जरीना ने जब यह जुमला सुना तो जमीनआसमान एक हो गए थे. हवाएं रुक गई थीं. सूरज बहुत जल्दी डूब गया था और वह सब कुछ हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था. क्या मैं अपने हुस्न की कीमत वसूल करने गई थी? क्या मैं इतनी सस्ती थी? क्या लड़कियों के मुकद्दर में सिर्फ धोखे ही लिख दिए जाते हैं? क्या इस जमीन पर उगने वाले सारे रिश्ते झूठे हैं?
अब तो आप को यकीन हो गया होगा कि मैं इतनी तल्ख हकीकत क्यों हूं. बताइए, मैं उस वक्त क्या करती? हर तरफ तो आप जैसे लोगों की सल्तनत है और सल्तनत इतनी बड़ी कि कोई आप की हविस के दायरे से निकल ही नहीं सकता. आप चाहे कोई भी हों, लड़कियों के लिए और खासतौर पर हसीन लड़कियों के लिए आप का रवैया एक जैसा ही होता है, बेरहम और कांटेदार. आप के रवैए के नाखून हसीन जिस्मों पर खराशें डाल देते हैं. आप को मालूम है कि बाद में मैं ने क्या किया होगा? हां, मैं ने वही किया जो मुझे करना चाहिए था. मैं उस औरत के घर पहुंच गई, जिस ने कहा था कि मेरे लिए उस के दरवाजे खुले रहेंगे.
…और उस के दरवाजे खुले हुए थे. सब से पहले तो उस ने मुझे पुराने नाम से निजात दिलाई. जरीना से डौली हो गई. उस घर में और भी लड़कियां थीं, लेकिन मेरी तरह कोई नहीं थी. इसलिए मेरे हालात बहुत तेजी से बदलने लगे. मैं ने कहा था कि मुझे इस समाज में पारसा कोई नहीं दिखाई दिया. सब एक जैसे हैं.
उस मकान में जाने के बाद यह बात बिलकुल सच साबित हो रही है. वहां आने वाले व्यापारी, नेता, अफसर, लेखक, अदाकार, गर्ज यह कि हर पेशे के लोग वही लोग हैं, जो दूसरों के सामने कुछ और होते हैं, लेकिन मेरे बदन के आईने में उन के चेहरों की बनावट कुछ और हो जाती है. एक दफा खुद फिरोज भी आ चुका है, लेकिन मुझे देख कर भाग गया था. शुरूशुरू में मेरे घर वालों ने मुझ से ताल्लुक खत्म कर लिया था, लेकिन जब मैं ने उन के आगे पैसों के ढेर लगा दिए, एक खूबसूरत सा मकान उन के हवाले कर दिया तो उन्होंने भी समझौता कर लिया. यह एक तल्ख बात है, लेकिन है हकीकत. अब हम सब साथ रहते हैं. एक ही घर में, एक ही छत के नीचे.
मेरे दोनों भाई अब भी कोई काम नहीं करते. अब उन्हें जरूरत भी नहीं है. उन की जेबें हमेशा नोटों से भरी रहती हैं. मेरी अम्मी को आज अगर जुकाम भी होता है तो शहर भर के डाक्टर ‘बेगम साहिबा, बेगम साहिबा’ कहते हुए दौड़ लगा देते हैं. मेरी बहन हसीना को जब लिबास की जरूरत होती है तो मैं उस के लिए इतने लिबास खरीद देती हूं कि उस के लिए पसंद करना मुश्किल हो जाता है.
आप मेरी कहानी पढ़ कर मुझ पर अफसोस न करें, क्योंकि डौली बहुत खुश है. हो सकता है कि जरीना खुश न रहती, लेकिन मैं जरीना नहीं, डौली हूं. अगर आप को कभी मेरी जरूरत महसूस हो तो मेरा पता जानने की जद्दोजहद न करें. अपने इर्दगिर्द नजर डालें, आलीशान मकानों में कोई न कोई डौली आप को जरूर मिल जाएगी. Hindi Stories
लेखक – जरीना






