Domestic Dispute : सास से परेशान बहु ने सुपारी देकर कराया मर्डर

(Murder Story)  ज्योति यदि अपनी आदतों में सुधार कर लेती तो उस की सास उस के साथ टोकाटाकी नहीं करती. लेकिन खुद सुधरने के बजाए ज्योति ने अपने और अपनी सहेली बरखा के प्रेमी राजू से मिल कर ऐसी गहरी साजिश रची कि…


‘‘दे खो या तो तुम मेरी बात को समझ नहीं पा रहे हो या फिर जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश कर रहे हो. तुम्हें तो पता ही है कि इस उम्र में भी छोटीछोटी बातों को ले कर बीजी मुझ से झगड़ा करती हैं. बातबात पर टोकना तो जैसे उन की आदत सी हो गई है. अब तुम ही बताओ कि मैं क्या कोई दूध पीती बच्ची हूं जो हर समय मुझ से टीकाटिप्पणी की जाती रहे. आखिर बीजी मेरे साथ सौतेला व्यवहार क्यों करती हैं.

‘‘हमारी शादी को लगभग 20-22 साल हो चुके हैं. 3 बच्चों की मां हूं मैं. बड़ा बेटा शादी के लायक हो चुका है. इन सब के बावजूद मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं इस घर की बहू नहीं मात्र एक नौकरानी हूं. यहां तक कि मेरे सारे गहने भी उन्होंने अलमारी में बंद कर रखे हैं.

‘‘कहीं आनाजाना हो तो पहले उन की मिन्नतें करो या फिर बिना गहनों के ही विधवाओं की तरह जाओ. मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता. आखिर बरदाश्त करने की भी कोई सीमा होती है.’’ ज्योति ने पति मंजीत से कहा. पत्नी की बात सुन कर कुछ समय के लिए मंजीत गंभीर हो गया था पर वह ज्योति को कोई ठोस जवाब नहीं दे सका था. वह भी अच्छी तरह जानता था कि ज्योति जो कह रही है वह सही तो है पर वह अपनी मां सुरजीत कौर के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था. वह पुराने विचारों की शक्की महिला थीं. बहू ज्योति को वह अपने हिसाब से चलाना चाहती थीं. पर ज्योति की कुछ बातें उन्हें पसंद नहीं थीं. इसलिए ज्योति भी सास को पसंद नहीं करती थी.

मंजीत अपनी मां के सामने जुबान नहीं खोल पाता था. या इस तरह कहें कि वह इस मामले को ले कर घर में क्लेश नहीं करना चाहता था. इसीलिए ज्योति उस से जब भी मां की शिकायत करती तो वह हर बार उस की बातों को टाल जाता था. सब कुछ समझते हुए उस दिन भी वह ज्योति की बात को टालते हुए बोला, ‘‘ज्योति देखो, अब साढ़े 8 बज गए हैं. मैं ड्यूटी के लिए लेट हो रहा हूं. तुम्हारे इस मसले पर मैं शाम को बीजी से बात कर लूंगा. तब तक तुम सब्र करो.’’ ज्योति को आश्वासन दे कर मंजीत सिंह अपनी ड्यूटी पर चला गया. यह बात 29 मई, 2018 की है. मंजीत सिंह लुधियाना के उपनगर टिब्बा रोड की कंपनी बाग कालोनी में रहता था. उस के पिता की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. परिवार में 75 वर्षीय मां सुरजीत कौर के अलावा पत्नी ज्योति और 3 बच्चे थे जिन में बड़ा बेटा गुरप्रीत सिंह 19 साल का हो चुका था.

मंजीत सिंह लुधियाना के औद्योगिक नगर, फोकल पौइंट फेस-4 स्थित एक साइकिल कंपनी में बतौर ड्राइवर की नौकरी करता था. वहां उसे जो तनख्वाह मिलती उस से आसानी से घर का गुजारा चल रहा था. दोनों बेटियों की पढ़ाई चल रही थी और बेटा गुरप्रीत एक कंपनी में नौकरी करता था. 29 मई की सुबह साढ़े 8 बजे मंजीत के औफिस जाने के कुछ देर बाद गुरप्रीत भी अपने काम पर चला गया और 9 बजे तक दोनों बेटियां सिमरन और खुशी भी अपने स्कूल चली गई थीं. सब के चले जाने के बाद ज्योति घर के कामों में व्यस्त हो गई. उस समय सुरजीत कौर अपने कमरे में लेटी हुई थी. घर का काम खत्म करने के बाद ज्योति पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली बरखा के घर चली गई थी. वह सास को बता कर गई थी और सहेली के यहां जाना उस का रोज का नियम था.

दोपहर के लगभग डेढ़ बजे मोहल्ले वालों ने मंजीत सिंह के घर से ज्योति के चीखने और जोरजोर से रोने की आवाजें सुनीं. ज्योति के चीखने की आवाज सुन कर आसपास के लोग इकट्ठे हो गए. लोग जब आए तो उन्होंने देखा कि सुरजीत कौर बुरी तरह से घायल थीं. उन के सिर से खून निकल रहा था. वह हौलेहौले कराह भी रही थीं. पड़ोसियों ने इस बात की सूचना सुरजीत कौर के बेटे मंजीत सिंह को फोन द्वारा दी और नजदीक के थाना टिब्बा रोड में भी इस वारदात की इत्तला दे दी. फिर वह सुरजीत कौर को सिविल अस्पताल ले कर पहुंचे. उन की गंभीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें चंडीगढ़ स्थित पीजीआई अस्पताल रेफर कर दिया. लेकिन चंडीगढ़ पहुंचने से पहले ही रास्ते में उन की मौत हो गई.

सूचना मिलने के बाद थाना टिब्बा के थानाप्रभारी दिलीप बेदी पुलिस पार्टी के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल पर एक कांस्टेबल को छोड़ कर वह पीजीआई चंडीगढ़ पहुंच गए. वहां जब पता चला कि घर की मालकिन सुरजीत कौर की मौत हो गई है तो उन्होंने इस की सूचना एसीपी (पूर्वी) पवनजीत सिंह को दे दी. एसीपी पवनजीत सिंह की सूचना पा कर एसीपी भी अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने वहां मौजूद मृतका के बेटे मंजीत सिंह से बात की. इस के बाद दोनों पुलिस अधिकारी मंजीत को ले कर उस के घर पहुंचे. मौके पर एसीपी ने क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया.

उन्होंने घर का निरीक्षण किया तो घर का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. अलमारी खुली हुई थी और उस में रखे जेवर और नकदी गायब थी. यह सब देख कर लग रहा था कि सुरजीत कौर की हत्या लूट के लिए ही की गई थी. यह भी साफ पता चल रहा था कि इस वारदात को अंजाम देने वाला जो भी व्यक्ति रहा होगा वह इस परिवार से परिचित होगा. क्योंकि घर में जबरदस्ती घुसने का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिला. देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हत्यारों के लिए पहले से ही दरवाजा खोल कर रखा गया था या उस के आने पर खोला गया था और यह काम घर का ही कोई सदस्य कर सकता है. बिस्तर पर और फर्श पर खून भी फैला हुआ था.

पूछताछ के दौरान मंजीत सिंह ने पुलिस को वही सब बताया था जो उस की पत्नी से बात हुई थी. मंजीत के बेटे गुरप्रीत ने बताया कि रोज की तरह वह उस दिन सुबह पौने 9 बजे काम पर जाने के लिए घर से निकल गया था. दोनों बेटियों ने भी बताया था कि वह समय से स्कूल चली गई थीं. थानाप्रभारी ने जब इन सब बातों की तस्दीक की तो वह सही पाई गई. परिवार के सदस्यों में अब केवल ज्योति बची थी. ज्योति के बारे में मोहल्ले से जो रिपोर्ट मिली, वह अच्छी नहीं थी. इस मामले में वह संदिग्ध लग रही थी. लेडी हेडकांस्टेबल सुरजीत कौर ज्योति को पूछताछ के लिए थाने बुला कर ले गई. उस से पूछा, ‘‘जिस समय यह घटना घटी उस समय तुम कहां थी?’’

‘‘घर का काम निपटा कर मैं पूर्वाह्न लगभग 11 बजे पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली बरखा के घर गई थी, मैं रोज ऐसा ही करती थी. कामकाज से निबटने के बाद मैं रोजाना ही बरखा के घर चली जाया करती थी और वहां से दोपहर करीब 1 बजे लौटती थी. उस दिन भी बीजी को दवा देने के बाद, उन्हें बता कर मैं बरखा के घर चली गई थी. जिस समय मैं बरखा के घर गई उस समय बीजी अपने कमरे में सो रही थीं.’’ ज्योति ने बताया.

‘‘वारदात वाले दिन क्या हुआ था, अच्छी तरह सोच कर विस्तार से बताओ.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, रोज की तरह उस दिन भी मैं घर का काम निपटा कर बरखा के घर चली गई थी और जब वापस दोपहर करीब 1 बजे मैं ने लौट कर देखा तो बीजी खून से लथपथ अपने बिस्तर पर पड़ी थीं. घर का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. यह सब देख कर मैं घबरा गई थी. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मैं ने शोर मचाना शुरू कर दिया जिसे सुन कर पड़ोसी भागे चले आए थे.’’ वह बोली.

‘‘जब आप बरखा के घर गई थीं, तब क्या बाहर का दरवाजा बंद कर के गई थीं?’’

‘‘जी नहीं, दरवाजा अंदर से बीजी ने बंद किया था,’’ ज्योति ने कहा.

ज्योति की इस बात पर पुलिस का शक गहरा गया. दरअसल शुरू से ही ज्योति पर संदेह था. ज्योति के बारे में पड़ोसियों ने जो बताया था वह भी कुछ ठीक नहीं था. पड़ोसियों के अनुसार ज्योति की अपनी सास सुरजीत कौर से बिलकुल नहीं बनती थी. अकसर सासबहू के बीच झगड़ा होता रहता था. ज्योति का चरित्र भी ठीक नहीं था. पति के काम पर और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद वह अपने प्रेमी से मिलने चली जाती थी. सास सुरजीत कौर उसे इन सब बातों के लिए टोका करती थी.

‘‘मैं यह पूछता हूं कि सुरजीत कौर के साथ लुटेरों ने इतनी मारपीट की, उन्हें घायल किया. वह भी चीखीचिल्लाई होंगी. तब आप ने उन की आवाज कैसे नहीं सुनी, जबकि आप की आवाज सुन कर पड़ोसी दौड़े आए थे. सुरजीत कौर की आवाज किसी ने कैसे नहीं सुनी.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मैं क्या कह सकती हूं.’’ वह गंभीर हो कर बोली.

‘‘चलिए छोडि़ए इस बात को. आप ने कहा था कि बरखा के घर जाने से पहले आप ने बीजी को दवा दी थी और वह अपने कमरे में सो रही थीं.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘तो फिर अभी आप ने बताया कि दरवाजा बीजी ने अंदर से बंद किया था. जब दवा पीने के बाद वह अपने बिस्तर पर सो रही थीं तो सोते हुए उठ कर दरवाजा अंदर से कैसे बंद कर सकती थीं.’’ थानाप्रभारी के इस प्रश्न पर ज्योति बगलें झांकने लगी. उसे भी लगने लगा था कि वह अपने ही झूठे जवाबों के बीच उलझ कर रह गई है. फिर भी उस ने अपने झूठ पर परदा डालने की असफल कोशिश की. पर वह कामयाब नहीं हो पा रही थी.

एक पड़ोसी ने साफ बताया था कि ज्योति घर से जाते समय मुख्य दरवाजे पर ताला लगा कर जाती थी पर उस दिन उस ने ऐसा नहीं किया था. इन सब बातों से यह तो स्पष्ट हो गया था कि सास को मरवाने में ज्योति का हाथ है. वह मुख्यद्वार इसलिए खुला छोड़ कर गई थी कि हत्यारे आसानी से घर में प्रवेश कर सकें. इस के बाद पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसी ने सुपारी दे कर यह कांड करवाया है. इस हत्याकांड में शामिल लोगों के नाम भी उस ने पुलिस को बता दिए. ज्योति के बयानों पर थानाप्रभारी दिलीप बेदी ने उसी दिन ज्योति की सहेली बरखा, बरखा के आशिक राजवीर कश्यप उर्फ राजू को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए तीनों आरोपियों को 30 मई, 2018 को अदालत में पेश कर 24 घंटे के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड के दौरान इस लूट और हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई वह कुछ इस प्रकार से थी.

घरेलू विवाद के चलते और सास सुरजीत कौर की रोकाटोकी से परेशान हो कर ज्योति ने अपने और अपनी सहेली बरखा के संयुक्त प्रेमी राजवीर कश्यप उर्फ राजू से सास की हत्या कराई थी. राजू बाबा थानसिंह चौक के पास स्थित अंबेडकर नगर में रहता था. योजना के अनुसार राजू ने मामले को लूट का रूप देने की कोशिश की थी. शुरुआती जांच में यह कहानी सामने आई कि ज्योति की अपनी सास से पटती नहीं थी. उस की सास उस के चरित्र पर संदेह करती थी जिसे ले कर घरेलू विवाद रहता था. ज्योति पति से शिकायत करती तो पति भी अपनी मां का साथ देता था. और तो और पति मनजीत ने पैसा व ज्योति के जेवर अपनी मां को सौंप रखे थे.

यह बात भी ज्योति को बेहद खटक रही थी. घर पर पूरी तरह से कब्जा करने और सास से छुटकारा पाने के लिए उस ने यह बात अपनी सहेली बरखा को बताई, बरखा ने यह बात अपने आशिक राजवीर उर्फ राजू को बताई. जिस के बाद तीनों ने मिल कर 75 वर्षीया सुरजीत कौर को रास्ते से हटाने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से साजिश तैयार की. साजिश के तहत राजू ने सुरजीत की हत्या करने के बाद घर में लूटपाट की. ज्योति ने लूटे गए पैसों में से 50 हजार रुपए राजू को देने का लालच दिया, जबकि लूटपाट करने के बाद जो गहने हासिल होने थे वह ज्योति ने अपने पास रखने की शर्त रखी थी. 29 मई, 2018 को मंजीत और उस का बेटा नौकरी पर चले गए. दोनों बेटियां भी स्कूल चली गईं. इस के बाद दोपहर करीब एक और डेढ़ बजे के बीच ज्योति बरखा और राजू की आपस में फोन पर बात हुई.

योजना के मुताबिक ज्योति अपनी सास को अकेली घर में छोड़ कर बरखा के पास चली गई और जाते वक्त वह दरवाजा खुला छोड़ गई थी. इस बीच वारदात को अंजाम देने के लिए राजू अपनी एक्टिवा से वहां पहुंच गया. घटना के वक्त सुरजीत कौर अपने कमरे में बैड पर लेटी हुई थीं. वह राजू को पहचानती थीं, क्योंकि राजू की शादीशुदा बहन उन के घर के नजदीक ही रहती थी. राजू अकसर अपनी बहन के पास आताजाता था. घर में दाखिल होने के बाद राजू ने योजना के मुताबिक सुरजीत कौर से कुछ पैसों की मांग की, जब उन्होंने पैसे देने से इनकार किया तो राजू ने बड़ी क्रूरता से लोहे की छैनी से उन के सिर पर 5-6 बार किए. छैनी का एक वार तो सुरजीत कौर के सिर के आरपास हो गया और वह लहूलुहान हो गईं. वह जोरजोर से चिल्लाने लगीं. पकडे़ जाने के डर से राजू घबरा गया और खून से लथपथ छैनी मौके पर छोड़ कर वहां से भाग खड़ा हुआ.

जल्दबाजी में उस का मोबाइल फोन भी वहीं रह गया था. वारदात को अंजाम देने के बाद उस ने बाहर से किसी के फोन से ज्योति को फोन कर के काम हो जाने की सूचना दे दी. इस के कुछ देर बाद ज्योति घर आ गई. सब से पहले उस ने खून से सना सुरजीत का मोबाइल पानी से धोया और खुद को ड्रामा रचने के लिए तैयार करते हुए लूटपाट का शोर मचा दिया. शोर सुन कर पड़ोसी जब वहां पहुंचे तो सुरजीत कौर बैड पर पड़ी थीं और उन के सिर पर चोटों के गहरे घाव थे. तब उन की सांसें चल रही थीं. लोगों ने बताया कि इस हालत में भी सुरजीत कौर राजू और अपनी बहू ज्योति का नाम ले रही थीं. उस समय किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था. बरखा और ज्योति ने राजू को सुपारी देने के साथ यह वादा भी किया था कि अगर वह पकड़ा गया तो उस की जमानत का इंतजाम भी वह खुद कर देंगी.

पूछताछ में राजू ने बताया कि ज्योति के पड़ोस में उस की बहन रहती है. उस के पास वह अकसर आताजाता था और इस दौरान उस की पहचान ज्योति से हुई. उस ने उस की पहचान अपनी सहेली बरखा से करवाई. बरखा के राजू के साथ करीब 2 साल से अवैध संबंध  चल रहे थे. इसी बीच ज्योति के साथ भी उस के संबंध बन गए और तीनों साथ मिल कर ऐश करने लगे. बरखा की किडनी में पथरी थी. बरखा का पति उस की पिटाई करता था और उस की पथरी का औपरेशन भी नहीं करा रहा था. इसलिए वह अपने पति से तलाक ले कर राजू से शादी करना चाहती थी. राजू ने उस से वादा किया था कि वह उस का पथरी का इलाज करवा कर उस से शादी कर लेगा. इस के लिए उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी. पर पैसों का कहीं से इंतजाम नहीं हो रहा था. इसलिए जब ज्योति ने अपनी सास के बारे में उन्हें बताया तो बरखा और राजू इस काम को करने के लिए तैयार हो गए. वैसे यह सौदा ढाई लाख रुपए में हुआ था.

ज्योति ने भी अपने बयान में बताया था कि वह अपनी सास से बहुत दुखी थी. पति भी उस की नहीं सुनता था और मां की तरफदारी करता था. मां के कहने पर उस से मारपीट भी करता था. ज्योति चाहती थी कि किसी तरह से उस का सास से छुटकारा मिल जाए. इस के चलते उस ने राजू को सास का मर्डर करने के बदले में उसे 50 हजार रुपए और अपने हिस्से की कुछ ज्वैलरी देने की बात कही थी. इस पर तीनों ने मिल कर मर्डर करने की प्लानिग की और सुरजीत कौर की हत्या कर दी थी. पूछताछ के बाद देर रात पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर वारदात के दौरान इस्तेमाल की गई छैनी भी बरामद कर ली.

पुलिस काररवाई मुकम्मल होने के बाद रिमांड अवधि समाप्त होने पर तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

— पुलिस सूत्रों पर आधारित कथा का नाट्य रुपांतर

Murdered : ममेरे भाई को ही घर में गड्ढा खोद दफना दिया

शादीशुदा संतोष का दिल अपने दोस्त की बहन रेखा पर आ गया. उसे पाने के लिए उस ने एक चाल चली. उस चाल में उस की मनोकामना तो पूरी हो गई पर रामकुमार बेवजह मारा गया. सुबह के करीब साढ़े 10 बजे रायबरेली के पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय जैसे ही अपने कार्यालय के सामने गाड़ी से उतरे, बूढ़ा चंद्रपाल यादव अपनी पत्नी जनकदुलारी के साथ उन के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उन के चेहरों से ही लग रहा था कि उन पर कोई भारी विपत्ति आई है. चंद्रपाल ने कांपते स्वर में कहा, ‘‘साहब, पिछले एक महीने से हमारा जवान बेटा रामकुमार लापता है. हम ने उसे बहुत ढूंढ़ा, थाने में गुमशुदगी भी दर्ज कराई, लेकिन कुछ पता नहीं चला. हर तरफ से निराश हो कर अब आप के पास आया हूं.’’

बात पूरी होते ही पतिपत्नी फफकफफक कर रोने लगे. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल का हाथ थाम कर सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘आप अंदर आइए, हम से जो हो सकेगा, हम आप की मदद करेंगे.’’

एसपी साहब ने वहां खड़े संतरी को उन्हें अंदर ले कर आने का इशारा किया. साहब का इशारा पाते ही एक सिपाही दोनों को अंदर ले गया. पांडेयजी ने दोनों को प्यार और सम्मान के साथ बैठा कर उन की पूरी बात सुनी. चंद्रपाल यादव उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली, थाना भदोखर के गांव बेलहिया का रहने वाला था. वैसे तो इस गांव में सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन यादवों की संख्या कुछ ज्यादा है. गांव के ज्यादातर लोगों की रोजीरोटी खेतीकिसानी पर निर्भर है. चंद्रपाल के परिवार में पत्नी जनकदुलारी के अलावा 2 बेटे थे श्यामकुमार तथा रामकुमार और एक बेटी थी श्यामा. श्यामकुमार और श्यामा की शादी हो चुकी थी. श्यामा अपनी ससुराल में रहती थी. जबकि श्यामकुमार अपने परिवार के साथ मांबाप से अलग रहता था. एक तरह से रामकुमार ही मांबाप के बुढ़ापे का सहारा था.

14 जनवरी, 2013 की रात रामकुमार खापी कर घर में सोया था, लेकिन सुबह को वह गायब मिला. 15 जनवरी की सुबह से ही चंद्रपाल ने 23 वर्षीय रामकुमार की तलाश शुरू कर दी, लेकिन काफी खोजबीन के बाद भी उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. कोई रास्ता न देख चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने 2-4 दिन इधरउधर देखा, उस के बाद वह भी शांत हो कर बैठ गई. धीरेधीरे महीना भर से ज्यादा बीत गया. जब रामकुमार का कुछ पता नहीं चला तो गांव वालों ने चंद्रपाल को शहर जा कर कप्तान साहब से मिलने की सलाह दी. इसी के बाद चंद्रपाल पत्नी के साथ पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय से मिलने आया था. एसपी साहब ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था कि वे लोग परेशान न हों. वह जल्द से जल्द उन के बेटे के बारे में पता लगवाने की कोशिश करेेंगे.

पुलिस अधीक्षक के इस आश्वासन पर चंद्रपाल और उस की पत्नी जनकदुलारी को काफी राहत महसूस हुई. इस के बाद पुलिस ने नए सिरे से छानबीन शुरू की. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय के निर्देश पर थाना भदोखर पुलिस, क्राइम ब्रांच और सर्विलांस सेल सभी सक्रिय हो गए. उन दिनों थाना भदोखर के थानाप्रभारी आर.पी. रावत थे. वह अपनी पुलिस टीम के साथ रामकुमार की खोज में लग गए. यह देख कर पुलिस से नाउम्मीद हो चुके चंद्रपाल को लगा कि शायद अब उन के बेटे के बारे में पता चल जाएगा. लेकिन पुलिस की तत्परता के बावजूद दिन पर दिन बीतते जा रहे थे. रामकुमार का कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा था. धीरेधीरे पुलिस ने लाख युक्ति लगाई, लेकिन कोई भी युक्ति काम नहीं आई. गांव वालों की ही नहीं, पुलिस की भी समझ में नहीं आ रहा था कि रामकुमार को जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

रामकुमार के पता न चल पाने से पुलिस अधीक्षक भी हैरान थे. उन की भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस के बारे में पता क्यों नहीं चल रहा है. गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. गांव वालों के अनुसार, वह अपने काम से काम रखने वाला लड़का था. उस की शादी भी नहीं हुई थी. उस का चालचरित्र भी ऐसा नहीं था कि उस बारे में कुछ ऐसावैसा सोचा जाता. हर कोई रामकुमार को ले कर परेशान था कि उसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि रामकुमार के लापता होने का रहस्य अपनेआप खुल गया.

26 जुलाई की रात इतनी ज्यादा बारिश हुई कि बेलहिया गांव में पानी ही पानी भर गया. चंद्रपाल के घर में भी पानी भर गया था. घर का पानी निकालने के लिए चंद्रपाल नाली बना रहा था तो जनकदुलारी ने कहा, ‘‘रामू के बप्पा रामू के कमरे में भी पानी भर गया है. उस में रखा तख्त सरका देते तो मैं वहां का पानी भी बाहर निकाल देती.’’

रामकुमार का अपना अलग कमरा था. जब से वह गायब हुआ था, जनकदुलारी उस कमरे में कम ही जाती थी. क्योंकि उस में रामकुमार का सारा सामान रखा था, जिसे देख कर उसे बेटे की याद आ जाती थी. इसी वजह से चंद्रपाल का भी उस कमरे में जाने का मन नहीं करता था. इसलिए उस ने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ऐसे ही काम चल जाए तो चला लो, मेरा उस कमरे में जाने का मन नहीं करता.’’

‘‘मन तो मेरा भी नहीं करता. लेकिन कच्ची दीवार है. पानी भरा रहेगा तो दीवारें गिर सकती हैं.’’

चंद्रपाल तख्त हटाने के लिए कमरे में पहुंचा तो उस ने देखा तख्त के नीचे की मिट्टी अंदर धंसी हुई है. वहां गढ्ढा सा बना हुआ था. उस गड्ढे को देख कर चंद्रपाल को हैरानी हुई, क्योंकि वह कोठरी काफी पुरानी थी. उस की जमीन काफी मजबूत थी. उस में इस तरह का गड्ढा खुदबखुद नहीं हो सकता था. बहरहाल उस ने जैसे ही तख्त हटवाया, उसे जो दिखाई दिया, उस से उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. गड्ढे की धंसी हुई मिट्टी में सड़ागला एक इंसानी हाथ दिखाई दे रहा था. चंद्रपाल ने जल्दीजल्दी हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की तो थोड़ी ही देर में उस के बेटे रामकुमार की लाश निकल आई.

रामकुमार की लाश निकलते ही चंद्रपाल बदहवास सा चिल्लाने लगा. उस की चीखपुकार सुन कर जनकदुलारी और आसपड़ोस के लोग भी आ गए. रामकुमार की सड़ीगली लाश देख कर घर में कोहराम मच गया. गांव वाले भी हैरान थे. बहरहाल रामकुमार की लाश मिलने की सूचना थाना भदोखर पुलिस को दे दी गई. वहां से यह सूचना पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय को दी गई.

पुलिस के लिए यह सूचना हैरान करने वाली थी. आननफानन में थाना भदोखर के थानाप्रभारी रामराघव सिंह सिपाही कन्हैया सिंह और अमरचंद्र शुक्ला को साथ ले कर गांव बेलहिया आ पहुंचे. थोड़ी ही देर में पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय भी फौरेंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने सावधानी से लाश गड्ढे से बाहर निकाली. वह पूरी तरह से सड़गल चुकी थी. लाश के साथ लाल रंग का एक दुपट्टा मिला, जिसे पुलिस ने कब्जे में ले लिया. इस के बाद अन्य काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए रायबरेली भेज दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि रामकुमार की हत्या गला दबा कर की गई थी. महीनों पहले हुई हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस के लिए यह चुनौती जैसी थी. हत्या की कोई वजह नजर नहीं आ रही थी. लाश घर के अंदर मिली थी, साफ था हत्या घर के अंदर ही की गई थी. ऐसी स्थिति में इस मामले में घरवालों का ही हाथ हो सकता था. लेकिन घर में सिर्फ बूढ़े मांबाप थे. वे अपने बेटे की हत्या क्यों करते? जबकि वही उन का सहारा था. वैसे भी वह ऐसा नहीं था कि मांबाप उस से परेशान होते. पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए जब चंद्रपाल और जनकदुलारी से विस्तारपूर्वक पूछताछ की तो उन्होंने एक बात ऐसी बताई, जिस पर पुलिस को संदेह हुआ. पतिपत्नी ने पुलिस को बताया था कि जिस रात रामकुमार गायब हुआ था, उस रात उन का रिश्ते का एक भांजा संतोष आया हुआ था.

वह पंजाब से एक लड़की साथ लाया था, जिस की शादी वह रामकुमार से कराना चाहता था. पुलिस ने जब चंद्रपाल से उन के उस भांजे संतोष के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह पंजाब के अंबाला शहर में रहता है. पुलिस को उस पर संदेह हो रहा था, इसलिए पुलिस उस से ही नहीं, उस लड़की से भी पूछताछ करना चाहती थी, जो उस के साथ आई थी. पुलिस अधीक्षक राजेश पांडेय ने चंद्रपाल के भांजे संतोष और उस के साथ आई लड़की को रायबरेली लाने के लिए एक पुलिस टीम अंबाला भेज दी. पुलिस ने दोनों को रायबरेली ला कर पूछताछ की तो 11 महीने पुराने रामकुमार हत्याकांड से पर्दा उठ गया. उन दोनों ने रामकुमार की हत्या की जो कहानी पुलिस को सुनाई थी, वह इस प्रकार थी.

रायबरेली के ही थाना डलमऊ के गांव ठाकुरद्वारा का रहने वाला दिनेश कुमार अपने साले संतोष कुमार के साथ पंजाब के अंबाला शहर में रहता था. वहां दोनों एक साइकिल बनाने की फैक्ट्री में नौकरी करते थे. दोनों ने पंजाबी बाग मोहल्ले में किराए का एक कमरा ले रखा था, जिस में वे एक साथ रहते थे. उसी मोहल्ले में पटना की साधु बस्ती का रहने वाला रमेश कुमार यादव भी रहता था. वह कृषिकार्य की मशीनें बनाने के कारखाने में काम करता था. रमेश के साथ उस का परिवार भी रहता था. रमेश के परिवार में पत्नी सुधा, 10 साल का बेटा राजू और 20 साल की बहन रेखा थी.

एक मोहल्ले में रहने की वजह से और एक ही जाति का होने की वजह से दिनेश और रमेश की पहले जानपहचान हुई, जो बाद में दोस्ती में बदल गई. बीच में दिनेश के साले संतोष की नौकरी छूट गई तो रमेश ने उसे अपनी फैक्ट्री में नौकरी दिलवा दी थी. इस के बाद संतोष से भी रमेश की दोस्ती हो गई थी. अकसर सभी एकसाथ बैठते और एकदूसरे का सुखदुख बांटते. ऐसे में ही एक दिन रमेश ने कहा, ‘‘भाई दिनेश, सब तो ठीक है. मुझे चिंता रेखा की है. समझ में नहीं आ रहा कि उस की शादी कहां करूं, क्योंकि गांव से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं रह गया है.’’

‘‘रमेश भाई, परदेश में आप ने हमारी बहुत मदद की है. मैं इस मामले में आप की मदद कर सकता हूं. दरअसल संतोष के एक मामा हैं चंद्रपाल. वह रायबरेली के नजदीक बेलहिया गांव में रहते हैं. उन का खातापीता परिवार है. उन के पास खेती की ठीकठाक जमीन है. उन का बेटा रामकुमार आप की बहन रेखा के लिए एकदम ठीक है. जातिबिरादरी भी एक है. आप कहें तो बात चलाऊं?’’ दिनेश ने कहा.

‘‘दिनेश भाई, तुम कह तो ठीक रहे हो. लेकिन परेशानी यह है कि मेरी बहन कई सालों से यहां शहर में हमारे साथ रह रही है. वह गांव में कैसे रहेगी?’’ रमेश ने अपनी परेशानी बताई तो दिनेश ने कहा, ‘‘रमेश भाई, आप भी कैसी बात करते हैं. न जाने कितने लोगों को आप ने नौकरी दिलवाई है. शादी के बाद बहनोई को भी यहीं बुला लेना. उस के बाद आप की बहन यहीं रहेगी.’’

दिनेश की बात रमेश को सही लगी. इस के बाद उस ने अपनी पत्नी सुधा से बात की तो उस ने भी हामी भर दी. इस के बाद तो दिनेश और संतोष से रमेश की और भी गहरी दोस्ती हो गई. रमेश की बहन रेखा की उम्र बामुश्किल 20 साल थी. उस का गोल चेहरा, बोलती आंखें किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती थीं. संतोष तो उसे देख कर पागल सा हो गया था. अब वह अकसर रमेश के घर आनेजाने लगा. उस की पत्नी को वह भाभी कहता था. अगर रेखा वहां होती तो वह उस की शादी की बात छेड़ देता. वह अपने मामा के बेटे रामकुमार की खूब तारीफें करता था. ऐसी ही बातों के बीच एक दिन सुधा ने कहा, ‘‘आप मेरी ननद को तो देख ही रहे हैं इस का दूल्हा भी इस जैसा है कि नहीं? अगर दूल्हा सुंदर न हुआ तो रेखा उस के साथ नहीं जाएगी. बारात को बिना दुल्हन के ही जाना होगा.’’

‘‘ऐसा नहीं होगा भाभीजी, रामकुमार भी कम सुंदर नहीं है. एकदम हीरो लगता है. लड़कियां उस पर जान छिड़कती हैं.’’

‘‘अच्छा तो यह बताओ कि वह मेरी रेखा को पसंद कर लेगा या नहीं?’’ सुधा ने हंसते हुए पूछा.

‘‘रेखा भी कहां कम है,’’ संतोष ने रेखा की ओर तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘एकदम हीरोइन लगती है. अगर मैं शादीशुदा न होता तो खुद ही इस से शादी कर लेता.’’

रेखा का दीवाना हो चुका संतोष रेखा की तारीफों के कसीदे काढ़ने लगा. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा के नजदीक जाना चाहता था. दिलफेंक संतोष जानता था कि लड़कियों को अपनी तारीफ अच्छी लगती है. इसीलिए वह उस की तारीफ कर के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था. दरअसल वह किसी भी तरह रेखा को पाने के सपने देखने लगा था और किसी भी तरह अपने उसी सपने को पूरा करने का तानाबाना बुन रहा था. रमेश, दिनेश और संतोष जब भी मिलते, रेखा की शादी को ले कर चर्चा जरूर होती. ऐसे में ही एक दिन दिनेश और संतोष ने रमेश की रायबरेली के रहने वाले अपने रिश्तेदार चंद्रपाल से बात भी कराई. इस के बाद संतोष ने कहा, ‘‘मामा, आप चिंता न करें. अगले सप्ताह मैं आ रहा हूं. अपने साथ आप की होने वाली बहू को भी ले आऊंगा. आप लोग उसे अपने घर रख कर कायदे से देख लीजिएगा.’’

चंद्रपाल अपने बेटे रामकुमार के लिए लड़की तलाश ही रहा था. संतोष और दिनेश ने इस रिश्ते की बात की तो उस ने हामी भर दी. संतोष रमेश का विश्वस्त था. उस ने जब रेखा को दिखाने के लिए उसे अपने साथ रायबरेली स्थित अपने गांव ले जाने की बात की तो वह इनकार नहीं कर सका. दिसंबर, 2012 के आखिरी सप्ताह में संतोष रेखा को साथ ले कर अपने गांव जाने के लिए रवाना हुआ. रास्ते में उस ने रेखा को अकेली पा कर उस से खूब प्यारभरी बातें कीं. बहाने से उस के संवेदनशील अंगों को भी छुआ. लेकिन रेखा सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रही. इस से संतोष की हिम्मत बढ़ गई. घर जा कर उस ने रेखा को अपनी पत्नी रमा और 3 साल की बेटी सुमन से मिलवाया. संतोष ने रमा को बताया कि रेखा को वह बेलहिया के रहने वाले मामा के बेटे रामकुमार से शादी कराने के लिए लाया है.

रमा को इस में क्या परेशानी हो सकती थी. उस ने रेखा की खूब आवभगत की. लेकिन घर मे रहते हुए रेखा और संतोष एकदूसरे से कुछ ज्यादा ही खुल गए. एक दिन मौका मिलने पर संतोष ने रेखा को बांहों में भर लिया. थोड़ी नानुकुर के बाद रेखा ने भी स्वयं को उसे समर्पित कर दिया. इस के बाद जब भी मौका मिलता, संतोष और रेखा अपनी इच्छा पूरी करते. संतोष और रेखा मिलते तो थे सब की नजरें बचा कर, लेकिन उन के हावभाव से रमा को उन पर शक हो गया. इस की एक वजह यह थी कि रमा को अपने पति की फितरत पता थी. उस ने रेखा को अपने घर में रखने से मना किया तो संतोष ने उसे अपने मामा चंद्रपाल के यहां बेलहिया पहुंचा दिया. अपनी होने वाली ससुराल देख कर और होने वाले पति से मिल कर रेखा खुश थी. संतोष ने वहां पहुंच कर चंद्रपाल से कहा था,

‘‘मामा, तुम्हारी होने वाली बहू ले आया हूं. कुछ दिन रख कर देख लो. मैं 10 दिन बाद अंबाला जाऊंगा, तब इसे साथ ले जाऊंगा.’’

चंद्रपाल ने रेखा को अपने घर में रख लिया. रामकुमार अपनी होने वाली पत्नी से बातचीत तो करता था, लेकिन संतोष की तरह कभी उस के नजदीक जाने की कोशिश नहीं की थी. वह सोचता था कि जो काम शादी के बाद होता है, उसे शादी के बाद ही होना चाहिए. रेखा को मामा के यहां छोड़ कर संतोष अपने घर तो लौट गया, लेकिन जल्दी ही उसे रेखा की याद सताने लगी. 2-3 दिन तो उस ने किसी तरह बिताए, लेकिन जब उस से नहीं रहा गया तो वह मामा के घर आ गया. रेखा चंद्रपाल के यहां घर के अंदर वाले कमरे में लेटती थी, जबकि रामकुमार अपनी मां जनकदुलारी के साथ वाले कमरे में सोता था. संतोष के सोने की व्यवस्था रामकुमार वाले कमरे में की गई थी.

रात में जब संतोष को लगा कि रामकुमार सो गया है तो वह चुपके से उठा और रेखा के कमरे में जा पहुंचा. रेखा ने उसे मना किया तो उस ने कहा, ‘‘यहां सभी घोड़े बेच कर सो रहे हैं, इसलिए चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. तुम्हें पता होना चाहिए कि इतनी दूर मैं सिर्फ तुम से मिलने आया हूं.’’

रेखा मान गई तो संतोष उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा. इसी बीच अचानक रामकुमार की आंख खुल गई तो उसे रेखा के कमरे में फुसफुसाने की आवाज सुनाई दी. उस ने संतोष का बिस्तर टटोला तो वह गायब था. रामकुमार सारा माजरा समझ गया, वह उठ कर सीधे रेखा के कमरे में जा पहुंचा. उस ने वहां जो देखा, उसे देख कर उसे गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उस ने उस गुस्से को जब्त कर के सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘तुम लोगों पर भरोसा कर के मैं ने शादी के लिए हामी भर दी थी. लेकिन यह सब देख कर मेरा इरादा बदल गया है. निश्चिंत रहो, मैं यह बात किसी से नहीं बताऊंगा. तुम लोग चुपचाप अपने घर चले जाना.’’

उन दोनों को चेतावनी दे कर रामकुमार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. रामकुमार की इस धमकी से रेखा और संतोष सन्न रह गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. पलभर सोचविचार कर के रेखा बोली, ‘‘तुम शादीशुदा हो, इसलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. चिंता की बात यह है कि अंबाला लौट कर हम भैयाभाभी को क्या जवाब देंगे कि रामकुमार शादी क्यों नहीं करना चाहता? अगर रामकुमार ने यह बात सब को बता दी तो हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’

सुन कर संतोष परेशान हो उठा. वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘अगर रामकुमार न रहे तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि रात में क्या हुआ था. इस का हल अब यही है कि उसे खत्म कर दें. इस से सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘मार तो देंगे, लेकिन उस की लाश का क्या करेंगे?’’ रेखा ने चिंता जाहिर की तो संतोष बोला, ‘‘उस की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मैं ने इस बारे में भी सोच लिया है.’’

उस समय रात के करीब 12 बज रहे थे. रेखा और संतोष दबे पांव रामकुमार के कमरे में पहुंचे. तब तक वह सो गया था. संतोष ने रेखा का दुपट्टा ले कर फुर्ती से रामकुमार के गले में डाला और जल्दी से कस दिया. रामकुमार छटपटा कर मर गया. इस के बाद दोनों लाश को उसी कमरे में ले आए, जहां थोड़ी देर पहले रंगरलियां मना रहे थे. उन्होंने तख्त हटा कर वहां 3 फुट गहरा गड्ढा खोदा और उस में लाश डाल कर मिट्टी भर दी. सारा काम निपटा कर संतोष ने कहा,  ‘‘रेखा हमें यहां 3-4 दिन रुकना पड़ेगा. अन्यथा लोग हम पर शंका करेंगे. जब मामला शांत हो जाएगा, उस के बाद अंबाला चले जाएंगे.’’

‘‘लेकिन लाश से बदबू आने लगेगी तो हमारा राज खुल जाएगा.’’ रेखा ने आशंका व्यक्त की.

‘‘तुम बेकार ही परेशान हो रही हो. आज मुझे किसी ने यहां आते देखा तो है नहीं. केवल रामकुमार जानता था, वह रहा नहीं. कल मैं 5-6 किलो नमक ले आऊंगा. उसे डाल देंगे तो लाश गल जाएगी और बदबू नहीं आएगी.’’ कह कर संतोष रात में ही अपने गांव चला गया. सुबह किसी ने रामकुमार की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन जैसेजैसे समय बीता, उस की तलाश शुरू हुई. शाम होतेहोते पूरे गांव में खबर फैल गई कि रामकुमार गायब है. रेखा भी घर वालों के साथ रामकुमार की तलाश में लगी थी.

चंद्रपाल ने संतोष को रामकुमार के गायब होने की बात बताई तो वह भी उस की तलाश के बहाने बेलहिया आ गया. जब सब सो गए तो वह रेखा के कमरे में गया और रामकुमार की लाश पर पड़ी मिट्टी हटा कर अपने साथ लाया नमक उस पर डाल कर ठीक से मिट्टी फैला कर गड्ढा बंद कर दिया. इस के बाद उस के ऊपर तख्त डाल दिया. उस कमरे में अंधेरा रहता था, इसलिए किसी का भी इस ओर ध्यान नहीं गया कि वहां गड्ढा खोदा गया है. घर में अब रामकुमार की मां जनकदुलारी ही रह गई थी. ऐसे में उन्हें किसी का डर नहीं था. इसलिए संतोष रामकुमार की लाश के ऊपर पड़े तख्त पर रेखा के साथ हर रात रंगरलियां मनाने लगा. चूंकि उन्हें इस के बाद इस तरह का मौका फिर मिलने वाला नहीं था. इसलिए इस का वे भरपूर लाभ उठा रहे थे.

रामकुमार का जब कई दिनों तक पता नहीं चला तो चंद्रपाल ने थाना भदोखर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. पुलिस ने भी 2-4 दिनों तक राजकुमार को इधरउधर खोजा. जब उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो पुलिस भी सुस्त पड़ गई. अब तक सभी को यकीन हो गया था कि रामकुमार घर छोड़ कर कहीं चला गया है. उधर जब संतोष को पूरा यकीन हो गया कि गांव और घर वालों ने रामकुमार को लापता मान लिया है तो वह रेखा को ले कर वापस अंबाला चला गया. वहां उस ने रामकुमार के गायब होने की बात बता कर रेखा और रामकुमार की शादी वाली बात खत्म कर दी.

बाद में संतोष को रेखा से भी डर लगने लगा कि कहीं वह किसी से सच्चाई न बता दे. इस से बचने के लिए उस ने रेखा की शादी भोपाल के कटरा सुल्तान के रहने वाले रामगोपाल यादव से करा दी. रामगोपाल उसी के साथ नौकरी करता था. इस के बाद संतोष निश्चिंत हो गया, क्योंकि उस ने फंसने के सारे रास्ते साफ कर दिए थे. वह समयसमय पर फोन कर के रामकुमार के पिता चंद्रपाल से उस का हालचाल लेता रहता था. लेकिन रामकुमार की लाश मिली तो पुलिस ने चंद्रपाल से विस्तार से पूछताछ की. उस ने उस रात घर में रेखा और संतोष के होने की बात बता कर उन के बारे में भी सारी बातें बता दी थीं.

पुलिस को रेखा और संतोष पर संदेह हुआ तो अंबाला जा कर दोनों को पकड़ लिया. पहले तो वे आनाकानी करते रहे, लेकिन पुलिस ने अंतत: सच्चाई उगलवा ही ली. रेखा और संतोष ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो थाना भदोखर पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.