Jaipur Crime Story. शफकत चाहती थी कि इकबाल जयपुर आ कर उस के साथ रहे, जबकि इकबाल को लगता था कि शफकत का जयपुर में किसी से प्रेम संबंध है, इसलिए वह जयपुर में रहने की जिद कर रही है. एकदूसरे को समझ न पाने की वजह से जो कुछ भी हुआ, वह दुखद ही था.
अदालत के आदेश पर बीवी पर गोली चलाने वाले इकबाल को जेल पहुंचाने आई पुलिस टीम उसे जेल स्टाफ को सौंपने के लिए लिखापढ़ी की काररवाई कर रही थी, तभी थाना रामगंज के थानाप्रभारी रामकिशन बिश्नोई के रीडर जगदीश चौधरी ने इकबाल को जो बताया, उसे सुन कर उस का चेहरा सफेद पड़ गया. उस की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे.
जेल में ऐसा होना आम बात है. लेकिन इकबाल का मामला कुछ अलग तरह का था. वह नासमझ नहीं, पढ़ालिखा इंसान था. दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय से एम.फिल. कर रहा था. पढ़ालिखा और समझदार होने के बावजूद उस ने गुस्से में बीवी को एक नहीं, 2 गोलियां मार दी थीं. उस ने गोलियां ऐसी जगह मारी थीं, जिस से वह मरे न, लेकिन वह मर गई थी.
इस बात की जानकारी इकबाल को तब तक नहीं थी. उसे यही मालूम था कि उस का अस्पताल में इस इलाज चल रहा है. यही वजह थी कि जेल स्टाफ को सौंपते समय जब रीडर जगदीश चौधरी ने उसे बताया कि उस की बीवी शफकत मर चुकी है तो वह सन्न रह गया था.
बीवी की मौत के बारे में जान कर इकबाल की आंखों से आंसू बहने लगे थे. उस के दोनों हाथ दुआओं के लिए उठ गए थे. इस के बाद हथेली से आंसू पोंछते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं शफकत से बहुत प्यार करता था और शायद इतना ही प्यार हमेशा करता रहूंगा. आप मेरे सासससुर से कहिएगा कि वे उस की कब्र पर कोई निशान लगा कर रखेंगे. मैं जेल से बाहर आऊंगा तो बाकी की जिंदगी उसी की कब्र पर बिताऊंगा. क्योंकि अब मैं सिर्फ उसी का हो कर रहना चाहता हूं. मैं अपने सासससुर से भी दूर नहीं रहना चाहता. ताउम्र उन से नाता बनाए रखना चाहता हूं.’’
जयपुर (उत्तर) के थाना रामगंज की पुलिस ने इकबाल को 19 अगस्त को अपनी बीवी शफकत को गोली मारने के आरोप में गिरफ्तार किया था. लेकिन अस्पताल पहुंचतेपहुंचते शफकत की मौत हो गई थी. पुलिस ने इकबाल को अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था.
उस की मनोस्थिति को देखते हुए पुलिस ने उसे यह नहीं बताया था कि शफकत अब इस दुनिया में नहीं रही. बीवी की मौत के बारे में जानकारी न होने की वजह से इकबाल रिमांड अवधि के दौरान खुदा से शफकत के जल्द से जल्द ठीक होने की दुआएं मांगता रहा.
लेकिन रिमांड अवधि खत्म होने पर अदालत के आदेश पर इकबाल को न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो उसे जेल पहुंचाने आई पुलिस टीम में शामिल रीडर जगदीश चौधरी ने जब उसे बताया कि शफकत अब इस दुनिया में नहीं रही तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘आप झूठ बोल रहे हैं. ऐसा कैसे हो सकता है. उस ने साथ जीने और मरने की कसमें खाई थीं. वह मुझे इस तरह छोड़ कर नहीं जा सकती. सासससुर ने शफकत को मेरे साथ नहीं भेजा, इसीलिए मैं ने उसे गोली मारी थी. मुझे पता नहीं था कि इस तरह वह मेरा साथ छोड़ देगी.’’
इकबाल की बातें सुन कर पुलिस वालों को भी उस पर दया आ गई थी. पुलिस वालों ने इकबाल को समझाबुझा कर शांत किया और उसे जेलकर्मियों के हवाले कर दिया. जेल वाले उसे बैरक में ले गए. जेल की बैरक में पहुंच कर इकबाल अपनी मोहब्बत की दुनिया में खो गया. उस की आंखों के सामने शफकत से प्यार, निकाह और बेटे अथर के पैदा होने से ले कर गोली मारने तक की पूरी घटना फिल्म की तरह चलने लगी.
हरियाणा के नूंह जिले की पुन्हाना तहसील के गांव बिछोर के रहने वाले याकूब खां के बड़े बेटे इकबाल ने गांव से इंटर पास कर के आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया था.
जिन दिनों इकबाल एमए कर रहा था, उस की जानपहचान अब्दुल्ला से हुई. लखनऊ का रहने वाला अब्दुल्ला इकबाल से सीनियर था. उस समय वह जामिया से ही पीएचडी कर रहा था, साथ ही वह किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता भी था.
अब्दुल्ला से इकबाल की जानपहचान हुई तो वह उसी के साथ उसी के कमरे में रहने लगा. साथ रहने की वजह से दोनों की दोस्ती और गहरी हो गई तो वे अपनेअपने परिवारों तथा दुखदर्द के साथसाथ दुनियाजहान की बातें करने लगे.
अब्दुल्ला के रिश्ते के एक भाई शमशाद अहमद जयपुर में रहते थे. मूलरूप से वह उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना नांगल सोती के गांव सबलपुरा बीतरा के रहने वाले थे. सन 2008 में वह अपने परिवार के साथ जयपुर आ गए थे और वहां वह रामगंज स्थित रैगरों की कोठी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे.
शमशाद अहमद एमए पास थे, लेकिन उन्होंने नौकरी करने के बजाय व्यवसाय को महत्व दिया. जयपुर में उन्होंने हल्दियों का रास्ता में बच्चों के कपड़ों की दुकान खोली, जो बढि़या चल रही है. दुकान से उन्हें ठीकठाक आमदनी होती थी, जिस से वह आराम की जिंदगी बसर कर रहे थे. वह खुद पढ़ेलिखे थे, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों की भी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया. शमशाद की 6 संतानों में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. शफकत उन की दूसरे नंबर की बेटी थी. उस का पूरा नाम था शफकत खानम.
अब्दुल्ला और इकबाल में जब कभी घरपरिवार और नातेरिश्तेदारों की बातें होतीं तो कभीकभी शमशाद अहमद की बेटी शफकत का भी जिक्र हो जाता. शफकत जयपुर के वैदिक कन्या कालेज से बीएससी कर रही थी. उसी बीच अब्दुल्ला के साथ इकबाल भी एकदो बार जयपुर घूमने गया.
चूंकि वहां अब्दुल्ला भाई के घर रुकता था, इसलिए दोस्त होने के नाते इकबाल भी वहीं रुकता था. इसी आनेजाने और घर में रुकने की वजह से इकबाल और शफकत खानम के दिलों में एकदूसरे के लिए चाहत पैदा हो गई. इस के बाद कभीकभी इकबाल से मिलने के लिए शफकत अपने चाचा अब्दुल्ला के पास दिल्ली आने लगी.
अब तक दोनों एकदूसरे से काफी खुल चुके थे. अब्दुल्ला को दोस्त पर विश्वास था, इसलिए वह शफकत को उस के साथ अकेली छोड़ कर चला जाता था. ऐसे में ही एक दिन इकबाल और शफकत शाहरुख खान की फिल्म ‘बाजीगर’ देख रहे थे तो टीवी स्क्रीन पर गाना आया, ‘किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुम ने, मगर कोई चेहरा भी तुम ने पढ़ा है..?’ इस लाइन के पूरा होते ही शफकत ने इकबाल की कलाई थाम कर शरारत भरे अंदाज में कहा, ‘‘क्या तुम ने भी किसी का चेहरा पढ़ा है?’’
इकबाल उस की शरारत को समझ गया. इसलिए गाने की लय से लय मिलाते हुए बोला, ‘‘पढ़ा है, मेरी जां नजर से पढ़ा है…’’
अब भला शफकत क्यों चुप रहती. उस ने गाने को आगे बढ़ाया, ‘‘बता, मेरे चेहरे पर क्याक्या लिखा है?’’
इस तरह शरारतशरारत में मोहब्बत का इजहार हो गया तो कभी इकबाल शफकत से मिलने जयपुर जाने लगा तो कभी शफकत उस से मिलने दिल्ली आने लगी. इन मुलाकातों में दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए भविष्य के सपने बुनने लगे.
इकबाल और शफकत का प्यार जब इतना गहरा हो गया कि वे जुदा होने के नाम पर घबराने लगे तो एक दिन इकबाल ने हंसते हुए कहा, ‘‘शफकत, तुम मेरे चक्कर में कहां पड़ रही हो? शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं पहले से ही शादीशुदा हूं. मेरी एक बेटी भी है. लेकिन मेरी बीवी मुझ से अलग रहती है, जिस के लिए मुझे गुजाराभत्ता देना पड़ता है.’’
शफकत अब तक इकबाल के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उस की इन बातों पर उसे विश्वास नहीं हुआ, इसलिए इस बात को मजाक समझ कर वह उस के साथ जिंदगी के सुनहरे सपने बुनती रही. दोनों के दिल एकदूसरे के लिए मचल रहे थे. इकबाल शफकत से बेपनाह मोहब्बत करने लगा था, इसलिए एक दिन उस ने अपने दिल की बात अब्दुल्ला से कह दी, ‘‘दोस्त, आप की भतीजी शफकत से मुझे प्यार हो गया है. मैं उस से निकाह करना चाहता हूं. आप अपने भैया से बात करो.’’
अब्दुल्ला को इस निकाह से कोई ऐतराज नहीं था. इकबाल और शफकत पढ़ेलिखे और समझदार थे. दोनों ही अपना अच्छाबुरा सोचनेसमझने लायक थे. इसलिए दोनों के निकाह में उसे कोई बुराई नजर नहीं आई. इस के बाद अब्दुल्ला जयपुर गया तो उस ने भाई शमशाद से शफकत और इकबाल के रिश्ते की बात चलाई. थोड़ी नानुकुर के बाद शमशाद ने इस रिश्ते की मंजूरी दे दी.
इकबाल के पहले निकाह की बात जब अब्दुल्ला को ही नहीं मालूम थी तो शमशाद को कैसे मालूम होती. शफकत से उस ने कहा था तो उस ने इसे मजाक समझा था, इसलिए उस के पहले निकाह की बात राज ही बनी रही. शमशाद अहमद के हामी भरने के बाद 23 दिसंबर, 2012 को इकबाल और शफकत का निकाह दिल्ली में हो गया.
इस निकाह में शफकत के घर वालों के साथ रिश्तेदार भी शरीक हुए थे, लेकिन इकबाल के घर वालों के साथ केवल कुछ दोस्त ही आए थे. शफकत के घर वालों ने इस बात पर ज्यादा तूल नहीं दिया, क्योंकि अब्दुल्ला और इकबाल में अच्छी दोस्ती थी, इसलिए सब को यही लगा था कि वह उसे अच्छी तरह जानता होगा. उस के व्यवहार से भी वाकिफ होगा.
निकाह के बाद इकबाल अपनी बेगम शफकत को गांव बिछोर ले गया. बिछोर में रहते हुए भी शफकत को इकबाल के पहले निकाह की जानकारी नहीं हो सकी. जबकि सच्चाई यह थी कि उस का हरियाणा के नूंह की ही रहने वाली साजिदा से 26 मई, 2006 को निकाह हो चुका था. 2 साल बाद साजिदा ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिस का नाम इकबाल ने सदर रखा था.
बेटी के जन्म के कुछ दिनों बाद इकबाल और साजिदा के बीच जमीन नाम कराने को ले कर मनमुटाव हो गया. यह मनमुटाव इतना बढ़ा कि साजिदा ने इकबाल और उस के घर वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस ने इकबाल, उस के वालिद याकूब खां और मां जमीला को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. यह दिसंबर, 2008 की बात थी.
बाद में सभी जमानत पर रिहा हुए. इस के बाद पारिवारिक न्यायालय के आदेश पर इकबाल को साजिदा को हर महीने 3 हजार रुपए गुजाराभत्ता देना पड़ रहा था.
शफकत गांव बिछोर में ही रह रही थी, जबकि इकबाल दिल्ली रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था. बीचबीच में वह गांव भी जाता रहता था. 2-4 बार वह शफकत को भी दिल्ली ले आया. जयपुर शहर में रह कर पढ़ीलिखी शफकत को उम्मीद थी कि पढ़ाई पूरी होने के बाद इकबाल की नौकरी लग जाएगी तो वह उस के साथ दिल्ली या किसी अन्य शहर में रह कर मजे से जिंदगी गुजारेगी. इसी उम्मीद में वह गांव में रह रही थी.
9 नवंबर, 2013 को शफकत ने एक बेटे को जन्म दिया. इकबाल ने उस का नाम अथर रखा. शफकत का निकाह हुए एक साल से ज्यादा हो गया, एक बेटा भी हो गया, इस के बाद भी इकबाल उसे साथ रखने को तैयार नहीं था. शहर में रहने वाली शफकत को बिछोर जैसे छोटे से गांव में अच्छा नहीं लगता था.
दिन भर परदे में रहने और पढ़ाईलिखाई का कोई उपयोग न होने से शफकत कुंठित होने लगी. उसे घुटन सी होने लगी तो वह इकबाल से जयपुर चल कर रहने के लिए कहने लगी. जबकि इकबाल इस के लिए राजी नहीं था. वह दिल्ली में रह कर पढ़ाई पूरी करना चाहता था. इसी बात को ले कर दोनों में अनबन रहने लगी.
शफकत जब बारबार जयपुर चल कर रहने की जिद करने लगी तो इकबाल को उस के चरित्र पर संदेह होने लगा. उसे लगने लगा कि इस का वहां किसी लड़के से प्रेम संबंध होगा, इसीलिए यह जयपुर चलने की जिद कर रही है. शक ऐसी बला है, जिस से जल्दी पीछा नहीं छूटता. यही हाल इकबाल का हुआ. इस तरह उस की और शफकत की प्रेम कहानी में शक का घुन लग गया, जो दांपत्य के विश्वास को धीरेधीरे खोखला करने लगा.
शफकत की छोटी बहन का निकाह लखनऊ में तय हुआ, जिसे अप्रैल, 2014 में होना था. संयोग से उसी बीच इकबाल के छोटे भाई अब्बास का भी निकाह तय हो गया. शफकत की बहन का निकाह पहले था, इसलिए शमशाद अहमद अपनी बीवी के साथ एक दिन बिछोर गए और शफकत को विदा करा लाए. अब तक शक की वजह से इकबाल और शफकत के बीच मनमुटाव इतना बढ़ गया था कि इकबाल न तो शफकत की बहन की शादी में गया और न ही शफकत इकबाल के भाई की शादी में आई.
बिछोर से जयपुर आने के बाद शफकत ने अपने गुजरबसर के लिए नौकरी ढूंढ़ ली. उसे एक प्राइवेट स्कूल में मैथ और साइंस पढ़ाने की नौकरी मिल गई. भले ही वह इकबाल से दूर थी और जयपुर में नौकरी कर रही थी, लेकिन उस की इकबाल से मोबाइल पर बातचीत होने के साथ वाट्सएप पर चैटिंग भी होती रहती थी.
इस बातचीत और चैटिंग में शफकत उसे जयपुर आ कर रहने के लिए कहती थी. इस बात पर इकबाल को गुस्सा आ जाता तो वह उसे भलाबुरा कहता. इस के बाद शफकत भी उसे उसी तरह जवाब देती. पुलिस के अनुसार, शफकत उसे चिढ़ाने के लिए यह भी कहने लगी थी कि उस ने दूसरा हमसफर ढूंढ लिया है, इसलिए अब वह उस के साथ नहीं जाएगी.
इकबाल शफकत को समझाता रहता था कि वह उस से बहुत प्यार करता है और उस के बिना रह नहीं सकता. इस के बावजूद शफकत जयपुर में मकान ले कर अलग रहने की जिद पर अड़ी थी. उस का कहना था कि वह तो नौकरी कर ही रही है, अगर वह भी यहां आ जाएगा तो उसे भी बढि़या नौकरी मिल लाएगी. दोनों कमाएंगे और आराम से रहेंगे.
वैसे चाहे इकबाल जयपुर चला भी जाता, लेकिन शक की वजह से वह वहां नहीं जाना चाहता था. यही नहीं, वह यह भी नहीं चाहता था कि शफकत वहां रहे. इसीलिए वह जयपुर नहीं जा रहा था.
शफकत के जयपुर में रहने की जिद से इकबाल परेशान रहने लगा था. उसे लगने लगा था कि शफकत बेवफा हो गई है. दोनों ही अपनीअपनी जिद पर अड़े थे. जब अब्दुल्ला को पता चला कि शफकत और इकबाल के बीच ठीक नहीं चल रहा है तो उस ने इकबाल को फोन किया.
पहले तो उस ने दोस्त को समझाया. लेकिन जब वह अपनी जिद पर अड़ा रहा तो अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘इकबाल, अगर तुम शफकत को ज्यादा परेशान करोगे और उस की बात नहीं मानोगे तो किसी दिन मैं तुम्हें गोली मार दूंगा.’’
कभी रूम पार्टनर और दोस्त रहे अब्दुल्ला ने गोली मारने की बात की तो इकबाल को भी गुस्सा आ गया. अब वह इस परेशानी से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा. अब वह इस बात को ले कर काफी परेशान रहने लगा था, क्योंकि बात अब जान लेने तक पहुंच गई थी.
काफी सोचविचार कर 16 अगस्त को इकबाल ने नूंह से एक देसी कट्टा और 10 कारतूस खरीदे. 19 अगस्त को उस ने अपने गांव बिछोर से एक बोलेरो जीप किराए पर की और जयपुर पहुंच गया.
बोलेरो के ड्राइवर से उस ने कहा था कि वह जयपुर अपनी बीवी को विदा कराने जा रहा है. जयपुर पहुंच कर उसने रामगंज में रैगरों की कोठी के पास बोलेरो रुकवा कर ड्राइवर से कहा, ‘‘तुम यहीं रुको, मैं दस मिनट में अपनी बीवी और बच्चे को ले कर आ रहा हूं. उस के बाद गांव चलेंगे.’’
इकबाल वहां से रैगरों की कोठी स्थित अपनी ससुराल की ओर पैदल ही चल पड़ा. उस समय दोपहर के 12 बज रहे थे. जब वह अपनी ससुराल पहुंचा तो घर में शफकत, उस के अब्बा शमशाद अहमद और अम्मी मौजूद थीं. इकबाल का 10 महीने का बेटा अथर पालने में सो रहा था.
इकबाल ने सासससुर से दुआसलाम की तो वे दामाद की खातिरदारी की तैयारी करने लगे. तभी इकबाल ने पैंट की जेब से कट्टा निकाला और वहां बैठी शफकत पर फायर कर दिया.
यह गोली शफकत के कंधे में लगी. सासससुर के आतेआते उस ने फुर्ती से एक और गोली भरी और उस पर चला दी, जो शफकत के पैर में लगी. इसी के साथ चीखपुकार मच गई.
इकबाल गोलियां चला कर भागा, लेकिन रैगरों की कोठी में गोलियां चलने की आवाज सुन कर पुलिस पौइंट पर ड्यूटी पर तैनात सिपाही उस दिशा में दौड़ पड़े, इसलिए इकबाल पकड़ा गया. रामगंज का यह इलाका जयपुर में सब से संवेदनशील माना जाता है. इसलिए गोली चलने की सूचना मिलते ही थाना रामगंज के थानाप्रभारी रामकिशन बिश्नोई तुरंत दलबल के साथ मौके पर पहुंच गए.
गोलियां चलाने वाला इकबाल पकड़ा जा चुका था. गोलियां लगने से घायल शफकत को इलाज के लिए तुरंत सवाई मानसिंह अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.
थाने ला कर इकबाल से पूछताछ की गई. इस के बाद उसे उसी दिन अदालत में पेश कर के विस्तारपूर्वक पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि शफकत को 5 महीने का गर्भ था. उस के पेट में पल रहा बच्चा लड़की थी. इकबाल ने गुस्से में पत्नी को गोली तो मार दी, लेकिन रिमांड के दौरान वह यही दुआ करता रहा कि उस की पत्नी की मौत न हो और वह जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए.
लेकिन शफकत तो तुरंत मर चुकी थी. इकबाल बीवी के लिए बहुत बेचैन था, शायद इसलिए पुलिस ने उसे बताया नहीं था कि शफकत की मौत हो चुकी है.
शफकत की मौत और इकबाल के जेल चले जाने से अथर अनाथ हो गया है. अब उस की देखभाल मौसी और नानानानी कर रहे हैं. शमशाद अहमद चाहते थे कि जमाई जयपुर आ जाते, शफकत और वह नौकरी कर के अराम से अपना जीवन बिताते. लेकिन दोनों की जिद से उन का प्यार का आशियाना उजड़ गया. इस तरह दिल्ली से शुरू हुई उन की ‘लव स्टोरी’ जयपुर में खत्म हो गई. अब इकबाल भी अपने किए पर आंसू बहाते हुए पछता रहा है. Jaipur Crime Story






