Cancer Drug Racket. कैंसर वार्ड में जिंदगी की आखिरी उम्मीद बनी एक वायल, जब काला बाजार की तिजोरी में पहुंच जाए तो यह सिर्फ दवा की चोरी नहीं, बल्कि मरीज की सांसों का सौदा है. दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा पिछले दिनों अलगअलग जगहों पर एक साथ की गई छापेमारी ने 9 करोड़ की दवाओं, 17 गिरफ्तारियों के साथ उसी सिंडिकेट को बेनकाब किया, जो अस्पताल के स्टोर से महंगी दवाएं चुरा कर बाजार में बेच रहा था.
कैंसर अस्पताल के उस कमरे में एक मरीज जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था. डौक्टरों की टीम उस के इलाज में जुटी थी. फेमिली वालों की निगाहें डौक्टर के चेहरे पर टिकी थीं. उन्हें उम्मीद थी कि महंगी दवा का इंजेक्शन मरीज की हालत संभाल देगा, लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि देश के किसी दूसरे हिस्से में कुछ लोग उन्हीं जीवनरक्षक दवाओं को पैसे कमाने का जरिया बना चुके हैं.
यह दवाएं किसी सामान्य बीमारी की नहीं थीं. इन में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बेहद महंगी दवाएं थीं. एकएक दवा की कीमत हजारोंलाखों रुपए तक पहुंच सकती थी. मरीज और उस की फेमिली के लिए ये दवाएं केवल दवा नहीं, बल्कि जिंदगी की आखिरी उम्मीद होती हैं.
22 जून, 2026 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की इंटरस्टेट सेल को एक ऐसी सूचना मिली, जिस ने जांच अधिकारियों का ध्यान खींच लिया.
सूचना यह थी कि महंगी एंटी कैंसर दवाओं का एक संगठित नेटवर्क दिल्ली से बाहर तक सक्रिय है. दवाएं सामान्य मैडिकल सप्लाई चैनल से नहीं, बल्कि संदिग्ध रास्तों से इधरउधर भेजी जा रही हैं.
पुलिस के लिए सब से महत्त्वपूर्ण सवाल यह था कि दवाएं आती कहां से हैं और फिर जाती कहां हैं? अगर कुछ लोग बिना बिल और बिना उचित दस्तावेजों के महंगी कैंसर दवाएं खरीदबेच रहे हैं तो उन के पीछे केवल 2-4 व्यक्ति नहीं हो सकते.
इस के लिए स्रोत, बिचौलिए, खरीदार, सप्लायर, पैकिंग करने वाले और परिवहन की पूरी व्यवस्था चाहिए. इसीलिए पुलिस ने जल्दबाजी नहीं की.
स्पैशल सीपी एच.जी.एस. धालीवाल के मुताबिक, जांच के बाद इंसपेक्टर कमल कुमार की टीम ने ईस्ट दिल्ली, रोहिणी और मुंबई से जुड़े संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की. फोन संपर्क, आवाजाही, मुलाकातें और दवाओं की सप्लाई के संभावित रास्तों को खंगाला गया.
जांच धीरेधीरे आगे बढ़ रही थी. एक नाम दूसरे नाम तक पहुंचाता था. एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने का पता मिलता था. एक सप्लायर के पीछे दूसरा सप्लायर दिखाई देता था. जितनी कडिय़ां जुड़ती गईं, मामला उतना ही बड़ा होता गया.
इस के बाद एसीपी रमेश लांबा की निगरानी में 7 विशेष टीमें बनाई गईं. पुलिस अब केवल किसी एक व्यक्ति को पकडऩा नहीं चाहती थी. उस का लक्ष्य पूरे नेटवर्क को पकडऩा था.
11 जुलाई, 2026 की सुबह दिल्ली एनसीआर और नवी मुंबई में कई जगहों पर एक साथ काररवाई की तैयारी हो चुकी थी. ड्रग्स विभाग और स्थानीय पुलिस के साथ समन्वय किया गया. 7 विशेष टीमें अलगअलग स्थानों के लिए रवाना हुईं.
जांच एजेंसियों को अंदेशा था कि अगर किसी एक ठिकाने पर काररवाई की खबर दूसरे लोगों तक पहुंच गई तो पूरा नेटवर्क भूमिगत हो सकता है, इसलिए काररवाई एक साथ की गई.
दिल्ली के लक्ष्मी नगर, रोहिणी और नवी मुंबई समेत कई स्थानों पर छापे पड़े. पुलिस जब संदिग्ध ठिकानों में दाखिल हुई तो वहां केवल कुछ दवाएं नहीं मिलीं, बल्कि वहां से बरामद सामान ने कथित कारोबार की पूरी तसवीर ही सामने रख दी.
छापे में कैंसर रोधी Darzalex, Imfinzi, Erbitux, Opdyta, Gazyva, Bavencio, Adcetris, Keytrudaजैसी महंगी दवाओं के नाम सामने आए.
इस के साथ पैकिंग के थर्मोकोल बौक्स, बबल रैप, टेप, खाली वायल, पुराने कार्टन थे. इस के अलावा रजिस्टर, डायरियां और नकदी भी बरामद हुई.
जांचकर्ताओं के सामने सवालों की लंबी सूची थी. ये दवाएं कहां से आईं? इन का वास्तविक खरीदार कौन था? क्या सभी दवाएं नकली थीं या कुछ असली दवाओं को अवैध तरीके से डायवर्ट किया गया था? किस अस्पताल से कितनी दवा बाहर आई? किस ने अस्पताल के भीतर से दवा निकाली? और सब से बड़ा सवाल— इन दवाओं का अंतिम खरीदार कौन था?
3 रास्ते, एक मंजिल
जांच में पुलिस ने दवाओं की कथित सप्लाई के 3 प्रमुख चैनल बताए. पहला, रास्ता था अनधिकृत स्रोतों से दवाएं खरीदना. दूसरा, अस्पतालों में मरीजों के लिए रखे स्टौक से कथित रूप से दवाएं बाहर निकालना. तीसरा, सरकारी संस्थानों और वेयरहाउस के लिए भेजी गई दवाओं को कथित रूप से अवैध बाजार में पहुंचाना. इन तीनों रास्तों की मंजिल एक ही थी मुनाफा, लेकिन यह कारोबार सामान्य तसकरी से अलग था.
यहां माल की कीमत बहुत ज्यादा थी, लेकिन उस का आकार छोटा था. एक छोटी सी वायल आसानी से छिपाई जा सकती थी. एक बौक्स को सामान्य मैडिकल पार्सल जैसा दिखाया जा सकता था. कुरियर से दूसरे शहर भेजा जा सकता था.
और अगर पैकेजिंग और रिकौर्ड को बदल दिया जाए तो किसी सामान्य व्यक्ति के लिए असली और संदिग्ध दवा के बीच अंतर करना कठिन हो सकता था. यही इस कथित नेटवर्क की ताकत थी.
पहचान मिटाने का खेल
जांच में सामने आई सब से गंभीर बातों में से एक थी दवाओं की पहचान बदलने की कथित कोशिश. पुलिस के मुताबिक, आरोपी पुराने कार्टन और खाली बौक्स संभाल कर रखते थे. जरूरत पडऩे पर दवाओं को उन्हीं बौक्स में दोबारा पैक किया जाता था.
वायल पर दर्ज बैच नंबर, एमआरपी और अन्य पहचान संबंधी जानकारी मिटाने के लिए एसीटोन जैसे रसायन का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है.
यह काम इसलिए किया, क्योंकि किसी दवा की पहचान केवल उस के नाम से नहीं होती. बैच नंबर, निर्माण संबंधी विवरण और दूसरी सूचनाएं उस के स्रोत और सप्लाई रिकौर्ड तक पहुंचने में मदद करती हैं. अगर वही जानकारी गायब कर दी जाए तो जांच मुश्किल हो सकती है.
दवा की पहचान मिटाने के बाद उसे थर्मोकोल के बौक्स में रखा जाता. उस के चारों ओर बबल रैपर लपेटा जाता. टेप और पौलीथिन से पैक किया जाता. फिर वह पैकेट किसी दूसरे शहर की ओर रवाना हो जाता.
कागज पर वह सामान्य पार्सल दिखाई देता, लेकिन पुलिस के मुताबिक उस के भीतर मरीज की जिंदगी से जुड़ी महंगी दवा होती थी.
पूरे कारोबार का हिसाब रखने के लिए रजिस्टर और डायरियां भी रखी जाती थीं. यानी यह कथित धंधा बेतरतीब नहीं था. इस के पीछे एक व्यवस्थित नेटवर्क होने का संदेह जांच एजेंसियों को था.
पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर का रहने वाला 26 वर्षीय अभिषेक वैश्य जांच में सामने आने वाले शुरुआती नामों में था. पुलिस के मुताबिक, वह वर्ष 2022 से इस अवैध कारोबार में सक्रिय था.
आरोप है कि वह अनधिकृत चैनल से एंटी कैंसर दवाएं खरीद कर आगे सप्लाई करता था. उस के ठिकाने से दवाओं के अलावा रजिस्टर, डायरी, इलैक्ट्रौनिक उपकरण, पैकिंग सामग्री और 4 लाख रुपए नकद बरामद होने की बात पुलिस ने कही.
जांचकर्ताओं के लिए यह बरामदगी महत्त्वपूर्ण थी. क्योंकि एक तरफ दवाएं थीं और दूसरी तरफ उन दवाओं के लेनदेन का हिसाब रखने वाले दस्तावेज. अब पुलिस को यह समझना था कि अभिषेक तक दवाएं कौन पहुंचाता था और वह आगे किन लोगों को देता था.
पूछताछ में सामने आई कडिय़ां धीरेधीरे नेटवर्क को और फैलाती चली गईं. दिल्ली के ही 25 वर्षीय शुभम कुमार चौधरी पर पुलिस ने वर्ष 2023 से बिना बिल नकद में दवाओं की खरीदबिक्री करने का आरोप लगाया था. उस के कब्जे से दवाओं के साथ बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी.
उस का 22 वर्षीय भाई सूरज चौधरी भी कथित रूप से वर्ष 2024 से इस कारोबार में उस के साथ जुड़ा हुआ था.
दोनों से जुड़ी काररवाई में दवाओं के अलावा 23.19 लाख रुपए नकद मिले थे. जांचकर्ताओं के सामने अब नकदी के स्रोत का सवाल था. क्या यह दवाओं की बिक्री से आई थी? किसकिस व्यक्ति से लेनदेन हुआ? क्या बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया? या कारोबार का बड़ा हिस्सा नकद में चलता था? इन सवालों के जवाब के लिए पुलिस वित्तीय रिकौर्ड खंगाल रही थी.
गाजियाबाद का 28 वर्षीय गगन होलसेल मैडिसिन कारोबार से जुड़ा था. वह सतीश कुमार से इंजेक्शन ले कर उन्हें अभिषेक तक पहुंचाता था. यानी नेटवर्क में एक और मध्यस्थ कड़ी सामने आ गई.
सतीश कुमार के बारे में पुलिस का कहना था कि वह पहले एक नामी अस्पताल में काम कर चुका था और कथित रूप से मरीजों के लिए रखे स्टौक से दवाएं बाहर निकाल कर आगे पहुंचाता था.
यहीं से जांच का सब से गंभीर हिस्सा शुरू हुआ. अगर अस्पताल के मरीजों के लिए रखी दवा वास्तव में बाहर निकाली गई थी तो वह कैसे निकली? स्टोर से, फार्मेसी से, नसिंग स्टाफ के जरिए या किसी और माध्यम से? जांच एजेंसियां इन सवालों का जवाब तलाशने लगीं.
जांच में गुरुग्राम निवासी 30 वर्षीय मुकेश का नाम भी जांच में सामने आया. पुलिस के मुताबिक, वह वर्ष 2023 से अस्पतालों में मरीजों के लिए रखी दवाओं को फार्मासिस्ट और ब्रोकरों तक पहुंचाता था. काररवाई के दौरान उस के वाहन से दवाएं और साढ़े 16 लाख रुपए नकद मिलने की बात कही गई. एक गाड़ी, कुछ वायल और भारी नकदी, जांचकर्ताओं के लिए ये चीजें केवल बरामदगी नहीं थीं. यह नेटवर्क के अगले हिस्से तक पहुंचने के सुराग थे.
अब सवाल था कि मुकेश से दवाएं कौन लेता था? क्या वह केवल परिवहनकर्ता था या बिक्री में भी उस की भूमिका थी? पूछताछ और दस्तावेजों की जांच से इन सवालों के जवाब खोजे जा रहे थे.
मुंबई की तरफ बढ़ी जांच
दिल्ली से निकली जांच अब नवी मुंबई तक पहुंच चुकी थी. 23 वर्षीय आयुष कुमार का नाम सामने आया. पुलिस के अनुसार, वह ‘Oncura Innovations Pvt Ltd’ और आयुष फार्मा से जुड़ा था और कथित रूप से दवाओं की बिक्री करता था. उस के पास से कुछ वायल बरामद होने की बात कही गई.
अब दिल्ली और मुंबई के बीच दवाओं की आवाजाही की तसवीर पुलिस के सामने आने लगी थी. एक शहर में दवा खरीदी जाती, दूसरे शहर में पहुंचती. फिर किसी तीसरे व्यक्ति के हाथ लगती. और अंत में किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुंच सकती थी, जो उस के वास्तविक स्रोत से अनजान भी हो सकता था.
यही कारण था कि पुलिस केवल गिरफ्तार लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहती थी, उसे अंतिम खरीदार तक पहुंचना था.
हर अवैध कारोबार को लंबे समय तक चलाने के लिए एक परदा चाहिए. पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क में भी कथित रूप से मैडिकल फर्मों और वैध कारोबार की आड़ इस्तेमाल की जाती थी.
गाजियाबाद के 35 वर्षीय विश्वास त्यागी पर फरजी फर्मों के बैंक खातों और फरजी इनवौइस के जरिए लेनदेन को वैध दिखाने का आरोप है. बताया गया कि वह लंबे समय तक मैडिकल स्टोरों पर काम कर चुका था. इस अनुभव ने उसे मैडिकल कारोबार की बारीकियों से परिचित कराया होगा, यह जांच का विषय था.
झज्जर निवासी 34 वर्षीय परमजीत श्योराण बी.फार्मा बताया गया और वह मैडिकल स्टोर चलाता था. पुलिस को संदेह था कि नेटवर्क में ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन के पास दवाओं और मैडिकल कारोबार का व्यावहारिक ज्ञान था.
यानी बाहर से सब कुछ सामान्य मैडिकल व्यापार जैसा दिख सकता था, लेकिन भीतर कथित तौर पर कुछ और चल रहा था.
नोएडा निवासी 42 वर्षीय आनंद कुमार को पुलिस नेटवर्क की महत्त्वपूर्ण कड़ी मान रही थी. उस के ठिकाने से 337 एंटी कैंसर वायल और बड़ी संख्या में अन्य दवाएं बरामद होने की बात कही गई.
अस्पताल के भीतर की कड़ी
337 वायल की बरामदगी ने जांच को एक नया मोड़ दिया. इतनी बड़ी मात्रा में महंगी दवाएं किसी व्यक्ति के पास क्यों थीं? वे कहां से आई थीं? क्या उन का कोई वैध दस्तावेज था? अगर वैध थीं तो उन का अंतिम गंतव्य क्या था? और अगर दस्तावेज नहीं थे तो उन्हें किसे बेचा जाना था? पुलिस अब इन सवालों के जवाब तलाशने में जुट गई थी.
इस मामले ने जांचकर्ताओं को सब से अधिक चिंतित शायद इसलिए किया, क्योंकि कथित नेटवर्क का संपर्क अस्पतालों तक बताया गया. कैंसर मरीजों के लिए रखी दवा अस्पताल में इसलिए होती है, क्योंकि मरीज को उस की जरूरत पड़ सकती है.
दवा का हर वायल अस्पताल के रिकौर्ड का हिस्सा होता है. उस का इस्तेमाल किस मरीज पर हुआ, कब हुआ और किस डौक्टर ने लिखा, इन सब का रिकौर्ड रखा जाता है.
अगर ऐसा कोई वायल मरीज तक पहुंचने से पहले गायब हो जाए तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं होती, किसी मरीज का उपचार प्रभावित हो सकता है. और यही कारण था कि जांच एजेंसियां अस्पताल से बाहर निकलने वाली दवाओं के स्रोत का पता लगाने में जुट गईं.
गुरुग्राम निवासी 35 वर्षीय मयंक गर्ग वर्ष 2014 से फार्मास्युटिकल फर्म चलाने से जुड़ा बताया गया. पुलिस के मुताबिक, वह अस्पतालों में काम करने वाले लोगों के जरिए एंटी कैंसर दवाएं हासिल कर सिंडिकेट तक पहुंचाता था.
अगर पुलिस का आरोप सही साबित होता है तो यह नेटवर्क की महत्त्वपूर्ण कड़ी थी, क्योंकि बाहरी बाजार से दवा खरीदना एक बात है, लेकिन अस्पताल के भीतर उपलब्ध दवा तक पहुंच बनाना बिलकुल अलग बात.
अस्पताल में काम करने वाले व्यक्ति को पता होता है कि दवाएं कहां रखी जाती हैं, उन का रिकौर्ड कैसे बनता है और मरीज तक उन का इस्तेमाल किस प्रक्रिया से होता है. इसीलिए पुलिस अस्पताल कर्मचारियों से जुड़े हर संभावित संपर्क की जांच कर रही थी.
फरीदाबाद निवासी 33 वर्षीय दीपक उर्फं रवि का नाम भी इस मामले में सामने आया. उस ने डेंटल टेक्नीशियन का कोर्स किया था और कथित तौर पर अस्पताल में औन्कोलौजिस्ट के पीए के तौर पर काम करता था.
पुलिस का आरोप है कि उसे दवाएं अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ से मिलती थीं. उस के घर से 108 वायल और साढ़े 6 लाख रुपए नकद बरामद हुए.
108 वायल की बरामदगी ने पुलिस के सामने एक अहम सवाल रखा कि क्या ये सभी दवाएं मरीजों के लिए रखे स्टौक से निकाली गई थीं? अगर हां, तो किस अवधि में? इस से कितने मरीजों का इलाज प्रभावित हो सकता था? कितनी दवाएं पहले ही बाजार में जा चुकी थीं? इस तरह यह जांच अब अस्पतालों के रिकौर्ड से मिलान की दिशा में बढ़ रही थी.
नर्सिंग इंचार्ज पर आरोप
फरीदाबाद निवासी 42 वर्षीय जसवंत शर्मा नर्सिंग क्वालिफिकेशन रखता था और एक नामी अस्पताल के औन्कोलौजी विभाग में नर्सिंग इंचार्ज बताया गया. उस का नाम सामने आना इसलिए भी गंभीर था, क्योंकि औन्कोलौजी विभाग में महंगी और संवेदनशील दवाओं का उपयोग होता है.
पुलिस अब यह पता लगाने में लगी थी कि अस्पताल में मौजूद दवाओं और बरामद दवाओं के बीच कोई संबंध है या नहीं.
इसी क्रम में अलवर निवासी मनीष शर्मा का नाम सामने आया. उस ने जयपुर से नर्सिंग की पढ़ाई की थी. पुलिस का आरोप है कि उस ने अस्पताल में मरीजों के लिए रखे एंटी कैंसर इंजेक्शनों की कथित हेराफेरी की.
अब जांच का दायरा केवल दवा कारोबारियों तक नहीं रहा था. यह अस्पताल के अंदर तक पहुंच चुका था.
हैदराबाद निवासी 52 वर्षीय श्रीनिवासुलु कलवा मैडिकल स्टोर चलाता था. इस के अलावा 35 वर्षीय मालगारी श्रीनाथ रेड्डी बी. फार्मा बताया गया और एक नामी अस्पताल में नौकरी कर चुका था. इन नामों ने नेटवर्क का भौगोलिक विस्तार और स्पष्ट कर दिया.
दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि से शुरू हुई दवा की यात्रा दूसरे शहर में पहुंच कर खत्म नहीं होती थी. वह कई हाथों से गुजरती थी.
जांच की सब से बड़ी तसवीर बरामदगी के आंकड़ों से सामने आई. करीब 9 करोड़ रुपए कीमत की 588 एंटी कैंसर दवाओं की भरी वायल, 6 खाली वायल, 7 खाली बौक्स और दूसरी दवाओं की 3,021 यूनिट. इस के अलावा करीब 50.19 लाख रुपए नकद.
लेकिन किसी अपराध की गंभीरता केवल बरामद माल की कीमत से तय नहीं होती, यहां असली सवाल उन मरीजों का था, जिन के लिए ये दवाएं बनाई गई थीं.
कैंसर के मरीज और उन के फेमिली वाले अकसर एक इंजेक्शन की व्यवस्था के लिए अपनी जमापूंजी तक खर्च कर देते हैं. कई परिवार जमीन बेचते हैं, कर्ज लेते हैं, गहने गिरवी रख कर किसी तरह इलाज जारी रखते हैं.
ऐसे में अगर वही दवा अवैध बाजार में पहुंच जाए तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मरीज की मजबूरी का फायदा उठाना भी है.
खंगाला बैंक रिकौर्ड
छापेमारी के बाद पुलिस के सामने केवल आरोपियों से पूछताछ का काम नहीं था. नकदी के साथ बैंकिंग रिकौर्ड भी महत्त्वपूर्ण थे. किस खाते में पैसा आया? किसे भेजा गया? किस फर्म के नाम पर भुगतान हुआ? कहां नकद लेनदेन हुआ? क्या फरजी बिल बनाए गए? क्या किसी वैध मैडिकल कारोबार की आड़ में संदिग्ध लेनदेन हुआ?
इन सवालों के जवाब पूरे नेटवर्क का वित्तीय नक्शा तैयार कर सकते थे. पुलिस अब बैंक खातों, नकद लेनदेन, रजिस्टर और डायरियों की जांच करने लगी. क्राइम ब्रांच ने जांच को 2 दिशाओं में आगे बढ़ाया. पहली थी, बैकवर्ड लिंक. यानी दवा आखिर आई कहां से? किस ने निकाली? किस ने खरीदी? किस अस्पताल या सरकारी संस्थान से उस का संबंध था?
दूसरी थी, फौरवर्ड लिंक. यानी दवा आगे किसे बेची गई? किस शहर में भेजी गई? किस मैडिकल फर्म या ब्रोकर तक पहुंची? और अंत में असली खरीदार कौन था?
यह जांच इसलिए भी महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि 17 लोगों की गिरफ्तारी के बावजूद पूरा नेटवर्क इस से बड़ा हो सकता था.
अगर किसी एक व्यक्ति ने दवा खरीदी, दूसरे ने पैक की, तीसरे ने पहुंचाई और चौथे ने बेच दी तो हर व्यक्ति नेटवर्क की अलग कड़ी था. पुलिस को यह पूरी शृंखला जोडऩी थी.
जांच में एक और महत्त्वपूर्ण अंतर सामने आया. कुछ दवाओं को कथित रूप से नकली बताया गया, जबकि कुछ दवाओं के अस्पतालों या सरकारी संस्थानों से डायवर्ट किए जाने की बात सामने आई. दोनों स्थितियां बेहद गंभीर थीं. नकली दवा मरीज के शरीर में गलत या खतरनाक पदार्थ पहुंचा सकती है.
दूसरी ओर, असली दवा का अवैध डायवर्जन मरीज के लिए निर्धारित उपचार को प्रभावित कर सकता था. यानी किसी भी रास्ते से मरीज ही सब से कमजोर पक्ष था.
कल्पना कीजिए, अस्पताल के स्टोर में एक वायल रखी है. उस पर मरीज का नाम दर्ज हो सकता है. डौक्टर ने उसे लिख रखा है. फार्मेसी रिकौर्ड में उस का हिसाब है, लेकिन वह वायल मरीज तक पहुंचने से पहले गायब हो जाती है. फिर वह किसी बिचौलिए के हाथ जाती है. वहां से किसी कारोबारी तक पहुंचती है, फिर उस की पैकिंग बदलती है. उस की पहचान मिटाने की कोशिश होती है. और अंत में वह किसी दूसरे शहर में बेच दी जाती है.
जिस मरीज के लिए वह दवा आई थी, उसे शायद पता भी नहीं चलेगा कि उस की दवा कहां गई. और अगर अस्पताल को समय पर पता न चले तो रिकौर्ड में भी कोई अंतर बाद में सामने आ सकता है. यही वह कथित तंत्र था, जिस की तह तक पुलिस पहुंचना चाहती थी.
एक डायरी, कई सवाल
जांचकर्ताओं को बरामद रजिस्टर और डायरियों से उम्मीद थी कि उन में लेनदेन के सुराग मिलेंगे. किस दिन कितनी दवा आई? किसे दी गई? कितने पैसे मिले? किस माध्यम से भेजी गई? किस शहर में भेजी? इस का उत्तर डायरी में दर्ज था तो वह पूरे नेटवर्क का दस्तावेज बन सकता था.
इलेक्ट्रौनिक उपकरणों की भी जांच की गई. क्योंकि आधुनिक अवैध कारोबार केवल कागज पर नहीं चलता. फोन संदेश, संपर्क, डिजिटल भुगतान और इलैक्ट्रौनिक रिकौर्ड भी किसी नेटवर्क की गतिविधियों का पता दे सकते हैं.
17 लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने सब से कठिन चरण शुरू हुआ. गिरफ्तारी किसी जांच का अंत नहीं होती. यह अकसर उस जांच की शुरुआत होती है, जिस में पूछताछ, दस्तावेज, बैंकिंग रिकौर्ड, अस्पताल के स्टौक रजिस्टर और बरामद दवाओं की पहचान को आपस में जोड़ा जाता है.
किसी वायल का बैच नंबर अगर मिटाया गया था तो उसे वैज्ञानिक जांच से पहचानने की कोशिश की जा सकती थी. किसी अस्पताल के रिकौर्ड में कमी थी तो उसे बरामद दवाओं से मिलाया जा सकता था. किसी बैंक खाते में असामान्य भुगतान था तो उसे डायरी में दर्ज लेनदेन से जोड़ा जा सकता था. इस तरह छोटेछोटे सुराग एक बड़ी तसवीर बनाते हैं.
छापेमारी में करीब 9 करोड़ रुपए की दवाएं बरामद होने की खबर ने पूरे मामले की गंभीरता उजागर कर दी.
लेकिन पुलिस के सामने एक और बड़ा सवाल था कि क्या बरामदगी ही पूरे नेटवर्क की सीमा थी? या इस से पहले भी बड़ी मात्रा में दवाएं बाजार में पहुंच चुकी थीं? अगर दवाएं पहले ही बिक चुकी थीं तो वे किन मरीजों तक पहुंचीं? क्या खरीदारों को पता था कि दवाएं संदिग्ध स्रोत से आई हैं? क्या कुछ खरीदार खुद इस नेटवर्क का हिस्सा थे? और क्या इस नेटवर्क के पीछे कोई बड़ा कारोबारी या वित्तीय संचालक अभी बाहर था? इन सवालों के जवाब आने बाकी थे.
कैंसर का इलाज केवल चिकित्सा विज्ञान की लड़ाई नहीं है. यह मरीज और उस के परिवार की भावनात्मक और आर्थिक लड़ाई भी है. एक तरफ डौक्टर होते हैं, जो मरीज की जिंदगी बचाने की कोशिश करते हैं. दूसरी तरफ परिवार होता है, जो पैसे जुटाता है. और फिर दवा होती है, जो इस पूरी प्रक्रिया की सब से महत्त्वपूर्ण कड़ी है.
ऐसे में अगर कोई व्यक्ति उसी दवा को अवैध कमाई का साधन बना ले तो वह केवल एक कानून नहीं तोड़ता. वह किसी परिवार की उम्मीद पर हमला करता है.
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की जांच ने कथित रूप से इसी काले कारोबार का एक बड़ा चेहरा सामने रखा है, लेकिन यह कहानी केवल 17 गिरफ्तारियों और 9 करोड़ रुपए की बरामदगी पर खत्म नहीं होती.
असल कहानी तब पूरी होगी, जब यह पता चलेगा कि दवा अस्पताल से निकली तो किस ने निकाली, किस ने खरीदी, किस ने उस का चेहरा बदला, किस ने शहरों के बीच पहुंचाया और अंत में किस के हाथों तक पहुंची.
अपराध की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही जांच एजेंसियां अब इस कथित सिंडिकेट की सप्लाई चेन की जड़ों और शाखाओं को जोड़ रही हैं. अस्पतालों और सरकारी संस्थानों के स्टौक रिकौर्ड की जांच होगी. दवाओं के स्रोत का पता लगाया जाएगा. फरजी बिल और फर्मों के वित्तीय रिकौर्ड खंगाले जाएंगे. बैंक खातों और नकद लेनदेन की जांच होगी. कुरियर और परिवहन के रास्तों की जानकारी जुटाई जाएगी.
और सब से महत्त्वपूर्ण उन लोगों की पहचान करने की कोशिश होगी, जो इस कथित कारोबार के पीछे थे, लेकिन अभी तक जांच की पहुंच से बाहर हैं.
17 लोगों की गिरफ्तारी के बाद नेटवर्क का एक हिस्सा सामने आया है, लेकिन अपराध की दुनिया में अकसर सामने आया हिस्सा पूरी तसवीर नहीं होता. कई बार सब से महत्त्वपूर्ण व्यक्ति वही होता है, जिस का नाम किसी रजिस्टर में नहीं होता, जो खुद दवा हाथ में नहीं रखता, जो खुद पैकेट नहीं भेजता, जो खुद अस्पताल नहीं जाता, वह केवल निर्देश देता है. और बाकी लोग उस के निर्देश पर काम करते हैं.
मरीजों की जिंदगी से बड़ा कोई मुनाफा नहीं होता. इस पूरे मामले की सब से भयावह बात यही है कि कथित कारोबार का माल कोई सामान्य वस्तु नहीं था. यह कैंसर रोधी दवाएं थीं. वह दवा जिस के लिए किसी अस्पताल के कमरे में कोई मरीज अपनी अगली सांस की उम्मीद लगाए बैठा हो सकता है.
यह दवा जिस के लिए परिवार का कोई सदस्य रातदिन पैसे जुटा रहा हो सकता है. वह दवा जिसे डौक्टर ने इसलिए चुना है, क्योंकि मरीज को उस की जरूरत है.
और वही दवा अगर किसी अवैध नेटवर्क की पैकिंग में बंद हो कर किसी दूसरे शहर की ओर चली जाए तो उस के पीछे केवल काला बाजार नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी का संकट छिपा होता है.
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया है और करीब 9 करोड़ रुपए की दवाओं की बरामदगी का दावा किया है.
आगे की जांच ही बताएगी कि आरोप कितने सही साबित होते हैं, कौनकौन इस नेटवर्क का हिस्सा था और इस कथित सिंडिकेट ने कितनी दवाएं अस्पतालों और सरकारी आपूर्ति से बाहर निकालीं. कानून अपना काम करेगा, अदालत में आरोपों की जांच होगी, दोष सिद्ध या बरी होना न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, लेकिन इस मामले ने एक बेहद गंभीर सवाल जरूर सामने रख दिया है कि जिस दवा को किसी कैंसर मरीज की जिंदगी बचाने के लिए बनाया गया था, वह आखिर किसी अपराधी की तिजोरी तक कैसे पहुंच गई?
इस सवाल का जवाब केवल इस एक मामले के लिए जरूरी नहीं है. यह पूरे दवा वितरण तंत्र के लिए चेतावनी है. क्योंकि अस्पताल की अलमारी में बंद एक छोटी सी वायल किसी कारोबारी के लिए केवल सामान हो सकती है, लेकिन कैंसर से जूझ रहे मरीज के लिए वह जिंदगी की उम्मीद होती है और जिंदगी की उम्मीद का कोई काला बाजार नहीं होना चाहिए. Cancer Drug Racket






