Under 8 Chess Champion. संस्कृति उम्र में भले ही छोटी है, लेकिन उस ने ताशकंद में कजाकिस्तान, मंगोलिया और ईरान के प्रतियोगियों को शतरंज में पछाड़ कर अपने हुनर का जो जौहर दिखाया है, उस से उस में अपार संभावनाएं नजर आती हैं.  

बाबासाहेब अंबेडकर रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के हौल में एक बड़ी सी मेज के सामने बैठी संस्कृति की नजरें मेज पर रखे मिल्क केक पर जमी थीं तो उस के पिता संघदास की नजरें उस के गले में पड़े चमकते मैडल पर जमी हुई थीं, जिसे उस ने शतरंज में उज्बेकिस्तान के ताशकंद में कजाकिस्तान, मंगोलिया और ईरान के प्रतिभागियों को हरा कर जीता था.

संघदास वानखेड़े को वह दिन याद आ गया, जिस दिन उन्होंने बेटी के लिए शतरंज ला कर दिया था. उन्होंने अखबार में पढ़ा था कि बच्चों के लिए वे खिलौने लाने चाहिए, जिन में वे दिमाग लगाएं. इस से उन के दिमाग की कार्य करने की क्षमता भी बढ़ती है और याद्दाश्त भी. उन की बेटी अब 3 साल की हो गई थी यानी अब उस की स्कूल में दाखिला कराने की उम्र हो गई थी. गुडि़या, टेडीबियर या चाबी से चलने वाले खिलौने अब उस के लिए बेकार हो चुके थे, क्योंकि ये खिलौने बच्चों के लिए तभी तक उपयुक्त होते हैं, जब तक बच्चे अपने दिमाग का उपयोग खुद नहीं कर पाते.

संस्कृति महाराष्ट्र के जिला पुणे के अकोला के संघदास वानखेड़े और भारती वानखेड़े की एकलौती बेटी है. मलिन बस्ती में रहने वाले संघदास वानखेड़े जिला परिषद के स्कूल में अध्यापक हैं तो भारती घरेलू महिला. संघदास को इस नौकरी में 22 हजार रुपए वेतन मिलता है. इसी सीमित आमदनी में वह अपना गुजरबसर करते हैं.

संघदास और भारती अपनी मलिन बस्ती से कहीं बाहर एक अच्छा सा मकान लेना चाहते थे, लेकिन बेटी के जन्म और शतरंज में उस की दिलचस्पी देख कर उन्होंने घर का सपना देखना छोड़ दिया और बेटी को बेहतर शिक्षा दिलाने तथा उस के भविष्य को संवारने के बारे में सोचने लगे. संघदास खुद अध्यापक थे, इसलिए वह शिक्षा के महत्त्व को अच्छी तरह जानतेसमझते थे. लेकिन उन्हें यह भी पता था कि उन की जो आमदनी है, उस में बेटी की अच्छी परवरिश और बेहतर शिक्षा दिलाना आसान नहीं है.

एकलौती बेटी थी, इसलिए संघदास और भारती से जितना हो सकता था, वे उस के लिए करते थे. हैसियत के हिसाब से वे उस के लिए खरीदारी करते थे. वे बेटी को कोई नई चीज ला कर देते और बेटी उसे खुशी से स्वीकार करती तो उन्हें उतनी ही खुशी मिलती, जितनी कोई सपना पूरा होने पर मिलती है. संस्कृति अपनी मासूम शैतानियों और तोतली बोली से घर को गुलजार करने लगी तो पतिपत्नी को जैसे दुनिया का सब से कीमती खिलौना मिल गया. दोनों उसी के साथ खेलते रहते.

संघदास शाम को घर आते तो भारती संस्कृति की दिन भर की शरारतों की रिपोर्ट देती. इस पर दोनों उस की शरारतों पर खूब खुश होते. संस्कृति 3 साल की हुई तो उन्हें उस के दाखिले की चिंता हुई, क्योंकि आज के जमाने में बच्चे का किसी ठीकठाक स्कूल में दाखिला कराना आसान नहीं है. जिस के पास पैसे हैं, उस के लिए उतनी चिंता की बात नहीं है, लेकिन एक सामान्य आदमी के लिए यह काम आज बहुत मुश्किल हो गया है. एक दिन शाम को टीवी पर एक शो आ रहा था, जिस में 3-4 साल के रूस के बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. उन बच्चों ने शतरंज की प्रतियोगिता जीती थी.

उन बच्चों को देख कर संघदास वानखेड़े को लगा कि क्यों न वह भी 3 साल की संस्कृति को शतरंज सिखाएं. वह और कुछ नहीं कर पाई तो कम से कम उस की बुद्धि और एकाग्रता तो बढ़ेगी ही. यही सोच कर वह अगले ही दिन बाजार से शतरंज खरीद लाए.

संघदास शतरंज खरीद कर लाए तो यह उन की बेटी संस्कृति के लिए एकदम अलग हट कर था. लेकिन वह तो इसे जानबूझ कर खरीद कर लाए थे. पापा भले ही इसे उस के लिए सोचसमझ कर लाए थे, लेकिन संस्कृति को पापा का यह उपहार जरा भी पसंद नहीं आया. लेकिन जब पापा ने शतरंज की बिसात पर मोहरे बिछाने शुरू किए तो यह खिलौना उसे खेलने में भले ही नहीं, देखने में अच्छा लगा.

लेकिन जब पापा ने धीरेधीरे उसे समझाना शुरू किया तो संस्कृति को पैदल सेना, हाथी, घोड़े, वजीर और राजा के साथ खेलने में मजा आने लगा. वह इस खेल में दिलचस्पी लेने लगी और दिमाग का उपयोग करते हुए शतरंज पर ध्यान लगाने लगी.

संघदास जो चाहते थे, वह पूरा हो गया था. लेकिन अब तक बेटी के साथ शतरंज खेलने की उन की आदत पड़ गई थी. शतरंज के बारे में उन्हें कुछ खास जानकारी नहीं थी, लेकिन बेटी का मन बहलाने और उसे समझाने भर की जानकारी तो उन्हें थी ही.

लेकिन लगातार खेलतेखेलते संस्कृति इस खेल में रुचि लेने लगी. पहले तो संघदास बेटी को खुश करने के लिए स्वयं उसे जिताते रहे, लेकिन संस्कृति अब उन्हें हराने लगी. जब बेटी लगातार बाप को हराने लगी तो संघदास को लगा, यह शतरंज में कुछ कर सकती है. उन्होंने उसे कोचिंग दिलाने का निर्णय लिया.

बेटी को अच्छा शतरंज खिलाड़ी बनाने के लिए एक अच्छे कोच की जरूरत थी. संघदास ने पता किया कि उस इलाके में शतरंज कौन सिखाता है. किसी से उन्हें शतरंज के कोच जितेंद्र अग्रवाल के बारे में पता चला तो वह संस्कृति को उन के पास ले गए. कोच जितेंद्र अग्रवाल ने उन से पूछा, ‘‘शतरंज किसे सीखना है, आप को या आप की पत्नी को?’’

संघदास वानखेड़े ने 3 साल की संस्कृति की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘मैं अपनी इस बेटी को शतरंज सिखाना चाहता हूं.’’

इस पर कोच जितेंद्र अग्रवाल ने हंसते हुए उन्हें सलाह दी, ‘‘भाईसाहब, आप इसे अगर स्कूल भेजें तो हमारे खयाल से ज्यादा अच्छा रहेगा.’’

लेकिन बेटी की बुद्धिमत्ता और शतरंज में दिलचस्पी देख कर संघदास तो पक्का इरादा बना कर गए थे कि संस्कृति को शतरंज का खिलाड़ी बनाना है. इसलिए वह कहां मानने वाले थे. उन्होंने कोच की सलाह पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया और कोच जितेंद्र अग्रवाल से निवेदन किया कि वह संस्कृति के साथ एक बाजी खेल कर देखें.

मजबूरी में ही सही, जितेंद्र को संघदास की बात माननी पड़ी. संस्कृति और कोच जितेंद्र अग्रवाल आमनेसामने बैठ गए. शतरंज की बिसात पर संस्कृति ने कोच को एक के बाद एक चालों से मात देनी शुरू की तो उन्हें भी यकीन हो गया कि यह बच्ची आगे चल कर जरूर कुछ बड़ा कमाल करेगी.

फिर क्या था, कोच जितेंद्र अग्रवाल संस्कृति को शतरंज सिखाने के लिए राजी हो गए. लेकिन जब बात फीस की आई तो जितेंद्र अग्रवाल की मोटी फीस संघदास वानखेड़े के वश की बात नहीं थी. लेकिन जितेंद्र अग्रवाल ने उन की लालसा और संस्कृति की कुछ कर गुजरने की क्षमता देख कर उन्हें निराश नहीं किया. वह उतनी फीस पर संस्कृति को शतरंज सिखाने को राजी हो गए, जितनी फीस  संघदास दे सकते थे. संस्कृति शतरंज की ट्रेनिंग लेने लगी.

6 महीने बाद ही नागपुर में स्थानीय शतरंज प्रतियोगिता थी. संस्कृति भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने गई. उस की यह पहली प्रतियोगिता थी. उस ने पूरी मेहनत से खेला. लेकिन इस प्रतियोगिता में उस का तीसरा स्थान आया. इस से संघदास और भारती की तो यह उम्मीद बढ़ी ही कि बेटी उन का नाम रोशन करेगी, कोच जितेंद्र अग्रवाल की भी उम्मीद बढ़ी.

अब तक संस्कृति का स्कूल में दाखिला भी करा दिया गया था, इसलिए उसे स्कूल भी जाना पड़ता था. लेकिन संस्कृति का ध्यान पढ़ाई पर कम, शतरंज पर ज्यादा था. इस का परिणाम यह निकला कि धीरेधीरे वह शतरंज में माहिर होती गई. क्योंकि नागपुर में जीतने से उस का आत्मविश्वास बढ़ गया था. अब वह अंडर-5 एशियन यूथ चेस चैंपियनशिप प्रतियोगिता की तैयारी में जुट गई थी.

सन 2012 में अंडर-5 नेशनल यूथ चेस चैंपियनशिप प्रतियोगिता दिल्ली में आयोजित की गई. इस प्रतियोगिता में संस्कृति ने गोल्ड मैडल जीत कर जहां मम्मीपापा और कोच को मैडल का उपहार दिया, वहीं दूसरे लोगों को भी चौंका दिया. चौंकाने की वजह यह थी कि जहां संस्कृति मलिन बस्ती में रहने वाली मराठी बोलने वाली लड़की थी, वहीं उस के सामने बड़े घरों के अंगरेजी बोलने वाले बच्चे थे. वह पहली बार दिल्ली आई थी.

उन बड़े घरों में अंगरेजी बोलने वाले बच्चों को देख कर संस्कृति घबरा गई थी. क्योंकि वह न तो अपनी बात उन्हें समझा पा रही थी और न उन की बातें समझ पा रही थी. लेकिन गोल्ड मैडल जीतने के बाद जब सब संस्कृति को बधाई देने आए तो वह सहज हुई.

संस्कृति इतनी बड़ी प्रतियोगिता जीत कर गोल्ड मैडल के साथ अपनी बस्ती में पहुंची तो कोई हलचल नहीं हुई. बस्ती का कोई आदमी बधाई देने की कौन कहे, यह भी पूछने नहीं आया कि वह कहां गई थी. इस की वजह यह थी कि बस्ती वालों को शतरंज की अहमियत की कौन कहे, इस खेल के बारे में भी पता नहीं था. उन्हें यह बड़े लोगों का खेल लगता था.

संस्कृति की बस्ती में रहने वालों को भले ही कुछ भी लगा हो, लेकिन उस के कोच जितेंद्र अग्रवाल और मातापिता को अब शतरंज में संस्कृति का सुनहरा भविष्य दिखाई दे रहा था. इस जीत के बाद जितेंद्र अग्रवाल उसे एशियन चैंपियनशिप की प्रतियोगिता की तैयारी कराने लगे.

इसी क्रम में संस्कृति ने लगातार 2011, 2012 और 2013 में नेशनल प्रतियोगिताओं में जीत दर्ज की. इस से संस्कृति का ही नहीं, मातापिता का भी उत्साह बढ़ा.

दिल्ली से वापस आने के बाद संघदास और भारती बेटी के लिए उस बस्ती से अलग एक अच्छा घर खरीदना चाहते थे. घर के लिए उन के पास उतने पैसे नहीं थे, जितने की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने बैंक से कर्ज ले लिया.

संघदास ने जैसे ही घर खरीदने के लिए पैसों की व्यवस्था की, वैसे ही कोच जितेंद्र अग्रवाल ने उन्हें बताया कि एशियन चैंपियनशिप के लिए श्रीलंका की राजधानी कोलंबो जाना होगा. तब तक उन्हें बैंक से कर्ज मिल चुका था. उन्होंने बेटी के लिए अच्छे घर का जो सपना देखा था, उसे पीछे छोड़ा और कोलंबो जाने की तैयारी करने लगे.

उन्होंने मकान के लिए जो कर्ज लिया था, उस पैसे से मकान के बजाय कोलंबो जाने का टिकट खरीद डाला. पैसे पूरे नहीं हुए तो उन्होंने संस्कृति की मां के गहने गिरवी रख दिए.

जब इस बात की जानकारी संघदास के रिश्तेदारों और दोस्तों को हुई तो उन्होंने मदद करने या उत्साह बढ़ाने के बजाय कहा कि लगता है उन का दिमाग खराब हो गया है. आखिर शतरंज में ऐसा क्या रखा है, जो वह अपना सब कुछ बरबाद करने पर तुले हैं. लेकिन उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और पत्नी तथा बेटी को ले कर कोलंबो चले गए. संस्कृति ने वहां गोल्ड मैडल जीता तो संघदास और भारती को लगा कि उन का पैसा वसूल हो गया है.

इस साल जुलाई में एशियन चेस चैंपियनशिप अंडर-8 में भाग लेने के लिए संस्कृति को उज्बेकिस्तान के ताशकंद जाना था. वहां जाने के लिए किराए और खर्चे की कौन कहे, संघदास के पास खेल में भाग लेने के लिए जो फीस जमा करनी थी, उस के भी पैसे नहीं थे.

संघदास किसी भी हालत में बेटी को एशियन चेस चैंपियनशिप में खेलते देखना चाहते थे. वह फीस जमा कराने के लिए भागदौड़ करने लगे. यारदोस्तों, रिश्तेदारों तथा सरकार से भी मदद मांगी. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. जैसेजैसे अंतिम तारीख नजदीक आती जा रही थी, संघदास की चिंता बढ़ती जा रही थी.

जब फीस जमा कराने के लिए सिर्फ एक दिन बचा तो वह पूरी तरह निराश हो गए. लेकिन संयोग से उसी दिन उन्हें बाबासाहेब अंबेडकर रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (बीएआरटीआई) के डाइरैक्टर जनरल डी.आर. परिहार से मिलने का मौका मिल गया. उन्होंने अपनी परेशानी उन्हें बताई तो श्री परिहार ने प्रतियोगिता में भाग लेने की फीस ही नहीं जमा कराई, बल्कि इंस्टीट्यूट की ओर से आनेजाने और वहां ठहरने की व्यवस्था भी कराई. इस तरह संसकृति का भाग्य ही बदल गया.

ताशकंद में संस्कृति ने कजाकिस्तान, मंगोलिया और ईरान के प्रतियोगियों को पछाड़ कर एशियन चेस चैंपियनशिप अंडर-8 का खिताब अपने नाम कर लिया. उसे 9 में से 7 पौइंट मिले थे. इस जीत पर उस के पिता संघदास का कहना है कि यह मैडल हमारे लिए एक यादगार है, क्योंकि इस के लिए हमें बहुत संघर्ष करना पड़ा है.  Under 8 Chess Champion

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