Crime Story : घिनौना खेल एक अपराधी का

Crime Story : गांव में दबंगई दिखाने के चक्कर में रामउजागर ऐसा हिस्ट्रीशीटर बदमाश बन गया कि उस के खिलाफ 45 मामले दर्ज हो गए. फिर उस ने पुलिस से बचने के लिए ऐसी फूलप्रूफ योजना बनाई कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बक्शा थाना क्षेत्र में एक गांव पड़ता है चुरावनपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जातियों की मिलीजुली आबादी है, लेकिन चौहानों की संख्या यहां दूसरी जातियों से ज्यादा है. इसी गांव के रामकिशोर चौहान ने अपने सभी बच्चों को ठीक से पढ़ायालिखाया.

वे चाहते थे कि उन के सभी बच्चे पढ़लिख कर किसी काबिल बनें. लेकिन उन के बेटे रामउजागर उर्फ कल्लू ने तो कुछ और ही सोच रखा था. घरपरिवार के दबाव के बावजूद वह ज्यादा नहीं पढ़लिख सका. जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ती गई, उस की सोच भी बदलती गई. वह खापी कर घर से निकलता और दिनभर मौजमस्ती कर के देर शाम घर लौट आता. धीरेधीरे गांव के कई आवारा लड़के उस की सोहबत में आ गए. इन लोगों के लिए गुंडागर्दी और लोगों से मारपीट करना आम बात हो गई. उस की इन हरकतों को देख कर रामकिशोर ने उस की नौकरी एक ईंट भट्टे पर लगवा दी, ताकि वह बुरी सोहबत से बचा रहे.

रामउजागर ने नौकरी तो कर ली, लेकिन इस काम में उस का मन नहीं लगता था. उसे आवारागर्दी में जो आनंद आता था, वह बंद हो गया. इसी बीच उसे शराब पीने की लत लग गई. अपनी इस लत को पूरी करने के लिए वह चोरी भी करने लगा. मारपीट करना तो उस की आदत में शामिल था ही. चोरीचकारी की शिकायतें भले ही रामकिशोर के पास नहीं आ पाती थीं, लेकिन बेटे द्वारा की गई मारपीट की बातें उन्हें अकसर पता चलती रहती थीं. इस से परिवार को भी कई तरह की मुशकिलों का सामना करना पड़ता था.  जब रामउजागर का आतंक बढ़ने लगा तो उस की शिकायतें थाने तक पहुंचने लगीं. एक बार उस की शिकायत पुलिस के पास पहुंची तो बक्शा थाने की पुलिस ने उसे उठा लिया.

उस के पास से पुलिस ने चाकू बरामद किया. पुलिस ने उस के खिलाफ 25 आर्म्स एक्ट का केस दर्ज किया. यह 1983 की बात है. यह छोटा सा मामला था, इसलिए जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जेल से आने के बाद सुधरने के बजाय वह और बिगड़ गया. वह बेखौफ हो कर वारदातें करने लगा, जिस से कुछ ही दिनों में उस पर बक्शा थाने में 9 केस दर्ज हुए और 1998 में वह थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश घोषित हो गया. हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद जब पुलिस का दबाव बढ़ने लगा तो रामउजागर जौनपुर से मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर चला गया. 22 अक्तूबर, 2014 को जौनपुर के पुलिस अधीक्षक बबलू कुमार अपने औफिस में बैठे दैनिक फाइलें निपटा रहे थे.

तभी पहरे पर तैनात सिपाही ने आ कर बताया कि उन से मध्य प्रदेश पुलिस के 2 पुलिसकर्मी मिलने आए हैं. साहब के हां करने पर उस ने उन दोनों को अंदर भेज दिया. पुलिस अधीक्षक ने उन दोनों को बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहिए, क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘सर, हम लोग मध्य प्रदेश, जबलपुर के थाना जीआरपी से आए हैं. रामउजागर चौहान जिस की उम्र करीब 50-55 वर्ष होगी, ने हमारे क्षेत्र में जहरखुरानी की कई वारदातों को अंजाम दिया है. पकड़े जाने पर वह कई बार जेल भी जा चुका है, लेकिन जमानत मिलने के बाद वह फिर से जहरखुरानी की घटनाओं को अंजाम दे रहा है. हमारे पास उस की कुर्की का आदेश है. हमें पता चला है कि इन दिनों वह जनपद जौनपुर के बक्शा थाना क्षेत्र के अपने गांव चुरावनपुर में छिपा हुआ है.’’

उन दोनों की बात सुन कर एसपी बबलू कुमार ने बक्शा थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को फोन मिलवा कर कहा कि रामउजागर चौहान के बारे में पता लगाएं और जबलपुर जीआरपी से आए सबइंस्पेक्टर आर.पी. सिंह की पूरी मदद करें. साथ ही अपनी काररवाई से भी अवगत कराएं. एसपी से बात होने के बाद थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने चुरावनपुर गांव का आपराधिक रजिस्टर मंगा कर उस पर नजर डाली तो उन्हें पहली ही नजर में पता चल गया कि रामउजागर बक्शा थाने का हिस्ट्रीशीटर है.

जबलपुर जीआरपी से आए सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह से बातचीत के बाद पता चला कि रामउजागर के खिलाफ 45 मुकदमे दर्ज हैं. प्रशांत कुमार तब आश्चर्य में रह गए, जब उन्हें पता चला कि रामउजागर तो 3 साल पहले ही मर चुका है. फाइल देखने के बाद प्रशांत कुमार ने गांव चुरावनपुर के प्रधान राजबहादुर पाल को फोन कर के थाने आने को कहा. ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ पाता, इस से पहले ही जबलपुर जीआरपी के सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह अपने सहयोगी के साथ थाना बक्शा पहुंच गए. उन्होंने एसपी बबलू कुमार का रेफरेंस दे कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को अपने आने का मकसद बता दिया.

थानाप्रभारी बक्शा और जबलपुर जीआरपी से आए आर.पी. सिंह रामउजागर के बारे में बातें कर ही रहे थे कि ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ गए. जब प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उन्हें बताया कि जबलपुर जीआरपी को उन के गांव के रामउजागर की तलाश है और वे उस के घर की कुर्की का आदेश ले कर आए हैं तो वह आश्चर्य से बोले, ‘‘साहब, वह तो 3 साल पहले मर चुका है, उस के घर की कुर्की कर के क्या होगा?’’

ग्रामप्रधान ने यह बात बड़े विश्वास से कही थी. उन का कहना था कि रामउजागर का अंतिम संस्कार उन के सामने किया गया था. ग्रामप्रधान की बात पर विश्वास कर के थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने उन से लिखित में रामउजागर का मृत्यु प्रमाणपत्र ले लिया. ग्रामप्रधान वापस लौट गया. ग्रामप्रधान द्वारा रामउजागर की मृत्यु के बारे में लिखित पत्र दिए जाने के बाद भी सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह यह मानने को तैयार नहीं थे कि वह मर चुका है. उन्होंने जातेजाते अपनी यह शंका थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को भी बता दी.

उन के जाने के बाद प्रशांत कुमार ने इस मुद्दे पर गहराई से सोचा तो उन्हें यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगी कि जब रामउजागर 3 साल पहले मर चुका है तो 1998 में खोली गई उस की चार्जशीट क्यों नहीं बंद की गई. मन में संदेह उठा तो उन्होंने पुराना रिकौर्ड चेक किया. उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि रामउजागर के मरने के बाद भी थाने में उस के खिलाफ 7 मुकदमें दर्ज हुए थे. सोचविचार के बाद प्रशांत कुमार ने अपने एक मुखबिर को सच्चाई पता लगाने का काम सौंपा. 2 दिन बाद मुखबिर ने थाने आ कर बताया कि रामउजागर मरा नहीं है, बल्कि उस ने पुलिस से बचने के लिए मरने का नाटक किया था. उस ने यह भी बताया कि वह अब भी अपराधों में लिप्त है. इतना ही नहीं, उस ने थानाप्रभारी को रामउजागर का मोबाइल नंबर भी दे दिया.

प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उस नंबर पर फोन लगाया. दूसरी ओर फोन की घंटी भी बजी और रिसीव भी किया गया. लेकिन थानाप्रभारी ने कोई बात करने के बजाय 2 बार ‘हैलो हैलो’ कह कर फोन काट दिया. इस से उन्हें यकीन हो गया कि रामउजागर वाकई जिंदा है. विश्वास होने के बाद उन्होंने यह बात एसपी बबलू कुमार को बता दी. यह जान कर उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि 45 अपराधों का आरोपी लोगों की नजरों में खुद को मरा हुआ साबित कर के अब भी अपराध कर रहा है. निस्संदेह मामला गंभीर था. उन्होंने  रामउजागर को पकड़ने के लिए क्राइम ब्रांच और थाना पुलिस की एक संयुक्त टीम बनाई, साथ ही आदेश दिया कि जैसे भी हो जल्दी से जल्दी रामउजागर को गिरफ्तार करें.

एसपी बबलू कुमार के निर्देश पर संयुक्त टीम ने रामउजागर को अपने जाल में फांसने की योजना बना ली. जब सारी तैयारी हो गई तो 9 नवंबर, 2014 को थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर उस से बात की. बातचीत के दौरान उन्होंने ठेठ गंवई अंदाज में कहा, ‘‘रामउजागर, मैं तुम्हारा भाई बोल रहा हूं. भाई बहुत बीमार है, चुपचाप आ कर मिल जाओ.’’

यह सुन कर रामउजागर ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कल शाम को आता हूं. ध्यान रखना किसी को कानोंकान खबर न हो. मैं भाई से मिल कर भोर में निकल जाऊंगा.’’

‘‘चिंता करने की जरूरत नहीं है, किसी को पता नहीं चलेगा.’’ कह कर प्रशांत कुमार ने फोन काट दिया.

बात होने के बाद पुलिस ने सारी तैयारी कर ली. दूसरे दिन यानी 10 नवंबर को पुलिस टीम ने थाना क्षेत्र के सरायहरखू रेलवे स्टेशन पर अपना जाल बिछा दिया. रामउजागर को पहचानने वाला एक मुखबिर पुलिस के साथ था. सभी लोग सादे कपड़ों में थे. ट्रेन आने से थोड़ी देर पहले थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर कहा, ‘‘कहां पहुंचे भैया, मैं स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘बस, थोड़ी देर में पहुंचने वाला हूं, मुझे गेट के पास मिलना.’’

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘और हां, मैं ने मुंह पर कपड़ा बांध रखा है, ताकि कोई पहचान न सके. इस बात का ध्यान रखना.’’

शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर सुलतानपुर की ओर से आने वाली गाड़ी जब प्लेटफार्म नंबर 1 पर आ कर रुकी और यात्री उतरनेचढ़ने लगे तो प्रशांत कुमार के नंबर पर फोन आया. फोन रामउजागर का ही था. वह बोला, ‘‘भैया, मैं ट्रेन से उतर गया हूं, तुम गेट के पास ही हो न?’’

‘‘हां, गेट पर ही खड़ा इंतजार कर रहा हूं.’’ कह कर थानाप्रभारी ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद पुलिस की नजर एक अधेड़ उम्र के आदमी पर पड़ी, जो मुंह पर कपड़ा लपेटे, एक बैग और एक ब्रीफकेस उठाए गेट की ओर आ रहा था. मुखबिर ने उसे पहचान कर बताया कि वही रामउजागर है. पुलिस ने उसे दबोच लिया. अचानक हुई इस काररवाई से रामउजागर हतप्रभ रह गया. हिरासत में ले कर रामउजागर के बैग और ब्रीफकेस की तलाशी ली गई तो उस के पास से 1 चाकू, 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात, एक फरजी पहचान पत्र और 205 ग्राम नशीला पाउडर बरामद हुआ. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

बक्शा बाजार से किसी तरह यह खबर रामउजागर के गांव चुरावनपुर पहुंच गई. सुन कर लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे लोग जिस रामउजागर के मृत्युभोज में शामिल हुए थे, वह जिंदा है और उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. इस बात की पुष्टि के लिए गांव के कुछ लोग रात 9 बजे ही थाना बक्शा पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें थाने में नहीं घुसने दिया. इस की जगह थानाप्रभारी ने उस इलाके के सिपाही को निर्देश दिया कि अगले दिन 9 बजे वह चुरावनपुर के ग्रामप्रधान और रामउजागर के पिता और भाई को थाने ले आए.

दूसरे दिन यानी 11 नवंबर, 2014 को रामउजागर के पिता रामकिशोर चौहान और ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल गांव के कुछ लोगों के साथ थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने एक सिपाही को बुला कर लौकअप से रामउजागर को लाने को कहा. उसे लाया गया तो उसे जीवित देख कर गांव के लोग आश्चर्यचकित रह गए. रामउजागर शरम के मारे सिर झुकाए खड़ा था. पूछताछ में रामउजागर ने अपनी जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी. रामउजागर की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद इलाके में कोई अपराध होने पर पुलिस पूछताछ के लिए उसे ही उठा कर लाती. पुलिस प्रताड़ना से तंग आ कर रामउजागर अपना गांव छोड़ कर जबलपुर चला गया.

वहीं पर उस की मुलाकात किशन नाम के एक युवक से हुई. किशन जबलपुर की गुप्तेश्वर रोड का रहने वाला था. रामउजागर ने उस से रोजी रोजगार की बात की तो वह बोला, ‘‘चिंता मत करो, ऐसा रोजगार बताऊंगा कि पैसे की कोई कमी न रहे. बस थोड़ी सी मेहनत और चालाकी की जरूरत है.’’

‘‘बताइए, क्या करना है.’’ रामउजागर ने विनती की, ‘‘बताओ दोस्त, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं. कभी भी तुम्हारा उपकार नहीं भूलूंगा.’’

इस पर किशन रामउजागर को पाउडर का एक पैकेट पकड़ाते हुए बोला, ‘‘यह लो और रेलवे स्टेशन की ओर निकल जाओ. वहां तुम्हें ट्रेनों में काम करना है. वहां जो भी ठीकठाक पैसे वाला आदमी दिखाई दे, उस से दोस्ती करो और चाय वगैरह में इस पाउडर में से थोड़ा सा मिला कर उसे चुपके से पिला देना. थोड़ी देर में वह बेहोश हो जाएगा. इस के बाद उस का माल ले कर चलते बनना.’’

‘‘और मान लो, अगर मैं पकड़ा गया तो?’’ रामउजागर ने कहा तो किशन बोला, ‘‘अरे भाई, पैसा कमाना है तो डर तो रहेगा ही, लेकिन सावधानी बरतेंगे तो पकड़े जाने का खतरा नहीं रहेगा. मैं ने रास्ता बता दिया है, आगे तुम्हारी मरजी.’’

कुछ देर शांत रहने के बाद रामउजागर उठा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया. स्टेशन पर पहुंच कर उस ने आसपास सरसरी नजर डाली तो एक व्यक्ति एक भारीभरकम बैग लिए बैठा दिखाई दिया. वह उसी की बगल में जा कर बैठ गया. कुछ देर खामोश बैठे रहने के बाद रामउजागर उस से गाडि़यों के बारे में बात करने लगा. बातों का सिलसिला जुड़ा तो वह अपना बैग उस के बैग के पास रखते हुए बोला, ‘‘खयाल रखना जरा, मैं कैंटीन से चाय ले कर आता हूं.’’

थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में चाय के 2 प्याले थे. उस ने एक प्याला उस आदमी को थमा दिया और दूसरा खुद ले कर उस के साथ बैठ गया. दोनों ने साथसाथ चाय पी. चाय पीने के बाद वह व्यक्ति एक ओर लुढ़कने लगा. यह देख रामउजागर ने इधरउधर नजर दौड़ाई. फिर उस आदमी को हिलाडुला कर देखा. चाय में नशीला पाउडर होने की वजह से उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस पर कोई प्रतिक्रिया न होती देख वह धीरे से अपना और उस का बैग ले कर वहां से चलता बना. जहर खुरानी का यह उस का पहला दिन था, इसलिए अपनी सफलता पर वह फूला नहीं समा रहा था. अपने ठिकाने पर आ कर जब उस ने बैग खोला तो उस में काफी मात्रा में नकदी और कपड़ों सहित कई कीमती सामान निकले.

बस फिर क्या था, उस दिन के बाद उस का जहरखुरानी का यह सिलसिला चल निकला. कभी इस शहर तो कभी उस शहर में वह वारदात पर वारदात को अंजाम देने लगा. इस तरह धीरेधीरे उस ने किशन से अलग हो कर अपना गिरोह बना लिया. उस के दोस्तों की संख्या भी अच्छीखासी हो गई. इसी बीच अचानक वह एक दिन वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. लेकिन जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जमानत मिलने के बाद वह फिर जौनपुर आ गया. लेकिन उस का अपराधी दिमाग उसे कहां शांत बैठने देने वाला था. बक्शा पुलिस ने उसे आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस मामले में भी उसे जमानत मिल गई.

जेल से बाहर आने के बाद वह मानिकपुर, बांदा आ गया और जहरखुरानी की वारदातों को अंजाम देने लगा. जौनपुर के अलावा वह बांदा, कानपुर, सुलतानपुर, सीतापुर, इलाहाबाद, वाराणसी में भी वारदातें करने लगा. धीरेधीरे उस का आतंक उत्तर प्रदेश से बाहर निकल कर मध्य प्रदेश और मुंबई तक फैल गया. पुलिस उस की कारगुजारियों से परेशान थी. रामउजागर इन प्रदेशों में ट्रेन और बस में सफर करने वाले सहयात्रियों के साथ मधुर संबंध बना कर उन्हें खानेपीने की चीजों में नशीला पदार्थ मिला कर उन के सामान पार कर देता था. उस के अपराधों का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा था. कई बार वह पकड़ा भी गया, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद वह केस की तारीखों पर नहीं जाता था. इस के लिए उस के खिलाफ कई वारंट भी निकाले गए.

अदालतों में न जाने से रामउजागर पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा था. आए दिन उस के घर पुलिस आने से उस के घर वाले भी परेशान थे. तभी अचानक एक दिन उस ने एक व्यक्ति की हत्या की खबर पढ़ी. हत्या सुलतानपुर के एक व्यक्ति की हुई थी, जिस की शिनाख्त नहीं हुई थी. इस खबर को पढ़ कर उस के दिमाग में साजिश का तानाबाना बुनने लगा. उन दिनों रामउजागर जौनपुर के ही कुल्हनामउ गांव में स्थित अपनी बहन की ससुराल आताजाता रहता था और लोगों से चोरीछिपे वह 2-4 दिन वहीं ठहर जाता था. घरपरिवार के लोग भी उस से वहीं आ कर मिल लिया करते थे. बहन के घर से उस ने चुपके से अपने घर संदेशा भिजवाया कि उस से कानपुर आ कर मिलें. वे लोग उस से मिलने आए तो उस ने उन्हें अखबार में छपी वह खबर दिखाई.

फिर कहा कि वे लोग सुलतानपुर जाएं और अज्ञात लाश की शिनाख्त उस की लाश के रूप में कर दें. इस से पुलिस के आए दिन घर आने का झंझट खत्म हो जाएगा. रामउजागर की राय पर उस के घर वालों ने ऐसा ही किया. लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर पुलिस ने उस व्यक्ति की लाश की शिनाख्त रामउजागर के रूप में कर दी. साथ ही बता भी दिया कि वह अपराधी प्रवृत्ति का था. पुलिस मामले में खानापूर्ति करना चाहती थी, इसलिए उस ने उन की बात सच मान ली. इस के बाद रामउजागर के घर वालों ने बाकायदा उस की तेरहवीं वगैरह की. कोर्ट में हाजिर न होने की वजह से रामउजागर के वारंट भी कटे हुए थे.

रामउजागर की तलाश में पुलिस उस के घर आती या फिर कुर्की वारंट का चक्कर होता तो घर वाले और ग्रामप्रधान उस के मरने की बात बता कर पल्ला झाड़ लेते. उधर रामउजागर अपना जहरखुरानी का काम बाकायदा करता रहा. पूछताछ में रामउजागर ने बताया कि उस से चांदी के जो जेवरात बरामद हुए हैं वे उस ने लखनऊ में चारबाग स्टेशन से वाराणसी जा रहे एक सेठ को नशीला पदार्थ खिला कर लूटे थे और उस का बैग ले कर सुलतानपुर स्टेशन पर उतर गया था. इस बैग में उसे 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात और 88 हजार रुपए नकद मिले थे.

पकड़े जाने के बाद रामउजागर को पत्रकारों के सामने पेश किया गया, जहां उस ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह लोगों को लूटने के लिए नशीले पदार्थों के अलावा बिस्किट आदि का भी प्रयोग करता था. बिस्किट और पैकेट के पेय पदार्थों में वह सिरिंज के जरिए नशीला पदार्थ डाल देता था. इस से लोगों को उस पर शक भी नहीं होता था. रामउजागर की कहानी उसी की जुबानी सुन पत्रकार भी दंग रह गए. 45 मामलों में वांछित शातिर अपराधी और बक्शा थाने के हिस्ट्रीशीटर व जौनपुर जिले के टापटेन अपराधियों की सूची में 5वें नंबर के इस अपराधी के पकड़े जाने से पुलिस खुश थी. जुर्म स्वीकारने के बाद पुलिस ने रामउजागर को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. Crime Story

Crime in Society : क्रिकेट खिलाड़ी ने बनाया चोरी का अर्द्धशतक

Crime in Society : एकांत बंसल क्रिकेट का उभरता हुआ खिलाड़ी था. उचित मार्गदर्शन मिलने पर उस की प्रतिभा निखर सकती थी लेकिन उस के सामने एक ऐसी समस्या आन पड़ी कि उस ने अपने कदम पिच के बजाय चोरी की तरफ बढ़ा दिए और…

रात के करीब ढाई बजे थे. दिल्ली के मध्य जिला के थाने पहाड़गंज को पुलिस नियंत्रण कक्ष से सूचना मिली कि क्षेत्र के नेहरू बाजार में एक दुकान का ताला तोड़ने वाले चोरों ने 2 चौकीदारों की पिटाई की है. यह सूचना मिलते ही थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एएसआई हरपाल सिंह नेहरू बाजार की ओर रवाना हो गए. नेहरू बाजार थाने से दक्षिणपूर्वी दिशा में करीब 2 किलोमीटर दूर महावीर मंदिर के पास है. पुलिस वहां पहुंची तो मंदिर के आसपास 2-3 लोग मिले. मंदिर के पास ही सड़क पर एक जगह खून पड़ा मिला. उन लोगों ने बताया कि एक दुकान का ताला तोड़ रहे कुछ चोरों ने 2 चौकीदारों को पीट कर घायल कर दिया.

जिन्हें पुलिस नियंत्रण कक्ष की वैन लेडी हार्डिंग अस्पताल ले गई है. जिस दुकान का चोर ताला तोड़ रहे थे पुलिस वहां भी गई. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. उस दुकान के शटर का एक ताला टूटा पड़ा था. यह बात 12-13 नवंबर, 2014 की रात की है. थानाप्रभारी एएसआई हरपाल सिंह को घटनास्थल पर छोड़ कर लेडी हार्डिंग अस्पताल पहुंच गए. वहां डाक्टरों ने बताया कि एक चौकीदार भगत शाह की अस्पताल में ही मौत हो गई है जबकि दूसरे घायल चौकीदार करन बहादुर शाह का इलाज चल रहा है. थानाप्रभारी करन बहादुर शाह के पास गए. वह बयान देने की हालत में था.

करन बहादुर ने पुलिस को बताया कि वह पहाड़गंज के 6 टूटी चौक पर चौकीदारी करता है. रात करीब 2 बजे उसे प्यास लगी तो वह नेहरू मार्केट में महावीर मंदिर के प्याऊ पर पानी पीने गया. उसे देख कर उस का चाचा भगत शाह भी उस के पास आ गया था. भगत शाह पास में ही स्थित रतन मार्केट सब्जीमंडी में चौकीदारी करता था. पानी पीने के बाद दोनों बातें कर रहे थे, तभी उन की नजर नेहरू बाजार में खड़ी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार पर गई. उस कार के पास ही 2 लड़के हाथ में लोहे की रौड लिए खड़े थे. एक उस सैंट्रो कार में था जबकि एक अन्य युवक एक दुकान के ताले तोड़ रहा था. यह देख कर वे चौंके. उन्होंने उन युवकों को टोका तो वे तीनों उन पर टूट पड़े और रौड से पिटाई करने लगे.

करन ने बताया कि एक हमलावर ने रौड से भगत शाह के सिर पर वार किया तो उन का सिर फट गया और वह नीचे गिर गए. दूसरे हमलावर ने उस के ऊपर वार किया तो उस ने हाथ से उस की रौड रोकने की कोशिश की जिस से उस के दाहिने हाथ के अंगूठे में चोट आ गई. अपनी जान बचाने के लिए वह रतन मार्केट सब्जीमंडी की तरफ भाग गया. फिर एक गली से निकल कर घटनास्थल की तरफ देखा तो वे हमलावर वहां नहीं दिखे. वे कार ले कर वहां से जा चुके थे. तब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां उस के चाचा भगत शाह खून में सने पड़े थे. किसी का फोन ले कर उस ने पुलिस के 100 नंबर पर काल की. थोड़ी देर में ही पीसीआर की गाड़ी वहां आ गई और उन्हें अस्पताल ले लाई.

करन बहादुर के बयान से पुलिस को इतना पता चल गया था कि बदमाश सिल्वर कलर की सैंट्रो कार में आए थे और दुकान में चोरी करने के लिए दुकान का एक ताला तोड़ भी चुके थे. उन्होंने यह मैसेज वायरलैस से पूरी दिल्ली में प्रसारित करा दिया कि 4 लड़के वारदात करने के बाद सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से भागे हैं. जहां भी वे दिखें, उन्हें ट्रेस किया जाए. इस के बाद उन्होंने अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के एसीपी ओमप्रकाश और डीसीपी परमादित्य को घटना की जानकारी दे दी. अगले दिन थानाप्रभारी को खबर मिली कि दिल्ली के नजफगढ़ की मेन मार्केट में जवाहर चौक पर स्थित एक ज्वैलरी शौप में 4 चोर ताले तोड़ कर उस में से 7 किलोग्राम से ज्यादा चांदी और सोने की ज्वैलरी तथा 35 हजार रुपए नकद ले गए.

चोरी करने से पहले उन्होंने वहां के चौकीदार को डराधमका दिया था. नजफगढ़ थाने में इस घटना की रिपोर्ट दर्ज हुई थी. उस चौकीदार ने पुलिस को बताया था कि वे चारों लुटेरे सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से आए थे. नजफगढ़ वाली घटना डीसीपी परमादित्य की जानकारी में आई तो उन्हें लगा कि कहीं नजफगढ़ में वारदात करने वाले वही तो नहीं हैं जो पहाड़गंज क्षेत्र में चौकीदार का मर्डर कर के भागे थे. क्योंकि दोनों ही वारदातों में एक बात समान थी कि बदमाशों की संख्या 4 थी और उन के पास सिल्वर कलर की सैंट्रो कार थी. उन बदमाशों के पास पहुंचने का एक ही रास्ता था कि किसी भी तरह उन की सैंट्रो कार का रजिस्ट्रेशन नंबर पता चल जाए. लेकिन दोनों ही जगहों के चौकीदारों को कार का नंबर पता नहीं था इसलिए यह केस खोलना किसी चुनौती से कम नहीं था.

डीसीपी परमादित्य ने इस केस को सुलझाने के लिए पहाड़गंज क्षेत्र के एसीपी ओमप्रकाश के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एसआई ओ.पी. मंडल, विनोद जैन, एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद कुमार, जितेंद्र राकेश, कांस्टेबल कुलदीप, समय सिंह को शामिल किया गया. इस के अलावा उन्होंने स्पैशल स्टाफ के इंचार्ज इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन की टीम को भी इस केस को सुलझाने में लगा दिया. दोनों पुलिस टीमें इस केस को खोलने में जुट गईं. पहाड़गंज के नेहरू बाजार में जिस जगह वारदात हुई थी, पुलिस ने उस जगह का एक बार फिर मुआयना कर के यह देखा कि उधर कहीं कोई सीसीटीवी कैमरे तो नहीं लगे हैं, जिस से उस सैंट्रो कार का नंबर मिल सके.

पुलिस को कुछ दुकानों के आगे सीसीटीवी कैमरे तो लगे मिले लेकिन उन में से कई कैमरे बंद थे. और जो कैमरे चालू थे, उन की रिकौर्डिंग की जांच की तो वे इस एंगल से थे कि कार का केवल ऊपर का भाग ही उन की जद में आ सका. कार का नंबर उन कैमरों में नहीं मिल सका. इस के बाद पुलिस ने नजफगढ़ मार्केट में जवाहर चौक पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग देखी तो वहां भी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार दिखी. एक कैमरे की रिकौर्डिंग में उस कार का नंबर दिखा, लेकिन वह स्पष्ट नहीं हो रहा था. उस नंबर को देखने की कोशिश की तो अधूरा नंबर 3409 ही पढ़ने में आया. इस अधूरे नंबर के माध्यम से उन बदमाशों तक पहुंचना आसान नहीं था. एसीपी ओमप्रकाश ने इस नंबर को भी दिल्ली के समस्त थानों में वायरलैस से फ्लैश करा दिया.

दोनों ही पुलिस टीमें अपनेअपने स्रोतों से उन बदमाशों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. इलाके के अनेक संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ की गई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका. इसी तरह करीब 2 महीने निकल गए. 15 जनवरी, 2015 को हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त को अपने एक मुखबिर द्वारा बदमाशों के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली. विष्णुदत्त ने उस सूचना से थानाप्रभारी राजकुमार को अवगत करा दिया. थानाप्रभारी ने आगे की काररवाई करने के लिए तुरंत 2 टीमें बनाईं. पहली टीम इंसपेक्टर सुखदेव मीणा के नेतृत्व में बनी, जिस में एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद को शामिल किया. जबकि दूसरी टीम एसआई विनोद नैन की देखरेख में बनाई जिस में हेडकांस्टेबल जितेंद्र, राकेश आदि सम्मिलित थे.

पहली टीम वीडियोकौन टावर के पास पचकुइयां रोड पर बैरीकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी तो दूसरी टीम को समयपुर बादली क्षेत्र में जीवन पार्क के नजदीक भेज दिया. पचकुइयां रोड पर जो टीम वाहनों की चैकिंग कर रही थी, उसे डीएल3सीए क्यू3409 नंबर की सैंट्रो कार आती दिखी. वह कार सिल्वर कलर की थी. पुलिस ने उसे रोका. उस कार में ड्राइवर के अलावा अगली सीट पर एक युवक और बैठा था. पूछने पर ड्राइवर ने अपना नाम राकेश कुमार और दूसरे युवक ने अपना नाम एकांत बंसल बताया. मुखबिर ने पुलिस को इन्हीं दोनों युवकों के बारे में सूचना दी थी. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

कार की तलाशी लेने पर पीछे वाली सीटों के नीचे से 2 रौड, गैस कटर, शटर खोलने का हैंडल, हथौड़ा, छेनी आदि औजार मिले. जिस सैंट्रो कार में वे बैठे थे, वह उन्होंने 16 अक्तूबर, 2014 को दिल्ली के पटेलनगर क्षेत्र से चुराई थी, जिस की वहां रिपोर्ट भी दर्ज है. उन्होंने बताया कि पहाड़गंज के नेहरू बाजार में चौकीदारों पर हमला और नजफगढ़ में ज्वैलरी की दुकान में चोरी की वारदात को उन्होंने ही अपने साथियों के साथ अंजाम दिया था. दोनों अभियुक्तों को पुलिस पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की दूसरी टीम जो जीवन पार्क गई थी, वहां से उस ने मनोज नाम के एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया. वह भी एकांत बंसल का साथी था.

वह जिस सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 से जीवन पार्क में स्थित अपने घर लौट रहा था. वह उस ने दिल्ली के राजेंद्रनगर से 15 जनवरी, 2015 यानी उसी दिन चुराई थी. तलाशी लेने पर उस की कार से एक गैस कटर, छोटा सिलेंडर, एक गदाड़ा, शटर खोलने का हैंडल आदि बरामद हुआ. उस ने भी बताया कि नजफगढ़ और पहाड़गंज की वारदातों में वह शामिल रहा. उसे भी हिरासत में ले कर पुलिस थाने लौट आई. चौकीदार भगत शाह की हत्या के मामले का खुलासा हो चुका था. 3 अभियुक्त पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे. मास्टरमाइंड एकांत बंसल था जो एक क्लब लेवल का क्रिकेट खिलाड़ी था. जबकि मनोज दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था. तीनों अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की तो उन से लूट और चोरी की 55 वारदातों का खुलासा हुआ.

एक क्रिकेट खिलाड़ी और राजनेता ने मिल कर चोरी की इतनी सारी वारदातों को कैसे अंजाम दिया और ये इस जरायम में कैसे आए, इस की एक रोचक कहानी सामने आई. 34 वर्षीय एकांत बंसल दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित संग तराशान इलाके में रहने वाले गुरुचरण बंसल का बेटा था. बचपन से ही उसे क्रिकेट खेलने का शौक था. क्रिकेट खेल में ज्यादा ध्यान देने की वजह से वह जूनियर कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. दिल्ली में वह कई क्लबों की तरफ से मैच खेलता था. उस ने बताया कि वह इशांत शर्मा जैसे कई बड़े खिलाडि़यों के साथ भी मैच खेल चुका है.

राष्ट्रीय खिलाडि़यों की तरह वह भी इस खेल में अपना नाम चमकाना चाहता था. लेकिन उस के हौसले उस समय पस्त हो गए जब पिता ने उस की शादी कर दी. पिता बूढ़े हो चुके थे, उन की इतनी कूवत नहीं थी कि वह अपने शादीशुदा बच्चों का भी खर्च उठा सकें. एकांत के सिर पर बीवी का खर्च भी आन पड़ा था. अब उस के सामने परेशानी यह थी कि वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था जिस से उसे कोई नौकरी मिल सके और उस के पास कोई तकनीकी ज्ञान भी नहीं था जिस के सहारे उस की रोजीरोटी चल सके. क्रिकेट खिलाड़ी होने की वजह से लोगों की नजरों में उस की अच्छी इमेज थी. इस की वजह से वह कोई ऐसा काम भी नहीं करना चाहता था जिस से उस की इज्जत धूमिल हो. इसी बीच उस के मातापिता की मौत हो गई. उन की मौत के बाद वह और परेशान रहने लगा.

उस के दूसरे भाई अलगअलग रह रहे थे. उस के सामने एक ही समस्या बनी हुई थी कि वह अपने घर का खर्च कैसे चलाए. काफी सोचनेसमझने के बाद एकांत चोरियां करने लगा. इस काम में जुट जाने के बाद उस ने क्रिकेट खेल की तरफ ध्यान नहीं दिया. इस के बाद वह इसी जरायम से पैसा कमाने लगा. चोर चाहे कितनी चालाकी से चोरी क्यों न करे, एक न एक दिन वह पकड़ में आ ही जाता है. एकांत भी एक दिन पुलिस की पकड़ में आ ही गया, जिस की वजह से उसे जेल जाना पड़ा.

रोहिणी स्थित जेल में ही सन 2008-09 में उस की मुलाकात राकेश कुमार नाम के व्यक्ति से हुई. वह दिल्ली के वजीरपुर क्षेत्र में रहता था. राकेश भी चोरी के आरोप में जेल गया था. साथसाथ जेल में रहने पर दोनों के बीच दोस्ती हो गई और जमानत पर रिहा होने के बाद दोनों ही मिल कर चोरियां करने लगे. वह बंद दुकानों के ताले तोड़ कर बड़ीबड़ी चोरियां करने लगे. चोरियों में मोटा माल हाथ लगने लगा तो उन के हौसले बढ़ने लगे. दोनों जने साथसाथ जेल भी गए. अब एकांत को जेल जाने से डर नहीं लगता.

जेल में ही इन की मनोज नाम के एक अन्य शख्स से मुलाकात हुई. समयपुर बादली के जीवन पार्क में रहने वाला 45 वर्षीय मनोज भी चोरी के मामले में जेल गया था. तीनों का पेशा एक ही था इसलिए जेल से बाहर आने पर तीनों ने मिल कर वारदात को अंजाम देने का फैसला कर लिया. मनोज ने अपने दोस्त अजय को भी अपनी टीम में शामिल कर लिया. फिर तो इस चौकड़ी ने दिल्ली में एक के बाद एक वारदातें करनी शुरू कर दीं. ये लोग किसी वाहन से रात में निकलते और वाहन को दुकान के आगे खड़ा कर के अपने साथ लाए औजारों से ताले तोड़ कर उस में रखा सामान, नकदी साफ कर देते थे.

इन के टारगेट पर मैडिकल स्टोर, ज्वैलरी शौप, सिगरेट शौप, जनरल स्टोर्स, साडि़यों की दुकान आदि रहते थे. चोरी किए सामान को यह आपस में बांट लेते थे. ज्वैलरी को मेरठ के एक ज्वैलर को बेचते थे. एक ही इलाके के बजाय ये दिल्ली के अलगअलग इलाकों में वारदात को अंजाम देते थे. कभीकभी तो ये एक ही रात में  3-4 वारदातें कर देते थे. मनोज के पास जब पैसा जमा हो गया तो उस ने राजनीति में पैर जमाने का निश्चय किया. सन 2003 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उस ने कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से संपर्क कर टिकट लेने की कोशिश की लेकिन जब उसे किसी भी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो उस ने निर्दलीय रूप से विधानसभा का चुनाव लड़ा, जिस में उसे 1500 वोट मिले. राजनीति में पैर न जमने पर वह फिर से अपने साथियों के साथ पुराने धंधे में उतर आया.

16 अक्तूबर, 2014 को इन्होंने पटेलनगर क्षेत्र से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल3सीए क्यू 3409 चुराई. इस कार का नंबर बदले बिना ही ये दिल्ली में इसे चलाते रहे लेकिन पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके. 12-13 नवंबर, 2014 की रात को ये इसी कार में बैठ कर वारदात के लिए निकले. इस बार वे पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित नेहरू बाजार में गए. वहां पर उन्होंने एक दुकान के आगे अपनी कार लगा दी. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. राकेश कार में ड्राइविंग सीट पर बैठा रहा तो मनोज और अजय हाथों में लोहे की रौड ले कर कार के पास खड़े हो कर निगरानी करने लगे. जबकि एकांत औजारों से उस दुकान के ताले तोड़ने लगा. उस ने दुकान का एक ताला तोड़ भी लिया था.

वह और ताले तोड़ रहा था तभी अचानक चौकीदार करन बहादुर और भगत शाह उधर आए. करन बहादुर और भगत शाह मूलरूप से नेपाल के रहने वाले थे. वे इस बाजार में पिछले 10-15 सालों से चौकीदारी कर रहे थे. फिलहाल वे संग तराशान इलाके में रह रहे थे. उन्होंने कार के पास 2 लोगों को खड़े देखा तो उन्हें शक हुआ कि रात 2 बजे ये हाथों में रौड लिए क्यों खड़े हैं. तभी उन की नजर एक दुकान की तरफ गई वहां भी एक आदमी तालों को तोड़ने में लगा था. वे समझ गए कि ये सेंधमार हैं. दोनों चौकीदारों ने आवाज दे कर उन से पूछा कि वे वहां क्या कर रहे हैं.

बदमाशों को डर हो गया कि ये चौकीदार उन की योजना को नाकाम कर सकते हैं, इसलिए वे तीनों रौड ले कर उन के पास आ गए और चौकीदारों पर रौड से हमला कर दिया. एक हमलावर ने भगत शाह के सिर पर वार किया जिस से वह वहीं गिर गया तथा दूसरा चौकीदार करन बहादुर जान बचा कर वहां से भाग गया. चौकीदार का सिर फटने के बाद बदमाशों ने सोचा कि शायद वह मर गया है, इसलिए चोरी करने के बजाय वे वहां से भाग खड़े हुए. पहाड़गंज से वे चारों नजफगढ़ मेनबाजार पहुंचे. रास्ते में उन की गाड़ी को पुलिस ने भी नहीं रोका. मेनमार्केट में पहुंच कर वे दुकानों के ऊपर लगे साइनबोर्डों को पढ़ कर सोचने लगे कि किस दुकान को निशाना बनाना सही रहेगा. तभी उन्हें जवाहर चौक पर एक ज्वैलरी शौप दिखी.

उस ज्वैलरी शौप के पास एक चौकीदार था. उन्होंने सब से पहले उस चौकीदार को काबू में कर के डराधमका दिया. इस के बाद उन्होंने दुकान के ताले तोड़ कर वहां से सोनेचांदी की करीब 7 किलोग्राम ज्वैलरी और 35 हजार रुपए कैश चुरा लिया. अपना काम करने के बाद वे पहाड़गंज लौट आए. रात में वे सभी एकांत के घर रुके और सुबह होने पर सभी अपनेअपने घर चले गए. बाद में उन्होंने चोरी के सामान का बंटवारा भी कर लिया था. 2 महीने बाद मनोज ने राजेंद्रनगर से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 चुराई.

दोनों जगहों की वारदातों में पुलिस को ऐसा सुबूत नहीं मिला था, जिस से पुलिस उन तक पहुंच पाती. इसलिए 13 नवंबर के बाद भी उन्होंने दिल्ली के अलगअलग क्षेत्रों में कई वारदातों को अंजाम दिया. आखिर मुखबिर की सूचना पर 15 जनवरी, 2015 को वे पुलिस के हत्थे चढ़ ही गए. पुलिस ने 16 जनवरी को अभियुक्त एकांत बंसल, राकेश कुमार और मनोज को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश कर के उन का 3 दिनों का रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन की निशानदेही पर 20 किलोग्राम चांदी और सोने की ज्वैलरी, 1 लाख 70 हजार रुपए नकद, चोरी की 2 सैंट्रो कारें, 2 मोटरसाइकिलें, 52 इंच के 2 एलईडी टीवी, 6 लैपटोप, 20 मोबाइल फोन, 30 किलोग्राम 5 व 10 रुपए के सिक्के, 4 गैस कटर, 5 म्यूजिक सिस्टम, भारी मात्रा में रेडीमेड कपड़े, ब्रांडेड कंपनियों के सिगरेट के पैकेट, चौकलेट आदि सामान बरामद किए. उन्होंने बताया कि वे दिल्ली के 20 से अधिक थानाक्षेत्रों में चोरी, डकैती, सेंधमारी की 55 वारदातों को अंजाम दे चुके हैं.

18 जनवरी को पुलिस ने चोरी का माल खरीदने वाले एक ज्वैलर को भी दिल्ली के मंगोलपुरी बसस्टाप से गिरफ्तार कर लिया. वह इन लोगों से मिलने दिल्ली आया था. उसे इन के गिरफ्तार होने की जानकारी नहीं थी. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 2 किलोग्राम चांदी एवं चांदी को मोल्डिंग करने वाली मशीन बरामद कर ली. 37 वर्षीय वह ज्वैलर चोरी का सामान खरीदने के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है. उस के खिलाफ 6 केस पहले से दर्ज थे. पांचवें अभियुक्त अजय को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी. चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच इंसपेक्टर सुखदेव मीणा कर रहे हैं. Crime in Society

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित