‘‘आज का अखबार कहां है?’’ किशोरीलाल ने पत्नी रमा से पूछा.
‘‘अभी देती हूं.’’
‘‘अरे, आज तो इतवार है न, वो साहित्य वाला पेज कहां है?’’
‘‘ये रहा,’’ रमा ने सोफे के नीचे से मुड़ातुड़ा सा अखबार निकाल कर किशोरीलाल की तरफ बढ़ाया.
‘‘इसे तुम ने छिपा कर क्यों रखा था?’’
‘‘अरे, इस में आज एक कहानी आई है, बड़ी अजीब सी. कहीं हमारे बच्चे न पढ़ लें, इसलिए छिपा लिया था. लगता है आजकल के लेखक जरा ज्यादा ही आगे की सोचने लगे हैं.’’
‘‘अच्छा, ऐसा क्या लिख दिया है लेखक ने जो इतना कोस रही हो नए लेखकों को?’’ किशोरीलाल की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.
‘‘लिखा है कि अगर मांबाप सैरसपाटे में बाधा बनें तो उन्हें अस्पताल में भरती करवा देना चाहिए चैकअप के बहाने.’’
‘‘अच्छा, जरा देखूं तो,’’ कहते हुए वे अखबार के संडे स्पैशल पेज में प्रकाशित युवा लेखिका की कहानी ‘स्थायी समाधान’ पढ़ने लगे.
कहानी के अनुसार नायक अपने बुजुर्ग पिता को ले कर परेशान था कि उनकी सप्ताहभर की ऐसी व्यवस्था कहां की जाए जहां उन्हें खानेपीने की कोई दिक्कत न हो और उन के स्वास्थ्य का भी पूरा खयाल रखा जा सके क्योंकि उसे अपने परिवार सहित अपनी ससुराल में होने वाली शादी में जाना है. तब उस का दोस्त उसे समाधान बताता है कि वह अपने पिता को शहर में नए खुले होटल जैसे अस्पताल में चैकअप के बहाने भरती करवा दे क्योंकि वहां भरती होने वालों की सारी जिम्मेदारी डाक्टरों और वहां के स्टाफ की होती है, खानेपीने से ले कर जांच और रिपोर्ट्स तक की. नायक को दोस्त का यह सुझाव बहुत पसंद आता है.
एक ही बार में किशोरीलाल पूरी कहानी पढ़ गए. रमा इस दौरान उन के चेहरे पर आतेजाते भावों को पढ़ रही थीं. चेहरे पर प्रशंसा के भावों के साथ जब उन्होंने अखबार समेटा तो रमा को आश्चर्य हुआ.
‘‘बिलकुल सही और व्यावहारिक समाधान सुझाया है लेखिका ने,’’ किशोरीलाल ने कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी.
‘‘क्या खाक सही सुझाया है? अरे, ऐसे भी कोई करता है अपने वृद्ध पिता के साथ?’’
‘‘तो तुम ही बताओ, ऐसे में उसे क्या करना चाहिए था?’’ रमा को तुरंत कोई जवाब नहीं सूझा तो वे ही बोले, ‘‘अच्छा, तुम जाओ एक कप चाय और पिला दो, आज इतवार है.’’
रिटायर्ड किशोरीलाल अपने परिवार के साथ एक सुखी जीवन जी रहे हैं. परिवार में पत्नी के अलावा बेटा आलोक और बहू रश्मि तथा किशोर पोती आयुषी है. बेटाबहू दोनों ही नौकरीपेशा हैं और पोती अभीअभी कालेज में गई है.
नौकरीपेशा होने के बावजूद बहू उन का बहुत खयाल रखती है और अपने सासससुर को पूरा मानसम्मान देती है. उन्हें भी बहू से कोई शिकायत नहीं है. पत्नी रमा रसोई में बहू की हर संभव सहायता करती हैं. दिन में उन्हें और पोती को गरमागरम खाना परोसती हैं और शाम को बहू के घर लौटने से पहले रात के खाने की काफीकुछ तैयारी कर के रखती हैं. वे खुद भी बाहर के छोटेमोटे काम जैसे फलसब्जीदूध लाना, पानीबिजली के बिल भरवाना आदि कर देते हैं. कुल मिला कर संतुष्ट हैं अपने पारिवारिक जीवन से.
किशोरीलाल को साहित्य से बड़ा प्रेम है. रोज 2 घंटे नियम से अच्छी साहित्यिक पुस्तकें पढ़ना उन की दिनचर्या में शामिल है. रविवार को कालेज, औफिस में छुट्टी होने के कारण घर में सब देर तक सोते हैं, इसलिए किशोरीलाल और रमा आराम से बाहर बालकनी में बैठ कर सुबह की ताजा हवा का आनंद लेते हुए देर तक अखबार पढ़ते हैं, समाचारों पर चर्चा करते हैं और चाय की चुस्कियां लेते हैं. कभीकभी किसी न्यूज को ले कर दोनों के विचार नहीं मिलते तो यह चर्चा बहस में तबदील हो जाती है. तब किशोरीलाल को ही हथियार डालने पड़ते हैं पत्नी के आगे.
रमा चाय बनाने जा रही थीं कि बेटे ने आवाज लगाई, ‘‘मां, चाय हमारे लिए भी बना लेना.’’
बहू भी उठ कर आ गई, सब गपशप करते हुए चाय पी रहे थे. मगर रमा अपने बेटेबहू का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं. वे पढ़ना चाह रही थीं उस चेहरे को, जो इस चेहरे के पीछे छिपा था. मगर सफल नहीं हो सकीं क्योंकि उन्हें वहां छलकपट जैसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया.
‘‘दादी, पता है, इस साल हम शिमला घूमने जाएंगे,’’ आयुषी ने दादी की गोद में सिर रखते हुए बताया.
‘‘अच्छा, लेकिन हमें तो किसी ने बताया ही नहीं.’’
‘‘अरे, अभी फाइनल कहां हुआ है? वो मम्मी की सहेली हैं न संगीता आंटी, वो जा रही हैं अपने परिवार के साथ. उन्होंने ही मम्मी को भी साथ चलने के लिए कहा है.’’
‘‘फिर, क्या कहा तेरी मम्मी ने?’’ रमा के दिमाग में फिर से सुबह वाली कहानी घूम गई.
‘‘कुछ नहीं, सोच कर बताएंगी, ऐसा कहा. दादी, प्लीज, हम जाएं क्या?’’ आयुषी ने उन के गले में बांहें डालते हुए कहा.
‘‘मैं ने कब मना किया?’’
‘‘वो मम्मी ने तो हां कर दी थी मगर पापा कह रहे थे कि आप लोगों का ध्यान कौन रखेगा. आप को अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते हैं.’’
त?भी फोन की घंटी बजी और आयुषी बात अधूरी ही छोड़ कर फोन अटैंड करनी चली गई. रमा को बेटे पर प्यार उमड़ आया, सोच कर अच्छा लगा कि उन का बेटा कहानी वाले बेटे की तरह नहीं है. कई दिन हो गए मगर घर में फिर ऐसी कोई चर्चा न सुन कर उन्हें लगा कि शायद बात ठंडे बस्ते में चली गई है. मगर एक रात सोने से पहले किशोरीलाल ने फिर जैसे सांप को पिटारे से बाहर निकाल दिया.
‘‘बच्चे शिमला घूमने जाना चाहते हैं,’’ उन्होंने पत्नी से कहा.
‘‘तो, परेशानी क्या है?’’
‘‘वो हमें ले कर चिंतित हैं कि हमारा खयाल कौन रखेगा?’’
‘‘हमें क्या हुआ है? अच्छेभले
तो हैं. हम अपना खयाल खुद रख सकते हैं.’’
‘‘सो तो है मगर कई बार तुम्हें अचानक अस्थमा का दौरा पड़ जाता है, उसी की फिक्र है उन्हें. ऐसे में मैं अकेले कैसे संभाल पाऊंगा.’’
‘‘इतनी ही फिक्र है तो न जाएं, कोईर् जरूरी है क्या शिमला घूमना.’’
‘‘कैसी बातें करती हो? यह कोई हल नहीं है समस्या का. भूल गईं, हम दोनों भी कितना घूमते थे. आलोक को कहां ले जाते थे हर जगह, मांबाबूजी के पास ही छोड़ जाते थे अकसर. अब इन का भी तो मन करता होगा अकेले कहीं कुछ दिन साथ बिताने का.’’
‘‘सुनो, एक काम करते हैं. कुछ दिनों के लिए तुम्हारी बहन के यहां चलते हैं. कईर् बार बुला चुकी हैं वो. इस बहाने हमारा भी कुछ चेंज हो जाएगा,’’ किशोरीलाल ने समस्या के समाधान की दिशा में सोचते हुए सुझाव दिया.
‘‘नहीं, इस उम्र में मुझे किसी के भी घर जाना पसंद नहीं.’’
‘‘वो तुम्हारी अपनी बहन है.’’
‘‘फिर भी, हर घर के अपने नियमकायदे होते हैं और वहां रहने वालों को उन का पालन करना ही होता है. सबकुछ उन्हीं के हिसाब से करो, बंध जाते हैं कहीं भी जा कर. अपना घर अपना ही होता है. जहां चाहो छींको, जहां मरजी खांसो. जब चाहो सोओ, जब मन करे उठो,’’ रमा ने पति का प्रस्ताव सिरे से नकार दिया.
किशोरीलाल अपनी जवानी के दिन याद करने लगे. हर साल गरमी में उन के 3-4 दोस्त परिवार सहित हिल स्टेशन पर घूमने जाने का प्रोग्राम बना लेते थे. आलोक तब छोटा था. वे उसे कभी उस के दादादादी और कभी नानानानी के पास छोड़ कर जाते थे क्योंकि छोटे बच्चे पहाड़ों पर पैदल नहीं चल सकते और उन्हें गोद में ले कर वे खुद नहीं चल सकते. ऐसे में मातापिता और बच्चे दोनों ही मौजमस्ती नहीं कर पाते. साथ ही, बच्चों के बीमार होने का भी डर रहता था. अपनी समस्या का उन्हें यही सटीक समाधान सूझता था कि आलोक को दादी या नानी के पास छोड़ दिया जाए. रमा भी शायद यही सबकुछ सोच रही थीं.
‘‘आलोक, तुम लोगों का क्या प्रोग्राम है शिमला का?’’ रमा ने पूछा तो आलोक और रश्मि चौंक कर एकदूसरे की
तरफ देखने लगे. किशोरीलाल अखबार पढ़तेपढ़ते मन ही मन मुसकरा दिए.
‘‘वो शायद कैंसिल करना पड़ेगा,’’ आलोक ने रश्मि की तरफ देखते हुए कहा.
‘‘क्यों?’’
‘‘आप दोनों अकेले रह जाएंगे और आयुषी के कालेज की तरफ से भी इस बार समरकैंप में बच्चों को शिमला ही ले जा रहे हैं ट्रैकिंग के लिए, तो वह भी हमारे साथ नहीं जाएगी. फिर हम दोनों अकेले जा कर क्या करेंगे.’’
‘‘अरे, यह तो और भी अच्छा हुआ, कहते हैं न कि किसी काम को करने की दिशा में अगर सोचने लगो तो रास्ता अपनेआप नजर आने लगता है.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब यह कि अगर आयुषी तुम्हारे साथ नहीं जा रही तो हम तीनों यहां आराम से रहेंगे. घर मैं संभाल लूंगी और बाहर तुम्हारे पापा, और अगर हमारे बूते से बाहर का कुछ हुआ, तो ये हमारी पोती है न, नई पौध, जरूरत पड़ने पर यह पीढ़ी सब संभाल लेती है-घर भी और बाहर भी. और जब आयुषी समरकैंप में जाएगी तब तक तुम दोनों आ ही जाओगे.’’
‘‘अरे हां, एक रास्ता यह भी तो है. हमारे दिमाग के घोड़े तो यहां तक दौड़े ही नहीं,’’ आलोक ने खुश होते हुए कहा.
‘‘इसीलिए तो कहते हैं ओल्ड इज गोल्ड,’’ रमा ने कनखियों से अपने पति की तरफ देखते हुए कहा तो घर में एक सम्मिलित हंसी गूंज उठी.
‘‘अरे रामू, क्या हुआ?’’ चनकू बाई ने पूछा.
‘‘यह लड़की धंधा करने को तैयार नहीं हो रही है,’’ रामू ने कहा.
रामू की बात सुन कर चनकू बाई कुछ सोचने लगी. कुछ याद आते ही वह बोली, ‘‘रामू, फौरन डीडी को बुलाओ, वही चुटकियों में ऐसे केस हल कर देता है.’’
डीडी उर्फ दामोदर गांव का एक सीधासादा नौजवान था. गांव के ऊंचे घराने की लड़की से उसे इश्क हो गया था. वह लड़की भी उसे बहुत प्यार करती थी. लेकिन उन दोनों के प्यार के बीच दौलत की दीवार थी, जिसे दामोदर तोड़ न सका.
दामोदर के सामने ही उस की प्रेमिका किसी और की हो गई. उस दिन दामोदर बहुत रोया था. उसे एहसास हो गया था कि दौलत के बिना इनसान अधूरा है. उस के पास दौलत होती, तो शायद उस का प्यार नहीं बिछुड़ता.
अपने प्यार का घरौंदा उजड़ते देख कर दामोदर ने फैसला किया कि वह बहुत दौलत कमाएगा, चाहे यह दौलत पाप की कमाई ही क्यों न हो.
इश्क में हारा दामोदर घर में अपने मांबाप से बगावत कर के शहर में
दौलत कमाने का सपना ले कर मुंबई आ गया.
मुंबई में दामोदर बिलकुल अकेला था. काम की तलाश में वह बहुत भटका, मगर उसे काम नहीं मिला.
एक दिन दामोदर की मुलाकात रामू से हो गई. दामोदर ने उसे अपनी आपबीती सुनाई, तो रामू को अपनापन महसूस हुआ.
वह बोला, ‘‘मैं तुम्हें काम दिला सकता हूं, पर उस काम में जोखिम बहुत है और पुलिस का डर भी है.’’
‘‘मो सिर्फ पैसा चाहिए, काम चाहे कितना भी खतरनाक ही क्यों न हो.’’
दामोदर की बात सुन कर रामू ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा. वह समा चुका था कि दामोदर के सिर पर दौलत कमाने का भूत सवार है. इस से कुछ भी काम कराया जा सकता है.
रामू दामोदर को ले कर चनकू बाई के कोठे पर पहुंचा. चनकू बाई ने दामोदर से बात की, फिर उसे एक वैन दे दी, जिस से वह लड़कियां सप्लाई करने लग पड़ा.
इस काम में दामोदर को अच्छीखासी रकम मिलती थी. अब रामू व दामोदर एकसाथ रहने लगे थे. उन दोनों में गहरी दोस्ती भी हो गई थी.
कुछ ही दिनों में दामोदर ने अपनी मेहनत से चनकू बाई के दिल में अच्छीखासी जगह बना ली थी. अब चनकू बाई दामोदर को डीडी के नाम से पुकारती थी.
डीडी उर्फ दामोदर को चनकू बाई का संदेश मिला और वह फौरन कोठे पर पहुंचा. रामू ने लड़की के बारे में दामोदर को सबकुछ बता दिया.
दामोदर दरवाजा खोल कर कमरे में आया. उस ने फर्श पर पड़ी लड़की को उठाना चाहा, मगर वह बेहोशी की हालत में थी. उस का जिस्म किसी गरम भट्ठी की तरह तप रहा था.
‘‘बाई, इस लड़की को तो काफी
तेज बुखार है. किसी डाक्टर को दिखाना होगा,’’ दामोदर ने कहा.
‘‘इस कोठे पर कौन डाक्टर आएगा…’’ चनकू बाई परेशान होते हुए बोली.
‘‘फिर?’’ रामू ने पूछा.
‘‘ठीक है बाई, मैं इस लड़की को घर ले जाता हूं, वहां किसी डाक्टर को दिखा लूंगा. जब यह ठीक हो जाएगी, तो कोठे पर ले आऊंगा,’’ दामोदर बोला.
दामोदर की बात से रामू और चनकू बाई दोनों राजी थे. दामोदर लड़की को अपने घर ले आया. उस का घर बहुत छोटा था. उस के साथ लड़की देख कर महल्ले वाले यह समो कि शायद यह उस की बीवी है.
डाक्टर ने आ कर लड़की को दवाएं दे दीं. बुखार उतर नहीं रहा था. दामोदर पूरी रात उस लड़की के माथे पर पट्टियां रखता रहा.
दामोदर की मेहनत रंग लाई. सुबह लड़की को होश आ गया. दामोदर ने उसे कुछ दवाएं खाने को दीं. नानुकर के बाद लड़की ने दवा खा ली.
दोपहर तक लड़की पूरी तरह से होश में आ चुकी थी. उस ने अपना नाम रजनी बताया. बचपन में ही उस के पिता की मौत हो चुकी थी.
रजनी की मां ने बेटी को पालने के लिए दूसरी शादी कर ली. शादी के कुछ साल बाद ही रजनी की मां की मौत हो गई.
मां की मौत के बाद से ही रजनी के सौतेले बाप ने उसे तंग करना शुरू कर दिया था. पिता से आजिज हो चुकी रजनी गांव के एक नौजवान को दिल दे बैठी.
उस नौजवान ने रजनी को शहर की चमकदमक के सुनहरे सब्जबाग दिखाए. वह रजनी को बहलाफुसला कर शहर ले आया और धोखे से कोठे पर बेच दिया था.
दामोदर ने रजनी की कहानी बड़े गौर से सुनी. आज तक उस ने जितनी भी लड़कियों को धंधे में उतारा था, उन में से किसी की भी कहानी नहीं सुनी थी.
थोड़ी देर के बाद दामोदर दरवाजे पर बाहर से ताला लगा कर खाना लेने होटल चला गया.
कुछ देर बाद ही दामोदर खाना ले कर लौटा. रजनी ने खाना खाया. उस के बाद वह तख्त पर लेट गई. दामोदर भी फर्श पर चटाई बिछा कर पुराना सा कंबल ले कर लेट गया.
रजनी की सेहत दिन ब दिन सुधरने लगी थी. दामोदर रोज घर के बाहर ताला लगाने के बाद कोठे पर जा कर चनकू बाई को रजनी की सेहत के बारे में बताता था.
एक दिन दामोदर जल्दी में बाहर से ताला लगाना भूल गया. जब वह शाम को घर लौटा, तो उस ने खुला दरवाजा देखा. उस के मानो होश उड़ गए. उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. लेकिन रजनी घर पर ही थी.
‘‘रजनी, आज तो भागने का मौका था. तुम भागी क्यों नहीं?’’
दामोदर की बात सुन कर रजनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘भाग कर जाती भी तो कहां? अब तो दुनिया के सभी दरवाजे मेरे लिए बंद हो गए हैं.’’
रजनी के ये शब्द दामोदर के दिल में तीर की तरह चुभ गए थे.
‘‘लो, खाना खा लो,’’ दामोदर ने खाने का पैकेट रजनी को देते हुए कहा.
‘‘नहीं, आज मैं ने घर पर ही खाना बना लिया था. आप हाथमुंह धो लीजिए. मैं खाना परोसती हूं,’’ रजनी बोली.
दामोदर ने रजनी के हाथ का बना खाना खाया. आज पहली बार मां के बाद उस ने किसी दूसरी औरत के हाथ का बना स्वादिष्ठ खाना खाया था.
खाना खाने के बाद दामोदर पुराना कंबल ले कर जमीन पर लेट गया. रजनी भी तख्त पर लेट गई. पर उन दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे दोनों अपनीअपनी जगह पर करवटें बदलते रहे.
सर्दी भरी रात में दामोदर ठंड से सिकुड़ता जा रहा था, लेकिन रजनी जाग रही थी. रजनी लेटे हुए ही दामोदर को देख रही थी, शायद दामोदर सो चुका था. रजनी ने अपनी रजाई उठाई और वह भी दामोदर के साथ सो गई.
सुबह जब दामोदर की आंख खुली, तब तक काफी देर हो चुकी थी. रजनी ने अपना सबकुछ दामोदर को सौंप दिया था. दामोदर अपनी इस गलती के लिए शर्मिंदा था.
दामोदर तैयार हो कर जैसे ही कोठे पर जाने के लिए निकला, सामने रामू अपने गुरगे ले कर पहुंच गया. वह रजनी को लेने आया था, पर दामोदर ने रजनी के बीमार होने की बात कही और उनके साथ कोठे पर चला गया.
अब दामोदर रजनी को कोठे पर नहीं लाना चाहता था. शायद उसे रजनी से प्यार हो गया था.
दामोदर ने अपने प्यार वाली बात रामू को बताई. रामू ने दामोदर को चनकू बाई के कहर का वास्ता दिया और आगे से ऐसी गलती न करने की राय भी दी.
दूसरे दिन रामू जीप ले कर रजनी को लेने दामोदर की खोली में पहुंचा, तो दामोदर वहां नहीं था. उस के कमरे के बाहर ताला लटका देखा. रामू तो समा गया कि दामोदर रजनी को ले कर कहीं भाग गया है.
जब यह खबर चनकू बाई को मिली, तो वह गुस्से से तिलमिला उठी. उस ने फौरन शहर में गुंडे फैला दिए थे, ताकि दामोदर और रजनी शहर से बाहर न जाने पाएं.
अब सारे शहर में चनकू बाई के आदमी घूम रहे थे, पर दामोदर और रजनी का कहीं अतापता नहीं था. रामू भी कुछ आदमियों को ले कर रेलवे स्टेशन पर तलाश कर रहा था. हथियारों से लैस चनकू बाई के आदमी टे्रन के हर डब्बे की तलाशी ले रहे थे.
रामू जैसे ही डब्बे में घुसा, सामने दामोदर और रजनी को देख कर ठिठक गया था. रजनी किसी अमरबेल की तरह दामोदर से चिपकी थी.
रामू को देख कर वह कांप उठी. दामोदर भी रामू की आंखों में आंखें डाले देख रहा था. उधर ट्रेन चलने के लिए हौर्न दे रही थी.
‘‘रामू, वे इस डब्बे में हैं क्या?’’ चनकू बाई के किसी आदमी ने चिल्ला कर पूछा.
‘‘नहीं, इस डब्बे में कोई नहीं है. चलो, कहीं दूसरी जगह ढूंढें़.’’
रामू की यह बात सुन कर दामोदर और रजनी की जान में जान आई.
रामू ट्रेन से नीचे उतर गया था. वह खिड़की के पास से गुजरते हुए बोला, ‘‘जाओ मेरे दोस्त, तुम्हें नई जिंदगी मुबारक हो. तुम दोनों हमेशा खुश रहो. इस दलदल से निकल कर एक नई जिंदगी जीओ.’’
ट्रेन चल चुकी थी. दामोदर ने खिड़की से बाहर देखा. रामू जीप स्टार्ट कर के चनकू बाई के आदमियों के साथ दूर जा चुका था.
18 वसंत पूरे करते ही जैसे ही रवीना के हाथ में वोटर कार्ड आया, उसे लगा जैसे सारी दुनिया उस की मुट्ठी में समा गई हो.
‘अब मैं कानूनी रूप से बालिग हूं. अपनी मरजी की मालिक. अपनी जिंदगी की सर्वेसर्वा. अपने निर्णय लेने को स्वतंत्र, जो चाहे करूं. जहां चाहे जाऊं, जिस के साथ मरजी रहूं. कोई बंधन, कोई रोकटोक नहीं. बस खुला आसमान और ऊंची उड़ान,’ मन ही मन खुश होती हुई रवीना पल्लव के साथ अपनी आजादी का जश्न मनाने का नायाब तरीका सोचने लगी.
ग्रैजुएशन के आखिरी साल की स्टूडैंट रवीना अपने मांपापा की इकलौती बेटी है. फैशन और हाई प्रोफाइल लाइफ की दीवानी रवीना नाजों से पली होने के कारण थोड़ी जिद्दी और मनमौजी भी है. मगर पढ़ाईलिखाई में औसत छात्रा ही है, इसलिए पास होने के लिए हर साल उसे ट्यूशन और कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है.
कसबाई युवक पल्लव पिछले दिनों ही इस कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाने लगा है. पहली नजर में ही रवीना उस की तरफ झुकने लगी थी. लंबा ऊंचा कद. गेहुआं रंग, गहरी गंभीर आंखें और लापरवाही से पहने कसबाई फैशन के हिसाब से आधुनिक लिबास. बाकी लड़कियों की निगाहों में पल्लव कुछ भी खास नहीं था, मगर उस का बेपरवाह अंदाज अतिआधुनिक शहरी रवीना के दिलोदिमाग में खलबली मचाए हुए था.
पल्लव कहने को तो कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाता था, लेकिन असल में तो वह खुद भी एक स्टूडैंट ही था. उस ने इसी साल अपनी ग्रैजुएशन पूरी की थी और अब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए शहर में रुका था. कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ाने के पीछे उस का यह मकसद भी था कि इस तरीके से वह किताबों के संपर्क में रहेगा साथ ही जेबखर्च के लिए कुछ अतिरिक्त आमदनी भी हो जाएगी.
पल्लव के पिता उस के इस फैसले से सहमत नहीं थे. वे चाहते थे कि पल्लव अपना पूरा ध्यान केवल अपने भविष्य की तैयारी पर लगाए लेकिन पल्लव से पूरा दिन एक ही जगह बंद कमरे में बैठ कर पढ़ाई नहीं होती, इसलिए उस ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध पढ़ने के साथसाथ पढ़ाने का विकल्प भी चुना और इस तरह से रवीना के संपर्क में आया.
2 विपरीत धु्रव एकदूसरे को आकर्षित करते हैं, इस सर्वमान्य नियम से भला पल्लव कैसे अछूता रह सकता था. धीरेधीरे वह भी खुद के प्रति रवीना के आकर्षण को महसूस करने लगा. मगर एक तो उस का शर्मीला स्वभाव. दूसरे सामाजिक स्तर पर कमतरी का एहसास उसे दोस्ती के लिए आमंत्रित करती रवीना की मुसकान के निमंत्रण को स्वीकार नहीं करने दे रहा था.
आखिर विज्ञान की जीत हुई और शुरुआती औपचारिकता के बाद अब दोनों के बीच अच्छीखासी ट्यूनिंग बनने लगी थी. फोन पर बातों का सिलसिला भी शुरू हो चुका था.
‘‘लीजिए जनाब, सरकार ने हमें कानूनन बालिग घोषित कर दिया है,’’ पल्लव के चेहरे के सामने अपना वोटर कार्ड हवा में लहराते हुए रवीना खिलखिलाई.
‘‘तो, जश्न मनाया जाए?’’ पल्लव ने भी उसी गरमजोशी से जवाब दिया.
‘‘चलो, आज तुम्हें पिज्जा हट ले चलती हूं.’’
‘‘न, पिज्जा हट नहीं. तुम अपने खूबसूरत हाथों से एक कप चाय बना कर पिला दो. मैं तो इसी में खुश हो जाऊंगा,’’ पल्लव ने रवीना के चेहरे पर शरारत करते बालों की लट को उस के कानों के पीछे ठेलते हुए कहा.
रवीना उस का प्रस्ताव सुन कर हैरान थी, ‘‘चाय? मगर कैसे? कहां?’’ रवीना ने पूछा.
‘‘मेरे रूम पर और कहां?’’ पल्लव ने उसे आश्चर्य से बाहर निकाला.
रवीना राजी हो गई.
रवीना ने मुसकरा कर अपना स्कूटर स्टार्ट करते हुए पल्लव को पीछे बैठने के लिए आमंत्रित किया. यह पहला मौका था जब पल्लव उस से इतना सट कर बैठा था.
कुछ ही मिनटों के बाद दोनों पल्लव के कमरे पर थे. जैसाकि आम पढ़ने वाले युवाओं का होता है, पल्लव के कमरे में भी सामान के नाम पर एक पलंग, एक टेबलकुरसी और थोड़ाबहुत रसोई का सामान था. रवीना अपने बैठने के लिए जगह तलाश कर ही रही थी कि पल्लव ने उसे पलंग पर बैठने का इशारा किया. रवीना सकुचाते हुए बैठ गई. पल्लव भी वहीं उस के पास आ बैठा.
एकांत में 2 युवा दिल एकदूसरे की धड़कनें महसूस करने लगे और कुछ ही पलों में दोनों के रिश्ते ने एक लंबा फासला तय कर लिया. दोनों के बीच बहुत सी औपचारिकताओं के किले ढह गए. एक बार ढहे तो फिर बारबार ये वर्जनाएं टूटने लगीं.
कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. दोनों की नजदीकियों की भनक जब रवीना के घर वालों को लगी तो उसे लाइन हाजिर किया गया.
‘‘मैं पल्लव से प्यार करती हूं,’’ रवीना ने बेझिझक स्वीकार किया.
बेटी की मुंहजोरी पर पापा आगबबूला हो गए. यह उम्र कैरियर बनाने की है, रिश्ते नहीं. समझी?’’ पापा ने उसे लता दिया.
‘‘मैं बालिग हूं. अपने फैसले खुद लेने का अधिकार है मुझे,’’ रवीना बगावत पर उतर आई.
इसी दौरान बीचबचाव करने के लिए मां उन के बीच आ खड़ी हुई.
‘‘कल से इस का कालेज और इंस्टिट्यूट, दोनों जगह जाना बंद,’’ पापा ने उस की मां की तरफ मुखातिब होते हुए कहा तो रवीना पांव पटकते हुए अपने कमरे की तरफ चल दी. थोड़ी ही देर में कपड़ों से भरा सूटकेस हाथ में लिए खड़ी थी.
‘‘मैं पल्लव के साथ रहने जा रही हूं,’’ रवीना के इस ऐलान ने घर में सब के होश उड़ा दिए.
‘‘तुम बिना शादी किए एक पराए मर्द के साथ रहोगी? क्यों समाज में हमारी नाक कटवाने पर तुली हो?’’ इस बार मां उस के खिलाफ हो गई.
‘‘हम दोनों बालिग हैं. अब तो हाई कोर्ट ने भी इस बात की इजाजत दे दी है कि 2 बालिग लिव इन में रह सकते हैं, उम्र चाहे जो भी हो,’’ रवीना ने कुछ समय पहले दिए गए केरल हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए मां के विरोध को चुनौती दी.
‘‘कोर्ट अपने फैसले नियम, कानून और सुबूतों के आधार पर देता है. सामाजिक व्यवस्थाएं इन सब से बिलकुल अलग होती हैं. कानून और समाज के नियम सर्वथा भिन्न होते हैं,’’ पापा ने उसे नरमाई से समझाने की कोशिश की.
मगर रवीना के कान तो पल्लव के नाम के अलावा कुछ और सुनने को तैयार ही नहीं थे. उसे अब अपने और पल्लव के बीच कोई बाधा स्वीकार नहीं थी. वह बिना पीछे मुड़ कर देखे अपने घर की दहलीज लांघ गई.
यों अचानक रवीना को सामान सहित अपने सामने देख कर पल्लव अचकचा गया. रवीना ने एक ही सांस में उसे पूरे घटनाक्रम का ब्योरा दे दिया.
‘‘कोई बात नहीं, अब तुम मेरे पास आ गई हो न. पुराना सब भूल जाओ और मिलन का जश्न मनाओ,’’ कमरा बंद कर के पल्लव ने उसे अपने पास खींच लिया और कुछ ही देर में हमेशा की तरह उन के बीच रहीसही सारी दूरियां भी मिट गईं. रवीना ने एक बार फिर अपना सबकुछ पल्लव को समर्पित कर दिया.
2-4 दिन में ही पल्लव के मकानमालिक को भी सारी हकीकत पता चल गई कि पल्लव अपने साथ किसी लड़की को रखे हुए है. उसने पल्लव को धमकाते हुए कमरा खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया. समाज की तरफ से उन पर यह पहला प्रहार था, मगर उन्होंने हार नहीं मानी. कमरा खाली कर के दोनों एक सस्ते होटल में आ गए.
कुछ दिन तो सोने से दिन और चांदी सी रातें गुजरीं, मगर साल बीततेबीतते ही उन के इश्क का इंद्रधनुष फीका पढ़ने लगा. ‘प्यार से पेट नहीं भरता,’ इस कहावत का मतलब पल्लव अच्छी तरह समझने लगा था.
समाज में बदनामी होने के कारण पल्लव की कोचिंग छूट गई और अब आमदनी का कोई दूसरा जरीया भी उन के पास नहीं था. पल्लव के पास प्रतियोगी परीक्षाओं का शुल्क भरने तक के पैसे नहीं बच पा रहे थे. उस ने वह होटल भी छोड़ दिया और अब रवीना को ले कर बहुत ही निम्न स्तर के मुहल्ले में रहने आ गया.
एक तरफ जहां पल्लव को रवीना के साथ अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था वहीं दूसरी तरफ रवीना तो अब पल्लव में ही अपना भविष्य तलाशने लगी थी. वह इस लिव इन को स्थाई संबंध में परिवर्तित करना चाहती थी. पल्लव से शादी करना चाहती थी. रवीना को भरोसा था कि जल्द ही ये अंधेरी गलियां खत्म हो जाएंगी और उन्हें अपनी मंजिल का रास्ता मिल जाएगा. बस किसी तरह पल्लव कहीं सैट हो जाए.
एक बार फिर विज्ञान का यह आकर्षण का नियम पल्लव पर लागू हो रहा है कि दो विपरीत धु्रव जब एक निश्चित सीमा तक नजदीक आ जाते हैं तो उन में विकर्षण पैदा होने लगता है. पल्लव भी इसी विकर्षण का शिकार होने लगा था.
हालात के सामने घुटने टेकता वह अपने पिता के सामने रो पड़ा तो उन्होंने रवीना से अलग होने की शर्त पर उस की मदद करना स्वीकार कर लिया. मरता क्या नहीं करता. पिता की शर्त के अनुसार उस ने फिर से कोचिंग जाना शुरू कर दिया और वहीं होस्टल में रहने लगा. इस बार कोचिंग में पढ़ाने नहीं बल्कि स्वयं पढ़ने के लिए.
यह रवीना के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था. वह अपनेआप को ठगा सा महसूस करने लगी. मगर दोष दे भी तो किसे? यह तो उस का अपना फैसला था. इस रास्ते पर चलना उस ने खुद चुना था.
पल्लव के जाने के बाद वह अकेली ही उस महल्ले में रहने लगी. इतना सब होने के बाद भी उसे पल्लव का इंतजार था. वह भी उस की बैंक परीक्षा के रिजल्ट का इंतजार कर रही थी.
‘‘एक बार पल्लव का चयन हो जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा. हमारा दम तोड़ता रिश्ता फिर से जी उठेगा,’’ इसी उम्मीद पर वह हर चोट सहती जा रही थी.
आखिर रिजल्ट भी आ गया. पल्लव की मेहनत रंग लाई और उस का बैंक परीक्षा में में चयन हो गया. रवीना यह खुशी उत्सव की तरह मनाना चाहती थी. वह दिनभर तैयार होकर उस का इंतजार करती रही मगर वह नहीं आया. रवीना पल्लव को फोन पर फोन लगाती रही, मगर उस ने फोन भी नहीं उठाया. आखिर रवीना उस के होस्टल जा पहुंची. वहां जा कर पता चला कि पल्लव तो सुबह रिजल्ट आते ही अपने घर चला गया.
रवीना बिलकुल निराश हो गई. क्या करे कहां जाए. वर्तमान तो खराब हुआ ही, भविष्य भी अंधकारमय हो गया. आसमान तो हासिल नहीं हुआ, पांवों के नीचे की जमीन भी अपनी नहीं रही. पल्लव का प्रेम तो मिला नहीं, मांपापा का स्नेह भी वह छोड़ आई. काश, उस ने अपनेआप को कुछ समय सोचने के लिए दिया होता. मगर अब क्या हो सकता है. पीछे लौटने के सारे रास्ते तो वह खुद ही बंद कर आई थी. रवीना बुरी तरह से हताश हो गई. वह कुछ भी सोच नहीं पा रही थी. कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी. आखिर उस ने एक खतरनाक निर्णय ले ही लिया.
‘‘तुम्हें तुम्हारा रास्ता मुबारक हो. मैं अपने रास्ते जा रही हूं. खुश रहो,’’ रवीना ने एक मैसेज पल्लव को भेजा और अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया. संदेश पढ़ते ही पल्लव के पांवों के नीचे से जमीन खिसक गई.
‘अगर इस लडकी ने कुछ उलटासीधा कर लिया तो मेरा कैरियर चौपट हो जाएगा,’ सोचते हुए उसने 1-2 बार रवीना को फोन लगाने की कोशिश की, मगर नाकाम होने पर तुरंत दोस्त के साथ बाइक ले कर उस के पास पहुंच गया. जैसाकि उसे अंदेशा था, रवीना नींद की गोलियां खा कर बेसुध पड़ी थी. पल्लव दोस्त की मदद से उसे हौस्पिटल ले गया और उस के घर पर भी खबर कर दी. डाक्टरों के इलाज शुरू करते ही दवा लेने के बहाने पल्लव वहां से खिसक गया.
बेशक रवीना अपने घर वालों से सारे रिश्ते खत्म कर आई थी मगर खून के रिश्ते भी कहीं टूटे हैं भला? खबर पाते ही मांपापा बदहवास से बेटी के पास पहुंच गए. समय पर चिकित्सा सहायता मिलने से रवीना अब खतरे से बाहर थी. मापापा को सामने देख कर वह फफक पड़ी.
‘‘मां, मैं बहुत शर्मिंदा हूं. सिर्फ आज के लिए ही नहीं बल्कि उस दिन के अपने फैसले के लिए भी, जब मैं आप सब को छोड़ आई थी,’’ रवीना ने कहा तो मां ने कस कर उस का हाथ थाम लिया.
‘‘यदि मैं ने उस दिन घर न छोड़ा होता तो आज कहीं बेहतर जिंदगी जी रही होती. मेरा वर्तमान और भविष्य, दोनों ही सुनहरे होते. मैं ने स्वतंत्र होने में बहुत जल्दबाजी की. अपने प्यार के फल को विश्वास की आंच पर पकने नहीं दिया. मैं तो आप लोगों से माफी मांगने के लायक भी नहीं हूं…’’ रवीना ने आगे कहा.
‘‘बीती ताहि बिसार दे. आगे की सुध लेय. तुम घर लौट चलो. अपनेआप को वक्त दो और फिर से अपने फैसले का मूल्यांकन करो. जिंदगी किसी एक मोड़ पर रुकने का नाम नहीं बल्कि यह तो एक सतत प्रवाह है. इस के साथ बहने वाले ही अपनी मंजिल को पाते हैं,’’ पापा ने उसे समझाया.
‘‘हां, किसी एक जगह अटके रहने का नाम जिंदगी नहीं है. यह तो अनवरत बहती रहने वाली नदी है. तुम भी इस के बहाव में खुद को छोड़ दो और एक बार फिर से अपनी तकदीर लिखने की कोशिश करो. हम सब तुम्हारे साथ हैं,’’ मां ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.
मन ही मन अपने फैसले से सबक लेने का दृढ़ संकल्प करते हुए रवीना मुसकरा दी. अब उसे स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में फर्क साफसाफ नजर आ रहा था.
रिसैप्शन रूम से बड़ी तेज आवाजें आ रही थीं. लगा कि कोई झगड़ा कर रहा है. यह जिला सरकारी जच्चाबच्चा अस्पताल का रिसैप्शन रूम था. यहां आमतौर पर तेज आवाजें आती रहती थीं. अस्पताल में भरती होने वाली औरतों के हिसाब से स्टाफ कम होने से कई बार जच्चा व उस के संबंधियों को संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता था.
अस्पताल बड़ा होने के चलते जच्चा के रिश्तेदारों को ज्यादा भागादौड़ी करनी पड़ती थी. इसी झल्लाहट को वे गुस्से के रूप में स्टाफ व डाक्टर पर निकालते थे.
मुझे एक तरह से इस सब की आदत सी हो गई थी, पर आज गुस्सा कुछ ज्यादा ही था. मैं एक औरत की जचगी कराते हुए काफी समय से सुन रहा था और समय के साथसाथ आवाजें भी बढ़ती ही जा रही थीं. मेरा काम पूरा हो गया था. थोड़ा मुश्किल केस था. केस पेपर पर लिखने के लिए मैं अपने डाक्टर रूम में गया.
मैं ने वार्ड बौय से पूछा, ‘‘क्या बात है, इतनी तेज आवाजें क्यों आ रही हैं?’’
‘‘साहब, एक शख्स 24-25 साल पुरानी जानकारी हासिल करना चाहते हैं. बस, उसी बात पर कहासुनी हो रही है.’’ वार्ड बौय ने ऐसे बताया, जैसे कोई बड़ी बात नहीं हो.
‘‘अच्छा, उन्हें मेरे पास भेजो,’’ मैं ने कुछ सोचते हुए कहा.
‘‘जी साहब,’’ कहता हुआ वह रिसैप्शन रूम की ओर बढ़ गया.
कुछ देर बाद वह वार्ड बौय मेरे चैंबर में आया. उस के साथ तकरीबन 25 साल की उम्र का नौजवान था. वह शख्स थोड़ा पढ़ालिखा लग रहा था. शक्ल भी ठीकठाक थी. पैंटशर्ट में था. वह काफी परेशान व उलझन में दिख रहा था. शायद इसी बात का गुस्सा उस के चेहरे पर था.
‘‘बैठो, क्या बात है?’’ मैं ने केस पेपर पर लिखते हुए उसे सामने की कुरसी पर बैठने का इशारा किया.
‘‘डाक्टर साहब, मैं कितने दिनों से अस्पताल के धक्के खा रहा हूं. जिस टेबल पर जाऊं, वह यही बोलता है कि यह मेरा काम नहीं है. उस जगह पर जाओ. एक जानकारी पाने के लिए मैं 5 दिन से धक्के खा रहा हूं,’’ उस शख्स ने अपनी परेशानी बताई.
‘‘कैसी जानकारी?’’ मैं ने पूछा.
‘‘जन्म के समय की जानकारी,’’ उस ने ऐसे बोला, जैसे कि कोई बड़ा राज खोला.
‘‘किस के जन्म की?’’ आमतौर पर लोग अपने छोटे बच्चे के जन्म की जानकारी लेने आते हैं, स्कूल में दाखिले के लिए.
‘‘मेरे खुद के जन्म की.’’
‘‘आप के जन्म की? यह जानकारी तो तकरीबन 24-25 साल पुरानी होगी. वह इस अस्पताल में कहां मिलेगी. यह नई बिल्डिंग तकरीबन 15 साल पुरानी है. तुम्हें हमारे पुराने अस्पताल के रिकौर्ड में जाना चाहिए.
‘‘इतना पुराना रिकौर्ड तो पुराने अस्पताल के ही रिकौर्ड रूम में होगा, सरकार के नियम के मुताबिक, जन्म समय का रिकौर्ड जिंदगीभर तक रखना पड़ता है.
‘‘डाक्टर साहब, आप भी एक और धक्का खिला रहे हो,’’ उस ने मुझ से शिकायती लहजे में कहा.
‘‘नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है. यह अस्पताल यहां 15 साल से है. पुराना अस्पताल ज्यादा काम के चलते छोटा पड़ रहा था, इसलिए तकरीबन 15 साल पहले सरकार ने बड़ी बिल्डिंग बनाई.
‘‘भाई यह अस्पताल यहां शिफ्ट हुआ था, तब मेरी नौकरी का एक साल ही हुआ था. सरकार ने पुराना छोटा अस्पताल, जो सौ साल पहले अंगरेजों के समय बना था, पुराना रिकौर्ड वहीं रखने का फैसला किया था,’’ मैं ने उसे समझाया.
‘‘साहब, मैं वहां भी गया था, पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. बोले, ‘प्रमाणपत्र में सिर्फ तारीख ही दे सकते हैं, समय नहीं,’’’ उस शख्स ने कहा.
आमतौर पर जन्म प्रमाणपत्र में तारीख व जन्मस्थान का ही जिक्र होता है, समय नहीं बताते हैं. पर हां, जच्चा के इंडोर केस पेपर में तारीख भी लिखी होती है और जन्म समय भी, जो घंटे व मिनट तक होता है यानी किसी का समय कितने घंटे व मिनट तक होता है, यानी किसी का समय कितने घंटे व मिनट पर हुआ.
तभी मेरे दिमाग में एक सवाल कौंधा कि जन्म प्रमाणपत्र में तो सिर्फ तारीख व साल मांगते हैं, इस को समय की जरूरत क्यों पड़ी?
‘‘भाई, तुम्हें अपने जन्म के समय की जरूरत क्यों पड़ी?’’ मैं ने उस से हैरान हो कर पूछा.
‘‘डाक्टर साहब, मैं 26 साल का हो गया हूं. मैं दुकान में से अच्छाखासा कमा लेता हूं. मैं ने कालेज तक पढ़ाई भी पूरी की है. मुझ में कोई ऐब भी नहीं है. फिर भी मेरी शादी कहीं तय नहीं हो पा रही है. मेरे सारे दोस्तों व हमउम्र रिश्तेदारों की भी शादी हो गई है.
‘‘थकहार कर घर वालों ने ज्योतिषी से शादी न होने की वजह पूछी. तो उस ने कहा, ‘तुम्हारी जन्मकुंडली देखनी पड़ेगी, तभी वजह पता चल सकेगी और कुंडली बनाने के लिए साल, तारीख व जन्म के समय की जरूरत पड़ेगी.’
‘‘मेरी मां को जन्म की तारीख तो याद है, पर सही समय का पता नहीं. उन्हें सिर्फ इतना पता है कि मेरा जन्म आधी रात को इसी सरकारी अस्पताल में हुआ था.
‘‘बस साहब, उसी जन्म के समय के लिए धक्के खा रहा हूं, ताकि मेरा बाकी जन्म सुधर जाए. शायद जन्म का सही समय अस्पताल के रिकौर्ड से मिल जाए.’’
‘‘मेरे साथ आओ,’’ अचानक मैं ने उठते हुए कहा. वह उम्मीद के साथ उठ खड़ा हुआ.
‘‘यह कागज व पैन अपने साथ रखो,’’ मैं ने क्लिप बोर्ड से एक पन्ना निकाल कर कहा.
‘‘वह किसलिए?’’ अब उस के चौंकने की बारी थी.
‘‘समय लिखने के लिए,’’ मैं ने उसे छोटा सा जवाब दिया.
‘‘मेरी दीवार घड़ी में जितना समय हुआ है, वह लिखो,’’ मैं ने दीवार घड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा.
उस ने हैरानी से लिखा. सामने ही डिलीवरी रूम था. उस समय डिलीवरी रूम खाली था. कोई जच्चा नहीं थी. डिलीवरी रूम में कभी भी मर्द को दाखिल होने की इजाजत नहीं होती है. मैं उसे वहां ले गया. वह भी हिचक के साथ अंदर घुसा.
मैं ने उस कमरे की घड़ी की ओर इशारा करते हुए उस का समय नोट करने को कहा, ‘‘अब तुम मेरी कलाई घड़ी और अपनी कलाई घड़ी का समय इस कागज में नोट करो.’’
उस ने मेरे कहे मुताबिक सारे समय नोट किए.
‘‘अच्छा, बताओ सारे समय?’’ मैं ने वापस चैंबर में आ कर कहा.
‘‘आप की घड़ी का समय दोपहर 2.05, मेरी घड़ी का समय दोपहर 2.09, डिलीवरी रूम का समय दोपहर 2.08 और आप के चैंबर का समय दोपहर 2.01 बजे,’’ जैसेजैसे वह बोलता गया, खुद उस के शब्दों में हैरानी बढ़ती जा रही थी.
‘‘सभी घडि़यों में अलगअलग समय है,’’ उस ने इस तरह से कहा कि जैसे दुनिया में उस ने नई खोज की हो.
‘‘देखा तुम ने अपनी आंखों से, सब का समय अलगअलग है. हो सकता है कि तुम्हारे ज्योतिषी की घड़ी का समय भी अलग हो. और जिस ने पंचांग बनाया हो, उस की घड़ी में उस समय क्या बजा होगा, किस को मालूम?
‘‘जब सभी घडि़यों में एक ही समय में इतना फर्क हो, तो जन्म का सही समय क्या होगा, किस को मालूम?
‘‘जिस केस पेपर को तुम ढूंढ़ रहे हो, जिस में डाक्टर या नर्स ने तुम्हारा जन्म समय लिखा होगा, वह समय सही होगा कि गलत, किस को पता?
‘‘मैं ने सुना है कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक पल का फर्क भी ग्रह व नक्षत्रों की जगह में हजारों किलोमीटर में हेरफेर कर देता है. तुम्हारे जन्म समय में तो मिनटों का फर्क हो सकता है.
‘‘सुनो भाई, तुम्हारी शादी न होने की वजह यह लाखों किलोमीटर दूर के बेचारे ग्रहनक्षत्र नहीं हैं. हो सकता है कि तुम्हारी शादी न होने की वजह कुछ और ही हो. शादियां सिर्फ कोशिशों से होती हैं, न कि ग्रहनक्षत्रों से,’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा.
‘‘डाक्टर साहब, आप ने घडि़यों के समय का फर्क बता कर मेरी आंखें खोल दीं. इतना पढ़नेलिखने के बावजूद भी मैं सिर्फ निराशा के चलते इन अंधविश्वासों के फेर में फंस गया. मैं फिर से कोशिश करूंगा कि मेरी शादी जल्दी से हो जाए.’’ अब उस शख्स के चेहरे पर निराशा की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की चमक थी.
शाम हो चुकी थी. धीरेधीरे करते हुए इशहाक को पार्क में आए काफी देर हो चुकी थी. न जाने क्या बात थी, जो उसे कसक रही थी. खामोश सा कुछ वह सोचता हुआ चला जा रहा था, ‘आखिर मैं कैसे बताऊं शबाना को कि मैं उस के लायक नहीं हूं. मैं अभी तक बेकार हूं और वह मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही है.
‘मेरा परिवार गरीब और उस के पिता नामीगिरामी वकील. कहीं भी तो बराबरी नहीं…’ सोचतेसोचते उस का मन किया कि वह शहर से बाहर चला जाए, फिर वह आगे सोचने लगा, ‘अगर मैं बिना बताए बाहर निकल भी जाऊं तो अम्मी का क्या होगा… वे तो सदमे से मर जाएंगी. अब्बा चल भी नहीं पाते, उन्हें कौन सहारा देगा… रुखसार की शादी कैसे होगी… बाहर चले जाने पर भी नौकरी मिलने की कोई गारंटी नहीं है…’
तभी एक आवाज ने इशहाक को चौंका दिया, ‘‘अरे इशहाक साहब, जरा मेरी तरफ भी थोड़ा देख लीजिए, कब से मैं आप के पास खड़ी हूं,’’ यह शबाना थी, जो औफिस से लौट कर इशहाक से मिलने आई थी.
इशहाक मुसकराया और बोला, ‘‘आओ शब्बो, बैठो. तुम्हारे औफिस में आज कुछ देर से छुट्टी हुई… क्या आज काम ज्यादा था?’’
‘‘नहीं, काम तो रोज के हिसाब से था, लेकिन औफिशियल मीटिंग में देर हुई…’’ शबाना ने बैंच पर बैठते हुए कहा, ‘‘तुम्हें मेरे लिए काफी देर तक बैठना पड़ा… सौरी.’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,’’ इशहाक बोला.
शबाना गौर से इशहाक के चेहरे की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘कुछ ऐसा क्यों नहीं करते कि हमारा इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो जाता…’’
इशहाक ने शबाना के चेहरे की तरफ एकबारगी देखा और खामोश ही रहा.
शबाना ने दोहराते हुए पूछा, ‘‘कोई बात है क्या? इतने चुप क्यों हो?’’
‘‘नहीं, कोई बात नहीं. और सुनाओ, आज का दिन औफिस में कैसा गुजरा?’’ इशहाक ने बात टालते हुए कहा.
‘‘ईशु मियां, बात टालते हुए अरसा गुजर रहा है. अब हमें अपनी जिंदगी को जवाब देना है. आखिर कब तक हम जिंदगी के सब से अहम सवाल को यों ही टालते रहेंगे?
‘‘तुम अच्छी तरह से जानते हो कि मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती. अब वक्त बहुत बीत गया है, इसलिए निकाह बहुत जरूरी है. तुम मेरे अब्बू से क्यों नहीं मिलते?’’ शबाना ने इशहाक को झकझोरते हुए कहा.
‘‘शब्बो, यह इतना आसान नहीं है. तुम समझने की कोशिश तो करो, मैं कैसे अब्बू से मिलूं. हजार सवाल पूछे जाएंगे. सब से बड़ा सवाल होगा कि मैं क्या करता हूं? तुम्हीं ही बताओ कि इस सवाल का मैं क्या जवाब दूं?
‘‘कैसे बताऊं कि मैं एमबीए करने के बाद भी बेकार हूं और मेरे पास रहने के लिए अपना घर तक नहीं है. तुम्हारे अब्बू किसी ऐसे आदमी से तुम्हारे निकाह के लिए कैसे हां कर सकते हैं?
‘‘मेरी बात मानो, तो मुझे भूलने की कोशिश करो. मैं तुम्हें कैसे खुश रख सकता हूं, जिस के पास न तो कोई नौकरी है और न ही रहने के लिए घर.
‘‘तुम एक बड़े घर में रहने वाली और बड़ी कंपनी में काम करने वाली खूबसूरत लड़की हो. और मैं…’’ इशहाक की आवाज कांप रही थी. उसे लग रहा था कि वह रो देगा. वह किसी तरह खुद को संभाल पा रहा था.
‘‘ईशू, यह आज क्या हो गया है तुम्हें? कैसी बातें कर रहे हो… तुम बेहद काबिल हो. आज नहीं तो कल नौकरी मिल ही जाएगी. इस तरह निराश मत हो और मुझ से ऐसी बातें मत करो.
‘‘तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी. रही बात अब्बू की, तो वे वकील हैं और उन की जिंदगी की शुरुआत बहुत ही खराब थी. उन्होंने काफी जद्दोजेहद की है और बहुत दर्द सहने के बाद आज इस मुकाम पर पहुंच सके हैं.
‘‘उन्हें धनदौलत और शोहरत वाला लड़का नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा कोई हो, जो मुझे प्यार करे और मेरे जज्बात को तवज्जुह दे.
‘‘वे अकसर कहते हैं कि शबाना की शादी मैं ऐसे लड़के से करूंगा, जो भले ही गरीब हो, लेकिन काबिल हो सब से अहम बात कि वह शबाना से बेहद प्यार करता हो.
‘‘ईशु, तुम एक बार मिल कर बात तो करो. कल इतवार है और सब लोग घर पर ही रहेंगे. तुम कल मेरे घर आ जाओ. तुम बिलकुल मत घबराओ. मैं वहीं रहूंगी और हमेशा तुम्हारे साथ हूं,’’ शबाना ने इशहाक का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा.
‘‘लेकिन शब्बो, कुछ अनहोनी न हो जाए,’’ इशहाक ने घबराहट में कहा.
‘‘जोकुछ भी होगा, हमारे साथ होगा… मैं साथ रहूंगी,’’ शबाना ने बहुत आत्मविश्वास से कहा और थोड़ी देर के बाद वह चली गई.
दूसरे दिन इशहाक बड़ी हिम्मत कर के शबाना के घर पहुंचा. उस समय शबाना के अब्बू बैठक में ही बैठे थे.
‘‘अब्बू, ये इशहाक हैं और मेरे साथ पढ़े हैं. मैं इन्हें अच्छी तरह से जानती
हूं. ये आप से मिलने आए हैं,’’ शबाना
ने कहा.
‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है कि तुम इन्हें जानती हो. बैठो बेटा. मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’ अब्बू ने पूछा.
‘‘मैं ने एमबीए फर्स्ट क्लास में पास किया है, पर कितनी कोशिश के बाद भी मुझे नौकरी नहीं मिली,’’ इशहाक बोला.
‘‘इस में परेशान होने की बात नहीं है बेटा, आज नहीं तो कल कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी, बस कोशिश करते रहना चाहिए.’’
‘‘अब्बू, मैं भी इन से यही कहती हूं कि कोशिश करने वाले कभी हारते नहीं,’’ शबाना ने बीच में दखल देते हुए कहा.
‘‘हां, जिंदगी में उतारचढ़ाव तो आते रहते हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. वैसे, मेरे एक दोस्त हैं… उन का कुछ असरदार लोगों से परिचय है. मैं उन से बात करूंगा. हो सकता है कि तुम्हारा काम हो जाए. तुम कल शाम को मुझ से मिलो,’’ कहते हुए शबाना के अब्बू उठ कर बाहर चले गए.
बैठक में शबाना और इशहाक रह गए. ‘‘ईशु मियां, ऐसे तो तुम कभी अपनी बात नहीं कह पाओगे,’’ शबाना ने रूठते हुए कहा. खैर, अगले दिन शाम को फिर इशहाक शबाना के घर पहुंचा.
‘‘आओ बेटा, शबाना तुम्हारे बारे में ही बात कर रही थी,’’ शबाना के अब्बू ने कहा.
इशहाक के चेहरे पर कई तरह के भाव आए. कुछ घबराहट सी हुई कि कहीं शबाना ने सारी बात तो नहीं बता दी. वह चुपचाप बैठ गया.
‘‘मैं ने तुम्हारे बारे में बात की है. हो सकता है कि तुम्हारा काम हो जाए, लेकिन तुम्हें मैं जहां भेज रहा हूं, वहां जा कर मेरे दोस्त से मिलना होगा. और जो वे कहें, वह मानना पड़ेगा,’’ शबाना के अब्बू ने इशहाक से कहा.
‘‘जी, मैं तैयार हूं,’’ इशहाक बोला.
‘‘तो ठीक है. मेरा खत ले कर जाओ और उन से मिलो,’’ वकील साहब ने इशहाक को खत देते हुए कहा.
इशहाक खत ले कर वकील साहब के दोस्त के यहां पहुंचा. खत पढ़ कर उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है. मैं आप का काम करा दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है.’’
‘‘कैसी शर्त?’’ इशहाक ने पूछा.
‘‘शर्त यह है कि नौकरी मिलने के बाद आप को मेरी बेटी से शादी करनी होगी.’’
‘‘लेकिन, मैं यह शादी नहीं कर सकता. मैं किसी और से प्यार करता हूं और मैं ने उस से शादी का वादा किया है,’’ इशहाक ने जोर दे कर कहा.
‘‘देखो, मेरी बेटी से शादी करने के बाद ही मैं तुम्हारे लिए कुछ सोच सकता हूं, इसलिए तुम्हें एक दिन का मौका है… सोचसमझ लो और चाहो तो मेरी बेटी से मिल भी सकते हो,’’ वकील साहब के दोस्त ने कड़े लहजे में कहा.
इशहाक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वह शबाना को किसी भी हालत में छोड़ने की सोच भी नहीं सकता था और नौकरी उस के लिए बहुत जरूरी थी. प्यार के नाम पर वह कोई समझौता नहीं कर सकता था.
‘‘ठीक है अंकल, मैं कल सोच कर जवाब दूंगा,’’ कहते हुए इशहाक चला आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा, ‘क्या शबाना के अब्बू ने जानबूझ कर मुझे ऐसे आदमी के पास भेजा था या
मेरी मजबूरी का फायदा उठाते हुए मुझे जानबूझ कर शबाना से अलग करने की चाल है? क्या शबाना को यह सब पता है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,’ यह सोचते हुए उसे नींद आ गई.
अगले दिन इशहाक मन में कुछ सोच कर शबाना के अब्बू से मिलने उस के घर गया. शबाना घर पर ही मिल गई. उस ने शबाना को सारी बात बताई.
पहले तो शबाना को यकीन ही नहीं हुआ, फिर वह इशहाक का हाथ पकड़ कर बैठक में गई. वहां उस के अब्बू अपने किसी मुवक्किल से बात कर रहे थे. अचानक ऐसे शबाना के अंदर आने से वे चौंक गए.
‘‘अब्बू, यह आप ने क्या किया है… जब आप को मालूम था कि अंकल ऐसे हैं, तो आप ने इशहाक को उन के पास क्यों भेजा?’’ शबाना ने गुस्से में भर कर कहा.
शबाना के अब्बू को अंदाजा हो गया था कि शबाना और इशहाक एकदूसरे के बहुत करीब हैं, लेकिन मौजूदा हालात की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.
‘‘बेटा, पहले कमरे में चलो. वहां बात करते हैं,’’ कहते हुए वे उन दोनों को भी कमरे में ले आए.
‘‘हां, अब बताओ कि क्या बात है. और इशहाक, तुम्हारे साथ कल क्या हुआ?’’
इशहाक ने सारी बात बताई.
‘‘अब्बू बताइए कि आप ने ऐसे आदमी के पास इशहाक को क्यों भेजा?’’ शबाना ने पूछा.
‘‘बेटा, यह बात मुझे पहले से मालूम थी कि उन की लड़की ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं है और मानसिक रूप विकलांग है. लेकिन यह सच नहीं है कि मैं ने इशहाक को उन के पास इसलिए भेजा कि वह नौकरी के लिए उन की लड़की से शादी कर ले. मुझे इस का अंदाजा भी नहीं था कि वे ऐसा करेंगे,’’ वकील साहब ने अपनी बात समझाने की कोशिश की.
‘‘पर अब्बू, इशहाक और मैं शादी करना चाहते हैं और आप हमें इजाजत दीजिए,’’ शबाना ने एकदम से कह दिया.
इशहाक चुपचाप खड़ा रहा. थोड़ी देर तक वहां सन्नाटा पसर गया और वकील साहब भी अवाक खड़े रह गए. फिर वे सामने कुरसी पर बैठ गए और उन दोनों को भी बैठने को कहा.
बैठने से पहले शबाना गिलास में पानी ले कर आई और अब्बू को दिया, फिर वह बोली, ‘‘अब्बू, आप ने ही सिखाया था कि मांबाप से दिल की बात साफसाफ कह देनी चाहिए. इशहाक गरीब जरूर है, लेकिन इस में आत्मसम्मान बहुत ज्यादा है. सब से खास बात तो यह है कि यह काबिल है. हम एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं और हर हाल में खुश रहेंगे,’’ शबाना ने अपने अब्बू से सबकुछ कह डाला.
‘‘अब्बू, मैं वादा करता हूं कि शबाना को हमेशा खुश रखूंगा और चाहे कैसे भी हालात हों, हम मिल कर उन का सामना करेंगे और हमेशा खुश रहेंगे,’’ इशहाक ने भी कहा.
‘‘अच्छा ठीक है. लेकिन, मैं लड़की वाला हूं, तो मुझे तो रिश्ता मांगने इशहाक के मांबाप से मिलने जाना होगा. जब तक शादी की तारीख तय न हो जाए, तब तक के लिए मुझे वक्त चाहिए.
‘‘इशहाक, तुम मेरे साथ 2 दिन बाद चलोगे, जहां तुम्हारी नौकरी की बात शबाना के मामू की कंपनी में करनी है. शादी की तारीख तक मुझे तुम्हारी नौकरी पक्की करानी है. अब तो मेरा काम बढ़ गया है. जल्दी से जल्दी शादी की तारीख निकलवाने की कोशिश करूंगा.’’
इतना कह कर वकील साहब ने शबाना और इशहाक को अपने गले से लगा लिया. शबाना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.
12 साल की स्वरा शाम को खेलकूद कर वापस आई. दरवाजे की घंटी बजाई तो सामने किसी अजनबी युवक को देख कर चकित रह गई. तब तक अंदर से उस की मां सुदीपा बाहर निकली और मुसकराते हुए बेटी से कहा, ‘‘बेटे यह तुम्हारी मम्मा के फ्रैंड अविनाश अंकल हैं. नमस्ते करो अंकल को.’’
‘‘नमस्ते मम्मा के फ्रैंड अंकल,’’ कह कर हौले से मुसकरा कर वह अपने कमरे में चली आई और बैठ कर कुछ सोचने लगी.
कुछ ही देर में उस का भाई विराज भी घर लौट आया. विराज स्वरा से 2-3 साल बड़ा था.
विराज को देखते ही स्वरा ने सवाल किया, ‘‘भैया आप मम्मा के फ्रैंड से मिले?’’
‘‘हां मिला, काफी यंग और चार्मिंग हैं. वैसे 2 दिन पहले भी आए थे. उस दिन तू कहीं गई
हुई थी?’’
‘‘वे सब छोड़ो भैया. आप तो मुझे यह बताओ कि वह मम्मा के बौयफ्रैंड हुए न?’’
‘‘यह क्या कह रही है पगली, वे तो बस फ्रैंड हैं. यह बात अलग है कि आज तक मम्मा की सहेलियां ही घर आती थीं. पहली बार किसी लड़के से दोस्ती की है मम्मा ने.’’
‘‘वही तो मैं कह रही हूं कि वह बौय भी है और मम्मा का फ्रैंड भी यानी वे बौयफ्रैंड ही तो हुए न,’’ स्वरा ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘ज्यादा दिमाग मत दौड़ा. अपनी पढ़ाई कर ले,’’ विराज ने उसे धौल जमाते हुए कहा.
थोड़ी देर में अविनाश चला गया तो सुदीपा की सास अपने कमरे से बाहर आती हुई थोड़ी नाराजगी भरे स्वर में बोलीं, ‘‘बहू क्या बात है, तेरा यह फ्रैंड अब अकसर घर आने लगा है?’’
‘‘अरे नहीं मम्मीजी वह दूसरी बार ही तो आया था और वह भी औफिस के किसी काम के सिलसिले में.’’
‘‘मगर बहू तू तो कहती थी कि तेरे औफिस में ज्यादातर महिलाएं हैं. अगर पुरुष हैं भी तो वे अधिक उम्र के हैं, जबकि यह लड़का तो तुझ से भी छोटा लग रहा था.’’
‘‘मम्मीजी हम समान उम्र के ही हैं. अविनाश मुझ से केवल 4 महीने छोटा है. ऐक्चुअली हमारे औफिस में अविनाश का ट्रांसफर हाल ही में हुआ है. पहले उस की पोस्टिंग हैड औफिस मुंबई में थी. सो इसे प्रैक्टिकल नौलेज काफी ज्यादा है. कभी भी कुछ मदद की जरूरत होती है तो तुरंत आगे आ जाता है. तभी यह औफिस में बहुत जल्दी सब का दोस्त बन गया है. अच्छा मम्मीजी आप बताइए आज खाने में क्या बनाऊं?’’
‘‘जो दिल करे बना ले बहू, पर देख लड़कों से जरूरत से ज्यादा मेलजोल बढ़ाना सही नहीं होता… तेरे भले के लिए ही कह रही हूं बहू.’’
‘‘अरे मम्मीजी आप निश्चिंत रहिए. अविनाश बहुत अच्छा लड़का है,’’ कह कर हंसती हुई सुदीपा अंदर चली गई, मगर सास का चेहरा बना रहा.
रात में जब सुदीपा का पति अनुराग घर लौटा तो खाने के बाद सास ने अनुराग को कमरे में बुलाया और धीमी आवाज में उसे अविनाश के बारे में सबकुछ बता दिया.
अनुराग ने मां को समझाने की कोशिश की, ‘‘मां आज के समय में महिलाओं और पुरुषों की दोस्ती आम बात है. वैसे भी आप जानती ही हो सुदीपा कितनी समझदार है. आप टैंशन क्यों लेती हो मां?’’
‘‘बेटा मेरी बूढ़ी हड्डियों ने इतनी दुनिया देखी है जितनी तू सोच भी नहीं सकता. स्त्रीपुरुष की दोस्ती यानी घी और आग की दोस्ती. आग पकड़ते समय नहीं लगता बेटे. मेरा फर्ज था तुझे समझाना सो समझा दिया.’’
‘‘डौंट वरी मां ऐसा कुछ नहीं होगा. अच्छा मैं चलता हूं सोने,’’ अविनाश मां के पास से तो उठ कर चला आया, मगर कहीं न कहीं उन की बातें देर तक उस के जेहन में घूमती रहीं. वह सुदीपा से बहुत प्यार करता था और उस पर पूरा यकीन भी था. मगर आज जिस तरह मां शक जाहिर कर रही थीं उस बात को वह पूरी तरह इग्नोर भी नहीं कर पा रहा था.
रात में जब घर के सारे काम निबटा कर सुदीपा कमरे में आई तो अविनाश ने उसे छेड़ने के अंदाज में कहा, ‘‘मां कह रही थीं आजकल आप की किसी लड़के से दोस्ती हो गई है और वह आप के घर भी आता है.’’
पति के भाव समझते हुए सुदीपा ने भी उसी लहजे में जवाब दिया, ‘‘जी हां आप ने सही सुना है. वैसे मां तो यह भी कह रही होंगी कि कहीं मुझे उस से प्यार न हो जाए और मैं आप को चीट न करने लगूं.’’
‘‘हां मां की सोच तो कुछ ऐसी ही है, मगर मेरी नहीं. औफिस में मुझे भी महिला सहकर्मियों से बातें करनी होती हैं पर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं कुछ और सोचने लगूं. मैं तो मजाक कर रहा था.’’
‘‘आई नो ऐंड आई लव यू,’’ प्यार से सुदीपा ने कहा.
‘‘ओहो चलो इसी बहाने ये लफ्ज इतने दिनों बाद सुनने को तो मिल गए,’’ अविनाश ने उसे बांहों में भरते हुए कहा.
सुदीपा खिलखिला कर हंस पड़ी. दोनों देर तक प्यारभरी बातें करते रहे.
वक्त इसी तरह गुजरने लगा. अविनाश अकसर सुदीपा के घर आ जाता. कभीकभी दोनों बाहर भी निकल जाते. अनुराग को कोई एतराज नहीं था, इसलिए सुदीपा भी इस दोस्ती को ऐंजौय कर रही थी. साथ ही औफिस के काम भी आसानी से निबट जाते.
सुदीपा औफिस के साथ घर भी बहुत अच्छी तरह से संभालती थी. अनुराग को इस मामले में भी पत्नी से कोई शिकायत नहीं थी.
मां अकसर बेटे को टोकतीं, ‘‘यह सही नहीं है अनुराग. तुझे फिर कह रही हूं, पत्नी को किसी और के साथ इतना घुलनमलने देना उचित नहीं.’’
‘‘मां ऐक्चुअली सुदीपा औफिस के कामों में ही अविनाश की हैल्प लेती है. दोनों एक ही फील्ड में काम कर रहे हैं और एकदूसरे को अच्छे से समझते हैं. इसलिए स्वाभाविक है कि काम के साथसाथ थोड़ा समय संग बिता लेते हैं. इस में कुछ कहना मुझे ठीक नहीं लगता मां और फिर तुम्हारी बहू इतना कमा भी तो रही है. याद करो मां जब सुदीपा घर पर रहती थी तो कई दफा घर चलाने के लिए हमारे हाथ तंग हो जाते थे. आखिर बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सके इस के लिए सुदीपा का काम करना भी तो जरूरी है न फिर जब वह घर संभालने के बाद काम करने बाहर जा रही है तो हर बात पर टोकाटाकी भी तो अच्छी नहीं लगती न.’’
‘‘बेटे मैं तेरी बात समझ रही हूं पर तू मेरी बात नहीं समझता. देख थोड़ा नियंत्रण भी जरूरी है बेटे वरना कहीं तुझे बाद में पछताना न पड़े,’’ मां ने मुंह बनाते हुए कहा.
‘‘ठीक है मां मैं बात करूंगा,’’ कह कर अनुराग चुप हो गया.
एक ही बात बारबार कही जाए तो वह कहीं न कहीं दिमाग पर असर डालती है. ऐसा ही कुछ अनुराग के साथ भी होने लगा था. जब काम के बहाने सुदीपा और अविनाश शहर से बाहर जाते तो अनुराग का दिल बेचैन हो उठता. उसे कई दफा लगता कि सुदीपा को अविनाश के साथ बाहर जाने से रोक ले या डांट लगा दे. मगर वह ऐसा कर नहीं पाता. आखिर उस की गृहस्थी की गाड़ी यदि सरपट दौड़ रही है तो उस के पीछे कहीं न कहीं सुदीपा की मेहनत ही तो थी.
इधर बेटे पर अपनी बातों का असर पड़ता न देख अनुराग के मांबाप ने अपने पोते और पोती यानी बच्चों को उकसाना शुरू का दिया. एक दिन दोनों बच्चों को बैठा कर वे समझाने लगे, ‘‘देखो बेटे आप की मम्मा की अविनाश अंकल से दोस्ती ज्यादा ही बढ़ रही है. क्या आप दोनों को नहीं लगता कि मम्मा आप को या पापा को अपना पूरा समय देने के बजाय अविनाश अंकल के साथ घूमने चली जाती है?’’
‘‘दादीजी मम्मा घूमने नहीं बल्कि औफिस के काम से ही अविनाश अंकल के साथ जाती हैं,’’ विराज ने विरोध किया.
‘‘ भैया को छोड़ो दादीजी पर मुझे भी ऐसा लगता है जैसे मम्मा हमें सच में इग्नोर करने लगी हैं. जब देखो ये अंकल हमारे घर आ जाते हैं या मम्मा को ले जाते हैं. यह सही नहीं.’’
‘‘हां बेटे मैं इसीलिए कह रही हूं कि थोड़ा ध्यान दो. मम्मा को कहो कि अपने दोस्त के साथ नहीं बल्कि तुम लोगों के साथ समय बिताया करे.’’
उस दिन संडे था. बच्चों के कहने पर सुदीपा और अनुराग उन्हें ले कर वाटर पार्क जाने वाले थे.
दोपहर की नींद ले कर जैसे ही दोनों बच्चे तैयार होने लगे तो मां को न देख कर दादी के पास पहुंचे, ‘‘दादीजी मम्मा कहां हैं… दिख नहीं रहीं?’’
‘‘तुम्हारी मम्मा गई अपने फ्रैंड के साथ.’’
‘‘मतलब अविनाश अंकल के साथ?’’
‘‘हां.’’
‘‘लेकिन उन्हें तो हमारे साथ जाना था. क्या हम से ज्यादा बौयफ्रैंड इंपौर्टैं हो गया?’’ कह कर स्वरा ने मुंह फुला लिया. विराज भी उदास हो गया.
लोहा गरम देख दादी मां ने हथौड़ा मारने की गरज से कहा, ‘‘यही तो मैं कहती आ रही हूं इतने समय से कि सुदीपा के लिए अपने बच्चों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण वह पराया आदमी हो गया है. तुम्हारे बाप को तो कुछ समझ ही नहीं आता.’’
‘‘मां प्लीज ऐसा कुछ नहीं है. कोई जरूरी काम आ गया होगा,’’ अनुराग ने सुदीपा के बचाव में कहा.
‘‘पर पापा हमारा दिल रखने से जरूरी और कौन सा काम हो गया भला?’’ कह कर विराज गुस्से में उठा और अपने कमरे में चला गया. उस ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.
स्वरा भी चिढ़ कर बोली, ‘‘लगता है मम्मा को हम से ज्यादा प्यार उस अविनाश अंकल से हो गया है,’’ और फिर वह भी पैर पटकती अपने कमरे में चली गई.
शाम को जब सुदीपा लौटी तो घर में सब का मूड औफ था. सुदीपा ने बच्चों को समझाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे अविनाश अंकल के पैर में गहरी चोट लग गई थी. तभी मैं उन्हें ले कर अस्पताल गई.’’
‘‘मम्मा आज हम कोई बहाना नहीं सुनने वाले. आप ने अपना वादा तोड़ा है और वह भी अविनाश अंकल की खातिर. हमें कोई बात नहीं करनी,’’ कह कर दोनों वहां से उठ कर चले गए.
स्वरा और विराज मां की अविनाश से इन नजदीकियों को पसंद नहीं कर रहे थे. वे अपनी ही मां से कटेकटे से रहने लगे. गरमी की छुट्टियों के बाद बच्चों के स्कूल खुल गए और विराज अपने होस्टल चला गया.
इधर सुदीपा के सासससुर ने इस दोस्ती का जिक्र उस के मांबाप से भी कर दिया. सुदीपा के मांबाप भी इस दोस्ती के खिलाफ थे. मां ने सुदीपा को समझाया तो पिता ने भी अनुराग को सलाह दी कि उसे इस मामले में सुदीपा पर थोड़ी सख्ती करनी चाहिए और अविनाश के साथ बाहर जाने की इजाजत कतई नहीं देनी चाहिए.
इस बीच स्वरा की दोस्ती सोसाइटी के एक लड़के सुजय से हो गई. वह स्वरा से 2-4 साल बड़ा था यानी विराज की उम्र का था. वह जूडोकराटे में चैंपियन और फिटनैस फ्रीक लड़का था. स्वरा उस की बाइक रेसिंग से भी बहुत प्रभावित थी. वे दोनों एक ही स्कूल में थे. दोनों साथ स्कूल आनेजाने लगे. सुजय दूसरे लड़कों की तरह नहीं था. वह स्वरा को अच्छी बातें बताता. उसे सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग देता और स्कूटी चलाना भी सिखाता. सुजय का साथ स्वरा को बहुत पसंद आता.
एक दिन स्वरा सुजय को अपने साथ घर ले आई. सुदीपा ने उस की अच्छे से आवभगत की. सब को सुजय अच्छा लड़का लगा इसलिए किसी ने स्वरा से कोई पूछताछ नहीं की. अब तो सुजय अकसर ही घर आने लगा. वह स्वरा की मैथ्स की प्रौब्लम भी सौल्व कर देता और जूडोकराटे भी सिखाता रहता.
एक दिन स्वरा ने सुदीपा से कहा, ‘‘मम्मा आप को पता है सुजय डांस भी जानता है. वह कह रहा था कि मुझे डांस सिखा देगा.’’
‘‘यह तो बहुत अच्छा है. तुम दोनों बाहर लौन में या फिर अपने कमरे में डांस की प्रैक्टिस कर सकते हो.’’
‘‘मम्मा आप को या घर में किसी को एतराज तो नहीं होगा?’’ स्वरा ने पूछा.
‘‘अरे नहीं बेटा. सुजय अच्छा लड़का है. वह तुम्हें अच्छी बातें सिखाता है. तुम दोनों क्वालिटी टाइम स्पैंड करते हो. फिर हमें ऐतराज क्यों होगा? बस बेटा यह ध्यान रखना सुजय और तुम फालतू बातों में समय मत लगाना. काम की बातें सीखो, खेलोकूदो, उस में क्या बुराई है?’’
‘‘ओके थैंक यू मम्मा,’’ कह कर स्वरा खुशीखुशी चली गई.
अब सुजय हर संडे स्वरा के घर आ जाता और दोनों डांस प्रैक्टिस करते. समय इसी तरह बीतता रहा. एक दिन सुदीपा और अनुराग किसी काम से बाहर गए हुए थे.
घर में स्वरा दादीदादी के साथ अकेली थी. किसी काम से सुजय घर आया तो स्वरा उस से मैथ्स की प्रौब्लम सौल्व कराने लगी. इसी बीच अचानक स्वरा को दादी के कराहने और बाथरूम में गिरने की आवाज सुनाई दी.
स्वरा और सुजय दौड़ कर बाथरूम पहुंचे तो देखा दादी फर्श पर बेहोश पड़ी हैं. स्वरा के दादा ऊंचा सुनते थे. उन के पैरों में भी तकलीफ रहती थी. वे अपने कमरे में सोए थे. स्वरा घबरा कर रोने लगी तब सुजय ने उसे चुप कराया और जल्दी से ऐंबुलैंस वाले को फोन किया. स्वरा ने अपने मम्मीडैडी को भी हर बात बता दी. इस बीच सुजय जल्दी से दादी को ले कर पास के अस्पताल भागा. उस ने पहले ही अपने घर से रुपए मंगा लिए थे. अस्पताल पहुंच कर उस ने बहुत समझदारी के साथ दादी को एडमिट करा दिया और प्राथमिक इलाज शुरू कराया. उन को हार्ट अटैक आया था. अब तक स्वरा के मांबाप भी हौस्पिटल पहुंच गए थे.
डाक्टर ने सुदीपा और अनुराग से सुजय की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘इस लड़के ने जिस फुरती और समझदारी से आप की मां को हौस्पिटल पहुंचाया वह काबिलेतारीफ है. अगर ज्यादा देर हो जाती तो समस्या बढ़ सकती थी यहां तक कि जान को भी खतरा हो सकता था.’’
सुदीपा ने बढ़ कर सुजय को गले से लगा लिया. अनुराग और उस के पिता ने भी नम आंखों से सुजय का धन्यवाद कहा. सब समझ रहे थे कि बाहर का एक लड़का आज उन के परिवार के लिए कितना बड़ा काम कर गया. हालात सुधरने पर स्वरा की दादी को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई
घर लौटने पर दादी ने सुजय का हाथ पकड़ कर गदगद स्वर में कहा, ‘‘आज मुझे पता चला कि दोस्ती का रिश्ता इतना खूबसूरत होता है. तुम ने मेरी जान बचा कर इस बात का एहसास दिला दिया बेटे कि दोस्ती का मतलब क्या है.’’
‘‘यह तो मेरा फर्ज था दादीजी,’’ सुजय ने हंस कर कहा.
तब दादी ने सुदीपा की तरफ देख कर ग्लानि भरे स्वर में कहा, ‘‘मुझे माफ कर दे बहू. दोस्ती तो दोस्ती होती है, बच्चों की हो या बड़ों की. तेरी और अविनाश की दोस्ती पर शक कर के हम ने बहुत बड़ी भूल कर दी. आज मैं समझ सकती हूं कि तुम दोनों की दोस्ती कितनी प्यारी होगी. आज तक मैं समझ ही नहीं पाई थी.’’
सुदीपा बढ़ कर सास के गले लगती हुई बोली, ‘‘मम्मीजी आप बड़ी हैं. आप को मुझ से माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं. आप अविनाश को जानती नहीं थीं, इसलिए आप के मन में सवाल उठ रहे थे. यह बहुत स्वाभाविक था. पर मैं उसे पहचानती हूं, इसलिए बिना कुछ छिपाए उस रिश्ते को आप के सामने ले कर आई थी.’’
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सुदीपा ने दरवाजा खोला तो सामने हाथों में फल और गुलदस्ता लिए अविनाश खड़ा था. घबराए हुए स्वर में उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सुना है कि अम्मांजी की तबीयत खराब हो गई है. अब कैसी हैं वे?’’
‘‘बस तुम्हें ही याद कर रही थीं,’’ हंसते हुए सुदीपा ने कहा और हाथ पकड़ कर उसे अंदर ले आई.
हर मांबाप का सपना होता है कि उन के बच्चे खूब पढ़ेंलिखें, अच्छी नौकरी पाएं. समीर ने बीए पास करने के साथ एक नौकरी भी ढूंढ़ ली ताकि वह अपनी आगे की पढ़ाई का खर्चा खुद उठा सके. उस की बहन रितु ने इस साल इंटर की परीक्षा दी थी. दोनों की आयु में 3 वर्ष का अंतर था. रितु 19 बरस की हुई थी और समीर 22 का हुआ था.
मां हमेशा से सोचती आई थीं कि बेटे की शादी से पहले बेटी के हाथ पीले कर दें तो अच्छा है. मां की यह इच्छा जानने पर समीर ने मां को समझाया कि आजकल के समय में लड़की का पढ़ना उतना ही जरूरी है जितना लड़के का. सच तो यह है कि आजकल लड़के पढ़ीलिखी और नौकरी करती लड़की से शादी करना चाहते हैं.
उस ने समझाया, ‘‘मैं अभी जो भी कमाता हूं वह मेरी और रितु की आगे की पढ़ाई के लिए काफी है. आप अभी रितु की शादी की चिंता न करें.’’ समीर ने रितु को कालेज में दाखिला दिलवा दिया और पढ़ाई में भी उस की मदद करता रहता. कठिनाई केवल एक बात की थी और वह थी रितु का जिद्दी स्वभाव. बचपन में तो ठीक था, भाई उस की हर बात मानता था पर अब बड़ी होने पर मां को उस का जिद्दी होना ठीक नहीं लगता क्योंकि वह हर बात, हर काम अपनी मरजी, अपने ढंग से करना चाहती थी.
पढ़ाई और नौकरी के चलते अब समीर ने बहुत अच्छी नौकरी ढूंढ़ ली थी. रितु का कालेज खत्म होते उस ने अपनी जानपहचान से रितु की नौकरी का जुगाड़ कर दिया था. मां ने जब दोबारा रितु की शादी की बात शुरू की तो समीर ने आश्वासन दिया कि अभी उसे नौकरी शुरू करने दें और वह अवश्य रितु के लिए योग्य वर ढूंढ़ने का प्रयास करेगा.
इस के साथ ही उस ने मां को बताया कि वह अपने औफिस की एक लड़की को पसंद करता है और उस से जल्दी शादी भी करना चाहता है क्योंकि उस के मातापिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं. मां यह सब सुन घबरा गईं कि पति को कैसे यह बात बताई जाए. आज तक उन की बिरादरी में विवाह मातापिता द्वारा तय किए जाते रहे थे. समीर ने पिता को सारी बात खुद बताना ठीक समझा. लड़की की पिता को पूरी जानकारी दी. पर यह नहीं बताया कि मां को सारी बात पता है. पिता खुश हुए पर कहा, ‘‘अपना निर्णय वे कल बताएंगे.’’
अगले दिन जब पिता ने अपने कमरे से आवाज दी तो वहां पहुंच समीर ने मां को भी वहीं पाया. हैरानी की बात कि बिना लड़की को देखे, बिना उस के परिवार के बारे में जाने पिता ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम खुश तो हम खुश.’’ यह बात समीर ने बाद में जानी कि पिता के जानपहचान के एक औफिसर, जो उसी के औफिस में ही थे, से वे सब जानकारी ले चुके थे.
एक समय इस औफिसर के भाई व समीर के पिता इकट्ठे पढ़े थे. औफिसर ने बहाने से लड़की को बुलाया था कुछ काम समझाने के लिए, कुछ देर काम के विषय में बातचीत चलती रही और समीर के पिता को लड़की का व्यवहार व विनम्रता भा गई थी. ‘उल्टे बांस बरेली को’, लड़की वालों के यहां से कुछ रिश्तेदार समीर के घर में बुलाए गए. उन की आवभगत व चायनाश्ते के साथ रिश्ते की बात पक्की की गई और बहन रितु ने लड्डुओं के साथ सब का मुंह मीठा कराया.
हफ्ते के बाद ही छोटे पैमाने पर दोनों का विवाह संपन्न हो गया. जोरदार स्वागत के साथ समीर व पूनम का गृहप्रवेश हुआ. अगले दिन पूनम के मायके से 2 बड़े सूटकेस लिए उस का मौसेरा भाई आया. सूटकेसों में सास, ससुर, ननद व दामाद के लिए कुछ तोहफे, पूनम के लिए कुछ नए व कुछ पहले के पहने हुए कपड़े थे. एक हफ्ते की छुट्टी ले नवदंपती हनीमून के लिए रवाना हुए और वापस आते ही अगले दिन से दोनों काम पर जाने लगे. पूनम को थोड़ा समय तो लगा ससुराल में सब की दिनचर्या व स्वभाव जानने में पर अधिक कठिनाई नहीं हुई. शीघ्र ही उस ने घर के काम में हाथ बटाना शुरू कर दिया. समीर ने मोटरसाइकिल खरीद ली थी, दोनों काम पर इकट्ठे आतेजाते थे.
समीर ने घर में एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया जो पूनम के आने से आया. उस के पिता, जो स्वभाव से कम बोलने वाले इंसान थे, अपने बच्चों की जानकारी अकसर अपनी पत्नी से लेते रहते थे और कुछ काम हो, कुछ चाहिए हो तो मां का नाम ले आवाज देते थे.
अब कभीकभी पूनम को आवाज दे बता देते थे और पूनम भी झट ‘आई पापा’ कह हाजिर हो जाती थी. समीर ने देखा कि पूनम पापा से निसंकोच दफ्तर की बातें करती या उन की सलाह लेती जैसे सदा से वह इस घर में रही हो या उन की बेटी ही हो. समीर पिता के इतने करीब कभी नहीं आ पाया, सब बातें मां के द्वारा ही उन तक पहुंचाई जाती थीं. पूनम की देखादेखी उस ने भी हिम्मत की पापा के नजदीक जाने की, बात करने की और पाया कि वह बहुत ही सरल और प्रिय इंसान हैं.
अब अकसर सब का मिलजुल कर बैठना होता था. बस, एक बदलाव भारी पड़ा. एक दिन जब वे दोनों काम से लौटे तो पाया कि पूनम की साडि़यां, कपड़े आदि बिस्तर पर बिखरे पड़े हैं. पूनम कपड़े तह कर वापस अलमारी में रख जब मां का हाथ बटाने रसोई में आई तो पूछा, ‘‘मां, आप कुछ ढूंढ़ रही थीं मेरे कमरे में.’’
‘‘नहीं तो, क्या हुआ?’
पूनम ने जब बताया तो मां को समझते देर न लगी कि यह रितु का काम है. रितु जब काम से लौटी तो पूनम की साड़ी व ज्यूलरी पहने थी. मां ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो वह साड़ी बदल, ज्यूलरी उतार गुस्से से भाभी के बैड पर पटक आई और कई दिन तक भाईभाभी से अनबोली रही.
फिर एक सुबह जब पूनम तैयार हो साड़ी के साथ का मैचिंग नैकलैस ढूंढ़ रही थी तो देर होने के कारण समीर ने शोर मचा दिया और कई बार मोटरसाइकिल का हौर्न बजा दिया. पूनम जल्दी से पहुंची और देर लगने का कारण बताया. शाम को रितु ने नैकलैस उतार कर मां को थमाया पूनम को लौटाने के लिए. ‘हद हो गई, निकाला खुद और लौटाए मां,’ समीर के मुंह से निकला.
ऐसा जब एकदो बार और हुआ तो मां ने पूनम को अलमारी में ताला लगा कर रखने को कहा पर उस ने कहा कि वह ऐसा नहीं करना चाहती. तब मां ने समीर से कहा कि वह चाहती है कि रितु को चीज मांग कर लेने की आदत हो न कि हथियाने की. मां के समझाने पर समीर रोज औफिस जाते समय ताला लगा चाबी मां को थमा जाता. अब तो रितु का अनबोलापन क्रोध में बदल गया. इसी बीच, पूनम ने अपने मायके की रिश्तेदारी में एक अच्छे लड़के का रितु के साथ विवाह का सुझाव दिया.
समीर, पूनम लड़के वालों के घर जा सब जानकारी ले आए और बाद में विचार कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दे दिया ताकि वे सब भी उन का घर, रहनसहन देख लें और लड़कालड़की एकदूसरे से मिल लें. पूनम ने हलके पीले रंग की साड़ी और मैचिंग ज्यूलरी निकाल रितु को उस दिन पहनने को दी जो उस ने गुस्से में लेने से इनकार कर दिया. बाद में समीर के बहुत कहने पर पहन ली.
रिश्ते की बात बन गई और शीघ्र शादी की तारीख भी तय हो गई. पूनम व समीर मां और पापा के साथ शादी की तैयारी में जुट गए. सबकुछ बहुत अच्छे से हो गया पर जिद्दी रितु विदाई के समय भाभी के गले नहीं मिली.
रितु के ससुराल में सब बहुत अच्छे थे. घर में सासससुर, रितु का पति विनीत और बहन रिचा, जिस ने इसी वर्ष ड्रैस डिजाइनिंग का कोर्स शुरू किया था, ही थे. रिचा भाभी का बहुत ध्यान रखती थी और मां का काम में हाथ बटाती थी. रितु ने न कोई काम मायके में किया था और न ही ससुराल में करने की सोच रही थी. एक दिन रिचा ने भाभी से कहा कि उस के कालेज में कुछ कार्यक्रम है और वह साड़ी पहन कर जाना चाहती है.
उस ने बहुत विनम्र भाव से रितु से कोई भी साड़ी, जो ठीक लगे, मांगी. रितु ने साड़ी तो दे दी पर उसे यह सब अच्छा नहीं लगा. रिचा ने कार्यक्रम से लौट कर ठीक से साड़ी तह लगा भाभी को धन्यवाद सहित लौटा दी और बताया कि उस की सहेलियों को साड़ी बहुत पसंद आई. रितु को एकाएक ध्यान आया कि कैसे वह अपनी भाभी की चीजें इस्तेमाल कर कितनी लापरवाही से लौटाती थी. कहीं ननद फिर कोई चीज न मांग बैठे, इस इरादे से रितु ने अलमारी में ताला लगा दिया और चाबी छिपा कर रख ली.
एक दिन शाम जब रितु पति के साथ घूमने जाने के लिए तैयार होने के लिए अलमारी से साड़ी निकाल, फिर ताला लगाने लगी तो विनीत ने पूछा, ‘‘ताला क्यों?’’ जवाब मिला-वह किसी को अपनी चीजें इस्तेमाल करने के लिए नहीं देना चाहती. विनीत ने समझाया, ‘‘मम्मी उस की चीजें नहीं लेंगी.’’
रितु ने कहा, ‘‘रिचा तो मांग लेगी.’’ अगले हफ्ते रितु को एक सप्ताह के लिए मायके जाना था. उस ने सूटकेस तैयार कर अपनी अलमारी में ताला लगा दिया. सास को ये सब अच्छा नहीं लगा. सब तो घर के ही सदस्य हैं, बाहर का कोई इन के कमरे में जाता नहीं, पर वे चुप ही रहीं. मायके पहुंची तो मां ने ससुराल का हालचाल पूछा.
रितु ने जब अलमारी में ताला लगाने वाली बात बताई तो मां ने सिर पकड़ लिया उस की मूर्खता पर. मां ने बताया कि यहां ताला पूनम ने नहीं बल्कि मां के कहने पर उस के भाई समीर ने लगाना शुरू किया था और चाबी हमेशा मां के पास रहती थी. ताला लगाने का कारण रितु का लापरवाही से भाभी की चीजों का बिना पूछे इस्तेमाल करना और फिर बिगाड़ कर लौटाना था. यह सब उस की आदतों को सुधारने के लिए किया गया था.
वह तो सुधरी नहीं और फिर कितनी बड़ी नादानी कर आई वह ससुराल में अपनी अलमारी में ताला लगा कर. मां ने समझाया कि चीजों से कहीं ऊपर है एकदूसरे पर विश्वास, प्यार और नम्रता. ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए और प्यार पाने के लिए जरूरी है प्यार व मान देना. रितु की दोपहर तो सोच में डूबी पर शाम को जैसे ही भाईभाभी नौकरी से घर लौटे उस ने भाभी को गले लगाया. भाभी ने सोचा शायद काफी दिनों बाद आई है, इसलिए ऐसा हुआ पर वास्तविकता कुछ और थी.
रितु ने देखा यहां अलमारी में कोई ताला नहीं लगा हुआ, वह भी शीघ्र ससुराल वापस जा ताले को हटा मन का ताला खोलना चाहती है ताकि अपनी भूल को सुधार सके, सब की चहेती बन सके जैसे भाभी हैं यहां. एक हफ्ता मायके में रह उस ने बारीकी से हर बात को देखासमझा और जाना कि शादी के बाद ससुराल में सुख पाने का मूलमंत्र है सब को अपना समझना, बड़ों को आदरमान देना और जिम्मेदारियों को सहर्ष निभाना. इतना कठिन तो नहीं है ये सब.
कितनी सहजता है भाभी की अपने ससुराल में, जैसे वह सब की और सब उस के हैं. मां के घुटनों में दर्द रहने लगा था. रितु ने देखा कि भाभी ने सब काम संभाल लिया था और रात को सोने से पहले रोज वे मां के घुटनों की मालिश कर देती थीं ताकि वे आराम से सो सकें. अब वही भाभी, जिस के लिए उस के मन में इतनी कटुता थी, उस की आदर्श बनती जा रही थीं.
एक दिन जब पूनम और समीर को औफिस से आने में देर हो गई तब जल्दी कपड़े बदल पूनम रसोई में पहुंची तो पाया रात का खाना तैयार था. मां से पता चला कि खाना आज रितु ने बनाया है, यह बात दूसरी थी कि सब निर्देश मां देती रही थीं. रितु को अच्छा लगा जब सब ने खाने की तारीफ की. पूनम ने औफिस से देर से आने का कारण बताया.
वह और समीर बाजार गए थे. उन्होंने वे सब चीजें सब को दिखाईं जो रितु के ससुराल वालों के लिए खरीदी गई थीं. इस इतवार दामादजी रितु को लिवाने आ रहे थे. खुशी के आंसुओं के साथ रितु ने भाईभाभी को गले लगाया और धन्यवाद दिया. मां भी अपने आंसू रोक न सकीं बेटी में आए बदलाव को देख कर. रितु ससुराल लौटी एक नई उमंग के साथ, एक नए इरादे से जिस से वह सब को खुश रखने का प्रयत्न करेगी और सब का प्यार पाएगी, विशेषकर विनीत का.
रितु ने पाया कि उस की सास हर किसी से उस की तारीफ करती हैं, ननद उस की हर काम में सहायता करती है और कभीकभी प्यार से ‘भाभीजान’ बुलाती है, ससुर फूले नहीं समाते कि घर में अच्छी बहू आई और विनीत तो रितु पर प्यार लुटाता नहीं थकता. रितु बहुत खुश थी कि जैसे उस ने बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो एक छोटे से हथियार से, ‘प्यार का हथियार’.
अम्मी खुश थीं सायरा को उस के शादी के बाद आए पहले तोहफे दिला कर. सायरा खुश थी अपनी पसंद के तोहफे पा कर. वह कभी हरा और रेशमी गरारा उठा कर देखती, तो कभी सलमासितारों से जड़ी हरी ओढ़नी अपने सिर पर रख कर कहती, ‘‘देखिए अम्मीजान, इस का हरा रंग कितना अलग सा है. इस पर जड़े सितारे तो ऐसे लगते हैं जैसे पूरी कायनात के सितारे मेरी ओढ़नी पर आ कर अपनी महफिल सजा कर बैठे हों.’’
अम्मी बोलीं, ‘‘मेरी बच्ची की ओढ़नी यों ही हरीभरी रहे…’’ फिर दोनों हाथों से सायरा की बलाएं ले कर अपने पान से सुर्ख हो रहे होंठों से उसे चूम लिया.मैं अभी भी किताब में अपना सिर झुकाए चोर नजरों से इन सासबहू का लाड़दुलार देख रहा था. मन ही मन कुढ़ भी रहा था
सायरा से मेरा निकाह हुए 2 महीने हो गए थे. मैं अभी तक उस से अपना जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा था. जुड़ाव महसूस भी कैसे करता? कुछ ऐसा महसूस करने के लिए जुड़ना जरूरी होता है. केवल किसी को ‘कबूल’ बोल देने भर से तो वह कबूल नहीं हो जाता.
यह अलग बात है कि काजी साहब के सामने किए इजहार को मैं अपनी जिंदगी के कयामत वाले दिन तक निभाने को तैयार हूं. हां, मगर अभी मुझे वक्त चाहिए खुद को समेटने के लिए. सलमा को भुलाने के लिए.
मैं क्या करूं… नहीं लुभाती सायरा की खूबसूरती, उस की चुलबुली सी अदाएं, उस का चहकना और मचलना मुझे कुछ भी नहीं भाता. मुझे हर वक्त अपने आसपास सलमा का सांवला सा संजीदा चेहरा ही नजर आता है.
मैं मानता हूं कि सायरा रिमझिम बरखा सी है, पर मेरा इश्क मेरी सलमा… वह भी तो भादों से भरी घटा थी.फिर मेरे मिजाज में भी तो यह सब नहीं था. मुझे कभी अच्छा भी तो नहीं लगा बरसात में भीगना. चिढ़ थी मुझे भीगने से और फिर लौट कर अम्मी के तमाम नियमकायदे मानने से. गीले पैर पायदान पर रख कर उसे खिसकाते हुए गुसलखाने तक जाओ, कपड़े का पानी बाहर ही निचोड़ो, यह सब मुझे उकता देता था.
ऊपर से अम्मी का वह जोशांदा काढ़ा… उफ. वह तो मेरे हलक से नीचे ही नहीं उतरता था. जो चीज मेरे दिल से गुफ्तगू करती थी, वह थी घिरी हुई घटाओं के बीच दालान में बैठ कर किताबें पढ़ना.बादलों को एकदूसरे में सिमटते देखना, बादलों का गरजना यों लगता जैसे आसमां अपने भीतर के सारे मनोभाव जमीन से खुल कर कह रहा हो कि किसी से नहीं डरना हमें. हम तो तेरे आशिक हैं.अकसर सोचता एक दिन मैं भी खुशी से सब को बता दूंगा कि मुझे सलमा से मुहब्बत है.
मैं अपनी सोच में खोया हुआ था कि तभी सायरा ने अपने सामान का जखीरा मेरे सामने ला पटका और बोली, ‘‘देखिए साहिर साहब, हमें अम्मीजान ने कितने तोहफे दिलाए हैं. आप भी कुछ दिलाइए…’’
बिना मेरा जवाब सुने ही उस ने फिर से कहना शुरू किया, ‘‘यह हार देखिए, और ये झुमके भी. यह तो उन्होंने अपनी छोटी वाली पेटी से निकाल कर दिए हैं. कह रही थीं कि बड़े बेशकीमती हैं.
‘‘अम्मीजान बता रही थीं कि उन की दुबई वाली खाला ने उन्हें बतौर नजराना दिए थे. आप देखें, आज ये सब अम्मीजान ने हमें दे दिए.’’
मैं ने बड़ी बेतकल्लुफी से उन सब पर बिना नजर डाले ही कहा, ‘‘सब ले लो, आज भी यह सब तुम्हारा ही है. कल भी सब तुम्हारा ही तो होना है. अम्मी का मेरे सिवा है ही कौन?’’
री बात सुन कर बड़ी बेतकल्लुफी से वह बोली, ‘‘यह क्या बात हुई… हम भी तो हैं अम्मी के. साहिर, हम ने कितनी ही सासें देखी हैं. एकलौती बहू को भी अपना सब अपने जीतेजी नहीं सौंप देती हैं. अम्मीजान तो लाखों में एक हैं.
‘‘एक बात सुनें आप… फिर हों भी क्यों न? उन में हमारे सैयद खानदान का ही खून दौड़ रहा है. आखिर वे मेरी फूफी भी तो हैं.’’
मैं चुप हो गया. यह सैयद खानदान की जिद ही तो थी, जिस ने सलमा और मेरे इश्क को परवान नहीं चढ़ने दिया. अम्मी ने अपने एक फैसले से मेरी दुनिया बदल कर रख दी.
बहुत सालों बाद पिछले साल जब अम्मी अपने मायके गई थीं, तब वहीं से सायरा का रिश्ता मांग लाई थीं. बिना मुझ से पूछे, बिना मेरी मरजी जाने और वापस आ कर बस फरमान सुनाया था, ‘‘साहिर, तुम्हें सायरा याद है न? वही मेरे चचा भाई की मंझली बेटी… हम उसे तेरे लिए मांग आए हैं.’’
यह सुन कर बिना घबराए मैं ने बड़े यकीन से अम्मी को अपने दिल का हाल सुनाया था. लेकिन अम्मी ने चंद शब्दों में सारी बात खत्म कर दी, ‘बरखुरदार, हम सैयद खानदान से ताल्लुक रखते हैं. हम जबान दे कर पीछे नहीं हटते हैं. तुम्हें मेरी बात न माननी हो, तो शौक से तुम अपने मामू को फोन कर के मना कर दो.साथ ही साथ यह भी कह देना कि तुम्हारी बेवा मां का इंतकाल हो गया है, तभी तुम यह रिश्ता तोड़ रहे हो.’अम्मी की इस बात के बाद सिवा सेहरा पहनने के मेरे पास कुछ कहने को नहीं था.
सायरा अभी भी अपने तोहफे समेट रही थी, जबकि मैं यादों की बारादरी से गुजर कर वापस भी आ गया. कल सायरा की पहली विदाई है. वह अपने अरमान संजो रही थी.
सुबह ही मैं ने अपने मन में सोच लिया था कि कल कुछ भी कर के मैं सलमा से मुलाकात करूंगा. उस से सब कह दूंगा कि नहीं रहा जाता तुम्हारे बिना… बताओ क्या करूं? कोई तो रास्ता सुझाओ…
मैं अपनी ही उधेड़बुन में था कि तभी सायरा आ कर मेरे गले लग गई और चहक कर बोली, ‘‘आप तो बड़े छिपे रुस्तम हो जी. ये हरी चूडि़यां ले कर आए हो तो मुझे दी क्यों नहीं?’’फिर प्यार से हाथ आगे बढ़ाते हुए वह बोली, ‘‘आप जानते हैं… आप के नाम लिख गई है मेरी कलाई की एकएक नस, तो फिर शरमाना कैसा? चलिए, पहना दीजिए.’’
मैं पसोपेश में पड़ गया. कल सलमा से मुलाकात के लिए लाया हुआ तोहफा सायरा के हाथ में था. उन चूडि़यों की खनक सायरा की आवाज में थी. बिना कुछ भी बोले हुए मैं ने उस की कलाई में वे हरी चूडि़यां सजा दी थीं. वह एकएक चूड़ी को चूम रही थी.
मैं ने खुद को वफा की नजर में तोला तो पाया कि मैं भटक रहा था. खुद को झटकते हुए मैं ने अपने भटकते मन को सीधी राह पर चलाने के लिए नजरबंद कर लिया. मन की दबी हुई सारी काली घटाएं बूंद बन कर पिघलने लगीं. हवाओं का शोर बता रहा था कि बाहर जोर से पानी बरस रहा है.
राजेश पिछले शनिवार को अपने घर गए थे लेकिन तेज बुखार के कारण वह सोमवार को वापस नहीं लौटे. आज का पूरा दिन उन्होंने मेरे साथ गुजारने का वादा किया था. अपने जन्मदिन पर उन से न मिल कर मेरा मन सचमुच बहुत दुखी होता.
राजेश को अपने प्रेमी के रूप में स्वीकार किए मुझे करीब 2 साल बीत चुके हैं. उन के दोनों बेटों सोनू और मोनू व पत्नी सरोज से आज मैं पहली बार मिलूंगी.
राजेश के घर जाने से एक दिन पहले हमारे बीच जो वार्तालाप हुआ था वह रास्ते भर मेरे जेहन में गूंजता रहा.
‘मैं शादी कर के घर बसाना चाहती हूं…मां बनना चाहती हूं,’ उन की बांहों के घेरे में कैद होने के बाद मैं ने भावुक स्वर में अपने दिल की इच्छा उन से जाहिर की थी.
‘कोई उपयुक्त साथी ढूंढ़ लिया है?’ उन्होंने मुझे शरारती अंदाज में मुसकराते हुए छेड़ा.
उन की छाती पर बनावटी गुस्से में कुछ घूंसे मारने के बाद मैं ने जवाब दिया, ‘मैं तुम्हारे साथ घर बसाने की बात कर रही हूं.’
‘धर्मेंद्र और हेमामालिनी वाली कहानी दोहराना चाहती हो?’
‘मेरी बात को मजाक में मत उड़ाओ, प्लीज.’
‘निशा, ऐसी इच्छा को मन में क्यों स्थान देती हो जो पूरी नहीं हो सकती,’ अब वह भी गंभीर हो गए.
‘देखिए, मैं सरोज को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी. अपनी पूरी तनख्वाह उसे दे दिया करूंगी. मैं अपना सारा बैंकबैलेंस बच्चों के नाम कर दूंगी… उन्हें पूर्ण आर्थिक सुरक्षा देने…’
उन्होंने मेरे मुंह पर हाथ रखा और उदास लहजे में बोले, ‘तुम समझती क्यों नहीं कि सरोज को तलाक नहीं दिया जा सकता. मैं चाहूं भी तो ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं.’
‘पर क्यों?’ मैं ने तड़प कर पूछा.
‘तुम सरोज को जानती होतीं तो यह सवाल न पूछतीं.’
‘मैं अपने अकेलेपन को जानने लगी हूं. पहले मैं ने सारी जिंदगी अकेले रहने का मन बना लिया था पर अब सब डांवांडोल हो गया है. तुम मुझे सरोज से ज्यादा चाहते हो?’
‘हां,’ उन्होंने बेझिझक जवाब दिया था.
‘तब उसे छोड़ कर तुम मेरे हो जाओ,’ उन की छाती से लिपट कर मैं ने अपनी इच्छा दोहरा दी.
‘निशा, तुम मेरे बच्चे की मां बनना चाहती हो तो बनो. अगर अकेली मां बन कर समाज में रहने का साहस तुम में है तो मैं हर कदम पर तुम्हारा साथ दूंगा. बस, तुम सरोज से तलाक लेने की जिद मत करो, प्लीज. मेरे लिए यह संभव नहीं होगा,’ उन की आंखों में आंसू झिलमिलाते देख मैं खामोश हो गई.
सरोज के बारे में राजेश ने मुझे थोड़ी सी जानकारी दे रखी थी. बचपन में मातापिता के गुजर जाने के कारण उसे उस के मामा ने पाला था. 8वीं तक शिक्षा पाई थी. रंग सांवला और चेहरामोहरा साधारण सा था. वह एक कुशल गृहिणी थी. अपने दोनों बेटों में उस की जान बसती थी. घरगृहस्थी के संचालन को ले कर राजेश ने उस के प्रति कभी कोई शिकायत मुंह से नहीं निकाली थी.
सरोज से मुलाकात करने का यह अवसर चूकना मुझे उचित नहीं लगा. इसलिए उन के घर जाने का निर्णय लेने में मुझे ज्यादा कठिनाई नहीं हुई.
राजेश इनकार न कर दें, इसलिए मैं ने उन्हें अपने आने की कोई खबर फोन से नहीं दी थी. उस कसबे में उन का घर ढूंढ़ने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. उस एक- मंजिला साधारण से घर के बरामदे में बैठ कर मैं ने उन्हें अखबार पढ़ते पाया.
मुझे अचानक सामने देख कर वह पहले चौंके, फिर जो खुशी उन के होंठों पर उभरी, उस ने सफर की सारी थकावट दूर कर के मुझे एकदम से तरोताजा कर दिया.
‘‘बहुत कमजोर नजर आ रहे हो, अब तबीयत कैसी है?’’ मैं भावुक हो उठी.
‘‘पहले से बहुत बेहतर हूं. जन्मदिन की शुभकामनाएं. तुम्हें सामने देख कर दिल बहुत खुश हो रहा है,’’ राजेश ने मिलाने के लिए अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया.
राजेश से जिस पल मैं ने हाथ मिलाया उसी पल सरोज ने घर के भीतरी भाग से दरवाजे पर कदम रखा.
आंखों से आंखें मिलते ही मेरे मन में तेज झटका लगा.
सरोज की आंखों में अजीब सा भोलापन था. छोटी सी मुसकान होंठों पर सजा कर वह दोस्ताना अंदाज में मेरी तरफ देख रही थी.
जाने क्यों मैं ने अचानक अपने को अपराधी सा महसूस किया. मुझे एहसास हुआ कि राजेश को उस से छीनने के मेरे इरादे को उस की आंखों ने मेरे मन की गहराइयों में झांक कर बड़ी आसानी से पढ़ लिया था.
‘‘सरोज, यह निशा हैं. मेरे साथ दिल्ली में काम करती हैं. आज इन का जन्मदिन भी है. इसलिए कुछ बढि़या सा खाना बना कर इन्हें जरूर खिलाना,’’ हमारा परिचय कराते समय राजेश जरा भी असहज नजर नहीं आ रहे थे.
‘‘सोनू और मोनू के लिए हलवा बनाया था. वह बिलकुल तैयार है और मैं अभी आप को खिलाती हूं,’’ सरोज की आवाज में भी किसी तरह का खिंचाव मैं ने महसूस नहीं किया.
‘‘थैंक यू,’’ अपने मन की बेचैनी के कारण मैं कुछ और ज्यादा नहीं कह पाई.
‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ ऐसा कह कर सरोज तेजी से मुड़ी और घर के अंदर चली गई.
राजेश के सामने बैठ कर मैं उन से उन की बीमारी का ब्योरा पूछने लगी. फिर उन्होंने आफिस के समाचार मुझ से पूछे. यों हलकेफुलके अंदाज में वार्तालाप करते हुए मैं सरोज की आंखों को भुला पाने में असमर्थ हो रही थी.
अचानक राजेश ने पूछा, ‘‘निशा, क्या तुम सरोज से अपने और मेरे प्रेम संबंध को ले कर बातें करने का निश्चय कर के यहां आई हो?’’
एकदम से जवाब न दे कर मैं ने सवाल किया, ‘‘क्या तुम ने कभी उसे मेरे बारे में बताया है?’’
‘‘कभी नहीं.’’
‘‘मुझे लगता है कि वह हमारे प्रेम के बारे में जानती है.’’
कुछ देर खामोश रहने के बाद मैं ने अपना फैसला राजेश को बता दिया, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं हो तो मैं सरोज से खुल कर बातें करना चाहूंगी. आगे की जिंदगी तुम से दूर रह कर गुजारने को अब मेरा दिल तैयार नहीं है.’’
‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं कहूंगा. अब तुम हाथमुंह धो कर फ्रैश हो जाओ. सरोज चाय लाती ही होगी.’’
राजेश के पुकारने पर सोनू और मोनू दोनों भागते हुए बाहर आए. दोनों बच्चे मुझे स्मार्ट और शरारती लगे. मैं उन से उन की पढ़ाई व शौकों के बारे में बातें करते हुए घर के भीतर चली गई.
घर बहुत करीने से सजा हुआ था. सरोज के सुघड़ गृहिणी होने की छाप हर तरफ नजर आ रही थी.
मेरे मन में उथलपुथल न चल रही होती तो सरोज के प्रति मैं ज्यादा सहज व मैत्रीपूर्ण व्यवहार करती. वह मेरे साथ बड़े अपनेपन से पेश आ रही थी. उस ने मेरी देखभाल और खातिर में जरा भी कमी नहीं की.
उस की बातचीत का बड़ा भाग सोनू और मोनू से जुड़ा था. उन की शरारतों, खूबियों और कमियों की चर्चा करते हुए उस की जबान जरा नहीं थकी. वे दोनों बातचीत का विषय होते तो उस का चेहरा खुशी और उत्साह से दमकने लगता.
हलवा बहुत स्वादिष्ठ बना था. साथसाथ चाय पीने के बाद सरोज दोपहर के खाने की तैयारी करने रसोई में चली गई.
‘‘सरोज के व्यवहार से तो अब ऐसा नहीं लगता है कि उसे तुम्हारे और मेरे प्रेम संबंध की जानकारी नहीं है,’’ मैं ने अपनी राय राजेश को बता दी.
‘‘सरोज सभी से अपनत्व भरा व्यवहार करती है, निशा. उस के मन में क्या है, इस का अंदाजा उस के व्यवहार से लगाना आसान नहीं,’’ राजेश ने गंभीर लहजे में जवाब दिया.
‘‘अपनी 12 सालों की विवाहित जिंदगी में सरोज ने क्या कभी तुम्हें अपने दिल में झांकने दिया है?’’
‘‘कभी नहीं…और यह भी सच है कि मैं ने भी उसे समझने की कोशिश कभी नहीं की.’’
‘‘राजेश, मैं तुम्हें एक संवेदनशील इनसान के रूप में पहचानती हूं. सरोज के साथ तुम्हारे इस रूखे व्यवहार का क्या कारण है?’’
‘‘निशा, तुम मेरी पसंद, मेरा प्यार हो, जबकि सरोज के साथ मेरी शादी मेरे मातापिता की जिद के कारण हुई. उस के पिता मेरे पापा के पक्के दोस्त थे. आपस में दिए वचन के कारण सरोज, एक बेहद साधारण सी लड़की, मेरी इच्छा के खिलाफ मेरे साथ आ जुड़ी थी. वह मेरे बच्चों की मां है, मेरे घर को चला रही है, पर मेरे दिल में उस ने कभी जगह नहीं पाई,’’ राजेश के स्वर की उदासी मेरे दिल को छू गई.
‘‘उसे तलाक देते हुए तुम कहीं गहरे अपराधबोध का शिकार तो नहीं हो जाओगे?’’ मेरी आंखों में चिंता के भाव उभरे.
‘‘निशा, तुम्हारी खुशी की खातिर मैं वह कदम उठा सकता हूं पर तलाक की मांग सरोज के सामने रखना मेरे लिए संभव नहीं होगा.’’
‘‘मौका मिलते ही इस विषय पर मैं उस से चर्चा करूंगी.’’
‘‘तुम जैसा उचित समझो, करो. मैं कुछ देर आराम कर लेता हूं,’’ राजेश बैठक से उठ कर अपने कमरे में चले गए और मैं रसोई में सरोज के पास चली आई.
हमारे बीच बातचीत का विषय सोनू और मोनू ही बने रहे. एक बार को मुझे ऐसा भी लगा कि सरोज शायद जानबूझ कर उन के बारे में इसीलिए खूब बोल रही है कि मैं किसी दूसरे विषय पर कुछ कह ही न पाऊं.
घर और बाहर दोनों तरह की टेंशन से निबटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर मुझे देख कर सरोज तनाव, नाराजगी, गुस्से या डर का शिकार बनी होती तो मुझे उस से मनचाहा वार्तालाप करने में कोई असुविधा न महसूस होती.
उस का साधारण सा व्यक्तित्व, उस की बड़ीबड़ी आंखों का भोलापन, अपने बच्चों की देखभाल व घरगृहस्थी की जिम्मेदारियों के प्रति उस का समर्पण मेरे रास्ते की रुकावट बन जाते.
मेरी मौजूदगी के कारण उस के दिलोदिमाग पर किसी तरह का दबाव मुझे नजर नहीं आया. हमारे बीच हो रहे वार्तालाप की बागडोर अधिकतर उसी के हाथों में रही. जो शब्द उस की जिंदगी में भारी उथलपुथल मचा सकते थे वे मेरी जबान तक आ कर लौट जाते.
दोपहर का खाना सरोज ने बहुत अच्छा बनाया था, पर मैं ने बड़े अनमने भाव से थोड़ा सा खाया. राजेश मेरे हावभाव को नोट कर रहे थे पर मुंह से कुछ नहीं बोले. अपने बेटों को प्यार से खाना खिलाने में व्यस्त सरोज हम दोनों के दिल में मची हलचल से शायद पूरी तरह अनजान थी.
कुछ देर आराम करने के बाद हम सब पास के पार्क में घूमने पहुंच गए. सोनू और मोनू झूलों में झूलने लगे. राजेश एक बैंच पर लेटे और धूप का आनंद आंखें मूंद कर लेने लगे.
‘‘आइए, हम दोनों पार्क में घूमें. आपस में खुल कर बातें करने का इस से बढि़या मौका शायद आगे न मिले,’’ सरोज के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर मैं मन ही मन चौंक पड़ी.
उस की भोली सी आंखों में झांक कर अपने को उलझन का शिकार बनने से मैं ने खुद को इस बार बचाया और गंभीर लहजे में बोली, ‘‘सरोज, मैं सचमुच तुम से कुछ जरूरी बातें खुल कर करने के लिए ही यहां आई हूं.’’
‘‘आप की ऐसी इच्छा का अंदाजा मुझे हो चुका है,’’ एक उदास सी मुसकान उस के होंठों पर उभर कर लुप्त हो गई.
‘‘क्या तुम जानती हो कि मैं राजेश से बहुत पे्रम करती हूं?’’
‘‘प्रेम को आंखों में पढ़ लेना ज्यादा कठिन काम नहीं है, निशाजी.’’
‘‘तुम मुझ से नाराज मत होना क्योंकि मैं अपने दिल के हाथों मजबूर हूं.’’
‘‘मैं आप से नाराज नहीं हूं. सच तो यह है कि मैं ने इस बारे में सोचविचार किया ही नहीं है. मैं तो एक ही बात पूछना चाहूंगी,’’ सरोज ने इतना कह कर अपनी भोली आंखें मेरे चेहरे पर जमा दीं तो मैं मन में बेचैनी महसूस करने लगी.
‘‘पूछो,’’ मैं ने दबी सी आवाज में उस से कहा.
‘‘वह 14 में से 12 दिन आप के साथ रहते हैं, फिर भी आप खुश और संतुष्ट क्यों नहीं हैं? मेरे हिस्से के 2 दिन छीन कर आप को कौन सा खजाना मिल जाएगा?’’
‘‘तुम्हारे उन 2 दिनों के कारण मैं राजेश के साथ अपना घर नहीं बसा सकती हूं, अपनी मांग में सिंदूर नहीं भर सकती हूं,’’ मैं ने चिढ़े से लहजे में जवाब दिया.
‘‘मांग के सिंदूर का महत्त्व और उस की ताकत मुझ से ज्यादा कौन समझेगा?’’ उस के होंठों पर उभरी व्यंग्य भरी मुसकान ने मेरे अपराधबोध को और भी बढ़ा दिया.
‘‘राजेश सिर्फ मुझे प्यार करते हैं, सरोज. हम तुम्हें कभी आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करने देंगे, पर तुम्हें, उन्हें तलाक देना ही होगा,’’ मैं ने कोशिश कर के अपनी आवाज मजबूत कर ली.
‘‘वह क्या कहते हैं तलाक लेने के बारे में?’’ कुछ देर खामोश रह कर सरोज ने पूछा.
‘‘तुम राजी हो तो उन्हें कोई एतराज नहीं है.’’
‘‘मुझे तलाक लेनेदेने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है, निशाजी. इस बारे में फैसला भी उन्हीं को करना होगा.’’
‘‘वह तलाक चाहेंगे तो तुम शोर तो नहीं मचाओगी?’’
मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए सरोज चलतेचलते रुक गई. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए. इस पल उस से नजर मिलाना मुझे बड़ा कठिन महसूस हुआ.
‘‘निशाजी, अपने बारे में मैं सिर्फ एक बात आप को इसलिए बताना चाहती हूं ताकि आप कभी मुझे ले कर भविष्य में परेशान न हों. मेरे कारण कोई दुख या अपराधबोध का शिकार बने, यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’
‘‘सरोज, मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूं, पर परिस्थितियां ही कुछ…’’
उस ने मुझे टोक कर अपनी बात कहना जारी रखा, ‘‘अकेलेपन से मेरा रिश्ता अब बहुत पुराना हो गया है. मातापिता का साया जल्दी मेरे सिर से उठ गया था. मामामामी ने नौकरानी की तरह पाला. जिंदगी में कभी ढंग के संगीसाथी नहीं मिले. खराब शक्लसूरत के कारण पति ने दिल में जगह नहीं दी और अब आप मेरे बच्चों के पिता को उन से छीन कर ले जाना चाहती हैं.
‘‘यह तो कुदरत की मेहरबानी है कि मैं ने अकेलेपन में भी सदा खुशियों को ढूंढ़ निकाला. मामा के यहां घर के कामों को खूब दिल लगा कर करती. दोस्त नहीं मिले तो मिट्टी के खिलौनों, गुडि़या और भेड़बकरियों को अपना साथी मान लिया. ससुराल में सासससुर की खूब सेवा कर उन के आशीर्वाद पाती रही. अब सोनूमोनू के साथ मैं बहुत सुखी और संतुष्ट हूं.
‘‘मेरे अपनों ने और समाज ने कभी मेरी खुशियों की फिक्र नहीं की. अपने अकेलेपन को स्वीकार कर के मैं ने खुद अपनी खुशियां पाई हैं और मैं उन्हें विश्वसनीय मानती हूं. उदासी, निराशा, दुख, तनाव और चिंताएं मेरे अकेलेपन से न कभी जुड़ी हैं और न जुड़ पाएंगी. मेरी जिंदगी में जो भी घटेगा उस का सामना करने को मैं तैयार हूं.’’
मैं चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाई. राजेश ठीक ही कहते थे कि सरोज से तलाक के बारे में चर्चा करना असंभव था. बिलकुल ऐसा ही अब मैं महसूस कर रही थी.
सरोज के लिए मेरे मन में इस समय सहानुभूति से कहीं ज्यादा गहरे भाव मौजूद थे. मेरा मन उसे गले लगा कर उस की पीठ थपथपाने का किया और ऐसा ही मैं ने किया भी.
उस का हाथ पकड़ कर मैं राजेश की तरफ चल पड़ी. मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला, पर मन में बहुत कुछ चल रहा था.
सरोज से कुछ छीनना किसी भोले बच्चे को धोखा देने जैसा होगा. अपने अकेलेपन से जुड़ी ऊब, तनाव व उदासी को दूर करने के लिए मुझे सरोज से सीख लेनी चाहिए. उस की घरगृहस्थी का संतुलन नष्ट कर के अपनी घरगृहस्थी की नींव मैं नहीं डालूंगी. अपनी जिंदगी और राजेश से अपने प्रेम संबंध के बारे में मुझे नई दृष्टि से सोचना होगा, यही सबकुछ सोचते हुए मैं ने साफ महसूस किया कि मैं पूरी तरह से तनावमुक्त हो भविष्य के प्रति जोश, उत्साह और आशा प्रदान करने वाली नई तरह की ऊर्जा से भर गई हूं.