शादी नहीं, मौजमस्ती ही चाहता था गिरिजा शंकर
कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते, दोनों के प्रेम प्रसंग की स्टोरी की जानकारी घर वालों को हो गई. धनराज ने सोचा कि समाज में उस की बदनामी हो, इस के पहले बेटी के हाथ पीले कर देना चाहिए. यही सोच कर पूर्णिमा की शादी गांव सारद सिवनी में अशोक नाम के लडक़े से तय कर दी. 22 अप्रैल, 2023 को पूर्णिमा की शादी होने वाली थी, किंतु वह प्रेम संबंध के चलते अपनी भाभी के भाई गिरिजा शंकर पर शादी करने का दबाव बना रही थी.
उस ने गिरिजा शंकर से साफतौर पर कह दिया था कि वह शादी करेगी तो सिर्फ उसी से. और गिरिजा शंकर पूर्णिमा से शादी करने का इच्छुक नहीं था, क्योंकि उसे अपनी बहन का घर उजडऩे का डर था. गिरिजा शंकर जानता था कि समाज के कानूनकायदे पूर्णिमा से विवाह की इजाजत नहीं देंगे. गिरिजा शंकर की बहन शारदा को उस के पूर्णिमा के साथ संबंधों की जानकारी थी. उस ने भी भाई से कहा था, “भैया कोई ऐसा कदम न उठाना कि मेरा घर उजड़ जाए.”
इधर पूर्णिमा गिरिजा शंकर पर शादी का दबाव बना रही थी. उस का कहना था कि 22 तारीख के पहले हम लोग भाग कर शादी कर लेते हैं. गिरिजा शंकर के सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई थी. वह कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था. आखिर में उसे अपनी बहन के सुखी दांपत्य जीवन का खयाल आया और उस ने पूर्णिमा को अपने रास्ते से हटाने की योजना बनाई.
पूर्णिमा लगातार गिरिजा शंकर पर जल्द शादी करने का दबाव बना रही थी. ऐसे में योजना के मुताबिक 5 अप्रैल को गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा को फोन कर के कहा, “आज कहीं घूमने चलते हैं, वहां मिल कर शादी करने का प्लान बनाते हैं.”
“लग्न होने की वजह से घर वाले अब बाहर घूमने से मना करते हैं.” पूर्णिमा ने जवाब दिया.
“सिलाई क्लास का बहाना बना कर आ जाओ, मैं बाइक ले कर गांव के बाहर पीपल के पेड़ के पास मिलता हूं.” गिरिजा शंकर ने राह सुझाते हुए कहा.
“ओके, तुम गांव आ कर फोन करना, मैं मम्मी को मनाती हूं.” पूर्णिमा ने कह कर फोन काट दिया.
गिरिजा शंकर ने प्यार में किया विश्वासघात
दोपहर करीब एक बजे गिरिजा शंकर लिम्देवाड़ा गांव पहुंच गया और पूर्णिमा को फोन कर के बुला लिया. पूर्णिमा ने मां से सिलाई सीखने का बहाना किया और सिर और मुंह को दुपट्ïटे से ढंक कर गांव के बाहर पीपल के पेड़ के पास पहुंच गई. गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा को बाइक पर बिठाया और गांव से निकल पड़ा.
रास्ते में प्यारमोहब्बत की बातें करते हुए वे गांगुलपरा और बंजारी गांव के बीच पडऩे वाले जंगल की पहाड़ी पर पहुंच गए. वहां पहुंच कर जब पूर्णिमा ने गिरिजा शंकर से शादी करने की बात कही तो गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा को अपने आगोश में लेते हुए भरोसा दिलाया कि वह 22 अप्रैल के पहले उस से शादी कर लेगा. पूर्णिमा ने उस की बातों पर भरोसा कर लिया. उस के बाद उन्होंने 2 बार शारीरिक संबंध बनाए.
संबंध बनाने के बाद वे पेड़ की छांव में एक चट्ïटान पर बैठ कर आराम कर रहे थे, तभी गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा के गले में पड़े दुपट्ïटे से उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. इस के पहले पूर्णिमा कुछ समझ पाती, पलभर में ही उस की जुबान बाहर निकल आई और उस की मौत हो गई.
प्रेमिका का मर्डर करने के बाद कातिल प्रेमी गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा का मोबाइल तोड़ कर दुपट्ïटे के साथ वहीं फेंक दिया. पूर्णिमा के शरीर के ऊपर सूखे पत्ते का ढेर लगा कर गिरिजा शंकर वहां से बाइक ले कर वापस किरनापुर आ गया. जब पूर्णिमा शाम तक घर नहीं लौटी तो गिरिजा शंकर की बहन शारदा ने मोबाइल पर उस से पूर्णिमा के संबंध में पूछताछ की तो उस ने साफ मना करते हुए कह दिया कि उसे पूर्णिमा के संबंध में कोई जानकारी नहीं है.
मगर पुलिस की पैनी नजर से वह ज्यादा दिनों तक नहीं बच सका और पूर्णिमा के कत्ल का जुर्म कुबूल कर लिया. आज भी समाज के ज्यादातर तबकों में यही परंपरा है कि जिस घर में लड़कियों को ब्याहा जाता है, उस घर की लडक़ी को अपने घर की बहू नहीं बनाते हैं. लेकिन कहते हैं कि इश्क और जंग में सब जायज है.
पूर्णिमा भी समाज के नियमों के विपरीत अपने भाई के साले को दिल दे बैठी और उस के साथ घर बसाने का सपना देख रही थी. गिरिजा शंकर तो केवल पूर्णिमा के शरीर का सुख भोग रहा था, उस के साथ शादी करने को वह कतई तैयार नहीं था.
पुलिस ने गिरिजा शंकर की निशानदेही पर पूर्णिमा की हत्या में प्रयुक्त बाइक और उस का मोबाइल भी घटनास्थल से बरामद किया और 17 अप्रैल को रिमांड की अवधि खत्म होने पर गिरिजा शंकर को पुलिस ने कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे बालाघाट जेल भेज दिया गया.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
रीवा जिले में मनगांव थाने की पुलिस ने एक युवक की पेड़ से लटकी लाश को फंदे से नीचे उतार लिया था. उस के कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस के पास से मोबाइल फोन और आधार कार्ड मिला. आधार कार्ड से उस की पहचान कैलाश यादव के रूप में हुई. वह खुरहा, रघुराजगढ़ गांव का रहने वाला था. टीआई जे.पी. पटेल ने युवक के घर वालों को खबर दे कर मौके पर बुलाया. करीब घंटे भर बाद उस के घर वाले आए. उन में उस की पत्नी भी थी.
पति की लाश देखते ही पिंकू यादव रोते हुए अचानक चिल्लाने लगी, ‘‘हाय! आखिर मार डाला हरामजादी मालती ने. पहले रेप में फंसाया और अब मरवा दिया कुतिया कमीनी ने मेरे पति को. कोई पकड़ लाओ उस हरामजादी को, ऐसे ही पेड़ से लटका दूंगी.’’ कहतेकहते वह अर्धमूर्छित हो गई. उस की हालत विक्षिप्तों जैसी हो गई थी.
प्रेमिका पर लगाया आरोप
मौके पर मौजूद एक सिपाही ने उस के चेहरे पर पानी का छींटे मारे. कुछ सेकेंड बाद उस की आंखें खुलीं, तब पीने के लिए पानी की बोतल उस के सामने कर दिया. वह 2 घूंट पानी पी कर फिर पहले की तरह मालती नाम ले ले कर गालियां देने लगी. पति की मौत का जिम्मेदार वह उसे ठहरा रही थी. गुस्से में आ कर वह लाश के चारों ओर घूमने लगी. हाथ में कभी पास पड़ा डंडा तो कभी ईंटपत्थर उठा लेती. तब तक वहां कुछ और लागों की भीड़ जमा हो गई थी.
भीड़ को देख कर वह और भी विक्षिप्त हो गई थी. कभी रोने लगती तो कभी गुस्से में बड़बड़ाने लगती. उस की इस हालत को देख कर पुलिसकर्मियों के सामने मुश्किलें आ रही थीं कि कैसे मृत युवक के संबंध में जरूरी जानकारियां जुटाए?
पत्नी के साथसाथ उस के सभी घर वालों ने एक सुर में कैलाश यादव की हत्या का आरोप लगाया, जबकि वह जबलपुर प्रयागराज नेशनल हाइवे 30 के किनारे सुबह साढ़े 6 बजे फांसी के फंदे से झूलता पाया गया था. हैंगिंग डैडबौडी देखने से तो यही लग रहा था कि उस ने सुसाइड की है1

इस घटना के अगले दिन 21 फरवरी को उस की कोर्ट में पेशी होनी थी. उस पर बलात्कार का आरोप लगा हुआ था, जो उसी के मोहल्ले की रहने वाली मालती नाम की युवती द्वारा लगाया गया था. कैलाश की पत्नी पिंकू यादव द्वारा बारबार चीख कर कहना कि उस के पति को मालती ने ही मरवाया है, एक संदेह पैदा करने जैसा था. पत्नी ने यह भी आरोप लगाते हुए सवाल किया कि जबलपुर के होटल में काम करने वाले कैलाश को कोर्ट में पेशी के लिए 21 फरवरी, 2023 को जबलपुर से रीवा आना था तो वह एक दिन पहले कैसे आ गया?
इस सवाल पर उपस्थित भीड़ भी बौखला गई और कुछ लोगों ने परिजनों के साथ मिल कर कैलाश की लाश को हाईवे पर रख कर वाहनों की जाम लगा दिया. इस सूचना को पा कर रीवा के एसपी नवनीत भसीन के आदेश पर पुलिस के दूसरे अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भीड़ को हटाया और लाश का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

रूपजाल में फंसाया मालती ने
जांच अधिकारी जे.पी. पटेल कैलाश की पत्नी को पूछताछ के लिए थाने ले आए. उस से मालती के बारे में पूछताछ की गई, जिस पर वह कैलाश को मरवाने का आरोप लगा रही थी. पत्नी ने दोटूक जवाब दिया कि मालती ने पहले कैलाश को अपने रूपजाल में फंसाया, फिर उसे बलात्कार के केस में फंसाने की धमकी दी. समझौते के लिए 15 लाख रुपए मांगने लगी. पैसा नहीं देने के चलते उस ने बलात्कार के केस में उसे फंसा ही दिया.
कैलाश की पत्नी के बयान से पुलिस को इतना तो पता चल ही गया था कि मृतक एक अय्याश किस्म का युवक रहा होगा. इस कारण ही वह मालती के जाल में फंस गया होगा. मालती की इस में कितनी और कैसी भूमिका थी, इस की जांचपड़ताल के लिए रीवा पुलिस ने रीवा के तरहटी मोहल्ले की रहने वाली मालती को हिरासत में ले लिया. साथ ही पुलिस कैलाश के अपराधों के बारे में जानकारी लेने के अलावा उस के मालती के संबंध के बारे में पता लगाने में जुट गई.
इस के लिए दोनों के मोबाइल फोन नंबरों की डिटेल्स निकलवाई गई. उस से पता चला कि कैलाश के जेल से बाहर आने के बाद उसे हमेशा मालती ही फोन करती रही. यहां तक कि जिस रोज कैलाश साईं मंदिर के पास फांसी पर लटका मिला था, उस रोज कुछ समय पहले मालती ने ही उसे फोन किया था. इस का पता कैलाश के मोबाइल में आई आखिरी काल के नंबर से भी चल गया था.
यही नहीं, 19 फरवरी, 2023 को भी मालती ने कैलाश को फोन किया था. उस वक्त दोनों के फोन की लोकेशन रीवा रेलवे स्टेशन की पाई गई. पुलिस के सामने बड़ा सवाल था कि मालती ने जिस कैलाश को बलात्कार के आरोप में जेल भिजवाया था, उसे बारबार क्यों फोन कर रही थी? उस ने 19 फरवरी को क्यों फोन किया होगा? आखिर मालती चाहती क्या थी?

जांच अधिकारी ने हिरासत में मालती के साथ पूछताछ में सख्ती बरती. महिला पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हुए उल्टा केस बनाने और कड़ी जेल भेजने की धमकी दी. जेल में महिला कैदियों के साथ होने वाले दुव्र्यवहार और शोषण की तमाम बातें उसे बताईं. मालती पुलिस की सख्ती के आगे ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई. सब से पहले तो उस ने स्वीकार कर लिया कि उस के कैलाश के साथ अवैध संबंध थे. कई बार वह जबलपुर से रीवा आ कर उस के घर पर ही ठहरता था. रातें रंगीन करता था. यहां तक कि अपनी पत्नी और बच्चों से मिले बिना वापस जबलपुर लौट जाता था. इस के बदले में कैलाश उसे पैसे देता था. अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा उस के साथ मौजमस्ती पर खर्च कर देता था.
ब्लैकमेलिंग पर उतर आई प्रेमिका
मालती ने यह भी स्वीकार किया कि उस ने कैलाश के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज कराया है. उसे वापस लेने के लिए उस से 15 लाख रुपए मांगे थे. इतनी बड़ी रकम देने से कैलाश ने इनकार कर दिया था. फिर मालती ने 5 लाख रुपए मांगे थे. 21 फरवरी को इसी केस में उस की कोर्ट में पेशी थी. इसी सिलसिले में मालती उसे 19 फरवरी को रीवा स्टेशन से सीधे अपने घर ले गई थी और उस पर दया करते हुए 5 लाख के बजाय 3 लाख रुपए की मांग रख दी थी. कैलाश ने यह रकम भी देने में अपनी मजबूरी बताई.
यहां तक कि मालती भी उस की मजबूरी पर थोड़ा और नरम हो गई. मालती ने पुलिस को बताया कि आखिर मांग उस ने डेढ़ लाख रुपए की रखी और कोर्ट में इस रकम पर समझौता कर अपना केस वापस लेने का वादा किया था. उस वक्त कैलाश कुछ कहे बगैर मालती के यहां से चला गया. वह कहां गया, इस बारे में वह पुलिस को कोई जानकारी नहीं दे पाई.

मालती के इस बयान पर टीआई जे.पी. पटेल ने यह निष्कर्ष निकाला कि कैलाश को मालती ने ब्लैकमेल किया है. पैसे के फायदे के लिए उस से संबंध कायम किए और उस के बदले में उस से पैसे वसूले और अब मोटी रकम वसूलने के चक्कर में लगी हुई थी. शायद इसी मानसिक उत्पीडऩ के चलते उस ने आत्महत्या कर ली होगी. इस आधार पर पुलिस ने उस के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. मालती और कैलाश यादव के अवैध संबंध और मौत की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—
अस्पताल में हुई थी मुलाकात
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के मनगंवा थाना सीमा से बसे खुरहा रघुराजगढ़ गांव के रहने वाले कैलाश यादव के परिवार में कुल 5 लोग थे, पत्नी, 2 बच्चों के अलावा उस की बूढ़ी मां. वह परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला अकेला सदस्य था. अपने परिवार को मां के पास छोड़ कर जबलपुर के एक होटल में नौकरी करता था.
बात 2 साल पहले कोरोना काल के ठीक पहले ही है. अपने बीमार भतीजे को देखने के लिए वह रीवां के संजय गांधी अस्पताल गया था. उसी दौरान कैलाश की चचेरी बहन के पति के साथ मालती भी अस्पताल में आई हुई थी. कैलाश ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन मालती की तिरछी नजर कैलाश पर जा टिकी थी. उसे कैलाश का बांका शरीर बेहद आकर्षक लगा था. वह उस से मिलने और बात करने को वह व्याकुल हो गई थी. लेकिन अस्पताल का माहौल था, इसलिए उस से बात नहीं कर पाई, लेकिन किसी तरह से उस ने कैलाश का फोन नंबर हासिल कर लिया था.
मालती का अपने पति से तलाक हो चुका था. वह उसी मोहल्ले में अकेली रहती थी, जहां कैलाश का परिवार रहता था. उस के बच्चे भी नहीं थे. रातें करवटें बदलती बीतती थीं. यौन संबंध के लिए तड़पती रहती थी. मर्द की चाहत में कई बार बेचैन हो जाती थी. जब से उस ने कैलाश को देखा था, तब से उस की बेचैनी और बढ़ गई थी. वह उस के ख्यालों में बारबार आ रहा था. वह उस से मिलने को बेचैन हो गई थी. लेकिन कैसे? उसे इतना पता था कि वह जबलपुर जा चुका है.
एक रात उस की याद में करवटें बदलता हुआ मोबाइल पर वीडियो देखने के लिए स्क्रीन स्क्राल कर रही थी. इसी दौरान मोबाइल में कैलाश का सेव नंबर दिख गया. उस ने तुरंत काल कर दिया. यह भी नहीं देखा कि रात के डेढ़ बज रहे हैं.
कैलाश को इस तरह फांसा मालती ने
उधर आधी रात को अनजाना नंबर देख कर कैलाश भौचक रह गया. उस ने काल रिसीव किए बगैर काट दी. कुछ समय बाद फिर वही नंबर स्क्रीन पर आया. उस ने दोबारा कट कर दिया और बाथरूम के लिए चला गया. बाथरूम से लौटने पर उस ने वाट्सऐप पर मैसेज आया देखा. एक लाइन में लिखा था, ‘‘मैं तुम्हारे मोहल्ले की हूं.’’
मैसेज को क्लिक करते ही उसी नंबर से काल आ गई. इस बार कैलाश ने काल रिसीव कर ली. हैलो बोलते ही जवाब सुनने को मिला, ‘‘रांग नंबर मत बोलना…गुस्सा मत होना. मैं तुम्हारे मोहल्ले की मालती बोल रही हूं. जब से तुम्हें देखा है तभी से तुम से जरूरी बात करना चाहती थी, लेकिन तुम जबलपुर चले गए.’’
“मुझे कब देखा?’’ कैलाश ने जिज्ञासा से पूछा.
“अस्पताल में और कहां? तुम्हारी बहन के साथ गई थी, जब तुम अपने भतीजे को देखने आए थे.’’ उधर से मालती मधुरता के साथ बोली. उस की आवाज में गजब की लोच थी, एक आकर्षण था और आमंत्रण भी. कैलाश को फोन पर अपना नाम और परिचय बताने के साथसाथ प्यार करने का जाल भी फेंक दिया. उस ने रीवा आने पर मिलने की इच्छा जताई. उ
स दिन मालती कैलाश से इधरउधर की बातें करती रही और अपनी बातों से मधुरता और अपनत्व का एहसास करवाती रही. कैलाश को भी धीरेधीरे उस से बातें करते हुए अच्छा लगने लगा थी. बातें करतेकरते उस ने महसूस किया कि उस की पत्नी कभी भी इतने प्यार से बात नहीं करती है. जब भी सामने आती है या पास बैठती है, हमेशा पैसे मांगती है. घर की समस्या बताती रहती है.
मालती और कैलाश के बीच फोन पर एक बार बातचीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह नियमित बन गया. उन के बीच लंबी बातें होने लगीं. इस बीच मालती अश्लील बातें भी करने लगती थी, जिस से उस की सैक्स भावना उभर जाती थी और वह कामुकता से भर जाता था.
एक दिन मालती ने अपनी मीठीमीठी बातों से कैलाश को इस कदर प्रभावित कर दिया कि वह अगले रोज ही जबलपुर से रीवा चला आया. अपने घर जाने के बजाए वह मालती के घर चला गया. वहीं रात गुजारी. मालती ने भी उस के आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी. बढिय़ा मनपसंद खाना और शराब के साथ शबाब पा कर कैलाश धन्य हो गया. हफ्ते भर बाद उसे तब होश आया, जब उस की छुट्ïटी खत्म हो चुकी है. जब साथ काम करने वाले ने फोन कर उसे जल्द आने के लिए कहा.
रातें रंगीन होने लगीं कैलाश की
इस तरह से कैलाश मालती का दीवाना बन गया था. उस की आंखों में वासना और प्यार की झलक को देख कर मालती अच्छी तरह समझ गई थी कि वह उस की गिरफ्त में आ चुका है. वह जैसे चाहेगी उसे अपना बना कर रखेगी. हुआ भी ऐसा ही. कैलाश मालती के साथ यौन सुख से जितना संतुष्ट था, उतना ही उसे पाने के लिए बेचैन भी रहने लगा था. बदले में उस पर पैसे खर्च करने में कोई कमी नहीं रहने देना चाहता था. उस की आमदनी बहुत अच्छी नहीं थी, फिर भी जो कमाता था, उस का बड़ा हिस्सा मालती पर लुटा देता था.
यह सिलसिला अपनी गति से चल रहा था. मालती ने मौका देख कर उस से एकमुश्त 15 लाख रुपए की मांग कर दी. इतनी बड़ी राशि सुनते ही कैलाश चकरा गया. उस ने किसी तरह से कहा इतना पैसा तो उस के पास नहीं है. यह बात जुलाई 2022 की है.
मालती को न सुनने की आदत नहीं थी. वह शुरू से ही अपने मन की करती आई थी. कैलाश की न से नाराज हो गई. उस ने दोटूक कह दिया कि चाहे जैसे भी हो, उसे 15 लाख रुपए चाहिए. मजाक में कैलाश ने बोल दिया कि यदि नहीं दिया तो क्या होगा? इस पर बिफरती हुई मालती ने उसे मुकदमे में फंसाने की धमकी दे डाली. मुकदमे की बात सुन कर कैलाश समझ नहीं पाया कि वह किस तरह मुकदमा करेगी, उस ने जो कुछ किया उस में उस की भी सहमति थी. उस ने मालती की धमकी को गंभीरता से नहीं लिया, जबकि मालती पैसे के मामले में जिद ठान चुकी थी.
मालती 22 अगस्त, 2022 को सीधे रीवा कोतवाली गई. उस ने कैलाश के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करवा दिया. यह मामला दर्ज होते ही उस की गिरफ्तारी हो गई. वह 70 दिनों बाद जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आया. जेल से छूटने के बाद अपने काम पर जबलपुर चला गया. इस की जानकारी मालती को लगी, तब वह उस से फोन पर ही पैसा मांगने लगी. मना करने पर धमकियां देने लगी.
प्रेमिका को जाना ही पड़ा जेल
इस बीच उस की रीवा के कोर्ट में पेशी होती रही. वह 10 जनवरी, 2023 को भी पेशी के लिए रीवा आया. उस रोज भी मालती ने कहा कि वह पैसे लिए बगैर उस का पीछा नहीं छोड़ेगी. जबकि वह कैलाश की चचेरी बहन की जानने वाली थी. कैलाश की पत्नी ने अपनी ननद से समझौता करवाने की बात की. समझौता भी हुआ, लेकिन मालती 5 लाख रुपए लेने पर अड़ गई.

दूसरी पेशी 24 जनवरी को होने वाली थी. उस रोज मालती 5 की जगह 3 लाख रुपए ले कर समझौता करने पर राजी हो गई थी. कैलाश ये पैसे देने में भी असमर्थ था. अगली पेशी 21 फरवरी को तय हुई थी. उस सिलसिले में ही कैलाश 19 फरवरी की रात को रीवा आ गया था. उसे मालती ने रेलवे स्टेशन पर ही अपनी गिरफ्त में ले लिया था और धमकी दी थी कि अगर उस ने पैसे नहीं दिए तो वह उसे जेल में सड़वा देगी. यह बात कैलाश को चुभ गई और उस ने पेड़ पर फंदा बना कर आत्महत्या कर ली.
प्यार और आत्महत्या की पूरी कहानी सामने आने के बाद कैलाश की पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों को पुलिस ने सही माना. मालती को अत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
जब पुलिस ने दोनों के मोबाइल लोकेशन बंजारी के जंगल में मिलने की बात कही और सख्ती से पूछताछ की तो पुलिस की सख्ती के आगे वह जल्दी ही टूट गया और सारी सच्चाई उस ने पुलिस के सामने बयां कर दी. गिरिजा ने बताया कि उस ने पूर्णिमा का मर्डर कर दिया है.
जंगल में मिली पूर्णिमा की लाश
14 अप्रैल, 2023 को गिरिजा शंकर ने पुलिस को बताया कि उस ने पूर्णिमा को गांगुलपरा और बंजारी के बीच जंगल की पहाड़ी में ले जा कर उस की गला घोट कर हत्या कर दी थी. टीआई अमित सिंह कुशवाह, एसआई जयदयाल पटले, रमेश इंगले, हैडकांस्टेबल रमेश उइके, गौरीशंकर को ले कर गांगुलपरा और बंजारी के बीच पहाड़ी जंगल ले कर पहुंची और गिरिजा शंकर की निशानदेही पर पूर्णिमा की लाश बरामद की.
इस दौरान पूर्णिमा बिसेन की हत्या की सूचना मिलते ही लांजी के एसडीपीओ दुर्गेश आर्मो, एसपी (सिटी) अंजुल अयंत मिश्रा, टीआई (भरवेली) रविंद्र कुमार बारिया के अलावा अन्य पुलिसकर्मी और अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और जांचपड़ताल शुरू की.
पूर्णिमा की लाश अधिक दिनों की होने से काफी खराब हो चुकी थी. मौके की काररवाई करने के बाद पूर्णिमा की लाश जिला अस्पताल लाई गई, जहां पर पूर्णिमा के मातापिता सहित परिवार के अन्य लोगों ने चप्पल और कपड़ों से लाश की पहचान की. उन्होंने बताया कि लाश पूर्णिमा की ही है. रात होने से लाश का पोस्टमार्टम नहीं हो पाया.
पोस्टमार्टम न हो पाने की वजह से लाश को बालाघाट के जिला अस्पताल के फ्रीजर में रखवा दिया, दूसरे दिन 15 अप्रैल को लाश का पोस्टमार्टम कर लाश को पूर्णिमा के घर वालों के सुपुर्द किया गया गया. जैसे ही पूर्णिमा की लाश गांव पहुंची तो पूरे गांव में मातम छा गया. परिवार के लोगों ने नम आंखों से उस का अंतिम संस्कार कर दिया.
पुलिस ने इस मामले में गिरिजा शंकर पटले के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत अपराध दर्ज किया और इस अपराध में उसे गिरफ्तार कर लिया. गिरिजा शंकर पटले से पूर्णिमा की हत्या में प्रयुक्त दुपट्ïटा, बाइक और मोबाइल भी बरामद कर लिया.
15 अप्रैल को पुलिस ने गिरिजा शंकर को बालाघाट कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे 2 दिन की पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह रिश्तों को तारतार करने वाली थी….
27 साल का गिरिजा शंकर बालाघाट जिले के किरनापुर ब्लौक के गांव मोहगांव खारा में रहने वाले खुमान सिंह पटले का बेटा था. खुमान सिंह की 2 बेटियों में से बड़ी बेटी शारदा की शादी 4 साल पहले लिम्देवाड़ा के पवन बिसेन से हुई थी.
बहन की शादी के बाद से ही गिरिजा शंकर का अपनी बहन की ननद पूर्णिमा के साथ प्रेम संबंध चल रहे थे. गिरिजा शंकर का किरनापुर में फोटो स्टूडियो है. वह शादी विवाह समारोह में फोटोग्राफी और वीडियो शूटिंग का काम करता है. ग्रैजुएट गिरिजा शंकर अपने इस हुनर से अच्छीखासी आमदनी कर लेता है. इसी आमदनी से उस के शौक भी पूरे होते हैं. गिरिजा शंकर पूर्णिमा की भी हर ख्वाहिश पूरी करता था, यही वजह थी कि पूर्णिमा उस के प्यार में दीवानी थी.
भाई के साले गिरिजा शंकर से हुआ प्यार
करीब 4 साल पहले गिरिजा शंकर की बहन शारदा का विवाह पूर्णिमा के भाई से हुआ था. शादी के बाद अपनी बहन को लिवाने जब गिरिजा शंकर अपने दोस्तों के साथ लिमदेवाड़ा गया था, तब परंपरा के अनुसार उन की खूब खातिरदारी हुई थी. पूर्णिमा भी गिरिजा शंकर के साथ बैठ कर खूब हंसीमजाक कर रही थी. पूर्णिमा उस समय 19 साल की नवयौवना थी, जिस का रूपयौवन देख कर गिरिजा शंकर मन ही मन फिदा हो गया था.
बहन शारदा की शादी के बाद उसे ससुराल से लिवाने अकसर गिरिजा शंकर बाइक से जाता था. बहन शारदा का एकलौता भाई होने की वजह से उसे सब पसंद करते थे. बहन की ससुराल में वह पूर्णिमा से हंसीमजाक करता तो रिश्ते के लिहाज से कोई कुछ नहीं कहता था. धीरेधीरे पूर्णिमा और गिरिजा शंकर के बीच हंसीमजाक से शुरू हुआ सिलसिला प्यार में तब्दील हो चुका था. पूर्णिमा का भाई और पिता खेतीबाड़ी में लगे रहते और पूर्णिमा कालेज की पढ़ाई कर रही थी, ऐसे में गिरिजा शंकर कभीकभार पूर्णिमा को कालेज भी छोड़ दिया करता था.
एक दिन कालेज ले जाते वक्त गिरिजा शंकर ने बाइक बंजारी के जंगल में रोक दी तो पूर्णिमा ने पूछा, “यहां घने जंगल में बाइक क्यों रोक दी?”
“कुछ नहीं, आज जंगल में मंगल करने का इरादा है.” गिरिजा शंकर पूर्णिमा के साथ शरारत करते हुए बोला.
“धत, यहां कोई देख लेगा तो घर तक खबर पहुंचने में देर नहीं लगेगी.” पूर्णिमा बोली.
गिरिजा शंकर ने पूर्णिमा के गले में हाथ डाला और उसे जंगल के घने पेड़ की आड़ में ले जा कर बोला, “मेरी जान, जब प्यार किया तो डरना क्या.”
पूर्णिमा के अंदर सुलग रही आग भी आज चिंगारी बन कर जल उठी थी. उस ने भी अपनी बाहों को गिरिजा शंकर के गले में डालते हुए कहा, “मैं तो तुम्हें जी जान से प्यार करती हूं, तुम्हारी बाहों में मुझे जमाने का डर नहीं.”
“तो फिर मुझे अपनी हसरत पूरी कर लेने दो.” पूर्णिमा के होंठो पर चुंबन देते हुए गिरिजा शंकर ने कहा.
“किस ने रोका है तुम्हें, मैं भी तुम्हारे प्यार में जी भर के डूब जाना चाहती हूं.” पूर्णिमा ने गिरिजा शंकर के माथे को चूमते हुए कहा. धीरेधीरे गिरिजा शंकर के हाथ पूर्णिमा के अंगों पर रेंगने लगे. जंगल के एकांत में पूर्णिमा और गिरिजा शंकर ने अपने देह की आग को शांत किया और कपड़ों को ठीक करते हुए उसे कालेज छोड़ दिया. तन की आग बुझाने का सिलसिला जो एक बार शुरू हुआ तो फिर आगे बढ़ता गया. अकसर दोनों को जब भी मौका मिलता, अपनी हसरतें पूरी करने लगे.
क्रमशः
5 अप्रैल, 2023 को दोपहर करीब 12 बजे की बात है. पूर्णिमा बिसेन अपनी मां से बोली, “मम्मी मैं सिलाईकढ़ाई सीखने जा रही हूं.”
“बेटा, तेरी लग्न हो गई है. ये सिलाईकढ़ाई सीखना बंद कर दे,” पूर्णिमा की मां ने उसे रोकते हुए कहा.
“नहीं मम्मी, अभी शादी तो 22 तारीख को है, जब तक कुछ और सीख लेने दो. फिर तो घरगृहस्थी से फुरसत कहां मिलेगी,” पूर्णिमा ने जिद करते हुए कहा.
“ठीक है बेटा, जैसी तेरी मरजी, मगर शाम ढलने से पहले घर आ जाना.” मां ने समझाते हुए कहा.
प्रेमी से मिलने पहुंच गई पूर्णिमा बिसेन
“मां आज साइकिल में हवा कम है, इसलिए पैदल ही जा रही हूं.” पूर्णिमा ने दुपट्ïटा सिर पर बांधते हुए कहा.
“बापू के आने के पहले ही घर वापस आ जाना, वरना मुझे उलाहना देंगे.” मां ने सीख देते हुए कहा.
मां की हरी झंडी मिलते ही पूर्णिमा अपने घर से पास ही के गांव डूंडा सिवनी चली गई, किंतु शाम तक घर नहीं लौटी. पूर्णिमा के समय पर घर वापस न आने से मां के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. पूर्णिमा के पिता धनराज और भाई बाइक ले कर अपने रिश्तेदारों को पूर्णिमा की शादी का आमंत्रण दे रहे थे. शाम को जब वे घर लौटे तो पूर्णिमा की मां बोली, “पूर्णिमा अभी तक सिलाई सीख कर घर वापस नहीं आई है.”
“आखिर अब सिलाई सीखने की क्या जरूरत है, विवाह तो होने वाला है.” दिन भर निमंत्रण कार्ड बांट कर थकेहारे लौटे धनराज बोले. धनराज मुंहहाथ धो कर खाना खाने की तैयारी में थे. पूर्णिमा के घर न लौटने की बात सुन कर वे अपने बेटे से बोले, “बेटा, जरा पूर्णिमा को फोन लगा कर पूछ, घर आने में देर क्यों हो गई?”
धनराज के बेटे ने पूर्णिमा को फोन लगाया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहा था. जब उस ने पिता को यह जानकारी दी तो उन की चिंता बढ़ गई. अनमने ढंग से जल्द ही भोजन खत्म कर के उठे धनराज ने आसपास के गांव में रिश्तेदारी के अलावा पूर्णिमा के जानपहचान वालों के घर फोन लगा कर पूछताछ की, परंतु पूर्णिमा का कोई पता नहीं चला.
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के हट्ïटा थाना इलाके में एक छोटा सा गांव लिम्देवाड़ा है, जिस की आबादी बमुश्किल एक हजार होगी. खेतीकिसानी वाले इस गांव में 55 साल के धनराज बिसेन खेतीबाड़ी करते हैं. धनराज का एक बेटा और पूर्णिमा नाम की एक बेटी है.
धनराज बिसेन खुद तो ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं हैं, परंतु अपनी बेटी को पढ़ा कर उसे काबिल बनाना चाहते थे. यही वजह थी कि गांव की 23 साल की लडक़ी पूर्णिमा एमएससी फाइनल की पढ़ाई बालाघाट कालेज से कर रही थी. हाल ही में उस ने परीक्षा दी थी. परीक्षा खत्म होते ही वह पास के गांव डूंडा सिवनी में सिलाईकढ़ाई सीख रही थी. पूर्णिमा की पढ़ाई के अलावा सिलाईकढ़ाई में भी रुचि को देखते हुए घर वालों ने उसे सिलाईकढ़ाई सीखने के लिए हंसीखुशी इजाजत दी थी.
शादी से पहले पूर्णिमा हो गई गायब
इस साल कालेज की पढ़ाई खत्म होने वाली थी, यही सोच कर धनराज बिसेन ने अपनी बेटी पूर्णिमा का विवाह ग्राम सारद में तय कर दिया था और 22 अप्रैल अक्षय तृतीया के दिन पूर्णिमा की शादी होने वाली थी. शादी को ले कर पूरे घरपरिवार में उत्साह और उमंग का माहौल था, मगर पूर्णिमा के घर से गायब होते ही शादी का जश्न मातम में बदल गया था.
धनराज के परिवार को बदनामी भी झेलनी पड़ रही थी. लोग दबी जुबान से यह भी कह रहे थे कि प्यारमोहब्बत के चक्कर में किसी के साथ भाग गई होगी. मामला जवान बेटी के शादी के ऐन वक्त घर से गायब होने का था, लिहाजा गांव के बड़ेबुजुर्गों की सलाह पर धनराज ने दूसरे दिन 6 अप्रैल को हट्ïटा थाने में जा कर पूर्णिमा की गुमशुदगी दर्ज करा दी. टीआई अमित कुमार कुशवाहा ने पूर्णिमा की फोटो और जानकारी ले कर धनराज को भरोसा दिया कि जल्द ही पूर्णिमा को खोज निकालेंगे.
पूर्णिमा के गुम होने की खबर उस के होने वाले पति के घर वालों तक पहुंच चुकी थी. वहां भी शादी की तैयारियां चल रही थीं. पूर्णिमा का मंगेतर रातदिन उस के ख्वाबों में डूबा उस दिन का इंतजार कर रहा था कि कब उस की डोली घर आए और वह पूर्णिमा के साथ सुहागरात मनाए. मगर पूर्णिमा के गायब होने की खबर से मंगेतर ने यह सोच कर राहत की सांस ली कि अच्छा हुआ कि वह शादी के पहले भाग गई, बाद में कुछ ऊंचनीच होती तो गांव में उस की बदनामी ही होती.
पूर्णिमा कर रही थी एमएससी की पढ़ाई
पूर्णिमा कालेज से अपनी एमएससी की पढ़ाई कर ही रही थी, वह साइकिल से गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने भी जाती थी. अपने गांव से 3-4 किलोमीटर दूर डूंडा सिवनी सिलाई क्लास भी साइकिल से ही जाती थी, लेकिन 5 अप्रैल को वह साइकिल के बजाय पैदल ही घर से चेहरे पर दुपट्ïटा बांध कर निकली थी, जिसे गांव के कुछ नवयुवकों ने गांव से जाते हुए देखा था.
पुलिस पूछताछ में एक नवयुवक ने बताया कि उस दिन भी दोपहर के समय एक युवक बाइक से उस के पास पहुंचा, जिस के साथ बैठ कर वह चली गई. जैसेजैसे दिन गुजर रहे थे, पूर्णिमा के घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी. पुलिस भी पूर्णिमा की खोज में जुटी हुई थी. पुलिस को शक था कि कहीं प्रेम प्रसंग के चक्कर में पूर्णिमा घर से भागी होगी.
जांच के दौरान पुलिस का यह संदेह सच साबित भी हुआ. जांच में पता चला कि पूर्णिमा का प्रेम संबंध पिछले कुछ सालों से उस की भाभी के भाई गिरिजा शंकर पटले के साथ चल रहा था. गिरिजा शंकर भरवेली थाना क्षेत्र के मोहगांव खारा का रहने वाला था. घर के आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ में पुलिस को यह भी पता चला कि घटना वाले दिन पूर्णिमा गिरिजा शंकर के साथ अंतिम बार देखी गई थी.
पुलिस टीम ने साइबर सेल की मदद से गिरिजा शंकर और पूर्णिमा के मोबाइल नंबर ले कर काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में 5 अप्रैल को पूर्णिमा और गिरिजा शंकर के बीच बातचीत के अलावा उन की मोबाइल लोकेशन भरवेली थाना क्षेत्र में आने वाले गांगुलपरा और बंजारी के बीच पहाड़ी जंगल में मिल रही थी.
तब पुलिस ने शक के आधार पर गिरिजा शंकर को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो पहले तो वह पुलिस को गुमराह करता रहा. पहले तो गिरिजा शंकर ने बताया कि वे बालाघाट घूमने गए थे और घूमने के बाद पूर्णिमा को गांव के बाहर छोड़ दिया था, परंतु पुलिस जांच में दोनों के मोबाइल फोन की लोकेशन बंजारी के जंगल की मिल रही थी.
क्रमशः
इस से रमित बुरी तरह डर गया. उस ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए निशा के पिता को चैक काट कर दे दिए. उस ने चैक तो दे दिए, लेकिन चैक देने के बाद वह परेशान रहने लगा. क्योंकि उस के खाते में पैसे नहीं थे. उसे पता था कि अगर चेक बाउंस हो गए तो एक और नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. इसलिए उस ने इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने के लिए एक भयानक योजना बना डाली.
रोशनलाल के परिवार में गहरी पैठ होने की वजह से रमित उन के परिवार की हर गतिविधियों को जानता था. वह यह भी जानता था कि हर रविवार की सुबह रोशनलाल और निशा हैबोवाल स्थित राधास्वामी सत्संग भवन में सत्संग सुनने जाते हैं. रविवार को साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से लुधियाना के सारे बाजार और उद्योग बंद रहते हैं. रमित की फैक्ट्री भी उस दिन बंद थी. इन्हीं बातों के मद्देनजर रमित ने शनिवार शाम यानी 21 अगस्त को रोशनलाल को फोन कर के कहा, ‘‘पापा, मैं कल सुबह एटीएम से रुपए निकाल कर आप को दे दूंगा. आप चैक बैंक में मत डालना.’’
अगले दिन सुबह जब रोशनलाल और निशा सत्संग के लिए जा रहे थे तो रास्ते में ही रमित ने उन्हें अपनी कार में बिठा लिया. हालांकि रोशनलाल ने बहुत कहा कि रुपए निकालने ही तो हैं, सत्संग के बाद निकाल लेंगे. लेकिन रमित ने यह कह कर उन्हें खामोश कर दिया कि वह पैसे दे देगा तो उस के सिर से बोझ उतर जाएगा.
रमित की गाड़ी दुगड़ी स्थित एटीएम पर रुकी. उस ने यह कह कर रोशनलाल को वहीं उतार दिया कि वह 10 मिनट वहीं रुकें, एटीएम कार्ड वह घर भूल आया है. झूठ बोल कर वह निशा को साथ ले कर सीधा फैक्ट्री पहुंचा. फैक्ट्री ले जा कर उस ने निशा को केबिन में बिठा दिया और पहले से खरीद कर रखा चाकू निकाल कर उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी.
निशा की हत्या कर के उस ने अपने 2 कर्मचारियों विजय व कुमार की मदद से निशा की लाश प्लास्टिक के एक बोरे में भरी और उन्हीं की मदद से वह बोरा कार की डिग्गी में रख कर जस्सियां के एक खाली प्लाट में फेंक आया. इस के बाद वह दुगड़ी स्थित एटीएम पर पहुंचा, जहां रोशनलाल खड़ा था. वह उसे भी कार में बैठा कर फैक्ट्री ले आया. निशा की तरह उस ने उस की भी हत्या कर दी और उस की लाश भी प्लास्टिक के बोरे में भर कर दोराहा नहर में फेंक दी.
बापबेटी की हत्या करने के बाद रमित कार से सीधा रोशनलाल के घर पहुंचा. कार उस ने मकान के पीछे वाली गली में खड़ी कर दी. इस के बाद वह मकान के भीतर गया. पहले वाले कमरे में शकुंतला बैठी थी. रमित ने चाकू निकाल कर उस पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया. वह ढेर हो गई. इस के बाद वह भीतर वाले कमरे में पहुंचा, जहां राजेश टीवी देख रहा था.
कमरे में पहुंचते ही उस ने सब से पहले टीवी की आवाज तेज की और फिर राजेश पर अचानक हमला बोल दिया. अचानक हमला हुआ था, फिर भी अपाहिज राजेश चीखाचिल्लाया. उस ने रमित का विरोध करते हुए आखिरी क्षणों तक उस के साथ संघर्ष किया. राजेश की हत्या करने के बाद रमित बाथरूम में हाथमुंह धोना चाहता था, लेकिन उसी समय मोहल्ले वालों ने बाहर का दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.
हड़बड़ाहट में वह चाकू वहीं छोड़ कर मकान के पिछले दरवाजे से भाग निकला. पूरे परिवार की हत्या करने के बाद वह पुन: फैक्ट्री आया, जहां उस ने हाथमुंह धोया. चार लोगों की हत्याएं करने में चाकू की कुछ खरोंचे उस के हाथ पर भी लग गई थीं. उस ने दुगड़ी की एक डिस्पेंसरी में जा कर हाथ पर पट्टी करवाई और फिर आगे के बारे में सोचने लगा. पर वह कुछ सोचता या करता, इस से पहले ही वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया.
पुलिस ने रमित भंडारी के साथ उस के दोनों कर्मचारियों को भी हिरासत में ले कर अगले दिन मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट परमिंदर कौर की अदालत में पेश कर के 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड की अवधि में रमित की निशानदेही पर जस्सियां से निशा की तथा दोराहा नहर के किनारे से रोशनलाल की लाश बरामद कर ली. पुलिस ने रमित की 2 कारें भी जब्त कर लीं. पुलिस ने 7-7 लाख रुपए के वे 2 चैक भी बरामद किए, जो रमित ने रोशनलाल को दिए थे. तलाशी लेने पर निशा के पर्स से डेढ़ लाख कैश भी मिला था.
इस तरह यह हत्याकांड पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह की देखरेख में एसीपी नरेंद्र रूबी व अन्य अधिकारियों की सूझबूझ से 24 घंटे के भीतर ही सुलझा लिया गया. एक तरह से इस में रुपए दे कर दुश्मन बनाने वाली बात हुई थी. रोशनलाल रमित को रुपए दे कर न उस की सहायता करता और न ही उस का परिवार यूं बेमौत मारा जाता. शायद सांप को दूध पिलाने का यही अंजाम होता है.
रमित की यह बात हमारे गले नहीं उतर रही थी. इस में कई ऐसे पेंच थे, जो समझ से बाहर थे. मैं ने रमित से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बताओ कि इस वक्त निशा कहां है?’’
मेरे सवाल पर वह बौखला उठा और झल्ला कर बोला, ‘‘मैं क्या जानूं, भाग गई होगी अपने किसी यार के साथ.’’
‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ मैं ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘जनाब ऐसी औरतें यही तो करती हैं. एक से दिल भर गया तो दूसरे के पास और दूसरे से भर गया तो तीसरे के पास.’’
‘‘वाह रमित कुमार.’’ मैं ने कहा, ‘‘मैं ने तो तुम से केवल निशा के बारे में पूछा था और तुम ने पूरी रामायण सुना दी. खैर छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हें ब्लैकमेल तो निशा कर रही थी, फिर तुम ने उस की मां और भाई की हत्या क्यों की?’’
मेरे इस सवाल पर वह बगले झांकने लगा. मैं ने उसे चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘देखो, हमें सब पता है. अच्छा यही है कि तुम हमें पूरी बात सचसच बता दो, वरना तुम्हें फांसी के फंदे से कोई नहीं बचा सकता.’’
मेरी बात सुन कर उस ने गर्दन झुका ली. मैं इंसपेक्टर हरपाल सिंह, निर्मल सिंह और बिट्टन कुमार को साथ ले कर उस की मौसी की फैक्ट्री पहुंचा. वहां रमित की कार बाहर ही खड़ी थी. कार का बारीकी से मुआयना किया गया तो उस में कई जगह खून के धब्बे दिखाई दिए. ठीक वैसे ही खून के धब्बे फैक्ट्री के औफिस में भी मिले. फैक्ट्री की अच्छी तरह तलाशी लेने पर हमें एक लेडीज सैंडिल भी मिली. फैक्ट्री में 2 कर्मचारी मिले, जिन के नाम विजय प्रसाद और कुमार थे. विजय प्रसाद गहरी कोठी, थाना नोतन, जिला पश्चिमी चंपारण (बिहार) का रहने वाला था तो कुमार गांव मुकार, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था.
दोनों से पूछताछ करने पर इस दोहरे हत्याकांड के साथसाथ रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल और उस की बेटी निशा की गुमशुदगी का रहस्य भी खुल गया. मेरे आदेश पर इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने विजय प्रसाद और कुमार को पुलिस हिरासत में ले लिया. रमित भंडारी को हम ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था. अब तक की तफ्तीश, रमित भंडारी और फैक्ट्री से दबोचे गए दोनों कर्मचारियों से की गई पूछताछ के बाद इस जघन्य हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई, वह स्वार्थ के रिश्तों और विश्वास की नींव पर झूठ का महल खड़ा करने जैसी थी.
36 वर्षीया निशा काफी खूबसूरत, मिलनसार व हंसमुख स्वभाव की युवती थी. संभवत: उस का यही स्वभाव उस की और उस के परिवार की हत्या का कारण बना था. सीधीसादी निशा की बीए पास करने के बाद शादी हो गई थी. लेकिन पति से उस की नहीं बनी, जिस से जल्दी ही उस का तलाक हो गया था. निशा ने इसे भाग्य मान कर चुपचाप स्वीकार कर लिया और मन ही मन तय कर लिया कि अब वह कभी शादी नहीं करेगी. गुजरबसर के लिए उस ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली.
सन 2008 में जब निशा का परिवार चंद्रनगर, सुंदरनगर में रहता था, तभी अचानक एक दिन निशा की मुलाकात रमित भंडारी से हुई. रमित महत्त्वाकांक्षी, चतुरचालाक युवक था. उस ने शादीशुदा होते हुए भी अपनी शादी की बात निशा से छिपा ली थी. हालांकि निशा ने कभी शादी न करने का फैसला किया था. लेकिन रमित ने उस की सोई कामनाओं को जगा कर उस से शादी करने का वादा कर लिया. न चाहते हुए भी निशा धीरेधीरे रमित के आकर्षण में बंधती चली गई. जल्दी ही दोनों के बीच आंतरिक संबंध बन गए. एक दिन निशा ने रमित को अपने घर ले जा कर उस का परिचय अपने मातापिता से करवा दिया.
रोशनलाल के परिवार की समस्या यह थी कि उस के परिवार में कोई भी युवा पुरुष नहीं था. बेटा राजेश था भी तो अपाहिज था. इसीलिए पूरा परिवार रमित से खुश रहता था और उसे बेटे की तरह मानता था. निशा का भी सोचना था कि उस की अन्य बहनें दूर रहती थीं, अगर शादी के बाद रमित उस के मातापिता और अपाहिज भाई का खयाल रखेगा तो इस से अच्छा और क्या हो सकता था.
समय के साथ निशा और रमित के आपसी संबंध बन गए थे. सन् 2009 के अंत में रोशनलाल स्टेशन मास्टर से रिटायर हो गए थे. उन्हें रिटायरमेंट पर काफी रुपए मिले थे. कुछ दिनों बाद उन्होंने चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेच दिया था. नया मकान लेने के बाद भी उन के पास 35-40 लाख रुपया बच गया था.
एक दिन जब रमित रोशनलाल के घर आया तो बहुत परेशान था. पूरे परिवार ने उस की परेशानी का कारण पूछा, पर उस ने कुछ नहीं बताया. बाद में उस ने निशा को अलग ले जा कर बताया, ‘‘निशा, मुझे बिजनैस में बहुत बड़ा घाटा हो गया है. बाजार का लाखों रुपया देना है. अगर मैं ने रुपए नहीं दिए तो मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाऊंगा.’’
‘‘तुम्हें कितने रुपए चाहिए?’’ निशा ने पूछा तो रमित बोला, ‘‘यही कोई 40-45 लाख…’’
रमित की बात सुन कर निशा हतप्रभ रह गई. पल भर बाद वह कुछ सोच कर बोली, ‘‘रमित, पापा के पास 30-35 लाख रुपए होंगे, वे तुम्हें इनकार नहीं करेंगे. जब तुम्हारा बिजनैस ठीक हो जाए तो पापा के पैसे लौटा देना.’’
‘‘वह सब तो ठीक है, पर मैं तुम्हारे पापा से रुपए नहीं मांगूगा. मुझे शर्म आती है.’’ रमित ने अभिनय करते हुए कहा तो निशा बोली, ‘‘ठीक है, तुम रुपए मत मांगना. रुपए मैं मांग लूंगी, पर तुम साथ तो चलो.’’
निशा के समझाने पर रमित उस के साथ चलने को तैयार हो गया. निशा ने जब अपने पिता रोशनलाल को रमित की परेशानी का कारण बताया तो वे हंसते हुए बोले, ‘‘तुम भी कमाल करते हो बेटा, यह घर तुम्हारा है. यहां की हर चीज पर तुम्हारा अधिकार है. रुपए मेरे पास बढ़ तो रहे नहीं हैं. तुम अपना काम निपटा लो. जब आ जाएं तो मुझे लौटा देना.’’
अगले दिन ही रोशनलाल ने रमित को 35 लाख रुपए कैश दे दिए. रुपए लेते समय उस ने वादा किया था कि वह एक महीने में रुपए लौटा देगा. लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी जब उस ने न तो पैसे लौटाए और न कभी इस विषय में बात की तो रोशनलाल और निशा को चिंता होने लगी. उसी बीच कहीं से निशा को पता चल गया कि रमित शादीशुदा है. उस ने उस से झूठ बोला था.
इस बात से निशा के दिल को बहुत ठेस पहुंची. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि पिता का पैसा वापस मिलने के बाद वह रमित से संबंध तोड़ लेगी. यह बात उस ने रमित से कह भी दी थी, लेकिन समस्या यह थी कि रमित पैसा लौटाने का नाम नहीं ले रहा था. इस पर निशा ने उसे धमकी देते हुए कहा कि अगर उस ने शराफत से उस के पिता का पैसा नहीं लौटाया तो वह अपने और उस के संबंधों की बात उस की मां और पत्नी को बता देगी.
क्रमशः
पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी, जिस के अनुसार मौत का कारण अधिक खून बह जाना था. फगवाड़ा से शकुंतला के मायके वाले आ गए थे. पोस्टमार्टम के बाद लाशें उन्हें सौंप दी गई थीं. मृतका के भाइयों ने दोनों लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया था. मैं ने उन से भी पूछताछ की. उन्होंने केवल इतना ही बताया था कि रोशनलाल ने रिटायर होने के बाद चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख में बेचा था. नया मकान उन्होंने 35-40 लाख रुपए में खरीदा था.
कुछ पैसा उन्हें रिटायर होने पर मिला था. कुल मिला कर उन के पास करीब 35 लाख रुपए थे. रुपए उन्होंने कहां रखे थे या किसी को दिए थे, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. फलस्वरूप बात वहीं की वहीं रह गई. मैं ने सोचा था कि शायद मृतका के मायके वालों से काम की कोई बात पता चल जाएगी, पर मायूस ही होना पड़ा. घूमफिर कर हमारी नजर फिर रमित भंडारी पर ही जा कर टिक गई थी.
रमित ने आधा घंटे बाद आने को कहा था. मैं ने घड़ी देखी. अब तक पौन घंटा हो चुका था. मैं ने सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार से कहा कि वह रमित को फोन कर के पूछे. बिट्टन कुमार ने बताया कि उस ने 10 मिनट में आने को कहा है, लेकिन वह दस मिनट बाद भी नहीं आया. इस प्रकार 10-10 मिनट करतेकरते उस ने 2 घंटे बरबाद कर दिए. उधर पुलिस के सिर पर उच्च अधिकारियों की तलवार लटक रही थी.
मेरी टीम की जान सांसत में थी. मुझे रमित भंडारी पर गुस्सा आ रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो मैं ने भंडारी से मोबाइल पर खुद बात की. मैं ने उसे डांटते हुए कहा कि वह तुरंत मेरे औफिस पहुंचे. उस ने मुझ से भी 10 मिनट का समय मांगा. जब वह 10 मिनट तक नहीं आया तो मैं ने फिर फोन किया. लेकिन इस बार उस के फोन का स्विच बंद मिला. इस के बाद उस के फोन का स्विच हमेशा के लिए बंद हो गया.
रमित के इस व्यवहार से मुझे उस पर संदेह हुआ. मैं समझ गया कि वह जानबूझ कर पूछताछ से बचना चाहता था. मैं ने हरपाल सिंह से उस के फोन की लोकेशन पता करने को कहा. इंसपेक्टर हरपाल ने रमित के फोन की लोकेशन चैक करवाई तो उस की लोकेशन जस्सियां रोड, लुधियाना की मिली. इस से यह बात साफ हो गई कि वह हम से झूठ बोल रहा था. इस से उस पर हमारा संदेह और बढ़ गया.
अभी मैं और हरपाल सिंह इस मुद्दे पर बातें कर ही रहे थे कि सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने आ कर बताया कि रमित भंडारी अपनी मौसी की फैक्ट्री नैना क्वायर प्रोडक्ट्स में कहने को तो मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव था, लेकिन एक तरह से उस गद्दा फैक्ट्री का सर्वेसर्वा वही था. बिट्टन कुमार ने यह भी बताया कि रिटायर्ड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की छोटी बेटी निशा से उस के मधुर संबंध थे. वह उस के घर खूब आताजाता था. रोशनलाल ने उसे अपना बेटा बना रखा था.
मेरे लिए यह जानकारी काफी थी. इस से मुझे पक्का यकीन हो गया था कि वह इस दोहरे हत्याकांड का रहस्य जरूर जानता होगा. इसीलिए पुलिस के सामने आने से कतरा रहा था. मुझे समय बेकार करना उचित नहीं लगा. इसलिए मैं ने इंसपेक्टर हरपाल सिंह को तुरंत पुलिस टीम के साथ घाघरा रोड पहुंचने को कहा.
एक टीम मैं ने एसीपी परमजीत सिंह पन्नू की अगुवाई में तैयार करवाई. रमित भंडारी हमें फैक्ट्री के पास ही मिल गया. उस से वहीं पूछताछ की गई. वह हमें बहकाने की कोशिश करने लगा. वह हर सवाल का जवाब घुमाफिरा कर दे रहा था. उस के चेहरे पर काफी उलझन और घबराहट के मिलेजुले भाव थे. बात करते हुए वह हकला भी रहा था. तभी अचानक मेरा ध्यान उस के हाथ की ओर चला गया. उस के हाथ पर ताजी पट्टी बंधी थी. मैं ने इस बारे में पूछा तो वह बोला, ‘‘ऐसे ही मामूली सी खरोंच आ गई थी. सावधानी के तौर पर मैं ने पट्टी बंधवा ली.’’
खरोंच कैसे और किस चीज से आई, यह वह नहीं बता सका. इस बातचीत के बाद मेरा शक विश्वास में बदलने लगा. मैं ने उसे अपने औफिस चलने को कहा.
औफिस आ कर इंसपेक्टर हरपाल सिंह और बिट्टन कुमार ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने शकुंतला और राजेश की हत्या की बात स्वीकार कर ली. मैं ने कारण पूछा तो उस ने कोई कारण नहीं बताया. लेकिन जब थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने बताया कि रिटार्यड स्टेशन मास्टर रोशनलाल की बेटी निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. उस के अनुसार निशा के साथ उस के तीन सालों से अवैध संबंध थे. वह शादीशुदा था, जबकि निशा तलाकशुदा थी.
निशा बहुत ही खूबसूरत थी. पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर फिदा हो गए थे. दोनों के संबंध इतनी तेजी से परवान चढ़े कि रमित आए दिन उस के घर आनेजाने लगा. परिवार के लोगों को भी उस का आनाजाना अच्छा लगता था. शकुंतला तो उसे बेटाबेटा कहते नहीं थकती थी. निशा के साथ रमित के संबंधों की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. वे लोग अपने घर के छोटे से ले कर बडे़ कामों तक में रमित की सलाह लेने लगे थे.
रमित के अनुसार पिछले कुछ समय से निशा उसे ब्लैकमेल कर रही थी. वह कई बार उस की मांग पूरी भी कर चुका था. उस के घर वाले भी इस बात का फायदा उठा रहे थे. कुछ ही दिनों पहले निशा ने उस से 50 हजार रुपए की मांग की थी, लेकिन उस ने इतना पैसा देने से मना कर दिया था. शनिवार को निशा ने रमित की मां को फोन कर के कहा था कि वह उन्हें कुछ राज बताना चाहती है.
उसी दिन निशा ने फोन पर रमित को भी धमकी दी थी कि उस ने दोनों के निजी संबंधों की सीडी बनवा रखी है. अगर उस ने 50 हजार रुपए नहीं दिए तो वह उस सीडी को उस की मां और पत्नी को दे देगी. इसी बात से गुस्से में उस ने निशा से बदला लेने के लिए उस की मां और भाई की हत्या कर दी थी.
क्रमशः
22 अगस्त, 2010 की सुबह 10 बजे पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि हैबोवाल की दुर्गापुरी कालोनी की गली नंबर 5 के मकान नंबर- 7187/1 में 2 लोगों की हत्या हो गई है. सूचना मिलते ही थाना सलेम टाबरी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर निर्मल सिंह, सीआईए इंचार्ज इंसपेक्टर हरपाल सिंह, इंसपेक्टर दविंद्र कुमार, एसएचओ डिवीजन नंबर 4 तथा दुर्गापुरी पुलिसचौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार मेरे पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर पहुंच गए थे. जिस मकान में हत्याएं हुई थीं, उस के बाहर लोगों की काफी भीड़ लगी थी.
पड़ोसियों ने बताया कि उन्होंने सुबह लगभग साढ़े 9 बजे मकान के भीतर तेज चीखों की आवाजें सुनी थीं. चूंकि उस वक्त अंदर तेज आवाज में टीवी चल रहा था, इसलिए यह समझना मुश्किल था कि आवाजें टीवी की थीं या मकान में रहने वालों की. मकान का दरवाजा अंदर से बंद था. थोड़ी देर बाद जब पड़ोसियों को लगा कि चीखें टीवी की नहीं, बल्कि उस में रहने वालों की थीं तो उन्होंने मुख्य द्वार तोड़ कर भीतर जा कर देखा.
अंदर अलगअलग कमरों में 2 लाशें पड़ी थीं. इस के बाद घटना की सूचना पुलिस को दी गई थी. मैं ने मकान के भीतर जा कर देखा. एक कमरे में अधेड़ उम्र की महिला की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर तेजधार हथियार के कई घाव थे, जिस में से खून रिस रहा था. दूसरे कमरे में लगभग 40 वर्षीय एक व्यक्ति की रक्तरंजित लाश पड़ी थी. उस के शरीर पर भी तेजधार हथियार के घाव थे. वह विकलांग था. उस की व्हीलचेयर वहीं पास में उलटी पड़ी थी. देखने से ही लग रहा था कि विकलांग होने के बावजूद उस ने हत्यारों का विरोध किया था. दोनों को ही बड़ी बेरहमी से मारा गया था.
मैं ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. कमरे में रखा टीवी अभी भी चल रहा था. मेरे इशारे पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने टीवी बंद कर दिया. क्राइम टीम और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी बुलाया गया था, साथ ही डौग स्क्वायड को भी. जासूस कुत्ते लाश को सूंघ कर मकान के पिछवाड़े जा कर रुक गए. संभवत: हत्यारे वहां से किसी सवारी में बैठ कर गए थे.
मकान की अच्छी तरह छानबीन की गई. लूटपाट के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. हत्याएं शायद आपसी रंजिश के कारण हुई थीं. टीवी के पास खून सना एक खंजरनुमा चाकू पड़ा था. मैं ने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को उसे संभाल कर रखने के लिए कहा. हत्याएं शायद चाकू से की गई थीं. मैं पुलिस टीम के साथ मुआयना कर रहा था कि पड़ोसियों से पता चला कि यहां सिर्फ हत्याएं ही नहीं हुई थीं, बल्कि इस परिवार के 2 अन्य लोग लापता भी थे.
इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने पूछताछ के आधार पर मुझे बताया कि इस परिवार के मुखिया का नाम रोशनलाल था और वह रेलवे से रिटायर्ड था. इस के पहले यह परिवार चंद्रनगर में रहता था. रोशनलाल की पत्नी का नाम शकुंतला था. दोनों की 4 संतानें थीं, जिन में सब से बड़ी 47 वर्षीया बेटी स्वीटी शादीशुदा थी और इंग्लैंड में रहती थी. दूसरे नंबर का बेटा राजेश कुमार उर्फ राजू अपाहिज था, लेकिन घर में काम कर के लगभग 10 हजार रुपए महीना कमा लेता था.
तीसरे नंबर की बेटी सीमा भी शादीशुदा थी, लेकिन 3 साल पहले पीलिया से उस की मृत्यु हो चुकी थी. सब से छोटी 36 वर्षीया निशा थी. बीए पास निशा किसी प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थी. लगभग 2 महीने पहले इन लोगों ने अपना चंद्रनगर वाला मकान 70 लाख रुपए में बेचा था. लगभग डेढ़ महीने पहले ही यह परिवार इस मकान में रहने आया था. यह मकान उन्होंने 40 लाख रुपए में खरीदा था. कत्ल शकुंतला और राजेश कुमार उर्फ राजू का हुआ था. जबकि रोशनलाल और निशा गायब थे.
मैं ने इंसपेक्टर निर्मल सिंह को आदेश दिया कि लाशों का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दें. साथ ही इंसपेक्टर हरपाल सिंह से कहा कि पड़ोसियों से पूछताछ कर के बापबेटी की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारें. जबकि सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार को मैं ने अस्पतालों, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन पर बापबेटी की तलाश करवाने तथा जिले के अन्य सभी थानों में उन का हुलिया बता कर वायरलैस मैसेज भिजवाने की जिम्मेदारी सौंपी.
चूंकि यह केस पुलिस कमिश्नर की नजर में आ गया था, इसलिए इन कामों से फारिग हो कर उन्हें रिपोर्ट देने मैं उन के औफिस पहुंच गया. मैं ने अपनी परेशानी बता कर उन से कहा, ‘‘सर, समस्या यह है कि यह परिवार मोहल्ले में नया है. पड़ोसियों को इन के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है.’’
‘‘ठीक है, जैसा भी हो हर नजरिए से जांच करो. इस के लिए कई टीमें बना कर लगाओ. और हां, सब से जरूरी है बापबेटी का पता लगाना.’’
कमिश्नर साहब के पास से लौट कर मैं ने एक बार फिर घटनास्थल पर जा कर पड़ोसियों से पूछताछ की. काफी लंबी छानबीन के बाद काम की एक बात पता चली. मैं ने जब रोशनलाल के घर पर आनेजाने वाले लोगों की लिस्ट बनाई तो पता चला कि रमित कुमार भंडारी उर्फ रिकी नाम का एक युवक रोशनलाल के घर कुछ ज्यादा ही आताजाता था. मैं ने हरपाल सिंह से रमित के बारे पता लगाने को कहा.
हरपाल सिंह ने पता लगा कर बताया कि रमित कुमार भंडारी जस्स्यिं रोड, तरसेम कालोनी के मकान नंबर बी34/6614 में रहता था. वह रमित का मोबाइल नंबर भी ले आए थे. मेरे कहने पर सबइंसपेक्टर बिट्टन कुमार ने रमित को फोन किया, पर उस ने फोन नहीं उठाया. जब उसे कई बार फोन किया गया तो उधर से कंप्यूटराइज्ड आवाज आने लगी कि यह नंबर पहुंच के बाहर है.
काफी कोशिशों के बावजूद हमें तफ्तीश को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था. कह सकते हैं कि हम अंधेरे में तीर मार रहे थे. ऐसे में जांच आगे बढ़ाने के लिए हमें केवल रमित भंडारी ही एकमात्र सहारा नजर आ रहा था. हमारी सारी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं. इसलिए हम उस का नंबर मिलाते रहे.
आखिर उस ने फोन उठा लिया. सबइंस्पेक्टर बिट्टन कुमार ने उसे मेरे औफिस आने को कहा. उस ने बताया था कि उस समय वह जालंधर में है और आधे घंटे में हाजिर हो जाएगा. मैं अपने औफिस में बैठा उस का इंतजार करता रहा.
इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने कहीं से मृतका शकुंतला के मायके का पता ढूंढ़ निकाला था. उस के पिता जगतराम की फगवाड़ा में टेलरिंग की दुकान थी. पता मिल गया तो इस घटना की सूचना मृतका के भाइयों अशोक, सुखविंदर और जसविंदर को दे दी गई थी.
क्रमशः
उस दिन के बाद से दीपक सोनाली को ट्यूशन पढ़ाने उस के घर कभी नहीं आया. अचानक उस के ट्यूशन पढ़ाना छोड़ देने से सोनाली के पापा सुनील थोड़ा परेशान हुए. उन्होंने इस विषय में ट्यूटर से बात भी की थी, लेकिन उस ने बहाना बनाते हुए समय का अभाव बताते हुए ट्यूशन छोडऩे का कारण बताया था.
सुनील को क्या पता था कि दीपक के नीयत में कितनी बड़ी खोट आ चुकी थी. जीवन संवारने के लिए जिस के हाथों में बेटी की डोर सौंपी थी, उसी के मन में पाप का काला परिंदा फडफ़ड़ाने लगा था. शुक्र तो सोनाली का कहिए, जो मर्यादा की डोर को चरित्र के मजबूत बंधन से बंधी थी कि खुद को पाकसाफ रहने दिया. ये सब घर वालों के अच्छे संस्कार की देन थी.
इतनी बड़ी बात हुई थी. सोनाली ने यह बात समझदारी के साथ खुद ही निबटा ली थी. यह बात न तो किसी और को शेयर की थी और न ही घर वालों से बताई थी. वह जानती थी कि अगर उस ने ये बात घर वालों से बता दी तो खामखा बड़ा हंगामा हो सकता है. इसलिए इसे यहीं पर विराम देने में समझदारी समझी. इस के बाद वह एक प्राइवेट स्कूट में पढ़ाने लगी.
सोनाली ने जिस सूझबूझ का परिचय दिया था, वह काबिलेतारीफ थी. ऐसा नहीं था कि दीपक ने सोनाली को भुला दिया हो, बल्कि उस के दिल में सोनाली के लिए और प्यार उमडऩे लगा था. उसे पाने की उस की हसरतें और जवां होती जा रही थीं. बस, उसे हासिल करने के लिए नित नईनई तरकीब सोचता रहता था, वक्तबेवक्त उसे फोन कर के अपने प्यार का इजहार करता था, लेकिन सोनाली का उस के लिए एक ही जवाब था- न.
जुनूनी आशिक बन गया दीपक साव
सनकी प्रेमी दीपक ने भी ठान लिया था कि सोनाली उस की नहीं हुई तो वह किसी और की भी दुनिया में नहीं हो सकती. वह उसी के लिए आई है और उसी की बन कर रहेगी. वह उस की नहीं हुई तो किसी और की भी नहीं हो सकती. तब उसे मरना होगा. इस के अलावा उस के पास जीने के लिए दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है.
पागलपन की हद से भी ज्यादा दीपक साव शिष्या रह चुकी सोनाली से एकतरफा प्यार करता था. जब सोनाली ने उस का प्यार ठुकरा दिया तो वह ईष्र्या की आग में जलने लगा था. ईष्र्या की इसी आग में जलते दीपक ने खतरनाक फैसला ले लिया.
घटना से 6 महीने पहले यानी सितंबर 2022 में सुपारी किलर भरत कुमार उर्फ कारू निवासी मझलीटांड़, थाना डोमचांच को डेढ़ लाख रुपए में उस की हत्या की सुपारी दे दी और पेशगी के तौर पर उसे 50 हजार रुपए भी दे दिए. इश्क में पागल हुए दीपक साव का साथ रोहित मेहता ने दिया. सुपारी लेने के बाद अपने 4 साथियों संतोष मेहता और संजय मेहता के साथ मिल कर सोनाली की रेकी करने लगा.

कहते हैं कि ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’, ये कहावत उस के साथ चरितार्थ हुई थी. 6 महीने बीत गए थे, मगर कारू अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका था. फिर दीपक ने ही एक दांव चला. वह जानता था इन दिनों सोनाली के घर वाले आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. पैसों की उन्हें सख्त जरूरत है.
इसी बात का लाभ उठाते हुए दीपक ने सोनाली से बात की कि उस के जानपहचान का एक बैंक है, जो बिना किसी शर्त के लोन दे सकता है. अगर तुम लोन लेना चाहो तो मैं तुम्हें वह दिलवा सकता हूं. जबकि दीपक का किसी भी बैंक वाले से कोई परिचय नहीं था. उस ने सोनाली को झांसे में लेने के लिए पांसा फेंका था, जो सही जगह जा कर लगा था. सोनाली ने लोन लेने के लिए हामी भर दी थी क्योंकि उसे पैसों की सख्त जरूरत थी.
ट्यूटर ने की हत्या
बात 21 मार्च, 2023 की है. दीपक ने सोनाली को सुबह फोन कर उसे मिलने के लिए बीरजामू के पास बुलाया. उस दिन सोनाली ने स्कूल से छुट्ïटी ले ली थी और घर पर ही थी. करीब साढ़े 10 बजे सोनाली मां को ‘दीपक सर से मिलने जाना है’ बता कर अपना पर्स और मोबाइल साथ ले कर निकली. उस ने यह भी कहा कि वह काम पूरा होते ही घंटे-2 घंटे में घर वापस लौट आएगी.
सोनाली पैदल ही डेढ़ घंटे में बीरजामू पहुंची तो सडक़ के बाईं पटरी पर एक चार पहिया वाहन के पास ओट लगा कर दीपक खड़ा उसे देख कर मंदमंद मुसकरा रहा था तो सोनाली भी हौले से मुसकरा दी. फिर दीपक ने कार का दरवाजा बाहर खोल कर उसे बैठने का इशारा किया तो वह कार की आगे वाली सीट पर बैठ गई.
कार की ड्राइवर सीट पर रोहित मेहता बैठा था, जबकि पीछे की सीट पर भरत उर्फ कारू, संजय मेहता, संतोष मेहता और दीपक बैठा था. दीपक का इशारा मिलते ही कार फर्राटा भरने लगी थी. हालांकि पहले से कार में बैठे लोगों को देख कर सोनाली चौंकी थी, लेकिन बाद में दीपक ने सोनाली से अपना पुराना दोस्त कह कर परिचय दिया तो वह सामान्य दशा में आई थी.
रोहित जब कार ले कर सुनसान इलाके की ओर बढ़ा तो सोनाली घबरा गई और उस ने दीपक से पूछा कि वह उसे कहां ले कर जा रहा है. ये रास्ता तो शहर की ओर नहीं जाता है. इस पर दीपक ने जवाब दिया, “तुम ठीक सोचती हो. ये रास्ता शहर की ओर नहीं, मौत की ओर जाता है. अब बता तू मुझ से शादी करेगी कि नहीं? मेरी बनेगी कि नहीं.”
इस पर सोनाली बिदक गई, “हजार बार कह चुकी हूं, मैं तुम से न तो प्यार करती हूं और न ही शादी कर सकती. तुम ने मेरे साथ धोखा किया है.”
“क्या करूं मेरी जान, प्यार और जंग में सब जायज होता है. मैं ने तुम से पागलपन की हद से ज्यादा प्यार किया और तुम ने मेरे प्यार को नहीं समझा. तो सुन ले अगर तू मेरी नहीं हो सकती तो मैं तुझे किसी और की भी नहीं होने दूंगा. अब मरने के लिए तैयार हो जा हरामजादी.” कहते हुए सनकी प्रेमी दीपक ने पास में रखे मोबाइल चार्जर की केबिल से गला कस कर उसे मौत के घाट उतार दिया और गाड़ी नीरू पहाड़ी खदान की ओर चलने का इशारा किया.
रोहित ने वैसा ही किया जैसा दीपक ने करने को कहा. उस ने कार नीरू पहाड़ी खदान की ओर मोड़ दी. वह इलाका बिलकुल सुनसान था. खदान के पास पहुंच कर पांचों कार से बाहर निकले, कार में पहले से रखे प्लास्टिक की बड़े आकार की बोरी निकाली. उस में एक बड़े आकार का भारी पत्थर डाला फिर सोनाली की लाश तोड़मरोड़ कर उस बोरी में भरी और उसे रस्सी से कस कर बांध दिया.
एकतरफा प्यार में हत्या करने के बाद उन्होंने सोनाली की लाश ऊपर से नीचे खदान में फेंक दी. इस से पहले दीपक ने सोनाली का फोन अपने कब्जे में ले लिया था. लाश ठिकाने लगाने के बाद पांचों कार में सवार हुए और अपनेअपने घरों को लौट गए. फिर क्या हुआ, कहानी में वर्णन किया जा चुका है.
कथा लिखे जाने तक पांचों आरोपी दीपक कुमार साव, रोहित कुमार मेहता, भरत कुमार उर्फ कारू, संजय मेहता और संतोष मेहता जेल की सलाखों के पीछे थे.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित