फाइवस्टार Hotel में अधिकारी के साथ किया बलात्कार

Hotel  वाणिज्यिक कर विभाग के बड़े अधिकारी पंकज सिंह ने फाइवस्टार होटल में नीलिमा के साथ बलात्कार किया था या फिर उन के बीच आपसी सहमति से संबंध बने थे, यह बात तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी. लेकिन यह तय है कि इस मामले ने पुलिस की उलझनें जरूर बढ़ा दी हैं.

5 अगस्त, 2018 की शाम के करीब साढ़े 7 बजे थे. भोपाल के प्रेमपुरा इलाके स्थित नामी जहांनुमा रिट्रीट की रौनक शवाब पर थी. लोग आजा रहे थे और कुछ लोग वहां इत्मीनान से बैठे बतिया रहे थे. जहांनुमा रिट्रीट फाइवस्टार होटल है, लिहाजा वहां ऐरेगैरे तो ठहरने की सोच भी नहीं पाते. जिन की जेब में खासा पैसा होता है, वही इस शानदार होटल का लुत्फ उठाते हैं. होटल के लौन में साइकिलिंग करते एक अधेड़ पुरुष और उस के साथ बेहद अंतरंगता से हंसतीबतियाती महिला को साइकिल पर पैडल मारते देख कोई भी यही अंदाजा लगाता कि वे पतिपत्नी हैं और नए जोड़ों की तरह अठखेलियां कर रहे हैं.

इस के पहले दोनों एक साथ कैरम खेलते दिखे थे. इस पर भी होटल स्टाफ को कोई हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि सर्वसुविधायुक्त इस लग्जरी होटल में ऐशोआराम के सारे साधन और सहूलियतें मौजूद हैं.  वह पुरुष भरेपूरे चेहरे वाला था और रुआब उस के हावभाव से साफ झलक रहा था. उस की साथी महिला उम्रदराज होते हुए भी युवा लग रही थी. बेइंतहा खूबसूरत और स्मार्ट दिख रही वह महिला पुरुष से बेतकल्लुफी से पेश आ रही थी. साइकिलिंग करतेकरते पुरुष गिर पड़ा तो महिला ने तुरंत स्टाफ से फर्स्टएड बौक्स मंगाया और उस की मरहमपट्टी खुद अपने हाथों से की. नजारा देख कर ऐसा लग रहा था कि अगर दूसरे के घाव या चोट अपने ऊपर लेने का कोई प्रावधान होता तो वह महिला उस पुरुष की चोट ले लेती.

उस के चेहरे से चिंता साफ झलक रही थी जबकि पुरुष को कोई खास चोटें नहीं आई थीं. उन की ये नजदीकियां युवा दंपतियों को भी मात कर रही थीं, देखने वाले जिन का पूरा लुत्फ उठा रहे थे. इस के उलट एकदूसरे की बातों में डूबे इन दोनों को मानो किसी की परवाह ही नहीं थी. लगभग 5 घंटे दोनों ने इसी तरह से साथ गुजारे. दरअसल ये दोनों जहांनुमा रिट्रीट में रुकने के लिए आए थे, लेकिन उस समय कोई कमरा खाली नहीं होने की वजह से वक्त गुजार रहे थे. रात 12 बजे के बाद इन्हें रूम नंबर 14 आवंटित हुआ तो दोनों एकदूसरे से सट कर कमरे की तरफ बढ़ गए.

एंट्री रजिस्टर में पुरुष ने अपना नाम पंकज कुमार सिंह, उम्र 42 वर्ष, पता नोएडा, उत्तर प्रदेश और पेशा सरकारी अधिकारी लिखा और साथ आई महिला का नाम नीलिमा (परिवर्तित नाम) दर्ज किया गया लेकिन इन दोनों के बीच का रिश्ता नहीं लिखा गया था. इस की वजह यह थी कि होटल के एंट्री रजिस्टर में रिलेशन वाला कौलम ही नहीं था. आमतौर पर यह कौलम अब अनिवार्य है लेकिन जहांनुमा रिट्रीट के रजिस्टर में नहीं था तो नहीं था. पंकज ने भारत सरकार द्वारा जारी किया गया पहचान पत्र दिया था तो नीलिमा ने पैन कार्ड दिया था. दोनों रिसैप्शन की खानापूर्ति कर के कमरे में बंद हो गए. अब तक होटल में आनेजाने वालों की तादाद इक्कादुक्का ही रह गई थी और स्टाफ के लोग भी ऊंघते हुए सोने की तैयारी करने लगे थे. रात को होटल के बंद कमरों में ठहरे लोग क्या करते हैं, इस से होटल स्टाफ कोई मतलब नहीं रखता और मतलब रखने के कोई माने या वजह है भी नहीं.

ऐसा ही पंकज और नीलिमा के मामले में हुआ था जो तकरीबन 5 घंटे तक होटल परिसर में घूमतेफिरते और बतियाते रहे थे. दोनों ने खाना भी साथ खाया था. दोनों की ही बौडी लैंग्वेज शाही थी तो इस की वजह भी थी कि पंकज उत्तर प्रदेश के वाणिज्य कर विभाग में डिप्टी कमिश्नर थे और नीलिमा इसी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर थे. बंद कमरे की अजब कहानी रात लगभग साढ़े 3 बजे नीलिमा कमरे से बाहर आई तो परेशानी और बदहवासी उस के चेहरे से साफ झलक रही थी. हालांकि उस के कपड़े अस्तव्यस्त नहीं थे और न ही बाल बिखरे हुए थे, जैसा कि आमतौर पर बलात्कार के मामलों में पीडि़ता के साथ होता है.

बाहर आ कर नीलिमा ने रिसैप्शन पर बैठे कर्मचारी को तुरंत कैब बुलाने को कहा लेकिन वजह पूरी तरह नहीं बताई. टैक्सी आई तो वह बाहर जा कर उस में बैठ गई और ड्राइवर को थाने चलने को कहा. टैक्सी ड्राइवर हैरानी से इस संभ्रांत महिला को देखते हुए उन्हें नजदीकी कमलानगर थाने ले गया जो कोटरा इलाके में है. जहांनुमा रिट्रीट होटल इसी थाने के अंतर्गत आता है. नीलिमा सीधे थाने के अंदर गई और मौजूद पुलिसकर्मी से रिपोर्ट लिखने को कहा. इतनी रात गए कोई अभिजात्य व सभ्य सी दिखने वाली महिला बलात्कार (Hotel)  की रिपोर्ट लिखाने आए तो थाने में खलबली मचना स्वाभाविक सी बात थी. नीलिमा का परिचय जान कर तो पुलिसकर्मी और भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उच्चाधिकारियों को इस हाईप्रोफाइल बलात्कार मामले की खबर दी.

सुबह की रोशनी होने से पहले कमला नगर थाने के टीआई मदनमोहन मालवीय और एसपी (नौर्थ भोपाल) राहुल कुमार लोढ़ा ने विस्तार से नीलिमा से जानकारी ली तो इस अनूठे बलात्कार की कहानी कुछ इस तरह सामने आई. नीलिमा मूलत: भोपाल की ही रहने वाली है. दरअसल भोपाल के जिस नामी मिशनरी स्कूल में वह पढ़ी थी, उस के पूर्व छात्रों के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 3 दिन पहले भोपाल आई थी. तब वह होटल जहांनुमा पैलेस के कमरा नंबर 104 में ठहरी थी. स्कूल का जलसा शानदार रहा था. कार्यक्रम के दौरान वह ऐसे कई सहपाठियों से मिली थी, जिन से बिछुड़े मुद्दत हो चुकी थी. सालों बाद जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो पुरानी कई यादें ताजा हो उठती हैं. तब लोग अपनी नौकरी और पेशे की परेशानियां व तनाव भूल जाते हैं.

पुराना याराना नया फसाद ऐसा ही नीलिमा के साथ हुआ था. नीलिमा के लिए भोपाल नया नहीं था, क्योंकि यहां उस का बचपन गुजरा था. तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक 5 अगस्त को नीलिमा को दिल्ली जाना था. दिल्ली रवाना होने के लिए जब वह एयरपोर्ट पहुंची तो एकाएक तभी पंकज का फोन आ गया. पंकज और नीलिमा पुराने परिचित थे. साल 2009 में नीलिमा का चयन वाणिज्यिक कर विभाग में हुआ था, जबकि इसी विभाग में पंकज की नियुक्ति सन 2010 में हुई थी लेकिन पद पंकज का ऊंचा था. एक ही विभाग में होने के कारण दोनों में परिचय हुआ और जल्द ही अच्छी जानपहचान में बदल गया. शादी की बात या चर्चा हुई या नहीं, यह तो नीलिमा ने पुलिस को नहीं बताया लेकिन चौंका देने वाली बात यह जरूर बताई कि पंकज ने पहले भी उस के साथ न केवल दुष्कर्म किया था बल्कि उस का वीडियो बना कर उसे ब्लैकमेल भी कर रहा था.

हुआ यूं था कि अब से कोई 7 साल पहले पंकज नीलिमा को अपनी मां से मिलाने के बहाने अपने घर ले गया था लेकिन वहां मां नहीं थी, घर खाली था. पंकज की नीयत में खोट था. एकांत का फायदा उठा कर उस ने नीलिमा के साथ जबरदस्ती की और वीडियो भी बना लिया. नीलिमा कभी इस बाबत मुंह न खोले, इसलिए उस ने वीडियो वायरल करने की धमकी दी थी. उस की यह धमकी कारगर साबित हुई. दोनों ही उच्चाधिकारी शादीशुदा हैं 5 अगस्त को पंकज ने फोन पर अपने किए की माफी मांगने की बात कही. इस पर नीलिमा ने ध्यान नहीं दिया तो उस ने फिर पुराना वीडियो वायरल करने की धमकी दी. नीलिमा की शादी एक बैंककर्मी से हो चुकी थी, जिस से उसे एक बेटी भी थी.

शादी तो पंकज की भी हो चुकी थी लेकिन उस का अपनी पत्नी से तलाक हो चुका था. अगर वाकई पंकज अपनी धमकी पर अमल कर बैठता तो नीलिमा के लिए कई झंझट खड़े हो जाते. इसलिए नीलिमा ने रुकने में कोई बुराई नहीं समझी. नीलिमा के भोपाल में मौजूद रहने की बात पंकज को पता लग गई थी. पर यह खबर पंकज को कैसे लगी थी, यह खुलासा तो कहानी लिखे जाने तक नहीं हुआ था. (Hotel)  होटल में न जाने कैसे पंकज ने नीलिमा के साथ नजदीकियां हासिल करने में सफलता हासिल कर ली. फिर जो हुआ, वह ऊपर बताया जा चुका है. मामले पर लीपापोती की कैसीकैसी कोशिशें की गईं, यह पुलिस काररवाई से भी समझ आता है कि पुलिस का एक बयान यह भी सुर्खियों में रहा था कि नीलिमा पहले से जहांनुमा रिट्रीट में ठहरी हुई थी और पंकज भी उसी होटल में रुका था.

हादसे की रात 12 बजे पंकज दरवाजा खुलवा कर जबरन नीलिमा के कमरे में घुस गया और उस ने नीलिमा के साथ बलात्कार किया. सुबह कोई 3 बजे जैसेतैसे कर के नीलिमा कमरे से बाहर आई और होटल प्रबंधन को अपने साथ हुए हादसे से अवगत कराया. खबर मिलने पर पुलिस आई और नीलिमा की रिपोर्ट दर्ज की. इस विरोधाभास पर पुलिस की ओर से कोई स्पष्टीकरण जारी न होना भी हैरत की बात थी. पूछताछ में पुलिस के उड़े होश नीलिमा ने बताया कि पंकज ने उस के साथ दुष्कर्म के अलावा मारपीट और गालीगलौज भी की और उस की बेटी को अगवा करने की भी धमकी दी थी.

नीलिमा की शिकायत पर पुलिस ने पंकज के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 294 और 323 के तहत मामला दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया और मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जमानत मिल गई. इस के पहले उस का मैडिकल भी कराया गया था. यह मामला उतना सहज नहीं है जितना लग रहा है. इस की वजह यह है कि रिपोर्ट लिखाते वक्त नीलिमा ने 3 बार अपने बयान बदले थे. अलावा इस के इतने बड़े पद पर होने के बाद भी उस ने ऐसे आदमी पर भरोसा क्यों किया जो उस के साथ पहले भी ज्यादती कर चुका था. तब उस ने उस की रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं कराई. इस के बावजूद भी वह आधी रात को उस के साथ एक कमरे में रुकने और सोने भी चली गई. यह बात भी समझ से परे है.

ऐसे कई झोल इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस में हैं, जो अब शायद ही सामने आएं. वजह पुलिस इस बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं दे रही. चर्चा यह भी रही कि दोनों भोपाल में रहते हुए कई अधिकारियों और एक रसूखदार भाजपा नेता से भी मिले थे. पंकज सिंह से पूछताछ की गई तो पुलिस वालों के रहेसहे होश भी तब उड़ गए. जब यह पता चला कि उस के पिता रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और एक भाई कलेक्टर और दूसरा भाई आईपीएस अधिकारी है. आरोपी और पीडि़ता दोनों रसूखदार और पहुंच वाले हों तो पुलिस वालों के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति हो जाती है, इसलिए पुलिस ने मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया और बलात्कार का यह मामला आयागया हो गया.

वैसे भी इसे बलात्कार मानने और कहने में हिचकने की अपनी वजहें हैं जिन्हें पंकज सिंह का वकील अदालत में गिनाएगा कि यह सब पीडि़ता की सहमति से हुआ था. क्योंकि वह अपनी मरजी से उस के मुवक्किल के साथ कमरे में ठहरी थी और बलात्कार से बचने के लिए चिल्लाई नहीं थी, फिर इसे बलात्कार कैसे कहा जा सकता है. रही बात पहले किए गए दुष्कर्म की तो भोपाल पुलिस इस बात को पचाने में कामयाब रही कि ऐसा कोई वीडियो उसे नहीं मिला था.

इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस के चर्चे भोपाल के राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में है कि देखें कोई नया गुल खिलता है या फिर दोनों पक्षों में अदालत से बाहर समझौता हो जाएगा, जिस की उम्मीद ज्यादा है.

बलात्कारियों को मिली अंतिम सांस तक उम्रकैद

31अगस्त, 2018 को चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पूनम आर. जोशी की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. अदालत की काररवाई शुरू होने से पहले ही वकील, कई सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, पत्रकार वगैरह कोर्टरूम में पहुंच चुके थे.

इस फास्टट्रैक कोर्ट में उस दिन एक ऐसे केस का फैसला सुनाया जाना था, जिस की चर्चा पंजाब में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हुई थी. मामले के मीडिया में चर्चित बने रहने की वजह से केस की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में हुई थी. मात्र 122 दिनों में कोर्ट ने पूरी सुनवाई पूरी कर आरोपियों को 27 अगस्त को दोषी ठहरा कर 31 अगस्त को फैसला सुनाने का दिन मुकर्रर कर दिया था.

माननीय न्यायाधीश पूनम आर. जोशी निर्धारित समय पर कोर्ट में पहुंचीं. उन्होंने सब से पहले केस की फाइल पर नजर डाली. फिर सामने कटघरे की तरफ देखा. तीनों दोषी मोहम्मद इरफान, किस्मत अली और मोहम्मद गरीब कटघरे में मुंह लटकाए खड़े थे. उन्हें शायद इस बात का अंदेशा हो गया था कि अदालत उन्हें सख्त सजा ही सुनाएगी, इसलिए उन के चेहरों पर हवाइयां उड़ी हुई थीं.

अदालत का फैसला जानने से पहले उस मामले के बारे में जान लिया जाए तो बेहतर होगा, जिसे सौल्व करने के लिए पंजाब पुलिस ने रातदिन एक कर दिया था. चंडीगढ़ के विभिन्न थानों के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के अलावा इस मामले के इनवैस्टीगेशन में क्राइम ब्रांच और साइबर सेल का भी सहयोग लिया गया था.

बात 17 नवंबर, 2017 की है. देहरादून निवासी 21 वर्षीय रमा शाम के करीब 7 बजे चंडीगढ़ के सेक्टर-37 स्थित कोचिंग सेंटर से अपनी कोचिंग क्लास खत्म कर के जैसे ही बाहर निकली, उस के घर वालों का देहरादून से फोन आ गया. वह फोन पर बातें करते हुए औटो पकड़ने के लिए मेनरोड पर स्थित बसस्टाप पर पहुंच गई.

फोन पर बात करते करते ही उस ने औटो रुकवाया. उस के बाद वह औटो में बैठ गई. औटो में पहले से ही 2 सवारियां बैठी हुई थीं, जिन की ओर रमा ने ध्यान नहीं दिया था. वह फोन पर बातें करने में व्यस्त थी.

रमा चंडीगढ़ की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी. नौकरी के अलावा उस ने सेक्टर-37 के एक कोचिंग सेंटर में कोचिंग लेनी भी शुरू की थी. उस का कोचिंग में वह तीसरा दिन था. कुछ दूर आगे चलने के बाद औटो ड्राइवर ने पैट्रोल भरवाने की बात कहते हुए औटो सेक्टर-42 की ओर मोड़ दिया.

रमा ने वहीं उतारने की बात कही तो औटो ड्राइवर ने अपनी बेटी की बीमारी की बात कह कर उसे औटो से न उतरने को कहा. फलस्वरूप वह औटो में ही बैठी रही. इस दौरान औटो ड्राइवर उसे बच्ची बच्ची कह कर अपनी बेटी और उस की बीमारी की कहानी सुना कर सांत्वना जुटाता रहा.

बाद में सेक्टर-42 स्थित पैट्रोल पंप के पास आ कर औटो रुक गया. औटो ड्राइवर और दोनों सवारियां औटो को धक्का मार कर अंदर ले गए थे, क्योंकि औटो में पैट्रोल खत्म हो गया था.

औटो में पैट्रोल भरवा कर ड्राइवर ने सेक्टर-43 से यू टर्न लिया. सेक्टर-53 पहुंच कर ड्राइवर ने औटो को स्लिप रोड पर ले लिया. कुछ दूर आगे जा कर ड्राइवर ने औटो खराब होने का नाटक करते हुए औटो रोक लिया.

ड्राइवर ने औटो खराब होने की बात कही, तो रमा औटो से उतर गई और ड्राइवर को पैसे देने लगी. वह कोई दूसरा औटो पकड़ कर जल्द जाना चाहती थी, क्योंकि पैट्रोल वगैरह के चक्कर में उस का काफी समय बरबाद हो चुका था और उसे घर जाने की जल्दी थी.

रमा औटो ड्राइवर को किराए के पैसे देने ही वाली थी कि पीछे बैठे दोनों युवकों ने उसे औटो के अंदर खींच लिया. यह देख ड्राइवर ने औटो दौड़ा दिया और एक सुनसान जगह पर ले गया. रमा ने विरोध करते हुए शोर मचाना चाहा तो युवकों ने उस का मुंह बंद कर दिया, जिस से वह शोर नहीं मचा सकी.

सुनसान जगह पर पहुंचने के बाद तीनों रमा को औटो से निकाल कर पास के जंगली एरिया में ले गए. वहां तीनों ने मिल कर उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया. दुष्कर्म के बाद उन्होंने रमा को चाकू दिखाते हुए चुप रहने की धमकी दी. इस से वह बुरी तरह डर गई.

वारदात को अंजाम देने के बाद वे तीनों रमा को छोड़ कर वहां से भाग निकले थे. साथ ही वे रमा का मोबाइल भी ले गए थे. रमा लड़खड़ाते कदमों से किसी तरह मेन रोड पर पहुंची और उस ने एक बाइक सवार को रोक कर अपनी आपबीती सुनाई. उस बाइक सवार की मदद से उस ने फोन द्वारा अपने साथ घटी घटना की सूचना पुलिस को दी.

सूचना मिलते ही सेक्टर-36 के एसएचओ इंसपेक्टर नसीब सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. वह रमा को सेक्टर-16 के सरकारी अस्पताल ले गए. रमा गहरे सदमे में थी.

पुलिस हुई सक्रिय

मामला एक छात्रा से संबंधित था, इसलिए खबर मिलते ही डीएसपी (साउथ) और एसएसपी नीलांबरी विजय जगदले तुरंत अस्पताल पहुंच गईं.

डाक्टरों ने बताया कि रमा सदमे में तो है लेकिन उस की हालत खतरे से बाहर है. रमा के बयानों के आधार पर पुलिस ने 3 अज्ञात लोगों के खिलाफ सामूहिक दुराचार का मामला भादंवि की धारा 376(डी), 376(2) जी और 506 के अंतर्गत दर्ज कर लिया. देहरादून में मौजूद रमा के घर वालों को भी फोन से इस मामले की सूचना दे दी गई थी.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने तुरंत पूरे शहर में अलर्ट जारी कर दिया और चंडीगढ़ से बाहर जाने वाली हरियाणा-पंजाब और हिमाचल की सीमाओं को सील कर दिया गया. उसी रात रमा की निशानदेही पर उस पैट्रोल पंप की सीसीटीवी फुटेज निकाल कर चैक की गई और रमा को साथ ले कर पूरा क्राइम सीन रीक्रिएट किया गया.

दरअसल, रमा चंडीगढ़ में नई थी. उसे रास्तों की पूरी जानकारी भी नहीं थी, इसीलिए औटो ड्राइवर उसे बहका कर गलत रास्ते पर ले गया था. सीसीटीवी फुटेज से पुलिस को कुछ खास हाथ नहीं लगा. ऐसा लगता था जैसे अपराधियों ने इस घटना को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया था.

औटो की आगेपीछे की नंबर प्लेट को 2 युवकों ने अपने हाथों से ढक रखा था. केवल एक युवक का ही अस्पष्ट चेहरा दिखाई दे रहा था. पुलिस ने उसी अस्पष्ट चेहरे को ले कर अपनी जांच आगे बढ़ानी शुरू कर दी.

अगले दिन इस घटना को ले कर पूरे शहर में हंगामा खड़ा हो गया. इस मामले को दिल्ली के निर्भया कांड से जोड़ कर देखा जाने लगा. स्कूलों कालेजों के छात्रछात्राएं, समाजसेवी संस्थाएं और राजनीतिक दल सड़कों पर उतर आए. आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर सजा देने की मांग उठने लगी.

विधानसभा में भी पुलिस की नाकामी और इस घटना की निंदा की गई. विपक्ष ने जम कर हंगामा किया. उसी दिन यानी 18 नवंबर को सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पीडि़ता रमा के अदालत में मजिस्ट्रैट के समक्ष बयान दर्ज करवाए गए.

रमा ने मजिस्ट्रैट को पूरा घटनाक्रम विस्तार से बता दिया. उस ने यह भी दरख्वास्त की कि मीडियाकर्मियों को उस से दूर रखा जाए. रमा की अपील पर मजिस्ट्रैट ने पुलिस को आदेश दिया कि इस मामले से जुड़ा कोई भी दस्तावेज लीक नहीं होना चाहिए.

एसएसपी नीलांबरी विजय जगदले ने आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने के लिए क्राइम ब्रांच, स्पैशल सेल और साइबर क्राइम सेल को अलर्ट करने के साथ सभी थानों के एसएचओ और पूरी फोर्स को इस काम पर लगा दिया.

चंडीगढ़ पुलिस का पूरा अमला लगा आरोपियों को ढूंढने में

उन्होंने यह भी आदेश दिया कि सभी अफसर अपने अपने एंगल से इस केस पर काम करते हुए आरोपियों तक पहुंचें. साथ ही उन्होंने थाना सेक्टर-36 के एसएचओ इंसपेक्टर नसीब सिंह व अन्य थानों के तेजतर्रार इंसपेक्टर रामरतन, इंसपेक्टर रंजीत सिंह, इंसपेक्टर बलदेव, इंसपेक्टर आर.आर. शर्मा के नेतृत्व में कई टीमें बना कर आरोपियों की तलाश शुरू करवा दी.

इस के अलावा कई डीएसपी और इंसपेक्टरों को भी इस केस पर लगाया गया. पुलिस हर एंगल से जांच कर रही थी. पुलिस ने सीसीटीवी में कैद एक आरोपी के चेहरे को लोकल टीवी, सोशल मीडिया पर दिखा कर उसे पकड़वाने में सहयोग की अपील की. साथ ही गली गली में उस के पोस्टर भी चिपकवा दिए गए, पर इतना कुछ करने के बावजूद घटना के 24 घंटे बाद भी पुलिस के हाथ खाली ही रहे.

पुलिस इस एंगल पर भी काम कर रही थी कि कहीं यह औटो ड्राइवरों का कोई गैंग तो नहीं जो मौका देख अकेली युवतियों को पकड़ कर उन से बलात्कार करता है. क्योंकि 12 सितंबर, 2016 को भी एक ऐसी ही वारदात हुई थी.

इस मामले में कालसेंटर में काम करने वाली युवती ने सेक्टर-34 से अपने घर जाने के लिए औटो लिया था. औटो में 2 लोग पहले से ही सवार थे. ड्राइवर सहित 3 लोगों ने उस युवती के साथ सामूहिक दुराचार किया था. इस केस में 6 दिन बाद औटो ड्राइवर तो पकड़ा गया था पर बाकी के 2 लोग अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर थे.

अगस्त, 2016 को ही मिस्र की रहने वाली एक युवती से औटो में दुष्कर्म का प्रयास हुआ था, जिस का आरोपी पकड़ा गया था. इसी तरह 24 मार्च, 2017 को एक युवती के साथ चलते औटो में दुष्कर्म का प्रयास किया गया था. उस युवती ने किसी तरह औटो से कूद कर अपनी जान और इज्जत बचाई थी. इस केस का दोषी भी अभी तक नहीं पकड़ा गया था. इन सब मामलों को देखते हुए पुलिस इस एंगल पर भी काम कर रही थी. सैकड़ों औटो ड्राइवरों से पूछताछ की गई.

इस के अलावा आसपास के हिस्ट्रीशीटरों से भी पूछताछ की गई पर नतीजा शून्य ही रहा. इस घटना के 4 दिन बीत जाने पर भी जब पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा तो चंडीगढ़ पुलिस ने 21 नवंबर को ईनाम के पोस्टर छपवा कर गली गली में चिपकवा दिए. पुलिस ने आरोपी औटो ड्राइवर के बारे में या इस केस से संबंधित कोई भी जानकारी देने वाले को एक लाख रुपए का ईनाम देने की घोषणा की थी.

देर से ही सही, मिल गई सफलता

दिनरात की भागदौड़ के बाद आखिर 7 दिन बाद पुलिस को इस मामले में सफलता मिली. सेक्टर-49 की थाना पुलिस ने जीरकपुर निवासी मोहम्मद इरफान को चंडीगढ़ से ही गिरफ्तार कर लिया. यह वही औटो ड्राइवर था, जिस के औटो में रमा बैठी थी.

इस के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर 28 नवंबर, 2017 को अन्य दोनों अभियुक्तों मोहम्मद गरीब और किस्मत अली उर्फ पोपू को उत्तर प्रदेश स्थित उन के पैतृक घर अमेठी और फैजाबाद से गिरफ्तार किया. पुलिस उन के घर में इंश्योरेंस एजेंट बन कर पहुंची थी और उन की पहचान होने पर उन्हें उन के घर से ही धर दबोचा था.

25 नवंबर को पीडि़ता रमा ने मजिस्ट्रैट के सामने मुख्य अभियुक्त औटो ड्राइवर मोहम्मद इरफान की पहचान कर ली थी. पहचान हो जाने के बाद पुलिस इरफान को अदालत में पेश कर उसे रिमांड पर लेना चाहती थी. लेकिन उसी समय उस ने खिड़की का कांच तोड़ कर अपने पेट पर 3-4 वार कर आत्महत्या करने का प्रयास किया. नतीजतन उसे अस्पताल में भरती करवाया गया.

पुलिस ने मोहम्मद गरीब और किस्मत अली की भी शिनाख्त मजिस्ट्रैट के सामने करवाई. पीडि़ता ने उन्हें भी पहचान लिया. इस मामले में पुलिस ने अभियुक्तों की पहचान से ले कर डीएनए टेस्ट तक कराने के बाद अपनी सारी काररवाई पूरी कर तीनों अभियुक्तों को अदालत पर पेश कर जेल भेज दिया था. अभियुक्तों को जेल भेजने के बाद 21 फरवरी, 2018 को पुलिस ने तीनों अभियुक्तों के खिलाफ अदालत में चालान भी दाखिल कर दिया.

13 मार्च, 2018 को पुलिस ने रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में मोहम्मद इरफान के अपराध स्वीकार करने के बाद दिसंबर 2016 को काल सेंटर में काम करने वाली एक युवती से गैंगरेप मामले में भी उसे आरोपी बनाया. 23 अप्रैल, 2018 को औटो गैंगरेप के तीनों दोषियों पर अदालत में आरोप तय किए गए और 2 मई, 2018 को इस केस का ट्रायल फास्टट्रैक कोर्ट में शुरू हुआ.

8 मई, 2018 को पीडि़ता रमा ने अदालत में अपना बयान दर्ज करवाया और तीनों अभियुक्तों के खिलाफ गवाही भी दी. 23 मई, 2018 को तीनों आरोपियों के डीएनए टेस्ट की सीएफएसएल रिपोर्ट अदालत में सौंपी गई. रिपोर्ट पौजिटिव थी. फिर पहली अगस्त, 2018 को तीनों दोषियों के सीआरपीसी की धारा 313 के तहत बयान दर्ज हुए.

फास्टट्रैक कोर्ट ने 122 दिनों में दिया फैसला

कोर्ट ने आरोपियों को अपनी बात रखने का मौका दिया. अदालत की काररवाई तेज गति से चल रही थी. 21 अगस्त, 2018 को इस केस की अंतिम बहस के बाद केस का ट्रायल पूरा हो गया था. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश पूनम आर. जोशी ने 27 अगस्त, 2018 को तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया और बताया कि इस केस का फैसला 31 अगस्त को सुनाया जाएगा.

फैसला जानने के लिए शहर के तमाम लोग 31 अगस्त, 2018 को अदालती काररवाई शुरू होने से पहले ही विशेष अदालत में पहुंच गए थे. जैसे ही माननीय जज एडीजे पूनम आर. जोशी अपनी सीट पर आ कर बैठीं तो कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया. सभी की निगाहें माननीय जज पर ही लगी थीं. उन्होंने कहा कि दोषियों ने ऐसा अपराध किया है जिस की सजा इन्हें अवश्य मिलनी चाहिए.

तमाम गवाहों के बयान और सबूतों के आधार पर अदालत ने मोहम्मद इरफान, किस्मत अली और मोहम्मद गरीब को भादंवि की धारा 376(डी) सामूहिक दुराचार और 506 आपराधिक धमकी के तहत दोषी करार देते हुए अंतिम सांस तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई.

विशेष अदालत ने 122 दिनों में ट्रायल समाप्त करते हुए सजा के अलावा तीनों मुजरिमों पर अलगअलग 2 लाख 5 हजार रुपए का जुरमाना भी लगाया. जुरमाना राशि में से 2-2 लाख यानी 6 लाख रुपए पीडि़ता को बतौर मुआवजा देने के आदेश दिए.

पुलिस ने मोहम्मद इरफान, मोहम्मद गरीब और किस्मत अली उर्फ पोपू के खिलाफ आईपीसी की धारा 376(डी), 376(2)जी और 506 के तहत केस दर्ज किया था. हालांकि बाद में पुलिस ने तीनों के खिलाफ चार्जशीट आईपीसी की धारा 376(डी) सामूहिक दुराचार और 506 आपराधिक धमकी देने के तहत दायर की थी. इन्हीं दोनों धाराओं में अदालत में ट्रायल चला था. इस केस में पुलिस की ओर से कुल 19 सरकारी गवाह पेश किए गए, जिन्होंने अदालत में अभियुक्तों के खिलाफ गवाही दी थी.

इस केस का ट्रायल फास्टट्रैक कोर्ट में 122 दिनों तक चला. शुक्र है कि यह फास्टट्रैक कोर्ट थी, जिस में इतनी जल्दी न्याय पाना आसान हुआ. अगर साधारण कोर्ट होती तो 122 दिनों की जगह 122 महीने या फिर साल भी लग सकते थे. आए दिन बच्चियों से ले कर वरिष्ठ महिला नागरिकों तक, हर उम्र हर तबके की औरतों का बलात्कार ब्रेकिंग न्यूज बनता है. मीडिया में आक्रोश बढ़ता है तब कहीं जा कर एकाध केस में फास्टट्रैक कोर्ट की घोषणा की जाती है.

जब हम अपने देश में बुलेट ट्रेन का संकल्प कर रहे हैं तो न्याय की बुलेट ट्रेन क्यों नहीं चल सकती. न्याय में देरी अपने आप में अन्याय है. इस घातक विलंब में कई मूल मसले कुचल दिए जाते हैं. अगर अपराधियों के खिलाफ त्वरित कानूनी काररवाई अमल में लाई जाए तो निश्चित ही अपराधियों में कानून का डर बैठेगा.

—मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीडि़ता का नाम बदला गया है.

विकृत : कौन समझेगा दुष्कर्म की पीड़ा?

विकृत : कौन समझेगा दुष्कर्म की पीड़ा? – भाग 3

‘‘बस करो दीदी,’’ लड़का चीखा, ‘‘मुझे मार दो, लेकिन इस तरह शर्मिंदा मत करो. मैं भी जीना नहीं चाहता. मैं भाई के नाम पर कलंक हूं. मैं नशे में होश खो बैठता था.’’

‘‘अब अपनी करनी का दोष शराब को दे रहा है.’’ लड़की ने कहा. उस की सहेली के साथ उस के इस भाई ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर क्रूरतम कांड किया था.

‘‘नीलेश, अब मैं तेरी बहन नहीं, मौत हूं.’’

‘‘हां सुरभि, मुझे मार दो. मौत ही अब मेरी मुक्ति का उपाय है.’’ नीलेश ने कहा,’’ लेकिन कोशिश करना कि कानूनी, गैरकानूनी रूप से चलने वाला नशे का व्यापार बंद हो जाए, क्योंकि नशे में आदमी अपना होश खो बैठता है.’’

‘‘तुम खुद बताओ,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘एक बलात्कारी की सजा क्या होनी चाहिए? क्या उसे नपुंसक बना देना चाहिए?’’

‘‘आप चाहें तो बना सकते है डाक्टर साहब. लेकिन इस से तो आदमी और भी विकृत हो जाएगा. वह महिलाओं का खूंखार हत्यारा हो जाएगा.’’ खुशाल ने कहा.

‘‘तो आजीवन कारावास उचित रहेगा?’’ डाक्टर की पत्नी ने पूछा.

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, आप उन लोगों के बारे में सोचिए, जिन पर झूठे आरोप लगा कर जीवन भर जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है. यह उन के साथ अत्याचार नहीं होगा, मैं ने 10 साल जेल में बिताए हैं. वहां आधे से अधिक लोग झूठे आरोपो में सजा काट रहे हैं, तमाम लोगों की न जाने कितने दिनों से सुनवाई चल रही है.’’

‘‘तो क्या दुष्कर्मियों को छोड़ दिया जाए?’’ सुरभि ने पूछा.

‘‘एक स्वस्थ समाज, जिस में न कोई नशीले पदार्थ का सेवन करता हो, न मानसिक रूप से विकृत हो, वहां दुष्कर्म के लिए जो भी सजा दी जाए, कम है.’’ खुशाल ने कहा तो जवाब में सुरभि बोली, ‘‘ऐसा व्यक्ति दुष्कर्म करेगा ही क्यों, जो नशा भी न करे और विकृत भी न हो.’’

‘‘वही तो मैं भी कह रहा हूं कि दुष्कर्म के पीछे दुष्कर्मी की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखना जरूरी है.’’

‘‘ऐसे भी लोग हैं, जो नशा नहीं करते, विकृत होने के कोई कारण भी नहीं हैं, फिर भी दुष्कर्म करते हैं.’’ सुरभि ने कहा.

‘‘ऐसे ही लोग दुष्कर्म के सही आरोपी हैं, जो अपनी हवस शांत करने के लिए छोटे बच्चों, कमउम्र की बच्चियों को बहलाफुसला कर उन के साथ संबंध बनाते हैं. ऐसे लोग समाज को गंदा कर रहे हैं. अपनी यौन पिपासा मिटाने के लिए अपनी मर्यादा को लांघते हैं. इन में स्त्रियां भी हैं.’’ खुशाल ने कहा.

‘‘तो तुम लोगों को छोड़ दिया जाए, यही चाहते हो न तुम लोग?’’ सुरभि ने कहा, ‘‘तुम अपराधी नहीं हो, तुम यही कहना चाहते हो न?’’

नीलेश ने नजरें नीची कर के कहा, ‘‘नहीं दीदी, मुझे मौत चाहिए.’’

‘‘बेटी,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘इन के किए की सजा इन्हें कानून देगा. हम क्यों अपने हाथ खून से रंगे. चलो, ये तो वैसे भी मरे और बीमार लोग हैं.’’

डाक्टर की पत्नी ने कहा, ‘‘चलो बेटी, इन्हें अनदेखा करना, इन से सावधान रहना और इन से कोई रिश्ता मत रखना. इन्हें अपने से अलग कर देना ही इन के लिए उचित सजा है. शर्म होगी तो खुद मुंह छिपाते हुए मर जाएंगें.’’

‘‘लेकिन मैं इन्हें मार देना चाहती हूं. ये दुष्कर्मी और हत्यारे हैं’’ सुरभि गुस्से में  चीखी.

‘‘किसी को योजनाबद्ध तरीके से जाल में फांस कर उन के साथ अत्याचार कर के मार देना विकृत और अपराधी किस्म के लोगों का काम है. जान लेना कोई बड़ा काम नहीं, यह काम कायर करते हैं. बेटी, हम सभ्य समाज के सभ्य लोग हैं. हमारा काम जान बचाना है, लेना नहीं.’’

इस के बाद डाक्टर और उन की पत्नी ने दोनों को पानी पिलाया. डाक्टर की पत्नी ने कहा, ‘‘जिस बच्चे को हम अपने गर्भ में पालते हैं, सीने का दूध पिला कर पालते हैं, वही बड़ा हो कर हम से ताकत दिखा कर खुद को मर्द साबित करना चाहता है. हमें प्रकृति ने कोमल और नाजुक इसलिए बनाया है, ताकि बच्चों को गर्भ का बिछौना और पोषण के लिए भोजन मिल सके. लेकिन तुम जैसे लोगों की समझ में यह बात नहीं आएगी.’’

दोनों के पैरों को बंधा छोड़ कर डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं तुम लोगों को माफ करता हूं.’’

इस के बाद डाक्टर ने दोनों के हाथों के बंधन इतने ढीले कर दिए कि उन के जाने के बाद वे थोड़ी मेहनत के बाद स्वयं को बंधन मुक्त कर सकें.

‘‘ये क्षमा या दया के योग्य नहीं, वध के योग्य हैं.’’ सुरभि ने कहा.

‘‘नहीं बेटी, हम इन के जैसे घिनौने और विकृत नहीं है.’’ डाक्टर ने सुरभि के हाथ से पिस्तौल ले कर फेंकते हुए कहा. इस के बाद वह पत्नी और सुरभि को ले कर बाहर आ गए. अपनी कार स्टार्ट की और चले गए.

उन के जाने के बाद कोशिश कर के नीलेश और खुशाल ने खुद को बंधन मुक्त किया और थकेहारे वहीं बैठे रहे. शर्म और ग्लानि उन के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी. पिस्तौल, तलवार, रौड वहीं पड़ी हुई थी.

‘‘मैं जीना नहीं चाहता’’ नीलेश ने कहा, ‘‘तुम्हारी वजह से मेरी जिंदगी बरबाद हुई है.’’

‘‘अब मैं भी नहीं जीना चाहता.’’ खुशाल ने कहा.

कुछ देर दोनों खामोश बैठे रहे. उस के बाद खुशाल ने कहा, ‘‘सोचा तो था कि जेल से बाहर आने के बाद नई जिंदगी शुरू करूंगा. लेकिन अब पता चला कि हमें जीने का कोई अधिकार नहीं है. हम जीने लायक नहीं हैं.’’

‘‘हम इतने गिर चुके हैं कि किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं हैं. जिस की बहन ही अपने भाई पर भरोसा न करे, जो खुद से नजरे न मिला सके, ऐसे जीने से मर जाना ही ठीक है. कितना अच्छा होता अगर वे मुझे मार देते.’’ नीलेश ने कहा.

‘‘मैं खुद को उसी तरह सजा दे कर अपने पापों से मुक्त होना चाहता हूं.’’ खुशाल ने कहा और वहां पड़ी लोहे की रौड एवं तलवार उठाई. लेकिन आगे की बात सोच कर उस का दिल कांप उठा.

‘‘मैं भी स्वयं को वही सजा देना चाहता हूं, जो मैं ने लड़कियों को दी है.’’ नीलेश ने कहा तो खुशाल ने तलवार और रौड नीलेश की ओर फेंक कर कहा, ‘‘यह लो, लेकिन हम में इतना साहस नहीं है कि हम स्वयं को उसी तरह बेरहमी से दंडित कर सकें.’’

नीलेश तलवार ले कर काफी देर तक सोचता रहा. उस के बाद तलवार फेंक कर बोला, ‘‘मैं कायर और डरपोक हूं.’’

‘‘काश! हम ने किसी लड़की को समझा होता?’’ खुशाल ने रोते हुए कहा.

‘‘लेकिन मैं खुद को जरूर सजा दूंगा. स्वस्थ समाज के लिए मेरा मर जाना ही ठीक है.’’ नीलेश ने पास पड़ी पिस्तौल उठा कर कनपटी पर लगाते हुए कहा.

‘‘मैं बूढ़ा हूं. मुझे मर जाने दो. तुम्हारा जीवन तो अभी शुरू हुआ है. तुम में सुधार की गुंजाइश है. अगर तुम ठान लो तो बेहतर नागरिक बन सकते हो.’’ खुशाल ने नीलेश को समझाते हुए कहा.

‘‘क्या पता मेरा विकृत मन अपने दोस्तों के साथ नशा कर के फिर कोई नीच हरकत कर बैठे. उस के बाद तीनों को अपनी उदारता पर पश्चाताप होगा. इस के बाद वे फिर कभी किसी को और स्वयं को माफ नहीं कर सकेंगे.’’

इस के बाद धांय की आवाज हुई और नीलेश जमीन पर गिर कर छटपटाने लगा. फिर खुशाल ने वही पिस्तौल उठा कर अपनी कनपटी पर लगाई. उसे उन तमाम लड़कियों की चीखें, कराहें सुनाई दीं, जिन के साथ उस ने दुष्कर्म किया था. वह मन ही मन बड़बड़ाया, ‘‘मेरे पापों के लिए इस से आसान मौत दूसरी नहीं हो सकती. हम तो इस लायक हैं कि हमारे शरीर में लोहे की रौड डाली जाए. हमारा गुप्तांग काट कर हमें हिजड़ों की जमात में भेज दिया जाए. लेकिन मैं खुद के लिए आसान सजा का चुनाव कर रहा हूं.’’

इस के बाद एक गोली और चली. उसी के साथ खुशाल का शरीर एक ओर लुढ़क गया. शायद यही उन के किए की सजा थी.

विकृत : कौन समझेगा दुष्कर्म की पीड़ा? – भाग 2

लड़का अधेड़ को जलती नजरों से इस तरह देख रहा था, जैसे वह उस का अपराधी हो. अपराधी था भी. वह अपने बचाव के लिए गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझे दुष्कर्मी बनाने में इस का हाथ है. फिर मेरे ऊपर तो मुकदमा चल रहा है. सजा तो होनी ही है. हम जैसे पापियों के लिए जेल की कोठरी ही ठीक है.’’

इसी के साथ एक और गोली चली. इस बार लड़के की चीख निकली. गोली चलाने वाली औरत ने कहा, ‘‘कमीने, जेल की कोठरी तेरे लिए कुछ नहीं है. जेल इंसानों के लिए है. तुम जैसे राक्षसों के लिए तो मौत ही उचित सजा है.’’

‘‘मुझे पानी पिला दो.’’ लड़के ने कहा.

‘‘तुम औरतों, मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म करो और पानी मांगने पर उन्हें पेशाब पिलाओ. अब समझ में आई पानी की कीमत? अब मैं तुम्हें दुष्कर्म की पीड़ा बताऊंगी.’’

तभी 2 लोग और आ गए. वे भी उसी तरह लबादे से ढके थे. उन में से एक के हाथ में लोहे की मोटी रौड थी तो दूसरे के हाथ में तलवार. उन्हें देख कर लड़के ने पूछा, ‘‘ये लोग कौन हैं?’’

‘‘हम कोई भी हों, तुम जैसों के लिए मात्र मांस का टुकड़ा हैं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है कि हम किसी की मां हैं, बहन हैं या पत्नी हैं. तुम्हें तो सिर्फ औरतों की चीखें सुनने में मजा आता है. आज देखते हैं, तुम कितना दर्द बरदाश्त कर पाते हो?’’

‘‘नहीं, हमें माफ कर दो. गोली मार दो, लेकिन हमें तड़पा तड़पा कर मत मारो.’’ दोनों एक साथ गिड़गिड़ाए.

‘‘तुम्हें उस दर्द का अहसास कराना जरूरी है. तुम्हें नपुंसक बना कर छोड़ देना ही तुम्हारे लिए उचित सजा है.’’

‘‘मेरी बच्चियों, मेरी बात सुनो. मैं मरने से नहीं डरता. हत्यारे को अपनी हत्या से डरना भी नहीं चाहिए. मेरी उम्र 50 साल है और ज्यादा से ज्यादा 10-5 साल और जिऊंगा. तुम लोगों को इस पापी देह के साथ जो करना है, करो. लेकिन पहले मेरी बात सुन लो.’’

‘‘अभी भी कुछ कहना बाकी है?’’ तीनों में से एक ने कहा. वह पुरुष था.

‘‘हां, बहुत कुछ कहना है. लेकिन अपनी जान बचाने के लिए नहीं. मैं नहीं जानता कि तुम लोग कौन हो. मैं यह जानना भी नहीं चाहता. इस बच्चे को मैं ने अपने पाप के लिए इस्तेमाल किया. तब मैं ने सोचा भी नहीं था कि मेरे कर्मों का इस पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा. उसी तरह मेरे दुष्कर्मी होने में मात्र मेरा पुरुष होना ही नहीं है. इस के पीछे समाज की वे गंदगियां हैं, जो हमारे मस्तिष्क को विकृत करती हैं.

‘‘मैं केवल सिनेमा, साहित्य या इंटरनेट को ही इस का दोष नहीं दूंगा. क्योंकि इस का असर कोमल मस्तिष्क पर तो पड़ सकता है, मुझ जैसे थके दिमाग वालों पर नहीं. लेकिन मैं कितनी भी वजहें गिना दूं, इस से मेरे अपराध कम नहीं होंगे. दुष्कर्म पहले भी होते थे. हर ताकतवर ने कमजोर की स्त्री के साथ मौका मिलते ही दुष्कर्म किया. लेकिन अभी जो बाढ़ सी आ गई है, यह समाज में फैला प्रदूषण है.

‘‘स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से न देखना, यह पुरुष प्रधान समाज की देन है. पुरुष औरतों को तुच्छ और कमजोर समझते हैं. जो दंड आप लोग हमें आज दे रहे हैं, अगर यह पहले ही स्त्रियां देना शुरू कर देतीं तो शायद आज यह स्थिति न आती. कोई जवाब देने वाला ही नहीं होगा तो हमला करने वाला कैसे पीछे हटेगा.’’

‘‘यही बकवास सुनानी थी तुम्हें?’’ तीनों में से एक ने पूछा.

‘‘मैं बकवास नहीं कर रहा. मैं मां के पेट से ही दुष्कर्मी बन कर पैदा नहीं हुआ और मेरी हत्या के बाद दुष्कर्म बंद भी नहीं हो जाएंगे. क्या इस में सारा दोष हम मर्दों का ही है? तुम स्त्रियों का कोई दोष नहीं है? क्यों नहीं दिया संसार के पहले दुष्कर्मी को सजा, क्यों सहती रही यह सब, क्यों सृष्टि के आरंभ से ही अबला बनी रहीं, क्यों नहीं दिया उसी समय जवाब?

‘‘तुम्हारी कायरता और कमजोरी की ही वजह से समाज को नियम बनाने पडे़. कानून को स्वयं कठोर बनना पड़ा. आज भी समाज और कानून के भरोसे बैठी हैं औरतें. अकेले नहीं, संगठित हो कर तो हमला कर सकती थीं. जो हालात शुरू में थे, आज वही इतने बिगड़ गए हैं कि दुष्कर्म खत्म करने के लिए आधे से अधिक पुरुषों को मृत्युदंड देना होगा. आप लोगों की कमजोरी की वजह से ही आप लोगों का शोषण होता रहा. सजा ही देनी है तो उन औरतों को भी दो, जो सभ्यता की शुरुआत से यह सब सहती आ रही हैं.’’

‘‘ऐसा नहीं है, जबजब औरतों पर अत्याचार हुए हैं, तब तब विनाश हुआ है. मर्दों को अगर प्रकृति ने शारीरिक रूप से अधिक ताकतवर बनाया है तो स्त्रियों को भी दूसरी शक्तियां दी हैं. प्रकृति किसी के साथ अत्याचार नहीं करती. फूल नाजुक है तो क्या हुआ, खूशबू बिखेरता है, उद्यान की शोभा बढ़ाता है. अगर कोई दुष्ट उसे मसल दे तो इस में फूल का क्या दोष?’’ सब से पहले आई महिला ने कहा.

‘‘एक स्त्री पूरे समाज को प्रभावित करती है. अगर यह ज्यादा है तो कम से कम एक परिवार को तो प्रभावित करती ही है. मकान को घर बनाने वाली स्त्रियां अगर घर को मकान बना दें या बाजार बना दें तो क्या उस घरपरिवार के पुरुष श्रेष्ठ हो सकते हैं?’’

खुशाल की यह बात सुन कर उन तीनों में जो पुरुष था, उस ने कहा, ‘‘खत्म करो इसे. इसी की वजह से मेरी बेटी पागलखाने में मरी थी. यह दुष्कर्मी है. हत्यारा है मेरी बेटी का. डाक्टर होते हुए भी मैं अपनी बेटी को नहीं बचा सका. इस के जुल्म के आगे मेरी चिकित्सा हार गई.’’

खुशाल समझ गया कि यह डाक्टर उसी लड़की का बाप है, जिस के साथ उस ने दुष्कर्म किया था. उसे सजा न होने पर वह लड़की पागल हो गई थी. इस के अनुसार अब वह मर चुकी है. उस ने कहा, ‘‘मेरी मां मेरे पिता की गैरहाजिरी में एक आदमी को बुला कर उस के साथ कमरे में बंद हो जाती थी. एक दिन मेरे चाचा ने उसे देख लिया तो उस ने पिता के सामने रोते हुए चाचा पर दुष्कर्म का झूठा आरोप लगा कर उन्हें जेल भिजवा दिया.

‘‘जमानत पर वापस आ कर जब समाज ने, परिवार ने चाचा को प्रताडि़त किया तो उन्होंने आत्महत्या कर ली. जब मेरे पिता ने अपनी आंखों से मां को गैरमर्द के साथ देख लिया तो मां ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर उन की हत्या कर दी. बाद में पकड़ी गई और जेल चली गई. मां की इस हरकत से मुझे सारी स्त्रियां हत्यारिन और कामलोलुप नजर आने लगीं.

‘‘बड़े होने पर मेरा विवाह हुआ. मेरे साथ भी वही हुआ, जो मेरे पिता के साथ हुआ था. किसी गैर मर्द की संगत की वजह से मेरी पत्नी ने मुझ पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगा कर मुझे जेल भिजवा दिया और खुद अपने आशिक के साथ रंगरलियां मनाती रही. मैं जमानत पर जेल से बाहर आया तो मुझ से तलाक ले लिया. बस उसी के बाद से मैं ने औरतों को अपमानित करना शुरू कर दिया.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि तुम 2 औरतों के किए का बदला सारी स्त्री जाति से लेना चाहते थे?’’ लड़की ने पूछा.

लड़की की बात का जवाब देने के बजाय खुशाल ने डाक्टर से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, पढ़ेलिखे हो कर आप भी गैरकानूनी काम कर रहे हैं. आप गुस्से में विकृत हो चुके हैं. मेरा भी मनमस्तिष्क विकृत हो चुका है. आप भले मुझे गोली मार दें, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मेरे दुष्कर्मी होने के पीछे औरतों का हाथ था. बेवफाई और बेहयाई ने मुझे ऐसा बनाया. इस की छाप मेरे मस्तिष्क पर बचपन से पड़ चुकी थी.’’

तीनों में से महिला ने अपना चोंगा उतार फेंका. उस की उम्र 60 साल के आसपास थी. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी बातों से मैं कुछ हद तक सहमत हूं. मैं ने भी अपनी मां की वजह से पिता को तिलतिल मरते देखा था. परिवार की वजह से मैं स्वयं भी काफी समय तक अवसाद में रही. लेकिन मैं ने खुद को संभाला, पढ़ाई की और डाक्टर बन गई. एक बेटी को जन्म दिया, जिसे तुम ने मौत के मुंह में धकेल दिया. तुम्हें अतीत ने विकृत किया, इस की वजह से तुम्हारे अपराध कम नहीं हो सकते. उन्हें माफ भी नहीं किया जा सकता.’’

इस के बाद खुद को डाक्टर कहने वाले ने भी अपना चोंगा उतार दिया. वह उस महिला का पति था. बेटी के साथ हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए उन्होंने खुशाल के रिहा होने का इंतजार किया था.

उस के जेल से बाहर आते ही वे उस का अपहरण कर के यहां ले आए थे. उस ने कहा, ‘‘एक डाक्टर होने के नाते मुझे पता है, तुम्हें दंड की नहीं, इलाज की जरूरत है. लेकिन तुम ने मेरी बेटी के साथ जो जुल्म किए हैं, मैं उन्हें बिलकुल नहीं भूल सकता.’’

‘‘गोली मार कर अपने बदले की आग बुझा लीजिए डाक्टर साहब.  मैं भी अपने इस जीवन से ऊब चुका हूं. इस से मैं भी छुटकारा पाना चाहता हूं.’’

‘‘मुझे लगता है, तुम्हारा जिंदा रहना ही तुम्हारे लिए सब से बड़ी सजा है.’’ डाक्टर की पत्नी ने कहा, ‘‘अगर हम ने तुम्हें इस तरह बेरहमी से मार दिया तो तुम में और हम में अंतर ही क्या रह जाएगा?’’

उन दोनों की इस बात से दुखी हो कर उन के साथ आई लड़की ने कहा, ‘‘इन्हें इस तरह छोड़ने के लिए हम ने इतनी मेहनत नहीं की है? इन्हें छोड़ दिया गया तो ये फिर वही करेंगे. इसलिए इन्हें मार देना ही ठीक है.’’

दर्द से बिलबिला रहे लड़के ने कहा, ‘‘तुम लोगों का दुश्मन तो खुशाल है, फिर मुझे क्यों बांध रखा है. इसी की वजह से मेरा जीवन नरक हुआ है. इसे मार दो और मुझे छोड़ दो.’’

‘‘नाबालिग होने की वजह से जिस दुष्कर्म के जुर्म में तुम रिहा हो गए थे, वह जुर्म रिहाई के योग्य नहीं था. कानून की नजर में तुम भले नाबालिग थे, लेकिन अपराध की दृष्टि से नहीं.’’ लड़की ने उस की ओर रिवाल्वर तान कर कहा.

‘‘दीदी…’’ लड़के ने कांपती आवाज में कहा.

‘‘मत कहो मुझे दीदी. तू भाई के नाम पर कलंक है. तुझ से बदला लेने के लिए ये लोग मेरी तलाश कर रहे थे कि जैसा भाई ने किया है, वैसा ही उस की बहन के साथ किया जाए. शुक्र था कि पिता के मित्र होने के नाते ये मुझे अपने घर ले गए, वरना मेरा भी वही हाल होता, जो तूने अपने दोस्तों के साथ मिल कर लड़कियों के साथ किया था. तब तुम यह भी भूल गए थे कि तुम्हारी भी एक बहन है. तू भी किसी का भाई है. वे लड़कियां भी किसी की बहनें थीं. उन का भी भाई रहा होगा. तेरे जैसे हैवान किसी के भाई नहीं हो सकते. मौका मिलता तो तू मुझे भी नहीं छोड़ता.’’

विकृत : कौन समझेगा दुष्कर्म की पीड़ा? – भाग 1

उस बंद पड़ी मिल में कोई आता-जाता नहीं था. उस की दीवारों का सीमेंट उधड़ चुका था, लोहे के पाइपों में जंग लग चुका था, सारी मशीनें कबाड़ हो चुकी थीं. मिल तक पहुंचने का रास्ता भी खराब हो चुका था. शहर के बाहर होने की वजह से वहां कोई कितना भी चीखे, कोई उसे सुनने वाला नहीं होता था.

उसी मिल के अंदर मशीन से एक 50-55 साल का आदमी बंधा था. लेकिन वह अपनी उम्र से काफी बड़ा दिखाई दे रहा था. साधारण से कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, अस्तव्यस्त बाल. उस के दोनों हाथ पीछे की ओर बंधे थे. उस से कुछ दूरी पर एक लड़का बंधा था. उस के कपड़े, जूते आदि उम्दा किस्म के थे. दोनों बेहोश पड़े थे.

जब दोनों को होश आया तो लड़के ने अधेड़ से पूछा, ‘‘मैं यहां कैसे आया, तुम कौन हो?’’

‘‘मुझे क्या पता? देखो न, मैं भी तो तुम्हारी तरह बंधा हूं.’’ अधेड़ ने झल्ला कर कहा.

दोनों पसीने से तरबतर थे. छत टिन की थी, जो मई की गर्मी में तप रही थी. कहीं से हवा भी नहीं आ सकती थी. जो खिड़कियां थीं, वे बंद थीं. लड़का चीखा, ‘‘कोई है?’’

गला सूखा होने की वजह से उसे खांसी आ गई. उस की आंखों से पानी बहने लगा. लड़के ने खांसी पर काबू पाते हुए कहा, ‘‘अगर किसी ने रुपयों के लिए मेरा अपहरण किया है तो वह महामूर्ख है. मेरे न तो मांबाप हैं और न मेरे पास रुपए ही हैं.’’

‘‘मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा था. मैं तो वैसे ही 10 सालों बाद जेल से बाहर आया हूं.’’ अधेड़ ने कहा.

दोनों खामोश हो कर याद करने की कोशिश करने लगे कि वे यहां कैसे पहुंचे?

अधेड़ जेल से 10 साल की सजा काट कर जेल से बाहर निकला था. रात 8 बजे उस की रिहाई हुई थी. जेल से कुछ दूर आने पर अचानक पीछे से आ रही कार ने उसे टक्कर मारी तो वह गिर गया. कार से एक व्यक्ति उतरा. उस ने माफी मांगते हुए कहा, ‘‘आइए, आप की मरहमपट्टी करवा कर आप के घर छोड़ देता हूं.’’

अधेड़ कार में बैठा ही था कि पीछे से किसी ने उस के मुंह पर कुछ रखा, जिस से वह बेहोश हो गया. उस के बाद वह होश में आया तो यहां बंधा था. उस की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती है? 10 सालों से वह किसी के संपर्क में नहीं रहा. कहीं कोई गलती से तो उसे नहीं उठा लाया.

लड़का शराब की दुकान से शराब पी कर घर लौट रहा था, तभी रास्ते में एक छोटा सा बच्चा उसे रोता हुआ मिला. बच्चे के गले में एक रेशम की डोरी से उस के घर का पता बंधा था. बच्चे को देख कर उसे लगा कि यह अपने घर वालों से भटक गया है. उस ने सोचा कि अगर वह इसे इस के घर पहुंचा देता है तो इस के मांबाप उसे कुछ इनाम देंगे, जिस से उस के शराब पीने का इंतजाम हो जाएगा.

वह बच्चे के बारे में सोच ही रहा था कि उस के पास एक कार आ कर रुकी. उस में से एक बुजुर्ग महिला उतरी. उस के कुछ कहने से पहले ही महिला ने उसे बच्चे की सलामती के लिए धन्यवाद देते हुए कहा, ‘‘आप मेरे घर चलिए. हम आप को कुछ इनाम देना चाहते हैं.’’

इनाम के लालच में वह कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठ गया. औरत बच्चे को ले कर पिछली सीट पर बैठ गई. उस के कार में बैठते ही पिछली सीट से किसी ने उस के मुंह पर रूमाल रखा तो वह बेहोश हो गया. लड़के ने कहा, ‘‘मुझे क्लोरोफार्म सुंधा कर बेहोश किया गया था.’’

‘‘मुझे भी.’’ अधेड़ ने हैरानी से कहा.

‘‘मेरा अपहरण क्यों किया गया, यह मेरी समझ नहीं आ रहा है?’’ लड़के ने कहा.

‘‘अपहरण कोई क्यों करता है, पैसों के लिए या फिर बदला लेने के लिए?’’ अधेड़ ने कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास न पैसे हैं और न किसी से ऐसी दुश्मनी है. मैं तो जेल से छूट कर आ रहा हूं.’’

‘‘किस जुर्म में जेल गए थे?’’ लड़के ने होंठों पर जीभ फेरते हुए पूछा.

‘‘तुम्हें उस से क्या लेना. यह सोचो कि हमें यहां क्यों लाया गया है? तुम्हारी जरूर किसी से दुश्मनी रही होगी? अपहरण करने वाले को पता होगा कि तुम्हारे पास रुपए नहीं हैं. ऐसा काम करने से पहले आदमी पूरी जानकारी कर लेता है.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे मामले में तो उस ने गलती की है.’’

‘‘मेरा मामला अलग है. तुम अपनी बात करो.’’

दोनों बातें कर ही रहे थे कि तभी दरवाजे के चरमराने की आवाज आई. इस के बाद कदमों की आहट सुनाई दी, जो निरंतर उन के करीब आती जा रही थी. एक आदमी जो सिर से पैर तक ढका था, सिर्फ उस की आंखें दिख रही थीं, आ कर उन के पास खड़ा हो गया. लड़के ने पूछा, ‘‘कौन हो तुम?’’

‘‘जवाब क्यों नहीं देते?’’ अधेड़ चीखा, ‘‘मुझे थोड़ा पानी पिला दो.’’

वह आदमी लौट गया. वापस आया तो उस के हाथ में एक बोतल थी. उस ने अधेड़ के मुंह से बोतल लगाई. एक घूंट पीने के बाद अधेड़ उसे उगल कर गुस्से से चीखा, ‘‘यह क्या है?’’

उस आदमी ने वही बोतल लड़के के मुंह लगा दी. लड़का छटपटाया. लेकिन कुछ बूंदें उस के मुंह में चली गईं. लड़के ने किसी तरह बोतल से मुंह हटा कर हांफते हुए कहा, ‘‘पेशाब क्यों पिला रहे हो?’’

‘‘यह क्या हैवानियत है?’’ अधेड़ ने कहा.

उस आदमी ने अधेड़ को एक ठोकर मारी. वह दर्द से बिलबिला उठा. इस के बाद लड़के को उसी तरह ठोकर मार कर बोला, ‘‘दुष्कर्म करने के बाद रोती गिड़गिड़ाती लड़कियों को तुम यही पिलाते थे न?’’

‘‘लेकिन मैं तो अपने अपराध की सजा काट चुका हूं. ’’ महिला की आवाज सुन कर अधेड़ गिड़गिड़ाया. उसी वक्त उसे पता चला कि वह आदमी नहीं औरत है.

‘‘तभी तो 50 की उम्र में 60 के लग रहे हो खुशाल.’’ उस महिला ने कहा.

अपना नाम सुन कर खुशाल ने पूछा, ‘‘कौन हो तुम?’’

‘‘पहले यह पूछो कि यह लड़का कौन है? जानते हो इसे?’’ लबादे से ढकी औरत ने चीख कर पूछा.

‘‘नहीं, इस से मेरा क्या वास्ता?’’ खुशाल ने लड़के की तरफ अजनबी निगाहों से देखते हुए कहा.

‘‘यह वही लड़का है, जिस के मातापिता अस्पताल जाते समय तुम्हें अपना भाई और इस का चाचा समझ कर इसे तुम्हारे पास छोड़ जाते थे और तुम इस के गले में अपने गोदाम का, जहां तुम काम करते थे, पता लटका कर गर्ल्स हौस्टल, वर्किंग वुमेन हौस्टल, गर्ल्स स्कूल या कालेज के पास छोड़ देते थे. जब कोई लड़की या महिला अपनी नारी सुलभ आदत की वजह से इसे तुम्हारे पास पहुंचाने जाती थी तो तुम अपने नीच दोस्तों के साथ इस मासूम बच्चे के सामने उस के साथ दुष्कर्म करते थे.

‘‘तुम्हारी हरकतों की वजह से इस का दिमाग इतना विकृत हो गया कि यह डाक्टर, इंजीनियर बनने के बजाय दुष्कर्मी बन गया. तुम ने इस के मातापिता से उन का बेटा छीन लिया, इस का पूरा भविष्य छीन लिया. जानते हो इस ने क्या किया है? जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही इस ने अपनी रिश्ते की बहन के साथ वही किया, जो तूने इसे सिखाया था. इस के मातापिता ने शरम से आत्महत्या कर ली.

‘‘कानून ने तुझे सिर्फ एक दुष्कर्म की सजा दी है. इस के मातापिता को आत्महत्या के लिए विवश करने की सजा और इसे दुष्कर्मी बनाने की सजा तो अभी बाकी है. जिन लड़कियों के साथ तूने दुष्कर्म किया था, बता सकता है उन का क्या हुआ था?’’ इतना कह कर उस औरत ने रिवाल्वर निकाला और खुशाल के दाएं पैर पर गोली मार दी. खुशाल दर्द से चीख पड़ा. उस के पैर से खून बहने लगा.

‘‘बताता हूं…बताता हूं. मुझे मत मारो. मैं सब बताता हूं. एक लड़की ने आत्महत्या कर ली थी, दूसरी जबरदस्ती करते वक्त ज्यादा चोट लगने से मर गई थी. तीसरी ने केस किया. लेकिन कोर्ट से मेरे बाइज्जत बरी होने के बाद उसे ऐसा सदमा लगा कि वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठी. सुना है पागलखाने में है. लेकिन तुम कौन हो?’’

बीता वक़्त वापिस नहीं आता

बीता वक़्त वापिस नहीं आता – भाग 3

पुलिस की सूचना पर रोक्सेन भी वहां पहुंच गई थी. बेटी की लाश देख कर उस का कलेजा फटा जा रहा था. आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. वह उस पल को कोस रही थी, जब उस ने वाकर पर विश्वास किया था. उस ने उस के साथ विश्वासघात ही नहीं किया, उस की जिंदगी वीरान कर दी थी. पुलिस ने वाकर की लाश को नीचे उतारा. उस के कपड़ों की तलाशी ली गई, तो पैंट की जेब से एक कागज निकला.

उसे खोला गया, तो वह सुसाइड नोट था. वाकर ने उस में लिखा था, ‘‘मैं इंसान नहीं, जानवर से भी गया गुजरा हूं. मैं ने रोक्सेन से प्यार किया. मेरा प्यार सच्चा था. उस ने भी मुझ पर भरोसा किया और मुझे अपना सब कुछ मान लिया. उस ने मुझे दिल से पति माना, तो मैं ने भी उसे पत्नी माना.

‘‘उस के बच्चों को अपना बच्चा मान लिया. मैं ने पूरी कोशिश की कि रोक्सेन को दिया वादा निभाऊं और स्टेसी एवं रौबर्ट का पिता बनूं. लेकिन मैं अपना वादा निभा नहीं पाया. मैं ने जो किया, उस से रोक्सेन को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा. इसलिए अपने गुनाह की सजा मैं ने खुद चुन ली.

‘‘स्टेसी को मैं बेटी की तरह प्यार करता था. मगर उस के शरीर में आए बदलावों से मेरी नीयत खराब हो गई. मैं उसे बेटी नहीं, औरत समझने लगा. मैं एकांत में उस से छेड़छाड़ करने लगा. जिस का वह कोई विरोध नहीं करती थी. शायद वह उसे पिता का स्नेह समझती थी. रोक्सेन ने मेरी हरकत देख ली और मेरी नीयत को समझ गई. उस ने मुझे टोका, तो एक बार फिर मैं ने वादा किया कि कभी कोई गलत काम नहीं करूंगा.

‘‘लेकिन मैं अपने आप को रोक नहीं सका. कल स्टेसी ने लौरी पर चलने की जिद की, तो मैं खुश हो गया. मैं ने ठान लिया कि हर कीमत पर आज अपनी चाहत पूरी कर लूंगा. मैं ने जल्दीजल्दी माल सप्लाई किया और लौरी को जंगल में ले गया. तब तक अंधेरा हो चुका था. मैं ने रोक्सेन को फोन किया कि हम लौट नहीं पाएंगे. स्टेसी से मैं ने कहा कि सुबह उसे एक नई जगह ले चलूंगा और उस की पसंद के कपड़े खरीद कर दूंगा.

‘‘मेरी नीयत से बेखबर स्टेसी बेहद खुश थी. खाना मैं साथ में पैक करवा कर लाया था. अपने लिए शराब की बोतल भी खरीद ली थी. मैं शराब पीने बैठ गया. स्टेसी लौरी में टीवी देख रही थी. मुझे नशा चढ़ा, तो मेरी आंखों के सामने स्टेसी का जिस्म घूमने लगा. मैं खुद पर नियंत्रण खो बैठा और जो नहीं करना चाहिए था, वह कर डाला. मेरे वहशीपन से स्टेसी बेहोश हो गई थी.

‘‘स्टेसी मुझ से छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ा रही थी. उस समय मैं शैतान बन गया था. मनमानी करने के बाद नशा कम हुआ, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं ने बहुत बड़ा गुनाह कर डाला है. अगर स्टेसी जिंदा रही, तो मुझे जेल जाना पड़ेगा. जेल जाने के डर से मैं ने एक गुनाह और कर डाला. उसे गला घोंट कर मार डाला.

इस के बाद रोक्सेन को दिए वादे की याद आई. अब मुझे अपने गुनाह पर पछतावा होने लगा. तब मैं ने सोचा कि रोक्सेन मेरे मुंह पर नफरत से थूक कर मुझे जेल भिजवाए, उस से पहले ही मैं खुद को क्यों न खत्म कर दूं. मेरी मौत का जिम्मेदार मेरे अंदर का शैतान है. मुझे दुख है कि मैं ने एक पल के सुख के लिए अपने प्यार और अपनी बेटी को खो दिया. रोक्सेन, हो सके तो मेरी लाश पर थूक देना. मैं इसी के काबिल हूं- वाकर.’’

रोक्सेन ने वाकर की लाश पर थूका तो नहीं, लेकिन उसे नफरत से देखते हुए चीखी, ‘‘मैं ने तुम पर भरोसा कर के अपना सब कुछ सौंप दिया था. मैं तुम्हें अपना चार्मिंग प्रिंस समझती थी, लेकिन तुमने…? तुम मुझे इतना प्यार करते थे, मेरे बच्चों का इतना खयाल रखते थे. तुम ऐसा भी कर सकते थे, विश्वास नहीं होता. तुम गंदे आदमी निकले. अच्छा किया जो आत्महत्या कर ली, वरना मैं तुम्हारी हत्या करने से न हिचकती.’’

पुलिस ने 5 जून, 2013 को पूरा प्रकरण कोर्ट में पेश किया, जहां से इस केस की फाइल बंद कर देने का हुक्म दिया गया. आखिर सजा किसे दी जाती, दुष्कर्मी ने खुद ही मौत को गले लगा लिया था.  उस समय कोर्ट में रोक्सेन भी मौजूद थी. उसे तसल्ली देने के लिए उस का पूर्व पति कोरोनट और बेटी एमा हेमंड भी आई थी. दोनों उस समय भी उस के साथ थे, जब पोस्टमार्टम के बाद स्टेसी की लाश को कब्र में दफन किया जा रहा था.

फूल के साथ रोक्सेन के आंसू भी स्टेसी की कब्र पर पड़े थे, जो कह रहे थे कि कहीं न कहीं इस में वह खुद भी गुनहगार है, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए अगर वह वाकर से प्यार न करती, तो आज उस की बेटी की यह हालत न होती. लेकिन अब उस के पास पछताने के अलावा कुछ भी नहीं था. सच है, बीता वक्त कभी वापस नहीं आता.

रोक्सेन ने वाकर पर आंखें मूंद कर विश्वास किया, यह उस की सब से बड़ी भूल थी. ऐसे बहुत कम मामले होते हैं, जिन में प्रेमी या सौतेले पिता अपनी प्रेमिका या दूसरी पत्नी के बच्चों, खास कर बेटियों को दिल से अपना बेटा या बेटी मानते हैं.

बात अगर शादीशुदा महिलाओं के वाचाल किस्म के प्रेमियों की करें, तो उन की निगाह प्रेमिका की जवान हो रही बेटी पर जाते देर नहीं लगती. स्टेसी के साथ भी यही हुआ.

बात प्रेमी या दूसरे पति की ही नहीं, बल्कि बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने वाले 80 प्रतिशत लोग रिश्तेदार या करीबी लोग ही होते हैं. ऐसे लोगों से सतर्क रहना जरूरी है. खासकर जब रिश्ते स्वार्थों पर टिके हों.

बीता वक़्त वापिस नहीं आता – भाग 2

इस के बाद उन की मुलाकातें होने लगीं. वे जब भी मिलते, घंटों एकदूसरे के साथ रहते. रोक्सेन को वाकर की नजदीकी बेहद सुकून देती थी. उस के मिलने से मन तो तृप्त हो जाता था, लेकिन तन की प्यास वैसी ही बनी रहती थी. वाकर एकांत में रोक्सेन के किसी अंग को छू लेता या होंठों को चूम लेता, तो उस की देह में आग सी लग जाती. मन करता कि वाकर की बांहों में समा जाए और उस से कहे कि वह उस के प्यासे तन को तृप्त कर दे. लेकिन वह ऐसा इसलिए नहीं कह पाती थी, क्योंकि वह जगह इस के लिए सुरक्षित नहीं होती थी.

पति की बेरुखी से विचलित वाकर की नजदीकी पा कर रोक्सेन ज्यादा दिनों तक अपनी इच्छा दबाए नहीं रह सकती थी. उस ने वाकर से सीधे तो नहीं कहा, लेकिन एक दिन घुमाफिरा कर अपने मन की बात कह ही दी, ‘‘वाकर, कहीं ऐसी जगह चलते हैं, जहां हम दोनों के अलावा कोई और न हो.’’

‘‘ठीक है, हम कल सुबह किंगस्टन झील पर पिकनिक मनाने चलते हैं.’’ वाकर ने रोक्सेन के दिल की मंशा भांप कर कहा.

अगले दिन पति काम पर चला गया और बच्चे स्कूल चले गए, तो रोक्सेन वाकर के साथ पिकनिक पर निकल गई. शहर से किंगस्टन झील लगभग 30 किलोमीटर दूर थी. वाकर अपनी लौरी से रोक्सेन को वहां ले गया. किंगस्टन एक छोटी सी झील थी. उस के दोनों ओर छोटेबड़े पहाड़ थे. वहां इक्कादुक्का लोग ही नजर आ रहे थे. वे भी प्रेमी युगल थे, जो इन्हीं की तरह एकांत की तलाश में यहां आए थे. रोक्सेन और वाकर भी एक छोटी सी पहाड़ी के पीछे जा पहुंचे. वहां से झील के आसपास का नजारा तो देखा जा सकता था, लेकिन उन तक किसी और की नजर नहीं पहुंच सकती थी. इसी का फायदा उठा कर वे एकदूसरे की बांहों में समा गए.

एकांत का पहला दिन रोक्सेन और वाकर के लिए यादगार बन गया. इस के बाद तो उन का मिलना आम हो गया. वाकर बेखौफ रोक्सेन के घर भी आनेजाने लगा. लेकिन वह इस बात का ध्यान जरूर रखता था कि उस का पति कोरोनट घर पर न हो. वह रोक्सेन की बेटियों की भी वह परवाह नहीं करता था. बेटा रौबर्ट अभी छोटा ही था. रोक्सेन को भी अब कोई खौफ नहीं था. उस ने बच्चों से वाकर का परिचय कराते हुए कहा था कि ये तुम्हारे अंकल हैं. वाकर जब भी आता था, बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर आता था, इसलिए बड़ी बेटी को छोड़ कर बाकी के दोनों बच्चे उस से खुश रहते थे. वे उस के आने का इंतजार भी करते थे.

धीरेधीरे रोक्सेन वाकर के इतने नजदीक आ गई कि उसे पति कोरोनट फालतू की चीज लगने लगा. अब वह वाकर को ही अपना पति मानने लगी थी. वाकर भी उस से सिर्फ शारीरिक सुख ही नहीं हासिल करता था, बल्कि उस की और उस के बच्चों की हर जरूरत का भी पूरा खयाल रखता था. यही वजह थी कि रोक्सेन को अब पति कोरोनट की जरा भी परवाह नहीं रह गई थी. वह वाकर को उस के सामने ही घर बुलाने लगी थी.

कोरोनट और उस की बड़ी बेटी को वाकर का आना बिलकुल पसंद नहीं था. क्योंकि रोक्सेन और उस के बातव्यवहार से उसे अंदाजा हो गया था कि इन के बीच गलत संबंध है. फिर एक दिन उस ने उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में देख भी लिया. कोरोनट ने इस पर ऐतराज जताया, तो रोक्सेन ने उसे खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुम न तो पेट की आग ठीक से बुझा पाते हो और न तन की. अब ऐसे पति से तो बिना पति के ही ठीक हूं. मैं ने अपना रास्ता खोज लिया है. अच्छा यही होगा कि तुम भी अपना रास्ता खोज लो. अब हम एक राह पर एक साथ नहीं चल सकते.’’

‘‘बच्चों का तो खयाल करो?’’ कोरोनट ने रोक्सेन को समझाना चाहा.

‘‘तुम्हें उन की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं जल्दी ही उन्हें वाकर को डैडी कहना सिखा दूंगी.’’ रोक्सेन ने तल्खी से कहा.

कोरोनट को लगा कि अब रोक्सेन से उम्मीद करना बेकार है. वह अपनी राह पर इतनी आगे बढ़ चुकी है कि उस का लौटना मुमकिन नहीं है. इसलिए अब उसे अपना रास्ता अलग कर लेना चाहिए. कोरोनट ने रोक्सेन को तलाक दे कर उसे अपनी जिंदगी से अलग कर दिया. मां की हरकतों से नाखुश बड़ी बेटी एमा हेमंड भी बाप के साथ चली गई थी. रोक्सेन को इस का जरा भी अफसोस नहीं हुआ, क्योंकि वह तो यही चाहती थी. उस की मुराद पूरी हो गई थी. अब उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहा, तो वाकर का अधिकतर समय उसी के घर गुजरने लगा.

जल्दी ही रोक्सेन की बेटी स्टेसी लारैंस और बेटे रौबर्ट ने वाकर को पिता के रूप में स्वीकार कर लिया था. रौबर्ट 4 साल का था, तो स्टेसी 9 साल की. संयोग से समय से पहले ही स्टेसी के शरीर में बदलाव आने लगा था. इसी बदलाव की वजह से उसे बनियान की जगह ब्रा पहननी पड़ रही थी. हारमोंस की गड़बड़ी की वजह से इसी उम्र में उसे मासिक भी शुरू हो गया था. रोक्सेन जो अब तक उसे बच्ची समझती थी, ऊंचनीच समझाने लगी. कुछ भी रहा हो, स्टेसी बेहद समझदार थी. अच्छेबुरे का उसे पूरा खयाल था.

स्कूल की छुट्टी के दिन अकसर स्टेसी वाकर की लौरी में बैठ कर घूमने चली जाती थी. लेकिन रोक्सेन को यह अच्छा नहीं लगता था, इसलिए वह बेटी को रोकती थी. क्योंकि वह औरत थी और मर्दों की निगाहों को भलीभांति पहचानती थी. उसे वाकर की निगाहों में खोट नजर आने लगा था.

यही वजह थी कि वह वाकर पर नजर रखने लगी थी. ऐसे में ही एक दिन उस ने वाकर को स्टेसी के शरीर से ऐसी छेड़छाड़ करते देख लिया, जो एक पिता नहीं, मर्द कर सकता है. उस ने तुरंत वाकर को टोका, ‘‘वाकर, तुम्हें मैं ने अपना मन ही नहीं, तन भी सौंपा है. तुम्हें वे अधिकार दिए हैं, जो सिर्फ पति को दिए जाते हैं. तुम ने भी वादा किया है कि मेरे बच्चों को अपने बच्चे समझ कर वह सब दोगे, जो एक पिता का कर्तव्य होता है. लेकिन अब तुम्हारी नीयत ठीक नहीं दिख रही है.’’

‘‘ऐसा नहीं है रोक्सेन. मैं न वादे को भूला हूं और न कभी अपने फर्ज भूलूंगा. मैं कोई ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस से तुम्हें आहत होना पड़े. अगर गलती से मुझ से कुछ गलत हो गया है तो मैं तुम्हें अपना मुंह नहीं दिखाऊंगा.’’ वाकर ने एक बार फिर रोक्सेन से वादा किया.

गलतफहमी दूर हुई, तो रोक्सेन ने वाकर को बांहों में भर लिया, ‘‘मैं ने तुम पर पूरा भरोसा किया है और करती रहूंगी.’’

इस के बाद रोक्सेन ने स्टेसी को छूट दे दी. वह वाकर के साथ घूमने जाने लगी. उस का नईनई जगहों पर घूमना तो होता ही, वाकर उसे तरहतरह की चीजें भी खिलाता. एक तरह से स्टेसी की पिकनिक हो जाती.

3 अप्रैल, 2013 को भी स्टेसी वाकर के साथ लौरी पर घूमने गई थी. वाकर को कई जगह माल सप्लाई करना था. फिर भी उसे शाम तक लौट आना था. लेकिन वह नहीं लौटा, तो रोक्सेन को चिंता हुई. वह फोन करने ही जा रही थी कि वाकर का फोन आ गया. उस ने कहा कि काम की वजह से वह आज लौट नहीं पाएगा, कल आएगा. लेकिन वह अगले दिन भी नहीं लौटा, तो रोक्सेन को वाकर और बेटी स्टेसी की चिंता हुई. उस ने सैकड़ों बार फोन किया, लेकिन एक भी बार फोन नहीं उठा. मजबूर हो कर उस ने पुलिस को फोन किया.

पुलिस फौरन हरकत में आ गई. वाकर जिस कंपनी का माल सप्लाई करता था, वहां पता किया गया. जानकारी मिली कि उस की लौरी में सभी तरह की सुविधाएं हैं. उस में वायरलेस फोन भी लगा है, जो कंपनी से चलता था. वायरलेस औपरेटर से पुलिस ने लौरी की लोकेशन पता की. ट्रैकिंग डिवाइस से पता चला कि लौरी की लोकेशन वेस्ट मिडलैंड्स के जंगल की है. पुलिस वहां पहुंची. काफी ढूंढने पर जंगल के बीच खड़ी लौरी मिल गई. लौरी के अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था. उस के अंदर स्टेसी की लाश पड़ी थी.

कमर के नीचे से वह निर्वस्त्र थी. वहां खून भी पड़ा था. देख कर ही लग रहा था कि स्टेसी के साथ जबरदस्ती की गई थी. कमर के नीचे के हिस्से पर वहशीपन के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. गरदन पर भी अंगुलियों के नीले निशान थे. दुष्कर्म के बाद उस की हत्या कर दी गई थी.

वाकर वहां नहीं था. अनुमान लगाया गया कि यह अमानवीय कृत्य वाकर ने ही किया होगा. वाकर की तलाश में पुलिस जंगल में फैल गई. लौरी से कुछ दूरी पर वाकर एक पेड़ से लटका मिल गया. शायद उस ने भी आत्महत्या कर ली थी.

बीता वक़्त वापिस नहीं आता – भाग 1

रोक्सेन के चेहरे पर परेशानी के बादल एक बार फिर घिर आए थे. ऐसे ही बादल पिछले दिन शाम को भी घिरे थे. लेकिन डेरेन  वाकर का फोन आ गया था, तो वे छंट गए थे. वाकर ने फोन कर के बता दिया था कि वह रात को घर नहीं आ पाएगा. स्टेसी भी उसी के साथ लौरी में रहेगी. वाकर ने स्टेसी से उस की बात भी करा दी थी. उस समय वह लौरी में लगा टीवी देख रही थी. वह काफी खुश नजर आ रही थी, इसलिए रोक्सेन निश्ंिचत हो गई थी.

अगला पूरा दिन गुजर गया और वाकर तथा स्टेसी नहीं आए, तो रोक्सेन एक बार फिर परेशान हो उठी. उस का धैर्य जवाब देने लगा था, क्योंकि वाकर फोन भी नहीं उठा रहा था. ऐसा किसी हादसे की सूरत में ही हो सकता था. वह हादसा कैसा हो सकता है, यह रोक्सेन की समझ में नहीं आ रहा था. रात हो गई और धैर्य ने भी जवाब दे दिया, तो हार कर उस ने पुलिस को फोन कर के अपने प्रेमी डेरेन वाकर और बेटी स्टेसी लारैंस के गायब होने की सूचना दे दी.

38 वर्षीय रोक्सेन तलाकशुदा 3 बच्चों की मां थी. बेटी एमा हेमंड 17 साल की, उस से छोटी स्टेसी लारैंस 9 साल की, तो बेटा रौबर्ट 4 साल का. लगभग 19 साल पहले उस की शादी कोरोनट पेंबर से हुई थी. शादी के शुरुआती दिन बहुत अच्छे बीते. रोक्सेन पति के साथ बहुत खुश थी. लेकिन बेटी स्टेसी के पैदा होने के 3 साल बाद अचानक उन के रिश्तों में कड़वाहट आ गई. इस की वजह थी उम्र के साथ रोक्सेन के मन में बढ़ती शारीरिक संबंध की इच्छा. जबकि शराब अधिक पीने और दिन भर मेहनत करने की वजह से कोरोनट की मर्दाना ताकत कम होती जा रही थी.

शुरूशुरू में तो रोक्सेन ऐसी नहीं थी, लेकिन बेटी के पैदा होने के बाद उस में न जाने क्या बदलाव आया कि उस की शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा एकाएक बढ़ने लगी. जबकि दिन भर का थकामादा कोरोनट शाम को शराब पी कर बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता था. कभीकभी तो उसे खाने का भी होश नहीं रहता था.कोरोनट को तो अच्छी नींद आती थी, लेकिन उस की बगल में लेटी रोक्सेन सारी रात शारीरिक सुख के लिए तड़पती रहती थी.

सुबह उठने पर रोक्सेन कोरोनट से शिकायत करती, ‘‘तुम्हें काम और शराब के अलावा भी कुछ दिखाई देता है या नहीं? पहले तो तुम ऐसे नहीं थे, कितना प्यार करते थे? एक भी रात मुझे चैन नहीं लेने देते थे. पूरीपूरी रात जगाए रखते थे. अब ऐसा क्या हो गया कि तुम मेरी ओर देखते तक नहीं. मैं खूबसूरत नहीं रही या तुम ने किसी और से दिल लगा लिया है?’’

‘‘कैसी बातें करती हो. अब तो तुम पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लगती हो. प्यार भी मैं तुम से पहले की ही तरह करता हूं. लेकिन क्या करूं, परिवार बढ़ने से जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. इसलिए ज्यादा कमाई के लिए मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है. यह सब मैं तुम लोगों को सुखी रखने के लिए ही तो कर रहा हूं.’’ कोरोनट ने रोक्सेन को समझाया.

‘‘भाड़ में जाए यह सुख. औरत को सिर्फ रोटीकपड़े से ही सुख नहीं मिलता, इस के अलावा भी उसे कुछ चाहिए. मैं सारी रात तड़पती रहती हूं और तुम मस्ती में सोए रहते हो. रोज नहीं, तो कभीकभार ही मेरी ओर देख लिया करो.’’ रोक्सेन ने कहा.

‘‘ठीक है, अब ध्यान रखूंगा.’’ कह कर कोरोनट ने किसी तरह पीछा छुड़ाया. लेकिन अपनी इस बात पर वह कभी खरा नहीं उतरा. उस का वही ढर्रा रहा. वह करता ही क्या. पूरे दिन की हाड़तोड़ मेहनत के बाद रात को उसे पत्नी को सुख देने का होश ही नहीं रहता. उस की मजबूरी भी थी. थका होने की वजह से मानसिक रूप से वह इस के लिए तैयार ही नहीं हो पाता था.

कभी कोशिश भी करता, तो उस के दिमाग में यह घूमता रहता कि वह किस तरह पत्नी और बेटी को सुख मुहैया करवाए, जिस की उन्हें जरूरत है. यही सोचने में वह भूल जाता कि उस की पत्नी रोक्सेन को इन चीजों के अलावा भी किसी चीज की जरूरत है. उस का सोचना था कि बेटी हो गई है, तो अब रोक्सेन को उस की नजदीकी की क्या जरूरत है. वह बेटी में ही व्यस्त रहती होगी, उसे उस का होश ही नहीं रहता होगा.

जबकि रोक्सेन की यही सब से अहम जरूरत बन गई थी. वह एक समय भूखी रह सकती थी, लेकिन पति के सान्निध्य के बिना नहीं रह सकती थी. इस की वजह यह थी कि इस इच्छा को दबाना शायद उस के वश में नहीं रह गया था, वरना वह जरूर दबा लेती.

खैर, किसी तरह वक्त गुजरता रहा. बेटी के पैदा होने के करीब 5 सालों बाद रोक्सेन एक बार फिर मां बनी. इस बार बेटा रौबर्ट पैदा हुआ. इस के बाद तो उस की इच्छा और ज्यादा होने लगी. हमेशा उस की देह में आग लगी रहती, जबकि कोरोनट में उस आग को बुझाने की ताकत नहीं रह गई थी.

पति की उपेक्षा से रोक्सेन की नजरें भटकने लगीं, जिस से उस के मन में खोट आ गया. अब वह जब भी घर से बाहर निकलती, उस की नजरें पराए पुरुषों पर ठहर जातीं. उन्हें वह हसरत भरी नजरों से तब तक ताकती रहती, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो जाते. वह मर्दों को ताकती जरूर, लेकिन चाहत का इजहार करने की हिम्मत नहीं कर पाती. संकोचवश वह किसी को इशारा भी नहीं कर पाती थी.

वे लोग बदनसीब होते हैं, जिन्हें इंतजार का वाजिब फल नहीं मिलता. रोक्सेन उन में से नहीं थी. उस दिन शाम को वह मौल में शौपिंग करने गई, तो उस की हसरत पूरी हो गई. शौपिंग करने के बाद वह कैश काउंटर पर पेमेंट कर के गेट की ओर बढ़ रही थी, तभी गेट के पास खड़े एक युवक पर उस की नजरें जम गईं. इस की वजह यह थी कि वह युवक उसी को ताक रहा था.

रोक्सेन का दिल धड़का और पलकें अपने आप झपक उठीं. वह युवक भी उस से जरा भी कम स्मार्ट नहीं था. हां, उम्र में उस से कम जरूर था. इस के बावजूद रोक्सेन उस की नजरों में छा गई, तो वह भला क्यों पीछे रहती. उस ने उसे दिल की धड़कन बना लिया. अब कदमों के रुकने का सवाल ही नहीं था. रोक्सेन ने उस की ओर कदम बढ़ाए, तो युवक भी उस की ओर बढ़ने लगा.

दोनों आमनेसामने थे. मुसकराहट दोनों के होंठों पर थी. वे एकदूसरे की आंखों में अपनीअपनी तसवीरें देखते हुए चाहत तलाशने की कोशिश कर रहे थे. कुछ कहना भी चाह रहे थे, लेकिन होंठों से शब्द नहीं निकल रहे थे. बस कांप कर रह जा रहे थे. इसी कशमकश में आखिर युवक ने हिम्मत दिखाई, ‘‘मुझे डेरेन वाकर कहते हैं और आप.’’

‘‘रोक्सेन नाम है मेरा, लेकिन आप मुझे आप न कह कर तुम कहोगे, तो ज्यादा अच्छा लगेगा.’’ रोक्सेन ने कहा.

‘‘अगर तुम भी मुझे आप न कह कर वाकर कहोगी, तो मुझे भी अच्छा लगेगा.’’ डेरेन ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘यहां आतेजाते लोग घूर रहे हैं. अगर हम कहीं एकांत में चलें, तो..?’’ रोक्सेन ने हिम्मत कर के कहा.

वाकर रोक्सेन को साथ ले कर मौल स्थित रेस्टोरेंट में आ गया. रेस्टोरेंट में कोने की टेबल पर बैठने के बाद बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बातचीत में दोनों ने अपनेअपने बारे में सब कुछ बता दिया.

32 साल का हो जाने के बाद भी डेरेन वाकर कुंवारा था. उस के पास अपनी एक कैब (लौरी) थी, जिस से वह शहर व शहर के बाहर डिपार्टमेंटल स्टोरों पर माल सप्लाई का काम करता था. काम भी अच्छा था और कमाई भी अच्छी थी. वह ए.एफ. ब्लेकमोरे एंड संस नामक कंपनी के लिए काम करता था. उसी का माल वह स्टोरों पर पहुंचाता था.

अपने जैसा स्मार्ट और अपनी उम्र से कमउम्र प्रेमी पा कर रोक्सेन खुश थी. वाकर को भी ऐतराज नहीं था कि रोक्सेन उस से उम्र में 6 साल बड़ी थी और 2 बच्चों की मां थी. रोक्सेन और वाकर ने किसी भी तरह की औपचारिकता निभाए बगैर पहली ही मुलाकात में अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया था.