Fake Death Conspiracy. पिंकी के घर वालों ने उस की शादी उस के प्रेमी नितेशराम के बजाय अरुण से कर दी. फिर ऐसी क्या वजह रही कि उन्होंने पिंकी को ट्रेन से गायब करा कर अरुण और उस के घर वालों को पिंकी की हत्या के आरोप में जेल भिजवा दिया. आखिर…
अरुण हमेशा उस पल को कोसा करता, जिस पल पिंकी से उस की शादी हुई थी. क्योंकि उसी की वजह से उसे ही नहीं, उस की बीमार मां, पिता और निर्दोष भाभी के साथ उस के डेढ़ साल के मासूम भतीजे अभिजीत को भी महीनों जेल की हवा खानी पड़ी थी. यह सब सोचसोच कर उसे स्वयं पर गुस्सा आता कि 10 महीने साथ रहने पर भी वह अपनी पत्नी की कुटिल चाल को समझ नहीं सका.
झारखंड के जिला गिरिडीह के थाना धनवार के गांव ओरखार के रहने वाले नूनूराम राणा के परिवार में पत्नी रामनी देवी के अलावा 2 बेटे अशोक, अरुण और एक बेटी सुजाता थी.
भारत सरकार के अधीन मिनरल एक्सप्लोरेशन कारपोरेशन लिमिटेड (एमईसीएल) में नौकरी करने की वजह से नूनूराम राणा पिछले 32 सालों से परिवार के साथ महाराष्ट्र के जिला नागपुर के थानाक्षेत्र गिट्टी खदान के आईबीएम रोड स्थित कृष्णानगर में रहते थे. रहते भले ही वह नागपुर में थे, लेकिन गांव से वह पूरी तरह जुड़े थे. साल में एकदो बार वह गांव आते रहते थे. गांव में उन की खेती की जमीन थी, जिसे उन्होंने बटाई पर दे रखी थी.
नूनूराम राणा के दोनों बेटों और बेटी की शादी गिरिडीह में ही अलगअलग इलाकों में हुई थी. अरुण की शादी ओरखार गांव से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव अलगदेशीय के रहने वाले केदार राणा की 20 वर्षीय बेटी पिंकी कुमारी से हुई थी. केदार राणा का फरनीचर का कारोबार था. हर तरह से संपन्न होने के बावजूद उन्होंने पिंकी की शादी 2 जून, 2010 को बड़ी सादगी से एक मंदिर में की थी.
केदार राणा उर्फ रामचंद्र के परिवार में पत्नी चंद्रावती के अलावा 3 बेटियां और एक बेटा दिनेश था. वह पिंकी के अलावा 2 बेटियों और बेटे की शादी कर चुके थे. वह पिंकी को पढ़ाना चाहते थे, क्योंकि पिंकी एक तो सब से छोटी थी, दूसरे पढ़ने में भी ठीक थी. लेकिन जिन दिनों वह घर से एक किलोमीटर दूर कुबरी हाईस्कूल में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों उस की दोस्ती साथ पढ़ रहे नितेशराम से हो गई.
नितेशराम उसी स्कूल के प्रधानाचार्य चंद्रभानुराम का बेटा था. वह रहने वाले तो उत्तरप्रदेश के जिला आजमगढ़ के थाना जहानागंज के गांव खानपुर के थे, लेकिन नौकरी की वजह से वह परिवार सहित कई सालों से स्कूल से कुछ दूर कुबरी में किराए पर रहते थे.
पिंकी और नितेशराम की यह दोस्ती समय के साथ परवान चढ़ी और प्यार में बदल गई. दोनों एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे. किसी का भी प्यार छिपाने से नहीं छिपा तो पिंकी और नितेशराम का ही प्यार कैसे छिपता.
जल्दी ही पिंकी और नितेश के प्रेमसंबंधों की चर्चा होने लगी. नितेश के पिता चंद्रभानुराम को जब इस बारे में पता चला तो उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा, लेकिन पिंकी के प्रेमसंबंधों की जानकारी होने पर चंद्रावती और केदार राणा इज्जत की दुहाई दे कर उस पर पाबंदी लगाने लगे.
भला प्यार पर कभी कोई पाबंदी लगा सका है, जो पिंकी के प्यार पर पाबंदी लग पाती. पिंकी और नितेश ने तो बहुत पहले ही निर्णय ले लिया था कि वे अपनी अलग दुनिया बसाएंगे. नितेश के घर वाले पिंकी को बहू बनाने को तैयार थे. इसलिए उस की ओर से कोई परेशानी नहीं थी.
परेशानी पिंकी के घर वालों की ओर से थी. वह उसे इस शादी से रोक रहे थे. जबकि पिंकी जिद पर अड़ी थी. इस से केदार राणा और दिनेश को लगा कि अगर पिंकी नितेश के साथ भाग गई तो जातिबिरादरी में नाक तो कटेगी ही, जगहंसाई भी होगी. उन्होंने इज्जत का हवाला दे कर उसे समझाया कि वह अपनी जिद छोड़ दे.
लेकिन पिंकी का कहना था कि वह नितेश को पति मान चुकी है, इसलिए वह किसी दूसरे से शादी कैसे कर सकती है. जब नितेश के घर वाले उसे अपनाने को तैयार हैं तो उन लोगों को क्यों परेशानी हो रही है.
घर वालों का कहना था कि नितेश उन की जाति का नहीं है, इसलिए वह उस से उस की शादी नहीं कर सकते. जब पिंकी नहीं मानी तो मांबाप ने कहा कि वह अपनी बिरादरी में शादी कर के एक बार ससुराल चली जाए. उस के बाद उस के मन में जो आए. वह वही करे.
फिर वही हुआ, जो पिंकी के मांबाप चाहते थे. इस के बाद 10 किलोमीटर दूर स्थित गांव ओरखार के रहने वाले नूनूराम राणा के बेटे अरुण से उस की शादी कर दी गई. यह शादी 2 जून, 2010 को हुई थी.
पिंकी विदा हो कर अपनी ससुराल नागपुर चली गई. वहां वह 10 महीने तक रही. इस बीच उस का व्यवहार ऐसा रहा कि सभी उसे आदर्श बहू मान बैठे. अप्रैल, 2011 में केदार राणा उसे कुछ दिनों के लिए अपने घर ले गए.
22 मई, 2011 को अरुण पिंकी को विदा कराने ससुराल आया. उस ने ससुर को बता दिया कि 26 मई को उस का गीतांजलि एक्सप्रेस से वापसी का टिकट है. इसलिए वह पिंकी की 26 मई की सुबह विदा कराएगा. जबकि पिंकी ससुराल जाने को तैयार नहीं थी.
उस ने साफसाफ कह दिया था कि उन लोगों के कहने पर उस ने अरुण से शादी तो कर ली, लेकिन अब वह वहां जाना नहीं चाहती. अगर उसे जबदस्ती भेजा गया तो वह जान दे देगी.
पिंकी के इस निर्णय से घर वाले घबरा गए. अगर पिंकी ने ऐसा कोई कदम उठा लिया तो वे सब मुसीबत में पड़ सकते थे. ऐसा ही कुछ दामाद के साथ होने पर भी हो सकता था. वे बीच का कोई रास्ता खोजने लगे. काफी सोचनेविचारने पर आखिर उपाय निकल ही आया. फिर वह उपाय पिंकी को बताया गया तो वह अरुण के साथ ससुराल जाने को तैयार हो गई.
26 मई, 2011 को अरुण पिंकी और भाभी गुडि़या को साथ ले कर राउरकेला रेलवे स्टेशन पर समय से पहुंच गया. वह टे्रन का इंतजार कर रहा था कि तभी प्लेटफार्म पर उसे केदार राणा, दिनेश और चतुर शर्मा दिखाई दिए. चतुर शर्मा पिंकी का बहनोई था. अरुण लपक कर उन के पास पहुंचा और हैरानी से पूछा, ‘‘दिनेशभाई आप इस समय यहां?’’
‘‘दरअसल एक जरूरी काम से हमें भी अचानक नागपुर जाना पड़ रहा है.’’ दिनेश ने कहा.
अरुण दिनेश से कुछ और पूछता, तब तक टे्रन के आने की सूचना प्रसारित होने लगी, इसलिए वह पिंकी और भाभी के पास आ गया. टे्रन आई तो वह गुडि़या और पिंकी के साथ एस-4 कोच में सवार हो गया. इस के बाद खाना खा कर सभी अपनीअपनी बर्थ पर सो गए.
आधी रात के आसपास अरुण का मोबाइल फोन बजा. उस ने फोन रिसीव किया तो दूसरी ओर से उस के साले दिनेश ने गुस्से में गाली देते हुए कहा, ‘‘तू ने मेरी बहन को चलती ट्रेन से फेंक कर मार दिया है. मैं तुझे छोड़ने वाला नहीं हूं. तुझे तेरे किए की सजा दिलवा कर ही रहूंगा.’’
दिनेश की इस बात से अरुण चौंका. उस की नजर तुरंत पिंकी की बर्थ पर गई. पिंकी बर्थ पर नहीं थी. उस ने गुडि़या को जगा कर पिंकी के बारे में पूछा तो वह भी यह जान कर हैरान रह गई कि पिंकी चलती टे्रन से गायब हो गई है. अरुण ने पिंकी को पूरी बोगी में खोज डाला, लेकिन वह दिखाई नहीं दी. पिंकी ही नहीं ससुर, साले और साढ़ू भी कहीं दिखाई नहीं दिए.
अरुण और गुडि़या की नींद गायब हो चुकी थी. अरुण ने फोन द्वारा पिंकी के इस तरह गायब होने की सूचना पिता और भाई को दी तो वे सब भी हैरान रह गए. गीतांजलि एक्सप्रेस 27 मई, 2011 की सुबह नागपुर पहुंची तो उस के पिता नूनूराम, भाई अशोक उर्फ परमेश्वर और चचेरा भाई रंजीत उसे स्टेशन पर मिले.
सलाहमशविरा कर के थाना जीआरपी को सफर के दौरान पिंकी के गायब होने की लिखित सूचना दी गई. नूनूराम तो गुडि़या को ले कर घर चले गए. लेकिन अरुण भाई अशोक उर्फ परमेश्वर और चचेरे भाई रंजीत के साथ पिंकी को खोजने के लिए बिलासपुर के लिए दूसरी टे्रन से रवाना हो गया.
बिलासपुर पहुंच कर तीनों जीआरपी के थानाप्रभारी से मिले और उन्हें पूरी बात बता कर पिंकी के गीतांजलि एक्सप्रेस से गायब होने की सूचना दर्ज करा दी. जिस तरह पिंकी गायब हुई थी, उस से अरुण और उस के भाई अशोक की समझ में आ गया था कि पिंकी को होशियारी के साथ टे्रन से गायब किया गया है. उसे उस के घर वालों ने ही किसी साजिश के तहत गायब किया है.
यह आशंका तब विश्वास में बदल गई, जब 2 जून, 2011 को केदार राणा ने थाना धनवार में अरुण, उस के पिता नूनूराम राणा, मां रामनी देवी, बड़े भाई अशोक उर्फ परमेश्वर, भाभी यानी अशोक की पत्नी गुडि़या के अलावा गांव में रह रहे अरुण के चाचाचाची और 2 चचेरे भाइयों नरेश और अनिल के खिलाफ भादंवि की धारा 304बी, 201, 34 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.
इस मुकदमा के दर्ज होने की जानकारी नूनूराम को हुई तो उन्हें जेल जाने का भय सताने लगा. फिर वही हुआ, जिस बात का उन्हें भय सता रहा था. 14 सितंबर, 2011 को थाना धनवार पुलिस ने नूनूराम राणा को नागपुर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. बाकी लोग भूमिगत हो गए थे. लेकिन वे भी कब तक भूमिगत रहते. एकएक कर के सभी पकड़े गए. गुडि़या के साथ उस के डेढ़ साल के मासूम बेटे अभिजीत को भी जेल जाना पड़ा.
धीरेधीरे सभी की जमानतें हो गईं, लेकिन अरुण की जमानत नहीं हो सकी. अरुण को जेल गए एक साल से अधिक हो गया. घर वालों को पता था कि पिंकी जिंदा है. इसलिए वे लगातार उस की खोज में लगे थे. वे इस संकट से तभी उबर सकते थे, जब पिंकी जिंदा मिल जाती. इसी खोज में उन्हें जो जानकारियां मिलीं, वे चौंकाने वाली थीं.
उसी बीच केदार राणा ने नूनूराम के पास एक प्रस्ताव भेजा कि अगर वह 8 लाख रुपए नगद दें तो वह मुकदमा उठा सकता है. इस प्रस्ताव ने उन के संदेह को और बढ़ा दिया कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. इसलिए उन्होंने पैसा देने से साफ मना कर दिया.
इस के बाद अरुण का भाई अशोक उर्फ परमेश्वर पूरे उत्साह के साथ पिंकी की खोज में जुट गया. पिंकी के बारे में पता लगाने के लिए अशोक ने सब से पहले अपने दूर के रिश्ते के एक साढ़ू से संपर्क साधा. दरअसल उसी ने पिंकी की शादी अरुण से कराई थी.
उसी ने अशोक को बताया था कि शादी से पहले पिंकी का अपने स्कूल के प्रिंसिपल के बेटे नितेशराम से प्रेमसंबंध था. उस ने यह भी बताया था कि पिंकी जिंदा है और वह अपने मांबाप की मरजी से नितेशराम के साथ बिलासपुर से गायब हुई थी. उस ने संदेह व्यक्त किया कि पिंकी गुजरात के सूरत शहर में हो सकती है, क्योंकि वहां उस का बड़ा भाई दिनेश रहता है.
अशोक के लिए इतनी जानकारी काफी थी. वह अपने चचेरे भाई को साथ ले कर सूरत पहुंचा. दिनेश वहां थाना पंडेसरा के कैलाशनगर में मोबाइल टावर नंबर 29 के बगल में रहता था. वह वहां फरनीचर की ठेकेदारी करता था.
अशोक को गुपचुप तरीके से की गई जानकारी में पता चला कि पिंकी वहीं अपने प्रेमी नितेशराम के साथ रह रही है. अशोक के पास पिंकी के तो कई फोटोग्राफ थे, लेकिन नितेशराम का कोई फोटो नहीं था. भागदौड़ कर के उस ने उस मकान को देख लिया, जिस मकान में पिंकी नितेश के साथ रह रही थी.
अशोक पूरी जानकारी इकट्ठा कर के थाना पंडेसरा के तत्कालीन थानाप्रभारी से मिला. उन्हें पूरी बात बता कर मदद मांगी तो उन्होंने कहा कि अगर लड़की नाबालिग होती तब तो वह उस की मदद कर सकते थे. लेकिन लड़की बालिग है, इसलिए वह अपनी मरजी से कहीं भी रह सकती है. अगर धनवार पुलिस आ कर लड़की बरामद करने में मदद मांगे तो वह उस की मदद कर सकते हैं.
अशोक ने सूरत से ही थाना धनवार के थानाप्रभारी से बात की. थाना धनवार पुलिस काररवाई करने सूरत जाती, उस से पहले ही कहीं से दिनेश को भनक लग गई कि पिंकी की ससुराल वालों को उस के सूरत में होने का पता लगा है. उस ने तुरंत पिंकी को वहां से हटा दिया. इस तरह अशोक की सारी मेहनत पर पानी फिर गया.
पिंकी सूरत से कहां गई, यह सिर्फ उस के घर वाले जानते थे. अब अशोक ने तय कर लिया था कि उसे पिंकी को हर हालत में खोज निकालना है. इस बार उस ने उस स्कूल का भी पता कर लिया, जहां पिंकी पढ़ाई करती थी. कुबरी स्थित उस स्कूल के बड़े बाबू हनुमानप्रसाद से पता चला कि नितेश के पिता चंद्रभानुराम रिटायर्ड हो कर अपने गांव चले गए थे. वह उत्तरप्रदेश के जिला आजमगढ़ के थाना जहानागंज के गांव खानपुर के रहने वाले थे.
हनुमानप्रसाद से अपनी विपदा बता कर अशोक ने पिंकी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी मांगी तो उन्होंने बताया कि पिंकी अपने प्रेमी नितेशराम के साथ आजमगढ़ के आसपास ही कहीं रह रही है.
अशोक अपने एक रिश्तेदार के साथ आजमगढ़ पहुंच कर नितेश के बारे में गुप्तरूप से पता किया तो जानकारी मिली कि नितेशराम कुछ दिनों पहले आजमगढ़ आया हुआ था. उस के साथ एक लड़की भी थी, जिस की गोद में एक बच्चा था. कुछ दिनों के बाद वह उस लड़की को ले कर कहीं चला गया था.
वहीं से अशोक को यह भी पता चला कि नितेश बनारसी साड़ी की बुनाई और कढ़ाई का काम करता था. इस काम में उस का ममेरा भाई श्रीराम उस की मदद करता था. इस के बाद अशोक मऊ पहुंचा. मऊ में हजारों लूम लगे हैं, जहां पर बनारसी साडि़यों की बुनाई और कढ़ाई का काम होता है. ऐसे में नितेशराम कहां काम करता है, यह पता लगाना आसान नहीं था.
अशोक राणा बुनकरों के संगठन से जुड़े मोहम्मद असलम एवं शाहिद से मिला और अपनी परेशानी बता कर मदद मांगी. इस में एक परेशानी यह थी कि उस के पास नितेशराम का कोई फोटो नहीं था. इस के बावजूद एक हफ्ते की भागदौड़ में उसे पता चल गया कि नितेशराम कहां काम करता है. अगले दिन उस ने यह भी पता कर लिया कि वह पिंकी के साथ कहां रहता था. लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि तीन दिन पहले ही नितेश मकान छोड़ कर कहीं चला गया था.
एक बार फिर अशोक के हाथ निराशा लगी. लेकिन उस ने हार नहीं मानी. उस ने नितेश के उस मकान के पास रहने वाले एक पांडेयजी से अपनी परेशानी बताई तो पांडेय ने अशोक को भरोसा दिलाया कि वह कैसे भी नितेश और पिंकी का पताठिकाना खोज निकालेग. लेकिन इस में जो खर्च आएगा, वह उसे देना होगा. अशोक इस के लिए तैयार हो गया. वह पांडेय को कुछ रुपए दे कर अपनी नौकरी पर जयपुर चला गया.
आखिर पांडेय ने पिंकी और नितेश को खोज निकाला. 17 दिसंबर, 2013 को पांडेय ने अशोक को फोन पर सूचना दी कि पिंकी वाराणसी के थाना कैंट के पांडेयपुर मोहल्ला के प्रेमनगर के एक तिमंजिला मकान के ऊपरी हिस्से में बतौर किराएदार रह रही है. उस का प्रेमी नितेशराम वहीं कहीं साड़ी बुनाई का काम करता है. अशोक खुद तो वाराणसी पहुंच ही गया, फोन कर के अपने पिता नूनूराम राणा को भी बुला लिया.
18 दिसंबर, 2013 को नूनूराम राणा, अशोक और उस का एक चचेरा भाई भी वाराणसी पहुंच गया. अशोक पांडेय के साथ जा कर वह मकान भी देख आया, जिस में पिंकी नाम बदल कर नितेश के साथ रह रही थी. वह मकान बसपा के एक स्थानीय नेता का था.
20 दिसंबर को अशोक चौकीप्रभारी ए.के. सिंह के साथ थाना कैंट के थानाप्रभारी विपिन राय से मिला. उन्हें उस ने पूरी बात बताई तो वह भी हैरान रह गए. लेकिन उन्होंने कहा कि जब तक धनवार पुलिस से उन की बात नहीं हो जाती, तब तक वह कोई काररवाई नहीं कर सकते.
अशोक को पता था कि अगर धनवार पुलिस को इस बात की जानकारी हुई तो हो सकता है पिंकी यहां से भी गायब हो जाए. इसलिए उस ने थाना पुलिस से बात कराने के बजाय गिरिडीह के पुलिस अधीक्षक क्रांति कुमार से उन की बात करा दी.
गिरिडीह के पुलिस अधीक्षक क्रांति कुमार ने हकीकत जान कर कहा कि वह पुलिस की एक टीम वाराणसी भेज रहे हैं. पूरी योजना बना कर 21 दिसंबर, 2013 की सुबह इंसपेक्टर विपिन राय ने सहयोगियों के साथ प्रेमनगर स्थित उस मकान पर छापा मार कर पिंकी को बरामद कर लिया. उस की गोद में उस समय डेढ़ साल का एक बेटा भी था.
पिंकी तो मिल गई, लेकिन नितेशराम फरार हो गया. दोपहर बाद गिरिडीह से एएसआई पशुपतिनाथ राय सहयोगियों के साथ वाराणसी पहुंचे तो आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर के वाराणसी पुलिस ने पिंकी को उन के हवाले कर दिया.
पिंकी की बरामदगी के बाद सारा सच सामने आ गया. उस के बताए अनुसार वह बिलासपुर रेलवे स्टेशन पर उतर गई थी. पिता, भाई और जीजा साथ ही थे. नितेश भी उसी टे्रन में था. वहां से वह नितेश के साथ दिल्ली चली गई. कुछ महीने दिल्ली में रहने के बाद वह सूरत चली गई थी.
कुछ दिनों तक इधरउधर रहने के बाद वह वाराणसी चली आई. जहां से पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. उस के घर वालों के अलावा नितेश के घरवालों को भी उन के बारे में जानकारी थी. नितेश के पिता हर महीने खर्च के लिए बैंक के माध्यम से पैसे भी भेजते थे.
पूछताछ के बाद पुलिस ने पिंकी को ही नहीं, साजिश के तहत नूनूराम और उन के परिवार के लोगों को हत्या जैसे आरोप में फंसने के अपराध में केदार राणा को भी जेल भेज दिया गया.
कथा लिखे जाने तक अरुण की जमानत हो चुकी थी. उस के घर वाले पिंकी के पिता केदार राणा और नितेशराम के घरवालों के खिलाफ हत्या के झूठे केस में जेल भिजवाने और मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की तैयारी कर रहे थे.
कथा लिखे जाने तक पिंकी और उस के पिता केदार राणा गिरिडीह की जिला जेल में बंद थे. नितेशराम फरार था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी. Fake Death Conspiracy
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— 2014 में प्रकाशित






