Expressway Scams . विकास के नाम पर बिछाए जा रहे चमचमाते हाईवे और एक्सप्रैसवे आज महज भ्रष्टाचार का स्मारक बन कर रह गए हैं. विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर का दंभ भरने वाली ये सड़कें जब पहली ही बारिश में धंसने और दरकने लगती हैं तो सिस्टम की खोखली नींव बेनकाब हो जाती है. कमीशनखोरी और घटिया निर्माण सामग्री के इस नापाक गठजोड़ ने जनता के टैक्स की गाड़ी कमाई को सीधे गड्ढों में झोंक दिया है. सवाल यह है कि आखिर कब तक ‘कमीशन का घुन’ विकास को खोखला कर जनता की जान से यूं ही खेलता रहेगा?
भारत में विकास को रफ्तार देने वाली नई हाईवे और एक्सप्रैसवे की हालत बनने के कुछ दिनों बाद ही जगहजगह खस्ता हो गई. कुछ सड़कें तो एक भी बारिश को नहीं झेल पाईं और धंस गईं या गड्ढों से भर गईं. आखिर क्यों टूट रहै हैं हाईवे? इन के निर्माण, सरकार की नीतियां और विभागीय अनियमितताओं से जुड़े कई सवाल हैं. इन घोटालों का दोषी कौन है? जबकि देश के 1.39 लाख किलोमीटर लंबे हाईवे एक्सप्रैसवे से सरकार को रोजाना 192 करोड़ यानी सालाना 70 हजार करोड़ रुपए की कमाई हो रही है.
उत्तर प्रदेश (यूपी) के 2 बड़े शहरों लखनऊ और कानपुर को जोडऩे वाली करीब 63 किलोमीटर की हाईवे बनाई गई, जबकि करीब 93 किलोमीटर की दूरी वाली दोनों बड़े शहरों के बीच पहले से ही बेहतर सड़कें थीं. नई हाईवे का निर्माण भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई द्वारा किया गया. इस पर करीब 4,200 करोड़ रुपए की लागत आई. एक्सप्रैसवे नाम के साथ तर्क दिया गया कि यह दोनों शहरों के बीच का सफर आसान और समय बचाने वाला होगा.
इस के 13 जुलाई, 2026 को धूमधड़ाके के साथ उद्ïघाटन के 12-13 दिन बाद 26 जुलाई को उन्नाव के कोरारी क्षेत्र, लगभग किलोमीटर 64 के पास कानपुर से लखनऊ जाने वाली लेन में सड़क की ऊपरी परत के अलकतरे उखड़ गई. इस पर दरजनों जगह गड्ढे हो गए हैं. कई जगह लंबी दरारें आ गईं. यह इस एक्सप्रैसवे की पहली क्षति थी.
एनएचएआई ने मरम्मत कर यातायात को सही करने की कोशिश की. इस के बाद जुलाईअगस्त में बारिश से अन्य हिस्सों में भी अलकतरे उखडऩे, गिट्टी अलग होने और शोल्डर यानी किनारों के प्रभावित होने की रिपोर्टें आईं. बाद की रिपोर्टों में दरजनों स्थानों पर सतह उखडऩे, धंसाव और असफल मरम्मत की बात सामने आई.
एनएचएआई ने इसे गंभीरता से लेते हुए टोल बंद किया, ठेकेदार और इंजीनियरों पर काररवाई की, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कदम उठाए और आईआईटी खडग़पुर के विशेषज्ञों से इस की जांच कराई.
इस पर एनएचएआई ने सख्ती के साथ 5 अगस्त, 2026 को बड़ी काररवाई करते हुए इस की निर्माता कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक को कारण बताओ नोटिस के साथ उस पर 2 फीसदी जुरमाना लगाने का प्रस्ताव दिया गया. जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ 3 वर्ष तक प्रतिबंधित काररवाई शुरू करने की बात कही गई.
प्रभावित हिस्से की मरम्मत कंपनी के खर्च पर कराने का आदेश दिया गया, जिस का अनुमानित खर्च लगभग 3 करोड़ रुपए बताया गया. फिर भी कई स्थानों पर नई खराबियां आती रहीं, जिस में हाईवे का धंसना भी था.
यूपी का दूसरा सब से चर्चित हाईवे गंगा एक्सप्रैसवे पर दरारों की भी शिकायतें आईं. उन्नाव में गंगा एक्सप्रैसवे के एक्सपेंशन जौइंट के किनारे सड़क धंसने की तसवीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी हैं. यह उन्नाव के दही क्षेत्र का है. बशीरतगंज के पास सराय कटियान नहर पुल के नजदीक गंगा एक्सप्रैसवे पर एक्सपेंशन जौइंट के किनारे दरार दिखाई दी. ढलान पर कई जगह नालियां भी टूटी मिलीं.
इस एक्सप्रैसवे से पहले 12 हजार करोड़ रुपए की लागत से बने दिल्लीदेहरादून एक्सप्रैसवे के निर्माण में लगातार खामियां सामने आईं. कहीं सड़क धंस गई. कहीं फ्लाईओवर के लेंटर से पानी टपकने लगा तो कई जगह दरारें आ गईं. इस का इसी साल 14 अप्रैल, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकार्पण किया था.
इस हाईवे ने महज साढ़े 3 महीने के भीतर ही दम तोड़ दिया. एक्सप्रैसवे पर कार की रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित है, जबकि यात्रियों का कहना है कि यहां 50-60 की स्पीड से भी चलना मुश्किल है, क्योंकि ज्यादा स्पीड पर झटके लगने लगते हैं.
खराबी की वजह
तेजी से बनने वाले हाईवे एक्सप्रैसवे के जल्द खराब होने के कई कारण हैं. उन में खराब या कहें गलत डिजाइन, निर्माण में कम गुणवत्ता वाली सामग्री का इस्तेमाल और ठेकेदारों व इंजीनियरों द्वारा बरती गई लापरवाही से ले कर विभागीय हेराफेरी और घोटाला शामिल है.
खराब डिजाइन में ट्रैफिक, मिट्टी, जल निकासी और बाढ़ का सही आकलन का नहीं होना है. सीएजी ने इस बारे में एनएचएआई की कुछ परियोजनाओं में फर्क का पता किया है. इस का असर सीधे खर्च पर पड़ता है और सड़क की लागत बढ़ जाती है, जिसे विभागीय अधिकारी रिश्वत ले कर अतिरिक्त खर्च दर्ज कर देते हैं.
गलत डिजाइन से निर्माण जल निकासी की खराब व्यवस्था से पानी सड़क की परतों में घुसने से उस की पत्थर या ईंट से बनाई गई तली कमजोर हो जाती है, जिस से बारिश में सड़कों का धंसाव बढ़ जाता है.
सड़क निर्माण में गलत डिजाइन के साथ जब इस्तेमाल की जाने वाली निर्धारित मानकों से कम गुणवत्ता की गिट्टी, बिटुमेन, मिट्टी आदि का इस्तेमाल होता है, तब सड़क और भी कमजोर बन जाती है.
गुणवत्ता परीक्षण और निरीक्षण में कमी का खुलासा सीएजी की विभिन्न राज्यों की रिपोर्टों में अनिवार्य गुणवत्ता नियंत्रण जांच और उस के लिए बनी लेबोरेट्री से जुड़ी कमियों से हो चुका है.
साथ ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने कुछ प्राधिकरण की अधिकतर परियोजनाओं में ठेकेदारों द्वारा रखरखाव में लापरवाही को पाया. उन के द्वारा नियमित निगरानी की अनेदखी और कई तरह की कमियां पाई गईं.
डिजाइन में खामियों के चलते ओवरलोडिंग और अत्यधिक यातायात प्रभावित हो गया. जैसे डिजाइन क्षमता से अधिक भारी वाहन से सड़क की तली तक की उम्र कम कर सकते हैं. अगर जमीन और पर्यावरण संबंधी समस्याओं को ध्यान में रख कर डिजाइन नहीं किया गया, तब सड़क के खराब बनने की आशंका और भी बढ़ जाती है.
उद्ïघाटन के बाद पहली बारिश भी नहीं झेलने वाली लखनऊकानपुर एक्सप्रैसवे के बारे में हाईवे इंजीनियरिंग को समझने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि किसी सड़क की मजबूती सिर्फ ऊपर दिखाई देने वाली असफाल्ट यानी तारकोल (डामर) या कंक्रीट की परत से तय नहीं होती, बल्कि सड़क के नीचे कई परतें होती हैं. अगर सड़क के नीचे पानी पहुंच जाता है और जल निकासी यानी ड्रेनेज ठीक नहीं है तो मिट्टी की परत धंसने लगती है और भारी ट्रैफिक के दबाव में सड़क धंस जाती है. इस के लिए जरूरी है कि सड़क बनाने से पहले वहां डाली गई मिट्टी बिलकुल ठोस हो जाए.
कई बड़ी सड़क परियोजनाओं का हिस्सा रहे सिविल इंजीनियर दिनेश कुमार ने मीडिया को बताया कि जल्दबाजी में सड़क के नीचे डाली गई मिट्टी और परतों को ठीक से दबाया नहीं जाता, जिस से अंदर नमी या एयर पाकेट्स रह जाते हैं. भारी मानसूनी बारिश के दौरान पानी सड़क के बेस तक रिस जाता है, जिस से मिट्टी अपनी पकड़ खो देती है और सड़क बैठने लगती है. इन सब के लिए समय चाहिए होता है, लेकिन अकसर देखने में आता है कि उद्ïघाटन की जल्दबाजी और तय डेडलाइन के चक्कर में जरूरी तकनीकी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर दी जाती है.
लखनऊकानपुर एक्सप्रैसवे में आई दरार घटिया निर्माण के पीछे की बड़ी वजह बताई गई. दिल्लीदेहरादून एक्सप्रैसवे के मामले में एनएचएआई ने सड़क धंसने के बाद खुद स्वीकार किया है कि इस के पीछे असली समस्या ड्रेनेज की रही. ड्रेनेज तभी नुकसान पहुंचाता है, जब मिट्टी खोखली हो यानी पूरी तरह से ठोस न हो पाई हो. हालांकि दिल्लीदेहरादून एक्सप्रैसवे के मामले में एनएचएआई ने निर्माण गुणवत्ता को प्राथमिक कारण मानने से इनकार किया है.
एनएचएआई की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि स्थानीय जलभराव और स्थायी क्रास ड्रेनेज सिस्टम के चालू नहीं हो पाने के कारण सड़क की सतह धंसी.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही एक तथ्य सड़कों और पुलों के धंसने और ढहने के लिए जिम्मेदार है. तकनीकी खामियों के अलावा निर्माण परियोजनाओं में भ्रष्टाचार और कमजोर निगरानी भी एक गंभीर सवाल बना हुआ है. सड़क परियोजनाओं से जुड़े अफसर सीधे तौर पर कहते हैं कि जल्दबाजी के अलावा सिस्टम में नीचे से ले कर ऊपर तक जो भ्रष्टाचार चल रहा है, वह निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है.
कई बार ऐसी खामियां सड़क बनवाने वाले ठेकेदारों पर डाल दी जाती हैं, लेकिन जानकारों के मुताबिक जिम्मेदारी केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं की जा सकती, बल्कि डिजाइन, गुणवत्ता नियंत्रण, साइट निरीक्षण और भुगतान की मंजूरी से जुड़े दूसरे स्तर भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं.
लखनऊकानपुर एक्सप्रैसवे की परियोजना से ही जुड़े एक बड़े अधिकारी का कहना है कि सड़क की खामी के पीछे भ्रष्टाचार की कहानी भी है. नाम नहीं छापने का आग्रह करने वाले अधिकारी के अनुसार हाईवे या एक्सप्रैसवे या किसी भी प्रोजेक्ट में सिर्फ ठेकेदार ही जिम्मेदार नहीं होता, बल्कि डिजाइन कंसल्टेंट, हाईवे अथौरिटी के इंजीनियर्स, अन्य इंजीनियर्स, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सिस्टम इत्यादि सभी की भूमिका होती है.
यदि किसी सड़क में खराब सामग्री का इस्तेमाल हुआ, मिट्टी को ठीक से दबाने का काम नहीं हुआ या डिजाइन के मुताबिक परतें नहीं बिछाई गईं तो यह केवल ठेकेदार की गलती नहीं रह जाती. काम की निगरानी पर भी सवाल उठता है.
कई मामलों में यह सवाल भी उठता है कि ऊंची परियोजना लागत के बावजूद निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और काम की गुणवत्ता पर पर्याप्त निगरानी क्यों नहीं हो पाती? अगर निर्माण सामग्री या सड़क की अलगअलग परतें तय मानकों के मुताबिक नहीं हैं तो उस का असर सड़क बनने के कुछ समय बाद ही सामने आ सकता है.
सीएजी की कई औडिट रिपोर्टों में हाईवे परियोजनाओं में कौंट्रैक्ट मैनेजमेंट, निर्माण और ठेकेदारों को अनुचित लाभ से जुड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं. महाराष्ट्र की 4 हाईवे परियोजनाओं की एक सीएजी औडिट में एनएचएआई की ओर से ठेकेदारों को करीब 203 करोड़ रुपए का अनुचित लाभ दिए जाने का जिक्र है. ऐसी रिपोर्टें यह सवाल जरूर उठाती हैं कि परियोजनाओं में सिर्फ निर्माण करने वाले ठेकेदार की नहीं, बल्कि टेंडर से ले कर निरीक्षण और भुगतान तक पूरी व्यवस्था की जवाबदेही कितनी प्रभावी है.
उत्तर प्रदेश के सड़क निर्माण कार्य पर सीएजी के कुछ मामलों में तकनीकी रूप से अयोग्य ठेकेदारों को सही ठहराने और उन के सरकारी अधिकारियों से मिलीभगत होने के संकेत दर्ज किए. उसी सीएजी की रिपोर्ट में रियायत और अनुचित लाभ तथा सड़क गुणवत्ता की उपेक्षा का उल्लेख किया गया है.
इस कारण अतिरिक्त खर्च बढ़ा. एनएचएआई की 23 पीपीपी परियोजनाओं में बदलाव किए जाने से 856.80 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च हुए, जिस में 662.53 करोड़ रुपए अधूरे काम से संबंधित थे.
कानपुरलखनऊ एक्सप्रैसवे को ले कर उठे सवालों के बीच कंपनी और राजनीति के बीच एक पारिवारिक कड़ी भी चर्चा में आ चुकी है. परियोजना का ठेका पाने वाली कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक के सीएमडी प्रदीप कुमार जैन, बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन के बड़े भाई हैं. नवीन जैन के चुनावी हलफनामे में पीएनसी इंफ्राटेक में उन की हिस्सेदारी भी दर्ज है. हालांकि नवीन जैन खुद इस बारे में कोई बातचीत नहीं करते.
उपलब्ध दस्तावेजों से यह साबित नहीं होता कि कंपनी को यह ठेका उस के राजनीतिक संबंधों की वजह से मिला. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक पीएनसी इंफ्राटेक ने प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में सब से कम बोली लगा कर परियोजना हासिल की थी, फिर भी कंपनी और सत्तारूढ़ दल के एक सांसद के बीच यह पारिवारिक और आर्थिक संबंध इस सवाल को जरूर महत्त्वपूर्ण बनाता है कि इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं में हितों के टकराव से बचने और निगरानी को स्वतंत्र रखने के लिए व्यवस्था कितनी मजबूत है.
पुरानी बनाम नई सड़क
सड़क की मजबूती को ले कर एक दूसरा सवाल भी है. यदि सड़क निर्माण में तकनीकी मानकों, मिट्टी की कसावट और जल निकासी की इतनी अहम भूमिका है तो देश में कई दशक पुराने हाईवे और सड़कें आज भी इस्तेमाल में हैं, इस संबंध यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या पहले सड़कें बेहतर बनती थीं या अब बदले निर्माण के तरीके का असर है?
हाईवे इंजीनियरिंग के जानकारों के मुताबिक इस की कोई एक वजह नहीं है. पुरानी और नई सड़कों की तुलना करते समय सड़क का डिजाइन, उस पर पडऩे वाला ट्रैफिक, रखरखाव, निर्माण सामग्री और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होता है, लेकिन एक बड़ा फर्क यह है कि आज सड़क निर्माण की परियोजनाएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं और उन्हें कम समय में पूरा करने का दबाव भी ज्यादा है.
किसी एक्सप्रैसवे की मजबूती उस के निर्माण के बाद नहीं, बल्कि निर्माण के दौरान तय होती है. यदि निर्माण के विभिन्न चरणों में जल्दबाजी होती है तो ऊपर से बनी सड़क कुछ समय तक बिलकुल ठीक दिखाई दे सकती है, लेकिन बारिश और भारी यातायात के बाद उस की कमजोरियां सामने आने लगती हैं. इस के अलावा अब देश में ऐसे इलाकों में भी बड़े एक्सप्रैसवे बनाए जा रहे हैं, जहां मिट्टी, भूजल, बारिश और भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं. ऐसे में पुराने डिजाइन प्रारूपों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ड्रेनेज और डिजाइन तैयार करने चाहिए.
दरअसल, सड़क की ऊपरी परत सब से पहले दिखाई देती है, इसलिए टूटने पर नजर भी उसी पर जाती है. लेकिन सड़क की असली मजबूती उस के नीचे छिपी परतों, जल निकासी यानी ड्रेनेज, मिट्टी की कसावट, डिजाइन और निगरानी से तय होती है. इसलिए अगर नई सड़क कुछ महीनों में टूटती है तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि डामर खराब था या नहीं. असली सवाल यह है कि सड़क बनने के बाद क्यों पता चलता है कि उस के निर्माण के दौरान कहीं कुछ गलत हुआ था.
अब टूटी सड़क को घोटाले के नजरिए से देखना होगा या फिर भ्रष्टाचार का परिणाम कहना सही नहीं होगा. हकीकत तो यह है कि यह सब मिलाजुला घोटाला है, जिस की जांच तो होती है, लेकिन सड़क निर्माण में सुधार होता नजर नहीं आता है.
किस राज्य में कितने हाईवे
देश के अलगअलग राज्यों में एक्सप्रैसवे और नैशनल हाईवे की संख्या अलगअलग है. सब से अधिक 12 एक्सप्रैसवे उत्तर प्रदेश में हैं. इन में एक नैशनल एक्सप्रैसवे (ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रैसवे) और 4 अर्बन और बाईपास एक्सप्रैसवे शामिल हैं.
महाराष्ट्र में सब से ज्यादा 102 नैशनल हाईवे हैं, जिन की लंबाई 18,462 किलोमीटर के लगभग है. दूसरे नंबर पर 91 हाईवे के साथ उत्तर प्रदेश आता है. इस के बाद 53 हाईवे के साथ राजस्थान, तमिलनाडु में 50 और कर्नाटक में 49 हाईवे हैं.
भारत में 2014-2026 के दरम्यान प्रमुख हाईवे घोटालों के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं—
- 2014: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, सड़क परिवहन और राजमार्ग (एनएचएआई) अधिकारी का यह मामला एक अधिकारी बृजमोहन गुप्ता से जुड़ा है. उन दिनों वह वह शिवपुरी (मध्य प्रदेश) में विभाग मेंटनेंस यूनिट के मैनेजर (टैक्निकल) पद पर थे. उन पर सीबीआई ने 16 मई, 2014 को भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया था.
उन पर एक कंप्यूटर औपरेटर को नौकरी से नहीं हटाने के बदले में 4 हजार रुपए रिश्वत मांगने का आरोप लगा था. सीबीआई काररवाई में यह रकम लेते हुए पकड़े गए थे, जिस की 7 नवंबर, 2014 चार्जशीट दाखिल हुई थी. अदालत का फैसला आने पर सितंबर 2023 में भोपाल की स्पैशल सीबीआई सेल ने उन्हें दोषी ठहरा कर 4 साल के कारावास और 5 हजार रुपए जुरमाने की सजा दी थी.
इस मामले को हाईवे का घोटाला नहीं माना गया, बल्कि संसद में सरकार ने इसे रिश्वत का मामला बताया, जो शुरुआती एनएचएआई भ्रष्टाचार मामलों में से एक था.
- 2015: पंजाब में एनएचएआई के लिए जमीन अधिग्रहीत के मुआवजे का फरजीवाड़ा. विजिलेंस जांच में 48.35 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी सामने आई. इसी साल महाराष्ट्र के एक मामले में राजमार्ग प्राधिकरण अधिकारी द्वारा एनओसी दिलाने के नाम पर 25 हजार रुपए की रिश्वत मांगी गई. 22 हजार स्वीकार करने का मामला बना और मामला सीबीआई कोर्ट में गया. इस मे प्रोजेक्ट डायरेक्टर को 3 वर्ष की सजा हुई.
- 2016: राजस्थान में प्राधिकरण ठेकेदार से भुगतान जारी करने के लिए 3.49 लाख रुपए की रिश्वत मांगी गई. मामला जोधपुर की सीबीआई कोर्ट में गया. इस में प्रोजेक्ट मैनेजर को 6 वर्ष के कठोर करावास की सजा मिली.
- 2017: उत्तराखंड के एनएच-74 निर्माण में कृषि भूमि को गैरकृषि दिखा कर भूमि अधिग्रहण मुआवजा कई गुना बढ़ाने का आरोप लगा, जो लगभग 300 करोड़ रुपए का था. राज्य एसआईटी जांच कई अधिकारियों पर गिरी.
- 2017: सीडीएम स्मिथ-एनएचएआई रिश्वत मामला सामने आया. हाईवे डिजाइन और सुपरविजन कौंट्रेक्ट पाने के लिए कथित तौर पर करीब 6-7 करोड़ रुपए अमेरिकी न्याय विभाग ने काररवाई के बाद भारत में हाईवे प्राधिकरण द्वारा जांच की गई. बाद में सीबीआई द्वारा एफआईआर हुई.
- 2017: तमिलनाडु के इस मामले में हाईवे प्राधिकरण के प्रोजेक्ट डायरेक्टर पर 2 लाख रिश्वत मांगने का आरोप लगा. सीबीआई ने गिरफ्तार किया. उस के बाद 2025 में विशेष सीबीआई कोर्ट ने 4 वर्ष कठोर कारावास की सजा दी.
- 2018: सीबीआई स्मिथ के इस मामले में रिश्वत ट्रांजैक्शन की औपचारिक सीबीआई जांच हुई. 1.18 मिलियन डौलर यानी करीब 11 करोड़ 30 लाख रुपए के संबंध में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की. मामला बेंगलुरु में चला.
- 2019: रांचीजमशेदपुर एनएच-33 के लिए प्रोजेक्ट फिनांस में राउंड ट्रिपिंग और मोबिलाइजेशन एडवांस की डाइवर्जन और कम प्रोग्रेस के प्रोजेक्ट की लागत 1,655 करोड़ रुपए. लोन करीब 1,029 करोड़ रुपए का था. इस मामले में सीबीआई केस बना. हाईवे प्राधिकरण ने रियायत को खत्म कर दिया. बाद की अदालत की काररवाई में एएफआईओ (गंभीर कपट अन्वेषण कार्यालय) भी दर्ज किया गया.
- 2019: असम एनएच-37, सिवासागर के लिए जमीन अधिग्रहण में हेराफेरी का लगभग 300 करोड़ का आरोप सीबीआई जांच के दायरे में आ गया. गोहाटी हाईकोर्ट ने 2019 में सरकार, सीबीआई और एनएचएआई को नोटिस दिया.
- 2019: चंडीगढ़लुधियाना एक्सप्रैसवे के फरजीवाड़े में 3 लोगों पर मुआवजे का लाभ देने का आरोप लगा. कुल 1.23 करोड़ रुपए की जांच शुरू हुई.
- 2021: तमिलनाडु में जमीन अधिग्रहण का फरजीवाड़ा सामने आया. फरजी पता और कागजात के जरिए हाईवे से मिलने वाले मुआवजा हासिल करने का आरोप लगा. कम से कम 200 करोड़ रुपए के भुगतान की जांच की गई. राज्य जांच में बड़े पैमाने पर फरजी दस्तावेज सामने आने के दावे के बाद मामले को सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की गई.
- 2021: जम्मू एनएचएआई के रखरखाव और मरम्मत और सुधारने का टेंडर 9 करोड़ रुपए से अधिक का एक प्राइवेट फर्म को दिया गया. हाईवे अधिकारी व प्राइवेट फर्म के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई.
- 2022: हाईवे ठेकेदार के घोटाले का मामला आया. इस केस में प्राधिकरण के 9 अधिकारियों पर मासिक रिश्वत लेने और बिल एवं खाते में हेराफेरी के आरोप लगे.1-2 लाख रुपए महीने की रिश्वत के आरोप में सीबीआई ने 22 आरोपियों को नामजद किया.
- 2022: बिहार के इस एनएच-31 के मामले में बिल की हेराफेरी, घटिया सामान लगाने और हाईवे की माप में गड़बड़ी पाई गई. 10 लाख रुपए के रिश्वत के आरोप के साथ सीबीआई केस दर्ज हुआ.
इसी साल पटना के एनएचएआई में बिल और माप की हेराफेरी के बदले 5 लाख रुपए की रिश्वत का मामला पकड़ में आया. तलाशी में सीबीआई ने 60 लाख रुपए नकद के साथ एनएचएआई सीजीएम को पकड़ा.
- 2023: एनएचएआई घोटाले के मामलों के बारे में विभिन्न परियोजनाओं में लिप्त भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई मामले की बात दिसंबर 2025 के लोकसभा उत्तर में स्वीकारी गई.
- 2024: नागपुर में हाईवे करप्शन ठेकेदारों के जरिए किए गए बिल की हेराफेरी, सड़क बनाने के फरजी सार्टिफिकेट बनवाने और काम को आगे बढ़ाने के एवज में 48.5 लाख रुपए के रिश्वत देने का आरोप लगा. जांच और छानबीन में लगभग 1.1 करोड़ रुपए नकद में बरामद हुए. 8 गिरफ्तारियां हुईं. इस के आरोपी हाईवे प्राधिकरण अधिकारी बने.
- 2025: बिहार में एनएचएआई ठेकेदार केस बिल की हेराफेरी, मापबुक में गड़बड़ी को सही बनाने के बदले में रिश्वत का खेल चला. सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की. कई करप्शन केस दर्ज हुए. विभिन्न अधिकारियों पर गाज गिरी.
दिसंबर 2025 के लोकसभा उत्तर में 2022, 2023, 2024 और 2025 के कई सीबीआई केस की चर्चा हुई.
- 2026: भारतमाला-रायपुर- विशाखापत्तनम कारीडोर छत्तीसगढ़ के लिए जमीन मुआवाजे का फरजीवाड़ा हुआ. बढ़ा कर राशि देने के इस मामले में ईडी के अनुसार वास्तविक देय 56.76 लाख के मुकाबले आरोपी परिवार को लगभग 9.83 करोड़ रुपए दिए गए. जून 2026 में इस मामले में जय प्रकाश गांधी को गिरफ्तार किया गया.
2026 में ही कानपुरलखनऊ एक्सप्रैसवे उद्ïघाटन के कुछ ही समय बाद क्रैक होने के बाद निर्माण की गुणवत्ता पर पर सवाल उठे, जबकि प्रोजेक्ट 4,200 करोड़ रुपए का था. इसे गुणवत्ता विवाद बताया गया, जो अपने आप में सिद्ध घोटाला नहीं माना गया.
इस तरह हाईवे और एक्सप्रैसवे बनाने के नाम पर संबंधित विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से जम कर सरकारी पैसों का बंदरबांट किया जा रहा है, जो गहरी चिंता का विषय है. Expressway Scams






