Love Story in Hindi. मुझे अफरोज को देख कर ही प्यार हो गया था. चाहता था कि वह मेरी जिंदगी में आ जाए. ऐसा शायद हो भी जाता, पर एक छोटी सी गलतफहमी की वजह से ऐसा न हो सका. उस गलतफहमी का मुझे 19 साल बाद पता चला, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.   

उन दिनों मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में थी. छोटीछोटी तंग गलियों और गंदे जरजर मकानों से घिरा यह मोहल्ला उन शरीफ लोगों का था, जो अपनी इज्जत का भरम रखने के लिए दरवाजों पर टाट या कपड़े के परदे टांग दिया करते थे.

इस से पहले मेरी ड्यूटी कई अच्छे इलाकों में रही थी, इसलिए इस इलाके में मेरी कोई खास रुचि नहीं थी. सच कहूं तो मेरा सारा दिन बोरियत भरा गुजरता था.

डाक विभाग में आए मुझे अधिक समय नहीं हुआ था. उम्र भी 19-20 साल से अधिक नहीं थी. चूंकि खुदा ने शक्लसूरत भी अच्छी दी थी, इसलिए कई लड़कियां मेरी ओर आकर्षित हो जाती थीं. उम्र के उस नाजुक दौर में कभीकभी मेरा झुकाव भी लड़कियों की ओर हो जाया करता था.

अब्बा डाक विभाग में क्लर्क थे. मैं ने मैट्रिक कर लिया तो उन्होंने मुझे अपने विभाग में क्लर्क बनवाने की कोशिश की, लेकिन वहां कोई जगह खाली नहीं थी, इसलिए उन्होंने मुझे पोस्टमैन बनवा दिया था. मैं ने कभी किसी ऊंची नौकरी का सपना नहीं देखा था. न ही पढ़नेलिखने के मामले में तेज था.

मैं जानता था कि अब्बा जैसी ही कोई नौकरी करनी पड़ेगी, इसलिए मैं डाकिए की नौकरी पा कर संतुष्ट था. शुरूशुरू में तो मुझे अपना काम बहुत अच्छा लगा. विभाग की ओर से मुझे साइकिल नहीं मिली थी, इसलिए मैं पैदल ही डाक बांटता था. डाक देते वक्त मेरा दरवाजे पर दस्तक देने का एक खास अंदाज था. साथ ही मुझे आवाज भी लगानी पड़ती थी, ‘पोस्टमैन’.

फिर मुझे साइकिल मिल गई, जिस की खास घंटी मेरे आने की सूचना होती थी. कभी मैं किसी के लिए खुशी का समाचार लाता और कभी दुख का. कुछ लोग मेरा इंतजार बड़ी बेचैनी से करते और कुछ लोग डाक लेते हुए भी कसमसाते.

पौश इलाकों में आमतौर से गेट के बाहर लेटरबौक्स लगा होता था, लेकिन मध्यमवर्गीय इलाकों के लोग दरवाजे पर आ कर डाक लेते थे. दोपहर के समय अकसर घर पर लड़कियां होती थीं, जो मुझे देख कर आपस में कानाफूसी करती थीं. कुछ तो मुझे देख कर फिकरे भी कसतीं. पहले तो मैं चुप रहा, लेकिन बाद में मैं एकाध को जवाब देने लगा था.

बाद में जब मेरी ड्यूटी मोहल्ला उस्मानाबाद में लगी तो मुझे बोरियत सी हुई. मेरी आदत थी कि साइकिल की घंटी बजाने के बाद दरवाजा खुलने का इंतजार किए बिना मैं खत को दरवाजे की झिर्री से अंदर फेंक देता था. इस की वजह यह थी कि कभी कोई दरवाजे पर आता भी तो वह गंदा सा बच्चा होता था या मैलीकुचैली सी कोई औरत.

एक दिन मैं गली नंबर 2 से गुजर रहा था कि 7वें मकान के सामने एकदम ठिठक गया. साइकिल की चाल कम हो गई और मैं भूल गया कि मैं कोई आम युवक नहीं, बल्कि डाक विभाग का एक जिम्मेदार पोस्टमैन हूं. वह घर जिस के दरवाजे पर चिक पड़ी हुई थी, दूसरे घरों के मुकाबले में कुछ अच्छी हालत में थी. उस चिक से एक चांद जैसे चेहरे वाली लड़की झांक रही थी. मुझे आते देख कर उस का सुंदर गुलाबी चेहरा फूल की तरह खिल उठा.

मेरे होंठों पर भी हलकी सी मुसकराहट आ गई. मगर अगले ही क्षण यह सोच कर कि वह मेरा इंतजार क्यों करने लगी, मैं उदास हो गया. मेरा इंतजार भला कौन करता है, सब को अपनेअपने खतों का इंतजार रहता है.

मैं ने सिर झुकाया और उस के दरवाजे के सामने से गुजर गया. वह भी अंदर चली गई. शायद दुखी हो कर, क्योंकि उस की डाक नहीं थी.

जाने क्यों वह लड़की मुझे अच्छी लगी. काले रेशमी बाल और गुलाबी चेहरे वाली वह लड़की जैसे मेरे सपने में दुलहन बन के उतर आई. शायद इसलिए कि अम्मी जब भी मेरी होने वाली पत्नी की बात करती थी तो मैं ऐसी ही लड़की की कल्पना करता था.

अब मैं रोजाना गली नंबर 2 से गुजरते हुए उस चिक वाले दरवाजे को जरूर देखता, मेरी साइकिल की घंटी सुन कर वह भी गली में झांकती. पलभर के लिए हम एकदूसरे को देखते और फिर मैं सिर झुकाए दरवाजे के सामने से गुजर जाता. वह भी अंदर चली जाती. उस के दरवाजे पर लगी सफेद नेमप्लेट पर मैं ने मलिक फजल लिखा देखा था.

मैं सोचता था कि कभी मलिक साहब का खत आए तो उस चिक वाली के ठीक से दर्शन हो जाएं, लेकिन ऐसा लगता था जैसे उन्हें कोई खत लिखता ही नहीं था. धीरेधीरे मुझे लगने लगा कि मेरे सपनों में बसने वाली वह लड़की वास्तव में मेरा इंतजार करती है. यह सोच कर मैं हवाओं में उड़ने लगता.

फिर अचानक एक दिन मुझे झटका सा लगा. दरअसल मैं डाकखाने से खत ले कर निकलते समय बिना वजह ही गली नंबर 2 के सातवें मकान का खत ढूंढा करता था. उस दिन मैं ने उस्मानाबाद की डाक देखी तो चौंका.

उस दिन की डाक में मकान नंबर 7 का एक खत था, लेकिन वह खत मलिक फजल के लिए नहीं अफरोज के नाम था. मैं समझ गया कि उस लड़की का नाम अफरोज है.

गुलाबी रंग का वह लिफाफा अफरोज के उस प्रेमी का रहा होगा, जिस के खत का वह इंतजार करती है. मैं ने सोचा, मैं भी कितना पागल हूं, वह इंतजार किसी और का करती थी और मैं समझ रहा था कि वह मेरा इंतजार करती है.

मैं ने लिफाफा उलटपलट कर देखा. उस पर कराची की ही मोहर थी. इस का मतलब था कि वह इसी शहर में कहीं रहता था. खत के कोने पर भेजने वाले का नाम वीए लिखा था. अगले दिन मैं डाक ले कर उस्मानाबाद गया तो वह दरवाजे पर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी. चिक से झांकती हुई उस की काली आंखों में इंतजार के जलते दीप साफ नजर आ रहे थे.

आज मेरी हार्दिक इच्छा पूरी होने जा रही थी, लेकिन दिल उदास था. जिसे मैं चाहता था, वह किसी और को चाहती थी. मैं ने उस के दरवाजे के सामने साइकिल रोकी और डाक के थैले से वह खत निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया. उसे खत देते हुए मेरी अंगुलियां कांप रही थीं और नजर उस के चेहरे पर थी. उस ने खत ले कर मुझे ऐसी निगाह से देखा, जैसे मैं ने जीवन का सब से बड़ा उपहार उसे दे दिया हो.

अगले दिन फिर वैसा ही खत अफरोज के नाम आया. उस ने उसी बेचैनी के साथ खत ले कर मुझे धन्यवाद दिया और मैं ने साइकिल आगे बढ़ा दी. अब हर दिन ऐसा होने लगा. मैं ने सोचा हो सकता है कि अफरोज और उस के प्रेमी ने आपसी सहमति से तय किया हो कि वे रोजाना एकदूसरे को खत लिखेंगे. जरूर वह भी रोज उसे इसी तरह एक खत भेजती होगी.

यह जानने के बाद भी कि वह किसी और को चाहती है, मेरे दिल में बनी उस की सूरत मिट नहीं सकी. अम्मा जब भी मेरी शादी की बात करती तो अफरोज की छवि मेरी आंखों में उतर आती.

कभीकभी मेरा दिल चाहता कि मैं उस का खत खोल कर पढ़ लूं, लेकिन मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर सका, क्योंकि यह अपराध था. आने वाली डाक पहुंचाना मेरी सरकारी ड्यूटी थी. बिना इजाजत किसी का खत पढ़ने का मुझे कोई हक नहीं था.

लगातार कई महीने तक खत आने से लिफाफे पर लिखा रहने वाला साफसुथरा पता मेरी आंखों में बस गया था. मैं मन ही मन सोचता था कि खत लिखने वाला भी अफरोज की तरह ही सुंदर होगा. फिर एक दिन अचानक एक अजीब घटना घटी.

उस दिन सुबह से ही बादल छाए थे. मैं डाक ले कर निकला तो फुहारें पड़ रही थीं. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि तेज बारिश होने लगेगी. मैं जल्दी से घर वापस लौटने का इरादा कर के उस्मानाबाद पहुंच गया. तब तक तेज बरसात होने लगी थी. पूरी तरह भीग जाने के बावजूद मैं सीधा उस के दरवाजे पर जा कर रुका.

डाक में उस दिन भी उस के नाम का लिफाफा था. मैं ने सोचा, मुझे भीगता देख कर वह अंदर आने के लिए कहेगी और अगर मौका मिला तो मैं उस के सामने अपना हालेदिल बयां कर दूंगा. मैं उस से कहूंगा कि मेरे जैसा प्यार करने वाला उसे कहीं नहीं मिलेगा. लेकिन जैसे ही मेरी साइकिल की घंटी बजने पर दरवाजे की चिक उठी, मेरे सारे अरमानों पर ओस पड़ गई.

चिक हटाने वाला एक बूढ़ा आदमी था. वह अफरोज का पिता भी हो सकता था, इसलिए मैं गुलाबी रंग का लिफाफा हाथ में दबाए सोच रहा था कि वह उसे दूं या न दूं. तभी उस के पिता के कंधों के ऊपर मुझे उस की काली आंखें दिखाई दीं, जिन्हें देख कर ऐसा लगा जैसे वह लिफाफा न देने की विनती कर रही हो.

एक क्षण के लिए मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं, लेकिन मैं तुरंत ही संभल कर बोला, ‘‘चचा मियां, बारिश का बड़ा जोर है. क्या आप..?’’

‘‘हां..हां आओ, आओ बेटा.’’ बुजुर्ग ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही बड़े प्यार से कहा और पीछे हट गया. वह बुजुर्ग अफरोज के पिता ही थे, मलिक साहब.

मैं अंदर चला गया. अंदर छोटा सा कमरा था, जिस में एक ओर चारपाई पर सफेद बिस्तर बिछा था और दूसरी ओर एक मेज के पास 2 कुर्सियां पड़ी थीं. मलिक साहब ने एक कुरसी मेरी ओर खिसका दी और दूसरी पर खुद बैठ गए.

‘‘बेटा अफरोज, अंगीठी जला कर ले आओ.’’ उन्होंने जोर से पुकारा. फिर मेरी ओर प्यार से देख कर बोले, ‘‘इस मौसम का भी कोई भरोसा नहीं, सुबह जब मैं दुकान पर गया था तो मौसम साफ था. फिर हलकीहलकी बूंदाबांदी होने लगी, लेकिन इस तरह अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.’’

इस के बाद वह इधरउधर की बातें करते रहे. इसी बीच अफरोज अंगीठी ले आई. बातोंबातों में जब उन्होंने कहा कि आजकल अच्छे लड़कों की कमी है तो मैं ने कहना चाहा कि मैं अच्छा लड़का हूं और आप का बोझ हलका करना चाहता हूं. लेकिन चाह कर भी मैं कुछ नहीं कह सका.

मलिक साहब बाप की हैसियत से अफरोज की बात कर रहे थे. उन्होंने बताया कि एक बेटी के अलावा उन की कोई औलाद नहीं है. कुछ समय पहले पत्नी की मौत हो गई थी. जमाना खराब है और बेटी अकेली, इसलिए उसे घर में ही रखते हैं. बाहर आनेजाने पर भी पाबंदी लगा रखी है.

मैं यह सोच कर दिल ही दिल में हंस रहा था कि वह अपनी बेटी के इश्क के बारे में कुछ नहीं जानते. साथ ही मन को तसल्ली भी दे रहा था कि उन की बेटी ने जिस का चुनाव किया होगा, वह मुझ से अच्छा ही होगा. मेरे मन ने चाहा कि मैं उन से कहूं कि चचा मियां, आप चिंता न करें. अफरोज ने आप का बोझ खुद ही हलका कर दिया है.

एक पल के लिए मन में खयाल भी आया कि मलिक साहब के सामने खुद को पेश कर दूं. लेकिन मैं ऐसा न कर सका. क्योंकि ऐसा करना एक तरह से जबरदस्ती होती. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो किसी से प्यार करती थी.

‘‘बेटा अफरोज, चाय बना ला.’’ मलिक साहब ने कहा तो वह किचन में चली  गई.

कुछ देर बाद वह चाय बना लाई. तभी मलिक साहब को खांसी उठी और वह थूकने के लिए बाहर चले गए. उसी वक्त मैं ने चुपके से गुलाबी लिफाफा उस के हाथ पर रख दिया. लिफाफा ले कर वह मेरी ओर देख कर मुसकराई और अंदर चली गई.

अधिकतर डाकियों की कईकई साल तक एक ही जगह ड्यूटी रहती थी, लेकिन शायद मैं नौकरी में नया था या अफरोज से रोज मिलना मेरे भाग्य में नहीं था. जो भी हो, जल्दी ही मेरी ड्यूटी उस्मानाबाद से बदल कर जौहराबाद में लगा दी गई.

अब साधारण डाक के अलावा मुझे रजिस्ट्री और मनीआर्डर बांटने का काम भी दे दिया गया था. वक्त के साथ सालों बीत गए. इस बीच मेरी शादी हो चुकी थी. जबतब ड्यूटी भी बदलती रहती थी. लेकिन मैं अफरोज को कभी नहीं भूल सका.

मैं अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ रहते हुए कभीकभी सोचता था कि अगर अफरोज ने मुझ से प्यार किया होता तो हम दोनों कितने खुश होते. अब तो वह न जाने किस घर में बैठी राज कर रही होगी. पता नहीं कौन था वह, जिसे वह चाहती थी. मुझे उस की किस्मत से ईर्ष्या होती थी. क्योंकि वह न होता तो मैं अपने सपनों की उस रानी को जरूर पा लेता जो आज भी मेरे दिल में बसी हुई थी.

19 साल बाद की बात है. एक दिन उस्मानाबाद का पोस्टमैन बीमार हो गया तो अपने इलाके के अलावा मुझे उस्मानाबाद की डाक भी बांटने के लिए दे दी गई. उस्मानाबाद के नाम पर मुझे अफरोज की याद आ गई. मन उस से मिलने, उसे देखने को मचल उठा. इसलिए सब से पहले मैं ने उस्मानाबाद की डाक में गली नंबर 2 के 7वें मकान की डाक ढूंढने की कोशिश की, लेकिन मुझे उस पते का कोई खत नहीं मिला.

मुझे यह सोच कर खुद पर हंसी आ गई कि 19 साल बीत गए, पता नहीं अफरोज कहां होगी. कितने बच्चों की मां होगी और मैं आज भी उसे देखने, उस से मिलने की सोच रहा हूं. बहरहाल, पता नहीं क्याक्या सोचते हुए मैं उस्मानाबाद पहुंच गया.

सालों बाद जानीपहचानी गलियों से गुजरते हुए मुझे खुशी भी हो रही थी और अफरोज की याद भी आ रही थी. मैं सोच रहा था कि वह अपने अब्बू की एकलौती बेटी थी, इसलिए मलिक साहब का पुश्तैनी मकान उसी को मिला होगा. अगर उस ने और उस के पति ने मकान बेचा नहीं होगा तो संभवत: वह उसी मकान में रह रही होगी.

अगर ऐसा हुआ तो उस के दर्शन हो सकते थे. मैं उसे एक नजर देखना चाहता था, उस के पति को भी और शायद बच्चों को भी. लेकिन मेरे पास कोई बहाना नहीं था, उस मकान का दरवाजा खटखटाने का.

मैं सोच में डूबा आगे बढ़ रहा था. मोड़ से घूम कर जब मैं ने मकान नंबर 7 के सामने जा कर साइकिल की घंटी बजाई तो अंदर से अधेड़ उम्र की औरत ने चिक हटा कर बाहर झांका, तब तक मैं आगे बढ़ गया था. उस ने पीछे से आवाज दी, ‘‘ओ भैया डाकिए, कोई चिट्ठी है क्या मेरी?’’

मैं ने पीछे मुड़ कर देखा, खिचड़ी बालों और ढलती उम्र के बावजूद उसे पहचानने में मुझे जरा भी देर नहीं लगी. वह अफरोज ही थी, जो अपनी उम्र से 10-15 साल ज्यादा की लग रही थी. मैं लौट कर उस के पास आ गया. मेरे अंदर आंधियां सी चल रही थीं, दिल बैठा जा रहा था. मुझे जैसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. मैं ने आह सी भरते हुए पूछा, ‘‘तुम अफरोज ही हो न?’’

‘‘हां, और तुम वही जो मेरे गुलाबी खत लाया करते थे?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा, जैसे यकीन न हो रहा हो.

‘‘हां, वही हूं.’’ मैं ने डूबे से स्वर में कहा.

‘‘इतने दिन बाद मिले हो, चाय तो पीते जाओ. मुझे अच्छा लगेगा.’’ उस ने आग्रहपूर्वक कहा तो मैं साइकिल खड़ी कर के अंदर चला गया. मेरे मन में उस गुलाबी खत वाले को देखने की इच्छा थी, जो अफरोज का शौहर बना होगा और जिस की वजह से उस की यह हालत हुई होगी.

अंदर घर का हाल 19 साल पहले जैसा ही था. कहीं कोई बदलाव नहीं, अफरोज ने मुझे बैठने के लिए कुरसी दी. मैं ने इधरउधर देखा. घर में न कोई बच्चा था, न कोई और. वह चाय बनाने जाने लगी तो मैं ने पूछ लिया, ‘‘वह गुलाबी खत वाले साहब नजर नहीं आ रहे अफरोज?’’

अफरोज ने एक ठंडी सांस ली, फिर बोली, ‘‘वह खत तो मैं खुद ही लिखती थी, अपने खत अपने लिए.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’

‘‘ताकि तुम खत पहुंचाने आओ और मैं एक नजर तुम्हें देख सकूं. मुझे प्यार हो गया था तुम से, मुझे पता नहीं था कि प्यार इतना खतरनाक होता है.’’

मुझे काटो तो खून नहीं, मैं बुत बना बैठा रहा. अपने शब्दों से मेरी चुप्पी का ताला उस ने ही खोला, ‘‘चाह कर भी कभी कह नहीं सकी, शायद अब्बा की वजह से. सोचती थी, किसी न किसी दिन कहूंगी जरूर. लेकिन तुम ने आना ही बंद कर दिया.’’

मुझ में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी, पर उस की बात सुनने के बाद सदमे से निकलने के लिए कुछ कहना तो था ही, सो बोला, ‘‘तुम्हारे अब्बा तुम्हें ले कर चिंतित रहते थे. मुझ से तुम्हारी शादी के बारे में जिक्र भी किया था उन्होंने. मेरे मन में उम्मीद भी जगी थी और मैं उन से बात भी करना चाहता था, लेकिन यह सोच कर चुप रह गया था कि तुम तो गुलाबी खत वाले से प्यार करती हो, रोजाना खत लिखता है वह तुम्हें.’’

‘‘नहीं, कोई नहीं था मेरी जिंदगी में तुम्हारे अलावा.’’ उस ने नजरें झुका कर दुखी स्वर में कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘तुम ने शादी की या नहीं?’’

‘‘नहीं, यह सोच कर बरसों तक तुम्हारा इंतजार करती रही कि शायद तुम फिर लौट कर आओगे, पर तुम नहीं आए. फिर अब्बा नहीं रहे तो अकेली रह गई. धीरेधीरे यह सोच कर इंतजार करना भी छोड़ दिया कि तुम ने अपनी गृहस्थी बसा ली होगी. गुजरबसर तो करनी ही थी, सो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी. अब तो अपने आप को ही भूल गई हूं.’’

मेरी आंखों से आंसुओं का झरना फूटने को तैयार था और वह दरिया की तरह शांत थी. अचानक उस ने पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है? देखा, प्यार तो कर लिया पर नाम कभी नहीं पूछा. मौका ही कहां मिला था.’’

‘‘अशरफ.’’

हिम्मत नहीं थी, जरूरत भी नहीं. फिर भी मैं ने सवाल किया, ‘‘अब भी प्यार करती हो मुझ से?’’

‘‘नहीं, न तुम से न अपने आप से. अब मैं सिर्फ उन बच्चों से प्यार करती हूं, जो मेरे पास पढ़ने आते हैं. किसी के प्यार की निशानी हैं.’’

मैं बुझे दिल से उठा और साइकिल उठा कर निकल आया मोहब्बत वाली उस गली से.  Love Story in Hindi

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