Uttar Pradesh Crime. शक का पौधा हमेशा जहर भरे फल देता है. यह फल खाना तो दूर की बात रही, अगर कोई इस पौधे की छाया में भी आता है तो उस शख्स की जीवन की गाड़ी डगमगा जाती है. इलियास के दिमाग में भी शक का ऐसा बीज उपजा कि उस ने न केवल बीवी नसीमा और 3 बच्चों का कत्ल किया, बल्कि अपनी जिंदगी भी बरबाद कर ली.  

सुबह के करीब 7 बजे का वक्त था. परेशान सा इलियास घर के बरामदे में टहल रहा था. कभी वह दरवाजे पर जा कर बाहर झांकता, तो कभी गली में चक्कर लगा कर घर में लौट जाता. पड़ोस में रहने वाले लियाकत ने इलियास को परेशान देख कर पूछ लिया, ‘‘खैरियत तो हैं इलियास मियां, कुछ परेशान दिख रहे हो?’’

इलियास ने पहले उसे गहरी नजरों से देखा, फिर जवाब दिया, ‘‘हां, परेशानी की ही बात है.’’

‘‘क्या हुआ मियां, जरा हमें भी तो बताओ?’’   ‘‘तुम्हारी भाभी का कुछ अतापता नहीं है.’’

‘‘मतलब?’’   ‘‘कल वह दवा लेने दिल्ली गई थी, लेकिन अभी तक आई नहीं है. परेशानी यह है कि उस के साथ तीनों बच्चे भी हैं.’’

‘‘मोबाइल तो होगा उन के पास?’’ लियाकत ने जिज्ञासावश पूछा तो इलियास चिंता जाहिर करते हुए बोला, ‘‘हां है, लेकिन नंबर मिलामिला कर थक गया हूं. बराबर बंद आ रहा है. खुदा खैर करे, किसी परेशानी में न फंस गई हो वह.’’

‘‘ऐसा क्यों सोचते हो इलियास भाई, आ जाएंगी.’’ लेकिन लियाकत के समझाने पर भी इलियास की परेशानी रत्ती भर कम नहीं हुई. इलियास की जगह कोई और भी होता तो ऐसे हालातों में वह भी इसी तरह परेशान होता.

इलियास उत्तरप्रदेश के जाट बाहुल्य बागपत जिले के कोतवाली क्षेत्र में आने वाले गांव चौहल्दा का रहने वाला था. वह दिल्ली के दिलशाद गार्डन इलाके की रेडीमेड गारमेंट्स फैक्ट्री में इस्तरी करने का काम करता था. उस के परिवार में पत्नी नसीमा, 7 साल का बेटा नाजिम, 5 साल की बेटी नाजिया और 4 साल के बेटे अकरम को मिला कर 5 सदस्य थे. नसीमा 7 महीने की गर्भवती थी.

इलियास दिल्ली में अकेला रहता था. बीचबीच में वह गांव आता रहता था. जबकि नसीमा बच्चों के साथ गांव में ही रहती थी. दुबलपतला इलियास किसी तरह मेहनत कर के अपने परिवार को पाल रहा था.

7 फरवरी, 2014 को नसीमा बच्चों के साथ दिल्ली गई थी, लेकिन अगले दिन तक भी वापस नहीं आई थी. इलियास इसी बात को ले कर किसी अनहोनी की आशंका से परेशान था.

इलियास व लियाकत इस मसले पर बात कर ही रहे थे कि तभी एक शख्स तेजी से साइकिल चलाते हुए उन के पास आया. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. उस ने हांफते हुए बताया, ‘‘इलियास भाई गजब हो गया.’’

इलियास ने फटीफटी आंखों से उस की तरफ देख कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘किसी ने नसीमा भाभी का कत्ल कर दिया है.’’   ‘‘या अल्लाह,’’ इलियास अपने कानों पर हाथ रख कर चिल्लाया.

‘‘भाभी की लाश गांव के रास्ते पर पड़ी है.’’ उस ने बताया तो इलियास के होश उड़ गए. वह रोनेबिलखने लगा तो जरा सी देर में लोग एकत्र हो गए. सभी दौड़ेदौड़े गांव के बाहर पहुंचे.

नसीमा की लाश अहेड़ा रेलवे स्टेशन से चौहल्दा गांव तक आने वाले रास्ते पर सड़क के किनारे खेत में पड़ी थी. वहां पहले से ही लोग जमा हो चुके थे. किसी ने बड़ी बेरहमी से नसीमा की गरदन और चेहरे पर वार किए थे. लाश के पास ही उस का मोबाइल पड़ा था. लाश को सुबह काम पर जा रहे ग्रामीणों ने देखा था. लाश देख कर उन्होंने नसीमा को पहचान लिया था. उन्हीं में से एक व्यक्ति ने गांव जा कर इलियास को इस बात की जानकारी दी थी.

नसीमा के बच्चों का कहीं पता नहीं था. ग्रामीणों ने आसपास तलाश शुरू की तो गेहूं के खेत में जो दृश्य देखने को मिला, उसे देख कर सभी के रोंगटे खड़े हो गए. तीनों बच्चों की भी लाशें वहां पड़ी थीं. उन की हत्या बेरहमी के साथ धारदार हथियार से गला काट कर की गई थी.

इस चौहरे हत्याकांड से गांव में कोहराम मच गया. दिल दहला देने वाले इस दृश्य को देख कर लोगों की आंखें नम हो गईं. सभी के मन में एक ही सवाल था कि आखिर इन मासूमों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? इलियास का रोरो कर बुरा हाल था. लोग गमजदा इलियास को संभालने की कोशिश कर रहे थे.

लोगों ने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी. सनसनीखेज हत्याकांड की खबर मिलते ही थानाप्रभारी अनिल कपरवाल, सीओ एन.पी. सिंह और पुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार शाही घटनास्थल पर आ गए. ग्रामीणों में भारी आक्रोश था.

निस्संदेह मामला गंभीर था. पुलिस ने शवों का निरीक्षण किया. सभी की गरदनों पर वार किए गए थे. घटनास्थल पर बिखरे खून से साफ पता चल रहा था कि हत्याएं उसी स्थान पर की गई थीं. हत्यारों ने नसीमा के मोबाइल के अलावा कोई सुबूत शवों के इर्दगिर्द नहीं छोड़ा था.

गमगीन माहौल में ही पुलिस ने पूछताछ की तो पता चला कि नसीमा की तबीयत खराब थी. वह दिल्ली के शाहदरा स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल दवा लेने गई थी. शाम को संभवत: जब वह टे्रन से उतर कर गांव की तरफ जा रही थी, तभी उस की हत्या कर दी गई थी.

मामला चौहरे हत्याकांड का था, लिहाजा एसपी जे.के. शाही ने इस की सूचना मेरठ रेंज के आईजी आलोक शर्मा व डीआईजी के. सत्यनारायण को भी दे दी. पुलिस ने मौकामुआयना कर के शवों का पंचनामा किया और उन्हें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. माहौल इस कदर गमगीन व गरमाया हुआ था कि इलियास से ज्यादा पूछताछ नहीं की जा सकती थी.

बड़ी घटना के मद्देनजर आईजी व डीआईजी बागपत आ गए. हत्याकांड की प्राथमिक जानकारी ले कर उन्होंने अधिकारियों को इस मामले का जल्द से जल्द खुलासा किए जाने के निर्देश दिए. इसी बीच सैकड़ों की तादाद में ग्रामीण पोस्टमार्टम हाउस पर जमा हो गए.

उन्होंने रोष प्रकट कर के पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी. इतना ही नहीं शवों को उठा कर उन्हें दिल्लीयमनोत्री हाईवे पर रख कर जाम लगा दिया. पुलिस ने विरोध किया तो लोग हाथापई पर उतारू हो गए. इलियास पुलिसकर्मियों से उलझ गया. अधिकारियों ने इसे उस की बदहवासी समझा.

पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाया और जल्दी ही हत्यारों को पकड़ने का आश्वासन दिया. जब ग्रामीण नहीं माने तो पुलिस ने बल प्रयोग किया और जबरन शव अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम कराया. पोस्टमार्टम के बाद शवों को ग्रामीणों के हवाले कर दिया गया. इस बीच इलियास की तरफ से थाने में अज्ञात हत्यारों के विरुद्ध भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

सामूहिक हत्या के इस जघन्य मामले को खोलने के लिए पुलिस पर दबाव बना हुआ था. पुलिस अपनी जांच में लगी थी. इसी जांच में चौंकाने वाली बात यह पता चली कि मृतका इलियास की दूसरी बीवी थी. उस की पहली बीवी वरीसा बागपत के ही निनाना गांव की रहने वाली थी. उस के आबिद, आबिदा, शाहिदा, शाहिद और राशिद 5 बच्चे थे. 12 साल पहले बीमारी के चलते वरीसा का इंतकाल हो गया था.

इलियास के रिश्तेदारों ने बच्चों के छोटे होने का वास्ता दे कर उसे दूसरे निकाह का मशविरा दिया. यह लोगों के मशविरे का असर था या इलियास की ख्वाहिश कि उस ने 3 साल बाद नसीमा से निकाह कर लिया.

नसीमा मूलत: बिहार के बेगूसराय जिले की रहने वाली थी. गुजरते वक्त के साथ नसीमा भी 3 बच्चों नाजिम, नाजिया व अकरम की मां बन गई.

इस बीच इलियास की पहली बीवी का बड़ा बेटा आबिद 18 साल का हो चुका था. वह दिल्ली में अपने एक रिश्तेदार के यहां रह कर मेहनतमजदूरी करता था. जबकि बेटियां और अन्य 2 बेटे इलियास के पास ही रहते थे.

जब कहीं से कोई लीड नहीं मिली तो इस मामले की जांच की जिम्मेदारी सीओ एन.पी. सिंह के सुपुर्द कर दी गई. घटना की बारीकियों और हत्यारों तक पहुंचने के लिए ठोस तथ्यों की जरूरत थी. इस के लिए एन.पी. सिंह ने इलियास से पूछताछ की.

पूछताछ के दौरान इलियास ने पुलिस को बताया कि नसीमा के सिर व पेट में दर्द रहता था. उस का दिल्ली के सरकारी अस्पताल से इलाज चल रहा था. 7 फरवरी को उस का अल्ट्रासाउंड होना था. उस ने फोन पर यह बात इलियास को बता कर अस्पताल जाने के लिए कहा था. इलियास ने उसे जाने को कह दिया और उस शाम खुद गांव आ गया.

उसे हैरानी तब हुई, जब नसीमा देर रात तक घर नहीं आई. इलियास के अनुसार उस ने नसीमा से संपर्क करने की बहुत कोशिशें की. लेकिन नसीमा का मोबाइल बंद था. अगली सुबह जब उसे नसीमा की हत्या की खबर मिली तो वह हतप्रभ रह गया.

‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ एन.पी. सिंह ने पूछा तो वह बोला, ‘‘नहीं साहब, मैं तो सीधासादा आदमी हूं. मेरा तो कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ. कमाना और खाना, बस इसी में जिंदगी बीत रही है. पता नहीं मेरे परिवार को किस मनहूस की नजर लग गई.’’

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि जब इलियास और नसीमा की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी तो फिर नसीमा को कोई क्यों मारेगा? साथ ही यह भी कि उस के बच्चों ने किसी का क्या बिगाड़ा था? यह बात साफ थी कि हत्यारे नसीमा या उस के बच्चों को जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

ऐसे में नसीमा का मोबाइल इस मामले के खुलासे में महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता था. इस बीच मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिल गई थी. नसीमा की गरदन व माथे पर तो 3 घाव थे, जबकि बच्चों के भी गले काटे गए थे. सभी की मृत्यु की एकमात्र वजह सांस की नली का कटना और अधिक रक्तस्राव होना थी.

अगले दिन पुलिस ने गांव के कुछ लोगों से भी पूछताछ की. पुलिस को इलियास की पहली बीवी के बेटे आबिद पर भी शक हुआ. दरअसल कई बार युवा लड़के प्रौपर्टी और मनमुटाव के चलते सौतेली मां के हत्यारे बन जाते हैं. लेकिन जांचपड़ताल में पता चला कि नसीमा का आबिद से कोई मनमुटाव नहीं था. कभी किसी ने उन्हें लड़तेझगड़ते भी नहीं देखा था.

नसीमा व उस के बच्चों की हत्याएं साफ इशारा कर रही थीं कि यह वारदात लूटपाट के लिए नहीं, बल्कि किसी अपने ने की थी. नसीमा की मौत से चूंकि आबिद को ही कोई फायदा हो सकता था, इसलिए शक की सूई उसी पर ठहर गई. सौतेली मां की मौत की खबर पा कर वह भी गांव आ गया था.

सीओ एन.पी. सिंह और इंसपेक्टर अनिल कपरवाल ने आबिद से घुमाफिरा कर पूछताछ की. उस ने बताया कि घटना वाली रात वह दिल्ली में था. पुलिस ने उस के बयानों की न सिर्फ तसदीक कराई, बल्कि उस के मोबाइल की लोकेशन की भी पड़ताल कराई.

शाम तक इस बात की पुष्टि हो गई कि आबिद सच बोल रहा है. वह इस तरह का युवक नहीं था कि हत्या या कोई षड्यंत्र कर सके. पुलिस ने उस के छोटे भाई शाहिद से भी पूछताछ की. लेकिन पुलिस को कोई दिशा नहीं मिल सकी.

पुलिस असमंजस में थी. जो शक के दायरे में आया था वह कातिल नहीं निकला और जो कातिल थे उन का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. यह निश्चित था कि नसीमा की हत्या रात के वक्त की गई थी.

अनुमान था कि वह 1 बजे पैसेंजर ट्रेन से अहेड़ा स्टेशन पर उतर कर गांव की तरफ चली होगी. ऐसा भी कोई शख्स नहीं मिला जो बता सके कि उस ने नसीमा या उस के बच्चों को स्टेशन पर उतरते देखा था. घटना को 2 दिन बीत चुके थे, लेकिन पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी.

कोई और रास्ता न देख पुलिस ने नसीमा की काल डिटेल्स और फोन की लोकेशन निकलवाई. नसीमा की घटना वाले दिन इलियास से बात हुई थी. उस की लोकेशन शाहदरा के गुरु तेगबहादुर अस्पताल के अलावा, लोनी व अहेड़ा रेलवे स्टेशन पर पाई गई थी.

इस का मतलब उस का मोबाइल हत्या के बाद बंद किया गया था. लेकिन इस से किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल था. इस बीच पुलिस को पता चला कि 2 महीने पहले नसीमा ने इलियास के खिलाफ टटीरी पुलिस चौकी पर मारपीट करने की शिकायत दर्ज कराई थी. हालांकि इस विवाद को पुलिस ने सुलझा दिया था.

इलियास के कमजोर शरीर को देख कर ऐसा नहीं लगता था कि वह इतना बड़ा कांड कर सकता है. लेकिन जब इस मामले पर दूसरे नजरिए से सोचा गया तो यह बात निकल कर सामने आई कि अपराध की पृष्ठभूमि में शरीर से नहीं दिमाग से काम लिया जाता है.

जो लोग ज्यादा शातिर होते हैं वे जाहिर तक नहीं होने देते कि उन के मन में क्या चल रहा है. पुलिस को लगा कि हो न हो इलियास के मामले में भी ऐसा ही हो. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले कर उस के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई.

पता चला दोपहर से ले कर रात तक उस के और नसीमा के मोबाइल की लोकेशन एक ही थी. इस का मतलब वे दोनों साथसाथ थे. जबकि उस ने पुलिस को बताया था कि वह शाम को घर आ गया था. जाहिर है वह झूठ बोल रहा था. लेकिन पुलिस इस संवेदनशील मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी, क्योंकि इलियास कोई ड्रामा भी खड़ा कर सकता था.

अपने पक्ष को और पुख्ता बनाने के लिए पुलिस ने उस की आउटगोइंग काल्स की जांच की. घटना वाले दिन उस की नसीमा के अलावा 3 और नंबरों पर बातें हुई थीं. पुलिस ने उन नंबरों का पता किया तो वे तीनों नंबर साजिद, परवेज व सलीम के नाम थे.

पुलिस को पता चला कि साजिद इलियास का ममेरा भाई, परवेज दोस्त व सलीम भांजा था. इस के बाद शक की सुई पूरी तरह इलियास पर ठहर गई. चौंकाने वाली बात यह थी कि उन तीनों के मोबाइल की लोकेशन भी घटना वाली रात अहेड़ा स्टेशन के आसपास थी.

पुलिस ने सब से पहले उन्हीं तीनों पर शिकंजा कसने का फैसला किया. 12 फरवरी की शाम पुलिस ने एक सूचना के आधार पर परवेज व साजिद को गौरीपुर मोड़ से गिरफ्तार कर लिया. दोनों को थाने ला कर पूछताछ की गई तो जल्दी ही दोनों ने ऐसी बात बताई, जिसे सुन कर पुलिसकर्मी हैरान रह गए.

पता चला कि इस हत्याकांड का षड्यंत्र इलियास ने ही रचा था. उसी ने इन लोगों के साथ मिल कर वारदात को अंजाम दिया था. यह पता चलते ही पुलिस ने बिना समय गंवाए इलियास को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में पहले तो उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन जब साजिद व परवेज को उस के सामने खड़ा किया गया तो वह टूट गया. उस से विस्तृत पूछताछ में चौंकाने वाली कहानी निकल कर सामने आई. बात कोई खास नहीं थी, बस इलियास के शक्की स्वभाव ने उसे कातिल बना दिया था.

इलियास शक्की स्वभाव का था. नसीमा से विवाह के बाद उस की जिंदगी आराम से बीत रही थी. नसीमा हंसमुख स्वभाव की थी. किसी से भी हंसबोल लेना उस का स्वभाव था. इलियास चूंकि दिल्ली में काम करता था, इसलिए कभी दिलशाद गार्डन में रुक जाता था तो कभी गांव आ जाता था.

करीब एक साल पहले उस ने नसीमा को मोबाइल ले कर दे दिया, ताकि वक्त जरूरत पर वह उसे फोन कर सके. इस से यह सुविधा हो गई थी कि इलियास घर फोन कर के न सिर्फ खैरखबर ले लिया करता था, बल्कि नसीमा अपने मायके भी बात कर लेती थी.

इसी के चलते कई बार ऐसा हुआ कि जब इलियास ने घर वाला नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. पूछने पर नसीमा ने बताया भी कि वह बिहार बात कर रही थी. इस के बावजूद इलियास ने उसे कई बार डांटा. वह शक्की तो था ही, उसे लगता था कि नसीमा किसी पुरुष से बात करती है.

एक दिन जब वह अचानक घर आ गया तो नसीमा किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी. इलियास को आया देख कर उस ने फोन काट दिया.

इस बात पर दोनों के बीच तीखी तकरार हो गई. एक बार तकरार का यह सिलसिला शुरू हुआ तो फिर यह आए दिन की बात हो गई. कुछ दिनों बाद नसीमा की तबीयत खराब रहने लगी. इलाज के लिए वह दिल्ली के गुरु तेग बहादुर सरकारी अस्पताल जाने लगी.

यह बात भी इलियास को परेशान करने लगी. उस के मन में यह बात घर कर गई कि नसीमा बहाने से किसी से मिलने जाती है. एक दिन जब इलियास दिल्ली में था तो नसीमा ने उसे फोन कर के बताया कि उस के पेट में तकलीफ है और उसे इलाज के लिए गुरु तेगबहादुर अस्पताल शाहदरा जाना है.’’

‘‘मुझे पहले ही पता था कि तुम वहीं जाने की बात करोगी. यार तो वहीं मिलते होंगे. तुम बागपत में भी तो दिखा सकती हो.’’ इलियास ने छूटते ही कहा.

‘‘खुदा के वास्ते सोचसमझ कर मुंह खोला करो इलियास. वहां अच्छी डाक्टर हैं, इसलिए जाती हूं.’’ नसीमा ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कुछ समझने को तैयार ही नहीं था. उस ने दो टूक अपना फैसला सुना दिया, ‘‘तुम्हें दवा लेने के लिए वहां जाने की जरूरत नहीं है.’’

इस बात को ले कर दोनों के बीच खूब बहस हुई. नसीमा पति की आदत से बहुत परेशान थी. उस ने उस की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी. इलियास के मना करने के बावजूद वह शाहदरा गई. यह बात इलियास को पता चली तो अगले ही दिन वह गांव आ गया और उस ने नसीमा के साथ जमकर मारपीट की.

इलियास की मारपीट से क्षुब्ध हो कर नसीमा ने अगले दिन पुलिस चौकी टटीरी में शिकायत दर्ज करा दी. पुलिस ने इलियास को बुला कर डांटाफटकारा. उस ने अपनी गलती मान ली तो पुलिस ने दोनों का समझौता करा दिया.

जरूरत से ज्यादा बंदिशें बगावत को जन्म देती हैं. नसीमा के साथ भी यही हुआ. इस के बाद उस ने इलियास से पूछना ही बंद कर दिया. उस का जब मन करता, शाहदरा चली जाती. इस का भेद तब खुला, जब एक दिन इलियास दिन के वक्त घर आ गया. बच्चे घर पर थे.

बच्चों से जब यह पता चला कि नसीमा शाहदरा गई है तो इलियास का पारा सांतवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने नसीमा का मोबाइल मिलाया. उस का गुस्सा तब और भी ज्यादा भड़क उठा, जब उस का मोबाइल बंद मिला.

शाम को नसीमा घर आई. उस के पास दवाइयां भी थीं. लेकिन इलियास कुछ सुनने को तैयार नहीं था. उस ने फिर उस के साथ मारपीट की. मोबाइल की बाबत पूछने पर नसीमा ने बताया कि उस की बैटरी खत्म हो गई थी, जिस की वजह से वह बंद हो गया था. वह सच बोल रही थी, पर इलियास को यकीन नहीं हुआ. वह कुछ भी सुनना या समझना नहीं चाहता था.

उस दिन के बाद इलियास बीवी पर शक को ले कर परेशान रहने लगा. शक उस के दिलोदिमाग पर इस कदर हावी हो चुका था कि उस की रातों की नींद उड़ गई. सोतेजागते, उठतेबैठते उस के दिमाग में एक ही बात चलती रहती थी कि नसीमा के किसी के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं.

वह जबजब दिल्ली जाती थी, इलियास का दिमाग घूम जाता था. उसे यही लगता था कि वह किसी से मिलने जाती है. हालांकि इन बातों का उस के पास कोई सुबूत नहीं था, लेकिन यह सच है कि शक करने वाला सुबूत पर नहीं सिर्फ अपने शक पर यकीन करता है. इलियास के साथ भी ऐसा ही था.

आखिर अपने शक की वजह से उस ने मन ही मन नसीमा को रास्ते से हटाने का एक खतरनाक निर्णय ले लिया. एक दिन उस ने ममेरे भाई साजिद, दोस्त परवेज व भांजे सलीम को अपने पास बुलवाया. ये सभी बागपत में ही रहते थे. इलियास ने अपनी परेशानी और शक के बारे में उन्हें बता कर कहा कि वह नसीमा को रास्ते से हटाना चाहता है. पहले तो ये लोग डरे, लेकिन इलियास के समझाने पर मान गए.

उस दिन चारों ने नसीमा की हत्या की योजना बना ली. योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इलियास ने सब से पहले नसीमा से नाराजगी दूर कर के उस के साथ मधुर रिश्ते बनाने शुरू कर दिए. जब वह इस में कामयाब हो गया तो उचित मौके की तलाश में रहने लगा.

जल्द ही उसे यह मौका मिला गया. 6 फरवरी, 2014 को नसीमा ने इलियास को फोन कर के बताया कि उसे अल्ट्रासाउंड के लिए शाहदरा जाना है.

‘‘ठीक है कल आ जाना, मैं साथ चलूंगा.’’ इलियास ने खुश हो कर कहा. उस के लिए यह अच्छा मौका था. उस ने इस बाबत अपने साथियों को भी फोन कर के बता दिया. इस बीच इलियास ने एक चाकू का इंतजाम कर के अपने पास रख लिया.

हालांकि उसी शाम इलियास खुद भी घर आ गया था, लेकिन 7 फरवरी की सुबह 7 बजे वह नसीमा से यह कह कर निकल गया कि दिल्ली आ कर वह उसे फोन कर ले. अगले दिन दोपहर के वक्त नसीमा बच्चों को ले कर इलियास के पास पहुंच गई. इलियास बच्चों को उस के साथ देख कर चौंका. उस ने नसीमा से पूछा, ‘‘इन्हें साथ लाने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘मैं ने सोचा इन्हें कपड़े दिला देंगे. इसलिए साथ ले आई.’’

इलियास को लगा था कि वह अकेली ही आएगी. उस ने उस का भविष्य भी तय कर दिया था. साजिद, परवेज व सलीम को वह कह चुका था कि वे लोग तैयार रहें, जब वह फोन करे तो आ जाएं.

इलियास ने पहले नसीमा को अस्पताल में दिखाया. फिर शाम को बच्चों को बाजार घुमाया, लेकिन यह कह कर कपड़े नहीं दिलाए कि फिर कभी दिला देगा. शाम ढले इलियास के तीनों साथी भी आ गए.

रात में टे्रन में सवार हो कर वह सवा 9 बजे अहेड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचे. वहां इक्कादुक्का लोग ही थे. जब यात्री चले गए तो इलियास नसीमा के साथ पैदल ही गांव की तरफ चल दिया. साजिद, परवेज व सलीम उस के पीछे थे. रास्ता सुनसान था. इलियास ने पीछे घूम कर इशारा किया तो सलीम आगे आया और उस ने तमंचा निकाल कर फायर कर दिया. लेकिन उस का निशाना चूक गया.

सकते में आई नसीमा को अपने सामने मौत नाचती नजर आई. वह समझ गई कि वे लोग उसे खत्म कर देना चाहते हैं. दहशत के मारे वह जमीन पर गिर गई. वह गिड़गिड़ाई, ‘‘खुदा के वास्ते मुझे मत मारो इलियास.’’

‘‘तू रहम के काबिल नहीं है नसीमा.’’ गुस्से में दांत पीसते हुए इलियास ने चाकू निकाला और नसीमा को खींच कर किनारे ले गया और चाकू से उस की गरदन पर वार कर दिया. उस का वार चूकने की वजह से चाकू माथे पर लगा. इलियास ने दोबारा वार किया. इस बार नसीमा की गरदन से खून की धार फूट पड़ी. वह बचाव के लिए छटपटाई तो सलीम व साजिद ने उस के पैर जकड़ लिए.

मां को लहूलुहान देख कर बच्चों की चीख निकल गई. वह बुरी तरह सहम गए. नसीमा तड़प रही थी. तीनों बच्चे इलियास से लिपट कर रोने लगे. लेकिन शैतान बने इलियास ने उन्हें खूंखार नजरों से घूरते हुए अपने से दूर झटक दिया.

जरा सी देर में नसीमा ने दम तोड़ दिया. यह देख उस का 7 वर्षीय बेटा नाजिम बहन का हाथ पकड़ कर चिल्लाया, ‘‘नाजिया. भाग, अब्बू ने अम्मी को मार दिया है. यह हमें भी मार डालेंगे. अकरम का भी हाथ पकड़ ले.’’ दहशतजदा तीनों बच्चे गेंहू के खेत की तरफ भागने लगे.

लेकिन उन लोगों ने दौड़ कर तीनों बच्चों को पकड़ लिया. इलियास के सिर पर खून सवार था. वह हैवान बन चुका था. बच्चे मौत के डर से कांप रहे थे. लेकिन इलियास को जरा भी दया नहीं आई. उस ने सब से पहले 4 साल के अकरम की गरदन काट दी. यह देख नाजिम व नाजिया रोते रहे, ‘‘अब्बू हमें मत मारो, अब्बू…’’

इलियास को रहम नहीं आया और उस ने नाजिया व नाजिम का भी गला काट दिया. बच्चों ने छटपटा कर दम तोड़ दिया. इस के बाद इन लोगों ने नसीमा का मोबाइल स्विच औफ कर के वहीं डाल दिया. इलियास ने चाकू परवेज के हवाले कर दिया और चुपचाप घर आ गया.

रात में उस ने नसीमा के जो चंद फोटो घर में थे, सब जला दिए. इस के पीछे उस की सोच थी कि उस के फोटो दिखा कर पुलिस ट्रेन या अस्पताल में पूछताछ न कर सके. क्योंकि नसीमा के साथ वह भी था. इस के बाद वह सो गया. उस के तीनों साथी अपनेअपने घर चले गए.

अगली सुबह दिन निकलते ही इलियास ने नाटक शुरू कर दिया. लियाकत को यह जताने की कोशिश की कि नसीमा नहीं आई है, इसलिए वह परेशान है. उस का मकसद लियाकत को गवाह बनाना था.

बाद में हत्या की बात सामने आने पर खूब ड्रामा किया. यही वजह थी कि एकाएक पुलिस को उस पर शक नहीं हुआ था.

इलियास को उम्मीद नहीं थी कि पुलिस उसे पकड़ लेगी. उस ने सोचा था कि कोई यकीन भी नहीं करेगा कि कोई इस तरह अपने बच्चों और पत्नी को मार सकता है. पुलिस गिरफ्त में इलियास को देख कर कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था कि वह ऐसा भी कर सकता है.

पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया. वहां इलियास को देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई. अदालत ने सभी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. बाद में पुलिस ने सलीम को भी मुखबिर की सूचना के आधार पर गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

अपराध चूंकि सनसनीखेज था, इसलिए पुलिस ने बाद में सभी आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत भी काररवाई की. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी.

अगर इलियास ने शक को तवज्जो न दे कर खतरनाक निर्णय न लिया होता तो न सिर्फ नसीमा और उस के बच्चे जिंदा होते, बल्कि उस का घर भी उजड़ने से बच जाता.  Uttar Pradesh Crime

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2014 में प्रकाशित

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...