UP Crime. पति से निराश शीला ने भूपेंद्र का दामन थामा, लेकिन जब उस की भी शादी होने लगी तो शीला को अपना यार बदलना पड़ा. यह बात भूपेंद्र को पसंद नहीं आई. इस के बाद उस ने जो किया, क्या वह जायज था.

दोपहर 2 बजे की गई शीला रात होने तक घर नहीं लौटी तो उस के बच्चे परेशान होने लगे. वह डा. बंगाली से खुजली की दवा लेने शमसाबाद गई थी. उसे घंटे, 2 घंटे में लौट आना चाहिए था. लेकिन घंटे, 2 घंटे की कौन कहे, उसे गए कई घंटे हो गए थे और वह लौट कर नहीं आई थी. अब तक तो डा. बंगाली का क्लिनिक भी बंद हो गया होगा.

शीला का बड़ा बेटा 10 साल का सतीश रात होने की वजह से डर रहा था. वह ताऊ चाचाओं से भी मदद नहीं ले सकता था, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही उस की मां की ताऊ और चाचाओं से खूब लड़ाई हुई थी. उस लड़ाई में ताऊ और चाचाओं ने उस की मां की खूब बेइज्जती की थी.

सतीश के मन में मां को ले कर तरहतरह के सवाल उठ रहे थे. मां के न आने से वह परेशान था ही, उस से भी ज्यादा परेशानी उसे छोटे भाइयों के रोने से हो रही थी. 8 साल के मनोज और 3 साल के हरीश का रोरो कर बुरा हाल था. अब तक उन्हें भूख भी लग गई थी. उस ने उन्हें दुकान से बिस्किट ला कर खिलाया था, लेकिन बच्चे कहीं बिस्किट से मानते हैं. अब तक खाना खाने का समय हो गया था.

सतीश अब तक मां को सैकड़ों बार फोन कर चुका था, लेकिन मां का फोन बंद होने की वजह से उस की बात नहीं हो पाई थी. जब वह हद से ज्यादा परेशान हो गया और उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने अपने मामा श्रीनिवास को फोन कर के मां के बंगाली डाक्टर के यहां जाने और वापस न लौटने की बात बता दी.

दोपहर की गई शीला उतनी देर तक नहीं लौटी, यह जान कर श्रीनिवास परेशान हो गया. वह समझ गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. बहन के इस तरह अचानक रहस्यमय ढंग से गायब होने की जानकारी पा कर वह बेचैन हो उठा. उस के भांजे मां को ले कर किस तरह परेशान होंगे, उसे इस बात का पूरा अंदाजा था. उस ने भी शीला को फोन किया, लेकिन जब फोन बंद था तो शीला की भी उस से कैसे बात होती. बहन से बात नहीं हो सकी तो दोस्त की मोटरसाइकिल ले कर वह तुरंत घर से निकल पड़ा. 8 किलोमीटर का रास्ता तय कर के वह 15-20 मिनट में भांजों के पास आ पहुंचा.

बहन को ले कर उस के मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे. जवान बहन के साथ बदनीयती से किसी ने बुरा तो नहीं कर दिया, यह सोचने के पीछे वजह यह थी कि एक तो शीला घर नहीं लौटी थी, दूसरे उस का फोन बंद था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा अचानक क्या हो गया कि बहन का फोन बंद हो गया?

श्रीनिवास ने सब से पहले तो अपने तीनों भांजों के लिए खाने की व्यवस्था की. इस बीच बातचीत में सतीश ने मामा को बताया कि उन्हें स्कूल से ला कर खाना खिलाया. वे अपना होमवर्क करने लगे तो मां तैयार हो कर दवा लेने चली गई. उस ने घंटे, डेढ़ घंटे में लौटने को कहा था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि वह लौट कर ही नहीं आई.

सतीश ने बताया था कि शीला शमसाबाद वाले डा. बंगाली से दवा लेने गई थी. सतीश की इस बात से श्रीनिवास को हैरानी हुई, क्योंकि अभी तक तो शीला गांव से थोड़ी दूरी पर अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. बंगाली से दवा लेती थी. इस बार वह शमसाबाद क्यों चली गई? शीला का पति यानी श्रीनिवास का बहनोई जयपाल दिल्ली में रहता था. श्रीनिवास ने जयपाल को फोन कर के सारी बात बताई तो उस ने मजबूरी जताते हुए उस समय गांव पहुंचने में असमर्थता व्यक्त करते हुए शीला की खोजबीन करने का अनुरोध किया.

श्रीनिवास ने बहन के इस तरह अचानक गायब होने पर उस के जेठ सहीराम और देवरों गिरिराज, राकेश तथा दिनेश से बात की तो इन लोगों में से किसी ने भी उसे ठीक से जवाब नहीं दिया. उन्होंने शीला और उस के बच्चों से किसी तरह की हमदर्दी या सहानुभूति दिखाने के बजाय साफसाफ कह दिया कि वह खुद ही ढूंढ ले. उस से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है.

अपनी बहन के जेठ और देवरों की बातों से श्रीनिवास समझ गया कि पिछले दिनों संपत्ति को ले कर इन लोगों का उस की बहनबहनोई से झगड़ा हुआ था, उसी वजह से ये लोग नाराज हैं. इसलिए इन लोगों से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद करना बेकार है. वह तीनों भांजों को ले कर अपने गांव चला गया. बच्चों को अपनी मां के पास छोड़ कर वह बहन की तलाश करने लगा. बेटी के इस तरह अचानक गायब होने से उस की मां भी चिंतित थी.

शीला के जेठ और देवरों ने श्रीनिवास के साथ जैसा व्यवहार किया था, उस से उसे लगा कि उस के गायब होने के पीछे इन लोगों का हाथ तो नहीं है? उस की मां को भी कुछ ऐसा ही लग रहा था. इसलिए मांबेटे ने इस बात पर गहराई से विचार किया. रात काफी हो गई थी, इस के बावजूद श्रीनिवास शमसाबाद चौराहे पर डा. बंगाली की क्लिनिक तक शीला को ढूंढ़ आया था.

उस का सोचना था कि साधन न मिल पाने की वजह से बहन घर न जा पाई हो. लेकिन पूरे रास्ते में उसे एक भी आदमी आताजाता नहीं मिला. रास्ते में ही नहीं, बाजार में भी सन्नाटा पसरा था. विकलांग श्रीनिवास. पूरी रात बहन की तलाश में भटकता रहा.

अगले दिन डा. बंगाली की क्लिनिक खुलने के पहले ही वह शमसाबाद पहुंच गया. डा. सपनदास विश्वास 9 बजे के आसपास क्लिनिक पर पहुंचे तो श्रीनिवास ने उन से बहन के बारे में पूछा. डा. विश्वास ने मरीजों का रजिस्टर देख कर बताया कि कल तो शीला नाम की कोई मरीज उन के यहां नहीं आई थी.

इस से श्रीनिवास को किसी अनहोनी की आशंका हुई. वह सीधे थाना शमसाबाद जा पहुंचा. उस ने शीला के अपहरण और हत्या की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो थानाप्रभारी ने अगले दिन शीला की फोटो ले कर आने को कहा. थानाप्रभारी ने अगले दिन आने को कहा तो श्रीनिवास को लगा पुलिस टाल रही है. इसलिए वह वहां से सीधे जिलाधिकारी के यहां चला गया.

एक विकलांग को अपनी जवान विवाहिता बहन की तलाश में भटकते देख जिलाधिकारी गुहेर बिन सगीर ने उस की व्यथा  ध्यान से सुनी और थाना शमसाबाद पुलिस को आदेश दिया कि तत्काल पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज कर के काररवाई की जाए. जिलाधिकारी के आदेश के बाद श्रीनिवास थाना शमसाबाद पहुंचा और शीला का अपहरण कर हत्या करने की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए उस ने शीला के जेठ सहीराम, देवर, गिरिराज, दिनेश, राकेश और देवरानी रामलाली को नामजद करते हुए तहरीर दे दी.

रिपोर्ट दर्ज कर के पुलिस शीला की देवरानी को छोड़ कर चारों नामजद लोगों को हिरासत में ले कर थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ और जांच में पुलिस ने सभी को निर्दोष पाया, लेकिन अपना पीछा छुड़ाने के लिए पुलिस ने कागजी काररवाई कर के उन्हें जेल भेज दिया.

शीला के अपहरण और हत्या के मामले में 4 लोगों को जेल तो भेज दिया गया, लेकिन उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी बरामद नहीं हुई. शीला के गायब होने से अब वे लोग भी परेशान थे, जिन्हें जेल भेजा गया था. अब उन के घर वाले भी शीला की तलाश में लग गए, क्योंकि वे तभी जेल से बाहर आ सकते थे, जब शीला का कुछ पता चलता.

वे शीला की तलाश तो कर ही रहे थे, इस के अलावा उन्होंने गांव वालों तथा रिश्तेदारों की एक पंचायत भी बुलाई. इस पंचायत में श्रीनिवास तथा उस के गांव के भी 10-12 लोगों को बुलाया गया था. पंचायत में जेल भेजे गए लोगों के घर वालों ने शीला के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी के साथ भाग जाने का आरोप लगाया तो श्रीनिवास भड़क उठा. उस ने शीला के जेठ और देवरों और देवरानी को शीला के अपहरण और हत्या को दोषी मानते हुए अपनी काररवाई को उचित ठहराया.

श्रीनिवास अपनी जिद पर अड़ा रहा तो 3-4 घंटों तक बातचीत चलने के बाद पंचायत बिना किसी फैसले के खत्म हो गई. जिस काम के लिए यह पंचायत बुलाई गई थी, वह वैसा का वैसा ही रह गया. जेल भेजे गए लोगों की रिहाई भी नहीं हो सकी. शीला के गायब होने से उस के घर तथा मायके वाले तो परेशान थे ही, उन के घर वाले भी परेशान थे, जो जेल भेजे गए थे.

सभी इस कोशिश में लगे थे कि कहीं से भी शीला का कोई सुराग मिल जाता. उन लोगों की कोशिश कोई रंग लाती, उस से पहले ही शीला के बारे में अपने आप पता चल गया. किसी ने फिरोजाबाद में रहने वाली शीला की बुआ महादेवी को फोन कर के बताया कि उन की भतीजी शीला का शव निबोहरा रोड से थोड़ा आगे सड़क से अंदर जा कर एक कंजी के पेड़ के नीचे पड़ा है. इस खबर से महादेवी चौंकी. उस ने फोन अपने बेटे शीलू को पकड़ा दिया. शीलू ने उस से जानना चाहा कि वह कौन है और कहां से बोल रहा है तो उस ने फोन काट दिया. शीलू ने तुरंत यह बात श्रीनिवास को बताई और वह फोन नंबर भी लिखा दिया, जिस नंबर से फोन कर के यह बताया गया था.

श्रीनिवास वह नंबर देख कर चौंका, क्योंकि वह नंबर उस की बहन शीला का ही था. देर किए बगैर श्रीनिवास कुछ दोस्तों को साथ ले कर बहन की लाश की तलाश में बताए गए स्थान की ओर चल पड़ा. निबोहरा रोड 10 किलोमीटर के आसपास थी. इतनी बड़ी सड़क पर सड़क से थोड़ा अंदर जा कर कंजी का पेड़ तलाशना आसान नहीं था. श्रीनिवास दोस्तों के साथ शीला के शव की तलाश में घंटों लगा रहा.

काफी कोशिश के बाद भी उन्हें लाश नहीं मिली. अंत में निराश हो कर सब लौट पड़े. वे शमसाबाद चौराहे पर पहुंचे थे कि श्रीनिवास के मोबाइल पर फोन आया. उस ने नंबर देखा तो वह शीला का था. उस ने फोन रिसीव करने के साथ ही रिकौर्डिंग चालू कर दी, जिस से वह फोन करने वाले की बात रिकौर्ड कर सके. फोन रिसीव होते ही दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘भाई साहब, आप लोग शीला की लाश जहां ढूंढ़ रहे थे, वह जगह तो काफी आगे है. शीला की लाश शमसाबाद चौराहे से निबोहरा रोड पर 2 किलोमीटर के अंदर ही पड़ी है.’’

‘‘भाई, तुम बोल कौन रहे हो? यह शीला का मोबाइल तुम्हें कहां से मिला? तुम्हें कैसे पता कि शीला की हत्या हो चुकी है और उस की लाश निबोहरा रोड पर थोड़ा अंदर जा कर कंजी के पेड़ के नीचे पड़ी है?’’ श्रीनिवास ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए.

श्रीनिवास के सवालों का जवाब देने के बजाय दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. निराश और थकेमांदे श्रीनिवास के अंदर इस दूसरे फोन ने जान डाल दी. एक बार फिर वह फोन पर बताई गई जगह पर जा कर लाश की तलाश करने लगा. आखिर उस की मेहनत रंग लाई और वह बदनसीब घड़ी आ गई, जिस का कोई भी भाई इंतजार नहीं करना चाहता.

लाश इस तरह सड़ चुकी थी कि पहचान में नहीं आ रही थी. श्रीनिवास ने अपनी मां और थाना शमसाबाद पुलिस को शीला की लाश मिलने की सूचना दे दी. तब थाना शमसाबाद पुलिस ने थाना फतेहाबाद पुलिस को सूचना देने को कहा, क्योंकि जहां शीला की लाश पड़ी थी, वह जगह थाना फतेहाबाद के अंतर्गत आती थी. तब श्रीनिवास ने 100 नंबर पर फोन कर के सारी बात बताई. इस के बाद जिला नियंत्रण कक्ष ने थाना फतेहाबाद के थानाप्रभारी मुनीष कुमार को सूचना दे कर तत्काल काररवाई का निर्देश दिया.

बेटी की लाश मिलने की सूचना पा कर रामदेवी भी घटनास्थल पर जा पहुंची. शक्लसूरत से वह भी लाश को नहीं पहचान सकी. तब उस ने बेटी की लाश कान के कुंडल, गले के मंगलसूत्र और साड़ी से पहचानी. अब तक थाना फतेहाबाद के प्रभारी मुनीष कुमार भी सहयोगियों के साथ वहां पहुंच गए थे.

लाश देख कर ही वह जान गए कि 3-4 दिनों पहले हत्या कर के इसे यहां ला कर फेंका गया है. क्योंकि वहां संघर्ष का कोई निशान नहीं था. जिस से साफ लगता था कि हत्या यहां नहीं की गई है. इस के अलावा लाश के पास तक मोटरसाइकिल के टायरों के आने और जाने के निशान भी थे.

लाश से इतनी तेज दुर्गंध आ रही थी कि वहां खड़ा होना मुश्किल हो रहा था. इसलिए पुलिस ने आननफानन में जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद थाना शमसाबाद पुलिस ने अपने यहां दर्ज शीला के अपहरण और हत्या का मुकदमा थाना फतेहाबाद पुलिस को स्थानांतरित कर दिया, जहां यह अपराध संख्या 183/2013 पर भादंवि की धाराओं 302, 201 के अंतर्गत दर्ज हुआ. मुकदमा दर्ज होते ही थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने जांच शुरू कर दी. यह 3 अगस्त, 2013 की बात है.

मुनीष कुमार ने सब से पहले श्रीनिवास से पूछताछ की. उस ने शुरू से ले कर लाश बरामद होने तक की पूरी कहानी उन्हें सुना दी. उस की इस कहानी में मृतका शीला के मोबाइल फोन से उस की हत्या और लाश पड़ी होने की बताने वाली बात चौंकाने वाली थी, क्योंकि अकसर हत्या करने वाले मृतक का मोबाइल सिम निकाल कर फेंक देते हैं. जिस से वे पकड़े न जाएं. लेकिन यहां मामला अलग था. साफ था कि मृतका का मोबाइल जिस किसी के भी पास था, वह उस के हत्यारे को जानता होगा या खुद ही हत्यारा होगा.

यही सोच कर मुनीष कुमार ने उस नंबर को सर्विलांस टीम को सौंप दिया, क्योंकि इस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन हत्यारे तक पहुंचा सकती थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शीला की हत्या 31 जुलाई, 2013 की शाम को गला दबा कर की गई थी. लेकिन गला दबाने से पहले उसे कोई जहरीली चीज भी खिलाई गई थी. इस का मतलब शीला की हत्या उसी दिन हो गई थी, जिस दिन वह गायब हुई थी.

सर्विलांस से मिली जानकारी के अनुसार, शीला का फोन 31 जुलाई की शाम को बंद हो गया था. 2 दिनों बाद फोन चालू हुआ तो उस की लोकेशन गांव अमर सिंह का पुरा की थी. फोन की लोकेशन तो बदलती रही थी, लेकिन ज्यादातर उस की लोकेशन अमर सिंह का पुरा की ही बता रही थी. इस का मतलब फोन उसी गांव के किसी आदमी के पास था. थानाप्रभारी ने अमर सिंह का पुरा में अपने मुखबिरों को तैनात कर दिया.

इस के बाद उन्होंने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो पता चला कि शीला के फोन पर 30 जुलाई से 31 जुलाई की दोपहर तक एक नंबर से लगातार बात हुई थी. मुनीष कुमार ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर शीला के ही परिवार के एक लड़के भूपेंद्र कुमार का था. रिश्ते में वह उस का भतीजा लगता था. भूपेंद्र शीला के जेठ लगने वाले रामलाल का बेटा था. थानाप्रभारी मुनीष कुमार सोचने लगे कि आखिर भूपेंद्र ने शीला को फोन क्यों किए थे? उन्होंने जब इस सवाल पर गहराई से सोचा तो भूपेंद्र पर उन्हें शक हो गया.

भूपेंद्र पर शक होते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ शाहपुर के लिए निकल पड़े. थाना फतेहाबाद पुलिस टीम शाहपुर गांव पहुंची तो गांव वाले परेशान हो उठे, क्योंकि शीला की हत्या के मामले में पहले से ही 4 लोग जेल जा चुके थे. पुलिस किसे पकड़ने आई है, गांव में इसी बात की चर्चा होने लगी.

पुलिस गांव वालों से पूछ कर रामलाल के घर पहुंची. भूपेंद्र घर पर ही था. पुलिस ने उसे जीप में बैठा लिया. गांव वालों ने इस बात का काफी विरोध किया, लेकिन पुलिस के आगे किसी की भी एक नहीं चली और थानाप्रभारी उसे थाने ले आए. थाने ला कर उन्होंने उस से सीधे पूछा, ‘‘शीला की हत्या तुम ने क्यों की?’’

मुनीष कुमार ने भूपेंद्र से यह बात इस तरह पूछी जैसे उन्हें पता हो कि शीला की हत्या इसी ने की है. उन के इस सवाल से भूपेंद्र परेशान हो उठा कि इन्हें कैसे पता चला कि शीला की हत्या उसी ने की है. उस ने सुना था कि अपराध उगलवाने के लिए पुलिस आरोपियों को बहुत बुरी मार मारती है. पुलिस की मार से बचने के लिए उस ने तुरंत स्वीकार कर लिया कि अपने दोस्त फतेह सिंह के साथ मिल कर उसी ने शीला की हत्या की है.

अमर सिंह का पुरा के रहने वाले फतेह सिंह के पास ही शीला का मोबाइल फोन है. उसी ने फोन कर के पहले शीला की बुआ और उस के बाद श्रीनिवास को लाश के बारे में बताया था.

थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने अमर सिंह का पुरा जा कर भूपेंद्र की निशानदेही पर उस के दोस्त फतेह सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद भूपेंद्र और फतेह सिंह से की गई पूछताछ में शीला की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

थाना डौकी गांव कटोरा के रहने वाले रामसनेही के परिवार में पत्नी रामदेवी के अलावा 7 संतानों का भरापूरा परिवार था. संतानों में बेटी मुन्नी देवी सब से बड़ी थी तो कल्लो सब से छोटी. शीला रामसनेही की दूसरे नंबर की बेटी थी. बेटियों में वह सब से खूबसूरत थी. विवाहयोग्य होते ही रामसनेही ने उस के घरवर की तलाश शुरू कर दी थी. खूबसूरत होने की वजह से रामसनेही को उस के लिए ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी पड़ी. शाहपुर के रहने वाले छोटेलाल का बेटा जयपाल उन्हें शीला के लिए पसंद आ गया. जयपाल को शीला पहली ही नजर में भा गई थी. इस के बाद दोनों का विवाह हो गया. यह 10-11 साल पहले की बात है.

शीला ससुराल आ गई. ससुराल में एक जेठ और 3 देवरों का भरापूरा परिवार था. जयपाल दिल्ली में नौकरी करता था. महीने, 2 महीने में ही उस का गांव आना होता था. समय के साथ शीला 3 बच्चों सतीश, मनोज और हरीश की मां बनी.

हरीश के पैदा होने के बाद जयपाल की तबीयत खराब रहने लगी. लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उसी पर थी, इसलिए दिल्ली में रह कर नौकरी करना उस की मजबूरी थी. उस की इस बीमारी का असर सब से ज्यादा शीला पर पड़ा. क्योंकि बीमारी की वजह से उस का शरीर इस लायक नहीं रहा कि घर जाने पर वह शीला को खुश कर पाता.

शीला को जब लगा कि पति अब उसे खुश नहीं कर सकता तो वह अपनी खुशी किसी और में तलाशने लगी. उस की यह तलाश जल्दी ही खत्म हो गई, क्योंकि इस के लिए उसे कहीं बाहर नहीं जाना पड़ा. परिवार के ही जेठ रामलाल का 20-22 साल का बेटा भूपेंद्र उसे भा गया. वह सेल्समैन था. उस का शहर भी आनाजाना लगा रहता था. गांव में वह सब से ज्यादा स्मार्ट था. शहर आनेजाने की वजह से वह रहता भी बनठन कर था.

शीला को भूपेंद्र भा गया तो वह उस पर डोरे डालने लगी. खूबसूरत शीला का गदराया बदन था. चाची का खुला आमंत्रण पा कर जवानी की दहलीज पर खड़ा कुंवारा भूपेंद्र उस के मोहपाश में बंधता चला गया. फिर तो वह दिन आते देर नहीं लगी, जब चाचीभतीजे ने सारी मर्यादाएं तोड़ कर 2 जिस्म एकजान कर दिए.

शीला गांव में बच्चों के साथ अकेली ही रहती थी, इसलिए भूपेंद्र से उसे मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. भूपेंद्र उस के घर से मात्र 20 मीटर की दूरी पर रहता था. बच्चों के सो जाने पर वह फोन कर के भूपेंद्र को अपने घर बुला लेती. दोनों का मिलन रात में ही होता था. यही वजह थी कि उन के इन संबंधों की जानकारी गांव या परिवार के किसी भी आदमी को नहीं हो पाई.

इसी तरह एकएक कर के 3 साल बीत गए. भूपेंद्र से संबंध बनने के बाद शीला को जयपाल की कोई फिकर नहीं रह गई थी. लेकिन जब घरवालों ने भूपेंद्र के लिए लड़कियां देखनी शुरू कीं तो एक बार शीला फिर परेशान हो उठी. फिर वह भी अपने लिए नया यार खोजने लगी, क्योंकि उसे पता था कि भूपेंद्र की शादी हो जाएगी तो वह उसे घास डालना बंद कर देगा. जबकि अब उसे दूसरों का ही सहारा था. जयपाल तो अब कईकई महीने बाद घर आता था.

इस बार शीला की नजर गांव के ही विजय सिंह पर जम गई. विजय सिंह भी कुंवारा था, इसलिए जल्दी ही वह शीला के प्रेमजाल में फंस गया. इस तरह शीला के अब 2 यार हो गए. विजय सिंह को अपने प्रेमजाल में फांस कर शीला निश्चिंत हो गई. भूपेंद्र उस के पास आना छोड़ देगा तो विजय सिंह तो रहेगा ही. वह विजय को भी भूपेंद्र की ही तरह सब के सो जाने पर रात को बुलाती थी.

गर्मियों में जयपाल घर आया तो जायदाद को ले कर भाइयों से विवाद हो गया. जयपाल अकेला था, जबकि भाई 4 थे. उन्होंने जयपाल की पिटाई कर दी. शीला पति को बचाने गई तो उन लोगों ने उसे भी जमीन पर गिरा कर मारापीटा. इस के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा तो जेठ और देवरों ने सब के सामने अपनी गलती के लिए लिखित रूप से माफी मांग ली. इस के बाद पूरा परिवार शीला से नफरत करने लगा. ठीक होने के बाद जयपाल दिल्ली चला गया तो शीला अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ी.

भूपेंद्र ने मांबाप से विवाह का काफी विरोध किया, लेकिन उम्र का वास्ता दे कर मांबाप ने उस की एक नहीं सुनी और 13 जुलाई, 2013 को उस का विवाह कर दिया. पत्नी के आने के बाद वह शीला की ओर से लापरवाह तो हुआ, लेकिन उस के पास जाना नहीं छोड़ा. ऐसे में ही किसी दिन उसे शीला और विजय सिंह के संबंधों का पता चला तो वह बौखला उठा.

उस ने यह बात शीला से कही तो शीला ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी ब्याहता तो हूं नहीं कि सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूं. मैं ने जिस के साथ 7 फेरे लिए, जब उस की नहीं हुई तो तुम्हारी क्यों होऊंगी. मेरे मन में जो आएगा, वह करूंगी. रौबदाब दिखाना है तो अपनी पत्नी को दिखाओ. उसे पल्लू में बांध कर रखो. तुम उस के पास सोते हो तो मैं ने तो नहीं मना किया. फिर तुम मुझे क्यों रोक रहे हो.’’

शीला की ये बातें भूपेंद्र को अच्छी नहीं लगीं. फिर भी वह कुछ नहीं बोला. लेकिन मन ही मन उस ने तय कर लिया कि शीला जिस शरीर और सुंदरता के बल पर कूद रही है, उसे वह ऐसा कर देगा कि छूने की कौन कहे, कोई उस की ओर देखेगा तक नहीं. इस के लिए उस ने तेजाब डालने की योजना बनाई. लेकिन इस में उसे लगा कि वह फंस जाएगा. क्योंकि तेजाब डालते समय शीला उसे पहचान लेगी. फंसने के डर से उस ने इस योजना पर पानी डाल दिया और कोई नई योजना बनाने लगा.

भूपेंद्र की पत्नी मायके गई हुई थी. इसलिए अकेला लेटा वह योजनाएं बनाता रहता था. ऐसे में ही उस ने सोचा कि क्यों न वह शीला नाम की इस बला को ही खत्म कर दे. इस में पकड़े जाने की संभावना कम रहेगी. इस योजना को अंजाम देने के लिए उस ने शीला से एक बार फिर मेलजोल बढ़ा लिया. अब वह उस से सिर्फ बातें करता था. रात में उस के पास आने के लिए कभी नहीं कहता था.

शीला भी अब फिर उस में दिलचस्पी लेने लगी. एक दिन बातचीत में शीला ने भूपेंद्र से कहा कि वह जल्दी ही विजय सिंह के साथ भाग जाएगी. बच्चों को भी वह साथ ले जाएगी. तब भूपेंद्र ने मन ही मन सोचा जब वह उसे भागने के लिए जिंदा छोडे़गा, तब न वह भागेगी. वह कमजोर था क्या, जो इस ने विजय सिंह का दामन थाम लिया.

शीला अपने बच्चों को ले कर भागे, उस के पहले ही वह उसे खत्म कर देना चाहता था. 30 जुलाई को उसे पता चला कि शीला दवा लेने डा. बंगाली के यहां जाएगी. तब भूपेंद्र ने उस से कहा, ‘‘तुम डा. बंगाली की दवा कब से खा रही हो. इस से तुम्हें कोई फायदा नहीं हो रहा है. ऐसा करो, तुम किसी बहाने से गांव के बाहर आ जाओ. मैं तुम्हें शहर ले जा कर अच्छे डाक्टर से दवा दिला देता हूं.’’

पिछले कई महीनों से शीला खुजली से परेशान थी. गांव के डा. बंगाली की दवा से उसे कोई फायदा नहीं हो रहा था. इसलिए वह भूपेंद्र के साथ किसी अच्छे डाक्टर के पास जाने को तैयार हो गई. फिर उसे पता भी तो नहीं था कि भूपेंद्र के मन में क्या है.

भूपेंद्र पर शीला को पूरा विश्वास था, इसलिए 31 जुलाई को बच्चों को स्कूल से ला कर वह भूपेंद्र के साथ डाक्टर के पास जाने के लिए तैयार हो गई. चलते समय उस ने बड़े बेटे सतीश को 20 रुपए दे कर कहा, ‘‘सतीश, तुम भाइयों को संभालना. मैं शमसाबाद के डा. बंगाली से दवा लेने जा रही हूं. वहां से लौटने में 2 घंटे तो लग ही जाएंगे. अगर तुम लोगों को भूख लगे तो बाजार से कुछ ला कर खा लेना.’’

इस के बाद शीला ने भूपेंद्र को फोन किया तो उस ने कहा, ‘‘तुम शमसाबाद चौराहे पर आ जाओ. मैं वहीं खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’

भूपेंद्र ने शीला को खत्म करने की तैयारी पहले से ही कर रखी थी. वह शीला को कोई तेज जहर दे कर मारना चाहता था. जब उसे कोई जहर नहीं मिला तो उस ने छिपकली मार कर सुखा कर उस का जहर तैयार कर लिया था. शमसाबाद चौराहे पर शीला उसे मिली तो उस ने वहां से रबड़ी खरीदी और उस में छिपकली का चूर्ण मिला कर पौलीथीन में पैक कर लिया.

भूपेंद्र शीला को मोटरसाइकिल पर बैठा कर निबोहरा रोड पर चल पड़ा. दोपहर की वजह से सड़क पर आवागमन काफी कम था.

अपनी योजना को अंजाम देने लायक जगह देख कर भूपेंद्र ने मोटरसाइकिल खराब होने के बहाने रोक दी. इस के बाद दोनों वहीं बने एक चबूतरे पर बैठ गए. भूपेंद्र ने कहा, ‘‘शीला मैं बाप बनने वाला हूं. इस खुशी में मैं तुम्हारा मुंह मीठा कराने के लिए रबड़ी खरीद कर लाया हूं.’’

‘‘मुबारक हो, इतनी बड़ी खुशखबरी है. तब तो मुंह मीठा करूंगी ही.’’ शीला ने कहा.

इस के बाद भूपेंद्र ने मोटरसाइकिल की डिक्की से रबड़ी और बोतल का पानी निकाल शीला को थमा दिया. शीला ने उस से भी रबड़ी खाने को कहा, लेकिन उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘यह पूरी रबड़ी मैं तुम्हारे लिए लाया हूं. मैं ने तो दुकान पर ही खा ली थी.’’

शीला ने आराम से पूरी रबड़ी खाई और बोतल का पानी पी कर प्रेमिल

नजरों से भूपेंद्र की ओर देखा. तब भूपेंद्र ने कहा, ‘‘शीला, मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘कहो क्या कहना है?’’ शीला ने पूछा.

‘‘मैं चाहता हूं कि अब हमारा मिलना ठीक नहीं है. मेरी शादी हो गई है, इसलिए मैं अपना परिवार देखूं. तुम्हारा अपना परिवार है, इसलिए तुम अपना परिवार देखो.’’

‘‘यही तो मैं भी कह रही थी. भई तुम्हारी नईनई पत्नी है. उस के साथ मौज करो. कहां मेरे पीछे पड़े हो.’’ शीला ने भूपेंद्र को समझाया.

इसी तरह की बातें करतेकरते आधा घंटा बीत गया. अब तक जहर शीला पर अपना असर दिखाने लगा था. जहर का असर होते देख भूपेंद्र ने अपने दोस्त फतेह सिंह को फोन कर के वहां आने को कहा. करीब आधे घंटे में फतेह सिंह वहां पहुंचा तो भूपेंद्र उसे फतेह सिंह की मोटरसाइकिल पर बिठा कर उस के पीछे खुद बैठ गया.

इस तरह बेहोश शीला को बीच में बैठा कर सड़क से कुछ अंदर जा कर शीला को जमीन पर पटक दिया. वहीं पर उस की गला दबा कर हत्या कर दी गई. इस के बाद लाश को कंजी के पेड़ के नीचे इस तरह रख दिया कि वह आसानी से दिखाई न दे.

इस के बाद भूपेंद्र ने फतेह सिंह को इस मदद के लिए एक हजार रुपए नकद और शीला का मोबाइल फोन दे कर विदा कर दिया. फतेह सिंह अपने घर चला गया तो भूपेंद्र भी अपनी मोटरसाइकिल से अपने घर चला गया.

शीला के घर वाले क्या कर रहे हैं, भूपेंद्र को सब पता चलता ही रहता था. लेकिन शीला की लाश का क्या हुआ, यह देखने के लिए वह अगले दिन घटनास्थल पर गया. तेज गरमी की वजह से अगले दिन ही शीला की लाश सड़ने लगी थी. प्रेमिका की लाश को सड़ते देख भूपेंद्र बेचैन हो उठा. जिस शरीर से उसे इतना सुख मिला था, उसे वह सड़तागलता नहीं देखना चाहता था.

फिर भी उस दिन वह चुप रहा. लेकिन जब उस के परिवार के 4 निर्दोष लोग जेल चले गए तो उस से रहा नहीं गया और उस ने फतेह सिंह से फोन कर के लाश की जानकारी पहले शीला की बुआ और उस के बाद उस के भाई श्रीनिवास को दे दी. शायद उसे पता नहीं था कि इस तरह फोन करने से वह पकड़ा जाएगा. अगर उसे पता होता तो वह यह गलती कतई न करता.

पूछताछ के बाद पुलिस ने भूपेंद्र एवं फतेह सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पुलिस ने फतेह सिंह के पास से शीला का वह मोबाइल भी बरामद कर लिया था, जिस से निबोहरा रोड पर लाश पड़ी होने की सूचना दी गई थी. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त जेल में थे. UP Crime

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

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