Story in Hindi. किसी गैर पर विश्वास कर के शबनम ने जिस सुख और प्यार के लिए पति और सासससुर ही नहीं, 3 मासूम बच्चों को भी छोड़ दिया, वह सुख उसे नहीं मिल सका.
‘‘कमबख्त, कमीनी किसे फोन कर रही थी? हिंदुस्तान कर रही थी ना? अगर तुझे उन पिल्लों से इतनी ही मोहब्बत थी तो यहां मरने क्यों चली आई? अगर तेरी हरकतें ऐसी ही रहीं तो तू एक न एक दिन मुझे जेल भिजवा कर रहेगी.’’ कह कर असलम ने मेरे हाथ से रिसीवर ले कर पटक दिया और मुझे ऐसा धक्का दिया कि मैं सिर के बल गिर पड़ी.
इस के बाद मुझे गंदीगंदी गालियां देते हुए बाहर से ताला लगाया और सीढि़यां उतर गया. असलम जितना चालाक था, उतना ही फुर्तीला और ताकतवर भी था. वह गले तक काले धंधों में डूबा था. अमेरिका की पुलिस सरगर्मी से उस की तलाश कर रही थी. मेरी बदकिस्मती यह थी कि उस के हर जुर्म में मैं बराबर की हिस्सेदार थी. यही एक वजह थी कि चाह कर भी मैं उस के घर से निकल नहीं पा रही थी.
मेरे पास अब आंसू बहाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं था? इस के लिए मैं किसी और को दोष भी नहीं दे सकती थी. मैं ने जो किया था, उसर की सजा मुझे मिल रही थी.
असलम जिसे मैं ने जीजान से चाहा था, जिस के लिए मैं ने अपना घर, पति और तीन प्यारेप्यारे मासूम बच्चों को भुला दिया था, आज वही असलम मुझ से इस तरह बदसलूकी करेगा, मैं ने सपने में भी नही सोचा था. जब से मैं अमेरिका आई हूं, तब से मेरा यही हाल है. ताले में बंद रहना और उस के हर नाजायज धंधे में शामिल होना.
मेरी खूबसूरती का इस से अच्छा इस्तेमाल और क्या हो सकता था. हर वह काम, जो असलम वर्षों में नहीं कर सका था, उसे मैं ने चुटकी बजा कर अपनी खूबसूरत अदाओं से कर दिया था.
मैं जब भी भागने की कोशिश करती, वह बेरहमी से मेरी पिटाई करता. उस की गिरफ्त से निकलना मेरे लिए नामुमकिन था. लेकिन मैं हिम्मत हारने वालों में नहीं हूं, मैं एक बार, सिर्फ एक बार अपने उन मासूम बच्चों को सीने से लगा कर प्यार करना चाहती हूं, जिन्हें 10 साल पहले मैं असलम के प्यार में पागल हो कर हिंदुस्तान छोड़ आई थी.
बच्चों की याद त्रिशूल बन कर मुझे सालती रहती थी. मैं जब भी तनहा होती थी, तीनों बच्चों के चेहरे मेरी आंखों के सामने तैरने लगते थे. जब मैं उन्हें छोड़ कर आई थी, सृष्टि 9 साल की थी, बबलू 4 साल का और दीपू 2 साल का. तीनों बच्चे मेरे सीने से चिपट कर सोते थे. कितनी मशगूल जिंदगी थी वह मेरी. एकएक बातें किताब के पन्नों की तरह खुलने लगी थीं.
सृष्टि और बबलू सुबह 7 बजे ही स्कूल चले जाते थे. उन के लिए टिफिन बनाना, उन्हें तैयार करना, बच्चों को स्कूल भेज कर घर की साफसफाई करना और दोनों समय के खाने में दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था.
और आज मैं विदेश में अकेली बैठी हूं. चारों ओर कुहासा और बर्फ से ढकी चोटियां हैं. मैं ऐसे दलदल में फंसी हूं, जहां से चाहूं तो भी नहीं उबर सकती. शुरू से ही आशावादी व भरपूर जीवन जीने की मैं आदी थी. एक मस्त हिरनी की तरह कुलांचे भरना मेरी फितरत थी. 3 बच्चों की मां होने के बावजूद मुझ में चंचलता पहले जैसी ही थी.
घर का काम निपटा कर मैं पूरे मन से अपना शृंगार करती और 5 बजते ही मैं लौन में चहलकदमी करने लगती. आतेजाते मर्द जब मुझ पर चाहतभरी निगाह डालते तो मैं उसे अपनी तारीफ और उपलब्धि समझ कर फूली न समाती. मेरे गालों पर मोगरे के फूल दहकने लगते.
इसी चंचल स्वभाव की वजह से 16 साल की उम्र में ही मैं सागर से प्यार कर बैठी थी. कैंब्रिज स्कूल में हम दोनों साथ पढ़ते थे. रोजरोज मिलने से हमारी दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई. मैं उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी. हर पल मेरी जुबान पर उसी का नाम होता. हम जब भी मिलते, अपने आशियाने के सपने संजोते. वह भी शिद्दत से मेरा दीवाना था.
उस की दीवानगी को देखते हुए एक दिन मैं ने अपनी मां को सब कुछ बता कर कहा कि ‘मैं सागर से ही शादी करूंगी और जल्दी ही करूंगी.’ मां ने बहुत समझाया. पापा ने भी कहा कि पहले पढ़ाई पूरी कर लूं, उस के बाद मैं जो कहूंगी, वह वही करेंगे. मैं ने घर से भाग जाने की धमकी दी. मेरे उद्दंड स्वभाव के आगे किसी की न चली और लाख पहरों के बावजूद मैं ने घर से भाग कर सागर से शादी कर ली. शायद आज यही मेरे जीवन की सब से बड़ी भूल साबित हुई.
मैं ने मांबाप की मरजी के खिलाफ जो कदम उठाए, उस से फिर कभी मैं उन की दहलीज पर लौट नहीं सकी. सागर का जुनून और दिलफरेब मोहब्बत नकली हीरे से कम नहीं थी. बीवी और महबूबा में एक बुनियादी फर्क होता है. इसी बुनियादी फर्क के तहत मेरी हदें निश्चित कर दी गईं.
शादी के बाद सागर पूरी तरह से मेरा हो गया था, इसलिए तनमन से मैं उस की सेवा करने लगी. दिनरात मैं उस के प्यार में डूबी रहने लगी. अपनी किस्मत पर मुझे रश्क आने लगा था कि इतनी बड़ी कोठी का एकलौता वारिस मुझ पर सौ जान से फिदा है. ईश्वर ने मुझे रूप भी ऐसा दिया था कि जो भी देखता, ठगा सा देखता रह जाता. दूध में केसर डाल कर जो रंग आता है, उस रंग की काया पर कमर तक झूलते काले स्याह बाल, लंबा कद. लेकिन जल्दी ही हमारी मोहब्बत का सुरूर बुलबुले की तरह खत्म हो गया.
परदा उठते ही जो हालात सामने आए, वे मेरी जिद और नासमझी के अंजाम थे. अपने मांबाप के जिंदगी भर के तजुर्बे को ठुकरा कर मैं ने जो प्रेमविवाह किया था, उस में सीरत वाला पहलू पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था. शायद प्रेमविवाह में ऐसा ही होता है. सूरत इस में अहम होती है. सागर की शानदार पर्सनैल्टी की मैं दीवानी सी हो गई थी. मेरे मांबाप, भाई जब कभी उस के खिलाफ कुछ कहते, मैं नाराज हो कर घंटों रोती रहती और भूख हड़ताल कर बैठती. प्यार में अंधी हो कर मैं सच सुनना नहीं चाहती थी.
सागर एक 5 स्टार होटल के डिस्कोथैक का मैनेजर था, जहां रातें शराबशबाब में डूबी रहती थीं. उस की ड्यूटी रात की होती थी. वह सुबह घर आता तो बेहद थका और टूटा हुआ होता. आते ही बिस्तर पर ढेर हो जाता. पूरे दिन सोता. शाम को उठता और फ्रैश हो कर होटल चला जाता. इस तरह महीनों हमारे बीच कोई बातचीत न होती. अगर कभी मैं कुछ कह देती तो उस के मुंह में ऊलजुलूल जो आता, कहने लगता. उस की इन बातों से हम दोनों के बीच एक ऐसी खाईं बनती चली गई, जिसे पाटना नामुमकिन सा हो गया. मैं समझ गई कि यह बड़े बाप की वह बिगड़ी हुई औलाद है. मैं घुटघुट कर जीने लगी.
उसी घुटन में एक दिन मैं सो रही थी कि अचानक मेरे फोन की घंटी बजी. फोन करने वाले ने कहा, ‘‘आप मुझे नहीं जानतीं, लेकिन मैं आप को अच्छी तरह जानता हूं. मैं आप का शुभचिंतक हूं, इसलिए आप को चेता रहा हूं कि आप अपने पति पर नजर रखिए. आजकल वह रेशमा नाम की खूबसूरत लड़की के साथ अकसर नाचतेगाते, खातेपीते नजर आते हैं.’’
मैं सागर से वैसे ही परेशान थी, इस गद्दारी से मैं बिफर उठी. उस दिन हम दोनों के बीच काफी कहासुनी हुई. सागर ने सारे आरोपों को गलत बताया. लेकिन शक का जहर मेरी नसनस में फैल चुका था. वह अजनबी न जाने मेरा हमदर्द था या खैरख्वाह या दुश्मन, जो मेरा अच्छा सोच रहा था.
इस के बाद उस ने मुझे न जाने कितने फोन किए. हर फोन में सिर्फ सागर की बुराई होती. सागर सुबह आता तो शराब की बू से कमरा भर जाता. मेरे नाम से उसे चिढ़ सी हो गई थी.
मेरा हर मशवरा उसे नागवार गुजरता. सागर की रात की ड्यूटी से मेरा और बच्चों का जीवन घर की चारदीवारी में कैद हो कर रह गया था. पति, 3 बच्चे और सासससुर की जिम्मेदारी उठातेउठाते मैं चिड़चिड़ी और बेरहम होती गई. जिस तरह बिना पानी के धरती सूखती जाती है, प्यार के बिना कुछ वैसी ही हालत मेरी हो गई थी. मैं प्यार के 2 बोल सुनने के लिए तरसती रहती थी.
अब मुझे अपना घर, मांबाप और छोटा भाई याद आने लगा. उन से रिश्ते तोड़ कर इस घर को अपनाने का अब मुझे पश्चाताप होने लगा. मां मुझे कितना प्यार करती थी, वह मेरी हर जरूरत को समझती थी, इस के बावजूद मैं ने उस के प्यार को ठोकर मार दी थी. पापा ने गुस्से में कहा था, ‘‘तू ने जो किया है, उस से हम तो सारी जिंदगी रोएंगे ही, तू भी खुश नहीं रहेगी. तू एक बदनाम और अय्यास लड़के को अपना जीवनसाथी बना रही है न, वह तुझे कभी चैन से नहीं रहने देगा. मेरी तरह तू भी सारी उम्र रोएगी.’’
इन शब्दों को सुनने के बाद मैं उन के पास कैसे जा सकती थी. एक बार, सिर्फ एक बार मैं मां की गोद में मुंह छिपा कर रोना चाहती थी. अब मुझे पता चला कि मांबाप के आशीर्वाद की क्यों जरूरत होती है. आशीर्वाद अपने आप में एक महान अर्थ लिए होता है, जिस के बिना मैं अधूरी रह गई थी.
वह रात मैं जिंदगी में कभी नहीं भूल सकती. उस तनाव में भी मैं ने सागर से वह रात अपने लिए उधार मांगी थी. 2 अक्तूबर हमारी शादी की सालगिरह थी. कई सालों बाद मैं ने उस रात मन से शृंगार किया. गुलाबी रंग का सूट पहन कर मैं सागर के साथ होटल में डिनर के लिए तैयार हो गई. सागर ने कहा था कि वह होटल जा कर वापस आ जाएगा. लेकिन गया तो लौटा नहीं.
शायद वह सोच कर गया था कि उसे वापस नहीं आना है. उस के इंतजार में मैं बाहर बगीचे में टहलती रही. चांद नाशाद था. तारे भी खामोश थे, मेरी बेबसी पर फिजाएं भी सहमीसहमी सी थीं. टहलतेटहलते मुझे लगा कि 2 आंखें मेरा पीछा कर रही हैं. सामने वाले फ्लैट की खिड़की पर खड़ा एक खूबसूरत सा युवक सिगरेट पीते हुए मेरी ओर ताक रहा था. वह काफी बुझाबुझा और परेशान लग रहा था.
सफेद कमीज और नीले कोट में वह युवक काफी दिलकश लग रहा था. बरबस मैं उस की ओर खिंचती चली गई. मैं ने कई बार उस लड़के की ओर देखा तो नीचे आ कर उस ने अपना परिचय दिया. उस ने बताया कि वह उसी दिन वहां शिफ्ट हुआ था. वह फ्लैट उस ने किराए पर लिया था. उस का नाम असलम था. बेसाख्ता मैं ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘अगर किसी भी चीज की जरूरत हो तो बिना झिझक बताइएगा.’’
इस के बाद वह रोजाना बच्चों के साथ खेलता दिखाई देने लगा. कभी उन के लिए चौकलेट लाता तो कभी गुब्बारे. अकसर उन्हें घुमाने भी ले जाता. मेरे ससुर के पास बैठ कर घंटों राजनीति पर बातें करता. जल्दी ही वह उन का अच्छा दोस्त बन गया. मांजी को अम्मी कहता तो वह निहाल हो जातीं. मांजी उसे तरहतरह की डिशेज बना कर खिलातीं.
धीरेधीरे वह सभी के दिलों में उतर गया. वह जब भी हमारे घर आता, उस की निगाहें कुछ खोजती सी रहतीं, हंसतेहंसते वह मायूस सा हो जाता. उसे क्या पता था कि 2 प्यार की प्यासी आंखें हर वक्त उस पर नजर रखती हैं.
इधर कुछ दिनों से उस की बेतकल्लुफी बढ़ती जा रही थी. सागर के रात भर गायब रहने और दिन भर सोते रहने से उसे हमारे घर आने की पूरी आजादी थी.
आज भी वह मनहूस रात याद आती है तो मैं शरम से लाल हो जाती हूं. वह 31 दिसंबर की रात थी. न्यू ईयर की वजह से उस पूरी रात सागर को होटल में रहना था. मेरे सासससुर मनाली घूमने गए थे. मेरे बच्चे खापी कर सो गए थे. अचानक दरवाजे पर धीरेधीरे दस्तक हुई. मुझे लगा, मुझे वहम हो रहा है.
मगर दस्तक लगातार होती रही तो मैं ने जा कर दरवाजा खोला. बाहर असलम खड़ा था. वह पूरी तरह से भीगा हुआ था. उस ने बताया कि उस के घर की चाबी औफिस की ड्राअर में रह गई है और बारिश इतनी तेज है कि चाबी लेने जाना मुमकिन नहीं है.
मुझे उस पर रहम और प्यार दोनों आया. उसे अंदर आने के लिए कह कर मैं बगल हो गई. सागर के कपड़े दे कर मैं ने उसे कौफी बना कर दी. बिजली तड़पने के साथ तेज हवाएं बारिश को बहका रही थीं. हम दोनों कौफी पीते हुए छिपछिप कर एकदूसरे को देखते रहे.
खाना खा कर वह एक किताब ले कर पढ़ने लगा. मैं खिड़की के पास खड़ी हो कर बारिश का लुत्फ ले रही थी. उस दिन उस ने बताया कि वह अनाथ है. किसी रिश्तेदार ने भी उसे सहारा नहीं दिया. किसी तरह उस ने पढ़ाई पूरी की और अब वह एक मालदार आदमी के साथ बिजनैस करता था, जिस में उसे लाखों का फायदा होता था.
उस ने बताया था कि अमेरिका में उस की 4 बड़ीबड़ी कोठियां हैं, जिन में वह राजाओंमहाराजाओं की तरह रहता है. उस के यहां कई नौकर हैं. ऐशोआराम के सभी साधन हैं. बस उसे कमी है तो एक जीवनसाथी की.
धीरेधीरे मैं भी उस के आगे बेपर्दा होने लगी. मैं ने उसे बताया कि मांबाप के लिए अब मैं एक गुजरा वक्त हो चुकी हूं, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मेरी हिचकियां बंध गईं. बरसों बाद मुझे एक साथी मिला था, जिस के आगे मैं ने सारे जख्म खोल कर रख दिए. सागर की बेवफाइयां बतातेबताते मैं कितनी निरीह लग रही थी. मेरी बातें सुनतेसुनते अचानक असलम उठा और मेरे सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जिन की पहचान न हो, वही हमसफर होते हैं. तूफानों के थपेड़ों से कटकट कर ही तो इतने प्यारे साहिल बनते हैं.’’
उस के इस तरह तसल्ली देने पर रोतेरोते मैं उस के सीने से कब जा लगी, मुझे पता ही नहीं चला. वह मेरे बाल सहलाता रहा और मैं रोती रही. अचानक उस ने कहा, ‘‘अब मुझे चलना चाहिए. अगर कोई आ गया तो बिना मतलब बदनाम हो जाओगी. हां, तुम्हारी परेशानी का कोई न कोई तो हल होगा ही? परसों तुम मुझे ताज पैलेस में मिलना, वहीं विचार किया जाएगा.’’
मैं कुछ कहती, उस के पहले ही उस ने कहा, ‘‘नहीं, आज ही न्यूइयर्स है, मिल कर मनाएंगे और खूब बातें करेंगे. ठीक है ना?’’
अपनी बातों से असलम मुझे एक निहायत ही शरीफ और सुलझा हुआ आदमी लगा. उस पर भरोसा ना करने की कोई वजह नहीं थी. नाकामियों ने मुझे तोड़ कर रख दिया था. यह तल्ख हकीकत है कि हौसला छोड़ देने से नई मंजिल नहीं मिलती. जबकि अब मुझे नई मंजिल की तलाश थी.
नया साल था और पति से अलग यहां मैं अकेली थी. बड़ी इज्जत के साथ मैं बेइज्जत हो रही थी. अलसाई सी मैं उठी और एक कप चाय बना कर बगीचे में आ कर बैठ गई. सामने नजर गई तो असलम खिड़की पर खड़ा सिगरेट पी रहा था. इशारेइशारे में हमारा सलाम एकदूसरे तक पहुंचा गया.
नए साल पर सागर की डबल ड्यूटी होती थी. विदेशी युवतियों से भरा होटल सेंट्स और फूलों की महक से गमक रहा होता था. सागर मस्ती में डूबा होगा, यह खयाल मन में आते ही मैं जलन के मारे सुलग उठी. सागर से बदला लेने के लिए मन मचल उठा. आखिर कितने दिनों तक मैं अंधेरे में रहूंगी. क्या मेरी छवि को ग्रहण लग गया है. जिस तरह नदी रेगिस्तान में मिल कर रेत हो जाती है, कुछ वैसा ही हाल मेरा भी था.
बस, मैं खुदगर्ज हो गई. नहा कर मैं ने बढि़या कपड़े और गहने पहने, शृंगार किया. आइने के सामने खड़ी हुई तो यह बदलाव मुझे अच्छा लगा. मैं बच्चों के बारे में सोच रही थी कि मेरी सहेली नीरू आ गई. वह और उस के पति अशोक हमारे अच्छे दोस्तों में थे. नीरू ने कहा, ‘‘भई हम तुम्हें लेने आए हैं. अशोक बाहर गाड़ी में तुम्हारा और बच्चों का इंतजार कर रहे हैं. आज न्यू ईयर्स पर बच्चे घर में ही सेलीब्रेट कर रहे हैं. चलो जल्दी करो.’’
मुझे बढि़या मौका मिल गया. मैं ने बड़ी ही मोहब्बत से कहा, ‘‘नीरू, अभी तुम मेरे बच्चों को ले कर चलो. मुझे कुछ जरूरी काम है, मैं एक घंटे बाद आ जाऊंगी.’’
मेरे अंदर छिपे पाप को नीरू समझ नहीं सकी और जल्दी आने के लिए कह कर मेरे बच्चों को ले कर चली गई.
अब मेरा रास्ता साफ था. बादल घेरे हुए थे. हल्कीहल्की बूंदे पड़ रही थीं. ठंडी हवाएं मेरी जुल्फों को बिखेर रही थीं. अंदर की सारी जलन खत्म हो गई थी. मैं ने टैक्सी की और होटल ताज पैलेस पहुंच गई. असलम बाहर खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था. उस ने हौले से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे होटल के बैंक्वेट हौल में ले गया. वहां हर ओर मस्ती का आलम था. असलम ने एक शानदार सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘बैठो.’’
मैं बैठ गई. थोड़ी खामोशी के बाद बातचीत शुरू हुई. धीरेधीरे हम बेतकल्लुफ होते गए. उसे पता चला कि मैं बेहद दुखी हूं. उस ने मेरी दुखती रग पकड़ ली. मेरी कहानी सुनने के बाद उस ने कहा, ‘‘गिरने वालों को संभाल भी कौन सकता है.’’
मैं ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’
‘‘समय आने पर वह भी बता दूंगा,’’ असलम ने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रख कर कहा, ‘‘आप ने अपनी पूरी कहानी सुना दी, लेकिन नाम नहीं बताया.’’
‘‘शबनम.’’ मैं ने हंस कर कहा.
‘‘वाकई तुम शबनम की तरह पाक और खूबसूरत हो. तुम कितनी हसीन हो, शायद यह तुम्हें पता नहीं. यह हम जैसे कद्रदानों को ही पता होगा. जब से मैं ने तुम्हें देखा है, तभी से बेचैन हूं. मैं तुम्हारा दीवाना हूं.’’
उस दिन के बाद हमें जब भी मौका मिलता, हम मिल लेते. हर मुलाकात में वह कुछ ऐसा कह देता कि मेरा सोया जमीर जाग उठता. वह अकसर कहता कि अगर भीख में उजाला मिलता है तो कभी मत लेना. किसी की ज्यादती सहना भी गुनाह है. हालात कितने भी बुरे क्यों ना हों, हर मोड़ पर मंजिल की तलाश करनी चाहिए.
धीरेधीरे मैं उस के रंग में रंगती चली गई. उस ने मुझ से वादा किया कि हम अमेरिका पहुंच कर निकाह करेंगे. मैं उस के साथ ऐशोआराम के सपने देखने लगी. मुझे लगता, अगर इतना प्यार करने वाला पति हो तो पति और बच्चे क्या, मैं पूरी दुनिया को ठोकर मार दूं.
और फिर मेरी जिंदगी में वह काली रात आ गई. शायद उस रात मेरा दिल पत्थर का हो गया था. मैं ने अपने सारे गहने तथा नकदी एक अटैची में रखी और जब सभी लोग सो गए तो रात 12 बजे घर से बाहर आ गई. सुबह 3 बजे हमारी फ्लाइट थी. असलम टैक्सी लिए खड़ा था. मेरे बैठते ही टैक्सी चल दी.
पूरे रास्ते मुझे अपराधबोध सताता रहा और बेसाख्ता आंसू बहते रहे. मुझे अपने बच्चों की याद आ रही थी. क्योंकि अभी उन्हें मेरी जरूरत थी. लेकिन बच्चों की दादी उन्हें जान से भी ज्यादा चाहती थी, इसलिए यह बात जल्दी ही खयालों से निकल गई. वह उन्हें पालपोस लेगी.
सागर भी बच्चों को बहुत चाहता था. बेटी को तो वह पलकों पर रखता था. डांटता और नजरअंदाज करता था तो सिर्फ मुझे. एक कुटिल सी मुसकान मेरे होंठों पर तैर गई. मुझे लगा, मैं ने उसे अच्छा सबक सिखाया है. वहां किसी को मेरी जरूरत नहीं थी.
हम अपने मुकाम पर पहुंच गए. रास्ते भर असलम ने मेरा बहुत खयाल रखा. असलम की कोठी देख कर मैं बहुत खुश हुई. चारों तरफ बगीचे, फूलों से लदे पेड़, पिछवाड़े बहता झरना, जगहजगह लालनीलीपीली बत्तियां, फैंसी परदे, झाड़फानूस. लगा धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस यहीं है. काजी और कुछ लोगों की हाजिरी में हमारा निकाह हो गया. ऐसा उस ने इसलिए किया था कि मैं बहुत घबराई हुई थी. इस के अलावा निकाह के बिना मैं उस की किसी बात पर रजामंद नहीं थी.
बाद में पता चला कि वह कोठी किराए की थी. एक रात असलम काफी देर से 8-10 दोस्तों के साथ आया. वे शक्ल से मालदार, लेकिन गुंडे नजर आ रहे थे. वे एक कमरे में बैठ कर बातें करने लगे. जब मैं ने उन की बातें सुनीं तो लगा मुझे गश आ जाएगा.
वे सब के सब स्मगलर थे. उन के सारे गैरकानूनी धंधों का मुखिया असलम था. जब उसे पता चला कि मुझे उस की असलियत मालूम हो गई है तो वह मेरे सामने पूरी तरह खुल गया. अपने हर काले धंधे में मुझे शामिल करने लगा. इस तरह धीरेधीरे मैं भी गुनाहों के दलदल में धंसती चली गई. खूबसूरत लड़कियों को फंसा कर गुनाहों में शामिल करना असलम का मुख्य धंधा था.
मैं ने निकाह का हवाला दिया तो उस ने कहा, ‘‘निकाह तो एक रस्म अदायगी थी. निकाह तो मैं ने ना जाने कितने किए हैं.’’
अब मैं ऐसे अंधियारे गलियारे से गुजर रही थी, जहां रोशनी की किरणें भी रोशनी की मोहताज थीं. उस दिन मैं उस के काले धंधे में नहीं गई तो उस ने मेरी जम कर पिटाई की. उस ने कहा, ‘‘तू किसी की नहीं हो सकती. मेरे झूठे फोन पर तू सागर को छोड़ कर यहां आ गई. अब किसी और के फोन आएंगे तो तू उस के साथ भाग जाएगी. औरत का नाम ही बेवफा है.’’
‘‘क्या कहा तुम ने, वह फोन तुम करते थे? इस का मतलब मेरा सागर बेवफा नहीं था? मेरी खूबसूरती देख कर तुम ने मुझे बरगलाया? कमीने कहीं के.’’ कह कर मैं असलम पर झपटी तो उस ने मुझे धक्का दे दिया. मैं गिरी तो मेरे सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. सागर और बच्चों को याद कर के मैं रोने लगी.
मजबूर जिंदगी किसी भी बदलाव का स्वागत नहीं कर सकती. तेज आंधियां मुझे बुझाने का जतन कर रही थीं. अब तो वैसे भी अंधेरे से दोस्ती हो गई थी. इस अंधेरे के खिलाफ जेहाद करना मेरे बस में नहीं रह गया था. विश्वास की माला टूट चुकी थी और मनके बिखर चुके थे.
इतनी चोट खाने के बाद भी मैं किसी तरह उठी. असलम के जाने के पदचाप मुझे राहत दे रहे थे. आज इतने सालों बाद मैं ने अपने घर फोन किया. उधर से सागर ने फोन उठाया. घबराहट और शर्मिंदगी भरे लहजे में मैं ने कहा, ‘‘मैं शबनम…’’
‘‘कौन शबनम…? उसे मरे तो एक अरसा गुजर गया है. आज मेरी बेटी की शादी है, थोड़ा जल्दी में हूं.’’
कह कर सागर ने फोन काट दिया.
मेरी जैसी चरित्रहीन औरतों का शायद यही हश्र होता है. जबजब औरतों ने लक्ष्मण रेखा लांघी है, वह तबाही ही लाई है. Story in Hindi






