फुटबॉल खिलाड़ी शालिनी की अधूरी प्रेम कहानी

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर – भाग 5

दिल्ली सीपी शूटआउट 10 पुलिस वाले दोषी

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के बहुचर्चित कनाट प्लेस (सीपी) शूटआउट मामले में तत्कालीन एसीपी के एस.एस. राठी समेत 10 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया. घटना 31 मार्च, 1997 की है. सीपी में 2 बिजनेसमैन को यूपी का गैंगस्टर यासीन समझ लिया गया था. जिस पर उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. उस का एनकाउंटर कर दिया गया था. जांच होने पर पुलिस ने कहा था कि पहचान में गलती हो गई थी. बिजनेसमैन को उन्होंने जानबूझ कर नहीं मारा, बल्कि यासीन का पीछा करते हुए गलती से वारदात हुई. निचली अदालत ने सभी को बरी कर दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने 2009 में सभी दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था.

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लाखन भैया एनकाउंटर, 13 पुलिसकर्मी दोषी

मुंबई के लाखन भैया फेक एनकाउंटर मामले में सेशन कोर्ट ने 13 पुलिसकर्मियों समेत 21 लोगों को दोषी करार दिया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी. पुलिस ने दावा किया था कि 11 सितंबर, 2006 को उन्होंने अंधेरी इलाके में उस के द्वारा लाखन भैया (बदमाश) को मार गिराया था.

लाखन के भाई ने दावा किया था कि उसे अगवा कर फरजी एनकाउंटर की कहानी पुलिस ने गढ़ी और पुलिस कमिश्नर को भेजे गए फैक्स और टेलीग्राम सबूत के तौर पर पेश कर दिए. सेशन कोर्ट ने मामले में 21 लोगों को दोषी करार दिया और 13 पुलिसकर्मी समेत अन्य को उम्रकैद की सजा सुना दी थी.

पीलीभीत एनकाउंटर, सिख युवकों की हत्या पर सवाल

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी के पीलीभीत में 11 सिख युवकों को फरजी एनकाउंटर में मारने के आरोपी पुलिसकर्मियों को गैरइरादतन हत्या के मामले में दोषी ठहराया. इस में कुल 43 पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने 7-7 साल कैद की सजा सुनाई थी. घटना 12 जुलाई, 1991 की है. पुलिस का कहना था कि लडक़े आतंकी थे, लेकिन मामले की छानबीन सीबीआई ने की और एनकाउंटर को फरजी ठहराया.

एनकाउंटर के दिशानिर्देश

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनकाउंटर के संबंध में 2014 में एक दिशानिर्देश जारी किया जारी किया गया. उस के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं-

  1. यदि जांच में यह पता चलता है कि किसी पुलिस अफसर के खिलाफ भादंवि के तहत मामला बनता है तो उसे तुरंत सस्पेंड कर अनुशासनात्मक काररवाई शुरू की जानी चाहिए.
  2. जब भी पुलिस को आपराधिक गतिविधि के बारे में गुप्त जानकारी मिले तो वह सब से पहले डायरी में उस की एंट्री करे. अगर मुठभेड़ में पुलिस की ओर से फायर आर्म का इस्तेमाल किया गया हो और किसी की मौत हो गई हो तो सब से पहले एफआईआर दर्ज किया जाना जरूरी है.
  3. एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए. सीबीआई या दूसरे थाने की पुलिस द्वारा जांच किया जाए और जांच वरिष्ठ अधिकारी की देखरेख में हो.
  4. पीडि़त के कलर फोटोग्राफ खींचे जाएं. साथ ही मौके से खून, बाल और अन्य चीजों का सैंपल बना कर उसे सुरक्षित किया जाए. गवाह के बयान के साथ ही उस का पूरा पता और टेलीफोन नंबर लिया जाए.
  5. जिला अस्पताल के 2 डाक्टरों से मृतक का पोस्टमार्टम कराया जाए, विडियो रेकौर्डिंग की जाए. घटना में इस्तेमाल हथियार, बुलेट सुरक्षित रखे जाएं. एफआईआर की कौपी तुरंत कोर्ट भेजी जाए.

सरकारी टेंडरों ने बनाए कई गैंगस्टर्स

देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर और गैंगवार की कहानी जितनी पुरानी है, उतनी ही उस से सामाजिक, राजनीतिक दशा को प्रभावित करने वाली भी रही है. इस का मुख्य कारण प्रदेश में 4 लाख करोड़ के सरकारी ठेके से होने वाली बड़ी कमाई है. उन पर गैंगस्टर कब्जा करने के चक्कर में आपस में भिड़ जाते हैं तो कभी वे पुलिस एनकाउंटर के शिकार हो जाते हैं.

बाहुबली, दबंग, दबंगई और रंगदारी. माफिया, डौन, शूटर आदि नामों से कुख्यात गैंगस्टर की शब्दावलियां 70 के दशक से चर्चा में आने लगी थीं. वे सरकारी महकमे को अपनी दबंगई से कुचलने के अलावा राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल करते हैं और सामाजिक रुतबा हासिल कर जनता के दिलोदिमाग पर भी राज करने लगते हैं.

शहर की सडक़ों पर दिनदहाड़े गुंडागर्दी से ले कर मर्डर तक की घटनाएं गैंगस्टर के बीच उत्तराधिकार हासिल करने के लिए होती हैं, जो उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके में काफी देखने को मिलती हैं. गलीमोहल्ले, खेतखलिहान से ले कर कोर्टकचहरी और भरी जनसभा आदि तक में गैंगस्टर, शूटर की हजारों वारदातें पुलिस फाइलों में दर्ज हैं. इन में ज्यादातर पैसा कमाने, पद पाने, रौबरुतबा कायम रखने और बदला लेने से संबंधित होते हैं. उन में कहीं गरीबी की कहानियां शामिल होती हैं तो कुछ मामलों में परिवार पर अत्याचार और अन्याय के चलते खूनखराबे की वारदातें हैं.

गैंगस्टर बनने की मुख्य वजहें प्रदेश में सरकारी ठेके और जमीनजायदाद पर कब्जा है. जमीन सेटलमेंट की जब बात आती है, तब गैंगस्टर सरकारी सिस्टम पर अपनी धाक बनाए रखने की हरसंभव कोशिश करते हैं. इस बीच जो भी आड़े आता है, उसे किसी भी कीमत पर हटा देते हैं. प्रदेश में विकास के लिए सरकारी ठेके को हासिल करना उन की पहली प्राथमिकता रहती है. जिन के पास जितने ज्यादा ठेके होते हैं, वह उतना बड़ा गैंगस्टर कहलाता है.

सडक़ बनाने से ले कर बालू निकालने तक या मछली पालने से ले कर रेलवे स्क्रैप तक, हर काम के लिए सरकारी ठेका जारी होता है. वह अनुमानित तौर पर सालाना 4 लाख करोड़ के होते हैं. देश में 2020- 21 में सरकारों ने कुल 17 लाख करोड़ रुपए से अधिक के काम के लिए ई टेंडर जारी किए थे. जिन में 22 फीसदी से ज्यादा उत्तर प्रदेश में थे. यूपी के लिए 3.83 लाख करोड़ रुपए.

यही सारे ठेके बाहुबली की ताकत तय करते हैं, जो उन की मरजी से खुलते हैं. हर बाहुबली या कहें माफिया डौन चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा सरकारी ठेके उसे और उस के चहेतों को मिलें. सरकारी ठेके को हासिल करने के लिए बाहुबलियों की दावेदारी बनी रहती थी. उन के दबदबे के आगे सरकारी दफ्तर के कर्मचारी नतमस्तक हो जाते थे. कुछ भय से तो कुछ बदले में भ्रष्टाचार की रकम ले कर.

इन दिनों वही ठेके औनलाइन तो हो गए, मगर सरकारें इन को अपराधियों और गैंगस्टर्स से मुक्त नहीं कर पाईं. उल्लेखनीय है कि विकास के लिए देश में किया जाने वाला हर काम केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा निजी कंपनियों को ठेका दे कर किया जाता है. चाहे जैसा भी काम छोटा या बड़ा हो, उस के लिए उस क्षेत्र से संबंधित कंपनियों से टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं.

कंपनियां अपने हिसाब से उस काम की लागत, पूरा करने का समय और बाकी ब्यौरा टेंडर में देती हैं. संबंधित विभाग सभी टेंडर्स की जांच करता है और तय नियमों पर जिस कंपनी का टेंडर सब से खरा उतरता है, उसे ठेका दे दिया जाता है. आजादी के पहले से सरकारी निर्माण से ले कर खनन के सारे काम ठेके पर होते आए हैं.

आज भी हर तरह की सरकारी खरीद, खनन और निर्माण ठेके पर ही होते हैं. ये ठेके किसे दिए जाएंगे और कैसे दिए जाएंगे, ये पूरी प्रक्रिया शुरू से ही भ्रष्टाचार के घेरे में रही है. कभी मंत्रियों के प्रभाव, कभी अफसरों की मिलीभगत और कभी बंदूक के जोर पर ठेकों का फैसला होता रहा है.

90 के दशक से सरकार ने ज्यादातर ठेके ई टेंडर के जरिए देने शुरू कर दिए. इस के लिए सरकार ने औनलाइन प्रोक्योरमेंट पोर्टल बनाया है. इन में ई टेंडर्स होते हैं, जिन में सब से बड़ी हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश की रहती है. टेंडर की पूरी प्रक्रिया में अपराधियों की दखलंदाजी बनी रहती है. बाहुबलियों का मानना है कि एक बार ठेका हाथ में आने के बाद सरकारी खजाने से पैसे पर कब्जा करना आसान हो जाएगा. इस पर वे नाममात्र का खर्च करते हैं. यह कहें कि 95 प्रतिशत पैसा हड़प लेते हैं.

पहले चुनाव में बाहुबल के इस्तेमाल के बदले अपराधियों को नेता ईनाम के तौर पर सरकारी ठेके दिलवाते थे. सरकारी ठेकों से होने वाली कमाई का हिस्सा उन्हें भी मिलता था. बाद में वही बाहुबली खुद राजनेता बनने लगे. उन्होंने इसे आय का मुख्य जरिया बना लिया. उत्तर प्रदेश में एक दौर ऐसा भी आया था, जब ठेकेदार और अपराधी एकदूसरे के पर्याय बन गए. उन्होंने ठेकों के हिसाब से खुद के या अपने करीबियों के नाम पर कंपनियां बना लीं. सरकारी दफ्तरों में मिलीभगत बढ़ा ली, ताकि पहले से टेंडर के जारी होने से ले कर उस के लिए जरूरी शर्तों की जानकारी हासिल करते रहें.

फिर शुरू हो जाता है बाकी कंपनियों को डराधमका कर टेंडर भरने से रोकना. इस क्रम में बाहुबली टेंडर खुलने के समय दबंगई से अधिकारियों को धमका कर अपनी ही कंपनी के नाम पर टेंडर खुलवाने का दबाव बनाते हैं. माना गया था कि ई टेंडर से ठेकों पर अपराधियों का प्रभाव कम हो जाएगा और वह अच्छी तरह से व्यवस्थित हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है.

पहले टेंडर भरने के लिए सरकारी दफ्तर में लोग जाते थे. उन्हें रोकने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे. खूनखराबा होता था. अब ऐसा नहीं होता है. वे कहीं से भी उसे औनलाइन भर लेते हैं, जिस में उन की मदद सरकारी दफ्तर वाले करते हैं. किंतु बाहुबलियों का सामना फील्ड में तब होता है, जब किसी का टेंडर पास हो जाता है.

अपराधी यहीं इंतजार करते और आने वाले कंपनियों के प्रतिनिधियों का अपहरण, मारपीट और फिरौती के तौर पर ठेके की रकम का कुछ परसेंटेज लेना शुरू कर देते हैं.

बाहुबलियों के आतंक का यह बदला हुआ रूप है. उन का आतंक अब इस बात पर निर्भर करता है कि कौन अपने इलाके में अपनी कंपनी का औनलाइन टेंडर भरवाने और हासिल करने में सफल होते हैं. या फिर टेंडर भरने वाली हर कंपनी को भी यह मालूम है कि काम मिलने की स्थिति में उन्हें बाहुबली को चुपचाप उस का परसेंटेज देना होगा.

हैरान कर देने वाली बात यह है आज यूपी में सख्त फैसला लेने वाले जिस सीएम योगी की चर्चा होती है, 1970 के दशक में उन के शहर गोरखपुर में ही ठेके को ले कर फैसले लिए जाते थे. वहीं जमीन विवाद सुलझाने से ले कर ठेके तक की चर्चा होती थी. उन्हें नेताओं का संरक्षण मिला हुआ था. जिस वजह से स्थानीय पुलिस और प्रशासन चुप रहता था. यह तब की बात है जब पूरा देश जेपी आंदोलन में युवा सक्रिय थे.

इस दौर में राजनेताओं को युवाओं की ताकत का अहसास हुआ था. विश्वविद्यालयों में राजनीति की शुरुआत हो गई थी. गोरखपुर विश्वविद्यालय की राजनीति में जाति का प्रभाव अधिक होने के कारण ब्राह्मण और ठाकुर के खेमे आमनेसामने बने रहते थे. उस दौर में ब्राह्मण खेमे के अगुआ हरिशंकर तिवारी और ठाकुर खेमे के नेता रविंद्र सिंह होते थे. उन्हें केंद्र में बैठे नेताओं की शह मिली हुई थी.

हरिशंकर तिवारी खुद को ब्राह्मणों का नेता कहते थे. जबकि रविंद्र सिंह जनता पार्टी के टिकट पर 1978 में विधायक बन गए थे. उन की कुछ ही समय बाद ही 35 वर्ष की उम्र में हत्या हो गई थी. उस दौर में केंद्र में रेल मंत्री अकसर उत्तर प्रदेश से ही होते थे. इन नेताओं ने अपने चहेते छात्रनेताओं को ईनाम के तौर पर रेलवे स्क्रैप के ठेके दिलाना शुरू कर दिया था. ये रेलवे स्क्रैप के ठेके धीरेधीरे बाहुबलियों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गए थे.

गोरखपुर और आसपास के इलाके में 1970 से 80 के दशक में गैंगवार रोज की बात हो गई थी. रविंद्र सिंह के हत्यारों में गाजीपुर के एक तिवारी का नाम आया था. इस के बाद गोरखपुर में ब्राह्मण और ठाकुर गैंग बिलकुल आमनेसामने आ गए. ठाकुरों ने वीरेंद्र प्रताप शाही को नेता बना लिया था.

1980 के दशक की बात है, जब वीरेंद्र प्रताप शाही चुनाव प्रचार पर निकले थे. बताते हैं कि इस दौरान वह खुली जीप पर जिंदा शेर ले कर चलते थे. उन का चुनाव चिह्न भी शेर ही था. रविंद्र सिंह के खास रहे वीरेंद्र प्रताप शाही को ठाकुर खेमे ने अपना नेता मान लिया था. उन्हें ‘शेर-ए-पूर्वांचल’तक कहा जाता था. उस दौर में आए दिन सडक़ों पर गोलियां और बम चलते थे. इन गैंगवारों की वजह से ही गोरखपुर का नाम पूरी दुनिया में फैल रहा था. उस दौर में बीबीसी रेडियो पर भी गोरखपुर के इन खूनी किस्सों का प्रसारण होता था.

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर – भाग 4

अतीक और अशरफ को जबजब थाने से बाहर दबिश या मैडिकल के लिए ले जाया गया, उस की आंखों में अजीब सा खौफ नजर आता था. जबजब थाने से अस्पताल और अस्पताल से थाने लाने के दौरान दोनों भाई एकदूसरे को सहारा दे कर पुलिस वैन से बाहर निकलते थे. अकसर अतीक पुलिस वालों का कंधा पकड़ कर पुलिस वैन से उतरता था.

योगी सरकार ने अतीक अहमद और उस के रिश्तेदारों की संपत्तियों पर बुलडोजर चला कर उस की आर्थिक रीढ़ को एक तरह से तहसनहस कर दिया था. इस से कट्ïटरपंथी जरूर खुश हो रहे थे, लेकिन आम लोगों की नजरों में बदले की राजनीति ही माना जा रहा था. लोगों का कहना है कि योगी को बुलडोजर ईमानदारी से प्रदेश के उन सभी माफिया, गैंगस्टरों की उन संपत्तियों पर भी चलाया जाना चाहिए, जो उन्ळोंने गलत धंधों से अर्जित कर रखी है. चाहे वह माफिया, गैंगस्टर किसी भी धर्म, जाति या राजनीति पार्टी के हों.

अतीक अहमद की लाइव हत्या करने के बाद भले ही उस के आतंक का खात्मा हो गया हो, लेकिन क्या  एनकाउंटर करने में वाहवाही लूटने वाली यूपी पुलिस उस के हत्यारों को कठोर सजा दिलवाने की पहल करेगी?

अतीक की बीवी भी है ईनामी गैंगस्टर

शाइस्ता परवीन डौन अतीक अहमद की बीवी का आतंक भी कुछ कम नहीं रहा है, उस पर भी 50 हजार रुपए का ईनाम है. वह पुलिस को चकमा देती रही है, जबकि पूरी यूपी पुलिस और एसटीएफ लगातार उस के पीछे लगी है.

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अतीक के जेल जाने के बाद शाइस्ता परवीन अपने पति के जुर्म की दुनिया को संभालने लगी थी. जिस वजह से लोग उसे भी लेडी डौन कहने लगे. बताते हैं कि किस तरह के काम के लिए क्या फैसला लेना है, क्या कदम उठाने हैं, जैसे- रंगदारी वसूलने के मामले में क्या रकम मांगनी है? उसे कैसे धमकी देनी है? फिरौती की रकम क्या रखनी है? किस सहयोगी को कहां फिट करना है? आदि बातें शाइस्ता ही तय करती है.

शाइस्ता का अतीक के साथ अगस्त 1996 में निकाह हुआ था. उन दिनों उस के पिता यूपी पुलिस में सिपाही हुआ करते थे. शाइस्ता पुलिस को चकमा देने में माहिर बताई जाती है. उस का बचपन पुलिस थाने और चौकियों में ही बीता है. उस के पिता का नाम फारुख है. वो पुलिस विभाग में सिपाही थे. थाना परिसर में ही उस का परिवार रहता था. बचपन में ही उस ने देखा था कि कैसे पुलिस किसी का पीछा करती है. कैसे कोई पुलिस को चकमा देता है. उसे ये सब कुछ बचपन में ही देखने को मिल चुका था. और निकाह के बाद उस की जिंदगी में जुर्म की नींव रखी शौहर अतीक अहमद ने.

शाइस्ता परवीन अपने मांबाप के साथ इलाहाबाद यानी प्रयागराज के दामुपुर गांव में रहती थी. पिता के साथ कई थानों में बने सरकारी पुलिस क्वार्टर में रही थी. शाइस्ता का बचपन और उस के बाद के कई साल प्रतापगढ़ में बीता था. वह 4 बहनें और 2 भाइयों में सब से बड़ी है. 2 भाइयों में से एक मदरसे में प्रिंसिपल है. शाइस्ता की पढ़ाईलिखाई प्रयागराज में हुई है. उस ने ग्रैजुएशन तक की पढ़ाई की है.

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1996 में जब अतीक अहमद का राजनीति से ले कर जुर्म की दुनिया में बड़ा नाम हो चुका था, तब उस से शाइस्ता का परिवार रिश्ता ले कर गया था. दोनों के परिवारों में पहले से जानपहचान थी. शाइस्ता बोलने में तेजतर्रार और अतीक अहमद से ज्यादा पढ़ीलिखी थी, इसलिए उस ने भी रिश्ता मंजूर कर लिया. अगस्त 1996 में दोनों की शादी हो गई थी. अतीक और शाइस्ता के कुल 5 बच्चे हैं. इन में से असद की मौत हो चुकी है. उस के बेटों के नाम अली, उमर अहमद, असद, अहजान और अबान हैं.

इसी साल जनवरी 2023 में शाइस्ता ने बसपा जौइन की थी. मीडिया रिपोर्ट में दावा है कि प्रयागराज में मेयर चुनाव के दौरान शाइस्ता को टिकट देने की बात सामने आई थी. लेकिन 24 फरवरी को उमेशपाल की हत्या में अतीक का नाम आने के बाद से मामला बिगडऩे लगा था. अब शाइस्ता खुद फरार हो गई. उस पर ईनाम घोषित हो गया. अतीक की हत्या के बाद अब बसपा ने शाइस्ता का नाम मेयर प्रत्याशी से हटा दिया.

हर एनकाउंटर पर लगते हैं आरोप

शायद ही कोई पुलिस एनकाउंटर ऐसा हो, जिस पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई हो. कुछ एनकाउंटर तो इतने विवादित हो चुके हैं कि वह अदालत तक जा पहुंचे. एक नजर ऐसे ही विवादित और न्यायिक जांच के दायरे में आए एकाउंटर पर डालें, जिस की चर्चा भी बहस का मुद्ïदा बनती रही है. सवालों के दायरे में आए ऐसे एनकाउंटर की असलियत को समझना तब काफी मुश्किल हो जाता है, जब वह न्याय के तराजू पर गलत होते हैं, लेकिन उसे व्यापक जनसमर्थन भी मिल रहा होता है.

ऐसा ही कुछ अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम के एनकाउंटर को ले कर हुआ. उस के मारे जाने पर पुलिस को  सरकार की तरफ से शाबासी मिली, लेकिन विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस मुठभेड़ की जांच करवाने की मांग कर दी. देश में एनकाउंटर का इतिहास रहा है, जिस में कई मामलों की न्यायिक समीक्षा की गई. उस के बाद अदालती फैसले ने सब को चौंका दिया. साथ ही अदालत ने कुछ दिशानिर्देश भी बना दिए.

हैदराबाद में रेप मर्डर के आरोपी

हैदराबाद के रेप मर्डर एनकाउंटर का मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा था. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जांच कमीशन बनाए थे. रिटायर्ड जज वी. एस. सिरपुरकर की अगुवाई वाले कमीशन की रिपोर्ट में 20 मई, 2022 को राज्य पुलिस के दावे को खारिज करते हुए पुलिस की कहानी को मनगढ़ंत करार दिया था. कमीशन का कहना था कि पुलिसकर्मियों ने मिल कर आरोपियों को मारने के इरादे से फायरिंग की थी.

जांच कमीशन की रिपोर्ट में सभी 10 पुलिसकर्मियों पर नीयत से हत्या का मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई थी.  रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी बनाई कि आरोपियों ने पुलिस की पिस्टल छीनी और फायरिंग की थी और सेल्फ डिफेंस में उन्होंने फायरिंग की.

यह मामला 2019 तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक पशु चिकित्सक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार का था. घटना हैदराबाद के शम्साबाद में 27 नवंबर 2019 को हुई थी, जिस में एक 26 वर्षीय डाक्टर के साथ बलात्कार किया गया था, जिस का आंशिक रूप से जला हुआ शव 28 नवंबर 2019 को शादनगर में चटनपल्ली पुल के नीचे पाया गया था.

विकास दुबे के एनकाउंटर में क्लीन चिट

यूपी पुलिस को विकास दुबे एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट की कमिटी से राहत मिल गई थी. इस की जानकारी 22 जुलाई, 2021 को यूपी के एडीजी (कानून-व्यवस्था) ने दी थी. कोर्ट ने आयोग की रिपोर्ट वेबसाइट पर अपलोड करने की अनुमति देने के साथ ही राज्य को आयोग की सिफारिश का पालन करने के निर्देश भी दिए. रिपोर्ट के अनुसार यूपी पुलिस के एनकाउंटर की ऐक्शन में कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी. यह जांच आयोग सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस बी.एस. चौहान की अगुआई में गठित किया था. एनकाउंटर का मामला 10 जुलाई, 2020 का था. विकास दूबे यूपी पुलिस के एनकाउंटर में मारा गया था.

एमबीए स्टूडेंट का एनकाउंटर फरजी

2 जुलाई को गाजियाबाद में शालीमार गार्डन में रहने वाला रणबीर सिंह दोस्त के साथ इंटरव्यू देने देहरादून गया था. किसी बात पर पुलिसकर्मी से उस की कहासुनी हो गई और इस के बाद पास के जंगल में ले जा कर पुलिस ने एनकाउंटर में मार डाला. पुलिस ने दावा किया कि उस ने बदमाश का एनकाउंटर किया है और पिस्टल की बरामदगी दिखाई. मृतक के पिता ने सीबीआई जांच की मांग की थी.

यह मामला मामला सीबीआई के पास गया और फिर इसे उत्तराखंड से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया. निचली अदालत ने 17 पुलिसकर्मियों को हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी थी. फिर हाई कोर्ट से 10 को बरी कर 7 को दोषी करार दिया गया था. मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर – भाग 3

सियासत में वर्चस्व की सनक

बात 25 जनवरी, 2005 की है. इलाहाबाद शहर पश्चिमी के बसपा विधायक राजू पाल 2 गाडिय़ों क्वालिस और स्कौर्पियो के काफिले के साथ एसआरएन हौस्पिटल से वापस अपने घर नीवा लौट रहे थे. क्वालिस गाड़ी वह खुद ड्राइव कर रहे थे. रास्ते में उन के दोस्त सादिक की पत्नी रुखसाना मिली. पाल ने उन्हें अपने गाड़ी की आगे वाली सीट पर बैठा लिया. पीछे वाली सीट पर संदीप यादव और देवीलाल बैठे थे. दूसरी गाड़ी स्कौर्पियो पीछे चल रही थी. उस में 4 लोग बैठे थे.

दोनों गाडिय़ों का काफिला जैसे ही सुलेमसराय के जीटी रोड पर आया और कुछ दूर तक गया ही था कि तभी बगल से तेज रफ्तार से आई मारुति वैन पाल की गाड़ी को ओवरटेक करते हुए एकदम सामने आ कर खड़ी हो गई. अचानक हुई इस घटना से राजू पाल की गाड़ी सडक़ किनारे बांसबल्ली की दुकान से जा भिड़ी.

सामने खड़ी मारुति वैन से 5 लोग धड़ाधड़ उतरे और पाल की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. उन में 3 ने पाल की गाड़ी को घेर कर फायरिंग शुरू कर दी, जबकि 2 काफिले की दूसरी गाड़ी पर फायरिंग करने लगे. उन्होंने किसी को भी गाड़ी से बाहर निकलने का मौका नहीं दिया.

इस ताबड़तोड़ फायरिंग में राजू पाल की मौत हो गई. राजू पाल हत्याकांड की जांच हुई, जिस में अतीक अहमद का नाम आया. वह इस मामले में मुख्य आरोपी के रूप में नामित और गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में उसे जमानत मिल गई थी. बताते हैं कि वह जेल के अंदर से भी अंडरवल्र्ड में अपनी सत्ता बनाए रखने में सक्षम था.

पाल की हत्या का आरोपी होने के बावजूद सपा में उस की अहमियत बनी रही. उसी साल 2005 में उपचुनाव हुआ, जिस में बसपा ने राजू पाल की विधवा पूजा पाल को चुनाव मैदान उतार दिया. वह 9 दिनों में ही विधवा हो गई थी. जबकि सपा की तरफ से अशरफ अहमद को दोबारा टिकट मिल गया. इस बार अशरफ चुनाव जीत गया.

साल 2005 में राजू पाल की हत्या से पहले अतीक पर साल 1989 में चांद बाबा, साल 2002 में नस्सन, साल 2004 में मुरली मनोहर जोशी के करीबी बताए जाने वाले भाजपा नेता अशरफ की हत्याओं के आरोप लग चुके थे. अतीक के बारे में यह कहा जाने लगा कि जो भी उस के खिलाफ सिर उठाने की कोशिश करता, उस की हत्या करवा दी जाती थी.

प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में मायावती के सत्ता में आने के बाद अतीक के खिलाफ कानून का दबाव बनने लगा था. उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और 2008 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अतीक का छोटा भाई अशरफ भी लगातार उस के अपराधों में साझीदार बना रहता था. किसी भी बड़ी घटना में अतीक के साथ अशरफ का नाम जरूर जुड़ जाता था. उन के खिलाफ सुर्खियों में आया सब से बड़ा मामला राजू पाल हत्याकांड का था.

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इस हत्याकांड को अशरफ ने ही पूरी तरह से अंजाम दिया था. 14 दिसंबर, 2016 को सैम हिगिनबौटम यूनिवर्सिटी औफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलौजी एंड साइंसेज के स्टाफ पर अतीक और उन के सहयोगियों द्वारा 2 छात्रों के खिलाफ काररवाई करने के कारण हमला किया गया था. कारण वे नकल करते पकड़े जाने के बाद परीक्षा देने से प्रतिबंधित कर दिए गए थे. अतीक द्वारा संस्थान के शिक्षक और कर्मचारियों की पिटाई का वीडियो इंटरनेट पर वायरल कर दिया था.

इस के चलते अतीक अगले दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया. इस के साथ ही 10 फरवरी, 2017 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अतीक के आपराधिक इतिहास को तलब किया और इलाहाबाद के एसपी को मामले के सभी आरोपियों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया. इसी निर्देश का पालन करते हुए पुलिस ने 11 फरवरी को अतीक को गिरफ्तार कर लिया. इस तरह उस के जुर्म की फेहरिस्त बढ़ती चली गई और साल 2019 आतेआते उस पर 101 मुकदमे दर्ज हो गए थे.

2019 में अतीक को उमेश पाल के अपहरण का दोषी ठहराया गया था, जिस ने राजू पाल हत्या मामले में अतीक के खिलाफ गवाही दी थी. 24 फरवरी, 2023 को उमेश पाल की फायङ्क्षरग और बम हमले के दौरान मौत हो गई थी. इस हत्याकांड में अतीक मुख्य संदिग्ध आरोपी था. अतीक के भाई अशरफ, बेटे असद और सहयोगी गुड्ïडू मुसलिम, एक बम निर्माता, जिस ने कथित तौर पर उमेश पाल पर बम फेंका था और पिछले हिंसक अपराधों में शामिल रहा है, सहआरोपी थे.

माफिया परिवार पर आई आफत

बसपा सरकार में अतीक का पूरा परिवार मुसीबत में आ गया था. परिवार का हर सदस्य किसी न किसी मामले का आरोपी बन चुका था. नतीजा यह रहा कि अतीक के 2 बेटे उमर व अली लखनऊ की जेल में थे, जबकि भाई अशरफ बरेली की जेल में बंद था. अतीक अहमद का तीसरा बेटा असद विदेश में कानून की पढ़ाई के लिए जाने वाला था. इस तरह से माफिया के परिवार में मुश्किलें तो थीं, लेकिन हालात बिगड़े नहीं थे.

माफिया परिवार के हालात तब बिगड़ गए, जब साल 2007 में बसपा की सरकार आने के साथ ही अतीक के खिलाफ काररवाई शुरू हो गई थी. 5 जुलाई, 2007 को एडवोकेट उमेश पाल ने अतीक, अशरफ समेत कुल 11 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी थी. सुनवाई के लिए वही कोर्ट में जाता था. उन के खिलाफ मामला तब और चर्चा में आ गया, जब उमेश पाल का ही अपहरण हो गया.

इसी के बाद से अतीक को साबरमती जेल से प्रयागराज लाने का सिलसिला शुरू हो गया था. जब भी अतीक पूरी सुरक्षा के साथ संगीनों के साए में जेल से निकलता था, तब वह मीडिया से बातें करते हुए बारबार यही कहता था कि उस की जान को खतरा है, वे लोग उसे मार डालेंगे. इस क्रम में अतीक को साबरमती से 2 बार बाहर निकाला गया था. तब वह बेहद थका हुआ, लाचार और डरा नजर आया था.

उमेश पाल की हत्या के मामले में एसटीएफ ने फौरी काररवाई करते हुए 3 दिन बाद ही 27 फरवरी को एक आरोपी अरबाज को एनकाउंटर में मार गिराया था. यही नहीं, इस केस में 6 मार्च को दूसरा एनकाउंटर हुआ, जिस में एक और आरोपी उस्मान मुठभेड़ में मारा गया.

उल्लेखनीय है कि उमेश पाल की हत्या के बाद से यूपी पुलिस और एटीएफ की एक दरजन टीमें उस से जुड़े हमलावरों की तलाश में देश के कई हिस्सों में छापेमारी कर रही थीं. इसी सिलसिले में 13 अप्रैल की दोपहर अतीक के बेटे असद व शूटर गुलाम की एसटीएफ से मुठभेड़ हुई और दोनों मारे गए.

यह वारदात मीडिया के लिए जितनी सनसनीखेज बन गई थी, उतनी ही अतीक और अशरफ के लिए दुखद थी. इस घटना से अतीक अंदर से और हिल गया था. जिस दिन बेटा असद मारा गया था, उसी रोज अशरफ व अतीक को पुलिस ने अदालत में पेश किया था. अदालत ने दोनों को 5 दिन की पुलिस रिमांड पर पुलिस वालों के हवाले कर दिया था.

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर – भाग 2

करीब 3-4 दशक पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की थी कि सियासत और धंधे में सफलता की सीढिय़ां फांदने वाले अतीक अहमद की दबंगई का जलवा इस कदर मिनटों में मिल जाएगा. 80 के दशक से साल 2006 तक इलाहाबाद (अब प्रयागराज) ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में अतीक अहमद का जबरदस्त जलवा था. उस के काफिले में सैकड़ों कारें और हथियारबंद लोग रहते थे. उस की दबंगई से सभी कांपते थे.

राजनीति में दखल निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर हुई थी और वह 5 बार विधायक और एक बार सांसद बना था. किंतु वक्त के बदलने और सियासत बदलने के साथसाथ अतीक का कद भी कम होता चला गया. बादशाहत की नींव हिल चुकी थी. देखते ही देखते एक समय ऐसा भी आया, जब उन के सितारे गर्दिश में आ गए.

हत्या के समय उस पर उमेश पाल हत्याकांड का मुख्य आरोप था. पुलिस रिमांड पर था. वह धूमनगंज थाने में 14 अप्रैल को अदालत में पेशी के बाद पूछताछ के लिए लाया गया था. अतीक और अशरफ की हत्या के बाद प्रयागराज पुलिस की ओर से धूमनगंज थाने में ही हेडकांस्टेबल राजेश कुमार मौर्य की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई. एफआईआर में उमेश पाल हत्याकांड में नामजद अभियुक्तों के जेल से लाए जाने से ले कर मौत की जानकारी का विवरण दिया गया.

साथ ही 15 अप्रैल को हुई पूरी घटना का विवरण लिखा गया, जो पुलिस के लिए अहम सबूत था. उस से कई और राज खुल सकते थे. यह भी लिखा गया कि 14 अप्रैल को सही तरह से पूछताछ नहीं होने के बाद अगले रोज 15 अप्रैल को भी दोनों अभियुक्तों से विस्तृत पूछताछ की गई. उन की निशानदेही पर 45 और 32 बोर के एकएक पिस्टल, 58 जिंदा कारतूस, विभिन्न बोर के 5 कारतूस (9 एमएम), जो पाकिस्तानी आर्डिनेंस फैक्ट्री के बने थे. दोनों ने पुलिस रिमांड में बताया था कि जेल में रहते हुए उन्होंने उमेश पाल की हत्या के लिए पूरी साजिश रची थी और हथियार दिलाए थे.

एफआईआर में बरामद किए गए हथियार को भारत में प्रतिबंधित बताया गया था. उन का उमेश पाल और सहयोगियों की हत्या के लिए प्रयोग में लाए जाने की बात दर्ज की गई. इस आधार पर 15 अप्रैल को अतीक अहमद और अशरफ के खिलाफ भादंवि की धारा 3/25/27/35 आम्र्स ऐक्ट के तहत केस दर्ज किया गया.

प्रयागराज पुलिस के अनुसार विदेशी हथियार कसारीमसारी की आर्मी कालोनी के पास एक खंडहर बन चुके मकान में छिपाने के लिए फोन पर दोनों ने जेल से ही निर्देश दिए थे. हथियारों की बरामदगी दोनों पर हमले के पहले करीब 7 से 8 बजे के बीच की गई थी. उस बारे में थाने में लिखापढ़ी रात के करीब 10 बजे तक चलती रही.

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अतीक को यूपी की जेलों में मौत का खौफ काफी पहले से सताने लगा था. उसे भय था कि उस की जेल में हत्या की जा सकती है. उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार आ जाने से वह कुछ ज्यादा ही असुरक्षित महसूस करने लगा था. इस का हवाला देते हुए उस ने साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई थी. उस में अदालत से यूपी की जेल में असुरक्षित होने और हत्या किए जाने की आशंका जताते हुए किसी दूसरी जेल में शिफ्ट करने की गुहार की थी. इस आधार पर अदालत ने अप्रैल 2019 में अतीक अहमद को गुजरात की साबरमती जेल में स्थानांतरित भी कर दिया था.

सियासत से सलाखों तक

इलाहाबाद में तांगे चलाने वाले के बेटों अतीक अहमद और अशरफ अहमद के सियासत के सरताज बनने और उन के सलाखों के पीछे पहुंचने की कहानी भी काफी रोमांच से भरी हुई है. उत्तर प्रदेश में राम मंदिर की लहर थी. बावजूद इस के अतीक 1989 में विधानसभा चुनाव में निर्दलीय जीत कर पहुंचे थे. उस चुनाव में मंदिरमसजिद मुद्दे के साथ वह भाजपा पर भारी पड़े थे. उन्होंने भाजपा उम्मीदवार रामचंद्र जायसवाल को 15 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया था. अगले विधानसभा चुनाव 1991 में भी वह निर्दलीय ही जीत गए थे.

उस के 2 साल बाद 1993 में हुए चुनाव में उन्होंने फिर भाजपा उम्मीदवार को हरा दिया था. तब वह 9 हजार से अधिक वोटों से जीते थे. उन की इस जीत को ले कर राजनीतिक पार्टियां उन पर चुनाव जीतने के लिए बूथ कैप्चरिंग के आरोप भी लगाती रहीं, लेकिन प्रशासन से इस की शिकायत किसी ने नहीं की. विधानसभा चुनावों में लगातार 3 बार भारी वोटों से जीतने के बाद मुलायम सिंह यादव ने उन्हें मिलने के लिए लखनऊ बुलाया. वह पूरे लावलश्कर और बड़े कफिले के साथ आए.  मुलायम सिंह ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर लिया. पहली बार उन के नाम के साथ राजनीतिक पार्टी ‘समाजवादी पार्टी’का नाम जुड़ गया.

चौथी बार उन्हें भारी 35 हजार से अधिक मतों से जीत मिली और वह इलाहाबाद शहर के पश्चिमी सीट से विधायक बन गए थे. इस के कुछ समय बाद ही सपा के साथ मतभेद हो गया और वह सोनेलाल पटेल की पार्टी ‘अपना दल’में शामिल हो गए. 2002 के विधानसभा चुनाव में वे सपा के खिलाफ अपना दल के टिकट पर चुनाव लड़े और 5वीं बार विधायक बन गए. जबकि पार्टी अध्यक्ष सोनेलाल खुद चुनाव हार गए थे. इस जीत ने एक बार फिर सपा को एहसास करवा दिया अतीक को चुनाव जीतने के लिए पार्टी मायने नहीं रखती है. यह देखते हुए मुलायम सिंह ने उसे बुला कर दोबारा पार्टी में शामिल कर लिया.

मुलायम सिंह ने अतीक अहमद पर भरोसा जताया और उसे फूलपुर लोकसभा सीट से प्रत्याशी बना दिया. उन की टक्कर बसपा की केसरी देवी पटेल से हुई. अतीक ने उन्हें हरा कर भी भारी मतों से जीत हासिल कर ली और सांसद बन गए. इस जीत से अतीक का कद और रौब काफी बढ़ गया. साथ ही इलाहाबाद के शहर की पश्चिमी विधानसभा सीट खाली हो गई. वहां 6 माह बाद उपचुनाव हुआ. उस के लिए अतीक ने अपने छोटे भाई अशरफ को सपा से टिकट दिलवा दिया.

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उसी समय कभी अतीक के साथ रहने वाला राजू पाल बसपा में शामिल हो गया था और वह मायावती द्वारा प्रत्याशी बनाया गया था. दोनों के बीच कड़ी टक्कर हुई, जिस में राजू पाल जीत गया. अशरफ 4 हजार वोटों से चुनाव हार गया. यह हार अतीक के दिल में चुभ गई. अतीक धीरेधीरे एक बड़ा नेता तो बन गया, लेकिन उस की माफिया वाली छवि बनी रही. उस की अपराधिक गतिविधियों में और तेजी आ गई. इस कारण उस के ऊपर कई मुकदमे भी दर्ज हो गए. उस की गिनती डौन और दागदार नेता के रूप में होने लगी थी.

वैसे तो अतीक अपराध की दुनिया में 80 के दशक से पहले ही आ चुका था. तब वह इलाहाबाद और उस के पास नैनी में बने बेहद बड़े रेल यार्ड में खड़ी ट्रेनों से कोयला चुरा कर बेच दिया करता था. बाद में वह रेलवे स्क्रैप का सरकारी टेंडर हासिल करने के लिए धमकी देने वाला ठेकेदार बन गया. उस पर पहला आपराधिक रिकार्ड 1979 में इलाहाबाद में दर्ज किया गया. उस पर हत्या का आरोप लगा था. उस के बाद से ही उस ने अपना क्राइम का नेटवर्क बनाने की शुरुआत कर दी थी. अपने शुरुआती दिनों में वह इलाहाबाद में माफिया के दूसरे कुख्यात सदस्यों में चांद बाबा के साथ मिल कर काम किया.

साल 1990 में अपने सब से बड़े प्रतिद्वंद्वी शौकत इलाही के एनकाउंटर के बाद अतीक और भी ताकतवर बन गया. उस के बाद पुलिस की मिलीभगत से जबरन वसूली, अपहरण, हत्या, प्रौपर्टी पर कब्जा, टैक्स चोरी, अधिकारियों पर दबाव डाल कर अपना अवैध काम करवाना आदि में लिप्त हो गया.

पुलिस की छाया में कैसे बनते हैं अतीक जैसे गैंगस्टर – भाग 1

उमेश पाल हत्याकांड में पुलिस रिमांड पर भेजे गए माफिया डौन से नेता बने अतीक अहमद और अशरफ ने 15 अप्रैल, 2023 की शाम को बताया था कि उन्हें काफी घबराहट हो रही है. उस वक्त रात के 10 बजने वाले थे. दरअसल, वे 2 दिन पहले ही अतीक के 19 वर्षीय बेटे असद अहमद की पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी, जिस से वह विचलित हो गए थे. उसी दिन अतीक की कोर्ट में पेशी हुई थी. वह बेटे की मौत से इतने आहत हो गए थे कि सिर पर पकड़ लिया था.

बेटे की मौत से बेहाल अतीक को बारबार छोटा भाई अशरफ दिलासा दे रहा था. हवालात में उसे जूट के बोरे का बिस्तर मिला था. ऊपर से भिनभिनाते काटते मच्छरों के बीच पुलिस की सख्तियां बनी हुई थीं. उन दोनों से पूछताछ भी जारी थी. थाने की हाजत में अतीक और अशरफ काफी डर गए थे. वे काफी असहज महसूस कर रहे थे.

दोनों की हालत बिगड़ती देख कर धूमनगंज थाने के इंसपेक्टर राजेश कुमार मौर्य ने उन की मैडिकल जांच के लिए तत्परता दिखाई. उन्होंने थाने के 7 एसआई विजय सिंह, सौरभ पांडे, सुभाष सिंह, विवेक कुमार सिंह, प्रदीप पांडे, विपिन यादव, शिव प्रसाद वर्मा एवं एक हैडकांस्टेबल विजय शंकर और 10 कांस्टेबल सुजीत यादव, गोविंद कुशवाहा, दिनेश कुमार, धनंजय शर्मा, राजेश कुमार, रविंद्र सिंह, संजय कुमार प्रजापति, जयमेश कुमार, हरि मोहन और मान सिंह के साथ दोनों को बोलेरो वाहन से रात करीब सवा 10 बजे मोतीलाल नेहरू मंडल चिकित्सालय अस्पताल भेज दिया गया.

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आरक्षी चालक महावीर सिंह गाड़ी चला रहा था. इस काफिले के साथ एक सरकारी जीप भी थी. दोनों को ले कर पुलिस टीम रात करीब साढ़े 10 बजे कोल्विन रोड पर मोतीलाल नेहरू मंडल चिकित्सालय पहुंची थी. अस्पताल के गेट पर गाड़ी खड़ी कर तमाम पुलिसकर्मी अतीक और अशरफ को ले कर अस्पताल की ओर बढ़े, जबकि महावीर सिंह और सतेंद्र कुमार गाडिय़ों की सुरक्षा में वहीं रुक गए.

अस्पताल गेट से 10-15 कदम आगे बढ़ते ही मीडियाकर्मियों का एक हुजूम सुरक्षा घेरे में चल रहे अतीक और अशरफ की बाइट और बयान लेने के लिए अपने कैमरे और माइक के साथ पहुंच गया. उन्होंने सुरक्षा घेरे को तोड़ दिया था और वे अतीक और अशरफ के काफी करीब पहुंच गए. मीडियाकर्मियों को देख कर दोनों भाई बाइट देने के लिए रुक गए, जबकि पुलिस टीम पीछे से उन्हें आगे बढऩे को कहती रही.

मीडियाकर्मियों के सवालों का सिलसिला शुरू हो चुका था. हथकड़ी पहने अतीक और अशरफ पत्रकारों के सवालों के जवाब देने लगे थे. अतीक से पूछा गया कि आप को अपने बेटे को सुपुर्द ए खाक करने के दौरान वहां नहीं ले जाया गया, क्या कहेंगे?

इस पर अतीक ने कहा, ‘‘नहीं ले गए तो हम नहीं गए.’’

यूं बरसीं दनादन गोलियां

ठीक इसी वक्त अशरफ बोल पड़े, ‘‘मेन बात ये है कि गुड्ïडू मुसलिम…’’ उन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि तभी मीडियाकर्मियों की भीड़ में से 2 लोगों ने अपने माइक और आईडी नीचे फेंक दी. उन्होंने तुरंत हथियार निकाल कर अतीक और अशरफ को निशाना बनाया. एक ने अतीक की कनपटी पर पिस्टल सटा दी और दूसरे ने तड़ातड़ फायरिंग शुरू कर दी. वे फायरिंग अत्याधुनिक सेमी आटोमैटिक हथियार से कर रहे थे. इसी दौरान तीसरे कथित मीडियाकर्मी ने भी अतीक और अशरफ को निशाना बना कर फायर करने शुरू कर दिए थे.

जब तक कोई कुछ समझ पाता और पुलिस सचेत हो पाती, तब तक मीडियाकर्मी बन कर आए हमलावरों द्वारा अतीक और अशरफ पर दनादन कई गोलियां दागी जा चुकी थीं. हमलावरों की लगातार हुई फायरिंग से कांस्टेबल मान सिंह भी जख्मी हो गए. उन के दाहिने हाथ में गोली लगी थी. गोलीबारी के बीच आधुनिक हथियार थामे हुए पुलिस वालों ने हमलावरों पर गोली नहीं चलाई और न ही अतीक व उस के भाई को बचाने की कोशिश की. इसे लोगों ने सुनियोजित साजिश बताया.

हमलावर निर्भीकता के साथ ‘जय श्रीराम’ का जयघोष कर भागने लगे, जबकि मीडियाकर्मियों के कैमरे औन थे. वैसे पुलिस को तीनों हमलावरों को लोडेड हथियारों के साथ पकडऩे में सफलता मिल गई. वे भागने में असफल रहे. इस फायरिंग में हमलावरों का एक साथी भी अपने साथियों के साथ फायरिंग के दौरान घायल हो गया.

तब तक घटनास्थल पर अफरातफरी मच गई थी. आसपास की दुकानों के शटर फटाफट गिरने लगे थे. वहां मौजदू बाकी मीडियाकर्मी भी तितरबितर हो गए. हमलावरों की गोली से गंभीर रूप से घायल अतीक और अशरफ को तत्काल अस्पताल के इमरजेंसी में ले जाया गया. वहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. यानी गोली लगने से दोनों भाइयों की मौत हो चुकी थी.

पकड़े गए तीनों युवकों के हाथों से लोडेड हथियार छिटक कर गिर गए थे, वहीं हथियार मीडिया के कैमरों में आ गए थे. फायरिंग के दौरान भगदड़ में कुछ पत्रकार भी घायल हो गए. घटनास्थल को तुरंत सुरक्षित घेरे में ले कर फोरैंसिक जांच कराई गई. साथ ही कांस्टेबल मान सिंह को इलाज के लिए अस्पताल में भरती करवा दिया गया.

हमलावरों की हुई पहचान

इस वारदात से पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई. ऐहतियात बरतते हुए धारा 144 लगा दी गई. मौके से पकड़े गए हमलावरों की पहचान भी जल्द हो गई. एक ने अपना नाम लवलेश तिवारी बताया. वह मात्र 22 साल का था और बांदा में केवतरा क्रौसिंग, थाना कोतवाली निवासी यज्ञ कुमार तिवारी का बेटा है. दूसरा 23 साल का मोहित उर्फ सनी, पुत्र स्वर्गीय जगत सिंह हमीरपुर जिले में कुरारा का रहने वाला है. तीसरे आरोपी ने अपना नाम अरुण कुमार मौर्य, पुत्र दीपक कुमार बताया.

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वह कातरबारी, थाना सोरों, जिला कासगंज का रहने वाला मात्र 18 साल का था. अतीक और अशरफ हत्या के आरोपियों में लवलेश तिवारी, सनी सिंह और अरुण मौर्य की जानकारियों से लोगों को बेहद हैरानी हुई. हैरानी लवलेश की मां आशा देवी को अपने बेटे की करतूत पर भी है. जबकि उस के पिता यज्ञ कुमार अपने बेटे को शुरू से ही नाकारा समझते रहे हैं.

ऊलजुलूल हरकतों के चलते ही घर वालों ने उस से बातचीत बंद कर रखी थी. फिर भी हत्याकांड में उस का नाम आ जाने से जितनी हैरानी पिता को है, उतनी ही परेशान मां आशा देवी हो गई हैं. बताते हैं कि लवलेश पहले बजरंग दल से जुड़ा हुआ था. 2 साल पहले एक लडक़ी को थप्पड़ मारने के आरोप में जेल भी जा चुका है, लेकिन हाल के दिनों में उस की संगति किन के साथ थी, वह क्या करता था, घर वाले इस से अनजान थे.

दूसरा हमलावर सन्नी सिंह पर कुरारा पुलिस थाने में 15 केस दर्ज हैं. वह पुलिस की निगाह में एक छंटा हुआ बदमाश और हिस्ट्रीशीटर है. उस के मातापिता की मौत हो चुकी है और पिछले 10 सालों से अपने घर नहीं गया है. उस के बारे में तहकीकात करने पर पता चला कि वह खूंखार सुंदर भाटी गैंग से भी संबंध रखता है. लवलेश की तरह सन्नी के घर वाले भी उसे पहले से ही खुद से अलग कर रखे हैं.

 

तीसरे आरोपी अरुण कुमार मौर्य की हरकतें भी अपने दोनों साथियों जैसी ही रही हैं. उसे जानने वाले और घर वाले कालिया कह कर बुलाते थे. उस के मातापिता की भी मौत हो चुकी है और पिछले 6 सालों से अपने घर से बाहर रह रहा है. आरोप है कि कुछ समय पहले उस ने जीआरपी थाने में तैनात एक पुलिसकर्मी की जान ले ली थी. तभी से वह फरार चल रहा था.

…और वह खौफनाक मंजर

जिस ने भी अतीक और अशरफ पर हमले का खौफनाक मंजर देखा, वह सिहर गया. और तो और वह कैमरे में भी कैद हो गया. हमले में अतीक अहमद को 8 गोलियां लगीं, जबकि 5 गोलियों से अशरफ धराशाई हो गया. अतीक की मौत तड़पतड़प कर हुई.

फुटबॉल खिलाड़ी शालिनी की अधूरी प्रेम कहानी – भाग 3

रवि पुलिस को बतातेबताते अतीत के झरोखे में चला गया…

उस ने बताया कि अभी हफ्ता भर पहले की ही बात है. उस ने मुझे फोन कर के कहा कि वह मुझ से वैलेंटाइंस डे पर मिलने प्रयागराज आ रही है.

मैं ने उस से चहकते हुए पूछा, ‘‘सच बताओ रोली (शालिनी को रवि प्यार से रोली कहता था), मजाक मत करो. क्या सच में तुम मुझ से मिलने वैलेंटाइंस डे पर प्रयागराज आओगी? इतने दिनों बाद तुम ने फोन किया है, मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि मेरी तुम से बात हो रही है.’’

‘‘अरे बुद्धू, मैं तुम्हारी रोली ही हूं और तुम्हीं से बात कर रही हूं. तुम किसी भूत या चुड़ैल से बात नहीं कर रहे हो. यकीन नहीं आ रहा तो अपने कान में कस कर चिकोटी काट कर देखो पता चल जाएगा.’’ इतना कह कर  शालिनी बात करतेकरते हंसने लगी.

‘‘हांहां, चलो, यकीन हो गया. अच्छा, अब यह बताओ कि गुड़गांव से तुम आ कब रही हो?’’ रवि ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘सुनो, मैं 14 फरवरी को प्रयागराज पहुंच जाऊंगी. उस दिन हम दोनों खूब मौजमस्ती और सैरसपाटा करेंगे. उस के बाद मैं वापस दिल्ली चली जाऊंगी.’’ शालिनी ने कहा.

‘‘क्यों, क्या तुम अपने घर नहीं जाओगी?’’

‘‘अरे नहीं बाबा. और यह बात तुम मेरे घर पर पापा या दीदी किसी से भी नहीं बताना क्योंकि मैं ने पापा से पहले ही कह रखा है कि मैं होली पर घर आऊंगी. मुझे इधर छुट्टी नहीं मिल रही है. समझे?’’ शालिनी ने बताया.

‘‘हां, समझा. ठीक है, मुझे तुम्हारे आने का बेसब्री से इंतजार है.’’ रवि बोला.

इस के बाद हम दोनों के बीच काफी देर तक बातें होती रहीं. अंतत: वह घड़ी भी आ गई जब 14 फरवरी की शाम शालिनी प्रयागराज जंक्शन के प्लेटफार्म पर उतरी. उस के आने से पहले ही रवि ने 10 हजार रुपए का मोबाइल बतौर सरप्राइज गिफ्ट खरीद रखा था. वह शालिनी को वैलेंटाइंस डे पर मोबाइल उपहार में देना चाहता था ताकि उस की प्रेमिका का प्यार और ज्यादा बढ़े.

14 फरवरी को तय समय पर शालिनी का प्रेमी रवि ठाकुर स्टेशन पहुंचा. उसे बाइक पर बिठाया और सीधे रेलवे स्टाफ की लोको कालोनी स्थित अपने आवास पर ले आया.

यहां गौरतलब है कि शालिनी धुरिया को 13 फरवरी को ही प्रयागराज आना था लेकिन ट्रेन मिस हो जाने के कारण वह 14 फरवरी को वहां पहुंची थी.

क्या शालिनी के और भी बौयफ्रैंड थे?

बहरहाल, जब रवि उसे ले कर अपने कमरे पर पहुंचा तो उस समय उस के घर वाले टीवी देख रहे थे. शालिनी फ्रैश होने चली गई. जब वह फ्रैश हो रही थी तो रवि ने शक के आधार पर उस का मोबाइल चैक किया. उसे शक था कि उस की प्रेमिका दिल्ली जा कर बदल गई है. उस के कई लोगों के साथ संबंध बन गए होंगे. मोबाइल की गैलरी में फोटो में शालिनी कई लड़कों के साथ स्टाइल में दिखी. फिर क्या था रवि को उस पर गहरा शक हो गया.

शालिनी जब बाथरूम से निकली तो रवि ने उस से पूछा, ‘‘रोली, तू दिल्ली जा कर बहुत बदल गई है. बेवफा है तू. अब तू पहले वाली रोली नहीं रही.’’

‘‘जुबान संभाल कर बात करो रवि, अगर मैं तुम से सच्चा प्यार न करती तो इतनी दूर तुम से मिलने नहीं आती. अपनी औकात में रह कर बात करो. क्या सबूत है तुम्हारे पास जो मुझ पर इतना बड़ा इलजाम लगा रहे हो.’’

‘‘अरे छिनाल, शरम कर जरा. सबूत है तेरा ये मोबाइल. इस में तेरे यारों के साथ खिंचवाई गई फोटो.’’ रवि गुस्से में बोला.

‘‘क्या कहा, छिनाल? तेरी हिम्मत कैसे हुई, यह कहने की?’’

‘‘एक बार नहीं सौ बार कहूंगा मादर…कहीं कहीं.’’ रवि ने उसे गाली दी.

अब शालिनी से सहा नहीं गया. उस ने एक जोरदार थप्पड़ रवि के गाल पर जड़ दिया. रवि तिलमिला उठा. गुस्से में गाली देते हुए बोला, ‘‘तेरी मां की… साली, तेरी इतनी हिम्मत कि मुझे थप्पड़ मारा…’’

शालिनी भी आपे से बाहर थी, ‘‘और नहीं तो क्या तेरी पूजा करूं. तूने मुझे समझ क्या रखा है अपनी रखैल? साले, अपने भाई के टुकड़ों पर पलने वाला मुझ पर इलजाम लगाता है. मैं इतनी बड़ी कंपनी में काम कर रही हूं. मेरा सभी के साथ उठनाबैठना, खानापीना, घूमनाफिरना है तो सब क्या मेरे यार हो गए. मैं पागल हूं जो इतनी दूर तुझ से मिलने यहां आई.’’

‘‘पता नहीं किसकिस को बयाना दे रखा होगा तूने. कौन जाने क्या खेल खेल रही है मेरे साथ फुटबाल की तरह.’’

रवि का इतना कहना था कि शालिनी ने फिर उसे झन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया. फिर क्या था दोनों के बीच ठेठ इलाहाबादी बोली में गालीगलौज और मारपीट होने लगी.

‘‘मादर…बहुत हाथ उठने लगे हैं तेरे. तू ऐसे नहीं मानेगी…’’ कह कर रवि ने जोर से शालिनी की गरदन पकड़ ली. शालिनी गरदन छुड़ाने के लिए तड़पने लगी लेकिन अब रवि के ऊपर शैतान सवार हो चुका था. थोड़ी देर में शालिनी के प्राणपखेरू उड़ चुके थे. गला घोटे जाने से उस की जीभ और आंखें दोनों बाहर आ गई थीं.

रवि ठाकुर को जब होश आया तब तक काफी देर हो चुकी थी. अब उसे लाश ठिकाने लगानी थी. उस ने अकेले ही शालिनी के शव को बोरे में भरा. सूजे और सुतली से बोरे का मुंह सिला और अकेले ही रात के 9 बजे उस की डेडबौडी बाइक पर रख कर पोलो ग्राउंड वाले पुराने कुएं में फेंक आया.

सब कुछ अकेले ही कर डाला उस ने और किसी को पता तक नहीं चला? सेना की गश्ती गाड़ी, क्यूआरटी और हाईकोर्ट पर हमेशा चैकिंग में लगे रहने वाले पुलिस के जवान सभी नदारद रहे उस समय? न शालिनी की लड़ाईझगड़े के दौरान किसी ने चीखें सुनीं? जबकि पीछे वाले कमरे में रवि के घर वाले मौजूद थे. उन्हें भी इस की जरा भी भनक नहीं लगी? सवाल बहुत हैं मगर कोई फायदा नहीं.

इंसपेक्टर वीरेंद्र कुमार यादव ने रवि की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त मोबाइल और आलाकत्ल बरामद कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फुटबॉल खिलाड़ी शालिनी की अधूरी प्रेम कहानी – भाग 2

शालिनी ने एलडीसी कालेज से मार्केटिंग का कोर्स किया हुआ था. एक अच्छी फुटबाल खिलाड़ी होने के साथसाथ उसे मार्केटिंग का भी अच्छा अनुभव था. इसलिए उस की नौकरी लगने में कोई परेशानी नहीं हुई. दिल्ली में शालिनी किराए का कमरा ले कर रहती थी.

फरवरी में उस की मकान मालकिन ने हमारे घर फोन कर जब पूछा कि शालिनी प्रयागराज पहुंची कि नहीं तो हम सन्न रह गए. क्योंकि मकान मालकिन ने बताया कि शालिनी 13 फरवरी, 2022 को ही प्रयागराज के लिए रवाना हो गई थी.

पिता ने लिखाई बौयफ्रैंड के खिलाफ रिपोर्ट

जब हम लोगों ने यह सुना तो आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि शालिनी ने कुछ ही दिनों पहले फोन कर के हमें बताया था कि वह अभी नहीं आ पाएगी. अभी उसे छुट्टी नहीं मिल रही है. होली के अवसर पर वह प्रयागराज आएगी. मकान मालकिन के अनुसार उसे अब तक दिल्ली वापस आ जाना चाहिए था. तभी से हम लोग परेशान थे.

इस के बाद उस के मोबाइल पर कई बार काल की, लेकिन हर बार उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला. जब शालिनी की मकान मालकिन ने हमें बताया कि वह कह कर निकली थी कि प्रयागराज अपने घर जा रही है और 2-4 दिन में वापस आ जाएगी. तभी किसी अनहोनी की आशंका के मद्देनजर बिना पुलिस को सूचना दिए उस की खोजबीन कर रहे थे.

उस की तलाश में शालिनी का प्रेमी रवि भी साथसाथ रातदिन उन के साथ एक किए हुए था. शालिनी का मोबाइल भी स्विच्ड औफ था, जिस से हमारी परेशानी और भी बढ़ गई थी. पूरा परिवार उस की चिंता कर रहा था और जब वह हमें मिली भी तो लाश के रूप में. इतना कह कर राजेंद्र प्रसाद रोने लगे. राजेंद्र प्रसाद से रवि के खिलाफ तहरीर ले कर पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू कर दी.

आगे की काररवाई के लिए सिविल लाइंस थाना पुलिस को कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि शालिनी का प्रेमी जोकि रेलवे स्टाफ क्वार्टर की लोको कालोनी में अपने बड़े भाई के साथ रहता था. उस समय वह थाने में ही मौजूद था. शालिनी के परिवार के साथ उस की खोजबीन का नाटक वह शुरू से ही कर रहा था.

रवि ठाकुर को फौरन पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी. शुरुआत में उस ने पुलिस को काफी बहकाने और भटकाने की कोशिश की लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उस ने शालिनी धुरिया की हत्या कर के लाश को बोरे में भर कर कुएं में फेंकने से ले कर सभी जुर्म स्वीकार कर लिए.

वैलेंटाइंस डे पर मिलने इतनी दूर से आई शालिनी की हत्या की जो कहानी सामने उभर कर आई, वह इस प्रकार निकली—

शालिनी धुरिया उर्फ रोली और उस का प्रेमी रवि ठाकुर दोनों ही फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी थे. शालिनी के कोच अनिल सोनकर ने ‘मनोहर कहानियां’ को बताया कि शालिनी जब महज 6-7 साल की थी, तभी से उस का रुझान फुटबाल की तरफ था. सदर बाजार फुटबाल ग्राउंड में वह फुटबाल की प्रैक्टिस करती थी.

शालिनी एक अच्छी फुटबाल खिलाड़ी थी. गजब का स्टैमिना था उस के अंदर.  बहुत ही प्रतिभाशाली खिलाड़ी थी वह. तपती दोपहर में भी वह बड़ी ही मेहनत, लगन और ईमानदारी के साथ इतने बड़े फुटबाल मैदान में अकेले दम पर बाउंड्री पर चूने का छिड़काव करती थी.

अपनी मेहनत और लगन से शालिनी धुरिया ने महिला फुटबाल खिलाड़ी के रूप में बेहतरीन खिलाड़ी की छवि बना ली थी. अपनी बेहतरीन परफार्मेंस के चलते स्टेट व नैशनल लेवल पर शालिनी ने सिर्फ उत्तर प्रदेश के जिलों में, बल्कि गोवा, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, समेत विभिन्न राज्यों व जिलों में प्रयागराज जिले का तो नाम रोशन किया ही, साथ ही सदर बाजार फुटबाल एकेडमी का भी परचम फहराया था.

शालिनी ने खेल के साथसाथ अपनी पढ़ाईलिखाई भी जारी रखी थी और गंगापार इलाके से बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद पर्ल्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, गुरुग्राम में नवंबर 2021 से जौब करने लगी थी. खेल के दौरान ही शालिनी को रवि ठाकुर नाम के फुटबाल खिलाड़ी से प्यार हो गया था. रवि मूलरूप से बिहार के जिला जहानाबाद के गांव मकदूमपुर का रहने वाला था.

उस के पिता दिनेश सिंह रेलवे में नौकरी करते थे. उन की पोस्टिंग प्रयागराज में ही थी, इसलिए सिविल लाइंस की रेलवे कालोनी में उन्हें क्वार्टर मिला हुआ था. उन्होंने करीब 5-6 साल पहले वीआरएस ले लिया और अपनी जगह अपने बड़े बेटे दिनेश ठाकुर को नौकरी पर लगवा दिया था.

रवि इलाहाबाद स्पोर्टिंग फुटबाल एकेडमी का होनहार खिलाड़ी था. वह स्कूल नैशनल से अंडर 17  के तहत सीनियर स्टेट चैंपियनशिप खिलाड़ी भी रहा है. खेल के साथ वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए सेकेंड ईयर की पढ़ाई भी कर रहा था.

शालिनी और रवि की प्रेम कहानी की शुरुआत लगभग 7-8 साल पहले खेल के दौरान मैदान में हुई थी. दोनों ही फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी थे, इसलिए प्रेम परवान चढ़ने में समय नहीं लगा. दोनों के पास एकदूसरे से मिलने का भरपूर समय था. खेल के बहाने रोज मुलाकात स्वाभाविक थी.

इन की प्रेम कहानी के बारे में दोनों के ही परिजन भलीभांति परिचित थे. शालिनी तो रवि के प्यार में ऐसी दीवानी हो गई थी कि उस ने अपने हाथ पर प्रेमी रवि का नाम तक गुदवा लिया था. इस तरह इन का प्यार परवान चढ़ता गया.

लेकिन एक दिन रवि की थोड़ी सी गलतफहमी ने सब कुछ उजाड़ दिया. जब रवि को हिरासत में लिया तो पूछताछ करने पर रवि ने पुलिस को बताया, ‘‘हां सर, मैं ने उस चुड़ैल का गला दबा कर हत्या की है. वह थी ही इसी लायक. मेरी सच्ची मोहब्बत का उस ने गलत फायदा उठाया था बेवफा कहीं की. मोहब्बत तो बेपनाह मैं उस से करता था और उस के मर जाने के बाद भी करता हूं.

‘‘लेकिन क्या करूं उस के बिगड़ैल रवैए और हाईप्रोफाइल लाइफस्टाइल की चाह ने मुझे उस की हत्या करने पर मजबूर कर दिया. हालांकि मैं ऐसा नहीं करना चाहता था लेकिन उस के थप्पड़ से मैं इतना आहत हो गया था कि बरदाश्त नहीं कर पाया. रोक नहीं सका खुद को और…’’

फुटबॉल खिलाड़ी शालिनी की अधूरी प्रेम कहानी – भाग 1

20 फरवरी, 2022 की शाम. समय यही कोई साढ़े 5-6 बजे के आसपास का रहा होगा. जाड़े की शाम थी. वैसे भी जाड़ों में दिन छोटे और रात बड़ी होती हैं. उस समय भी शाम हो चली थी और शाम के धुंधलके ने प्रयागराज हाईकोर्ट के पास स्थित पोलो ग्राउंड और सड़क को अंधेरे में घेर रखा था.

चूंकि यह सड़क वीआईपी है और लोगों का आवागमन लगा रहता है. खासकर सुबह और शाम को वाक करने वालों का. उसी पोलो ग्राउंड में एक बहुत ही पुराना और गहरा कुआं भी है. ठंड के बावजूद उस पुराने कुएं से बदबू आ रही थी, जिस की असहनीय दुर्गंध ने वाक करने वालों और राहगीरों को अपने नथुनों पर रुमाल रख कर चलने पर मजबूर कर दिया था. किसी अनहोनी की आशंका के मद्देनजर कुछ लोगों ने पोलो ग्राउंड का चक्कर लगाया कि आखिर माजरा क्या है.

चूंकि आर्मी एरिया में स्थित पोलो ग्राउंड बहुत बड़े दायरे में फैला हुआ है, इसलिए बदबू कहां से आ रही है, यह जानने के लिए लोग सब से पहले कुएं के पास गए. कुआं मुख्य सड़क से सिर्फ 10 कदम की दूरी पर था. सब से पहले कुएं के पास ही लोगबाग गए. जैसेजैसे लोग कुएं के पास बढ़ते गए, बदबू उतनी ही तेजी से उन के नथुनों में घुस रही थी.

शक होने पर वहां मौजूद एक वकील साहब ने फौरन 112 नंबर व संबंधित थाना सिविल लाइंस को सूचना दी कि कुएं से लगातार असहनीय दुर्गंध उठ रही है. जरूर उस में किसी की लाश हो सकती है. हमेशा उस कुएं से लाश ही बरामद की गई है, इसलिए उसे मौत का कुआं ही कहते थे. इस बात में या यह कहनेसमझने में जरा भी समय नहीं लगा कि उस कुएं में किसी का काम तमाम कर के उस की लाश फेंक दी गई है.

बहरहाल, सूचना मिलते ही प्रयागराज के थाना सिविल लाइंस की पुलिस और गश्ती गाड़ी पोलो ग्राउंड के अंदर घुसे और जब कुएं के अंदर झांका तो पाया कि एक सफेद रंग का बोरा उस कुएं में (लगभग सूख चुका है कुआं फिर थोड़ाबहुत पानी उस में अब भी हमेशा रहता है) पड़ा था. कुछ ही देर में एसएसपी अजय कुमार और सीओ संतोष सिंह भी वहां पहुंच गए.

कुआं काफी गहरा था. बोरे को निकालने के लिए इंसपेक्टर वीरेंद्र यादव ने फायर ब्रिगेड को फोन कर दिया. फायर ब्रिगेड कर्मचारियों ने कुएं के अंदर एक लंबी सीढ़ी डाली और अपनेअपने मुंह ढक कर उस के अंदर उतरे. जैसेतैसे बोरे को कुएं से बाहर लाया गया. उसे उठाने में जवानों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि बोरा काफी वजनी था.

बोरे में निकली लड़की की लाश

जब उस बोरे का मुंह खोला तो उस के अंदर एक युवती की लाश देख कर लोग दंग रह गए. अब जबकि बोरे को कुएं से निकाला जा चुका था तो उस में से और भी तेजी के साथ दुर्गंध चारों तरफ फैलने लगी थी.

युवती ने जींस टीशर्ट और पैरों में जूते पहन रखे थे. उस की लाश देख कर पुलिस ने अंदाजा लगाया कि उस की हत्या कोई एक हफ्ता पहले कर के उस की लाश को ठिकाने लगाने के लिए हाथपैर मोड़ कर उसे बोरे में ठूंसठूंस कर भरा गया था. उस के बाद सुतली और सूजे की मदद से बोरे को सिल कर कुएं में फेंका गया होगा.

पानी में पड़ेपड़े उस युवती की लाश लगभग फूल चुकी थी. चेहरा भी पहचानने में नहीं आ रहा था. सिविल लाइंस पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त करने को कहा, लेकिन वहां मौजूद कोई भी शख्स उसे पहचान पाने में असमर्थ था.

लड़की कौन थी? कहां की रहने वाली थी? यह सब जानने के लिए जब महिला पुलिस ने उस के कपड़ों की तलाशी ली तो उस में कुछ भी नहीं मिला. हां, मृतका की बाईं कलाई पर एक टैटू बना हुआ था और उस पर रवि नाम लिखा हुआ था.

बहरहाल, लाश का पंचनामा भरने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. एसएसपी अजय कुमार ने हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए सीओ संतोष सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थाना वीरेंद्र सिंह यादव, एसएसआई इंद्रदत्त द्विवेदी, एसआई वजीउल्लाह खान, अरविंद कुमार कुशवाहा, कांस्टेबल राहुल कुमार गोला, राहुल कुमार, महिला कांस्टेबल इंदु आदि को शामिल किया.

अगले दिन कुएं में मिली जवान युवती की लाश की खबर शहर के सभी अखबारों में छपी और साथ ही उस की कलाई पर बने टैटू पर रवि नाम गुदे होने का जिक्र किया गया तो पुलिस को उस की शिनाख्त के लिए ज्यादा भागदौड़ की जरूरत नहीं पड़ी.

मृतका निकली राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल खिलाड़ी

प्रयागराज के ही थाना शिवकुटी के मोहल्ला शिलाखाना में रहने वाले राजेंद्र प्रसाद ने अगले दिन यानी 21 अप्रैल को जब अखबार में यह पढ़ा कि एक जवान युवती की डेडबौडी पोलो ग्राउंड के अंदर पुराने कुएं से थाना सिविल लाइंस पुलिस ने बरामद की है, उस के हाथ पर बने टैटू पर ‘रवि’ नाम लिखा हुआ है तो वह थाने पहुंचे और इंसपेक्टर वीरेंद्र यादव से मिले.

वीरेंद्र यादव से उन्होंने डेडबौडी देखने की इच्छा जाहिर की तो बिना एक पल गंवाए इंसपेक्टर ने उन्हें अपने मातहतों के साथ पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया.

लाश के चेहरे से जब कफन हटाया गया तो उस के पिता और परिजन फफकफफक कर रोने लगे. शव की शिनाख्त हो चुकी थी. मृतका का नाम शालिनी धुरिया उर्फ रोली था. उस के पिता राजेंद्र प्रसाद, मां व भाईबहन ने उसे पहचान लिया. घर वाले यह जान कर हैरान थे कि शालिनी तो गुड़गांव में नौकरी कर रही थी तो प्रयागराज कब आ गई.

शालिनी पूरे परिवार की लाडली थी. उस की हत्या से घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था. पेशे से ईरिक्शा ड्राइवर राजेंद्र प्रसाद के 4 बच्चों में सब से बड़ी बेटी श्रद्धा, उस से छोटी शालिनी उर्फ रोली व उस से छोटे भाई बहन अंकित और स्वाति थे.

बहरहाल, उस के अंतिम संस्कार के बाद घर वालों से, खासकर शालिनी के पिता से जब यह पूछा गया कि उस की कलाई पर जो रवि नाम लिखा हुआ है, वह कौन है? शालिनी का उस से क्या संबंध है? शालिनी यहां से पहले कहां रहती थी?

पुलिस को इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी था, तभी वह शालिनी के हत्यारों तक पहुंच सकती थी. पूछताछ के दौरान शालिनी के पिता राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि रवि उन की बेटी का दोस्त है.

‘‘उस का आप के घर भी आनाजाना था?’’ इंसपेक्टर वीरेंद्र यादव ने पूछा.

उन्होंने बताया कि शालिनी बहुत होनहार थी. वह राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल प्लेयर थी. परिवार की माली हालत को देखते हुए 2021 में दूसरे लौकडाउन के खत्म होने के बाद वह नवंबर महीने में गुड़गांव चली गई थी. और एक प्राइवेट कंपनी में जौब करने लगी थी.