बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा

बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा – भाग 5

उस दिन तो इंसपेक्टर खान चले गए, लेकिन अगले दिन जब रोशन घर में अकेला था तो आ कर सख्ती से पूछताछ करने लगे. उन्होंने पूछा, ‘‘चाची के साथ तुम्हारा रवैया कैसा था?’’

‘‘मैं उन का बहुत आदर करता था. जो भी काम कहती थीं, मैं कर देता था.’’

‘‘तुम किसी सालार को जानते हो या इस तरह का नाम कभी सुना है?’’

‘‘नहीं साहब, मैं किसी सालार को नहीं जानता.’’

‘‘रेशमा का कत्ल किस ने किया, यह तो तुम्हें पता ही होगा? तुम्हारा ही कोई दोस्त होगा?’’

रोशन घबरा कर बोला, ‘‘नहीं साहब, मेरा यहां कोई दोस्त नहीं था.’’

इंसपेक्टद सफदर खान के दिमाग में नईम की कही बात बारबार घूम रही थी कि अम्मी रोशन भाई को बहुत चाहती थीं, हम से ज्यादा उन का खयाल रखती थीं. आखिर रेशमा रोशन पर इतना मेहरबान क्यों थी? अपने बेटे से भी ज्यादा उस से प्यार करती थी.

उन्होंने इसी बात को ध्यान में रख कर पूछा, ‘‘रेशमा, तुम्हारी सगी चाची नहीं थी, फिर वह तुम्हारा इतना खयाल क्यों रखती थी? तुम छोटे बच्चे तो हो नहीं, जवान हो. फिर तुम पर इतना प्यार लुटाने का मतलब क्या था? कहीं तुम अपनी चाची पर अपनी जवानी और खूबसूरती की बदौलत डोरे तो नहीं डाल रहे थे? पैसों के लिए उसे बरगला तो नहीं रहे थे?’’

‘‘नहीं साहब, खुदा के लिए ऐसा न कहें. वह मेरी मां जैसी थीं.’’

‘‘फिर उन के इतना प्यार करने की वजह क्या थी?’’

रोशन के सब्र का बांध एकदम से टूट गया. वह फफक कर रो पड़ा. संयोग से उसी समय फरीद घर में दाखिल हुआ. रोशन की रोने की आवाज सुन कर वह दरवाजे के पीछे खड़ा हो गया.

रोशन ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, खुदा की कसम, मैं ने कभी उसे नजर उठा कर नहीं देखा. अल्लाह गवाह हैं, वह बहुत खराब औरत थी. वह मुझे फंसाना चाहती थी. कहती थी कि वह मुझ से प्यार करती है. साहब, मैं उसे मां की तरह इज्जत देता था. उस की बेजा चाहत से बचने के लिए मैं ज्यादातर घर से बाहर रहता था.’’

रोशन की बातें सुन कर फरीद जहां खड़ा था, वहीं सिर थाम कर बैठ गया. शमा के कहे अल्फाज उस के कानों में गूंजने लगे, ‘‘अम्मी तो भाईजान के पीछे पीछे घूमा करती थीं. हम से ज्यादा भाईजान का खयाल रखती थीं. हमें तो जैसे भूल ही गई थीं.’’

तभी इंसपेक्टर खान की आवाज उन के कानों में पड़ी, ‘‘फिर तुम ने क्या किया? सारी बातें सचसच बता दो, मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा.’’

रोशन रुंधी आवाज में कहने लगा, ‘‘साहब, आप चाचा को कुछ मत बताना, क्योंकि सच्चाई जान कर उन्हें बहुत दुख होगा. वह मुझे बहुत परेशान करती थी. रोज रात को मेरे पास आ जाती और मुझ से प्यार जताती. अल्लाह की कसम मैं उस से बचता था. मैं उसे हटाता, पर वह मुझे उठने ही नहीं देती. चाचा की इज्जत के बारे में सोच कर मैं चीखचिल्ला भी नहीं सकता था. शमा और नईम को भी नहीं उठा सकता.

‘‘जब मैं उस के हाथ नहीं आया तो वह उलटीसीधी बातें करने लगी. कहा कि चाचा से शिकायत कर दूंगी कि तू मुझ पर बुरी नजर रखता था. मैं उन से यह भी बताऊंगी तू शमा पर भी डोरे डाल रहा था. साहब, मैं बहुत डर गया था. मैं चाचा की बहुत इज्जत करता हूं.

‘‘मैं शमा को पसंद जरूर करता था, पर आज तक उसे नजर भर कर नहीं देखा है. जरा सी बात का उस ने कैसा फसाना बना दिया था. मुझे डर था कि अगर चाचा से उस ने ऐसा कुछ कह दिया तो मैं उन की नजरों से गिर जाऊंगा. मेरे ऊपर से उन का यकीन टूट जाएगा. दुनिया में बदनाम हो जाऊंगा. मैं मजबूर हो गया था साहब. मुझे बेबस कर दिया था उस ने.’’

इंसपेक्टर सफदर खान बहुत ही समझदार इंसान थे. सारे हालात उन के सामने थे. वह जानते थे कि प्यासी औरत बहक सकती है. फरीद ज्यादातर बाहर रहता था, वह देखने में भी अच्छा नहीं था. हो सकता है इसी वजह से उस ने रोशन को रिझाने की कोशिश की हो. उन्होंने पूछा, ‘‘तो फिर तुम ने चाचा की इज्जत बचाने के लिए क्या किया?’’

‘‘रहीम चाचा से कुछ पैसे ले कर मैं घर जाने के बाहने यहां से चला गया. रहीम चाचा से जो पैसे मिले थे, उस से मैं 2 दिन तक एक लौज में रुका रहा. तीसरी रात दीवार फांद कर मैं छत पर पहुंचा. चाची मेरी चारपाई पर सो रही थी. उस की धमकियों से विवश हो कर मैं उसे चाकू मार कर भाग गया. सुबह लौज से अपना सामान ले कर मैं गांव चला गया.

‘‘मैं मजबूर था साहब. दो दिनों तक मैं यही सोचता रहा कि इस मसले का क्या हल हो सकता है. मैं उसे उस के किए की सजा देना चाहता था, इसलिए उसे चाकू मारने के अलावा मुझे और कोई रास्ता नहीं सूझा. उस की गलत फितरत और चाचा से बेवफाई के लिए मैं उसे सबक सिखाना चाहता था. उस की गंदी हरकतों से मुझे उस से बेइंतहा नफरत हो गई थी. मैं चाचा का सामना नहीं करना चाहता था, इसलिए उन के आने से पहले ही उसे चाकू मार कर भाग गया था.

‘‘मैं उसे मारना नहीं चाहता था, लेकिन नफरत और शराफत की वजह से ऐसा हो गया. उसे मार कर मुझे एक पल के लिए भी चैन नहीं मिला. गुनाह का अहसास मुझे कचोटता रहा. मेरा जमीर मुझे झकझोरता रहा. गुनाह कुबूलने के बाद अब मुझे सुकून मिला है. अब मुझे सजा की भी चिंता नहीं है.’’

इतना कह कर रोशन दोनों हाथों से मुंह छिपा कर रोने लगा.

इंसपेक्टर सफदर खान ने कातिल पकड़ लिया था. लेकिन यह ऐसा मामला था, जिस में कातिल को पकड़ कर भी खुशी नहीं हुई थी. क्योंकि सही मायने में लड़का हत्यारा होते हुए भी बेकुसूर था.

फरीद ने अंदर आ कर रोशन को गले लगा लिया, ‘‘बेटा, मैं तेरा इस बात के लिए अहसानमंद हूं कि तू ने मेरी इज्जत के लिए अपनी बरबादी की भी चिंता नहीं की.’’

इस के बाद फरीद ने इंसपेक्टर खान से कहा, ‘‘इंसपेक्टर साहब, यह लड़का बेकुसूर है. मैं अपना केस वापस ले रहा हूं. आप सच्चाई जान गए हैं, इसे किसी तरह बचा लीजिए.’’

‘‘आप की बात ठीक है, लेकिन रोशन ने जो बयान दिया है, वह पूरी तरह से इस के खिलाफ है. लेकिन रेशमा ने अपने बयान में इस का नहीं, सालार का नाम लिया था. कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं था, इसलिए वैसे भी यह केस काफी कमजोर है. अपनी ओर से भी मैं इस केस को हल्का बनाऊंगा, ताकि रोशन संदेह का लाभ पा कर छूट जाए,’’ इंसपेक्टर खान ने कहा.

‘‘लेकिन साहब एक विनती और है. मैं चाहता हूं कि मेरी बीवी की चरित्रहीनता उजागर न हो, वरना मेरे बच्चे सिर उठा कर जी नहीं पाएंगे.’’ फरीद ने हाथ जोड़ कर इंसपेक्टर खान से कहा.

इस के बाद फरीद ने रोशन को गले लगा कर कहा, ‘‘मेरे बच्चे, तू घबरा मत, मैं तेरे साथ हूं. मैं वैसे भी अब नौकरी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं नौकरी पर चला जाऊंगा तो मेरे बच्चों को कौन संभालेगा. मैं नौकरी छोड़ कर कोई कारोबार कर लूंगा और उस कारोबार में तुम्हें भी शामिल कर लूंगा.

‘‘तुम्हारे मांबाप को यहां ले आऊंगा. बच्चों को भी सहारा मिलेगा और उन की भी ठीक से देखभाल हो सकेगी. उस के बाद तुम्हारी शादी शमा से करा दूंगा. इस तरह तुम्हारी चाहत तुम्हें मिल जाएगी.’’

इंसपेक्टर खान ने अपना वादा पूरा किया. उन्होंने ऐसा केस बनाया कि रोशन को संदेह का लाभ मिला. चश्मदीद गवाह न होने की वजह से वैसे भी यह केस काफी कमजोर था. फरीद ने वकील भी अच्छा किया था, जिस से रोशन सजा से बच गया. जमानत न होने से 2 सालों तक वह जेल में रहा. इतने दिनों जेल में रह कर रोशन के दिल पर जो बोझ था, वह उतर गया.

रोशन के मांबाप शहर आ गए थे, इसलिए जेल में रह कर भी उसे चिंता नहीं थी. लेकिन सालार को कोई नहीं भूल सका. सभी सोचते थे कि आखिर यह सालार कौन था? लेकिन रेशमा की मौत के साथ ही ‘सालार’ का रहस्य रहस्य ही रह गया था. किसी को पता नहीं चल सका था कि सालार उस की आवाज का दीवाना और प्रेमी था. रेशमा उस के प्यार को दिल में छिपाए उसी के जुनून में बेमौत मारी गई थी.

बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा – भाग 3

रोशन पर रेशमा की मेहरबानियां बढ़ती जा रही थीं. वह उस की प्लेट में ढेर सारा सालन डाल देती, पराठों में भी खूब घी लगाती. रोशन बच्चों के साथ ही घर से निकल जाता और नौकरी की तलाश में दिन भर दफ्तरों के चक्कर लगाता रहता, जो समय बचता, रहीम चाचा की दुकान पर बैठ कर उन का हिसाब किताब कर देता. बदले में वह उसे खर्च के लिए थोड़े बहुत पैसे दे देते थे.

जब तक रोशन घर से बाहर रहता, रेशमा पागलों की तरह दरवाजा ताकती रहती. आने पर ऐसी बेताबी से उस का स्वागत करती कि वह शर्मिंदा हो जाता. रात में उस की चारपाई पर जा कर बैठ जाती तो वह घबरा कर खड़ा हो जाता. रेशमा जुनूनी हो कर उस का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसे चारपाई पर बिठाती. रोशन घबरा कर पसीने पसीने हो कर कहता, ‘‘चाची, मैं ऐसे ही ठीक हूं.’’

यह कहते रोशन की आवाज गले में फंसने लगती. एक रात रेशमा ने उस के करीब आ कर कहा, ‘‘तुम बहुत खूबसूरत हो रोशन, बिलकुल मेरे सा…’’

संयोग से इतने पर ही रेशमा की जुबान रुक गई. 2 शब्द और निकल जाते तो सारा राज खुल जाता. चाची के इस जबरदस्ती के प्यार से रोशन परेशान रहने लगा था. उसे लगने लगा कि अगर यही हाल रहा तो यहां रहना मुश्किल हो जाएगा. चाची की हरकतों से तंग आ कर वह गांव वापस जाने की सोचने लगा था. लेकिन चाचा ने आने तक उसे रुकने को कहा था. वह अपने अफसरों और दोस्तों से उस के लिए बात करना चाहते थे.

चाची का व्यवहार रोशन की समझ से बाहर होता जा रहा था. लेकिन मांबाप की मजबूरियों का खयाल कर के घर के लिए उस के कदम नहीं उठ रहे थे. वह कुछ पैसे कमा कर ही घर वापस जाना चाहता था.

रात होते ही रोशन की घबराहट बढ़ जाती थी. उसे डर लगने लगता था कि चाचा कहीं कुछ उलटासीधा न समझ लें. उस रात रेशमा ने उसे जबरन अपने पास बैठा कर पूछा था कि वह उसे कैसी लगती है? रोशन ने हकलाते हुए कहा था, ‘‘चाची, आप बहुत अच्छी हैं. आप मेरा खयाल अपने बच्चों की तरह रखती हैं.’’

‘‘रोशन मुझे देख कर तुम्हें कैसा एहसास होता है, क्योंकि मैं तुम से प्यार करती हूं.’’

रोशन ने घबरा कर कहा, ‘‘चाची, यह आप कैसी बातें कर रही हैं? आप मेरी मां जैसी हैं. अब मैं यहां नहीं रह सकता. बस फरीद चाचा आ जाएं.’’

फरीद का नाम सुनते ही रेशमा जैसे होश में आ गई. उस का प्यार का सारा खुमार उतर गया. जल्दी से रोशन का हाथ छोड़ कर वह बेबसी से बोली, ‘‘तुम्हें कोई तो अच्छा लगता होगा रोशन?’’

‘‘हां, मुझे शमा अच्छी लगती है.’’ रोशन ने शरमाते हुए कहा.

रेशमा के दिल में तीर सा लगा. उस ने रोशन को घूरते हुए कहा, ‘‘आज तो शमा का नाम ले लिया, लेकिन फिर कभी मत लेना, वरना मैं तुम्हारी शिकायत तुम्हारे चाचा से कर दूंगी. वह बहुत ही गुस्से वाले हैं. जूते मार मार कर तुम्हारा मुंह तोड़ देंगे.’’

रोशन डर गया. उस ने कहा, ‘‘चाची, ऐसी कोई बात नहीं है. आप चाचा से कुछ मत कहिएगा.’’

रेशमा उठी और पैर पटकती हुई अंदर चली गई. हैरान परेशान रोशन चुपचाप वहीं बैठा रहा.

रेशमा ने रोशन पर अपनी मेहरबानियां और बढ़ा दी थीं, साथ ही शमा पर नजर रखने लगी थी. अब वह उसे रोशन के पास बिलकुल नहीं जाने देती थी.

रोशन चाची की नीयत जान गया था, इसलिए उसे फरीद से डर लगने लगा था कि अगर चाची ने चाचा से कुछ उलटासीधा कह दिया तो वह चाचा को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. अब वह चाची से बचने लगा था. अपना रवैया भी रूखा कर लिया था. एक रात रोशन की अचानक नींद खुली तो उस ने देखा रेशमा उस के पास बैठी उस के बालों में अंगुलियां फेर रही है. वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ.

रेशमा ने मनुहार करते हुए कहा, ‘‘रोशन, कुछ देर मेरे पास बैठ कर मुझ से बातें करो.’’

इतना कह कर रेशमा ने रोशन का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती अपने पास बैठा लिया और उस से लिपट गई. रोशन छिटक कर उस से अलग होते हुए गुस्से में बोला, ‘‘आप मेरी चाची हैं. अदब करना मेरा फर्ज है. आप को रिश्तों की मर्यादा का खयाल रखना चाहिए.’’

रेशमा चिढ़ कर बोली, ‘‘अदब करना अपनी मां का, मेरा नहीं.’’

रोशन की आंखों में आंसू आ गए. रेशमा की बात से एक तो मां की याद आ गई थी, दूसरे उसे अपनी मजबूरी और बेबसी का अहसास हो उठा था. उस ने आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘चाची, मैं कल ही यहां से चला जाऊंगा.’’

रेशमा नागिन की तरह फुफकारी, ‘‘अभी तुम घर जाने के बारे में सोचना भी मत. अगर तुम चले गए तो मैं तुम्हारी शिकायत फरीद से करूंगी. उस के बाद क्या होगा, तुम्हें पता ही है.’’

अगले दिन सुबह ही रोशन ने रेशमा को अपना फैसला सुना दिया कि वह घर जा रहा है. इस के बाद तो रेशमा जैसे गम के समुद्र में डूब गई. उस ने तड़प कर कहा, ‘‘तुम ऐसे कैसे जा सकते हो? अपने चाचा को तो आ जाने दो.’’

‘‘मैं चाचा को खत लिख दूंगा.’’ दुखी मन से रोशन ने कहा.

रेशमा का दिल धक से रह गया. जब से फरीद गया था, उस ने भूल कर भी उस का नाम नहीं लिया था. आज रोशन के मुंह से उस का नाम सुन कर उस का दिल खौफ से भर उठा था. उस ने जल्दी से पूछा, ‘‘उस खत में क्या लिखोगे?’’

‘‘खैरियत लिख कर अपनी नौकरी के बारे में पूछूंगा.’’

इस के बाद रेशमा को सलाम कर के रोशन घर से निकल गया. घर से बाहर आ कर उसे लगा, जैसे वह जेल से रिहा हुआ हो.

रोशन की जुदाई रेशमा के दिल पर जख्म सी लगी. अब किसी काम में उस का मन नहीं लगता था. घर काटने को दौड़ने लगा था. दिन बेचैनी और बेकरारी से कट रहे थे. उस के जाने के बाद से शमा भी चुपचुप सी रहने लगी थी. अब सभी रात को जल्दी सो जाते थे. रेशमा उस की चारपाई पर लेट कर तड़पती रहती थी.

बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा – भाग 4

फरीद के आने में एक दिन रह गया तो रेशमा को अजीब सी घबराहट होने लगी. फिर वही बेरंग जिंदगी हो गई थी. यही सोचतेसोचते वह सो गई. अचानक किसी आहट से उस की नींद खुली तो उसे एक परछाई दिखाई दी. उस ने घबरा कर पूछा, ‘‘कौन…?’’

आने वाले ने चेहरे पर बंधा कपड़ा खोला तो वह एकदम से खिल उठी, ‘‘अरे रोशन तुम, मेरा दिल कह रहा था कि तुम जरूर लौट कर आओगे. आखिर तुम्हारा दिल मेरे बिना नहीं लगा न?’’

रोशन ने तीखे लहजे में कहा, ‘‘चाची, तुम्हें औरत कहना औरत की तौहीन है. तुम रिश्ते के नाम पर कलंक हो. मैं तुम्हें मां की तरह मानता था, जबकि तुम मेरी बेबसी और मजबूरी का फायदा उठा रही थीं. उम्र और रिश्ते का लिहाज किए बगैर तुम मुझ से इश्क लड़ा रही थी. मैं यहां नौकरी का सपना ले कर आया था, लेकिन तुम ने मुझे बरबाद कर दिया.’’

रेशमा दम साधे उस की बातें सुनती रही. रोशन निडर मर्द की तरह तना खड़ा था. रेशमा गिड़गिड़ाई, ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं रोशन.’’

‘‘लानत है तुम्हारे प्यार पर.’’ कह कर उस ने चादर में छिपा चाकू निकाला और फुर्ती से रेशमा पर हमला कर दिया. चाकू बाईं बाजू के पास सीने में घुस गया. चाकू को उसी तरह छोड़ कर वह हवा के झोंके की तरह दीवार फांद कर भाग गया. रेशमा बेहोश हो गई. उस के शरीर से तेजी से खून बहता रहा.

फरीद के स्वागत में बच्चों ने घर को सजाने का प्रोग्राम बनाया था, इसलिए बच्चों ने स्कूल से छुट्टी ले रखी थी. सुबह जब वे मां को बुलाने छत पर गए तो मां खून में डूबी पड़ी थी. दोनों जोर जोर से रोने चिल्लाने लगे. शोर सुन कर पड़ोसी आ गए. आननफानन में एंबुलैंस से रेशमा को अस्पताल पहुंचाया गया. फरीद घर पहुंचा तो उसे इस दर्दनाक हादसे के बारे में पता चला.

फरीद ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतने दिनों बाद घर आने पर इस तरह की बुरी खबर सुनने को मिलेगी. वह दोनों बच्चों को ले कर अस्पताल पहुंचा. संयोग से उसी समय रेशमा को होश आ गया.

डाक्टर से पूछ कर वह रेशमा के पास पहुंचा तो उस के साथ इंस्पेक्टर सफदर खान भी थे. रेशमा का चेहरा पीला पड़ गया था. फरीद ने बेकरारी से पूछा, ‘‘रेशमा यह सब कैसे हुआ, किस ने मारा तुम्हें?’’

इंसपेक्टर सफदर खान ने भी करीब आ कर वही सवाल किया, ‘‘रेशमा बोलो, तुम्हें किस ने मारा?’’

रेशमा कमजोर आवाज में टूटेफूटे शब्दों में बोली, ‘‘व…वह सालार बेग… सालार बेग ने…’’

‘‘यह सालार कौन है रेशमा?’’ फरीद ने जल्दी से पूछा.

‘‘वह सालार, वह शहजादा…’’

बात पूरी किए बगैर ही सासों ने रेशमा का साथ छोड़ दिया.

फरीद ने बेटी से पूछा, ‘‘शमा, रोशन कहां है?’’

‘‘वह तो 3-4 दिन पहले ही अपने घर चले गए थे.’’

रेशमा की मौत से फरीद और बच्चे एकाएक सदमे में आ गए थे. फरीद को बच्चों को संभालना था, इसलिए पत्नी की मौत के दुख को भूल कर वह अन्य काररवाई में लग गया. लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई थी.

जैसे जैसे रोशन शहर से दूर जा रहा था, वैसेवैसे उसे सुकून मिलता जा रहा था. वह घर पहुंचा तो नौकरी न मिलने से मांबाप दुखी तो हुए, लेकिन बेटे को देख कर खुशी भी हुई. उन्होंने कहा, ‘‘नौकरी नहीं मिली, कोई बात नहीं. यहीं कोई धंधा कर लेना.’’

अगले दिन फरीद ने फोन कर के भाई को बताया कि रेशमा की मौत हो गई है. वे सभी लोग शहर पहुंच गए. फरीद और बच्चों को ढांढस बंधाया. पता चला कि किसी सालार शहजादा ने रेशमा की चाकू मार कर हत्या कर दी थी.

रोशन अजीब सी उलझन में था. दो दिन रुक कर सभी लौट गए. फरीद काफी परेशान था. बीवी की हत्या हो जाने से बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं था. दूसरी ओर पुलिस बारबार पूछ रही थी कि यह सालार शहजादा कौन है?

फरीद को खुद ही कुछ पता नहीं था, इसलिए वह क्या बताता? नईम मां की मौत के बारे में बाहर से कुछ सुन कर आता तो उस से पूछता. फरीद उस के सवालों का क्या जवाब देता? वह तो बाहर रहता था. बेटे के बारबार पूछने पर वह गुस्सा होता.

रोशन की दिमागी हालत काफी खराब थी. उस का जमीर उसे कचोट रहा था कि उस ने यह क्या कर दिया? बच्चों से उन की मां छीन ली. किसी काम में उस का मन नहीं लगता. खाना पीना भी छूट गया था.

पुलिस और फरीद को सालार नाम के शख्स ने मुश्किल में डाल दिया था. फरीद के रिश्तेदारों में भी कोई सालार नाम का आदमी नहीं था.

इंसपेक्टर सफदर खान ने पूछा, ‘‘आप के घर में कौन कौन रहता था?’’

‘‘मेरी बीवी रेशमा, बेटीबेटा और एक भतीजा रोशन, जो साढ़े 3 महीने पहले ही नौकरी की तलाश में आया था.’’

‘‘आप ने उस से पूछा था, शायद वह सालार को जानता हो?’’

‘‘वह तो रेशमा की हत्या के 3 दिन पहले ही गांव चला गया था.’’

इस के बाद इंसपेक्टर सफदरखान ने नईम और शमा से पूछा, ‘‘तुम्हारे रोशन भाई घर छोड़ कर क्यों चले गए थे?’’

‘‘काफी परेशान होने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली तो वह गांव लौट गए थे.’’

‘‘तुम्हारी अम्मी से कहासुनी या लड़ाई तो नहीं हुई थी?’’

‘‘नहीं, अम्मी तो उन्हें खूब प्यार करती थीं. उन का खयाल भी हम दोनों से ज्यादा रखती थीं.’’ नईम ने कहा.

इस के बाद शमा बोली, ‘‘रोशन भाई अम्मा का बड़ा अदब करते थे. अम्मी भी उन से बहुत प्यार से पेश आती थीं.’’

सफदर खान ने पूछा, ‘‘रोशन का कोई दोस्त तो तुम्हारे घर नहीं आता था?’’

‘‘नहीं, उन का कोई दोस्त कभी हमारे घर नहीं आया.’’ भाईबहन दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘फरीद साहब, मैं रोशन से भी पूछताछ करना चाहता हूं. क्या आप उसे गांव से बुलवा देंगे?’’ इंसपेक्टर सफदर खान ने कहा.

इस में फरीद को क्या परेशानी हो सकती थी. उन्होंने रोशन को बुलवा लिया. इंसपेक्टर सफदर खान ने उस से बड़ी नरमी से पूछा, ‘‘तुम्हारे पास कोई कामधाम तो था नहीं, दिन भर तुम घर में क्या करते रहते थे?’’

‘‘साहब, मैं घर में कहां रहता था, दिन भर नौकरी की तलाश में भटकता रहता था. उस के बाद जो समय बचता था, रहीम चाचा की दुकान पर उन का हिसाब किताब ठीक करता था.’’

‘‘तुम्हारी चाची का तुम्हारे प्रति कैसा व्यवहार था?’’

‘‘साहब, वह बहुत अच्छी थीं. मेरा बहुत खयाल रखती थीं.’’

यह बात उन्हें बच्चे भी बता चुके थे. रहीम से भी रोशन के बारे में पूछा गया. उन्होंने रोशन को बहुत ही नेक ओर मेहनती लड़का बताया. उन का कहना था कि उस मासूम मजबूर बच्चे के बारे में ऐसा सोचना भी गुनाह है.

बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा – भाग 1

गहरे रंग की तीखे नयननक्श वाली रेशमा एक छोटे से कस्बे में अपने बाप अल्लारखा और मां ताहिरा के साथ रहती थी. उस का बाप कपड़ों  की सिलाई का काम करता था. उस की आमदनी ठीकठाक थी, इसलिए उस की गुजरबसर आराम से हो रही थी.

रेशमा एकलौती बेटी थी, इसलिए मांबाप उस के खूब नाजनखरे उठा रहे थे. बाप खुद सिलाई का काम करता था, इसलिए वह नएनए फैशन के कपड़े पहनती थी.

उस में वैसे तो कोई खास बात नहीं थी, सिर्फ एक गुण यह था कि उस की आवाज ऐसी सुरीली और मीठी थी कि दिल को छू लेती थी. अल्लारखा के पास एक ट्रांजिस्टर था, जिसे वह दिन भर दुकान पर साथ रखता था और शाम को घर आते समय लेते आता था.

मौका मिलते ही रेशमा उस पर गाने लगा कर साथसाथ गाती. इस से धीरेधीरे उसे गानों के उतारचढ़ाव और सुरताल समझ में आने लगे थे. उसे ढेरों गाने याद भी हो गए थे. कभी स्कूल में कोई समारोह होता तो उसे गाने का मौका भी मिलता, जिस से उसे तारीफ तो मिलती ही, इनाम भी मिलता. मां भी उस की तारीफ और इनाम से खुश होती. रेशमा की सब से प्यारी सहेली थी मैमूना. उस के भाई की सगाई थी, जिस में उस ने रेशमा को भी बुलाया था.

करीबी सहेली ने बुलाया था, इसलिए रेशमा खूब सजधज कर सगाई में गई थी. वहां गाने के प्रोग्राम में जब रेशमा ने गाया तो उस की आवाज का जादू ऐसा चला कि लोग कामधाम छोड़ कर उस का गाना सुनने वहां आ गए.

मैमूना का भाई सालार बेग, जो उस से 2-3 साल बड़ा था, जिस की सगाई हो रही थी, वह तो उस की सुरीली आवाज पर मर ही मिटा. जितनी देर तक रेशमा की रसभरी आवाज वहां गूंजती रही, वह दम साधे सुनता रहा. गाना खत्म हुआ तो उस ने कहा, ‘‘ऐसी आवाज मैं ने पहले कभी नहीं सुनी, क्या गजब गाती है.’’

रेशमा ने जैसे उस का दिल अपने वश में कर लिया था. शमीम, जिस से उस की सगाई हो रही थी, वह उसी की पसंद थी. गोरी, खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली समझदार शमीम से अचानक सालार का दिल उचट गया. उस के कानों में रेशमा ने जो रस घोला था, उस से उस का काला रंग भी छिप गया था. उस ने कई बार रेशमा को देखा था, पर उस की काली रंगत ने उसे कभी आकर्षित नहीं किया था.

सालार खुद भी लंबाचौड़ा, गोरा, खूबसूरत जवान था. उस का अच्छाखासा चलने वाला जनरल स्टोर था. शमीम के बाप की अनाज की आढ़त थी. सुखीसंपन्न लोग थे. अच्छा दहेज देने वाले थे. एक साल से सालार और शमीम की शादी की बात चल रही थी. उस के भाई से मैमूना का भी रिश्ता तय हो गया था. लेकिन ऐन सगाई के दिन रेशमा की जादू भरी आवाज ने सालार का दिल लूट लिया था.

सालार की समझ में नहीं आ रहा था कि यह उसे क्या हो गया है. उस का दिल रेशमा की तरफ क्यों खिंचा चला जा रहा है. आखिर यह कैसी बेचैनी और बेबसी है? जबकि वह दिल से ऐसा नहीं चाहता था.

घर के सभी लोग सगाई की तैयारी में लगे थे. उस के दोस्त डांस कर रहे थे. जबकि उस का दिल इस सब से अलग रेशमा की आवाज के जादू में खोया था.

सगाई हो गई. सालार के लिए उस की ससुराल से खूब सामान आया था. खूब मिठाई बंटी और खुशियां मनाई गईं. अगले दिन मैमूना की भी शमीम के भाई अनवर से सगाई हो गई. धीरेधीरे एक महीना बीत गया. इस बीच सालार की बेचैनी कम होने के बजाय बढ़ती गई.

जब उस से नहीं रहा गया तो एक दिन उस ने दिल की बात मैमूना से कही तो वह अवाक रह गई. उस ने हैरानी से कहा, ‘‘भाई, अभी अभी तो आप की मंगनी हुई है और अब आप रेशमा की बात कर रहे हैं. ऐसा कैसे हो सकता है?’’

सालार बेबसी से बोला, ‘‘मैं क्या करूं मैमूना, मुझे एक पल भी चैन नहीं मिल रहा. अगर मुझे रेशमा नहीं मिली तो मैं मर जाऊंगा. तुम मेरी मदद करो.’’

मैमूना परेशान हो गई. उस ने भाई के दिल का हाल मां को बताया. मां ने सालार से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मां, मैं रेशमा से ही शादी करूंगा, क्योंकि अब मैं उस के बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘तू ने उस का रंग देखा है? वह शमीम के पांव की जूती के बराबर भी नहीं है. तू ने शमीम को खुद पसंद कर के सगाई की है. रही बात रेशमा की तो वह हमारी जाति बिरादरी की भी नहीं है. ऐसे में वहां तेरा रिश्ता कैसे हो सकता है?’’ मां ने सालार को डांटा.

‘‘अम्मा, तुम एक बार राखा चाचा से बात करो. मुझे पता है कि वह मेरे लिए मना नहीं करेंगे. मैं किसी भी कीमत पर रेशमा को पाना चाहता हूं.’’ सालार ने बेचैनी से कहा.

‘‘बेटा, तू कैसी बातें कर रहा है. तेरे साथ तेरी बहन की भी सगाई उस घर में हुई है. अगर तू ने सगाई तोड़ दी तो तेरी बहन की भी सगाई टूट जाएगी. तू बहन पर ऐसा जुल्म मत कर. यह भी तो सोच ऐसा करने से बिरादरी में हमारी कितनी बेइज्जती होगी. सब थूथू करेंगे. कोई मैमूना से शादी नहीं करेगा.’’ मां गुस्से में बोली.

‘‘अम्मा, मैं कुछ नहीं जानता. आप राखा चाचा से रेशमा से रिश्ते के लिए बात करो. यह मेरा अंतिम फैसला है.’’ सालार ने कहा.

रेशमा को क्या पता था कि उस की आवाज ने सहेली के घर में कैसा तूफान खड़ा कर दिया है? उस की वजह से सहेली की खुशियां दांव पर लग गई हैं. कई दिनों बाद वह मैमूना के घर गई तो सालार से उस की मुलाकात हो गई. उसे देख कर रेशमा का दिल धड़क उठा कि सालार कितना खूबसूरत है, एकदम सपनों के शहजादे जैसा.

घबरा कर रेश्मा ने नजरें झुका लीं. तभी सालार ने उस के चेहरे पर नजरें जमा कर कहा, ‘‘रेशमा, तुम्हारी आवाज बड़ी सुरीली है. उस में ऐसा जादू है कि मैं उस का दीवाना हो गया हूं. अपनी उस आवाज से तुम ने मेरा चैन और करार लूट लिया है. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं रेशमा, क्योंकि अब मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता.’’

रेशमा हैरानी से सालार को देखती रह गई. उस ने ख्वाब में भी ऐसे खूबसूरत नवजवान के बारे में नहीं सोचा था. उस ने घबरा कर कहा, ‘‘लेकिन आप की तो शमीम से सगाई हो चुकी है?’’

‘‘लेकिन अब शादी मैं तुम से करूंगा, क्योंकि मुझे तुम से प्यार हो गया है. मैं तुम्हारे लिए यह सगाई तोड़ दूंगा.’’

खुशी और घबराहट में रेशमा तेजी से बाहर की ओर भागी. अब वह हवाओं में उड़ रही थी. उस के कानों में सालार के शब्द गूंज रहे थे, ‘मुझे तुम से प्यार हो गया है.’ इतना स्मार्ट लड़का उस से प्यार करता है और उस का दीवाना है. उस के तो भाग्य ही खुल गए हैं.

बेगुनाह कातिल : प्यार के जुनून में बेमौत मारी गयी रेशमा – भाग 2

शाम को मैमूना उस के घर मिलने आई तो कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी. रेशमा के पूछने पर बोली, ‘‘मेरे घर में जो तूफान मचा है, मैं बता नहीं सकती. सालार भाई तेरी आवाज के दीवाने हो गए हैं. वह तुझ से शादी करना चाहते हैं. अगर उन्होंने शमीम से सगाई तोड़ दी तो मेरी भी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. अम्मा ने उन्हें बहुत समझाया, पर वह मान नहीं रहे हैं. अगर अब्बा को इस बात का पता चला तो घर में कयामत आ जाएगी. वह इस के लिए कभी नहीं मानेंगे.’’

सहेली की हालत पर उसे दया तो आई, लेकिन स्वार्थवश वह सहेली के बारे में सोच नहीं सकी. उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘मैमूना इस में मेरा क्या दोष है? अगर तेरा भाई मुझे चाहता है तो तुम उसे समझाओ. इस में मैं क्या कर सकती हूं.’’

सहेली के इस रवैये से दुखी मैमूना रोती हुई लौट गई. रेशमा अब ख्वाबों में खोई रहने लगी कि उसे शहजादों जैसा सालार मोहब्बत करता है.

लेकिन दुर्भाग्य से रेशमा के सपने सपने ही रह गए. क्योंकि उस के अब्बू अल्लारखा ने उस का रिश्ता अपने एक पुराने दोस्त के भतीजे से तय कर दिया. लड़का जहाज पर नौकरी करता था. उम्र जरा ज्यादा थी, लेकिन बढि़या नौकरी थी.

रेशमा की मोहब्बत का फूल खिलता, उस के पहले ही उसे फरीद के नाम की अंगूठी पहना दी गई. मैमूना को इस सगाई का पता चला तो वह बहुत खुश हुई. लेकिन सालार को उदासी ने घेर लिया.

जल्दी ही फरीद और रेशमा का ब्याह हो गया. सुहागरात को फरीद ने उसे देखा तो काफी निराश हुआ, क्योंकि वह गोरीचिट्टी खूबसूरत दुल्हन चाहता था. उसी तरह की दुल्हन की तलाश में इतनी उम्र हो गई थी. फरीद जैसा ही हाल रेशमा का था. उस की आंखों में तो सालार की खूबसूरती बस चुकी थी. उस के आगे सांवला, ठिगना, छोटीछोटी आंखों वाला फरीद कुछ भी नहीं था. रेशमा जहां सालार के खयालों में खोई रहने लगी थी, वहीं फरीद भी उसे प्यार नहीं कर सका. बस दोनों अपना अपना फर्ज अदा करते रहे.

इसी तरह 20-22 साल बीत गए. रेशमा 2 बच्चों की मां बन गई. वह शहर के छोटे से मकान में जिंदगी गुजर रही थी. फरीद की नौकरी जहाज पर थी, जो सफर पर निकल जाता तो कई महीनों बाद वापस आता. उस तनहाई में सालार की यादें ही उस का सहारा थीं.

अचानक उस की जिंदगी में उस समय एक नया मोड़ आया, जब फरीद अपने एक भतीजे को घर ले आया. वह नौकरी की तलाश में चाचा के साथ आया था.

किचन में खाना बना रही रेशमा के कानों में उस की मीठी आवाज ‘सलाम चाची’ पड़ी तो उस ने पलट कर देखा. 22-23 साल का एक गोराचिट्टा, लंबातगड़ा, खूबसूरत नौजवान किचन के बाहर खड़ा था. जिस की बड़ीबड़ी आंखों में कामयाबी और भविष्य के सुनहरे सपने झलक रहे थे. नीली शर्ट और ब्राउन पैंट में वह काफी स्मार्ट लग रहा था. उसे देख कर रेशमा जैसे पलक झपकाना ही भूल गई.

‘‘यह रोशन अली है, भाईजान का बड़ा बेटा.’’ फरीद ने कहा तो वह एकदम से चौंक कर बोली, ‘‘सलाम, कैसे हो? बैठो, मैं चाय पानी ले कर आती हूं.’’

रोशन अली बैठ कर रेशमा के बेटे नईम से बातें करने लगा, जबकि बेटी शमा किचन में उस की मदद के लिए आ गई.

बीए पास रोशन को फरीद ने अपने कुछ परिचितों से मिलवा दिया और खुद अपनी नौकरी पर चला गया. हमेशा उदास खामोश रहने वाली रेशमा रोशन अली के आने के बाद से खुश रहने लगी थी. बच्चों के साथ बैठ कर रोशन टीवी देखता, उन्हें पढ़ाता, उन्हें नई नई जानकारियां देता. रेशमा भी आ कर उन्हीं के साथ बैठ जाती.

रोशन अली को नौकरी की सख्त जरूरत थी. बीमारी की वजह से बाप कोई काम नहीं कर पाता था, इसलिए नौकरी लगते ही वह उस का इलाज कराने के लिए अपने पास लाना चाहता था. वह बहुत ही समझदार और तमीज वाला लड़का था. चाचा चाची का बहुत अदब करता था.

रेशमा भी रोशन का बहुत ध्यान रखती थी. उस का हर काम समय पर कर देती थी. इसलिए रोशन चाची का बहुत एहसान मानता था. लेकिन दूसरी ओर तो मामला ही कुछ और था. रेशमा को उस में सालार नजर आता था. इसलिए वह चाहती थी कि वह हर वक्त उस के सामने रहे. रेशमा के बच्चे उस से काफी हिलमिल गए थे.

सांवली घबराई शमा रोशन को बहुत अच्छी लगती थी. 18 साल की शमा के चेहरे पर गजब का आकर्षण था. उस की बड़ी बड़ी झुकी आंखें दिल मोह लेती थीं. शमा को भी रोशन अच्छा लगता था. अगर रोशन कभी उसे कुछ कहता तो उस के चेहरे पर हया की लाली फैल जाती. इस सब से बेखबर रेशमा रोशन को सालार मान कर उस की दीवानी होती जा रही थी.

गरमी के दिन थे, इसलिए रोशन छत पर सोता था. जबकि रेशमा बच्चों के साथ नीचे कमरे में सोती थी. एक रात बिजली जाने पर रेशमा की आंख खुली तो वह पानी पीने बाहर आई. गर्मी से बेहाल रोशन हाथ का पंखा चला रहा था. रेशमा ने उस के पास जा कर पूछा, ‘‘गरमी की वजह से नींद नहीं आ रही क्या रोशन?’’

‘‘हां चाची, आज उमस कुछ ज्यादा है.’’ रोशन ने अदब के साथ कहा.

रोशन के हाथ से पंखा ले कर रेशमा बोली, ‘‘तुम लेटो, मैं पंखा झलती हूं.’’

उस समय रेशमा को यही लग रहा था कि उस के सामने सालार लेटा है. यही सोच कर वह रोशन की चारपाई पर बैठ गई. उस के बैठते ही रोशन हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ. उस ने घबरा कर कहा, ‘‘नहीं चाची, मैं पंखा झल लूंगा. आप जा कर आराम कीजिए, मैं सो जाऊंगा.’’

जब तक रेशमा बैठी रही, रोशन खड़ा रहा. मजबूरन रेशमा को उठ कर कमरे में जाना पड़ा. वह कमरे में भले आ गई, लेकिन लग रहा था वह अपना सब कुछ वहीं छोड़ आई है.