Hindi Fiction Story. गरीबी की मार झेल रहे अशोक को एक दिन रास्ते में पाउच में सोने का हार मिला. उस पाउच में एक बिजनैसमैन का विजिटिंग कार्ड भी था. ईमानदारी दिखाते हुए करीब 7 लाख रुपए के हार को अशोक ने उस बिजनैसमैन की कोठी पर जा कर लौटा दिया. अगले दिन कोठी में बिजनैसमैन की हत्या उस की पत्नी ने कर दी. आखिर वह हार उस बिजनैसमैन की हत्या की वजह कैसे बना?

औफिस में 5 बजे चाय पीने के बाद जो बीड़ी पी थी, वही आखिरी थी. क्योंकि बंडल में वही आखिरी बीड़ी थी. घर जाते समय याद कर के बीड़ी का बंडल खरीदना पड़ेगा. अशोक ने सोचा.

वह सिविल लाइंस के एक औफिस में चपरासी की नौकरी करता था. चाय और बीड़ी के अलावा उसे कोई अन्य व्यसन नहीं था. औफिस में मालिक से मिलने रोजाना 5-6 लोग आते थे. मालिक के कहने पर उसे चाय की दुकान से चाय लानी पड़ती थी और इस तरह दिन में 4-5 बार चाय पीने को मिल जाती थी. बीड़ी के लिए पैसे खर्च करने पड़ते थे. औफिस में बीड़ी पीना मना था, इसलिए उस पर नियंत्रण बना रहता था.

शाम 7 बजे छुट्टी होने के बाद उस ने साइकिल की सीट साफ की. टिफिन वाला झोला हैंडिल पर टांगा और बस स्टौप की ओर साइकिल बढ़ा दी. अल्लापुर में वह हैजा अस्पताल के सामने वाली सड़क पर अपनी पत्नी सविता के साथ एक कमरे और रसोई वाले मकान में रहता था.

चमचमाती रोशनियों वाली शानदार कारें तेज रफ्तार से सिविल लाइंस की ओर जाती थीं. यह दृश्य अशोक रोज देखता था.

बीड़ी का बंडल खरीदने के लिए सड़क किनारे एक पान की दुकान तय थी. दूर से वह पान की दुकान दिखाई दी तो अशोक ने साइकिल धीमी कर दी. सिविल लाइंस जाने वाले अमीर लोगों की 2 कारें वहां खड़ी थीं. ड्राइवर कारों में बैठे थे और उन के मालिक पान खाने के लिए दुकान पर खड़े थे. तभी एक टैक्सी वहां आ कर रुकी और उस में से सूटबूट पहने एक युवक उतर कर दुकान पर आया.

रोज के अनुभव से अशोक जानता था कि जो अमीर लोग ड्राइवर नहीं रखते, वे पार्किंग का पैसा बचाने के लिए उबर या ओला से आते हैं.

उस युवक ने जेब से पर्स निकाला, उस में से पैसे दे कर सिगरेट का एक पैकेट खरीदा. एक सिगरेट निकाल कर सुलगाई. वह वहीं खड़ा हो कर सिगरेट पी रहा था कि तभी अशोक भी वहां पहुंच गया.

इतने में युवक का मोबाइल बज उठा. उस ने सिगरेट मुंह में ही दबाए मोबाइल उठा लिया. दूसरी ओर से जो कहा गया, उसे सुन कर वह थोड़ा झुंझला गया और जवाब देने लगा. एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में मोबाइल ले कर वह तेजी से टैक्सी के पास पहुंचा. वहां से ब्रीफकेस उठा कर वापस पान की दुकान के पास आया.

ब्रीफकेस से कागज निकालने के लिए उस ने पास खड़ी एक कार के सहारे ब्रीफकेस खोला. उस में से कागजों का पुलिंदा निकाला और कुछ देख कर सामने वाले व्यक्ति से गुस्से में बात करने लगा. सिगरेट अब भी उस के हाथ में थी. भयंकर गुस्से में उस ने सामने वाले को 2 गालियां दीं.

मोबाइल कोट की जेब में रखा और जल्दबाजी में सारे कागज वापस ब्रीफकेस में ठूंस कर जोर से उसे बंद कर दिया. फिर बिना पीछे देखे लगभग दौड़ता हुआ टैक्सी में बैठा और टैक्सी सिविल लाइंस की ओर रवाना हो गई.

अशोक की नजर पूरे समय उसी पर टिकी हुई थी. उस युवक को पता नहीं चला, लेकिन अशोक ने देखा कि गुस्से में ब्रीफकेस बंद करते समय उस में से कोई चीज नीचे गिर गई थी. अशोक साइकिल स्टैंड पर लगा कर उसे बताने जाए, उस से पहले ही वह युवक जा चुका था.

जो चीज गिरी थी, वह कार के पीछे पड़ी थी, इसलिए न पान की दुकान वाले को और न किसी और को वह दिखाई दी. अशोक आगे बढ़ा. टिफिन वाला झोला उस के हाथ में था. मोबाइल से लगभग डेढ़ गुना आकार का आकर्षक पाउच देख कर उस की आंखें चमक उठीं.

उस ने जानबूझ कर अपना झोला हाथ से नीचे गिरा दिया, फिर झुक कर झोला उठाया और उसी के साथ वह पाउच भी चुपचाप थैले में सरका लिया. बीड़ी खरीद कर वह साइकिल से घर की ओर चल पड़ा.

घर पहुंचते ही सविता ने पूछा, ”खिचड़ी बन गई है. सुबह की सब्जी गरम करने रखी है. आप को अभी खाना है या थोड़ी देर बाद?’’

अशोक ने कोई जवाब नहीं दिया. उस ने थैले से खाली टिफिन निकाल कर बाहर रखा और फिर धड़कते दिल से वह पाउच निकाल कर हाथ में लिया. तभी सविता भी उस के पास आ कर खड़ी हो गई.

पाउच पर सुनहरे अक्षरों में एक जौहरी के शोरूम का नाम छपा था. अशोक पाउच खोल रहा था, तब सविता भी उत्सुकता से उस की तरफ देख रही थी.

पाउच में चमचमाता हुआ सोने का एक नेकलेस था. उस के साथ एक छोटा सा सुगंधित लिफाफा और एक विजिटिंग कार्ड भी रखा था.

सविता फटी आंखों से नेकलेस को देख रही थी. अशोक ने नेकलेस हाथ में ले कर उस के वजन का अंदाजा लगाया और सविता की ओर देखते हुए कहा, ”लगभग 5 तोले का होगा. साढ़े 7 लाख रुपए का माल है.’’

कार्ड पढ़ कर उस ने आगे कहा, ”आयोग रोड पर रहने वाले किसी बड़े आदमी का है. कल सुबह उस के बंगले पर जा कर लौटा दूंगा.’’

इतना कह कर उस ने विस्तार से बताया कि यह पाउच उसे कैसे मिला. सविता ने तुरंत कहा, ”वापस देने की क्या जरूरत है? कोठी वाले किसी बड़े आदमी के लिए 7 लाख रुपए की क्या कीमत होगी? और हमारी हालत कैसी है? मेरे पास तो पहनने लायक एक अच्छी साड़ी भी नहीं है, यह भी सोचो.’’

अशोक गंभीर हो गया, ”सविता, सोना मिलना भी अपशकुन होता है और खोना भी अपशकुन. जब मैं मैट्रिक में पढ़ता था, तब मेरे पिता को हीरे जड़ी सोने की एक छोटी सी अंगूठी मिली थी. मेरी मां ने उन्हें समझाया था कि इसे मंदिर में चढ़ा आओ. हमें यह नहीं रखनी चाहिए. मिला हुआ सोना घर का सर्वनाश कर देता है.

”लेकिन पिता नहीं माने. अंगूठी बेच कर उन्होंने नई साइकिल खरीद ली. 15 दिन बाद एक ट्रक ने उन की साइकिल को टक्कर मार दी. साइकिल चकनाचूर हो गई और पिता की मृत्यु हो गई. मुझे आगे की पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी.’’

सविता के चेहरे पर छाई निराशा देख कर उस ने फिर कहा, ”कल यह गहना वापस कर दूंगा. तब सेठानी खुश हो कर जो भी देंगी, प्रेम से ले लूंगा. हो सकता है सेठ खुश हो कर मुझे अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी भी दे दें. जो वे खुशी से देंगे, वही हमारा हक है, लेकिन यह चीज तो हर हाल में लौटानी ही पड़ेगी.’’

कारण सुनने के बाद सविता ने बिना किसी बहस के पति की बात मान ली.

अगली सुबह अशोक साइकिल ले कर आयोग रोड पहुंच गया. पाउच में नेकलेस, सुगंधित प्रेमपत्र वाला लिफाफा और विजिटिंग कार्ड था, जिस पर पूरा पता लिखा हुआ था.

आमनेसामने शानदार कोठियां बनी हुई थीं. वह 4 नंबर वाली कोठी के गेट पर जा कर खड़ा हो गया. ठीक सामने 17 नंबर वाली कोठी के गेट के पास साढ़े 6 फुट से भी अधिक लंबा एक युवक खड़ा था. उस का ध्यान इस ओर नहीं था.

अशोक ने डोरबेल बजाई. कोठी में काम करने वाली लगभग 50 साल की एक महिला ने दरवाजा खोल कर पूछा, ”किस से मिलना है, भाई?’’

अशोक ने जवाब दिया, ”क्या यह श्रीकांतजी की कोठी है? उन से जरूरी काम है.’’

तभी अंदर से मधुर आवाज आई, ”गंगा, कौन आया है?’’

गंगा ने उत्तर दिया, ”मालकिन, कोई भाई साहब मालिक का नाम ले कर आए हैं.’’

यह सुनते ही मालकिन बाहर आई और अशोक की ओर देखने लगी.

अशोक उस के प्रभावशाली व्यक्तित्त्व को देखता रह गया. लगभग 25 साल की उम्र, स्वस्थ शरीर, दमकती त्वचा, चौड़ा माथा, नुकीली नाक और तीखी आंखें. मालकिन ने मधुर स्वर में पूछा, ”श्रीकांतजी से क्या काम था भाई?’’

अशोक ने कहा, ”कल शाम जब श्रीकांतजी एयरपोर्ट की ओर जा रहे थे, तब पान की दुकान पर उन के ब्रीफकेस से एक चीज गिर गई थी. शायद उन का ध्यान नहीं गया. मैं ने देखा था. मैं दौड़ कर उन्हें देने जाता, उस से पहले ही वह टैक्सी में बैठ कर चले गए थे. अच्छा हुआ कि साथ में उन का पता लिखा हुआ कार्ड था, इसलिए वह चीज लौटाने चला आया.’’

मालकिन ने कहा, ”आइए, अंदर आइए.’’

मालकिन का नाम रत्ना था. रत्ना के पीछेपीछे अशोक ड्राइंगरूम में पहुंचा. ड्राइंगरूम बहुत विशाल था. रत्ना ने सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ”बैठिए.’’

अशोक संकोच के साथ सोफे पर बैठ गया. रत्ना ने गंगा की ओर देख कर कहा, ”इन भाई साहब के लिए एक प्लेट आइसक्रीम ले आइए.’’

गंगा ने पूछा, ”मालकिन, आप भी लेंगी? आप के लिए भी ले आऊं?’’

रत्ना ने सिर हिला कर मना कर दिया. फिर रत्ना ने कहा, ”साहब का स्वभाव ही कुछ लापरवाह है. वह अकसर बहुत सी चीजें कहीं न कहीं भूल आते हैं. ऊपर से कारोबार के सिलसिले में हर महीने 3-4 दिन के लिए मुंबई भी जाना पड़ता है. तब तो वह और भी जल्दी में रहते हैं. अब बताइए, उन्होंने क्या गिरा दिया था?’’

अशोक ने थैले में हाथ डाला ही था कि गंगा आइसक्रीम ले कर आ गई.

रत्ना बोली, ”कोई जल्दी नहीं है भाई. पहले आराम से आइसक्रीम खा लीजिए.’’

अशोक ने आइसक्रीम का कटोरा हाथ में लिया. चौसा आम की आइसक्रीम बहुत स्वादिष्ट थी और कटोरा भी काफी बड़ा था.

आइसक्रीम खातेखाते अशोक सोचने लगा, ”यह रत्नाजी कितनी उदार हैं. बोलने में भी कितनी विनम्र हैं. जब मैं नेकलेस लौटाऊंगा, तब यह इनाम जरूर दिल खोल कर देंगी, लेकिन नकद इनाम लेने से अच्छा होगा कि इन से श्रीकांतजी की कंपनी या औफिस में अच्छी नौकरी दिलाने की बात करूंगा. हो सकता है, उन की कोई फैक्टरी भी हो. मेरी ईमानदारी देख कर रत्नाजी श्रीकांतजी से जरूर कहेंगी. तब मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.’’

कटोरा खाली कर के उस ने मेज पर रखा, थैले में हाथ डाला और उत्साह से वह पाउच निकाल कर रत्ना को दे दिया. उसी समय खाली कटोरा लेने आई गंगा भी वह दृश्य देखने के लिए वहीं ठहर गई. नेकलेस और वह छोटा सा लिफाफा देखते ही रत्ना की आंखें चमक उठीं.

साढ़े 7 लाख रुपए का वह कीमती हार लौटाने आए अशोक को वह आश्चर्य से देखने लगी. गंगा भी आदरभाव से अशोक की ओर देख रही थी.

नेकलेस हाथ में ले कर रत्ना कुछ क्षण मन ही मन सोचती रही. फिर उस ने अशोक की ओर देख कर कहा, ”भाई, आज के जमाने में आप के जैसे इंसान बहुत कम मिलते हैं. आप ने सचमुच बहुत बड़ा काम किया है. बिना किसी संकोच के बताइए, मैं इस उपकार का बदला कैसे चुकाऊं? जितनी रकम चाहिए, बताइए.’’

अशोक ने सहजता से कहा, ”मालकिन, मैं किसी इनाम के लालच में नहीं आया हूं. अपने अनुभव से मानता हूं कि सोना खोना भी अपशकुन है और मिलना भी. इसलिए आप की चीज लौटाने आया हूं. अगर संभव हो तो बस एक काम कर दीजिए. मेरी वर्तमान नौकरी में तनख्वाह बहुत कम है. आप के साहब के औफिस या फैक्ट्री में मैं पूरी मेहनत से काम करूंगा. कृपया मेरी नौकरी की सिफारिश कर दीजिए.’’

नेकलेस और फिर अशोक के भोले चेहरे की ओर देखते हुए रत्ना बोली, ”आज शनिवार है. साहब सोमवार रात को वापस आएंगे. मैं कहूंगी तो वे मना नहीं कर पाएंगे. आप भूलिएगा नहीं, मंगलवार सुबह लगभग 8 बजे यहां आ जाइए. आजकल ईमानदार और सच्चे आदमी कहां मिलते हैं? मंगलवार को जरूर आइए. आप को नौकरी मिल जाएगी.’’

रत्ना को प्रणाम कर के अशोक वहां से विदा हुआ. साइकिल चलाते समय उसे ऐसा लग रहा था मानो उस की साइकिल हवा में उड़ रही हो.

अशोक उत्साह से भरा घर पहुंचा तो सविता उस की राह देख रही थी.

”साढ़े 7 लाख रुपए की चीज तो आप ने लौटा दी.’’ सविता ने पूछा, ”इनाम में उन्होंने आप को क्या दिया?’’

”अरे, बहुत आलीशान कोठी है और सेठानी तो जबरदस्त हैं.’’ अशोक की आवाज में उम्मीद झलक रही थी. ”उन्होंने इनाम मांगने को कहा तो मैं ने साफ कह दिया कि सेठ से कह कर मुझे अच्छी नौकरी दिलवा दीजिए. उन्होंने खुशीखुशी वचन दिया है. मंगलवार सुबह सेठ से मिलूंगा तो उन के औफिस या फैक्ट्री में अच्छी नौकरी सौ प्रतिशत मिल जाएगी. तेजतर्रार रत्ना किसी की कद्र करने में पीछे हटने वालों में से नहीं हैं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ”उन्होंने कहा कि मैं कह दूंगी तो सेठ की हिम्मत नहीं होगी कि मना कर दें.’’

”काश! अगर ज्यादा वेतन वाली नौकरी मिल जाए तो बड़े हनुमान को लड्डू चढ़ाने चलेंगे. इस महंगाई में तुम्हारी इतनी सी तनख्वाह में मैं घर कैसे चलाती हूं, यह मेरा मन ही जानता है. हनुमानजी का नाम ले कर मंगलवार सुबह जरूर पहुंच जाना.’’

शनिवार, रविवार और सोमवार, ये तीनों दिन अशोक और सविता छोटेछोटे भविष्य के सपने बुनते रहे. वेतन बढ़ेगा तो नया पंखा खरीदेंगे, रसोई की मरम्मत करवाएंगे और अगर किस्तों पर मिल गया तो फ्रिज भी ले आएंगे. वर्षों से फ्रिज लेने की इच्छा थी, लेकिन कम वेतन के कारण संभव नहीं हो पाया था.

सविता की स्त्री सुलभ समझ अपने से बेहतर है, यह बात अशोक अच्छी तरह जानता था और उस की सलाह मानता था.

सोमवार की रात सविता अशोक के पास बैठ कर समझाने लगी, ”मेरी बात मानो और जमाने के हिसाब से जीना सीखो. जब तुम नेकलेस लौटाने गए थे, तब कैसे गए थे? औफिस में रोज पहनते हो वही ढीलेढाले कपड़े, 4-5 दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी, पैरों में चप्पल और साइकिल ले कर गए थे, ठीक है न?’’

सविता ने पूछा तो अशोक ने हां में सिर हिला दिया.

”लेकिन कल जब सेठ से मिलने जाओगे तो उस तरह अस्तव्यस्त हो कर मत जाना.’’ सविता ने प्यार से आदेश दिया, ”होली पर जो नया शर्टपैंट खरीदा था, वही पहनना. तुम्हारे जूते भी मैं ने मरम्मत करवा दिए हैं, वही पहन कर जाना. सुबह जल्दी उठ कर अच्छे से तैयार होना, तब जाना. सेठ तुम्हें देखें तो तुम्हारी अच्छी छाप पड़े. अगर ऐसे ही अस्तव्यस्त जाओगे तो चपरासी की ही नौकरी देंगे. मेरी बात समझ रहे हो? कहना कि मुझे हर तरह का काम आता है, क्लर्क का काम करने में भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

अशोक ने माना कि सविता की सलाह बिलकुल सही है. मंगलवार की सुबह वह सविता के बताए अनुसार तैयार हो कर 8 बजे आयोग रोड की आलीशान कोठी वाली सोसाइटी में पहुंच गया.

श्रीकांत के बंगले के पास का दृश्य देख कर अशोक उलझन में पड़ गया. यह सब क्या है, उसे कुछ समझ में नहीं आया. रोड के सभी कोठी वाले श्रीकांत की कोठी के सामने भीड़ लगाए खड़े थे. गेट के पास एक एंबुलेंस और पुलिस की 2 जीपें खड़ी थीं. बंगले के गेट पर 3 पुलिस कांस्टेबल किसी को भी अंदर नहीं जाने दे रहे थे. यह सब क्या हुआ होगा? बंगले में क्या घट गया?

हिम्मत कर के अशोक आगे बढ़ा और भीड़ में शामिल हो गया. सब के चेहरों पर गजब की उत्सुकता और जिज्ञासा थी. बगल में खड़े एक अधेड़ व्यक्ति के कंधे पर हलके से हाथ रख कर अशोक ने पूछा, ”क्या हुआ है? पुलिस क्यों आई है?’’

उस व्यक्ति ने गरदन घुमा कर अशोक की ओर देखा, ”हमें भी पूरी जानकारी नहीं है. बस इतना पता चला है कि श्रीकांतजी का मर्डर हो गया है.’’ सामने वाले बंगले की ओर देखते हुए उस ने कहा, ”श्रीकांत के सामने जो ललित लंबू रहता है, उसे सब मालूम होगा. कारोबार में उस की श्रीकांत से प्रतिस्पर्धा थी. फिर दोनों के यहां काम करने वाली नौकरानी भी एक ही है, इसलिए उसे घर की रत्तीरत्ती खबर रहती होगी. हम भी उसी के बाहर आने का इंतजार कर रहे हैं. वही पूरी बात बताएगा. खैर, हत्या का मामला है, इसलिए पुलिस तो आएगी ही.’’

यह सुन कर अशोक के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई. श्रीकांत की हत्या हो गई तो अब नौकरी की बात तो भूल ही जानी चाहिए. फिर भी अगर रत्ना दया कर के कहीं कोई व्यवस्था कर दें तो शायद कुछ बात बन जाए. वह गहरी निराशा में डूब गया.

उसी समय सामने वाले बंगले से वही लंबा युवक बाहर निकला. जब अशोक पाउच लौटाने आया था, तब भी उस ने उसे देखा था. युवक के बाहर आते ही सब लोग उसे घेर कर खड़े हो गए. एक साथ सवालों की बौछार होने लगी तो उस ने हाथ उठा कर सब को शांत रहने का इशारा किया.

सभी शांत हो कर उस की ओर देखने लगे. अशोक भी अधिक साफ सुनने के लिए धीरेधीरे आगे बढ़ता हुआ उस के बिलकुल पास जा कर खड़ा हो गया. उस लंबे युवक ने कहना शुरू किया, ”कल रात करीब डेढ़ बजे श्रीकांतजी की हत्या हो गई. …और उन की हत्या किसी दूसरे ने नहीं, बल्कि स्वयं रत्ना ने ही की है.’’

भीड़ में एकदम सन्नाटा छा गया. किसी को भी इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. सब के चेहरों पर आश्चर्य साफ दिखाई दे रहा था.

”गलती तो श्रीकांत की ही थी.’’ लंबे युवक ने आगे कहा, ”मुंबई में उन्होंने एक रखैल रखी हुई थी. हर महीने 4-5 दिन वह उस के पास जाते थे और रत्ना से कह देते थे कि कारोबार के काम से उन्हें मुंबई जाना पड़ता है.’’

थोड़ी देर रुक कर वह सब की ओर देख कर फिर बोला, ”हमारे यहां काम करने वाली गंगा पहले चौबीसों घंटे मेरे बंगले में रहती थी. बाद में श्रीकांत ने उसे दोगुनी तनख्वाह दे कर अपने यहां रख लिया. फिर भी झाड़ूपोंछा, बरतन और कपड़े धोने का काम करने वह आज भी मेरे यहां आती है. अभी वह बहुत घबराई हुई मेरी पत्नी के साथ हमारे घर में बैठी है. जो कुछ हुआ, वह सब उस ने अपनी आंखों से देखा है.

”रत्ना को श्रीकांत के मुंबई वाले रिश्ते का कभी पता नहीं चलता, लेकिन पिछले शुक्रवार को जब श्रीकांत एयरपोर्ट जा रहा था, तब उस की गलती से अपनी प्रेमिका को देने के लिए खरीदा गया 5 तोले का सोने का नेकलेस रास्ते में गिर गया. उसी पाउच में वह प्रेमपत्र भी था, जो उस ने अपनी रखैल के लिए लिखा था और उस का विजिटिंग कार्ड भी रखा था.

”एक गरीब युवक को वह पाउच मिल गया. उस ने बड़ी ईमानदारी और खानदानी दिखाते हुए वह पाउच श्रीकांत के बंगले में ला कर रत्ना के हाथों में सौंप दिया. उस समय गंगा भी वहीं मौजूद थी.

”रत्ना तो राजपूत परिवार की बेटी हैं. एक ही क्षण में उन्हें सब समझ में आ गया, लेकिन उस समय उन्होंने जहर का घूंट पी लिया. उस गरीब युवक की ईमानदारी देख कर वह भावुक हो गई थीं. उन्होंने उसे इनाम देने की बात कही, लेकिन उस ने नौकरी मांगी. तब रत्ना ने उसे आज यानी मंगलवार की सुबह आने के लिए कहा था.’’

सब की ओर देख कर वह फीकी मुसकान के साथ बोला, ”बेचारा शायद आज सुबह आया भी होगा, लेकिन यह सब देख कर निराश हो कर लौट गया होगा.

”सोमवार की रात 10 बजे जब श्रीकांत मुंबई से लौटे, तब रत्ना रणचंडी का रूप धारण कर के उन का इंतजार कर रही थीं. गंगा भी डर कर एक कोने में खड़ी हो गई थी. रत्ना ने श्रीकांत की शर्ट का कौलर पकड़ लिया और भयंकर क्रोध में उस के सामने वह नेकलेस और प्रेमपत्र दिखा कर पूछा, ”यह औरत कौन है?’’

”भेद खुल जाने के बाद भी श्रीकांत बेहया बन गए. उन्होंने साफसाफ स्वीकार कर लिया कि उन का मुंबई जाना आगे भी चलता रहेगा. रत्ना ने उस पर हाथ उठाया तो जवाब में श्रीकांत ने भी मारपीट शुरू कर दी.

रत्ना ने चेतावनी दी, ”मुझ पर हाथ उठाना बंद कर दो, नहीं तो अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’ लेकिन श्रीकांत नहीं रुके. रत्ना ने दूसरी बार चेतावनी दी, ”अब अगर हाथ उठाया तो मैं तुम्हें मार डालूंगी.’’

श्रीकांत ने हंसते हुए कहा, ”जो करना है कर ले.’’ इतना कह कर उन्होंने फिर एक तमाचा मार दिया.

”तब रत्ना घायल शेरनी की तरह रसोई में गईं, लोहे का मूसल उठाया और श्रीकांत के सामने आ कर खड़ी हो गईं. श्रीकांत जैसे उन का मजाक उड़ा रहा हो, वैसे हंसा और फिर उन्हें थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया. उसी क्षण रत्ना ने अपने पूरे शरीर की ताकत दोनों हाथों में समेट कर वह भारी लोहे का मूसल पूरी शक्ति से श्रीकांत के सिर पर दे मारा. नारियल फूटने जैसी भयानक आवाज हुई. श्रीकांत की खोपड़ी चकनाचूर हो गई और वह लहूलुहान हो कर वहीं जमीन पर गिर पड़े.’’

यह कहानी सुनने वाले सभी लोग हैरान रह गए. लंबा युवक वही बता रहा था, जो गंगा ने अपनी आंखों से देखा था. उस ने आगे कहा, ”खून से सने हाथों के साथ स्वयं रत्ना ने ही 108 एंबुलेंस पर फोन किया और गंगा के सामने हाथ जोड़ कर कहा कि सब को यही कहना कि वे सीढिय़ों से गिर गए थे.’’

गंगा घबरा गई थी, लेकिन उस की अंतरात्मा जाग उठी. उस ने भी हाथ जोड़ कर कहा, ”मालकिन, पुलिस पूछेगी तो मैं वही कहूंगी, जो मैं ने अपनी आंखों से देखा है.’’

इस के बाद रत्ना ने अपने भाई को फोन कर के बुला लिया. उन के भाई ने आ कर गंगा को एक लाख रुपए देने की पेशकश की, लेकिन उस ने साफ मना कर दिया. तब रकम बढ़ा कर 10 लाख रुपए देने का लालच दिया और कहा, ”आप को तो बस इतना कहना है कि आप वहां मौजूद ही नहीं थीं, बाकी सब मैं संभाल लूंगा.’’

लेकिन गंगा ने दृढ़ स्वर में कहा, ”श्रीकांत जब छोटा था, तब मैं ने उसे अपनी गोद में खिलाया है. उस का ऐसा अंत… मैं झूठ नहीं बोल सकती.’’

उस गरीब औरत ने 10 लाख रुपए का लालच भी ठुकरा दिया. पुलिस अधिकारी के सामने जो कुछ हुआ था, उस की पूरी सच्चाई बता दी और उस के बाद मेरे बंगले में आ कर बैठ गई है.

लंबे युवक ने निराशा से सिर हिलाते हुए कहा, ”पुलिस को प्रत्यक्षदर्शी गवाह मिल गया है, इसलिए अब रत्ना का जेल जाना तय है. सोने का नेकलेस लौटाने आए उस गरीब युवक ने अनजाने में ही श्रीकांत को मौत के मुंह तक पहुंचा दिया.’’

इतने में 2 महिला पुलिसकर्मियों के बीच रत्ना बाहर आईं और पुलिस की जीप में बैठ गईं. पीछे स्ट्रेचर पर श्रीकांत का शव रखा गया और पुलिस पोस्टमार्टम के लिए उसे एंबुलेंस में ले कर चली गई.

अपनी साइकिल से घर लौट रहा अशोक असहनीय पीड़ा से भीतर ही भीतर टूट रहा था. वह बारबार यही सोच रहा था, ”काश, मैं ने सविता की बात मान कर वह नेकलेस अपने पास ही रख लिया होता तो यह इतनी दुखद घटना कभी नहीं घटती.’’ Hindi Fiction Story

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