Hindi love Stories : रगों में समाया प्यार

Hindi love Stories : जिस तरह प्यार अंधा होता है, उसी तरह प्यार होने के बाद प्रेमी भी अंधे ही नहीं, विचारशून्य भी हो जाते हैं. वह अपने प्यार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, चाहे वह हत्या जैसा अपराध ही क्यों न हो. नरिंदर और राजन ने भी कुछ ऐसा ही किया. जिन दिनों मैं पंजाब के जिला पटियाला के थाना खरड़ का थानाप्रभारी था, एक दिन सुबह के करीब साढ़े 7 बजे मुझे अपने

मोबाइल फोन पर सूचना मिली कि लांडरा रोड के साथ लगे धोबिया मोहल्ले में अज्ञात हत्यारे एक लड़की के हाथपैर बांध कर एक महिला की हत्या कर गए हैं. मैं एक सबइंसपेक्टर और 2 सिपाहियों को ले कर सूचना में बताए गए पते पर पहुंच गया. जिस वक्त मैं घटनास्थल पर पहुंचा, सिटी चौकीइंचार्ज हरजिंदर सिंह वहां मौजूद थे. हरजिंदर सिंह ने मुझे बताया कि इस घटना की सूचना मिलते ही वह पुलिसपार्टी के साथ वहां आ गए थे. उन्होंने गेट के अंदर लड़की (नरिंदर कौर) को हाथ बंधे पड़ी देखा तो एक महिला सिपाही को गेट के ऊपर से दूसरी तरफ उतारा.

महिला सिपाही ने नरिंदर कौर के रस्सी से बंधे हाथ खोले तो उस ने कमरे से चाबी ला कर गेट का ताला खोला. बदमाशों ने इसी की मां का कत्ल किया है. मैं ने नरिंदर कौर के चेहरे को गौर से देखते हुए घटना के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सर, नकाबपोश बदमाशों ने मेरी मां की हत्या कर दी और मुझे रस्सियों से बांध कर मुंह में कपड़ा ठूंस कर एक कोने में फेंक दिया. किस्मत अच्छी थी कि सांस घुटने से पहले मैं अपने मुंह का कपड़ा निकालने में सफल हो गई और किसी तरह घिसटघिसट कर बाहर आ गई.’’

इस के बाद उस ने एक लंबी सांस ली. सांस लेने के बाद वह कुछ ज्यादा ही जोश में आ गई, ‘‘कौन कहता है कि हमारी पुलिस अच्छी नहीं है. मैं तो यही कहूंगी कि दुनिया में सब से अच्छी हमारी पुलिस है.’’

मैं ने फिलहाल लड़की की बातों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा. मगर ऐसे हालात में भी जब वह बेबाकी के साथ बोलती ही गई तो मुझे अपने पुलिसिया अनुभव के हिसाब से उसे दूसरी दृष्टि से परखना पड़ा. लेकिन मैं ने अपना शक किसी भी तरह से जाहिर नहीं होने दिया. उसे जैसेतैसे आश्वस्त कर के मैं चौकीइंचार्ज हरजिंदर सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों के साथ घर के भीतर चला गया. घर का नक्शा कुछ इस तरह से सामने आया. मुख्य गेट के बाद खुला दालान था. दालान के बाद बरामदा. जो बीच वाला कमरा था, उसी में बिछे डबलबैड पर एक किनारे नरिंदर कौर की मां सुरजीत कौर की लाश पड़ी थी.

सुरजीत कौर का शव सीधी अवस्था में था. उन का बायां हाथ कमर के साथ चिपका था तो दायां हाथ ऊपर उठा था. दोनों कलाइयों की नसें काट दी गई थीं, जहां से खून बह रहा था. एक अजीब बात वहां यह सामने आई कि शव के नथुनों में रुई के फाहे फंसे हुए थे. मृतका के हाथों में सोने की चूडि़यां और कानों में सोने की बालियां साफ नजर आ रही थीं. उन्हें देख कर यही लग रहा था कि नकाबपोश लुटेरों ने यह हत्या लूटपाट के लिए नहीं की. अगर यदि ऐसा होता तो वे मृतका के गहने भला छोड़ कर क्यों जाते? दूसरे कमरे का सामान बिखरा हुआ था. ऐसा बदमाशों ने शायद घटना को लूटपाट का रूप देने के लिए किया था.

वहां की हालत से पूरी तरह साफ हो गया था कि नरिंदर कौर जो बता रही थी, वह सच नहीं था. उस का झूठ पकड़ने के लिए हम ने एक चाल चली. मैं बगल में खड़े सबइंसपेक्टर से बात कर रहा था, तभी वहां एक आदमी आया. उस का नाम देवेंद्र सिंह था. उस ने खुद को नरिंदर कौर का फूफा बताया. वह लांडरा रोड, पर सेक्टर-10 में रहता था. उस ने बताया, ‘‘सर, मृतका सुरजीत कौर ने बीती रात मुझे अपने घर बुलाया था. उस के बुलाने पर मैं यहां पहुंचा तो उस ने नाराज हो कर मुझ से कहा था कि नरिंदर अपने खानदान का बेड़ा गर्क कर रही है. वह पड़ोस में रहने वाले राजन के साथ मुंह काला करती घूम रही है. लाख समझाने पर भी नहीं मान रही है. उस ने मुझ से इस बारे में नरिंदर से बात करने को कहा था.

‘‘तब मैं ने जैसेतैसे सुरजीत को आश्वस्त किया था. चूंकि उस समय नरिंदर घर पर नहीं थी, इसलिए मैं ने सोचा कि कल आ कर नरिंदर को समझा दूंगा. मैं अपने घर जा रहा था तो लांडरा रोड पर मुझे सामने से नरिंदर आती दिखाई दी. मैं ने उसे रोक कर राजन के बारे में बात की तो उस ने कहा कि मां उस के बारे में झूठी अफवाहें उड़ा रही है. जबकि वह दिनरात मां का खयाल रख रही है और इस वक्त वह मां के लिए दवा ले कर आ रही है. उस ने मुझे अपने हाथ में पकड़ा लिफाफा भी दिखाया था, जिस में किसी दवा की स्ट्रिप थी.

‘‘इस के बाद मैं अपने घर चला गया था. मगर आज अभी कुछ देर पहले मुझे पता चला कि सुरजीत का किसी ने कत्ल कर दिया है. जानकारी मिलते ही मैं यहां चला आया. मुझे लगता है, हो न हो सुरजीत कौर का कत्ल नरिंदर ने ही अपने प्रेमी राजन के साथ मिल कर किया है.’’

मैं ने भी इस सिलसिले में ज्यादा सोचाविचारा नहीं और देवेंद्र सिंह की तहरीर पर कत्ल का मामला जरूर दर्ज करा दिया, मगर इस बात की जानकारी नरिंदर को नहीं होने दी. मेरे साथी पंचनामा आदि की काररवाई कर रहे थे, तभी मैं नरिंदर को पूछताछ के लिए एक किनारे ले गया. मैं ने उस से सवाल किया कि जब नकाबपोश लुटेरों ने घर में लूटपाट की और उस की मां का कत्ल किया तो क्या उस वक्त उन लोगों ने हाथपैर बांध कर उस के मुंह में कपड़ा ठूंस रखा था? मैं ने यह भी पूछा कि उस की मां के नथुनों में जो रुई के फाहे मिले हैं, क्या वे भी नकाबपोशों ने ही ठूंसे थे? यह घटना कितने बजे हुई थी?

उस ने बताया, ‘‘घटना शायद रात डेढ़ बजे या फिर दो-ढाई बजे के आसपास घटी थी. नकाबपोश लुटेरों ने जो भी किया, सब मेरी आंखों के सामने किया. मैं उन का भारी विरोध करने लगी थी, इसी से चिढ़ कर उन्होंने मेरे हाथपैर बांध कर मुंह में कपड़ा ठूंस दिया था. इस के बाद मां के हाथों की नसें काट कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था. उन के नथुनों में रुई क्यों ठूंसी, यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही है.’’

यह सब बताते हुए वह हकला रही थी. उस के चेहरे की भंगिमाएं इस बात की साफ चुगली करने लगी थीं कि वह भीतर से डरी हुई है. मुझे उस पर पूरा शक होने लगा था. उसी समय जिले के अन्य पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए. मैं ने उन्हें पूरी जानकारी दे दी. सुरजीत कौर की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद नरिंदर पर अपना मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए हम सभी पुलिस अधिकारी एक कमरे में चले गए. कमरा बंद कर के आधे घंटे तक गुप्त मीटिंग करने का नाटक किया. इस के बाद बाहर निकल कर बारीबारी से सब ने नरिंदर को कुछ इस तरह से घूरना शुरू किया, जैसे उसे इस बात का यकीन हो जाए कि पुलिस को उसी पर शक है.

हमारा यह सोचना था कि इस सब से अगर वह खुद ही आत्मसमर्पण को तैयार हो जाए तो केस की तफ्तीश का सिलसिला हमारे लिए आसान हो जाएगा. अपनी यह मनोवैज्ञानिक काररवाई करने के बाद हम लोग थाने आ गए. जैसा हम ने सोचा था, वैसा ही हुआ. हमारे थाने पहुंचने के थोड़ी देर बाद नरिंदर कौर का एक करीबी रिश्तेदार उसे आत्मसमर्पण करवाने के लिए थाने आ पहुंचा. उस ने आते ही नरिंदर कौर को मेरे सामने खड़ी कर के कहा, ‘‘इस ने और इस के प्रेमी राजन ने ही सुरजीत कौर का कत्ल किया है.’’

‘‘राजन कहां है?’’ मैं ने उतावलेपन से पूछा.

वह बोला, ‘‘सर, वह भी आया है. बाहर खड़ा है, अभी बुलाए देता हूं.’’

इस के बाद जरा ही देर में काले रंग की लैदर जैकेट पहने 1 नवयुवक अंदर आ गया. खुद को नरिंदर का नजदीकी रिश्तेदार कहने वाला आदमी मेरे नजदीक आ कर बोला, ‘‘सर, जब आप लोग मौके पर तफ्तीश कर रहे थे, तब मैं भी वहीं था. आप सब के जाते ही नरिंदर कौर ने मुझ से कहा कि वह बहुत घबरा रही है. उस ने कुछ सिपाहियों को आपस में बातें करते सुना था कि अपराधी अगर अपनी मरजी से आत्मसमर्पण कर देता है तो पुलिस उस से कुछ नहीं कहती, वरना पुलिस की कोशिशों से पकड़े जाने पर उस से बहुत बुरा सुलूक किया जाता है.’’

इस के बाद नरिंदर कौर ने मुझे बता दिया कि उस ने ही अपने प्रेमी राजन के साथ मिल कर मां का कत्ल किया था. पुलिस की पिटाई से बचने के लिए वह आत्मसमर्पण करना चाहती थी. नरिंदर कौर ने उसी समय फोन कर के राजन को भी बुलवा लिया था. उसे भी उस ने आत्मसमर्पण करने के लिए राजी कर लिया था. दोनों की सहमति पर वह आदमी उन्हें मेरे पास ले कर आया था. मैं ने नरिंदर कौर और राजन से पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. मैं ने दोनों को सुरजीत कौर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर के अदालत में पेश कर के 5 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में की गई पूछताछ में प्रेम अपराध की जो लोमहर्षक दास्तान सामने आई, वह कुछ इस तरह से थी.

पटियाला के खरड़ निवासी मोहिंद्र सिंह मोहाली स्थित पंजाब स्कूल एजुकेशन बोर्ड में नौकरी करते थे. उन के घर से मोहाली कोई 10 किलोमीटर दूर था, इसलिए वह घर से ही स्कूटर से औफिस आतेजाते थे. कई सालों पहले सड़क दुर्घटना में उन की मौत हो गई थी. तब उन की जगह पत्नी सुरजीत कौर को नौकरी मिल गई थी. उस वक्त उन के बच्चे काफी छोटे थे. नरिंदर उस समय 10 साल की थी और उस का भाई हरनेक 4 साल का. सुरजीत कौर पढ़ीलिखी महिला थीं. उन्होंने तय किया कि वह अपने दोनों बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर बढि़या नौकरियों पर लगवाएंगी.

इसी तरह वक्त आगे बढ़ता गया. हरनेक 12वीं में पढ़ रहा था और नरिंदर बीए फाइनल में. वह चंडीगढ़ के जिस महिला कालेज में पढ़ रही थी, बस से ही अकेली आयाजाया करती थी. सुरजीत के घर से 4 घरों की दूरी पर सुरेश कुमार का घर था. वह बैंड मास्टर था. उस के बच्चों में एक बेटी और 3 बेटे थे. तीनों बेटे भी पिता के साथ बैंड बजाते थे. इन में मंझला बेटा राजन कुछ ज्यादा ही महत्त्वाकांक्षी था. 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद उस ने अपने आप को एक कलाकार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया. उस की मेहनत रंग लाई और वह उभरते हुए कलाकार के रूप में स्टेज शोज करने लगा.

किसी स्टेज शो में अपने पड़ोसी राजन की कला देख कर नरिंदर उस पर मर मिटी. शो खत्म होने पर उस ने राजन का हाथ अपने हाथों में ले कर न केवल उसे मुबारकबाद दी, बल्कि उस की कला की भी जम कर तारीफ की. यहीं से दोनों के प्रेम की शुरुआत हुई. इस के बाद दोनों अकसर मिलने लगे. जून, 2003 में किसी बहाने से दोनों हिमाचल प्रदेश के नगर कसौली जा कर होटल में रुके. वहीं दोनों के बीच जिस्मानी ताल्लुकात भी बन गए. इस के बाद तो इन के लिए एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया. सुरजीत कौर ने नरिंदर व हरनेक को अलगअलग कमरे दे रखे थे, ताकि वे अपनी पढ़ाई ठीक से कर सकें. नरिंदर रात में अपने कमरे की कुंडी लगा कर काफी देर तक पढ़ती थी.

पूरे मोहल्ले में वह पढ़ाकू लड़की के रूप में मशहूर थी. राजन से संबंध बनाने के बाद वह रात में उसे अपने कमरे पर बुलाने लगी. राजन आधी रात में छतों से होता हुआ पिछवाड़े की तरफ से घर में दाखिल हो कर उस के कमरे में चला आता. रंगरलियां मनाने के बाद वह उसी तरह वापस अपने घर लौट जाता. कई महीने यह सिलसिला चलता रहा. मगर एक रात लघुशंका के लिए सुरजीत कौर अपने कमरे से निकलीं तो ठीक उसी समय राजन उन की बेटी के कमरे से निकल कर सीढि़यों की ओर जा रहा था. उसे देख कर सुरजीत कौर को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या हो सकता है. शोर मचाने से अपनी ही बदनामी होती. लिहाजा उन्होंने चुप रहते हुए समस्या का समाधान निकालने की सोची.

इस के बाद सुरजीत कौर बेटी से बेरुखी से पेश आने ही लगीं. वह रातरात भर जाग कर उस की निगरानी करने लगीं. इस से नरिंदर कौर समझ गई कि मां को शायद उस के प्यार की भनक लग गई है. वह खुद भी सतर्क हो गई. इस से राजन को रात में अपने पास बुलाना नरिंदर के लिए मुश्किल हो गया. किसी दिन सुरजीत कौर ने गुस्से में कह भी दिया ‘‘अच्छे खानदानी घर की लड़की हो कर भी तुझे उस दो टके के लड़के के साथ रासलीला रचाने में शर्म नहीं आई. आगे मैं ने उसे कभी तेरे साथ देख लिया तो दोनों की बोटीबोटी कर के कुत्तों को खिला दूंगी.’’

मां के ये शब्द सुन कर नरिंदर कौर ने जवाब तो कोई नहीं दिया, लेकिन उस के लिए अब उस की मां सब से बड़ी दुश्मन नजर आने लगी. क्योंकि उस के रहते वह अपने प्रेमी से नहीं मिल सकती थी. इसलिए उस ने अपनी मां को दुनिया से विदा करने का फैसला ले लिया. नरिंदर ने इस बारे में अपने प्रेमी राजन से बात की तो उस ने उसे सलाह दी, ‘‘अपनी मां से नफरत करने के बजाय तुम उन का विश्वास जीतने की कोशिश करो. उन्हें समझाओ कि हम दोनों आपस में सच्चा प्यार करते हैं और उन के आशीर्वाद से एकदूसरे से शादी करना चाहते हैं.’’

राजन की बात नरिंदर को जंच गई. एक दिन नरिंदर कौर ने मां के पैर छूते हुए पहले अपनी गलती की माफी मांगी, फिर नजरें झुका कर बोली, ‘‘मम्मी, मैं और राजन एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं. न मैं राजन के बिना रह सकती हूं और न ही वह मेरे बिना. वह किसी और से शादी भी नहीं करेगा. इसलिए आप मेरी उस से शादी करवा दो. मम्मी शादी में मुझे आप के आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं चाहिए.’’

नरिंदर ने हिम्मत कर के यह बात कह तो दी, मगर उसे इस बात का डर भी था कि ये सब सुनते ही मां एक बार उस पर भड़केगी जरूर. लेकिन सुरजीत कौर ने नाराज होने के बजाय अपना स्नेहिल हाथ उस के सिर पर रख कर प्यार से कहा, ‘‘तू बहुत भोली है बेटी, नादान है अभी. तू नहीं जानती कि दुनिया मक्कार लोगों से भरी पड़ी है. मैं ने रिश्तेदारी में कुछेक जगह तेरी शादी की बात चलाई है. सही लड़का मिलते ही ऐसा धूमधाम से शादी करूंगी कि सारा शहर देखता रह जाएगा. एकएक चीज दूंगी तुझे दहेज में. कार बोल कौन सी लेगी?’’

‘‘नहीं मां, न मुझे कार चाहिए, न कुछ और. शादी में दहेज का तुम मुझे एक रुपया भी मत देना. बस, मेरा ब्याह राजन से करवा दो, तुम्हारा यह एहसान मैं सारी जिंदगी नहीं भूलूंगी.’’

इतना सुनते ही सुरजीत कौर ने पास पड़ी लकड़ी की छड़ी उठा ली. यह देख कर नरिंदर डर गई कि इस छड़ी से अब उस की पिटाई होने वाली है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सुरजीत कौर वह छड़ी अपने सिर पर मारते हुए बुक्का फाड़ कर चीखने लगीं, ‘‘औलाद की बदौलत यह दिन देखने से पहले मुझे मौत आ जाती तो अच्छा था.’’

मां को चुप करवाने को नरिंदर कौर उन की ओर बढ़ी तो सुरजीत कौर ने उस छड़ी से उस को भी धुन दिया. नरिंदर कौर के जिस्म का कोई अंग ऐसा न बचा, जहां छड़ी की मार न पड़ी हो. काफी देर तक नरिंदर कौर सुबकसुबक कर रोती रही. इस के बाद उस के मन में यह बात बैठ गई कि मां किसी भी कीमत पर उस की शादी राजन से करने के लिए तैयार नहीं होगी. एकबारगी उसे यह भी डर लगा कि मां किसी रोज कहीं उसे मौत के घाट न उतार दे. लिहाजा, नरिंदर ने मन ही मन निर्णय ले लिया कि अब मां को मौत के घाट उतार कर ही दम लेगी. बाद में जब उस ने राजन को इस बारे में विस्तार से बताया तो वह भी उस के फैसले से सहमत हो गया. इस के बाद उन्होंने सुरजीत कौर को ठिकाने लगाने की योजना बना ली.

उधर बेटी को ले कर सुरजीत काफी तनाव में रहने लगी थी. उन का ब्लडप्रैशर अक्सर बढ़ने लगा. वह दवा वगैरह भी नरिंदर कौर से ही मंगवाया करती थीं. नरिंदर ने इसी बात का फायदा उठाया. 28 फरवरी, 2005 की रात में उस ने मां को खाना परोसते वक्त उन के साग में नींद की 6 गोलियों का पाउडर मिला दिया. उस दिन उस का भाई हरनेक रिश्तेदारी में गया हुआ था. खाना खाने के बाद सुरजीत कौर पर गोलियों का ऐसा असर हुआ कि वह जल्द ही गहरी नींद में चली गईं. नरिंदर को अपना काम आधी रात के बाद करना था, इसलिए मोबाइल फोन पर डेढ़ बजे का अलार्म लगा कर वह भी सो गई. डेढ़ बजे अलार्म की आवाज पर उठ कर उस ने राजन को फोन कर के आने को कहा. वह छत के रास्ते नरिंदर के घर आ गया.

नरिंदर के इशारा करने पर राजन ने गहरी नींद में सो रही सुरजीत कौर के मुंह पर तकिया रख कर दबा दिया. सुरजीत कौर छटपटाने लगीं तो नरिंदर ने अपने दुपट्टे से उन की बांहें व टांगें बांध दीं. अब तक सुरजीत की नींद पूरी तरह टूट चुकी थी. वह खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगीं. इस प्रयास में वह नीचे गिर गईं तो उन्होंने उन्हें उठा कर फिर से बैड पर पटक दिया. वह फिर बेहोशी में चली गईं. राजन ने नरिंदर से रुई मंगवा कर फाहे उन के नथुनों में घुसेड़ दिए. इस के बाद उन के पास ही उसी बैड पर मौजमस्ती करने लगे. उन्हें भरोसा हो गया था कि सुरजीत कौर मर चुकी है. मगर प्रेमालाप के दौरान उन्होंने उन की एक बाजू फड़फड़ाते देखी तो नरिंदर ने नब्ज टटोली, वह चल रही थी.

वह रसोई से 2 चाकू उठा लाई. एक चाकू से उस ने मां की दाईं कलाई की नस काटी तो दूसरे चाकू से राजन ने उन के बाएं हाथ की कलाई की नस काट दी. नसों से खून बह कर बिस्तर पर फैलने लगा. ज्यादा खून निकलने से थोड़ी देर में सुरजीत कौर की मौत हो गई. मां की हत्या करने के बाद उन की लाश के पास ही नरिंदर सुबह के 5 बजे तक राजन के साथ वासना का खेल खेलती रही. इस के बाद घर में रखे 3,300 रुपए, कुछ गहने उस ने राजन को सौंप दिए. इसी के साथ कुछ आलमारियों में से कपड़े वगैरह निकाल कर इधरउधर फेंक दिए, ताकि मामला लूटपाट का लगे.

घर से जाते वक्त राजन ने सुरजीत कौर के हाथों में बंधा दुपट्टा खोल कर नरिंदर के मुंह में घुसेड़ा और रस्सी से उस के हाथपैर बांध कर जमीन पर लिटा दिया. नींद की गोली का खाली पत्ता और दोनों चाकू बाहर कहीं फेंकने के लिए राजन ने अपने पास रख लिए. इस के बाद वह वहां से चला गया. सुबह 7 बजे तक नरिंदर उसी तरह लेटी रही. फिर सरकसरक कर बाहर गेट के पास आई और बचाव के लिए चिल्लाने लगी. नरिंदर और राजन द्वारा अपना अपराध स्वीकार करने के बाद हम ने राजन की निशानदेही पर गहने, नींद की गोलियों का खाली पत्ता, दोनों चाकू और 3,300 रुपए बरामद कर लिए. पुलिस रिमांड खत्म होने पर दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में पटियाला की सेंट्रल जेल भेज दिया गया.

तय समय सीमा के अंदर ही मैं ने दोनों अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र तैयार कर के अदालत में पेश कर दिया. सेशन कमिट होने के बाद पटियाला की जिला अदालत में यह केस विधिवत चला. 31 अगस्त, 2007 को केस का फैसला सुनाते हुए रोपड़ की तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश रेखा मित्तल ने नरिंदर और राजन को दोषी मानते हुए उम्रकैद व 2 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. ऊपरी अदालतों द्वारा अपील खारिज होने के बाद आज दोनों जेल की सलाखों के पीछे अपनी उम्रकैद की सजा भुगत रहे हैं. बताया जा रहा है कि सजा पूरी होने के बाद जेल से बाहर आने पर नरिंदर कौर और राजन शादी करेंगे. किसी ने सच ही कहा है कि इश्क जब किसी की रगों में समा जाए तो इस का भयानक अंजाम सामने आने पर भी उस का महबूब ही उस के लिए सर्वोपरि होता है. Hindi love Stories

—कथा पुलिस रिकार्ड व अदाल

Girlfriend को बाथरूम में बंद कर दोस्तों को मजे के लिए बुलाया

भला कोई अपनी उस बीवी से सच्ची मोहब्बत कर सकेगा, जब उसे पता चलेगा कि उस की यह बीवी शादी से पहले किसी दूसरे मर्द से मोहब्बत करती थी यह सच है कि अगर मेरे शौहर सुलतान अहमद मुझ से मेरी जान भी मांगते तो मैं देने में एक लमहे की भी देर न करती. उन का छोटे से छोटा काम भी मैं खुद किया करती थी, हालांकि घर में नौकरनौकरानियां भी थीं. इस में ताज्जुब की कोई बात नहीं थी. अकसर औरतें अपने पतियों की ताबेदारी में खुशी महसूस करती हैं. फिर भी उन्होंने कभी मेरे साथ मुसकरा कर बात नहीं की थी.

दूसरों के सामने तो वह मेरे साथ नरम पड़ जाते थे, मगर तनहाई में या बच्चों के सामने बिलकुल अजनबी से बन जाते थे. ऐसा भी नहीं था कि वह स्वभाव से ऐसे थे. दूसरों के लिए वह बहुत हंसमुख थे. खासतौर पर बच्चों पर तो जान छिड़कते थे. उन के बीच वह बेतकल्लुफ दोस्त बन जाते थे. उन की हर फरमाइश मुंह से निकलते ही पूरी किया करते, मगर मेरे लिए उन के पास सिवाय बेगानगी के और कुछ नहीं था. मुझे देखते ही सुलतान अहमद के चेहरे पर अजीब सी संजीदगी भरी सख्ती छा जाती. अगर वह बोल रहे होते तो मेरे आते ही खामोश हो जाते. हमारा बेडरूम साझा था, मगर वह वहां देर रात को आते थे. घर में उन का अधिक समय अपने स्टडी रूम में गुजरता था. वह कभी मेरे साथ शौपिंग के लिए नहीं गए.

सुलतान अहमद आला ओहदे पर लगे हुए थे. दफ्तर की तरफ से उन्हें मकान और गाड़ी मिली हुई थी. वह अपनी सारी तनख्वाह अपना खर्च निकाल कर मेरे हवाले कर देते थे और फिर पलट कर यह नहीं पूछते थे कि मैं ने क्या खर्च किया, कहां खर्च किया, क्यों खर्च किया और क्या बचाया. उन का यह रवैया मैं कोई 1-2 साल से नहीं, बल्कि पिछले 25 सालों से बरदाश्त कर रही थी. एक चौथाई सदी के इस अरसे में उन की तरफ से चाहत का एक भी फूल मेरे आंचल में नहीं डाला गया था. इस सितम के बावजूद वह मेरे सिर का ताज थे. उन की सेवा करना, उन के काम करना मेरी जिंदगी का अहमतरीन मकसद था. सुलतान अहमद भी इतनी बेरुखी के बावजूद अपना हर काम मुझ से ही करवाना पसंद करते थे.

सुबह 8 बजे तक वह और बच्चे घर से निकल जाते थे. उन के जाने के बाद मैं नौकरानी से सफाई करवाती. फिर बर्तन और कपड़े धोने वाली आ जाती. मगर मैं सिर्फ अपने और बच्चों के कपड़े धुलवाती. सुलतान अहमद के कपड़े मैं अपने हाथों से ही धोया करती थी. फिर मैं दोपहर के खाने की तैयारी में लग जाती. बच्चे 1 बजे तक स्कूलकालेज से आ जाते थे और सुलतान अहमद भी दोपहर का खाना घर में ही आ कर खाते थे. दफ्तर से आमतौर पर वह शाम 6 बजे तक आ जाते थे. फ्रेश हो कर लाउंज में बच्चों के पास बैठ जाते थे. इस दौरान वह उन के मनोविनोद और तालीमी सरगर्मियों के बारे में पूछते. चाय पीते और फिर अपने स्टडी रूम में चले जाते, जहां से वह रात के खाने के वक्त ही निकलते थे. खाने के बाद वह फिर स्टडीरूम में वापस चले जाते और लगभग 11, साढ़े 11 बजे बेडरूम में आते थे.

सुलतान अहमद आर्थिक मामलों में माहिर थे. वह आडिट और एकाउंट के विषय में खास अधिकार रखते थे. इस विषय पर उन की लिखी हुई किताबें बहुत मकबूल थीं. अपने स्टडी रूम में वह लिखनेपढ़ने का काम करते थे. इन सारी बातों से आप ने अंदाजा लगा लिया होगा कि उन के पास मेरे लिए एक लमहा भी नहीं था. यह मैं बता चुकी हूं कि सुलतान अहमद स्वभाव से ऐसे नहीं थे. तब मुझे इतनी लंबी और कड़ी सजा देने की वजह क्या हो सकती थी, यह बताने के लिए मुझे अपनी जिंदगी की किताब के उन पन्नों को खोलना पड़ेगा, जिन की बातें आज तक किसी पर जाहिर नहीं की थीं. हमारे समाज में जब कोई औलाद लगातार तीसरी लड़की होने के नाते इस दुनिया में आंख खोलती है तो आमतौर पर उसे इस जुर्म की सजा तकरीबन उस सारे अरसे भुगतनी पड़ती है, जब तक वह बाप के घर रहती है.

मगर मेरी खुशकिस्मती थी कि जब बेटे की जगह मैं इस दुनिया में आई तो सब ने बड़ी मोहब्बत से मेरा स्वागत किया. यह मेरी खूबसूरती का करिश्मा था. दादी अम्मा, जो मेरी पैदाइश से पहले उठतेबैठते अम्मी को बेटा पैदा करने की याद दिलाना भूलती नहीं थी, मुझे देख कर खुश हो गईं. उन का कहना था कि हमारी 7 पीढि़यों में कोई इतनी हसीन बच्ची पैदा नहीं हुई. मेरी पैदाइश के बाद भाइयों का जन्म शुरू हो गया. अब्बू तरक्की पर तरक्की करते गए. खुशहाली के सारे दरवाजे खुल गए. इस तरह मुझे पैदाइशी भाग्यशाली का दर्जा हासिल हो गया. होश संभालते ही मुझे जो पहला अहसास हुआ या फिर मेरे घर वालों ने अहसास दिलाया, वह यह था कि मैं बेहद खूबसूरत हूं.

स्कूल में दाखिले के समय मैं ने उस स्कूल में पढ़ने से साफ इनकार कर दिया, जहां मेरी दोनों बड़ी बहनें तालीम हासिल कर रही थीं. उस की बेरौनक इमारत, मामूली फर्नीचर और सादा लिबास लड़कियां मेरी पसंद से  कतई मेल नहीं खाती थीं. मैं ने अम्मीअब्बू से साफ कह दिया कि मैं उस गंदेसंदे स्कूल में उन गंदीसंदी लड़कियों के साथ हरगिज नहीं पढूंगी. यह सुनते ही दोनों बहनों ने हंगामा खड़ा कर दिया कि क्या हम गंदीसंदी हैं? अम्मी ने भी मेरी बात का बुरा तो माना, लेकिन दरगुजर कर गईं. उन्होंने दोनों बहनों को भी समझा लिया.

‘‘तो क्या तुझे किसी अंगरेजी स्कूल में पढ़ाऊं?’’ उन्होंने दबेदबे लहजे में कहा.

‘‘मैं ने कह दिया कि मैं उस स्कूल में नहीं पढूंगी, बस.’’ मैं ने ठुनक कर कहा.

अब्बू ने मेरी हिमायत की. उन्होंने अम्मी से कहा, ‘‘ठीक तो कह रही है मेरी बेटी. वह स्कूल भला इस के लायक है?’’

‘‘तो फिर दाखिल करा दें किसी बढि़या स्कूल में और दें भारी भरकम फीस.’’ अम्मी भन्ना कर बोलीं.

अब्बू ने भागदौड़ कर के मेरा दाखिला शहर के एक आला इंगलिश मीडियम स्कूल में करा दिया. घर से दूर होने की वजह से मुझे गाड़ी लेने और छोड़ने आया करती थी. स्कूल में मैं ने चुनचुन कर खूबसूरत और नफासतपसंद लड़कियों को सहेली बनाया. टीचरें भी मुझे पसंद करती थीं, जिस का सब से बड़ा फायदा मुझे तालीम हासिल करने में हुआ. मैं अपनी क्लास की बेहतरीन स्टूडेंट्स में गिनी जाती थी.

मतलब यह कि चाहतों के हिंडोले में झूलती उम्र की मंजिलें तय करती रही. जब मैं छठी क्लास में थी, तब बड़ी आपा का रिश्ता तय हो गया. उन्हें मैट्रिक के बाद स्कूल से उठा लिया गया, क्योंकि हमारी बिरादरी में लड़कियों को इस से ज्यादा पढ़ाने का रिवाज नहीं था. हमारे खानदान में बिरादरी से बाहर शादी का भी रिवाज नहीं था. बड़ी आपा की शादी के बाद अम्मी ने फौरन ही छोटी आपा की रुखसती की तैयारी शुरू कर दी. वह बचपन से ही ताया अब्बा के बेटे से जोड़ दी गई थी. मेरे 8वीं पास करतेकरते दोनों बहनें विदा हो कर अपनेअपने घर की हो चुकी थीं.

मैट्रिक में आतेआते मुझ पर बहार आ गई. मैं ने ऐसा रूपरंग और कद निकाला कि मैट्रिक करते ही दरवाजे पर रिश्तों की लाइन लग गई. अम्मी का इरादा तो यही था कि मैट्रिक के बाद मुझे भी घर से रुखसत कर दिया जाए, लेकिन मैं अभी और आगे पढ़ना चाहती थी. इसलिए मैं ने अम्मी से छिप कर अब्बू से कालेज में दाखिले की जिद शुरू कर दी. पहले उन्होंने इनकार कर दिया, मगर फिर राजी हो गए. लेकिन यह बात खुलते ही अम्मी ने हंगामा खड़ा कर दिया. वह मेरे आगे पढ़ने के हक में नहीं थीं. अब्बू ने उन्हें किसी न किसी तरह राजी कर लिया. मैट्रिक में मेरी बहुत अच्छी पोजीशन आई थी, इसलिए बेहतरीन कालेज में दाखिले में कोई मुश्किल पेश नहीं आई. उस कालेज में ज्यादातर बड़े घरानों की लड़कियां पढ़ती थीं. मुझे उस माहौल में आ कर ऐसा महसूस हुआ, जैसे मैं किसी तालाब से निकल कर विशाल समुद्र में आ गई थी.

कालेज में अगरचे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मौजूदी थीं, मगर उन की सुंदरता मेरे हुस्न के आगे फीकी पड़ गई. अलबत्ता उन की बेबाकियां और बातें मुझे दांतों तले अंगुली दबा लेने पर मजबूर कर देतीं. फिर मैं धीरेधीरे उन से घुलमिल गई. लड़कियां जब अपने चाहने वालों की दीवानगी के अंदाज बयान करतीं तो मैं उन के मुंह देखती रह जाती. यह हकीकत थी कि मेरी खूबसूरती के बावजूद किसी लड़के ने मुझे चाहत का पैगाम नहीं दिया था. कालेज में मेरा दूसरा साल था. मेरी क्लासफेलो नाजिया की सालगिरह थी और मैं उस जलसे में खासतौर पर तैयार हो कर गई थी. यही वजह थी कि वहां मौजूद हर निगाह कुछ क्षणों के लिए मुझ पर जम कर रह गई. नाजिया करोड़पति बाप की औलाद थी और उस दावत में आई हुई लड़कियां कीमती कपड़ों और बेशकीमती जेवरातों से जगमगा रही थीं.

फिर भी एक नौजवान की निगाहें बारबार मुझ पर ही टिक जाती थीं. लंबा कद, बर्जिशी जिस्म, हल्के घुंघराने बाल, सुर्खी मिली रंगत और चमकती आंखें. वह हाथ में कैमरा लिए तसवीरें खींच रहा था. मैं ने महसूस किया कि बारबार कैमरे की फ्लैश मुझ पर पड़ रही थी. उस की निगाहों की गर्मी मैं फासले से भी महसूस कर रही थी. मेरे होंठों पर एक गुरूरभरी मुसकराहट फैल गई. जल्दी ही परिचय का मौका भी आ गया. वह केक की प्लेट उठाए चला आया.

‘‘आप तो कुछ खा ही नहीं रही हैं मिस!’’ उस ने गहरी नजर से मेरा जायजा लिया.

‘‘गुल.’’ मैं ने कनफ्यूज हो कर अधूरा नाम बताया.

‘‘बहुत खूब. आप बिलकुल गुल (फूल) जैसी ही हैं. मुझे राहेल कहते हैं.’’ उस ने मेरी आंखों में झांकते हुए कहा.

उसी वक्त नाजिया वहां आ गई.

‘‘राहेल! तुम इस से मिले? मेरी बेस्टफ्रेंड गुलनार है.’’

‘‘मिल ही तो रहा हूं.’’ वह बोला और मैं ने अपने चेहरे पर रंग बिखरता हुआ महसूस किया.

फिर मुझे पता ही नहीं चला कि कब हम बेतकल्लुफी की सीमा में दाखिल हो गए. जाते समय उस ने चुपके से कागज की एक चिट मेरे हाथ में पकड़ा दी, जो मैं ने हथेली में दबा ली. घर पहुंचते ही धड़कते दिल के साथ वह चिट देखी. उस पर एक फोन नंबर लिखा था. उस रात नींद मेरी आंखों से गायब हो गई थी. नतीजे में सुबह कालेज न जा सकी. सारा दिन व्याकुल सी रही. रात हुई तो सब के सोने के बाद टेलीफोन उठा कर अपने कमरे में ले आई. कांपती अंगुलियों से चिट पर लिखा हुआ नंबर डायल किया. पहली ही घंटी पर रिसीवर उठा लिया गया.

‘‘हैलो!’’ मैं ने धीरे से कहा.

‘‘मुझे यकीन था कि आप फोन जरूर करेंगी.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई. मेरे स्वाभिमान को धक्का सा लगा और मैं ने बात किए बिना फोन काट दिया. मगर अगली रात को फिर फोन करने से खुद को रोक न सकी, हालांकि कोई अंदर से मुझे खबरदार कर रहा था कि गुल यह खेल मत शुरू कर. मैं ने गोलमोल शब्दों में उसे अपने दिल की हालत कह सुनाई और उस ने अपनी बेताबियों का खुल कर इजहार किया. यह कच्ची उम्र की जुनूनी मोहब्बत थी, जो नफानुकसान के खयाल से बेपरवाह होती है. इसलिए जब उस ने मुझे कहीं बाहर मिलने को कहा तो मैं सोचेसमझे बिना तैयार हो गई.

उस ने तजवीज पेश की कि मैं कालेज से किसी बहाने छुट्टी ले कर बाहर आ जाऊं. फिर हम दोनों किसी रेस्त्रां में चलेंगे. मुझे एहसास ही नहीं था कि मैं एक अजनबी की मोहब्बत के नशे में डूब कर मांबाप की इज्जत को दांव पर लगा रही हूं. बस मुझे एक ही अहसास था कि शहजादों जैसी खूबसूरती रखने वाला शख्स मेरी मोहब्बत में गिरफ्तार है. साथ जीनेमरने की कसमों ने मुझे उस के जादू में जकड़ लिया था. पहली मुलाकात में, जो एक रेस्त्रां के फैमिली केबिन में हुई. उस ने वादा किया कि अपनी तालीम पूरी होते ही वह अपने वालिदैन को हमारे घर भेजेगा. उस के बाद मैं हर तीसरेचौथे रोज उस से इसी तरह बाहर मिलती रही.

अगरचे मैं बड़ी कामयाबी से इस सारे सिलसिले को घर वालों की नजरों से छिपाए हुए थी, मगर कुदरत ने माताओं को एक खूबी दे रखी है, जो उन्हें अपनी बेटियों की बदलती अवस्था से आगाह रखती है. शायद मेरी खुशी, गालों के दमकते हुए गुलाबों और आंखों में उतरे सपनों ने उन्हें सचेत कर  दिया. वह अकसर टटोलती निगाहों से मुझे देखतीं. उन के शक की वजह से मैं राहेल से मिलनेजुलने में सावधानी बरतने लगी. मगर उस समय धमाका हो गया, जब मेरा फस्ट ईयर का नतीजा आया और मैं 4 परचों में फेल हो गई. अब्बू को भी पहली बार मुझ पर सख्त गुस्सा आया. वह आशा कर रहे थे कि मैं इस साल इंटर में कोई अच्छी पोजीशन हासिल करूंगी, क्योंकि न केवल मैं ने कालेज से छुट्टी ली थी, बल्कि घर में भी हर समय अपने कमरे में स्टडी में मगन रहती थी.

हकीकत यह थी कि मैं कालेज कम ही जाती थी. मेरा सारा समय राहेल के साथ घूमनेफिरने में गुजरता था. कमरे में घुसे रहने का कारण यह था कि वहां मैं सब से छिप कर अपने महबूब के तसव्वुर में गुम रह सकती थी. उस समय मेरा नशा हिरन हो गया, जब अब्बू ने मुझ से परचों में फेल होने की वजह पूछी थी. उन की चिंता उचित थी. जब मैं इतनी जहीन और पढ़ाकू थी तो मेरे 4 परचों में फेल हो जाने की क्या वजह थी? मैं ने बहाने तराश कर अब्बू को किसी हद तक नार्मल किया. वादा किया कि अगले सालाना इम्तिहान में पोजीशन ले कर दिखाऊंगी. मगर अम्मी किसी तौर पर रजामंद नहीं हुईं. उन्होंने फैसला सुना दिया कि मेरी पढ़ाई खत्म, कालेज जाना बंद. अब्बू ने अम्मी के फैसले के आगे हथियार डाल दिए.

तालीम की तो मुझे भी कोई खास परवाह नहीं थी, मगर कालेज जाना बंद होने की हालत में मेरे लिए राहेल से मुलाकात का रास्ता बंद हो जाता. टेलीफोन भी मेरी पहुंच से बाहर हो गया था. रात को सोने से पहले अम्मी टेलीफोन सेट अपने कमरे में ले जाती थीं. दिन में भी मुझे मौका नहीं मिलता था. मैं अपना हर तरीका इस्तेमाल कर के थक गई, अम्मी टस से मस नहीं हुईं. तब मैं ने अपना सब से ज्यादा परखा हुआ नुस्खा आजमाया और भूख हड़ताल कर दी. जब मैं ने लगातार 2 दिनों तक कुछ नहीं खाया तो अम्मी घबरा गईं. उन्होंने हर तरह से कोशिश की कि मैं अपनी भूखहड़ताल खत्म कर दूं, मगर मेरी एक ही रट थी कि जब तक मुझे कालेज जाने की इजाजत नहीं मिलेगी, मैं कुछ नहीं खाऊंगी, चाहे मेरी जान ही क्यों न निकल जाए. तीसरे दिन अम्मी ने मुझे बेदिली से इजाजत तो दे दी, मगर धमकी भी दी कि अगर उन्होंने मेरे बारे में ऐसीवैसी कोई बात सुनी तो वह मेरा गला घोंट देंगी और खुद भी जहर खा कर मर जाएंगी.

मैं ने उन की धमकी पर कोई ध्यान नहीं दिया. मैं तो राहेल से मिलने के तसव्वुर में जैसे पागल हुई जा रही थी. क्लासें शुरू होते ही मेरी और राहेल की मुलाकातें फिर शुरू हो गईं. इतने अरसे बाद उसे देख कर मैं जैसे दोबारा जी उठी थी. अब मैं बेधड़क उस के साथ शहर की तफरीहगाहों में चली जाती थी. खास तौर पर समुद्र तट हम दोनों की पसंदीदा जगह थी. उस के संग समुद्र की नरम रेत पर चलते हुए ऐसा लगता, जैसे मैं ने पूरी दुनिया जीत ली हो. उस दिन भी हमारा क्लफटन (कराची का मुंबई के जुहू जैसा स्थान) का प्रोग्राम था. मैं घर कह कर आई थी कि कालेज के बाद अपनी सहेली के यहां जाऊंगी. वहां से शाम तक घर वापस आऊंगी. राहेल कालेज से बाहर एक जगह पर अपनी गाड़ी लिए मेरे इंतजार में खड़ा था. वहां से हम दोनों क्लफटन पहुंच गए. छुट्टी का दिन न होने की वजह से वहां रश नहीं था.

राहेल कुछ ज्यादा ही खुशगवार मूड में था. वह रहरह कर जिस अंदाज में तारीफ कर रहा था, उस ने मुझे आसमान पर पहुंचा दिया था. हम समुद्र के किनारे टहलते रहे. उस की शरारतों में बेबाकी पाई जाती थी, मगर मैं ने बुरा नहीं माना. यों ही हंसतेखेलते वक्त गुजर गया और होश उस समय आया, जब सूरज डूबने के करीब था. खारे पानी और साहिल की रेत ने मेरा हुलिया बिगाड़ दिया था और मैं इस हुलिए  में घर जा कर अम्मी के क्रोध को दावत नहीं देना चाहती थी. मगर मसला यह था कि मैं अपना हुलिया कहां ठीक करती? इस परेशानी का इजहार मैं ने राहेल से किया तो वह कहकहा लगा कर बोला, ‘‘बस इतनी सी बात? तुम्हें परेशान देख कर तो मेरी जान निकल जाती है. यहीं करीब ही मेरे एक दोस्त का कौटेज है. इत्तेफाक से उस की चाबी मेरे पास है. वहां साफ पानी होगा. तुम आराम से मुंहहाथ धो लेना. वैसे भी देर हो गई है. तुम्हें अब तक घर पहुंच जाना चाहिए था.’’

‘‘तुम याद कहां रहने देते हो?’’ मैं ने नाराजगी से कहा.

कौटेज छोटा सा था और बिलकुल खाली था. चौकीदार भी नहीं था, जबकि सुनसान साहिल पर चौकीदार रखना लाजिमी था.

‘‘इस कमरे से अटैच्ड बाथ है,’’ राहेल ने एक कमरे की तरफ इशारा किया. वह शानदार बेडरूम था. मैं बाथरूम में चली गई. साफ पानी से जल्दीजल्दी मुंहहाथ साफ किए. कंघी से सिर में फंसी रेत साफ की और एक हद तक कपड़े भी साफ किए. फिर मैं ने आईने में अपना जायजा लिया और बाहर जाने के लिए बाथरूम के दरवाजे का हैंडिल घुमाया, मगर वह टस से मस नहीं हुआ. मैं ने जोर लगाया. फिर भी कोई असर नहीं हुआ. अंदर जाते समय वह आसानी से घूम गया था. पहली बार मुझे किसी खतरे का अहसास हुआ, लेकिन मेरे दिल ने तसल्ली दी कि यह कोई फाल्ट है. मैं ने दरवाजा पीट कर राहेल को आवाज दी.

‘‘मैं यहीं हूं. शोर मत मचाओ.’’ उस की आवाज करीब से उभरी.

‘‘राहेल, यह दरवाजा बंद हो गया है. खुल नहीं रहा.’’ मैं ने रुआंसी हो कर कहा.

‘‘बंद नहीं हुआ, बल्कि मैं ने लौक कर दिया है.’’ वइ इत्मीनान से बोला तो मेरी जान निकल गई, ‘‘राहेल, प्लीज, मजाक बंद करो. मुझे पहले ही देर हो गई है.’’

‘‘देर तो तुम्हें हो ही चुकी है जानेमन और मजाक यह नहीं, वह था, जो मैं अब तक करता आया था.’’ उस के लहजे में व्यंग्य था.

‘‘दरवाजा खोलो. तुम मुझे यों कैद नहीं कर सकते.’’ मैं पूरी ताकत से चिल्लाई.

‘‘कैद तो तुम हो चुकी हो. अब जरा 2-4 रोज तो हमारे पास रहो.’’ उस ने कहकहा लगा कर कहा.

‘‘हमारे… हमारे से क्या मतलब?’’ मैं चौंकी.

‘‘भोली लड़की, मैं ने दोस्तों की दावत का इंतजाम किया है. तुम्हारे पास हुस्न का जो खजाना है, उस से तो कितने ही जरूरतमंद खुशहाल हो सकते हैं.’’ उस की हंसी में कमीनापन था.

‘‘बंद करो बकवास. कुत्ते! धोखेबाज!’’ मैं चीखी. फिर सिसकसिसक कर रोने लगी, ‘‘राहेल, तुम्हें क्या हो गया है? तुम मुझ से मोहब्बत करते हो. फिर भी मुझे यों रुसवा करना चाहते हो?’’

‘‘मोहब्बत,’’ उस ने फिर कहकहा लगाया, ‘‘यह किस चिडि़या का नाम है? जानेमन, हम तो हुस्नोंशबाब के पुजारी हैं. अब तुम जरा पुरसुकून हो जाओ. नहाधो कर हमारे स्वागत के लिए तैयार हो लो. मैं जा कर दोस्तों को खबर कर आऊं और सुनो, शोर मचाने से कुछ हासिल नहीं होगा. इस वीराने में तुम्हारी फरियाद सुनने कोई नहीं आएगा.’’

फिर उस के कदमों की और मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज आई. मैं खुद को शिकारियों के घेरे में घिरी हुई हिरनी महसूस कर रही थी. यह बात अच्छी तरह मेरी समझ में आ गई थी कि वह अब तक मुझे बेवकूफ बना रहा था. वह मुनासिब मौके की तलाश में था, जो बेवकूफी में मैं ने उसे बख्श दिया था. जिंदगी में पहली बार मुझे अपनी किसी तमन्ना पर पछतावा महसूस हुआ था. मेरा दिल चाह रहा था कि जमीन फटे और मैं उस में समा जाऊं या मौत का फरिश्ता मुझे आ दबोचे, ताकि आने वाले हालात का सामना न करना पड़े. मगर दोनों बातें मुमकिन नहीं थीं. अपनी इज्जत खतरे में देख कर मेरे अंदर की औरत जाग उठी. मैं ने फैसला कर लिया कि अपनी इज्जत पर आंच नहीं आने दूंगी, चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े. उस समय मुझे खुदा की याद आई.

मैं जानती थी कि उस के सिवा अब मुझे कोई नहीं बचा सकता था. मैं ने दिल की गहराइयों से गिड़गिड़ा कर अपनी हिफाजत की दुआ मांगी और उस कैद से रिहाई की सोचने लगी. बाथरूम खासा बड़ा था. उस में बाथटब भी था. एक तरफ वाशबेसिन था, जिस में आगे शीशा लगा हुआ था. उस के बराबर में एक रैक था, जिस पर शैम्पू और साबुन आदि रखे थे, मगर शेविंग का सामान नहीं था, वरना मैं ब्लेड से शायद अपना गला काट कर खुदकुशी कर लेती. इस बात का मुझे कैद करने वालों को भी अंदाजा था. इसलिए उन्होंने बाथरूम से हर वह चीज हटा दी थी, जिसे मैं रिहाई या खुदकुशी के लिए इस्तेमाल कर सकूं. रैक स्टील का बना हुआ था, मगर दीवार में इस तरह जुड़ा हुआ था कि उसे वहां से निकालना मेरे लिए मुमकिन नहीं था.

बाथरूम का दरवाजा ठोस लकड़ी का था और मेरे लिए उसे तोड़ना नामुमकिन था. तब मेरी निगाह रोशनदान पर गई. फर्श से लगभग 8 फुट ऊंचा वह रोशनदान इतना चौड़ा था कि उस में से आसानी से बाहर निकल सकती थी. उस में शीशे के 2 पट थे, जो सिटकिनी के सहारे बंद थे, मगर असल मसला उस तक पहुंचना था. यह मुमकिन नहीं था कि मैं उछल कर वहां तक पहुंच सकूं. कोई ऐसी चीज मुहैया नहीं थी, जिस के सहारे मैं ऊपर चढ़ सकती. वाशबेसिन और बाथटब, सब अपनी जगह पर फिट थे. फिर भी मैं ने उछल कर रोशनदान की मुंडेर पकड़ने की कोशिश की, मगर कुछ नाकाम कोशिशों के बाद मेरा हौसला जवाब दे गया और मैं फूटफूट कर रोने लगी. मुझे महसूस हुआ कि मैं खुद कुछ भी करूं, उस कैदखाने से नहीं निकल सकूंगी.

कुछ देर रोने के बाद मुझे अक्ल आ गई कि इस तरह आने वाली मुसीबत टल नहीं सकेगी. फिर मुझ पर जैसे जुनून छा गया. मैं ने रैक से साबुन और शैम्पू की बोतल आदि उठा कर फर्श पर दे मारी. रैक को कुछ जोरदार झटके दिए, मगर वह अपनी जगह जमा रहा. फिर बेसिन को झिंझोड़ा, मगर वह भी टस से मस नहीं हुआ. आखिर मैं ने टब को जोरदार ठोकर मारी और यह देख कर चौंक गई कि वह अपनी जगह से हिल कर रह गया. मैं ने उसे पकड़ कर झटके दिए. तब पता चला कि वह फर्श के साथ महज पाइप की मदद से जुड़ा हुआ था. पाइप शायद ढीला पड़ गया था. उस समय जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई थी कि मैं ने उसे झटके दे कर आखिर फर्श से अलग कर दिया. सेरामिक्स का बना हुआ वह टब 3 फुट चौड़ा और 5 फुट लंबा था. बनावट में गोलाकार था. मैं उसे उस की जगह से सरकाने लगी.

अब मैं टब को लंबाई के रुख से दीवार के साथ लगाती तो खुद टब पर चढ़ना मेरे लिए मुमकिन न रहता और चौड़ाई के रुख से खड़ा करने की हालत में उस के स्लिप हो जाने का खतरा था. बहरहाल मैं ने टब दीवार से लगा कर खड़ा किया. सैंडिल उतारी और ऊपर चढ़ने लगी, मगर पहली ही कोशिश में टब स्लिप हो गया और मेरा घुटना दीवार से जा टकराया. वक्त रोने का नहीं था. अगर मौके के चंद लमहे मेरे हाथ से निकल जाते, तो दरिंदों से छुटकारा पाना नामुमकिन था. इस बार टब को कम तिरछा कर के दीवार से टिकाया और बड़ी सावधानी से धीरेधीरे कदम जमा कर ऊपर चढने लगी. बड़ी मुश्किल से अपने जख्मी घुटने के कंपन पर काबू पाया. खुदाखुदा कर के मेरा हाथ रोशनदान तक जा पहुंचा और उस की मुंडेर पर हाथ जमा कर मैं ने उस के पट खोले.

मेरी खुशकिस्मती थी कि रोशनदान की दूसरी तरफ खासा चौड़ा छज्जा था. मैं ने बाहर की मुंडेर पर अभी हाथ जमाया ही था कि ऐन उसी लमहे टब फिर स्लिप हो कर एक धमाके से गिरा. मुझे शदीद झटका लगा. एक लम्हे के लिए ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरी बांहें कंधों से उखड़ जाएंगी. मेरी पूरी कोशिश थी कि मुंडेर मेरे हाथ से न छूटने पाए. मुझे नहीं पता कि मैं कैसे रोशनदान से गुजर कर छज्जे तक पहुंची. छज्जे का हिस्सा कौटेज के अंदर ही था. इसलिए मैं उस पर से होती हुई पिछले हिस्से में आ गई. यह कौटेज से बाहर था. जमीन वहां से 10-11 फुट नीचे थी, मगर मैं ने हिम्मत की. पहले पांव नीचे लटकाए, फिर बाहों के बल पर छज्जे से लटक गई. मैं ने आंख बंद कर के छलांग लगा दी. खुशकिस्मती से और किसी चोट से महफूज रही.

अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था और दूर कहींकहीं मकानों की रोशनियां झिलमिला रही थीं. मैं ने उठ कर कपड़े झाड़े. सैंडिल तो अंदर ही रह गई थी, मगर दुपट्टा मेरे पास था, जिसे मैं ने अच्छी तरह अपने गिर्द लपेटा और अंधाधुंध साहिल से कुछ दूर स्थित सड़क की तरफ भागी. मैं जल्दी से जल्दी उस कैदखाने से दूर निकल जाना चाहती थी. सड़क तक आतेआते कितने ही नुकीले कंकड़ों ने मेरे पांव छलनी कर दिए. कितनी ही बार मैं ठोकर खा कर गिरी. मुझे कुछ पता नहीं चला. अभी सड़क पर मैं ने कदम रखा ही था कि दाईं तरफ से एक तेज रोशनी मेरे करीब आ कर रुक गईं. फिर मैं ने आंसुओं से धुंधलाई हुई आंखों से एक शख्स को गाड़ी से उतर कर अपनी तरफ बढ़ते देखा. वह कोई मर्द था.

‘‘अंधी हैं आप? अभी मेरी गाड़ी के नीचे आ जातीं.’’ उस शख्स ने मेरे सामने आ कर गुस्से से कहा.

‘‘प्लीज, मुझे बचा लीजिए. मैं कुछ दरिंदों के चंगुल से निकल कर भागी हूं.’’ मैं ने रोते हुए कहा. वह गौर से मेरा जायजा ले रहा था.

‘‘रात को तनहा भटकने वाली लड़कियों के पीछे दरिंदे लग ही जाते हैं.’’ उस ने रुखाई से कहा. मैं फूटफूट कर रोने लगी.

वह शख्स बौखला गया, ‘‘मोहतरमा! खुदा के लिए चुप हो जाएं. अगर इस वक्त कोई यहां आ गया तो आप को यों रोती हुई और आप का हुलिया देख कर न जाने मेरे बारे में किस गलतफहमी में पड़ जाए.’’

तब मैं ने एक नजर खुद पर डाली. मेरे कपड़े कई जगह से फट गए थे. रेतमिट्टी से अटी हुई हालत बेहद खराब थी. मैं ने जल्दी से दुपट्टे को ठीक किया.

‘‘आप को कहां जाना है?’’ उस ने पूछा.

मैं ने बिना उस की ओर देखे उसे अपने इलाके का नाम बताया.

‘‘बैठिए.’’ उस ने एक गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘मगर…’’ मैं ने कहना चाहा.

‘‘अगरमगर कुछ नहीं. आप को मुझ पर भरोसा करना होगा, वरना मैं चलता हूं. आप किसी भरोसे वाले का इंतजार करें.’’ वह कुछ गुस्से से बोला, ‘‘मुमकिन है कि पीछे से वही बदमाश आ जाएं, जिन से बच कर आप भागी हैं.’’

वह सही कह रहा था. मैं डर कर जल्दी से गाड़ी में बैठ गई. उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. वह मेरे जानेपहचाने रास्ते पर सफर करती हुई मेरे इलाके में दाखिल हुई. मैं इशारे से उसे रास्ता बताती गई. मैं ने अपनी गली से कुछ पहले उतरना मुनासिब समझा. मेरे उतरते ही उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी. तब मुझे खयाल आया कि अपने मोहसिन का नाम तक नहीं पूछा, यहां तक कि उस का चेहरा तक ठीक से न देख सकी थी. खुदा ने मेरी इज्जत महफूज रखी थी, मगर मैं घर वालों की पूछताछ से किसी तरह नहीं बच सकती थी. उस समय रात के साढ़े 8 बज रहे थे और मैं कभी इतनी देर तक घर से गायब नहीं रही थी. बहरहाल, हिम्मत कर के घर की तरफ चल पड़ी. खुशकिस्मती से हमारी गली के सभी खंभों के बल्ब शरारती लड़कों ने तोड़ दिए थे. उस लमहे मुझे अंधेरा बहुत गनीमत लगा कि उस ने मेरे शिकस्ता वजूद को दूसरों की नजरों से आने से बचा लिया था.

अम्मी जैसे दरवाजे से लगी मेरे इंतजार में थीं. हल्की सी दस्तक के जवाब में फौरन दरवाजा खोल दिया. उन के चेहरे पर परेशानी जैसे जम कर रह गई थी. मुझे देखते ही उन की आंखों में खून उतर आया. इत्तेफाक से बाकी सब घर वाले टीवी लाउंज में बैठे प्रोग्राम देख रहे थे. मैं फौरी तौर पर अब्बू और भाइयों की नजरों में गिरने से बच गई थी. अम्मी एक शब्द बोले बगैर मुझे अंदर कमरे में ले गईं और दरवाजा बंद कर के दांत पीसती हुई धीरे से बोलीं, ‘‘कहां से आ रही है कमीनी?’’

जवाब में मैं ने हिचकियों के बीच पूरी कहानी सुनाई.

‘‘चुप कर जा जलील!’’ उन्होंने मुझे थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘मैं ने तेरे बापभाइयों से यह बात छिपाई है. और तू टेसुवे बहा कर उन्हें बताने जा रही है. जा, दफा हो जा. अपना हुलिया ठीक कर.’’

मैं ने गुसलखाने में जा कर नहाया और साफसुथरा जोड़ा पहन लिया. रात सब के सोने के बाद अम्मी मरहम ले कर मुझे लगाने लगीं. तब मैं उन से लिपट कर रोने लगी. मैं ने माफी मांगी तो वह दबी आवाज में बोलीं, ‘‘बेटी, मां तो औलाद की बड़ी से बड़ी गलती माफ कर देती है. मगर तूने मेरा ऐतबार खो दिया है.’’

उन की बात तल्ख सही, लेकिन सच थी. मैं ने जान निसार करने वाले मांबाप की मोहब्बत को नजरअंदाज कर के और एक बेहद गंदे शख्स पर ऐतबार कर के उन्हें धोखा दिया था. मुझे पता था कि अम्मी अब मुझ पर ऐतबार नहीं करेंगी. इसलिए कालेज जाने का खयाल तो मैं दिल से निकाल ही चुकी थी. इस के अलावा भी मैं ने घर से निकलना बंद कर दिया था. राहेल के साथ संबंध उस दिन से खत्म हो गया था. मैं ने खुदा का शुक्र अदा किया कि राहेल के पास मेरा कोई खत या तसवीर नहीं थी, वरना उस जैसे कमीने का कोई भरोसा नहीं था कि वह मुझे ब्लैकमेल न करता. अब सारा दिन बोरियत से बचने के लिए मैं घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने लगी. इस के अलावा कोर्स की किताबें मंगवा कर सेकेंड ईयर के इम्तिहान की तैयारी शुरू कर दी.

अम्मी मेरे इस बदलाव से बहुत खुश थीं. वह मुझे सारे घरेलू मामलों में माहिर करना चाहती थीं. हमेशा मुझे कुछ न कुछ सिखाने की केशिश करती रहतीं. मैं भी मेहनत कर रही थी. मैं ने इंटर का इम्तिहान आसानी से पास कर लिया. अम्मी मुझे इम्तिहान दिलाने ले जाया करती थीं. एक साल गुजरने के बावजूद अम्मी की बेऐतबारी पहले दिन की ही तरह कायम रही. उन की आंखों में लहराते शक के नाग जैसे हर लमहे मुझे डसते रहते थे. अब वह बड़ी सरगर्मी से मेरे लिए आए हुए रिश्तों की छानबीन में लगी थीं. मुझे मर्द के नाम से वहशत होती थी, मगर मैं अम्मी के आगे मजबूर थी. उन्हीं रिश्तों में सुलतान अहमद का रिश्ता भी था. वह हुकूमत में एक अच्छे ओहदे पर लगे हुए थे. खानदानी थे और हमारी बिरादरी से ताल्लुक रखते थे. मतलब यह कि वह हर दृष्टि से मेरे लिए मुनासिब थे. अम्मी ने अब्बू और बहनों की रजामंदी पा कर सुलतान अहमद के घर वालों को हां कर दी.

मेरी ससुराल वालों को शादी की जल्दी थी. अम्मी को भी कोई ऐतराज नहीं था. उन्होंने अच्छीखासी तैयारी पहले ही कर रखी थी. तारीख तय होते ही घर में चहलपहल शुरू हो गई. एक दिन बड़ी आपा ने मुझे एक लिफाफा देते हुए कहा, ‘‘दूल्हे मियां की तसवीर देख ले. बाद में हम से कुछ न कहना.’’

मैं ने लिफाफा ले कर बेजारी से एक तरफ डाल दिया कि देख लूंगी. अब जब शादी में चंद रोज बाकी रह गए तो मुझे दूल्हे की तसवीर दिखाने का खयाल आ रहा था. अपनी इस बेकद्री पर मैं खून के आंसू बहा कर रह गई. कहां वह कि मेरी छोटी सी छोटी चीज भी मेरी मरजी के बगैर नहीं पसंद की जाती थी, कहां यह सितम कि जिंदगी भर का साथी बगैर मुझ से पूछे, मेरी मरजी जाने चुन लिया गया था. अपनी इस हद तक बेकद्री की सारी जिम्मेदारी भी मुझ पर आयद होती थी. आखिर मेरी जिंदगी में वह दिन भी आ गया, जिस की तमन्ना हर लड़की के दिल में अंगड़ाइयां लेती रहती हैं. मगर मैं उस दिन के हर सपने से पहले ही बेहिस हो चुकी थी. मेरे बेजान से जिस्म को एक मूरत की तरह सजा कर सुलतान अहमद के पहलू में ला बैठाया गया. इस से पहले अम्मी की बात मेरे दिल में फांस की तरह गड़ गई. उन्होंने कहा था कि मैं हमेशा अपने शौहर की वफादार बन कर रहूं.

सुलतान अहमद का घराना पौश कालोनी ‘सोसाइटी’ के एक बड़े से बंगले में रहता था. सुहाग का कमरा बड़ी खूबसूरती से सजाया गया था. उसी सजे हुए कमरे में उस शख्स का इंतजार कर रही थी, जिसे मेरा मालिक बना दिया गया था. दिल की धड़कनों में कोई सनसनी नहीं थी. फिर भी जैसे ही दरवाजे पर आहट हुई, मेरे अंदर जमी बर्फ पिघलने लगी. एक नई भावना अंगड़ाई ले कर जागने लगी, जो शायद निकाह के 2 बोलों का असर था. वह मेरे सामने बैठते हुए बोले, ‘‘क्या आप यकीन करेंगी कि मैं ने आप की तसवीर भी नहीं देखी है. यह सब मेरी बहनों की शरारत है. वे मुझे सरप्राइज देना चाहती थीं. उन का कहना था कि आप ख्वाबों की शहजादियों से भी ज्यादा हसीन हैं और यह मेरी खुशकिस्मती है कि आप मेरा नसीब हैं,’’ यह कहतेकहते वह मेरे करीब झुक आए, ‘‘क्यों न हम तसदीक कर लें. इसी बहाने मुंह दिखाई भी हो जाएगी.’’

उन्होंने अचानक घूंघट उलट दिया. मैं उन का चेहरा न देख सकी, मगर वह एक झटके से मुझ से दूर हो गए. थोड़ी देर तक वह बेचैनी से कमरे में टहलते रहे. फिर सर्द सी आवाज में बोले, ‘‘आप चाहें तो आराम फरमाएं.’’ यह कह कर उन्होंने तकिया उठाया और करीब पड़े सोफे पर लेट गए. मैं डे्रसिंग टेबल के आईने में जेवर उतारते हुए खुद को देख रही थी कि आखिर कहां कमी रह गई थी, जो वह अचानक यों मुझ से बेजार हो गए. जब मैं लिबास बदल कर पास आई तो वह लेटे थे. शायद सो गए थे. मगर मुझे अभी सारी रात अपनी बदनसीबी का मातम करना था.

उस दिन के बाद मैं ने कभी सुलतान अहमद के रवैये में अपने लिए मोहब्बत महसूस नहीं की. उन्होंने मेरे वे सभी हक अदा किए, जो एक पति पर लाजिम हो सकते हैं, सिवाय उस चाहत के, बीवी अपने पति से जिस की तलबगार होती है. मैं शायद सारी उम्र इस बात से बेखबर रहती कि सुलतान अहमद के इस रवैये की वजह क्या है, अगर उन को हार्टअटैक न होता. यह हमारी शादी की 22वीं सालगिरह थी. मेहमानों के रुखसत होने के बाद अचानक उन्होंने सीने में तकलीफ की शिकायत की और फिर देखते ही देखते उन की हालत बिगड़ती चली गई. उन को फौरी तौर पर अस्पताल ले जाया गया. वह दरम्याने दर्जे का हार्टअटैक था. तीसरे दिन डाक्टरों ने उन की हालत खतरे से बाहर करार दे कर उन्हें एक प्राइवेट कमरे में शिफ्ट कर दिया. इन 3 दिनों में मेरी हालत दीवानी जैसी हो गई थी. मैं हर लमहे उन के बेड से लगी रहती थी. इस सारे वक्त एक लमहे के लिए सो न सकी थी.

रात के किसी पहर उन्होंने पानी मांगा. मैं ने जल्दी से पानी गिलास में निकाल कर उन्हें दिया. उन्होंने पानी पी कर गिलास मुझे थमाया और बड़ी कमजोर सी आवाज में बोले, ‘‘गुल, मैं तुम से बहुत शर्मिंदा हूं.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं?’’ मैं ने उन के सीने पर हौले से हाथ रखा, ‘‘यह सब मेरा फर्ज है. आप की खिदमत तो मेरे लिए इबादत का दर्जा रखती है.’’ मेरा लहजा शिकायती हो गया.

‘‘मैं जानता हूं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसीलिए तो शर्मिंदा हूं. सारी उम्र तुम्हें सच्ची खुशी न दे सका. मेरी बात सुनो. कुछ कहो मत. यह हकीकत है कि मैं ने सारी उम्र तुम्हें सिवाय बेरुखी के और कुछ नहीं दिया, मगर मैं मजबूर था. जब से तुम्हें देखा, मैं एक आग में जल रहा था, जो मुझे अंदर ही अंदर भस्म किए जा रही थी.’’ कमजोर आवाज में बोलतेबोलते उन का लहजा जज्बाती हो गया, मगर उन्होंने जो कहा, उसे सुन कर मेरा वजूद जैसे भूडोल के घेरे में आ गया, ‘‘तुम्हें वह रात याद होगी, जब तुम भयभीत और उजड़ीउजड़ी सी दौड़ रही थीं और साहिली सड़़क पर एक गाड़ी के नीचे आतेआते बची थीं? फिर उस गाड़ी वाले ने तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुंचाया था.’’

‘‘मगर… मगर आप को यह सब कैसे पता चला?’’

‘‘इसलिए कि वह शख्स मैं ही था,’’ उन्होंने ठहरेठहरे लहजे में कहा, ‘‘जब मैं ने तुम्हें अपनी दुलहन के रूप में देखा तो मत पूछो, मुझ पर क्या गुजरी थी. वह खयाल बारबार मुझे किसी नाग की तरह डसने लगा था कि मेरी बीवी शादी से पहले किसी दूसरे मर्द से मोहब्बत करती थी. क्यों, मैं ठीक कह रहा हूं न?’’ उन्होंने मेरी आंखों में झांका और मेरी निगाहें झुक गईं. उन्होंने बात जारी रखी, ‘‘मगर मैं खुद को तसल्ली दे लिया करता था कि तुम ने उस का असली नफरत भरा रूप देख कर उसे अपने दिल से निकाल दिया होगा. फिर भी अपने दिल को न समझा सका. मैं तुम से मोहब्बत न कर सका.’’

बोलतेबोलते थक कर वह चुप हो गए. फिर शायद सो गए, मगर मुझे तकलीफों के एक नए भंवर में डाल दिया. उन्होंने मुझे वह सब याद दिला दिया, जो मैं भूल जाना चाहती थी. बेशक वह मेरे सब से बड़े मोहसिन थे. पहले उन्होंने मुझे उस रात घर पहुंचा कर रुसवाई से बचाया, फिर मुझ से शादी कर  के मुझे इज्जत बख्शी. फिर भी वह सब ख्वाबख्वाब सा था.

 

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी – भाग 3

इधर गींदोली के मन में प्रेम का झरना फूट रहा था, उधर जगमाल उस के ख्वाबों से अनजान थे. वह तो तीजनियों को महेवा लाने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानजी, कहीं हाथी खान हमारे साथ धोखा न कर जाए. हम शहजादी को तभी छोड़ेंगे, जब हमारी तीजनियां महेवा की धरती पर कदम रख देंगी.’’

अपने वादे के अनुसार हाथी खान तीजनियों को ले आया तो उसी मैदान में भौपजी शहजादी को ले गए. महमूद बेग ने तीजनियों को पहले छोड़ने का हुकुम दिया. तभी शहजादी जा कर अब्बा के कलेजे से लिपट गई. भौपजी सावधान था. तीजनियों को सुरक्षित घेरे में खेड़ रवाना किया ही था कि हाथी खान जगमाल के दल पर टूट पड़ा.

उस ने जासूस से जगमाल की ताकत का पता कर लिया था. पर यह उस की भूल थी. जगमाल के 3 तालियां बजाते ही तमाम ऐसे जवान वहां आ गए, जो कदकाठी और वेशभूषा में जगमाल की तरह थे. उन के वहां आते ही हाथी खान की सेना को पहचानना मुश्किल हो गया कि उन में जगमाल कौन है.

तभी हाथी खान की सेना में यह अफवाह फैल गई कि जगमाल को भूत सिद्धी हासिल है. तभी तो वहां पर उस के तमाम हमशक्ल आ गए हैं. डर की वजह से महमूद बेग और हाथी खान वहां से भाग खड़े हुए. अफरा तफरी में शहजादी गींदोली को भी वे अपने साथ नहीं ले जा सके.

उधर तीजनियों के सकुशल घर लौटने पर महेवा के घरों में दीपक जल उठे. इस के बाद ही जगमाल ने उजले कपड़े पहने. सिर पर केसरिया कसूंबल पाग बांधी. दाढ़ी बनाने के बाद अपने सांवले मुखड़े पर नोकदार मूंछें संवारते हुए वह अपने डेरे से निकले ही थे कि दासी ने आ कर जुहार की, ‘‘खम्मा घणी हुकुम, शहजादी गींदोली तो अपने डेरे में ही बैठी हैं?’’

‘‘क्या शहजादी अपने डेरे में है, ऐसा कैसे हो सकता है?’’ जगमाल चौंके.

‘‘हुजूर, आप खुद ही चल कर देख लीजिए.’’ दासी ने कहा.

जगमाल उसी समय गींदोली के डेरे पर  पहुंचे. सामने खड़ी शहजादी गींदोली मुसकरा रही थीं. वह जगमाल को एकटक देखती रहीं. जगमाल जड़वत हो गए. उन की नजरें धरती पर गड़ी थीं, वह खुद को संभाल कर बोले, ‘‘शहजादी गींदोली आप यहां?’’

‘‘हां कुंवर सा.’’ गींदोली पहली बार जगमाल से बिना परदे के बात कर रही थी, ‘‘मुझे महेवा छोड़ना अच्छा नहीं लगा कुंवरजी.’’

‘‘पर आप यहां कहां रहेंगी, कैसे रहेंगी, आप के अब्बा हुजूर परेशान होंगे? हम आप को अहमदाबाद पहुंचाने का प्रबंध करते हैं.’’

जगमाल एक ही सांस में इतना कुछ कह गया. पर गींदोली ने अहमदाबाद जाने से इंकार कर दिया. इस के बाद उस ने अपने मन की बात जगमाल को बता कर कहा कि अब वह उन के साथ ही रहेगी.

शहजादी की बात सुन कर जगमाल हतप्रभ रह गए कि यह क्या हो गया? उस ने ऐसा तो कभी नहीं सोचा था. उस के सामने एक तरह का धर्म संकट पैदा हो गया. उस ने गींदोली से अनुरोध किया, ‘‘शहजादी साहिबा, हमारी इज्जत उछाली जा रही है. आप मान जाएं और महेवा छोड़ दें.’’

मगर शहजादी अपने फैसले पर अटल थी. कुछ ही देर में पूरे महेवा में यह बात फैल गई कि शहजादी गींदोली जगमाल से प्यार करने लगी है और वह उन से शादी करना चाहती है, लेकिन कुंवर जगमाल जातिपांत के डर से उस से विवाह करने को तैयार नहीं हो रहे हैं. यह बात तीजनियों के कानों तक पहुंचीं. गींदोली ने उन की संकट के समय में देखभाल की थी, इसलिए उन्होंने गींदोली की सहायता करने का फैसला कर लिया.

उन्होंने जगमाल से अनुरोध किया कि वह शहजादी गींदोली के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें. उन्होंने उन की भी बात नहीं मानी. तब तीजनियों ने तय कर लिया कि जब तक कुंवर गींदोली के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे, वे घरों में चूल्हे नहीं जलाएंगी.

इस तरह तीजनियों ने अन्नपानी त्याग दिया. ऐसा करते हुए 3 दिन बीत गए.

तब महेवा के तमाम लोग कुंवर जगमाल के पिता रावल मल्लीनाथ के पास गए. उन्होंने उन से कुंवर जगमाल को समझाने का अनुरोध किया. रावल मल्लीनाथ ने जगमाल को समझाया. जगमाल को अपने पिता की बात मानने के लिए मजबूर होना पड़ा. आखिरकार गींदोली के प्रेम के आगे जगमाल की जातिपांत वाली सोच पराजित हो गई.

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पिता के कहने पर जगमाल गींदोली के डेरे पर पहुंचे. उन्होंने अपने कारिंदों को आदेश दिया कि शहजादी गींदोली की सवारी महल में पहुंचाई जाए. आदेश का पालन हुआ. महल में बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी हुई. तीजनियों ने खूब गीत गाए.

आज भी राजस्थान में जगमाल और गींदोली के गीत गाए जाते हैं. गणगौर विसर्जित करने के दिन सारा राजस्थान गींदोली को याद करता है. तीजनियां आज भी गींदोली को याद करती हैं. गींदोली और जगमाल का प्रेम आज भी पाबासर के हंस प्रेमी हृदय में तैर रहा है.

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी – भाग 2

समय अपनी गति से गुजर रहा था. उधर प्रधान हुल भौपजी बहुत परेशान थे. उन्हें यह जानकारी मिल चुकी थी कि तीजनियां अब पाटण के बाग में हैं.

प्रधान हुल भौपजी अपने हुल पाटण भेज कर आगे की तैयारी में जुट गए. वह घोड़ों को पाटण के रास्तों पर दौड़ा रहे थे, ताकि उस रास्ते को घोड़े अच्छी तरह से पहचान जाएं, जिस से हमले के समय घोड़े रुके नहीं. उन जवानों का हुलिया राजकुमार जगमाल के हुलिए की तरह करा दिया गया था.

प्रधान हुल मौके की तलाश में लगे थे. आखिर उन के हाथ मौका लग ही गया. पाटण में गणगौर की सवारी बड़ी धूमधाम से निकल रही थी. हाथी खान भी खुश था. वह शहजादी को खुश करने में लगा था. शायद शहजादी रीझ कर उस से शादी कर ले. अगर ऐसा हो गया तो अहमदाबाद से पूरे गुजरात में उस का डंका बजेगा. इसी उम्मीद में वह शहजादी गींदोली की हर इच्छा पूरी कर रहा था.

तीजनियों के बगीचे की चौकसी उस ने बढ़ा दी थी, ताकि त्यौहार का फायदा उठा कर जगमाल वहां तक पहुंच न सके.

गणगौर के काफिले में प्रधान हुल भौपजी के साथी मौका मिलते ही घुस गए और गींदोली को पालकी से उठा कर यह जा वह जा करते हुए निकल गए. भौपजी ने गींदोली को अपने घोड़े पर बिठा कर ललकार लगाई, ‘‘महेवा के कुंवर जगमालजी का प्रधान हुल भौपजी तुम्हारी शहजादी को दिनदहाड़े ले जा रहा है. हिम्मत हो तो पकड़ लो.’’

इस के बाद पाटण अहमदाबाद के रास्ते पर दौड़ रहे प्रधान हुल के घोड़े के पीछे हाथी खान ने अपनी सेना के घुड़सवारों को लगा दिया. उन्होंने पचास कोस तक भौपजी का पीछा किया. लेकिन वे उन्हें पकड़ नहीं सके. प्रधान हुल शहजादी गींदोली को ले कर सीधे जगमाल के सामने पहुंचे. प्रधान के साथ एक रूपसी को देख कर जगमाल ने पूछा, ‘‘भौपजी, यह रूपसी कौन है?’’

‘‘हुजूर, यह सेनापति महमूद बेग की शहजादी गींदोली है. चरणों में हाजिर है.’’

जगमाल ने शहजादी को गौर से देखा. लगा जैसे आसमान से चांद उतर आया हो. रूपसी थरथर कांप रही थी. जगमाल गुस्से में बोले, ‘‘वाह प्रधानजी, वाह! अच्छा बदला लिया है. अच्छी बहादुरी दिखाई है. मुझे अपने यहां की वही तीजनियां चाहिए, जिन्हें हाथी खान ले गया था. किसी दूसरे की बहन बेटी नहीं.’’

‘‘वह भी हो जाएगा कुंवर सा, मैं ने ऐसा पांसा फेंका है, जिस से हाथी खान अब खुद तीजनियों को ले कर हाजिर होगा.’’ प्रधान हुल ने अपना इरादा व्यक्त किया.

जगमाल कुछ नहीं बोले. भौपजी ने गींदोली का अलग डेरा लगवा दिया और उस की सुरक्षा के अच्छे बंदोबस्त करा दिए. शहजादी गींदोली जगमाल की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गई थी. अब उसे तीजनियों की वे बातें याद आ रही थीं, जिस में उन्होंने जगमाल की इंसानियत और बहादुरी की तारीफ के पुल बांधे थे. शहजादी ने तीजनियों से जगमाल की जो प्रशंसा सुनी थी, वह वैसा ही निकला था.

दूसरे दिन जगमाल गींदोली के डेरे पर उस का हालचाल लेने पहुंचे. उन के साथ भौपजी भी थे. वह पर्दे की ओट से बोले, ‘‘शहजादी गींदोली, प्रधान हुलजी आप को उठा लाए, इस के लिए मैं शर्मिंदा हूं. मैं वादा करता हूं कि आप को आप के मातापिता के पास इज्जत के साथ पहुंचा दिया जाएगा. बस आप अपने पिताजी को तीजनियों को छोड़ने का पत्र लिख दीजिए.’’

गींदोली ने चुपचाप सिर हिला कर स्वीकृति दे दी और अपने अब्बू के नाम एक पत्र लिख दिया.

बेटी के पत्र के जवाब में महमूद बेग का उत्तर उतावली के साथ आया. अपनी पुत्री को देखने को वह तड़प रहा था. गींदोली उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी थी. उसे छुड़ाने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. वह हाथी खान को उस दिन के लिए कोसने लगा, जिस दिन वह तीजनियों का अपहरण कर लाया था.

न हाथी खान तीजनियों को लाता और न ही गींदोली दुश्मन के हाथों में पहुंचती. पर अब क्या हो सकता था. वह विवश बैठा हाथ मल रहा था कि जगमाल का दूत गींदोली का पत्र ले कर पहुंचा. दूत को उस ने मानसम्मान दे कर विदा किया और अपना हरकारा संदेश के साथ महेवा भेज दिया.

दूत के पहुंचने के पहले ही महमूद बेग का हरकारा खेड़ पहुंच चुका था. महमूद बेग के दूत ने कुंवर जगमाल को महमूद बेग का संदेश सुनाया, ‘‘अहमदाबाद के जांबाज सुल्तान महमूद बेग ने फरमाया है कि आप के प्रधान हुल ने बड़ा ही खराब काम किया है. इसे हम कभी भी माफ नहीं करेंगे.’’

दूत के वाक्य पूरा करने से पहले ही भौपजी की तलवार तन गई. कुंवर जगमाल ने उन्हें शांत करते हुए दूत से कहा, ‘‘अपनी बात आगे बढ़ाओ.’’

दूत बोला, ‘‘सुल्तान अपनी शहजादी के बदले में तीजनियों को छोड़ने को तैयार हैं. पर पहले शहजादी गींदोली को हमारे साथ भेजना होगा.’’

दूत को आराम करने को कह कर जगमाल ने भौपजी के साथ विचारविमर्श किया. तय हुआ कि सुल्तान तीजनियों को ले कर मालाणी की सरहद तक आएं और बदले में गींदोली को ले जाएं. दूत जवाब ले कर चला गया.

जगमाल तीजनियों को लाने के दिन की प्रतीक्षा करने लगे. गींदोली अपने डेरे में अपनी आजादी के दिन का इंतजार कर रही थी. पर उस के मन में जगमाल की तसवीर उभर रही थी. जगमाल राजपूती वीरता का उदाहरण था. गींदोली के मन में यह वीरता समा गई.

तीजनियों के साथ हुई बातचीत गींदोली के मन में उभरने लगी कि हिंदू नारी जीवन में एक ही पुरुष की कामना करती है. गींदोली परेशान हो उठी. वह अपने दिमाग में जगमाल की तसवीर बसा चुकी थी और जगमाल था कि परदा हटा कर उसे एक नजर भी नहीं देख रहा था.

नवाब के दूत का संदेश ले कर आने पर जगमाल खुद गींदोली से मिला. वह परदे की ओट से ही बोला, ‘‘शहजादी, आप के अब्बा हुजूर का संदेश आया है. अब आप शीघ्र ही आजाद हो जाएंगी. हमें इस तकलीफ में आप को रखना पड़ा, इस के लिए मैं शर्मिंदा हूं.’’

जगमाल की इंसानियत देख कर वह मन ही मन बोली, ‘‘कुंवरजी, अब मैं अहमदाबाद के महलों में नहीं जाऊंगी. आप का खेड़ का यह डेरा ही मेरा जीवन है.’’

अपनी बात को वह जुबान पर इसलिए नहीं लाई, क्योंकि वह मुसलमान थी. उसे इस बात का अंदेशा था कि जगमाल उसे स्वीकार नहीं करेंगे. बादशाह अलाउद्दीन की पुत्री और वीरम देव सोनगरा की कहानी वह सुन चुकी थी. मरने से पहले तक वीरम देव ने शादी के लिए हां नहीं की थी.

प्रेम जातिपांत नहीं देखता, इसलिए उस ने उसी समय फैसला कर लिया कि वह जगमाल से ही शादी करेगी. वह अपनी दासी से हिंदू रीतिरिवाजों के बारे में पूछने लगी. दासी हंस कर बोली, ‘‘शहजादी साहिबा, आप को क्या करना है इस सब से?’’

गींदोली ने उसे मन की बात बताई तो दासी की आंखें खुली की खुली रह गईं. दासी ने उसे अंजली और जेठवा की प्रेम कहानी सुनाई, जो गुजराती थे. प्रेम कहानी सुनने के बाद गींदोली के पोर पोर में प्यार का समावेश हो गया. वह सोचने लगी कि लोग जिस तरह प्रेम को ले कर सारस और चकवा की चर्चा करते हैं, अब उस में गींदोली और जगमाल के प्रेम की चर्चा भी शामिल हो जाएगी.

                                                                                                                                 क्रमशः

पवित्र प्रेम : गींदोली और कुंवर जगमाल की प्रेम कहानी – भाग 1

सावन का महीना था. बरखा की रिमझिमरिमझिम फुहारें पड़ रही थीं. महेवा की धरती हरीभरी हो उठी थी. पेड़ों पर नएनए पत्ते उस हरियाली में एक नया उजास पैदा कर रहे थे. मंदमंद चलती पवन और आकाश में तैरती बादलों की घटाओं ने सिणली के तालाब के आसपास की सुंदरता चौगुनी कर दी थी. बादलों की गर्जना के साथ मोरों की पीऊपीऊ मन को मोह रही थी.

तालाब के किनारे के पेड़ों पर पड़े झूलों पर झूला झूलते हुए महिलाएं यानी तीजनियां समूह में सावन के गीत गा रही थीं. बीचबीच में उन की हंसी की खिलखिलाहट सिणाली के तालाब पर इत्र सी तैर रही थी. अचानक ही उन के झूले रुक गए और झूला झूल रही महिलाएं ‘बचाओ…बचाओ…’ चिल्लाने लगीं.

वातावरण में गीतों की जगह चीखपुकार गूंजने लगी. क्योंकि गीत गा रही तीजनियों को पाटण का सूबेदार  हाथी खान अपने साथ ले जा रहा था. जब तक गांव वालों को इस बात की खबर लगती, तब तक हाथी खान उन महिलाओं को ले कर जा चुका था.

गांव के लोग हाथ मलते रह गए. उस समय महेवा के राजकुमार जगमाल अपनी रियासत से बाहर गए हुए थे. उन के अलावा और किसी में इतना साहस नहीं था कि वह हाथी खान का पीछा करता. हाथी खान के इस दुस्साहस से गांव वाले बहुत नाराज थे. यह 15वीं शताब्दी की बात है.

उस समय राजकुमार जगमाल के पिता रावल माला महेवा में तप कर रहे थे. यही रावल माला अपनी भक्तिमती पत्नी रूपांदे की संगति में रावल मल्लीनाथ कहलाए थे. आज उन्हीं के नाम पर यह प्रदेश मालानी कहलाता है. वह तपस्वी और संत के अलावा बड़े ही बलशाली योद्धा भी थे.

राजकुमार जगमाल भी पिता की तरह युद्ध कला में बड़े ही निपुण और बलशाली योद्धा थे. महेवा लौटने पर जब उन्हें पता चला कि पाटण का सूबेदार हाथी खान उन के राज्य की महिलाओं का अपहरण कर ले गया है तो उन का खून खौल उठा.

उन्होंने अपने प्रधान हुल भौपजी से कहा, ‘‘ठाकुर सा, हाथी खान ने हमारे राज्य की महिलाओं का अपहरण कर के हमारी इज्जत उतार दी है. हमें उन महिलाओं को मुक्त करा कर हाथी खान को सबक सिखाना जरूरी हो गया है.’’

भौपजी नम्रता से बोले, ‘‘हम उन महिलाओं को मुक्त तो कराएंगे ही, साथ ही इस का बदला लेने के लिए हाथी खान को सबक भी सिखाएंगे. मैं वादा करता हूं कि अहमदाबाद की छाती चीर कर उन महिलाओं को महेवा ले आऊंगा. वे एक बार फिर बेखौफ हो कर सिणली तालाब की पाल पर झूले झूलती दिखेंगी.

मगर राजकुमार जगमाल को चैन कहां था. जब तक वे महिलाएं सकुशल घर नहीं आ जातीं, तब तक उन्होंने पगड़ी न बांधने, हजामत न बनाने और धुले कपड़े न पहनने की प्रतिज्ञा कर ली थी. उसी समय सिर पर काला कपड़ा बांध कर वह अहमदाबाद पर चढ़ाई करने की योजना बनाने लगे.

उधर हाथी खान ने उन महिलाओं को पाटण के किले में कैद कर दिया था. दरअसल हाथी खान सिपहसालार था, जो अहमदाबाद के अपने सुल्तान महमूद बेग को सदैव खुश रखने में लगा रहता था. अपने आका को खुश करने के लिए ही उस ने यह काम किया था. यद्यपि उस के सैनिक चाहते थे कि इन सुंदर महिलाओं का बंटवारा कर लिया जाए, पर उस ने किसी की भी नहीं सुनी. उस ने साफ साफ कह दिया था कि सुल्तान महमूद बेग जैसा कहेंगे, वैसा ही किया जाएगा.

उधर पाटण के किले में बंद महेवा की उन तीजनियों ने अन्नजल लेने से मना कर दिया था. हाथी खान ने उन्हें सुल्तान महमूद बेग को खुश करने का लालच दिया. उस ने कहा कि अगर वे ऐसा करती हैं तो पूरी जिंदगी शानोशौकत के साथ कटेगी. तीजनियों ने हाथी खान की बात नहीं मानी. उन्होंने हाथी खान से साफ कह दिया था कि वे मर जाएंगी, लेकिन परपुरुष को अपना शरीर नहीं छूने देंगी.

अहमदाबाद में सुल्तान महमूद बेग की बेटी गींदोली को जब पाटण के किले में महेवा से अपहरण कर के लाई तीजनियों को कैद में रखने की सूचना मिली तो वह अपने पिता महमूद बेग से बोली, ‘‘अब्बा हुजूर, सुना है कि आप के सिपहसालार हाथी खान ने महेवा लूटा है और लूट का बहुत सा माल ला कर पाटण के किले में रखा है?’’

‘‘तुम ने ठीक सुना है शहजादी. हाथी खान एक बहादुर सिपाही है. उस ने हमारा नाम रोशन किया है.’’

‘‘पर अब्बा हुजूर, सुना है कि लूट में वह वहां से औरतें भी लाए हैं और उन्हें आप के हरम में भेजना चाहते हैं. यह तो ठीक नहीं है अब्बा हुजूर.’’

‘‘मर्दों की बातों में दखलंदाजी नहीं किया करते शहजादी.’’ महमूद बेग ने यह बात नाराजगी से कही, पर जब उस ने बेटी की आंखों में आंसू देखे तो वह तड़प उठा. वह उसे समझाते हुए बोला, ‘‘रोओ मत, रोओ मत मेरी दुलारी. अच्छा यह बताओ कि तुम चाहती क्या हो?’’

‘‘मैं उन औरतों से मिलना चाहती हूं अब्बा हुजूर. सुना है, उन्होंने अन्नजल त्याग दिया है. अगर उन्होंने खानापीना छोड़ दिया है तो वे फिर जिंदा कैसे रहेंगी अब्बा?’’ गींदोली ने भोलेपन से पूछा तो महमूद बेग ने कहा, ‘‘यही तो मुसीबत है इन हिंदू औरतों की, मरने पर तुल जाती हैं. किसी की सुनती ही नहीं हैं.’’

अब्बू के मना करने के बावजूद शहजादी गींदोली पाटण किले में कैद तीजनियों से मिलने जा पहुंची.

शहजादी सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी थी, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती ही नहीं थी. इसलिए बंदी तीजनियों को देख कर वह सिहर उठी. उस ने एक रूपसी से कहा, ‘‘क्यों सता रही हो अपने आप को बहन. मान जाओ इन लोगों की बात. औरत को आखिर क्या चाहिए. घरबार, धनदौलत और सुखी जीवन. यहां तुम्हें यह सब कुछ मिलेगा. यहां तुम्हें महेवा से भी ज्यादा सुख मिलेगा…’’

शहजादी गींदोली अपनी बात पूरी कर पाती, उस के पहले ही रूपसी का झन्नाटेदार थप्पड़ शहजादी के गाल पर पड़ा. थप्पड़ लगते ही शहजादी का गाल लाल हो गया. उसे थप्पड़ मारने के बाद रूपसी ने थू कह कर मुंह बनाते हुए जमीन पर थूक दिया.

सैनिकों ने रूपसी की पिटाई शुरू कर दी, पर गींदोली ने उन्हें रोक दिया. शहजादी गींदोली ने समझाबुझा कर आखिरकार उन्हें खाना खाने के लिए मना ही लिया. उन्होंने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उन्हें यहां से निकलने में मदद करेगी. अपने अब्बा से कह कर आखिरकार शहजादी ने उन्हें कैदखाने से निकलवा कर पाटण के बाग में रहने की व्यवस्था करा दी. इस के अलावा उन्हें अच्छे कपड़े भी उपलब्ध करा दिए, ताकि रूपसियों का मन बदल जाए.

सुल्तान महमूद बेग भी खुश था. हाथी खान अपनी तरक्की का इंतजार कर रहा था. उस ने पाटण के बाग की चौकसी के पुख्ता इंतजाम कर दिए थे.

                                                                                                                                     क्रमशः