Hindi Crime Story. पोंगा पंडित के जाल में इंटर कालेज के लेक्चरर सुधाकर वर्मा पत्नी बीना वर्मा की भावनाओं को समझ नहीं पाए, जिस की वजह से उन के बीच कलह रहने लगी. बीना वर्मा के मायके में आने वाले एक पुरोहित हनु उपाध्याय ने अपना हित साधने के लिए बीना को ऐसी सलाह दी कि वह न तो घर की रही और न घाट की.
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के स्योहारा कस्बे का रहने वाला सुधाकर वर्मा मुरादाबाद के एक इंटर कालेज में लेक्चरर था. मुरादाबाद में कमरा ले कर रहने के बजाय वह घर से ही रोजाना अपनी ड्यूटी पर आताजाता था, जबकि उस की पत्नी बीना वर्मा उस से बारबार कहती कि वह मुरादाबाद में ही एक कमरा किराए पर ले लें. जहां उस के साथ वह भी रह लेगी. लेकिन सुधाकर मांबाप की सेवा करने की बात कह कर उस की बात अनसुनी कर देता था.
बीना वर्मा ने अंगे्रजी विषय से एमए किया था. शादी से पहले उस के भी अरमान थे कि उस का पति ऐसा हो, जो उस की भावनाओं को समझे. उसे अपनी आंखों पर बिठाए रखे और वह उस के साथ किसी शहर में रहे.
सुधाकर वर्मा से शादी हो जाने के बाद बीना बहुत खुश थी, क्योंकि वह एक कालेज में पढ़ाता था. बीना चाहती थी कि वह गांव के माहौल से निकल कर पति के साथ मुरादाबाद शहर में रहे. मगर सुधाकर अपने घर वालों से उसे अलग नहीं करना चाहता था.
इसी बीच बीना एक बेटे की मां भी बन गई, जिस का नाम स्पर्श रखा गया. बेटा पैदा होने के बाद घर के सभी लोग खुश थे. बीना बेटे की परवरिश में लग गई. जब वह कुछ बड़ा हो गया तो बीना पति से मुरादाबाद में रहने की जिद करने लगी.
उसी दौरान सुधाकर ने मुरादाबाद के लाइनपार इलाके में पुतली घर रोड पर एक कमरा किराए पर ले लिया और वहीं पर रहने लगा. जबकि पत्नी से कह दिया कि वह बरेली में एक दोस्त के यहां रह रहा है. बीना ने उस से कहा भी कि वह भी बरेली में रह लेगी, लेकिन सुधाकर ने उसे टाल दिया.
अपनी नवविवाहिता से कोई भी पति दूर रहना नहीं चाहेगा, मगर सुधाकर पत्नी से दूर क्यों रहना चाहता था, वह उसे अपने साथ रहने से क्यों मना कर रहा था, इस बात को बीना समझ नहीं पा रही थी. वह जब भी उस के साथ जाने की बात करती, वह भड़क उठता. इस बात पर उन के बीच विवाद बढ़ जाता. बीना जिद्दी स्वभाव की थी. वह भी अपनी जिद पर अड़ी रहती.
इसी बीच 22 जनवरी, 2014 को सुधाकर मुरादाबाद से रहस्यमय तरीके से गायब हो गया. सुधाकर के पिता रामअवतार वर्मा की बेटे से जब कई दिनों तक कोई बातचीत नहीं हुई तो उन्होंने उस का फोन नंबर मिलाया. उस का फोन भी स्विच औफ आ रहा था. उन्होंने मुरादाबाद स्थित उस का कमरा देखा ही था, इसलिए वह जब मुरादाबाद आए तो पता चला कि उस का कमरा 22 जनवरी से ही बंद है.
सुधाकर एसडीएम इंटर कालेज में नौकरी करता था, रामअवतार उस कालेज में पहुंचे तो जानकारी मिली कि वह 22 जनवरी से कालेज भी नहीं आ रहा है. यह जानकारी मिलते ही रामअवतार चिंतित हो गए. उन्होंने अपनी सभी रिश्तेदारियों में फोन कर के बेटे के बारे में मालूमात की, लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर उन्होंने 30 जनवरी, 2014 को मझोला थाने जा कर थानाप्रभारी को बेटे के गायब होने की बात बता दी.
रामअवतार ने पुलिस को बताया, ‘‘सुधाकर की उस की बीवी से नहीं बनती थी. मुझे उम्मीद है कि उसे गायब कराने में उस की बीवी का हाथ है.’’
कोई पत्नी अपने पति को भला क्यों गायब कराएगी, यह बात थानाप्रभारी नहीं समझ पा रहे थे. सुधाकर की पत्नी बीना मुरादाबाद की एमडीए कालोनी में रह रही थी. पुलिस जब उस के कमरे पर गई तो वहां नहीं मिली. बीना के गायब होने पर पुलिस को सुधाकर के पिता रामअवतार की बातों में सच्चाई नजर आई. काफी कोशिश के बाद भी पुलिस को बीना के बारे में जानकारी नहीं मिली.
2 हफ्ते से ज्यादा बीत गए, लेकिन 38 वर्षीय सुधाकर का कहीं पता नहीं लग रहा था. जवान बेटे के लापता होने से रामअवतार और उन की पत्नी का हाल बेहाल था. रोरो कर उन की आंखें सूज गई थीं. मां की तो जैसे भूखप्यास ही मर गई थी. हर समय वह बेटे के बारे में ही सोचती रहती थी.
कोई जानकारी न मिलने पर पुलिस ने सुधाकर के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई, ताकि उस से उस के बारे में कोई क्लू मिल सके. काल डिटेल्स की जांच से जानकारी मिली कि 22 जनवरी को उस के मोबाइल पर एक काल आई थी. वह अंतिम काल जिस नंबर से आई थी, वह नंबर तहसील मंडी धनौरा के सीकरखेड़ा गांव के रहने वाले विजयपाल का था.
इस जांच में पुलिस को एक जानकारी यह भी मिली कि सुधाकर के फोन की 22 जनवरी की लोकेशन विजयपाल के गांव यानी सीकरखेड़ा के आसपास की थी.
इस का मतलब यह था कि उस दिन सुधाकर और विजयपाल साससाथ थे. इस जानकारी के बाद विजयपाल इस मामले की जांच में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बन गया.
काल डिटेल्स का अध्ययन करने के बाद पुलिस को जांच आगे बढ़ने की कुछ उम्मीद जागी. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम विजयपाल के घर सीकरखेड़ा भेज दी. विजयपाल घर पर ही मिल गया. वह उत्तर प्रदेश होमगार्ड में था, इस के बावजूद भी वह पुलिस को देख कर घबरा गया. पूछताछ के लिए पुलिस उसे मझोला थाने ले आई.
होमगार्ड होने की वजह से वह पुलिस द्वारा पूछी जाने वाली बातों को बड़ी चालाकी से टालता रहा. उस की बातों से लग रहा था कि वह सुधाकर के बारे में कुछ न कुछ जानता तो है, मगर छिपा रहा है. इसलिए पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की. जिस का नतीजा यह निकला कि उसे सच्चाई बताने पर मजबूर होना पड़ा.
विजयपाल ने बताया कि सुधाकर वर्मा अब जिंदा नहीं है, उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी है. इस साजिश में सुधाकर की पत्नी बीना वर्मा भी शामिल थी.
यह सुन कर थानाप्रभारी सन्न रह गए. उन्होंने सुधाकर की लाश के बारे में पूछा तो विजयपाल ने बताया कि लाश उस ने अपने घर में दबा दी थी. थानाप्रभारी विजयपाल को उस के गांव सीकरखेड़ा ले गए. इस बीच थानाप्रभारी ने सुधाकर की हत्या किए जाने की बात अपने अधिकारियों को भी बता दी थी.
खबर मिलने के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आशुतोष कुमार और पुलिस अधीक्षक (नगर) महेंद्र यादव भी सीकरखेड़ा पहुंच गए. गांव के लोगों की मौजूदगी में पुलिस ने विजयपाल के घर में उस के द्वारा बताई जगह पर खुदाई कराई तो वास्तव में वहां सुधाकर वर्मा की लाश निकली. करीब महीना भर जमीन में दफन रहने के बावजूद लाश ज्यादा खराब नहीं हुई थी.
मौके पर सुधाकर के पिता रामअवतार वर्मा भी मौजूद थे. बेटे की लाश देख कर वह दहाड़ें मार कर रोने लगे. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने मौके की जरूरी काररवाई निपटाई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.
विजयपाल को थाने ला कर पुलिस ने उस से सुधाकर वर्मा की हत्या के बारे में पूछताछ की. उस ने हत्या की जो कहानी बताई, वह पारिवारिक रिश्तों की बुनियाद को हिला देने वाली निकली.
सुधाकर वर्मा उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के स्योहारा कस्बे के रहने वाले रामअवतार वर्मा का बेटा था. अंगे्रजी विषय से एमए करने के बाद वह नौकरी की तलाश करने लगा. उस की तलाश पूरी हुई और उस की नौकरी मुरादाबाद स्थित एसडीएम इंटर कालेज में लेक्चरर के पद पर लग गई. बेटे की नौकरी लग जाने के बाद रामअवतार वर्मा ने उस की शादी ज्योतिबाफुले नगर (अमरोहा) के कस्बा मंडी धनौरा के रहने वाले सुभाष वर्मा की बेटी बीना उर्फ विधि वर्मा से कर दी. यह करीब 10 साल पहले की बात है.
बीना वर्मा खूबसूरत युवती थी. उस ने भी अंगे्रजी से एमए किया हुआ था. सुधाकर भी हैंडसम था. उस से शादी कर के वह खुश थी. जिस बीना के साथ सुधाकर ने सात फेरे लिए थे, जीवन भर साथ रहने की कसमें खाई थीं, शादी के कुछ दिनों बाद वह उस की नाक में दम कर देगी, ऐसा उस ने सोचा भी नहीं था.
दरअसल बीना जिद्दी स्वभाव की थी. इसी वजह से शादी के 2 साल बाद ही पति से उस की खटपट रहने लगी. इस में कुछ गलती सुधाकर की भी थी. दरअसल, बात यह थी कि मुरादाबाद के इंटर कालेज में नौकरी लगने के बाद सुधाकर कुछ दिनों तक ड्यूटी पर गांव से ही आताजाता रहा, लेकिन बाद में उस ने मुरादाबाद में ही पुतली घर रोड पर किराए का कमरा ले लिया. मुरादाबाद में रहते हुए वह सप्ताह के अंत में ही घर आ पाता था.
बीना उस से उस के साथ रहने की बात कहती तो वह उसे नहीं ले जाता था. वह उस से झूठ बोलते हुए कह देता था कि वह बरेली में दोस्त के कमरे पर रहता है. जबकि मुरादाबाद से जितनी दूर उस का घर है, उस से कहीं ज्यादा दूर बरेली है. इसलिए बरेली से ड्यूटी आनेजाने वाली बात बीना के गले नहीं उतर रही थी. यह बात बीना के समझ से परे थी कि वह उसे अपने साथ न रख कर गांव में ही क्यों रखना चाहता है.
बीना जब भी सुधाकर से मुरादाबाद में रहने की बात करती, वह मांबाप की सेवा करने की बात कह कर उसे घर पर ही रहने को कह देता. बेटा पैदा होने के बाद भी सुधाकर उसे अपने साथ नहीं ले गया. इसी बात से उन के बीच नोकझोंक होने लगी.
घर में जब ज्यादा कलह होने लगी तो सुधाकर के मांबाप ने उसे समझाया. इस पर वह पत्नी और बेटे को अपने साथ मुरादाबाद ले आया. पति के साथ रह कर बीना खुश थी. मगर उस की यह खुशी कुछ दिनों तक ही कायम रह सकी.
दरअसल, उच्च शिक्षित होने के बावजूद भी बीना की जिंदगी घर की चारदीवारी के बीच सिमट कर रह गई थी. वह नौकरी करना चाहती थी, लेकिन सुधाकर उसे नौकरी करने को मना करता था.
दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. जब पतिपत्नी की जिद आपस में टकराती है तो उस से बरबादी की भयानक चिंगारी निकलती है, जो घर की सुखशांति को भस्म कर देती है. इस से परिवार की उन्नति को विराम लग जाता है.
अन्य महिलाओं की तरह बीना भी पति के साथ शहर में घूमनाफिरना चाहती थी. लेकिन सुधाकर पता नहीं कौन से जमाने में जी रहा था कि वह उसे केवल घर में रहने को कहता था. न तो वह उसे शहर में घुमाने ले जाता था और न ही उसे अकेले बाहर जाने देता था.
वह पत्नी की भावनाओं को समझ नहीं पा रहा था. इस से बीना मन ही मन घुटती थी. कभीकभी अपनी नाराजगी वह पति से जाहिर करती तो दोनों के बीच झगड़ा शुरू हो जाता. घर में आए दिन होने वाली कलह से सुधाकर परेशान रहने लगा. हालात यह हो गए कि एक दिन सुधाकर ने उसे घर से निकाल दिया.
बीना भी जिद की पक्की थी, वह बेटे को ले कर एमडीए कालोनी में किराए पर फ्लैट ले कर रहने लगी. उस ने बेटे का दाखिला एक कौन्वेंट स्कूल में करा दिया था. पढ़ाई का खर्चा और फ्लैट का किराया बीना की मां ऊषा वर्मा दे रही थी. ऊषा खर्चे के पैसे देने के लिए अपने एक पुरोहित हनु उपाध्याय को बीना के पास भेजती थी.
बीना और सुधाकर के संबंधों में हनु उपाध्याय ने भी जहर घोलने का काम किया. हनु उपाध्याय मूलरूप से राजस्थान के अलवर जिले के रोजीझियान गांव का रहने वाला था. वह पिछले 10 सालों से मंडी धनौरा के एक मंदिर में पुजारी था.
पुजारी होने की वजह से कस्बे के तमाम लोग उस की इज्जत करते थे. ऊषा के यहां भी पूजापाठ, हवन, कथा आदि हनु उपाध्याय ही कराता था. पिछले 8 सालों से हनु का उस के यहां आनाजाना था.
बीना ने तो हनु को अपना मुंह बोला भाई बना रखा था, लेकिन उस की बीना पर गलत नजर थी. वह जवान हुई तो 26-27 साल का हनु उस से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश करने लगा, लेकिन बीना उस की बातों को नजरअंदाज करती रही.
चूंकि बीना की मां ऊषा पुजारी हनु पर बहुत विश्वास करती थी, इसलिए बदनामी की वजह से वह बीना से अपने मन की बात कह नहीं सका. बाद में जब बीना की शादी सुधाकर वर्मा से हो गई तो हनु हाथ मलता रह गया.
शादी के बाद जब बीना की पति के साथ नोंकझोंक रहने लगी तो ऊषा वर्मा ने अपने पुरोहित हनु उपाध्याय से बेटी के भविष्य के बारे में पूछा. हनु ने उसे बताया कि बीना और सुधाकर की कुंडली मेल नहीं खा रही है, इसलिए इन की गृहस्थी में शांति नहीं रह पाएगी. ग्रहनक्षत्र सही न होने की वजह से बीना को पति से सुख मिलने की संभावना नहीं है.
बीना ने जब उस से इस का समाधान पूछा तो उस ने अपना स्वार्थ साधने के लिए सलाह दी कि वह लगातार पति के साथ न रहे. महीने दो महीने में वह मायके आती रहे और मंदिर में आ कर पार्वती का पूजन करे तो समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है.
पुरोहित हनु उपाध्याय के सुझाव के बाद बीना ने बारबार मायके जाना शुरू कर दिया. हनु जिस मंदिर में पुजारी था, वह उस मंदिर में पूजा करने जाने लगी. उसी दौरान उस की हनु से नजदीकियां बढ़ गईं. पतिपत्नी के बीच चल रही नाराजगी का फायदा उठाने के लिए हनु ने एक दिन बीना को ऐसी बात बताई, जिस ने उस की गृहस्थी में और कड़वाहट घोल दी.
पंडित हनु ने उस से कहा, ‘‘बीना, दरअसल तुम्हें अपने पति की हकीकत पता नहीं है. वह तुम से जो दूरी बना रहा है, उस की भी एक वजह है.’’
‘‘वह क्या वजह है पंडिजी?’’ बीना ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘बात यह है कि सुधाकर का बरेली की एक लड़की के साथ चक्कर चल रहा है. वह उस लड़की को इतना चाहता है कि उस के साथ शादी करने की सोच रहा है. इसलिए वह तुम्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता.’’
इतना सुनते ही वह गुस्से से भर गई. उसे पंडित हनु की बातों पर विश्वास हो गया, क्योंकि जब वह गांव में रहती थी तो सुधाकर उस से बरेली में रहने की बात कहता था. फिर भी वह हनु से बोली, ‘‘आप को यह बात कैसे पता?’’
‘‘एक दिन सुधाकर ने ही मुझ से यह बात बताई थी. साथ ही वह उस लड़की से शादी करने का उपाय भी पूछ रहा था. तब मैं ने उसे बहुत समझाया था कि अपनी गृहस्थी पर ध्यान दे.’’ हनु ने तपते लोहे पर वार करते हुए कहा.
इस के बाद बीना के मन में पति पर जो शक था, वह सच में बदल गया. उस की पति से दूरी बढ़ती गई और उस के मन में पंडित हनु के प्रति चाहत पैदा हो गई. इस बीच दोनों के बीच ऐसे संबंध भी कायम हो गए, जो केवल पतिपत्नी के बीच ही बनते हैं.
बीना मायके से जब मुरादाबाद में पति के कमरे पर आ जाती तो हनु उस से मिलने वहां भी पहुंच जाता था. सुधाकर वर्मा को हनु उपाध्याय की गतिविधियों पर शक था, इसलिए वह बीना से हनु के वहां आने की वजह पूछता. चूंकि अब वह बीना का प्रेमी बन चुका था, इसलिए वह कह देती कि पंडितजी उस के मुंह बोले भाई हैं. मां के यहां भी इन का बहुत दिनों से आनाजाना है. इन से हम लोगों के पारिवारिक संबंध हैं.
बीना बहाने चाहे जो भी बनाती, लेकिन सच्चाई यह थी कि सुधाकर हनु को पसंद नहीं करता था.
सुधाकर के बारे में मनगढ़ंत बातें कह कर हनु बहुत खुश था, क्योंकि इस के बाद बीना के पति के साथ संबंध इतने बिगड़ गए थे कि उसे पति से अलग हो कर दूसरी जगह किराए के मकान में रहना पड़ा. बीना जब एमडीए कालोनी में अलग रहने लगी तो हनु बेखौफ उस के पास आने लगा.
चूंकि ऊषा ही बेटी का खर्चा उठा रही थी, इसलिए वह अपने विश्वासपात्र हनु के द्वारा ही बेटी के पास पैसे भिजवा देती थी. करीब डेढ़ साल पहले पंडित हनु और बीना ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ कर जो नाजायज संबंध बनाए थे, वह इतने गहरे हो गए थे कि उन्होंने जीवनभर साथ रहने का फैसला ले लिया था. उन दोनों के बीच क्या चल रहा है, इस की जानकारी ऊषा वर्मा को नहीं थी.
ऊषा ने भी सुधाकर को कई बार समझाने की कोशिश की थी लेकिन उस पर समझाने का कोई फर्क नहीं पड़ा था. उधर अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए हनु भी सुधाकर के खिलाफ ऊषा के कान भरता रहता था. दरअसल हनु किसी तरह से सुधाकर को ठिकाने लगवा कर बीना के साथ शादी करने का रास्ता तैयार कर रहा था.
मौके का फायदा उठाते हुए हनु ने एक दिन ऊषा को सलाह दे डाली, ‘‘बीना इस समय पति से अलग रहती है. इस के बावजूद सुधाकर उसे टेंशन देता रहता है. पति होने का उसे कोई सुख तो मिल नहीं रहा तो ऐसे पति से क्या फायदा?’’
‘‘पंडिजी, अब हम कर भी क्या सकते हैं? मैं तो उसे समझासमझा कर थक गई. पता नहीं वो कौन सी मिट्टी का बना है जो उस पर समझाने का कोई फर्क नहीं पड़ रहा. वैसे तो वह टीचर है लेकिन अकल उस में बच्चे के बराबर भी नहीं है. मुझे पहले से पता होता तो उस के साथ मैं हरगिज शादी नहीं करती. मेरी बेटी की हालत ऐसी हो गई है कि वह न तो कुंआरी है और न ही शादीशुदा. ऐसे आदमी को तो मर जाना चाहिए, कम से कम बेटी कुछ दिन रोने के बाद चैन से तो रहेगी.’’ ऊषा दुखी मन से बोली.
‘‘यह तो तुम बड़ी अच्छी बात कह रही हो. लेकिन वो इतना बेशरम है कि ऐसे नहीं मरेगा.’’
‘‘फिर कैसे मरेगा?’’
‘‘तुम तैयार हो तो मैं उसे इस तरह से निबटवा दूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा. और फिर उस के मरने के बाद बीना को उस की जगह कालेज में नौकरी भी मिल जाएगी. क्योंकि वह भी पढ़ीलिखी है.’’
पंडित पर ऊषा आंख बंद कर के विश्वास करती थी इसलिए उस ने इस बारे में हनु से विस्तार से बात की तो उस ने सुधाकर की हत्या करने की जो योजना बताई, उसे सुन कर ऊषा भी खुश हो गई.
क्योंकि प्लान इतना फूलपू्रफ था कि हत्या का राज राज ही रहने की उम्मीद थी. अपने दामाद की हत्या कराने के लिए ऊषा ने 50 हजार रुपए खर्च करने की भी हामी भर दी. पूरी योजना के बारे में बीना को भी जानकारी थी.
हनु ने हत्या की वारदात को अंजाम देने के लिए अपने जानकार विजयपाल, प्रेम, और मुकेश को चुना. विजयपाल उत्तर प्रदेश पुलिस में होमगार्ड था. वह मंडी धनौरा के सीकरखेड़ा गांव का रहने वाला था.
हनु अलवर के जिस गांव का रहने वाला था, उस के पास ही एक कस्बा था खेड़की, वहीं के रहने वाले राजेंद्र नाम के एक युवक को भी हनु ने इस योजना में शामिल कर लिया.
सुधाकर को कैसे ठिकाने लगाना है. इस की योजना हनु, विजयपाल, प्रेम, मुकेश, राजेंद्र, ऊषा और बीना ने बना ली. सुधाकर शादी के बाद जब अपनी ससुराल जाता था तो वहां उस की जानपहचान विजयपाल से हो गई थी. बाद में दोनों के बीच दोस्ती हो गई थी.
चूंकि सुधाकर विजयपाल पर विश्वास करता था इसीलिए हनु ने विजयपाल को योजना में शामिल किया था.
वारदात से 2-4 दिन पहले विजयपाल ने मुरादाबाद में सुधाकर से मुलाकात कर के कहा था, ‘‘मंडी धनौरा में मेरा एक प्लौट है. मुझे इस समय पैसों की सख्त जरूरत है, इसलिए उस प्लौट को मैं बेचना चाहता हूं. आप ने एक बार मुझ से प्रौपर्टी खरीदने के बारे में कहा था. वो प्लौट एकदम सड़क के किनारे है. उसे ले कर डाल भी दोगे तो कुछ ही दिनों में पैसे दोगुने हो जाएंगे.’’
सुधाकर वैसे भी प्रौपर्टी में कुछ पैसे इनवैस्ट करना चाह रहा था, इसलिए उस ने कहा कि प्लौट देखने के बाद अपनी राय बता देगा. विजयपाल ने उस से उसी दिन प्लौट देखने को कहा लेकिन उस दिन व्यस्त होने की वजह से सुधाकर ने 2-4 दिन बाद के लिए कह दिया.
फिर 22 जनवरी, 2014 को विजयपाल ने प्लौट देखने के लिए सुधाकर को फोन किया. सुधाकर से बात करने के बाद विजयपाल मुरादाबाद में सुधाकर से पास आ गया और उसे अपने साथ सीकरखेड़ा गांव स्थित अपने घर ले गया. वहां पहले से ही मुकेश, प्रेम और राजेंद्र बैठे थे. कुछ देर तक वे सभी बातें करते रहे.
करीब 20 मिनट बाद वहां हनु उपाध्याय पहुंचा तो वहां मौजूद राजेंद्र और मुकेश ने हनु का इशारा पाते ही सुधाकर वर्मा के गले में रस्सी डाल दी और वे दोनों रस्सी से उस का गला घोंटने लगे. सुधाकर भी हट्टाकट्टा था. वह उन से खुद को बचाने की कोशिश करने लगा. तभी वह रस्सी टूट गई जिस से वे उस का गला घोंट रहे थे.
रस्सी टूटते ही जान बचाने के लिए सुधाकर वहां से भागने की कोशिश करने लगा. लेकिन उन लोगों ने उसे फिर दबोच कर गिरा दिया. उसी समय हनु उपाध्याय ने सुधाकर को बेहोशी की दवा सुंघा दी. जिस से वह बेहोश हो गया. फिर हनु उपाध्याय ने उस के सीने पर चढ़ कर उस का गला घोंट दिया.
लाश को ठिकाने लगाने की योजना वे पहले ही बना चुके थे. लाश ठिकाने लगाने को कह कर हनु वहां से चला गया. उस के जाते ही उन सभी ने घर में गड्ढा खोद कर लाश दफना दी. अपना काम निपटाने की बात विजयपाल ने हनु को बता दी थी.
ऊषा ने दामाद को ठिकाने लगाने की 10 हजार रुपए की पेशगी विजयपाल को दे दी थी. बाकी के पैसे उस ने बाद में देने को कहा था. ऊषा और उस की बेटी बीना को जब सुधाकर को ठिकाने लगाने की जानकारी मिली तो वे बहुत खुश हुईं. जिस जगह पर लाश दफनाई गई थी. उसी जगह पर अगले दिन 23 जनवरी को हनु उपाध्याय ने सुधाकर की आत्मा की शांति के लिए हवन भी किया.
इस के बाद पंडित हनु बीना को ले कर अलवर के थाना रौनेजा क्षेत्र में रहने लगा. हत्याकांड में शामिल सभी लोग इस बात से निश्चिंत थे कि सुधाकर की हत्या का राज कभी नहीं खुल सकेगा.
मगर सुधाकर के पिता रामअवतार वर्मा के पास कई दिनों से सुधाकर का फोन नहीं आया तो उन्होंने उस का फोन मिलाया. लेकिन उस का फोन बंद निकला. शक होने पर वह उसे देखने उस के मुरादाबाद स्थित कमरे पर पहुंच गए. सुधाकर के बारे में जब उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली तो वह थाना मझोला गए थे.
फिर फोन के सहारे मझोला थाने की पुलिस अभियुक्तों तक पहुंच ही गई. 20 मार्च, 2014 को ही पुलिस ने राजेंद्र को भी मंडी धनौरा से गिरफ्तार कर लिया. दोनों से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. शेष बचे 5 अभियुक्तों की तलाश में पुलिस उन के संभावित ठिकानों पर दविश डालती रही. लेकिन सफलता नहीं मिली.
पुलिस ने हनु उपाध्याय और बीना वर्मा उर्फ विधि वर्मा के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. इस में उन की लोकेशन राजस्थान के अलवर जिले के थाना रौनेजा क्षेत्र की आ रही थी. एक पुलिस टीम 30 मार्च, 2014 को थाना रौनेजा पहुंच गई.
थाना रौनेजा पुलिस के सहयोग से मझोला थाने की पुलिस ने हनु उपाध्याय और बीना वर्मा को भी गिरफ्तार कर लिया.
थाने ला कर उन से भी गहन पूछताछ की गई तो उन्होंने हत्या की पूरी कहानी उगल दी. दोनों को 31 मार्च, 2014 को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक पुलिस ऊषा वर्मा, मुकेश और प्रेम को तलाश कर रही थी. Hindi Crime Story
— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
— मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित






