मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 3

रीनू ने पड़ोसी जीशान को फोन कर के घर बुला लिया. उस ने मुन्ना को देख कर कहा, ‘‘यह एक गंभीर चर्मरोग है. इस की दवा मुझे मालूम नहीं है. ऐसा करो, तुम मेरे कमरे पर आ जाओ. मैं लैपटौप में देख कर इस के लिए दवा लिख देता हूं.’’  यह कह कर जीशान चला गया.

मुन्ना की पीठ में निकले दानों में भयंकर जलन हो रही थी. उस की परेशानी रीनू से देखी नहीं जा रही थी. घर में उस के अब्बा या कोई भाई नहीं था, इसलिए मजबूरी में उसे ही जीशान के कमरे पर जाना पड़ा. जून की भयंकर गरमी में चौथी मंजिल तक सीढि़यां चढ़तेचढ़ते उस की जुबान सूख गई. कमरे में सामने ही मेज पर पानी की बोतल रखी थी. रीनू ने पानी पीने के लिए जैसे ही बोतल उठाई, जीशान ने कहा, ‘‘यह जूठी है, इसलिए इस का पानी तुम्हारे पीने लायक नहीं है. मैं तुम्हारे लिए नीचे से दूसरा ठंडा पानी लाए देता हूं.’’

जीशान भाग कर नीचे गया और रीनू के लिए एक गिलास ठंडा पानी ले आया. उसे पीते ही रीनू को चक्कर सा आया और वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. इस के बाद उस के साथ क्या हुआ, उसे पता नहीं चला. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो वह दवा की पर्ची ले कर घर आ गई. जब उस के ऊपर से बेहोशी का असर पूरी तरह से हटा तो उसे लगा कि जीशान ने उसे पानी में कोई नशीली चीज पिला कर उस के साथ गलत काम किया है. उस के साथ क्या हुआ होगा, वह जान तो गई, लेकिन वह शादीशुदा थी, इसलिए इज्जत ही नहीं, अपनी गृहस्थी बचाए रखने के लिए उस ने यह बात किसी से नहीं कही.

रीनू ने सोचा कि जो होना था, वह हो गया. लेकिन अब आगे से वह जीशान को इस तरह का कोई मौका नहीं देगी. लेकिन जीशान नादान नहीं था. उस ने रीनू को कब्जे में रखने के लिए उस से संबंध बनाने की वीडियो क्लिप बना ली थी. उसी को ले कर वह तीसरे दिन रीनू के घर आ धमका. उस ने रीनू को एकांत में ले जा कर हंसते हुए उसे वह अश्लील वीडियो क्लिप दिखा कर कहा, ‘‘अब तुम्हें वही करना होगा, जो मैं कहूंगा. अगर तुम ने मना किया तो यह वीडियो क्लिप मैं मोहल्ले में सभी को दिखा दूंगा.’’

‘‘जीशान, तुम ऐसा कतई मत करना, वरना मेरा हंसताखेलता घरपरिवार बिखर जाएगा. मेरे बच्चों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी. खुदा के लिए इसे डिलीट कर दो.’’

‘‘ठीक है, तुम कहती हो तो डिलीट कर दूंगा, लेकिन बदले में तुम्हें मुझे खुश करना होगा.’’ जीशान ने शर्त रखी.

न चाहते हुए भी रीनू को जीशान की बात माननी पड़ी. इस बार भी जीशान ने अपने और रीनू के शारीरिक संबंधों की वीडियो क्लिप बना ली. फिर तो सिलसिला सा चल पड़ा. क्लिपों को डिलीट करने की बात कह कर वह रीनू से शारीरिक संबंध बनाता रहा. यही नहीं, वह हर बार की वीडियो क्लिप भी बना लेता था. इस तरह जीशान के जाल में रीनू बुरी तरह फंसती चली गई.

यह सब रीनू अपने घरपरिवार और बच्चों के भविष्य के लिए कर रही थी. उसे यह भी पता था कि उस का पति उसे जान से ज्याद प्यार करता है. अगर ऐसे में उसे जीशान और उस के संबंधों के बारे में पता चल गया तो वह यह सब बरदाश्त नहीं कर पाएगा. इसी वजह से वह जीशान के चंगुल में फंसती चली गई थी. जब रीनू को लगा कि अब वह जीशान के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाएगी तो उस ने आत्महत्या के बारे में भी सोचा. लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए वह ऐसा नहीं कर सकी.

उमर को जब जीशान की असलियत का पता चला तो उसे उस पर बहुत गुस्सा आया. उसे लगा कि जब तक यह आदमी जिंदा रहेगा, उस की पत्नी को ब्लैकमेल करते हुए वह उस की देह से खेलता रहेगा. यही नहीं, अपने दोस्तों के बीच उस की इज्जत का तमाशा भी बनाएगा. अब यह सब तभी बंद होगा, जब उसे मार दिया जाए.

उमर के दिमाग में जीशान को मारने की बात आई तो उस ने उस की हत्या की योजना बना डाली. फिर उसी योजना के तहत 29 दिसंबर को ट्रैवल बैग में एक लोहे की रौड रख कर वह पुष्पक एक्सप्रेस से कानपुर आ गया. वह दोपहर 1 बजे के करीब कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर उतरा. ससुराल जाने के बजाए वह स्टेशन के बाहर होटल में कमरा ले कर ठहर गया.

रात 10 बजे उमर शाद बैग ले कर होटल से बाहर निकला. उस समय भयंकर ठंड पड़ रही थी, जिस से सड़कों पर लगभग सन्नाटा पसरा था. एक रिक्शा ले कर वह मकबरा के लिए चल पड़ा. 11 बजे के आसपास वह मकबरा पहुंचा तो मोहल्ले में पूरी तरह सन्नाटा था. वह अपनी ससुराल जाने के बजाय सीधे जीशान के कमरे  पर चला गया. एकबारगी उमर को अपने कमरे पर देख कर जीशान ने हैरानी से पूछा, ‘‘अरे उमर भाईजान, इतनी रात को अचानक यहां कैसे?’’

‘‘मुंबई से आ रहा हूं. कोहरे की वजह से ट्रेन लेट हो गई. यहां आया तो देखा गलीमोहल्ले में सन्नाटा पसरा है. ससुराल वाले रजाई में दुबके होंगे. उन्हें परेशान करने के बजाय सीधे आप के कमरे पर चला आया. सोचा, रात आप के साथ गुजार लूं, सुबह ससुराल चला जाऊंगा.’’ हंसते हुए उमर ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, यह भी आप का ही घर है. कपड़े उतार कर रजाई में आ जाओ. बड़ी ठंड है.’’ जीशान ने कहा.

कपड़े उतार कर उमर जीशान के साथ लेट गया. कुछ देर दोनों बातें करते रहे. बातें करतेकरते जीशान तो सो गया, लेकिन उमर जागता रहा. क्योंकि वह तो प्रतिशोध की आग में जल रहा था. जब उसे यकीन हो गया कि जीशान सो गया है तो वह धीरे से उठा. उस ने मुंबई से लाई लोहे की रौड बैग से निकाली और गहरी नींद सो रहे जीशान के सिर पर पूरी ताकत से एक के बाद एक कई वार कर दिए.

सिर पर गहरी चोट लगने से जीशान चीख भी नहीं सका और इस दुनिया से विदा हो गया. इस के बाद प्रतिशोध की आग में जल रहे उमर ने रजाई हटा कर उस के पुरुषांग पर भी कई वार किए. इस पर भी उसे संतोष नहीं हुआ तो उस ने साथ लाई रौड को पत्थर से ठोंकठोंक कर खूंटे की तरह उस के पेट में घुसेड़ दिया.

यह सब कर के उमर ने जीशान का मोबाइल फोन उठाया और तीसरी मंजिल के दरवाजे पर ताला लगा कर नीचे आ गया. वहां से सीधे वह रेलवे स्टेशन पहुंचा और मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ कर अपने घर चला गया. पुलिस से बचने के लिए उस ने जीशान और अपना मोबाइल फोन तथा दोनों सिम तोड़ कर रास्ते में कहीं फेंक दिए.

उमर ने जीशान की हत्या का अपराध स्वीकार कर के हत्या की वजह भी पुलिस को बता दी थी. इस के बाद थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ ने उस के खिलाफ जीशान की हत्या का मुकदमा दर्ज कर 6 जनवरी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

(कथा में महिलाओं के नाम बदले हुए हैं.)

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 2

पूछताछ करतेकरते 2 दिन बीत गए. इसे बीच पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. इस से इलाके में तनाव बढ़ने लगा. जब इस बात की जानकारी एसपी (पश्चिम) दिनेश कुमार पी. को हुई तो उन्होंने मामले की जांच के लिए आननफानन एक पुलिस टीम गठित कर दी, जिस में थाना ग्वालटोली, कर्नलगंज, कोहना के थानाप्रभारियों के अलावा क्राइम ब्रांच के कुछ तेजतर्रार अधिकारियों को भी शामिल किया गया.

इस पुलिस टीम ने सब से पहले जीशान और उस के कुछ मित्रों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स के अध्ययन के बाद पुलिस को उस में मिले एक नंबर पर संदेह हुआ. पुलिस ने उस नंबर के मोबाइन फोन की लोकेशन निकलवाई तो पता चला कि घटना वाले दिन वह फोन कानपुर में ही था, जबकि वह नंबर महाराष्ट्र का था. इस में अहम बात यह थी कि घटना से पहले उस की लोकेशन जहां कानपुर और घटनास्थल के आसपास थी, वहीं घटना घटने के बाद वह फोन बंद कर दिया गया था.

जांच टीम ने उस नंबर के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला मऊ के थाना घोसी के रहने वाले मोहम्मद उमर शाद के नाम था, जो वर्तमान में परिवार के साथ महाराष्ट्र के जिला थाणे के थाना नालासोपारा के अचोल रोड स्थित एमडीनगर के किसराज स्कूल के नजदीक साईंनाथ अपार्टमेंट के रूम नंबर 103 में रहता था. इसी के साथ यह भी पता चला कि कानपुर के ग्वालटोली के मोहल्ला मकबरा के रहने वाले अब्बास की बेटी रीनू से उस का निकाह हुआ था.

पुलिस ने अब्बास से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘मेरे दामाद मोहम्मद उमर शाद के मृतक जीशान से दोस्ताना संबंध थे. लेकिन वह तो इधर 6 महीने से कानपुर आया ही नहीं है.’’

लेकिन पुलिस को सर्विलांस द्वारा मिली जानकारी के अनुसार उमर शाद घटना वाले दिन कानपुर में ही था. पुलिस समझ गई कि अब्बास या तो झूठ बोल रहा है या उस के आने का इसे पता नहीं है. यही बात उमर की पत्नी रीनू ने भी पुलिस को बताई थी. बहरहाल पुलिस को अब्बास, उस की बेटी रीनू और दामाद मोहम्मद उमर शाद पर शक हो गया. पुलिस ने छानबीन की तो सचमुच मामला अवैध संबंध का निकला.

अवैध संबंध की बात सामने आते ही मोहम्मद उमर शाद को कानपुर लाने के लिए एक पुलिस टीम थाणे के लिए रवाना हो गई. लेकिन पुलिस टीम के वहां पहुंचने से पहले ही वह फरार हो गया. पुलिस को वहां से उस का मोबाइल नंबर मिल गया, जिसे सर्विलांस पर लगा कर उस की लोकेशन पता की जाने लगी. फिर सर्विलांस के माध्यम से ही उस की लोकेशन पता कर के घंटाघर रेलवे स्टेशन से उसे गिरफ्तार कर लिया गया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने जीशान की हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी.

मूलरूप से जिला मऊ के थाना घोसी के रहने वाले मोहम्मद उमर शाद के पिता सालों पहले मुंबई जा कर रहने लगे थे. उन्हीं के साथ उन का परिवार भी रहता था. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 6 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन्हीं में एक उमर शाद भी था. वह मुंबई में बच्चों की साइकिल बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी करता था.

चूंकि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला था, इसलिए आज भी उस के तमाम रिश्तेदार उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में रह रहे हैं. यही वजह थी कि 7 साल पहले उस की शादी कानपुर के ग्वालटोली के मोहल्ला मकबरा के रहने वाले अब्बास की बेटी रीनू के साथ हो गई थी. अब तो वे 2 बच्चों के मांबाप भी बन चुके हैं.

पिछले साल अचानक रीनू की तबीयत खराब हुई तो वह इलाज कराने के इरादे से उमर से अनुमति ले कर अपने देवर मुन्ना के साथ कानपुर आ गई. कुछ दिन कानपुर में रहने के बाद मुन्ना मुंबई वापस गया तो उस ने अपने बड़े भाई उमर शाद से कहा, ‘‘भइया, मुझे लगता है कि कानपुर में भाभी का उन्हीं के मोहल्ले के रहने वाले एक लड़के से गलत संबंध है.’’

‘‘ऐसा तुम्हें कैसे लगा?’’ उमर शाद ने मुन्ना से पूछा.

‘‘उन दोनों के बातव्यवहार से,’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘हमारे खयाल से भाभी को कानपुर भेजना ठीक नहीं है.’’

भाई की इन बातों ने उमर शाद को बेचैन कर दिया, क्योंकि पत्नी का सालोंसाल का पलपल का साथ, बातचीत और नजदीकियों से भाई की बातों पर उसे विश्वास नहीं हुआ था. लेकिन वह पुरुष था. पुरुष का मन शंकालु होता है, इसलिए भाई की बातें सोचसोच कर वह रातदिन बेचैन रहने लगा.

जब यह बेचैनी कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगी तो वह 2 महीने की छुट्टी ले कर कानपुर अपनी ससुराल आ गया और जीशान तथा अपनी पत्नी रीनू पर नजर रखने लगा. उसी बीच उसे मोहल्ले के कुछ लड़कों से पता चला कि रीनू और जीशान के बीच शारीरिक संबंध ही नहीं हैं, बल्कि जीशान ने अपने उन संबंधों की वीडियो क्लिपें भी बना रखी हैं.

इस बात ने उमर की बेचैनी और बढ़ा दी. सच्चाई का पता लगाने के लिए उस ने जीशान से दोस्ती गांठ ली. वह किसी भी तरह उस के मोबाइल में पड़ी रीनू और उस की वीडियो क्लिपें देखना चाहता था. इस के लिए वह जीशान के साथ उस के कमरे पर रुका भी, लेकिन जीशान ने मोबाइल में कोड लगा रखा था, इसलिए वह उस की मेमोरी को खोल नहीं सका. धीरेधीरे उस की उलझन बढ़ती ही जा रही थी.

इसी तरह छुट्टी खत्म हो गई और उमर मुंबई चला गया. कानपुर में रहते हुए उस ने रीनू से भले ही कुछ नहीं कहासुना था, लेकिन उस के दिमाग में यह बात पूरी तरह बैठ गई थी कि उस की पत्नी का जीशान से संबंध है. इसलिए इस बात को ले कर वह बुरी तरह परेशान रहने लगा था.

दूसरी ओर जीशान चाहता था कि अगर रीनू का उमर से तलाक हो जाए तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. इस के लिए वह अपने करीबी मित्रों से उमर शाद के मोबाइल पर फोन करवा कर अपने और रीनू के शारीरिक संबंधों की बात कहलवाने लगा था. उसे लगता था कि यह जान कर उमर अपनी पत्नी रीनू को तलाक दे देगा.

उमर शाद रीनू से बेहद प्यार करता था, इसलिए वह किसी भी सूरत में उसे छोड़ना नहीं चाहता था. लेकिन रीनू और जीशान के संबंधों को ले कर जब भी उस के पास कोई फोन आता, वह बुरी तरह तिलमिला उठता था. ऐसे में वह गुस्से में अपने शरीर को किसी धारदार चीज से काट लेता. इस के बाद भयानक पीड़ा उठती तो पत्नी के गैरमर्द के संबंधों की तिलमिलाहट धीरेधीरे शांत हो जाती. एक बार तो उस ने पत्नी की इस बेवफाई पर जान तक देने की कोशिश की, लेकिन किसी तरह वह बच गया.

उमर शाद खुद इतना परेशान और बेचैन रहता था, लेकिन उस के पास इन अनैतिक संबंधों का कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए वह इस बारे में पत्नी से कुछ पूछ नहीं पा रहा था. लेकिन जब उस की बेचैनी हद से ज्यादा बढ़ गई तो उस ने रीनू से उस के और जीशान के अवैध संबंधों तथा अश्लील वीडियो क्लिपों के बारे में पूछ ही लिया.

तब रीनू ने रोते हुए कहा, ‘‘मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है. इस की वजह से मैं कई महीनों से भयानक मानसिक पीड़ा की आग में दिनरात जल रही हूं. औरत हूं, इसलिए अपने साथ हुए धोखे के बारे में तुम से बताने की हिम्मत नहीं कर सकी. बस, यही मुझ से गलती हुई है.’’

‘‘तुम्हारे साथ यह सब कैसे हुआ, तुम ने कभी बताने की कोशिश क्यों नहीं की?’’ उमर शाद ने कहा.

‘‘कहा न, हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी. अब आप सब जान ही गए हैं तो आप को सारी सच्चाई बताए देती हूं.’’ रीनू ने कहा.

इस के बाद रीनू ने उमर को जो बताया, वह कुछ इस प्रकार था…

पिछले साल जून में बीमार होने पर मुन्ना रीनू को कानपुर ले कर आया तो मुन्ना की पीठ में दाने निकल आए थे, जिस की पीड़ा से वह काफी परेशान था. तब अब्बास ने रीनू से कहा कि वह उसे जीशान को दिखा कर उस के लिए मैडिकल स्टोर से दवा मंगा ले.

मोहब्बत का खतरनाक अंजाम – भाग 1

जीशान अपने भांजे शानू के पैर की ड्रेसिंग करने नहीं आया तो उस की बड़ी बहन अलीशा ने पहले उसे फोन किया, फोन बंद मिला तो उस ने उस की खोजखबर करवाई. लेकिन जब उस का कुछ पता नहीं चला तो अलीशा को लगा कि वह किसी जरूरी काम से कहीं बाहर चला गया होगा, घंटे-2 घंटे में लौट कर ड्रेसिंग कर देगा. यही सोच कर वह अपने कामकाज में लग गई. शाम के 5 बज गए और जीशान नहीं आया तो उसे चिंता हुई. चूंकि उस के पति एहसान किसी जरूरी काम से अहमदाबाद गए हुए थे और घर में कोई दूसरा बड़ाबूढ़ा नहीं था, इसलिए अलीशा ने पड़ोस में रहने वाले समीर को मोहल्ला मकबरा स्थित अपने दूसरे मकान पर जीशान के बारे में पता करने के लिए भेज दिया.

अलीशा के उस दूसरे 4 मंजिला मकान में कुल 6 कमरे थे, जिन में नीचे की 2 मंजिलों में 3 किराएदार अपने परिवार के साथ रहते थे. उस के ऊपर की तीसरी और चौथी मंजिल के 3 कमरों में 2 लड़के और उस का छोटा भाई जीशान हैदर रहता था. जीशान की खोज में आया समीर दूसरी मंजिल पर पहुंचा तो तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे पर ताला लगा था. वह वहीं रुक गया. तभी उसे वहां कुछ सड़ने जैसी बदबू महसूस हुई. ताला बंद होने की वजह से वह ऊपर नहीं जा सका तो नीचे रहने वाले किराएदारों से जीशान के बारे में पूछा. लेकिन वे लोग जीशान के बारे में कुछ नहीं बता सके.

जब समीर को जीशान के बारे में कुछ पता नहीं चला तो लौट कर उस ने अलीशा को बताया कि तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे पर ताला लगा है, इसलिए वह जीशान के कमरे तक पहुंच नहीं सका. लेकिन ऊपर से लाश के सड़ने जैसी बदबू आ रही थी. यह सुन कर अलीशा परेशान हो उठी. उस के दिल में छोटे भाई को ले कर तरहतरह की आशंकाएं उठने लगीं. वह खुद तो वहां नहीं जा सकी, लेकिन मोहल्ले के 2 अन्य लड़कों को बुला कर कहा, ‘‘तुम लोग समीर के साथ वहां जा कर तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे का ताला तोड़ कर ऊपर के सभी कमरों को ठीक से देखना. मुझे किसी गड़बड़ी की आशंका हो रही है.’’

समीर ने दोनों लड़कों के साथ जा कर तीसरी मंजिल पर जाने वाले दरवाजे का ताला तोड़ दिया. इस के बाद वह चौथी मंजिल पर पहुंचा तो वहां बने गोदामनुमा कमरे में जीशान हैदर की खून से लथपथ क्षतविक्षत लाश पड़ी देख कर डर गया. उस के साथ आए दोनों लड़के भी डर गए थे. उन्होंने लगभग भागते हुए आ कर यह बात अलीशा को बताई तो छोटे भाई की हत्या की खबर सुन कर अलीशा जोरजोर से रोने लगी.

उस के रोने की आवाज सुन कर मोहल्ले वाले इकट्ठा हो गए. धीरेधीरे यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई. अलीशा रोते हुए मकबरा स्थित अपने मकान की ओर भागी. उसी बीच किसी ने इस हत्या की जानकारी थाना ग्वालटोली पुलिस को दे दी थी. जानकारी मिलते ही थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे कर पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए थे.

जब वह घटनास्थल पर पहुंचे तो वहां भारी भीड़ जमा हो चुकी थी. उस में काफी तनाव भी था. थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधीक्षक (पश्चिम) दिनेश कुमार पी. को दी तो कानूनव्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्होंने थाना बजरिया, चमनगंज, कोहना के थानाप्रभारियों को पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. थोड़ी देर में वह खुद भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

फोरैंसिक टीम को जांच के दौरान कमरे से जैलोकेन के इंजेक्शन, सिरिंज और रबर की एक जोड़ी चप्पल मिली. टीम ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो पुलिस अपना काम करने लगी. कमरे में मिले जैलोकेन के इंजेक्शन से आशंका व्यक्त की गई कि मृतक जीशान की हत्या बेहोश कर के की गई थी.

हत्या बड़ी ही क्रूरता से की गई थी. उस का सिर और चेहरा इस तरह से कुचला गया था कि उस की एक आंख फूट गई थी. सिर का भेजा भी बाहर निकल आया था. नाजुक अंगों को भी हत्यारे ने बुरी तरह क्षतविक्षत किया था. यही नहीं, मृतक के पेट में लोहे की जो रौड घुसी थी, लगता था उस के पेट के ऊपर रख कर किसी भारी चीज से ठोंकी गई थी.

लाश और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद पुलिस ने पंचनामा तैयार कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए हैलेट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उस मकान में रहने वाले सभी किराएदारों और पड़ोसियों से पूछताछ की गई. पुलिस ने काफी प्रयास किया, लेकिन इस पूछताछ में हत्या से संबंधित ऐसी कोई भी जानकारी पुलिस को नहीं मिली, जिस से हत्यारे तक पहुंचने का रास्ता आसान हो जाता.

जीशान की हत्या की सूचना पा कर उस के बड़े भाई मोहम्मद इरफान घर वालों के साथ रात 10 बजे थाना ग्वालटोली पहुंच गए थे. इस के बाद उन्हीं की तहरीर पर थानाप्रभारी मोहम्मद अशरफ ने जीशान की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया. हत्या का मुकदमा दर्ज होने के बाद उन्होंने इरफान से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में इरफान ने जो बताया, उस के अनुसार वह उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के कस्बा सफीपुर के मोहल्ला सराय खुर्रम के रहने वाले डा. हसन असगरी उर्फ शम्मू का बेटा था. भाईबहनों में उस के अलावा उस के 2 भाई इमरान और मृतक जीशान के अलावा 2 बहनें थीं.

भाइयों में 29 वर्षीय जीशान सब से छोटा था. पढ़ाईलिखाई के साथ वह पिताजी की उन के काम में मदद करता था, जिस की वजह से उसे बीमारियों और उन के इलाज के बारे में काफी जानकारी हो गई थी. लेकिन उस का मन न पढ़ाईलिखाई में लगा, न पिताजी के साथ काम करने में. इस की वजह यह थी कि वह इलेक्ट्रीशियन बनना चाहता था. समय मिलने पर वह मोटर वाइंडिंग और इलेक्ट्रिक के अन्य काम सीखता रहता था. जब वह बिजली के सारे कामों में निपुण हो गया तो कमाईधमाई करने के लिए कानपुर के ग्वालटोली में रहने वाले अपने बहनोई एहसान के यहां चला गया. यह लगभग 10 साल पहले की बात थी.

पुलिस को शक था कि जीशान की हत्या प्रेमप्रसंग, लेनदेन या किसी रंजिश की वजह से हुई थी. लेकिन इन में से सब से ज्यादा संभावना थी कि उस की हत्या प्रेमप्रसंग को ले कर हुई थी, क्योंकि जिस तरह क्रूरता के साथ उस की हत्या की गई थी, ऐसा अकसर प्रेमप्रसंग या अवैध संबंधों के मामलों में होता था. पुलिस जीशान के दोस्तोंपरिचितों से पता करने लगी कि उस का किसी से प्रेम संबंध तो नहीं था. क्योंकि इस तरह की बातें लोग दोस्तों से जरूर बताते हैं.

आशिक पति ने ली जान – भाग 3

दामोदर शीतल के पीछे पागल था, यही वजह थी कि एक दिन उस ने ओमप्रकाश से कहा, ‘‘मैं शीतल से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘तुम शीतल से कैसे शादी कर सकते हो. अगर तुम्हें उस से शादी करनी है तो पहले मोहरश्री को छोड़ो. उस के रहते मैं अपनी बेटी की शादी तुम्हारे साथ कतई नहीं करूंगा.’’ इस तरह ओमप्रकाश ने शादी से मना कर दिया.

इस से दामोदर निराश हो गया. उसे पता था कि मोहरश्री से छुटकारा पाना आसान नहीं है. दामोदर शीतल के लिए इस तरह बेचैन था कि मोहरश्री से छुटकारा पाने का आसान रास्ता न देख पाने के बारे में विचार करने लगा. जब उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने उसे खत्म करने का निर्णय ले लिया. इस के बाद वह मोहरश्री की हत्या के लिए किराए के हत्यारों की तलाश करने लगा. पैसे ले कर हत्या करने वाला कोई नहीं मिला तो वह खुद ही कुछ करने के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उसे लगता था कि मोहरश्री उस की खुशियों की राह का रोड़ा है.

संयोग से उसी बीच मोहरश्री खेत में डालने के लिए एक शीशी कीटनाशक ले आई. आधा कीटनाशक तो उस ने खेत में डाल दिया, बाकी घर में ही रख दिया. उस कीटनाशक को देख कर दामोदर ने भयानक योजना बना डाली.  इस के बाद वह मोहरश्री की हर हरकत पर नजर रखने लगा. इस बीच उस ने मोहरश्री के प्रति अपना व्यवहार बदल लिया था.

मोहरश्री सुबह खेतों पर चली जाती तो दोपहर को बच्चों के लिए खाना बनाने आती थी. बच्चों को खाना खिला कर वह फिर खेतों पर चली जाती थी. उस दिन मोहरश्री दोपहर को खेतों से आई तो दामोदर उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. इधर दामोदर का व्यवहार बदल गया था, इसलिए मोहरश्री ने इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया.   मोहरश्री को खेतों में काम करना था, इसलिए वह बच्चों को खिला कर अपना खाना ले कर चली गई. वह अपना काम कर रही थी, तभी दामोदर आ गया. उस ने कहा, ‘‘मैं काम कर रहा हूं, तुम जा कर अपना खाना खा लो.’’

मोहरश्री को भूख लगी थी, इसलिए हाथपैर धो कर वह खाना खाने बैठ गई. खाना खातेखाते ही उस की तबीयत बिगड़ने लगी तो उस ने पानी पिया. पानी पीने के बाद उस की तबीयत और बिगड़ गई. उस समय वहां दामोदर के अलावा कोई और नहीं था. उस ने दामोदर को आवाज दी. दामोदर आया तो, लेकिन मदद करने के बजाय वह खड़ा मुसकराता रहा. थोड़ी देर में तड़प कर मोहरश्री ने दम तोड़ दिया.

मोहरश्री मर गई तो दामोदर की समझ में यह नहीं आया कि वह उस की लाश का क्या करे? जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह ओमप्रकाश के पास गया.  जब उस ने ओमप्रकाश से मोहरश्री की मौत के बारे में बताया तो वह घबरा गया. उस ने कहा, ‘‘तुम ने यह क्या कर डाला, क्यों मार डाला उसे? मैं इस मामले में कुछ नहीं जानता, तुम्हें जो करना है, करो.’’

दामोदर लौटा और मोहरश्री की लाश को घसीट कर मकाई के खेत में डाल दिया. वहां से वह घर आया तो बच्चों ने मां के बारे में पूछा. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी मम्मी थोड़ी देर में आएंगी. तब तक तुम लोग जा कर निमंत्रण खा आओ.’’

बच्चे निमंत्रण खाने चले गए. निमंत्रण खा कर लौटे, तब भी मां नहीं आई थी. कृष्णा को चिंता हुई तो वह मामा चंद्रपाल के पास पहुंचा और उसे सारी बात बताई. इस बीच दामोदर गायब हो गया. उस का इस तरह गायब हो जाना, शक पैदा करने लगा. चंद्रपाल घर तथा गांव वालों के साथ मोहरश्री की तलाश में निकल पड़ा.

सभी खेतों पर पहुंचे तो वहां उन्हें ओमप्रकाश और उस की पत्नी गुड्डी मिली. उन से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि मोहरश्री की तबीयत खराब हो गई थी, दामोदर उसे एटा ले गया है. इस के बाद सभी अपने घर लौट आए, जब दामोदर घर नहीं आया तो सब को चिंता हुई. सभी विचार कर रहे थे कि अब क्या किया जाए, तभी मक्की के खेत में मोहरश्री की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली.

पुलिस को सूचना देने के साथ मोहरश्री के घर वालों के साथ पूरा गांव वहां पहुंच गया, जहां लाश पड़ी थी. सूचना मिलने के बाद कोतवाली (देहात) प्रभारी पदम सिंह सिपाहियों के साथ वहां पहुंच गए. लाश और घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद जरूरी कारर्रवाई कर के उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

कोतवाली प्रभारी द्वारा की गई पूछताछ में पता चला कि दामोदर के संबंध नगला गोकुल के रहने वाली ओमप्रकाश की बेटी शीतल से थे. इस के बाद उन्हें समझते देर नहीं कि यह हत्या दामोदर ने की है. उन्होंने चंद्रपाल की ओर से मोहरश्री की हत्या का मुकदमा दामोदर के खिलाफ दर्ज कर के उस की तलाश शुरू कर दी. पुलिस तो उस की तलाश कर ही रही थी, गांव वाले भी उस के पीछे लगे थे.

घटना के 4 दिनों बाद गांव वालों ने कासगंज के थाना पतरे के एक गांव के एक बाग से दामोदर को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया.  दामोदर ने पहले तो हत्या से इनकार किया लेकिन जब उस के साथ सख्ती की गई तो वह टूट गया. शीतल के साथ अपने संबंधों को स्वीकार करते हुए उस ने बताया कि मोहरश्री उस की खुशियों की राह में रोड़ा बन रही थी, इसलिए उस ने उस के खाने में कीटनाशक मिला कर उसे मार डाला था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कीटनाशक की शीशी बरामद कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

आशिक पति ने ली जान – भाग 2

बगल के गांव नगला गोकुल के रहने वाले ओमप्रकाश का खेत मोहरश्री के खेत से लगा था. ओमप्रकाश भी पत्नी गुड्डी के साथ अपने खेत पर काम करता था. उस की बेटी शीतल भी मांबाप की मदद करने खेत पर आती थी. मोहरश्री ने गौर किया कि जब तक शीतल खेत में रहती है, दामोदर उस के आसपास ही मंडराता रहता है. वह अपना काम करने के बजाय ओमप्रकाश की मदद में लगा रहता है.

उसी बीच कहीं से मोहरश्री को पता चला कि दामोदर ओमप्रकाश को मुफ्त में शराब पिलाता है तो ओमप्रकाश उसे मुफ्त खाना खिलाता है. उसे लगा कि इस के पीछे भी शीतल का ही आकर्षण है. प्रकाश के गायब होने के बाद बड़ी मुश्किल से मोहरश्री ने घरपरिवार संभाला था. अगर इस बार कुछ हुआ तो दोबारा संभालने में बहुत मुश्किल हो जाएगा. इसी चिंता में वह बेचैन रहने लगी थी.

शीतल के आकर्षण में बंधे दामोदर को अब उस के अलावा कुछ और दिखाई नहीं देता था. वह यह भी भूल गया था कि वह शादीशुदा ही नहीं, 4 बच्चों का बाप भी है. सारे कामकाज छोड़ कर वह इसी फिराक में लगा रहता था कि कैसे शीतल के नजदीक पहुंचे. अब दोपहर में उस के लिए खाना आता तो वह अपना खाना ले कर ओमप्रकाश के पास पहुंच जाता. इस के बाद दोनों शराब पीते और एकसाथ खाना खाते.

ऐसे ही समय में अपनी लच्छेदार बातों से दामोदर शीतल को आकर्षित करने की कोशिश करता. वह इस कोशिश में लगा रहता कि अगर शीतल एकांत में मिल जाए वह उस से दिल की बात कह देगा.दूसरी ओर शीतल भी अब उस के मन की बात से अनजान नहीं रह गई थी. इसलिए वह भी उसे देखती तो मुसकरा देती. दामोदर मौका ढूंढ़ ही रहा था. आखिर उसे मौका मिल ही गया. उस दिन शीतल मां के साथ खेत पर आई तो मां खेत में काम करने लगी. जबकि शीतल ट्यूबवैल के कमरे में बैठ गई. उसी बीच दामोदर वहां पहुंच गया.

हालचाल पूछ कर दामोदर शीतल से दिल की बात कहने ही जा रहा था कि मोहरश्री वहां आ गई. दामोदर को शीतल के पास देख कर उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें वहां ढूंढ़ रही हूं, तुम यहां शीतल के पास बैठे क्या कर रहे हो?’’

‘‘मैं यहां पानी पीने आया था. मुझे क्या पता कि यहां शीतल बैठी है.’’

दामोदर ने सफाई तो दे दी, लेकिन मोहरश्री ने जो सुन रखा था, दोनों को इस तरह देख कर उसे बल मिला. लगा कि जो कानाफूसी हो रही है, उस में दम है. मोहरश्री ने दामोदर को समझाने की कोशिश तो की, लेकिन उस की समझ में कहां से आता. वह तो शीतल के पीछे पागल हो चुका था. इसलिए दिल की बात न कह पाने की वजह से वह मोहरश्री पर खीझ उठा था. यही वजह थी, अपना पलड़ा भारी बनाए रखने के लिए उस ने मोहरश्री को 2-4 तमाचे जड़ कर कहा, ‘‘तुम अपनी औकात में रहो, तभी ठीक है.’’

दामोदर मौके की तलाश में लगा ही था. आखिर एक दिन उसे मौका मिल ही गया. ओमप्रकाश पत्नी गुड्डी के साथ पड़ोस के गांव में किसी के यहां गया हुआ था. ओमप्रकाश के बाहर जाने वाली बात उसे पता थी, इसलिए उसे समय भी पता था. वह नगला गोकुल स्थित ओमप्रकाश के घर पहुंच गया. दरवाजा खटखटाया तो शीतल ने दरवाजा खोला. वह उसे देख कर बोली, ‘‘मम्मीपापा तो बाहर गए हैं.’’

‘‘मैं मम्मीपापा से नहीं, तुम से मिलने आया हूं.’’ दामोदर ने कहा तो शीतल का दिल धड़क उठा. वह कुछ कहती, उस के पहले ही दामोदर अंदर आ गया. घर में शीतल बिलकुल अकेली थी. उस ने शीतल का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘शीतल मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. रातदिन सिर्फ तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूं. लगता है, अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता.’’

‘‘मुझे यह पहले से ही मालूम है. तुम्हारे मन में मेरे लिए क्या है, यह मैं ने तुम्हारी नजरों से जान लिया था.’’ शीतल ने नजरें नीची कर के कहा.

शीतल का इतना कहना था कि दामोदर ने खींच कर उसे बांहों में भर लिया. इस के बाद वही हुआ, जिस के लिए दामोदर न जाने कब से परेशान था. उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, दोनों एक हो जाते. दामोदर अब पत्नीबच्चों की ओर से पूरी तरह लापरवाह हो गया. वह अपनी सारी कमाई शीतल पर लुटाने लगा.  ओमप्रकाश और गुड्डी को दामोदर और शीतल के मिलनेजुलने में जरा भी ऐतराज नहीं था. दामोदर ओमप्रकाश को मुफ्त में शराब पिलाता ही था, जरूरत पड़ने पर गुड्डी को पैसे भी दिया करता था.

दामोदर की हरकतें मोहरश्री को बेचैन करने लगी थीं. लोग उस से कहते थे कि दामोदर को समझाती क्यों नहीं. वह पति को समझाना तो चाहती थी, लेकिन अब वह इतना आक्रामक हो गया था कि जरा भी बोलने पर मारपीट पर उतारू हो जाता था. उस की बातों और हरकतों से यही लगता था कि उसे पत्नी और बच्चे उसे बोझ लगने लगे हैं.

घर के जो हालात थे, उस से मोहरश्री परेशान रहने लगी थी. बच्चे भी सहमेसहमे रहते थे. गांव वालों से मोहरश्री की परेशानी छिपी नहीं थी, लेकिन मोहरश्री ने कभी किसी से कुछ नहीं कहा. वह बच्चों से जरूर कहती थी कि अगर उन्हें अपनी जिंदगी बनानी है तो मेहनत से पढ़ो.

मोहरश्री दामोदर को रास्ते पर लाने की कोशिश कर रही थी, जबकि दामोदर उस से पिंड छुड़ाने के बारे में सोच रहा था. अब वह शीतल के साथ अपनी गृहस्थी बसाना चाहता था. लेकिन दामोदर के लिए यह इतना आासन भी नहीं था. क्योंकि वह अपने सालों से बहुत डरता था.

दूसरी ओर मोहरश्री ने कभी अपने भाइयों से दामोदर की कोई बात नहीं बताई थी. इस के बावजूद चंद्रपाल को गांव वालों से दामोदर की हरकतों का पता चल गया था. उस ने एक दिन दामोदर को घर पर बुला कर पूछा, ‘‘पता चला है कि आजकल तुम कुछ ज्यादा ही उड़ने लगे हो?’’

साले की इस बात पर दामोदर का चेहरा सफेद पड़ गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब, ऐसी कोई बात नहीं है.’’

चंद्रपाल ने दामोदर को धमकाते हुए कहा, ‘‘एक बात याद रखना, मैं किसी भी कीमत पर यह बरदाश्त नहीं करूंगा कि तुम मेरी बहन या उस के बच्चों को परेशान करो. अगर तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो अंजाम अच्छा नहीं होगा.’’

दामोदर खामोशी से चंद्रपाल की बातें सुनता रहा. उसे लगा कि मोहरश्री ने ही चंद्रपाल से उस की शिकायत की है. इसलिए वह घर लौटा तो शराब के नशे में धुत था. मोहरश्री खाना बना रही थी. आते ही वह मोहरश्री को गालियां देने लगा. उस ने कहा, ‘‘मेरे मन में जो आएगा, मैं वही करूंगा. कोई मेरा कुछ नहीं कर सकता. एक बात और सुन, मैं शीतल से प्यार करता हूं और अब उस से शादी भी करूंगा. जा कर कह दे अपने भाइयों से.’’

दामोदर की बातों से मोहरश्री सन्न रह गई. उस ने बच्चों को तो खाना खिला दिया, लेकिन खुद नहीं खा सकी. उस रात उसे नींद भी नहीं आई. उसे इस बात की चिंता थी कि अगर दामोदर ने सच में शीतल से शादी कर ली तो वह क्या करेगी.

उसे लगा कि अगर वह शीतल की मां से बात करे तो शायद कोई हल निकल आए. लेकिन हल निकालने की कौन कहे, गुड्डी उलटा उस पर बरस पड़ी, ‘‘शीतल तो अभी बच्ची है, उसे क्या समझ. तू ही दामोदर को क्यों नहीं समझाती. मैं दामोदर को बुलाने थोड़े ही जाती हूं, वह खुद ही यहां आता है.’’   गुड्डी की बातों से मोहरश्री दुविधा में पड़ गई. क्योंकि गुड्डी जो कह रही थी, सच वही था. दामोदर ही उस के घर आताजाता था.

आशिक पति ने ली जान – भाग 1

एटा-कासगंज रोड पर स्थित है एक गांव असरौली, जो कोतवाली (देहात) क्षेत्र के अंतर्गत आता है. इसी गांव के रहने वाले चोखेलाल के परिवार में पत्नी पार्वती के अलावा 3 बेटियां सावित्री, बिमला, मोहरश्री तथा 2 बेटे सत्यप्रकाश और चंद्रपाल थे. सत्यप्रकाश खेतीकिसानी में बाप की मदद करता था तो चंद्रपाल सड़क पर खोखा रख कर अंडे बेचता था. चोखेलाल की गुजरबसर आराम से हो रही थी. उन्होंने सभी बच्चों की शादियां भी कर दी थीं. सभी अपनेअपने परिवार के साथ खुश थे. उन की छोटी बेटी मोहरश्री का विवाह कासगंज के कस्बा नदरई में प्रकाश के साथ हुआ था.

सब से छोटी होने की वजह से मोहरश्री मांबाप की ही नहीं, भाईबहनों की भी लाडली थी. शादी के लगभग डेढ़ साल बाद वह एक बेटे की मां बन गई. यह खुशी की बात थी, लेकिन बेटा पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही उस के पति प्रकाश का दिमागी संतुलन बिगड़ गया और एक दिन वह घर से गायब हो गया. घर वालों ने उसे बहुत ढूंढ़ा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला.

पति के गायब होते ही ससुराल में मोहरश्री की स्थिति गंभीर हो गई. ससुराल वालों का मानना था कि उसी की वजह से प्रकाश गायब हुआ है, इसलिए उसे दोषी मान कर सभी उसे परेशान करने लगे. चंद्रपाल मोहरश्री से मिलने उस की ससुराल गया तो उसे लगा कि बहन यहां खुश नहीं है. वह उसे अपने यहां लिवा लाया.

घर आ कर मोहरश्री ने जब मांबाप और भाइयों से ससुराल वालों के बदले व्यवहार के बारे में बताया तो सभी ने तय किया कि अब उसे ससुराल नहीं भेजा जाएगा. लेकिन ससुराल वालों ने खुद ही मोहरश्री की सुधि नहीं ली. अब घर वालों को उस की चिंता सताने लगी, क्योंकि अभी उस की उम्र कोई ज्यादा नहीं थी.  अकेली जवान औरत के लिए जीवन काटना बहुत मुश्किल होता है. अगर कोई ऊंचनीच हो जाए तो सभी उन्हीं को दोष देते हैं, इसलिए पिता और भाइयों ने तय किया कि वे मोहरश्री की शादी कहीं और कर देंगे.

मोहरश्री को जब पता चला कि घर वाले उस की दूसरी शादी करना चाहते हैं तो उस ने कहा, ‘‘आप लोगों को मेरे लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं अपने बेटे के सहारे जी लूंगी. सभी के साथ मेहनतमजदूरी कर के जिंदगी बीत जाएगा.’’  लेकिन पिता और भाई उस की इस बात से सहमत नहीं थे. वे किसी भी तरह मोहरश्री का घर बसाना चाहते थे. वह बहुत ही सीधीसादी थी. उस के स्वभाव की वजह से गांव का हर आदमी उस की मदद और सम्मान करता था. यही वजह थी कि इस परेशानी में भी वह खुश थी.

चोखेलाल की बड़ी बेटी सावित्री एटा में ब्याही थी. मायके आने पर जब उसे पता चला कि घर वाले मोहरश्री का पुन: विवाह करना चाहते हैं तो उस ने बताया कि उस के पड़ोस में रहने वाली रानी का भाई दामोदर शादी लायक है. अगर सभी लोग तैयार हों तो वह बात चलाए.

मोहरश्री की शादी में उस के पहले पति का बेटा कृष्णा बाधा बन रहा था. घर वाले चाहते थे कि वह बेटे को मायके में छोड़ दे, लेकिन मोहरश्री इस के लिए तैयार नहीं थी. उस का कहना था कि वह उसी आदमी से शादी करेगी, जो उस के बेटे को अपनाएगा. सावित्री ने बताया कि दामोदर मोहरश्री के बेटे को अपना सकता है, इसलिए सभी को उस के फोन का इंतजार था.

सावित्री ने फोन कर के बताया कि दामोदर अपनी बहन रानी के साथ सावित्री को देखने आ रहा है तो घर वालों ने तैयारी शुरू कर दी. देखासुनी के बाद मोहरश्री और दामोदर की शादी इस शर्त पर हो गई कि वह मोहरश्री के पहले पति के बेटे कृष्णा को अपना नाम देगा.

दामोदर जिला फर्रुखाबाद के थाना पाटियाली के गांव शाहपुर का रहने वाला था. उस की 2 बहनें और 2 भाई थे. दोनों भाई पंजाब में नौकरी करते थे. शादी के बाद मोहरश्री बेटे के साथ शाहपुर आ गई.  ससुराल आने पर पता चला कि दामोदर की कमाई से घर नहीं चल सकता. इसलिए उस ने दामोदर को अपने मायके असरौली चलने को कहा.

दामोदर असरौली जाने को राजी नहीं हुआ तो मोहरश्री ने फोन द्वारा सारे हालात अपने भाई चंद्रपाल को बताए तो वह खुद शाहपुर पहुंचा और सभी को असरौली ले आया. इस तरह लगभग 10 साल पहले दामोदर परिवार के साथ ससुराल आ गया था.  ससुराल आ कर वह पूरी तरह से निश्चिंत हो गया. चंद्रपाल ने भागदौड़ कर के उसे एटा रोड पर स्थित आलोक की फैक्ट्री में चौकीदारी की नौकरी दिला दी. फैक्ट्री में उसे रहने के लिए कमरा भी मिल गया था. इस तरह एक बार फिर मोहरश्री की जिंदगी ढर्रे पर आ गई.

समय के साथ मोहरश्री दामोदर के 3 बच्चों अजय, सुमित और प्रेमपाल की मां बनी. शुरूशुरू में तो दामोदर का व्यवहार कृष्णा के प्रति ठीक रहा, लेकिन जब उस के अपने 3-3 बेटे हो गए तो उस का व्यवहार एकदम से बदल गया. अब वह बातबात में कृष्णा से मारपीट करने लगा. मोहरश्री को यह बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. उस ने देखा कि दामोदर बच्चों में भेदभाव कर रहा है तो उस ने उसे टोका. लेकिन दामोदर पर इस का कोई असर नहीं पड़ा. कृष्णा के प्रति उस की हिंसा बढ़ती ही जा रही थी.

मोहरश्री ने दामोदर से शादी जीवन को सुखी बनाने के लिए की थी. लेकिन दामोदर तनाव पैदा करने लगा था. परिवार बढ़ा तो घर में आर्थिक तंगी रहने लगी. बहन की परेशानी देख कर चंद्रपाल ने एक खेत पट्टे पर ले कर बहन को दे दिया. मोहरश्री मेहनत कर के खेत की कमाई से बच्चों को पालने लगी. उस ने बेटों को समझाया कि वे अपनी जिंदगी संवारना चाहते हैं तो मेहनत कर के पढ़ें.

दामोदर न तो अच्छा पति साबित हुआ और न अच्छा बाप. इसलिए मोहरश्री को उस से कोई उम्मीद नहीं थी. उस ने चौकीदारी वाली नौकरी भी छोड़ दी थी. अपना खर्च चलाने के लिए वह खेतों में चोरी से शराब बना कर बेचने लगा था. जब इस बात का पता मोहरश्री को चला तो वह बहुत नाराज हुई. लेकिन दामोदर पर इस का कोई असर नहीं हुआ.

आवारगी में गंवाई जान – भाग 3

रेखा ने रिंकी को पहली बार तेजप्रताप गिरि के यहां देखा था, तभी से वह भांप गई थी कि यह औरत उस के काम की साबित हो सकती है. उस ने तेजप्रताप से रिंकी का मोबाइल नंबर ले कर उस से बातचीत शुरू कर दी थी. बातचीत के दौरान उसे पता चल गया कि रिंकी पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है, इसलिए वह उसे पैसे कमाने का रास्ता बताने लगी. फिर जल्दी ही रिंकी उस के जाल में फंस भी गई.

रिंकी जब भी गोरखपुर आती, रेखा से मिलने उस के घर जरूर जाती थी. इसी आनेजाने में अपनी उम्र से छोटे बबलू, संदीप और मनोज से उस के संबंध बन गए. इन लड़कों से संबंध बनाने में उसे बहुत मजा आता था.

रेखा का एक पुराना ग्राहक था सरदार रकम सिंह, जो सहारनपुर का रहने वाला था. उस ने रेखा से एक कमसिन, खूबसूरत और कुंवारी लड़की की व्यवस्था के लिए कहा था, जिस से वह शादी कर सके. रेखा को तुरंत रिंकी की याद आ गई. रिंकी भले ही शादीशुदा और 2 बच्चों की मां थी, लेकिन देखने में वह कमसिन लगती थी. कैसे और क्या करना है, उस ने तुरंत योजना बना डाली.

अब तक रिंकी की बातचीत से रेखा को पता चल गया था कि वह अपने सीधेसादे पति से खुश नहीं है. उसे भौतिक सुखों की चाहत थी, जो उस के पास नहीं था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थी.

1 दिसंबर, 2013 को रिंकी छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर गोरखपुर आई. संयोग से उसी दिन किरन किसी बात पर पति से लड़झगड़ कर बड़ी बहन पुष्पा के यहां कुबेरस्थान (कुशीनगर) चली गई. रिंकी ने वह रात तेजप्रताप के साथ आराम से बिताई.

अगले दिन सुबह तेजप्रताप ने रिंकी को उस की ससुराल वापस पटहेरवा भेज दिया. इस के 2 दिनों बाद रेखा ने रिंकी को फोन किया. हालचाल पूछने के बाद उस ने कहा, ‘‘रिंकी मैं ने तुम्हारे लिए एक बहुत ही खानदानी घरवर ढूंढा है. अगर तुम अपने पति को छोड़ कर उस के साथ शादी करना चाहो तो बताओ.’’

रिंकी ने हामी भरते हुए कहा, ‘‘मैं तैयार हूं.’’

‘‘ठीक है, कब और कहां आना है, मैं तुम्हें फिर फोन कर के बताऊंगी.’’ कह कर रेखा ने फोन काट दिया.

8 दिसंबर, 2013 को फोन कर के रेखा ने रिंकी से 11 दिसंबर को गोरखपुर आने को कहा. तय तारीख पर रिंकी अजय से बड़ी ननद पुष्पा के यहां जाने की बात कह कर घर से निकली. शाम होतेहोते वह रेखा के यहां पहुंच गई. उस ने इस की जानकारी तेजप्रताप को नहीं होने दी. रात रिंकी ने रेखा के यहां बिताई. 12 दिसंबर को रेखा ने भतीजे बबलू और भांजे मनोज के साथ उसे सहारनपुर सरदार रकम सिंह के पास भेज दिया और उस के बेटे को अपने पास रख लिया.

रिंकी को सिर्फ इतना पता था कि उस की दूसरी शादी हो रही है, जबकि रेखा ने उसे सरदार रकम सिंह के हाथों 45 हजार रुपए में बेच दिया था. रिंकी को वहां भेज कर उस ने उस के बेटे को बेलीपार की रहने वाली भाजपा नेता इशरावती के हाथों 30 हजार रुपए में बेच दिया था. बच्चा लेते समय इशरावती ने उसे 21 हजार दिए थे, बाकी 9 हजार रुपए बाद में देने को कहा था.

दूसरी ओर 2 दिनों तक रिंकी का फोन नहीं आया तो अजय को चिंता हुई. उस ने खुद फोन किया तो फोन बंद मिला. इस से वह परेशान हो उठा. उस ने पुष्पा को फोन किया तो उस ने बताया कि रिंकी तो उस के यहां आई ही नहीं थी. अब उस की परेशानी और बढ़ गई. वह अपने अन्य रिश्तेदारों को फोन कर के पत्नी के बारे में पूछने लगा. जब उस के बारे में कहीं से कुछ पता नहीं चला तो वह उस की तलाश में निकल पड़ा.

रिंकी का रकम सिंह के हाथों सौदा कर के रेखा निश्चिंत हो गई थी. लेकिन सप्ताह भर बाद उसे बच्चों की याद आने लगी तो वह रकम सिंह से गोरखपुर जाने की जिद करने लगी. तभी सरदार रकम सिंह को रिंकी के ब्याहता होने की जानकारी हो गई. चूंकि रिंकी खुद भी जाने की जिद कर रही थी, इसलिए उस ने रेखा को फोन कर के पैसे वापस कर के रिंकी को ले जाने को कहा.

अब रेखा और मनोज की परेशानी बढ़ गई, क्योंकि रिंकी आते ही अपने बेटे को मांगती. जबकि वे उस के बेटे को पैसे ले कर किसी और को सौंप चुके थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. रिंकी के वापस आने से उन का भेद भी खुल सकता था. इसलिए पैसा और अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्होंने उसे खत्म करने की योजना बना डाली.

21 दिसंबर, 2013 को बबलू और मनोज सहारनपुर पहुंचे. रकम सिंह के पैसे लौटा कर वे रिंकी को साथ ले कर ट्रेन से गोरखपुर के लिए चल पड़े. रात 7 बजे वे गोरखपुर पहुंचे. स्टेशन से उन्होंने रेखा को फोन कर के एक मोटरसाइकिल मंगाई. संदीप उन्हें मोटरसाइकिल दे कर अपने गांव चौरीचौरा गौनर चला गया.

आगे रिंकी के साथ क्या करना है, यह रेखा ने मनोज को पहले ही समझा दिया था. मनोज, बबलू रिंकी को ले कर कुसुम्ही जंगल पहुंचे. मनोज ने उस से कहा था कि वह कुसुम्ही के बुढि़या माई मंदिर में उस से शादी कर लेगा. मंदिर से पहले ही मोड़ पर उस ने मोटरसाइकिल रोक दी. तीनों नीचे उतरे तो मनोज ने बबलू को मोटरसाइकिल के पास रुकने को कहा और खुद रिंकी को ले कर आगे बढ़ा.

शायद रिंकी मनोज के इरादे को समझ गई थी, इसलिए उस ने भागना चाहा. लेकिन वह भाग पाती, उस के पहले ही मनोज ने उसे पकड़ कर कमर में खोंसा 315 बोर का कट्टा निकाल कर बट से उस के सिर के पीछे वाले हिस्से पर इतने जोर से वार किया कि उसी एक वार में वह गिर पड़ी.

घायल हो कर रिंकी खडंजे पर गिर कर छटपटाने लगी. उसे छटपटाते देख मनोज ने अपना पैर उस के सीने पर रख कर दबा दिया. जब वह मर गई तो उस की लाश को ठीक कर के दोनों मोटरसाइकिल से घर आ गए. बाद में इस बात की जानकारी तेजप्रताप को हो गई थी, लेकिन उस ने यह बात अपने साले अजय को नहीं बताई थी.

कथा लिखे जाने तक रिंकी हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त मनोज कुमार पुलिस के हाथ नहीं लगा था. सरदार रकम सिंह की भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. वह भी फरार था. बाकी सभी अभियुक्तों को पुलिस ने जेल भेज दिया था.

इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार ने 5 हजार रुपए पुरस्कार देने की घोषणा की है.

—कथा पारिवारिक और पुलिस सूत्रों पर आधारित.

आवारगी में गंवाई जान – भाग 2

उसी दिन पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया. इन की गिरफ्तारी के बाद अजय गिरि का 3 वर्षीय बेटा सुंदरम भी सहीसलामत मिल गया. गिरफ्तार पांचों अभियुक्तों से की गई पूछताछ के बाद रिंकी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी…

पुलिस ने लाश बरामद होने पर हत्या का जो मुकदमा अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज किया था, खुलासा होने पर अजय से तहरीर ले कर अज्ञात हत्यारों की जगह मनोज पाल, बबलू, संदीप पाल, तेजप्रताप गिरि, रंभा उर्फ रेखा पाल, इशरावती और सरदार रकम सिंह के नाम डाल कर नामजद कर दिया.

25 वर्षीया रिंकी उर्फ रिंकू, उत्तर प्रदेश के जिला कुशीनगर के थाना तरयासुजान के गांव लक्ष्मीपुर राजा की रहने वाली थी. उस के पिता नगीना गिरि गांव में ही रह कर खेती करते थे. इस खेती से ही उन का गुजरबसर हो रहा था. उन के परिवार में रिंकी के अलावा 3 बच्चे, जियुत, रंजीत और नंदिनी थे. नगीना के बच्चों में रिंकी सब से बड़ी थी. रिंकी खूबसूरत तो थी ही, स्वभाव से भी थोड़ा चंचल थी, इसलिए हर कोई उसे पसंद करता था.

नगीना की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ाते, इसलिए उन्होंने रिंकी की पढ़ाई छुड़ा दी थी. रिंकी जैसे ही सयानी हुई, गांव के लड़के उस के इर्दगिर्द मंडराने लगे. चंचल स्वभाव की रिंकी शहजादियों की तरह जीने के सपने देखती थी. लेकिन उस के लिए यह सिर्फ सपना ही था. यही वजह थी कि पैसों के लालच में वह दलदल में फंसती चली गई.

गांव के कई लड़कों से उस के संबंध बन गए थे. वे लड़के उसे सपनों के उड़नखटोले पर सैर करा रहे थे. जब इस बात का पता उस के पिता नगीना को चला तो उन्होंने इज्जत बचाने के लिए बेटी की शादी कर देना ही उचित समझा. उन्होंने प्रयास कर के कुशीनगर के ही थाना परहरवा के गांव पगरा बसंतपुर के रहने वाले पारस गिरि के बेटे अजय गिरि से उस की शादी कर दी.

पारस गिरि भी खेती से ही 7 सदस्यों के अपने परिवार कोे पाल रहे थे. शादी के बाद बड़ा बेटा नौकरी के लिए बाहर चला गया तो उस से छोटा अजय पिता की मदद करने लगा. साथ ही वह एक बिल्डिंग मैटेरियल की दुकान, जहां वेल्डर का भी काम होता था, पर नौकरी करता था. इस नौकरी से उसे इतना मिल जाता था कि उस का खर्च आराम से चल जाता था. पारस ने बेटियों की शादी अजय की मदद से कर दी थी.

पारस ने छोटी बेटी किरण की शादी जिला देवरिया के थाना तरकुलवा के गांव बालपुर के रहने वाले लालबाबू गिरि के सब से छोटे बेटे तेजप्रताप गिरि से की थी. शादी के बाद तेजप्रताप किरण को ले कर गोरखपुर आ गया था, जहां शाहपुर की द्वारिकापुरी कालोनी में किराए का कमरा ले कर रहने लगा था.

रिंकी ने शहजादियों जैसे जीने के जो सपने देखे थे, शादी के बाद भी वे पूरे नहीं हुए. वह खूबसूरत और स्मार्ट पति चाहती थी, जो उसे बाइक पर बिठा कर शहर में घुमाता, होटल और रेस्तरां में खाना खिलाता. जबकि रिंकी का शहजादा अजय बेहद सीधासादा, ईमानदार और समाज के बंधनों को मानने वाला मेहनती युवक था. दुनिया की नजरों में वह भले ही रिंकी का पति था, लेकिन रिंकी ने दिल से कभी उसे पति नहीं माना . वह अभी भी किसी शहजादे की बांहों में झूलने के सपने देखती थी.

रिंकी सपने भले ही किसी शहजादे के देख रही थी, लेकिन रहती अजय के साथ ही थी. वह उस के 2 बेटों, सत्यम और सुंदरम की मां भी बन गई थी. इसी के बाद अजय ने छोटी बहन किरन की शादी तेजप्रताप से की तो पहली ही नजर में तेजप्रताप रिंकी को सपने का शहजादा जैसा लगा. फिर आनेजाने में कसरती बदन और मजाकिया स्वभाव के तेजप्रताप पर रिंकी कुछ इस तरह फिदा हुई कि उस से नजदीकी बनाने के लिए बेचैन रहने लगी.

तेजप्रताप को रिंकी के मन की बात जानने में देर नहीं लगी. सलहज के नजदीक पहुंचने के लिए वह जल्दीजल्दी ससुराल आने लगा. इस आनेजाने का उसे लाभ भी मिला. इस तरह दोनों जो चाहते थे, वह पूरा हो गया. रिंकी और तेजप्रताप के शारीरिक संबंध बन गए. दोनों बड़ी ही सावधानी से अपनअपनी चाहत पूरी कर रहे थे, इसलिए उन के इस संबंध की जानकारी किसी को नहीं हो सकी थी.

तेजप्रताप पादरी बाजार पुलिस चौकी के पास छोलेभटूरे का ठेला लगाता था. उस की दुकान पर बबलू और संदीप पाल अकसर छोले भटूरे खाने आते थे. बबलू और संदीप में अच्छी दोस्ती थी. उन की उम्र 15-16 साल के करीब थी. तेजप्रताप के वे नियमित ग्राहक तो थे, इसलिए उन में दोस्ती भी हो गई थी. बाद में पता चला कि वे रहते भी उसी के पड़ोस में थे. इस से घनिष्ठता और बढ़ गई. उन का परिवार सहित तेजप्रताप के घर आनाजाना हो गया.

एक बार रिंकी अजय के साथ ननद के घर गोरखपुर ननदननदोई से मिलने आई तो संयोग से उसी समय संदीप पाल की मां रंभा उर्फ रेखा पाल भी किसी काम से तेजप्रताप से मिलने आ गई. रेखा ने रिंकी को गौर से देखा तो महिलाओं की पारखी रेखा को वह अपने काम की लगी.

रिंकी ने तेजप्रताप के घर का रास्ता देख लिया तो उस का जब मन होता, वह किसी न किसी बहाने तेजप्रताप से मिलने गोरखपुर आने लगी. रिंकी गोरखपुर अकसर आने लगी तो रंभा उर्फ रेखा से भी जानपहचान हो गई. रेखा के 20 वर्षीय भांजे मनोज पाल की नजर मौसी के घर आनेजाने में रिंकी पर पड़ी तो खूबसूरत रिंकी का वह दीवाना हो उठा.

मनोज गोरखपुर में टैंपो चलाता था. वह रहने वाला गोरखपुर के थाना गोला के गांव हरपुर का था. वह मौसी रेखा के यहां इसलिए बहुत ज्यादा आताजाता था, क्योंकि वह उस का खास शागिर्द था. रेखा देखने में जितनी भोलीभाली लगती थी, भीतर से वह उतनी ही खुराफाती थी. उस औरत से पूरा मोहल्ला परेशान था. इस की वजह यह थी कि वह कालगर्ल रैकट चलाती थी. उस के इस काम में उस का भतीजा बबलू, बेटा संदीप और भांजा मनोज उस की मदद करते थे. रेखा के अच्छेबुरे सभी तरह के लोगों से अच्छे संबंध थे, इसलिए मोहल्ले वाले सब कुछ जानते हुए भी उस का कुछ नहीं कर पाते थे.

आगे क्या हुआ? जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग…

आवारगी में गंवाई जान – भाग 1

रात साढ़े 9 बजे के आसपास कुसुम्ही जंगल के वन दरोगा राकेश कुमार गश्त करते हुए बुढि़या माई दुर्गा मंदिर रोड पर मंदिर से थोड़ा आगे बढ़े थे कि वहां लगे खड़ंजे पर उन्हें एक लाश पड़ी दिखाई दी. उन्होंने टार्च की रोशनी में देखा, लाश महिला की थी. वह हरा सूट पहने थी. उस के दोनों पैरों में चांदी की पाजेब थी. लाश के पास ही एक पीले रंग की शौल पड़ी थी. सिर पर पीछे की ओर किसी धारदार हथियार से वार किया गया था. वहां बने घाव से अभी भी खून बह रहा था. इस से उन्हें लगा कि यह हत्या अभी जल्दी ही की गई है.

राकेश कुमार ने फोन द्वारा थाना खोराबार के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव को लाश पड़ी होने की सूचना दी. वह गायघाट मर्डर केस को ले कर वैसे ही परेशान थे, इस लाश ने उन की परेशानी और बढ़ा दी. बहरहाल उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी और खुद पुलिस बल के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही क्षेत्राधिकारी नम्रता श्रीवास्तव, एसपी (सिटी) परेश पांडेय और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

मृतका के सिर से बह रहे खून से पुलिस अधिकारियों ने अनुमान लगाया कि हत्या एकाध घंटे के अंदर हुई है. मृतका की उम्र 24-25 साल थी. घटनास्थल पर संघर्ष के निशान थे. खड़ंजे से कुछ दूरी पर जूते और  दुपहिया वाहन के टायरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. इस का मतलब हत्यारे मोटरसाइकिल से आए थे. मृतका की छाती पर भी जूते के निशान मिले थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे मृतका से नफरत करते रहे होंगे.

लाश के निरीक्षण के दौरान मृतका की दाहिनी हथेली पर पुलिस को एक मोबाइल नंबर लिखा दिखाई दिया. पुलिस ने वह मोबाइल नंबर नोट कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मृतका के पास से मिला सामान कब्जे में ले लिया था, ताकि उस की शिनाख्त कराने में मदद मिल सके. यह 21 दिसंबर की रात की बात थी. 22 दिसंबर की सुबह उन्होंने मृतका की हथेली से मिले मोबाइल नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन उठाने वाले ने ‘हैलो’ कहने के साथ ही उन के बारे में भी पूछ लिया.

‘‘मैं गोरखपुर के थाना खोराबार का थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव बोल रहा हूं.’’ उन्होंने अपना परिचय देते हुए पूछा, ‘‘यह नंबर आप का ही है. आप कहां से और कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘साहब मैं अजय गिरि बोल रहा हूं. यह नंबर आप को कहां से मिला?’’

‘‘यह नंबर एक महिला की हथेली पर लिखा था, जिस की हत्या हो चुकी है.’’

‘‘उस का हुलिया कैसा था?’’ अजय गिरि ने पूछा.

थानाप्रभारी ने हुलिया बताया तो अजय ने छूटते ही कहा, ‘‘साहब, यह हुलिया तो मेरी पत्नी रिंकी का है. क्या उस की हत्या हो चुकी है? दिसंबर, 2013 को छोटे बेटे सुंदरम को ले कर घर से निकली थी. तब से उस का कुछ पता नहीं चला. उसी की तलाश में मैं बड़े भाई की ससुराल मधुबनी आया था.’’

‘‘ऐसा करो, तुम थाना खोराबार आ जाओ. मरने वाली तुम्हारी पत्नी है या कोई और यह तो यहीं आ कर पता चलेगा.’’ थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘लेकिन मृतका के पास से हमें कोई बच्चा नहीं मिला है. भगवान तुम्हारे साथ अच्छा ही करे.’’

अजय ने पत्नी के साथ बच्चे के होने की बात की थी, जबकि महिला की लाश के पास से कोई बच्चा नहीं मिला था. इस से थानाप्रभारी थोड़ा पसोपेश में पड़ गए कि उस का बच्चा कहां गया? बच्चे की उम्र भी कोई ज्यादा नहीं थी. उन्हें लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हत्यारों ने बच्चे को कहीं दूसरी जगह ले जा कर ठिकाने लगा दिया हो. गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई थी. अब यह अजय के आने पर ही सुलझ सकती थी.

उसी दिन शाम होतेहोते अजय थाना खोराबार आ पहुंचा. थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव ने मेज की दराज से कुछ फोटो और लाश से बरामद सामान निकाल कर उस के सामने रखा तो सामान और फोटो देख कर वह रो पड़ा. थानाप्रभारी समझ गए कि मृतका इस की पत्नी रिंकी थी. इस के बाद मैडिकल कालेज ले जा कर उसे शव भी दिखाया गया. अजय ने उस शव की भी शिनाख्त अपनी पत्नी रिंकी के रूप में कर दी. अब सवाल यह था कि उस के साथ जो बच्चा था, वह कहां गया?

थानाप्रभारी श्रीप्रकाश यादव द्वारा की गई पूछताछ में अजय ने बताया, ‘‘रिंकी अपने 3 वर्षीय छोटे बेटे सुंदरम को साथ ले कर ननद पुष्पा की ससुराल कुबेरस्थान जाने की बात कह कर घर से निकली थी. वहां जाने के लिए मैं ने ही उसे जीप में बैठाया था. उस ने 2 दिन बाद लौट कर आने को कहा था.

2 दिनों बाद जब वह घर नहीं लौटी तो मैं ने उस के मोबाइल पर फोन किया. उस के मोबाइल का स्विच औफ था. बाद में पता चला कि वह कुबेरस्थान न जा कर सीधे गोरखपुर में रहने वाले मेरे बहनोई तेजप्रताप गिरि के यहां चली गई थी. इस के बाद मैं ने उन से रिंकी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह उन के यहां आई तो थी, लेकिन दूसरे ही दिन चली गई थी. उस के बाद उस का कुछ पता नहीं चला.’’

अजय के अनुसार उस का बहनोई तेजप्रताप गिरि शाहपुर की द्वारिकापुरी कालोनी में किराए पर परिवार के साथ रहता था. पुलिस ने उसी रात उस के घर से उसे पकड़ लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू हुई. तेजप्रताप गिरि कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. वह काफी देर तक पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा. जब पुलिस को लगा कि यह झूठ बोल रहा है, तब पुलिस ने अपने ढंग से उस से सच्चाई उगलवाई.

तेजप्रताप ने पुलिस को जो बताया था, उसी के आधार पर पुलिस ने बबलू और संदीप पाल को गिरफ्तार कर लिया. जबकि मनोज फरार होने में कामयाब हो गया. बबलू और संदीप से पूछताछ की गई तो पता चला कि रिंकी की हत्या के मामले में 2 महिलाएं रंभा उर्फ रेखा पाल और इशरावती भी शामिल थीं.

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