सुप्रीम कोर्ट ने कहा- नहीं बदलेगा फैसला
सीजेआई ने एसबीआई से कहा, ”आप को कुछ बातों पर स्पष्टीकरण देना चाहिए. पिछले 26 दिनों में आप ने क्या किया? आप के हलफनामे में इस पर एक शब्द नहीं लिखा गया है. बौंड खरीदने वाले के लिए एक केवाईसी होती थी तो आप के पास बौंड खरीदने वाले की जानकारी तो है ही.’’
इस पर एसबीआई के वकील हरीश साल्वे ने जवाब देते हुए कहा, ”इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हमारे पास जानकारी है, लेकिन डोनर्स से मिलान करने में वक्त लगेगा.’’
इस पर पांचों जजों में से दूसरे नंबर के जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा, ”जानकारी अगर सील कवर में है तो उस सील कवर को खोलिए और जानकारी दीजिए.’’
फिर हरीश साल्वे ने कहा, ”आदेश में 2 पार्ट हैं बी और सी. अगर आप बी और सी के बीच में किसी तरह का ब्रिज नहीं चाहते, अगर खरीदार की जानकारी को पार्टी से मिलाना नहीं है तो हम जानकारी 3 हफ्ते में दे देंगे. हमें लगा कि आप एक को-रिलेशन भी दिखाने की बात कर रहे हैं.’’
इस पर तीसरे जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा कि बैंक को कोर्ट का पहले दिया हुआ आदेश मानना होगा. कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में अवमानना के अपने अधिकार को इस्तेमाल नहीं किया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इलेक्टोरल बौंड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद के बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है. इसलिए अदालत अपने फैसले पर कायम है, फैसला नहीं बदलेगा.
2 कंपनियां ऐसी हैं जिन्होंने बड़े पैमाने पर इलेक्टोरल बौंड खरीदे. एक है फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, जिसे एक लौटरी किंग के नाम से जाने जाने वाले सैंटियागो मार्टिन चलाते हैं. इस का कोई भी मुनाफा नहीं है. इस का दफ्तर भी नहीं मिलेगा, उस ने हजार करोड़ रुपए से ज्यादा चंदा दिया.

भ्रष्टाचार को वैध बनाने का है मामला
दूसरी है जानीमानी कंपनी रिलायंस, जिस ने खुद सीधे चंदा नहीं दिया, बल्कि एक छोटी सी निजी मालिकाने वाली कंपनी के मार्फत राजनीतिक दलों को कई सौ करोड़ रुपए का चंदा दिया. उस कंपनी का आमतौर पर नाम तक पता नहीं चलेगा और न ही उस का कोई मुनाफा है.
यह कंपनी हजारों करोड़ रुपए का कारोबार करती है लेकिन उस का कहना है कि उसे कोई मुनाफा नहीं होता. लेकिन वो फिर राजनीतिक दलों को कई सौ करोड़ रुपए का फंड दे देती है. यह मामला भी खुद पर प्रश्नचिह्न लगाता है. कंपनी को कोई मुनाफा भी नहीं होता है तो फिर इतने बड़े पैमाने पर चंदा कहां से देती है?
कोर्ट ने इलेक्टोरल बौंड को बताया असंवैधानिक
बात 15 फरवरी, 2024 की थी. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलेक्टोरल बौंड की वैधता पर अपना फैसला सुनाते हुए इस पर रोक लगा दी. सर्वोच्च अदालत ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्टोरल बौंड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उस के बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है.
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि काले धन पर काबू पाने का एकमात्र तरीका इलेक्टोरल बौंड नहीं हो सकता है. इस के और भी कई विकल्प हैं. उन्होंने आगे कहा, स्टेट बैंक औफ इंडिया को राजनीतिक पार्टियों को मिले इलेक्टोरल बौंड की जानकारी देने का निर्देश दिया था.
अपनी बातों पर कायम रहते हुए अदालत ने आगे कहा, ”एसबीआई चुनाव आयोग को जानकारी मुहैया कराएगा और चुनाव आयोग इस जानकारी को 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा.’’
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच ने यह फैसला सुनाया. इस बेंच में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्र शामिल थे. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की जानेमाने वकील प्रशांत भूषण ने तारीफ की है. प्रशांत भूषण ने कहा कि इस फैसले से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बौंड मामले में एक महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिस का हमारे लोकतंत्र पर लंबा असर होगा. कोर्ट ने बौंड स्कीम को खारिज कर दिया. इस स्कीम में यह नहीं पता लगता था कि किस ने कितने रुपए के बौंड खरीदे और किसे दिए.
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे सूचना के अधिकार का उल्लंघन माना है. इसे ले कर जो संशोधन किया गया था, जिस के तहत कोई कंपनी, किसी भी राजनीतिक दल को कितना भी पैसा दे सकती है, कोर्ट ने वह भी रद्ïद कर दिया है.
कोर्ट ने कहा कि यह चुनावी लोकतंत्र के खिलाफ है, क्योंकि यह बड़ी कंपनियों को लेवल प्लेइंग फील्ड खत्म करने का मौका देती है. जो भी पैसा इस स्कीम के तहत जमा किया गया था, वो भारतीय स्टेट बैंक चुनाव आयोग को दे और आयोग की तरफ से इस की जानकारी आम लोगों को मुहैया कराई जाएगी.
इलेक्टोरल बौंड के खिलाफ जो याचिकाएं दायर की गई थीं, उन में कहा गया था कि यह सूचना के अधिकार का उल्लंघन है. इस के साथ ही यह भी कहा गया था कि कारपोरेट फंडिंग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के खिलाफ है.
चुनाव में खर्चों और पारदर्शिता पर नजर रखने वाली संस्था असोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफौम्र्स (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 में कारपोरेट डोनेशन का 90 फीसदी बीजेपी को मिला.
2022-23 में राष्ट्रीय पार्टियों ने 850.438 करोड़ रुपए चंदा में मिलने की घोषणा की थी. इस में केवल बीजेपी को 719.85 करोड़ रुपए मिले थे और कांग्रेस को 79.92 करोड़ रुपए. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में कई सालों से लंबित था और इस पर सभी की निगाहें इसलिए भी टिकी थीं, क्योंकि इस मामले का नतीजा साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों पर बड़ा असर डाल सकता है.

इलेक्टोरल बौंड पर क्यों उठे सवाल?
चुनाव आयोग द्वारा जानकारी जारी करने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनावी बौंड खरीदने वाली दूसरे नंबर पर रहे मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को ले कर सवाल किए. उन्होंने कहा, ’11 अप्रैल, 2023 को मेघा इंजीनियरिंग ने 100 करोड़ के इलेक्टोरल बौंड किस को दिए? फिर एक महीने के अंदर ही उसे बीजेपी की महाराष्ट्र सरकार से 14,400 करोड़ रुपए के कौन्ट्रैक्ट मिले.’
हालांकि, एसबीआई ने इस जानकारी में बौंड के नंबर छिपा लिए हैं, लेकिन फिर भी कुछ डोनर और पार्टियों के मिलान कर के एक अनुमान लगाया जा सकता है. ज्यादातर चंदे ‘एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले’ जैसे लग रहे हैं.
चर्चा यह भी है कि कुछ राजनीतिक पार्टियां इस चुनावी चंदे की अधिकांश धनराशि दूसरे मदों पर खर्च कर चुकी हैं. कोर्ट के इस फैसले के बाद उन्हें लोकसभा चुनावों में फंड की दिक्कत हो सकती है.
राजनीति के जानकारों का कहना है कि कारपोरेट या किसी व्यक्ति द्वारा किसी भी पार्टी को चंदा देने की प्रक्रिया ही बंद होनी चाहिए. इस से भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है. यदि किसी को दान देना ही है तो वह सीधे चुनाव आयोग को दे. फिर चुनाव आयोग एक नियम के तहत वह पैसा प्रत्याशी को देने की व्यवस्था करे.
बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय का चुनावी दान को ले कर लिया गया फैसला स्वागत योग्य है. इस से जहां एक ओर भ्रष्टाचार के बढ़ावे पर अंकुश लग सकता है तो दूसरी ओर चुनाव में शीशे की तरह पारदर्शिता भी. अब तो यही देखना है आगे क्या होता है.
बीजेपी को मिला सब से ज्यादा चंदा
भारतीय निर्वाचन आयोग ने 14 मार्च की शाम इलेक्टोरल बौंड से जुड़ा डेटा जारी कर दिया था. उस ने भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेशानुसार 12 मार्च को ही निर्वाचन आयोग को इलेक्टोरल बौंड से जुड़ा डेटा दे दिया था. इस डेटा का विश्लेषण जारी है. लेकिन अब तक मिली जानकारी के मुताबिक बीजेपी सब से ज्यादा चंदा हासिल करने वाली पार्टी बन कर सामने आई है. इस जानकारी को 2 हिस्सों में जारी किया गया.
पहले हिस्से में 336 पन्नों में उन कंपनियों के नाम हैं, जिन्होंने इलेक्टोरल बौंड खरीदा था और उन पैसों की पूरी जानकारी भी दी गई है. जबकि दूसरे हिस्से में 426 पन्नों में राजनीतिक दलों के नाम हैं और उन्होंने कब कितनी राशि के इलेक्टोरल बौंड कैश कराए, उस की विस्तृत जानकारी है.
गौरतलब है, सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को 12 मार्च तक इलेक्टोरल बौंड की खरीद से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था. अदालत ने चुनाव आयोग से इस जानकारी को 15 मार्च की शाम 5 बजे तक अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का भी निर्देश दिया था.
क्या इलेक्टोरल बौंड स्कैम है
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इलेक्टोरल बौंड को स्कैम बताया और कहा कि इलेक्टोरल बौंड से बड़ा कोई भ्रष्टाचार नहीं हो सकता. अब यह निकल कर सामने आया है कि यह भारत के बड़े कारपोरेट्स से धन उगाही का एक तरीका था. एक ऐसा तरीका जिस में कंपनियों से धन लिया जाए, उन्हें धमकी दी जाए और बीजेपी को चंदा देने के लिए मजबूर किया जाए. यह दुनिया का सब से बड़ा उगाही रैकेट है. इलेक्टोरल बौंड में पारदर्शिता का सवाल लंबे समय से उठता रहा है.
राहुल गांधी का समर्थन करते हुए पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा है कि इलेक्टोरल बौंड ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अनुचित फायदा पहुंचाने की जमीन तैयार की. सवाल तो उठेगा ही कि उन्हें क्यों कुल बौंड का 40 फीसदी से अधिक मिला और बाकी सारी पार्टियों को जोड़ भी दें तो उन्हें कम मिला. क्यों? बड़ा सवाल है.

इस पर पलटवार कर जवाब देती हुई बीजेपी प्रवक्ता चारु प्रज्ञा ने कहा कि इलेक्टोरल बौंड कानून बना कर जारी किए गए थे और जिस ने भी इन्हें खरीदा उस ने केवाईसी किए हुए अपने वैध अकाउंट से भुगतान किया. इसलिए इसे काला धन नहीं कहा जा सकता. उन्होंने आगे कहा कि अगर यह स्कैम लग रहा था तो आप ने क्यों पैसे लिए.
यह हो सकता है कि किसी पार्टी को यह चंदा ज्यादा मिला हो और किसी को कम, यह आप की आवश्यकतानुसार और ताकत के अनुसार भी हो सकता है. भाजपा की केंद्र और 18 राज्यों में सरकार है, लेकिन अगर टीएमसी से तुलना करें जोकि एक ही राज्य में सत्ता में है, उस ने अकेले 3,000 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बौंड कैश कराए.
चंदा देने में कौन रहा अव्वल
एसबीआई ने इलेक्टोरल बौंड का जो डेटा दिया है, उस के मुताबिक पहली अप्रैल 2019 से ले कर 15 फरवरी 2024 के बीच 12,156 करोड़ रुपए का राजनीतिक चंदा दिया गया.
चुनाव आयोग की ओर से जारी चुनावी बौंड इनकैश करवाने वालों की लिस्ट में बीजेपी पहले नंबर पर है. उस ने 60 अरब रुपए से अधिक के इलेक्टोरल बौंड्स कैश कराए. आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस दूसरे नंबर पर है, जिस ने 16 अरब रुपए से अधिक के इलेक्टोरल बौंड्स इनकैश कराए.
इस मामले में तीसरे नंबर पर अध्यक्ष, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति है जिस ने 14 अरब रुपए से अधिक के इलेक्टोरल बौंड्स को इनकैश किया है. इस के बाद भारत राष्ट्र समिति ने 12 अरब रुपए और बीजू जनता दल ने 7 अरब रुपए से अधिक के इलेक्टोरल बौंड को इनकैश किया है.
इस मामले में 5वें और छठें नंबर पर दक्षिण भारत की पार्टियां डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस (युवा सेना) रहीं. सूची में इन पार्टियों के बाद तेलुगु देशम पार्टी, शिवसेना (पौलिटिकल पार्टी), राष्ट्रीय जनता दल, आम आदमी पार्टी, जनता दल (सेक्युलर), सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी, जनसेना पार्टी, अध्यक्ष समाजवादी पार्टी, बिहार प्रदेश जनता दल (यूनाइडेट), झारखंड मुक्ति मोर्चा, शिरोमणि अकाली दल, आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म, शिवसेना, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी, जम्मू और कश्मीर नैशनल कौन्फ्रैंस, नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी हैं.
वहीं सब से अधिक कीमत के इलेक्टोरल बौंड खरीदने वाली कंपनियों में फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज के बाद मेघा इंजीनियरिंग एंड इनफ्रास्ट्रक्चर्स लिमिटेड दूसरे नंबर पर है. फ्यूचर गेमिंग ने कुल 1,368 बौंड खरीदे, जिन की कीमत 1,368 करोड़ रुपए थी. वहीं मेघा इंजीनियरिंग ने 966 करोड़ रुपए के कुल 966 बौंड खरीदे.
इन के बाद जिन कंपनियों ने सब से अधिक बौंड खरीदे, उन में क्विक सप्लायर्स चेन प्राइवेट लिमिटेड, हल्दिया एनर्जी लिमिटेड, वेदांता लिमिटेड, एसेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, वेस्टर्न यूपी पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड, केवेंटर फूड पार्क इंफ्रा लिमिटेड, मदनलाल लिमिटेड, भारती एयरटेल लिमिटेड, यशोदा सुपर स्पैशलिटी हौस्पिटल, उत्कल अलुमिना इंटरनैशनल लिमिटेड, डीएलएफ कामर्शियल डेवलेपर्स लिमिटेड, जिंदल स्टील, आईएफबी एग्रो लिमिटेड, डा. रेड्डी लैबोरेटरीज आदि शामिल हैं.
क्या थी एसबीआई की याचिका
एसबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में इसी महीने अरजी दी थी. एसबीआई ने कहा था कि वह अदालत के निर्देशों का पूरी तरह से पालन करना चाहता है. हालांकि, डेटा को डिकोड करना और इस के लिए तय की गई समय सीमा के साथ कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां हैं, इलेक्टोरल बौंड खरीदने वालों की पहचान छिपाने के लिए कड़े उपायों का पालन किया गया है. अब इस के डोनर और उन्होंने कितने का इलेक्टोरल बौंड खरीदा है, इस जानकारी का मिलान करना एक जटिल प्रक्रिया है.
भारतीय स्टेट बैंक ने कहा था कि 2 जनवरी, 2018 को इसे ले कर अधिसूचना जारी की गई थी. यह अधिसूचना केंद्र सरकार की ओर से साल 2018 में तैयार की गई इलेक्टोरल बौंड की योजना पर थी. इस के क्लाज 7 (4) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अधिकृत बैंक हर सूरत में इलेक्टोरल बौंड खरीदार की जानकारी को गोपनीय रखें.
एसबीआई ने याचिका में कहा था कि हमारी एसओपी के सेक्शन 7(1) (2) में साफ कहा गया था कि इलेक्टोरल बौंड खरीदने वाले की केवाईसी जानकारी को सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) में न डाला जाए. ऐसे में ब्रांच में जो इलेक्टोरल बौंड बेचे गए हैं, उन का कोई सेंट्रल डेटा एक जगह पर नहीं है. जैसे खरीदार का नाम, बौंड खरीदने की तारीख, जारी करने की शाखा, बौंड की कीमत और बौंड की संख्या. यह डेटा किसी सेंट्रल सिस्टम में नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट नेे स्टेट बैंक औफ इंडिया के उस आवेदन को खारिज कर दिया, जिस में उस ने इलेक्टोरल बौंड से जुड़ी जानकारी देने का समय बढ़ाने की मांग की थी. इलेक्टोरल बौंड की जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए एसबीआई ने 30 जून तक का समय मांगा था.
इस से पहले पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने इलेक्टोरल बौंड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक औफ इंडिया जो इलेक्टोरल बौंड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक था, उसे निर्देश दिया था कि वह 6 मार्च, 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से ले कर अब तक खरीदे गए इलेक्टोरल बौंड की जानकारी चुनाव आयोग को दे. इसी मामले में एसबीआई ने जानकारी देने की तारीख 30 जून तक बढ़ाने की मांग की थी.
बात 15 मार्च, 2024 की है. जब देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के 5 न्यायमूर्तियों डी.वाई. चंद्रचूड़ (Justices D.Y. Chandrachud), जस्टिस संजीव खन्ना (Justice Sanjeev Khanna), जस्टिस बी.आर. गवई (Justice B.R. Gavai), जस्टिस जे. पारदीवाला (Justice J. Pardiwala) और जस्टिस मनोज मिश्रा (Justice Manoj Mishra) ने इलेक्टोरल बौंड (Electoral Bond) पर केंद्रीय चुनाव आयोग (Central Election Commission) और भारतीय स्टेट बैंक (State Bank Of India) को आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई थी.
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने चुनाव आयोग से इलेक्टोरल बौंड के यूनिक (अल्फान्यूमेरिक) नंबर की जानकारी देने को कहा था. अदालत ने 2 दिनों की मोहलत देते हुए 17 मार्च तक का समय दिया. वहीं यूनिक नंबर न बताने को गंभीरता से लेते हुए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को नोटिस जारी किया.
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि एसबीआई ने बौंड नंबर जारी नहीं किए, जबकि उसे इस से जुड़ी सभी सूचनाएं देनी थीं.
चूंकि मामला गंभीर था, इसलिए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की कड़ी फटकार को गंभीरता से लेते हुए भारतीय स्टेट बैंक की ओर से पेश हुए वकील संजय कपूर से अदालत ने कहा कि एसबीआई को 17 मार्च, 2024 तक इस नोटिस का जवाब देना है.

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एसबीआई ने इलेक्टोरल बौंड के खरीदारों और उसे भुनाने वाली पार्टियों की जानकारियां दीं, लेकिन यूनिक नंबर नहीं दिया, जिस से ये पता लगा पाना और मिलान कर पाना मुश्किल हो गया था कि किस कंपनी या किस व्यक्ति ने किस पार्टी को कितना चंदा दिया.
एसबीआई ने यूनिक नंबर के मिलान सहित जानकारी देने के लिए 30 जून का समय मांगा था, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था. गौरतलब है कि अगर ये यूनिक नंबर आ जाए तो कोई भी पता कर सकता है कि इन कंपनियों ने किस राजनीतिक दल को चंदा दिया.
आखिर सुप्रीम कोर्ट इलेक्टोरल बौंड यानी चुनावी चंदे को ले कर इतनी सख्त क्यों हुई? आखिर अदालत को किस बात की आशंका थी, जिस के चलते इस चुनावी चंदे को असंवैधानिक घोषित किया?

यूनिक नंबर की सारी जानकारी देने के लिए भारतीय स्टेट बैंक ने 30 जून, 2024 तक का समय मांगा था. अदालत ने उसे मोहलत देने से इंकार किया और उस की याचिका भी खारिज कर दी, क्योंकि इन सब को जानने के लिए हमें कुछ साल पहले जाना होगा, जहां इलेक्टोरल बौंड का उदय हुआ था. आइए, पढ़ते हैं इस ज्वलंत मुद्दे को—
क्या होता है इलेक्टोरल बौंड (What is Electoral Bond)
इलेक्टोरल बौंड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक धनोपार्जन का जरिया था. यह एक वचनपत्र की तरह था, जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा ब्रांचों से खरीद सकता था और अपनी इच्छानुसार किसी भी पौलिटिकल पार्टी को गुमनाम तरीके से दान कर सकता था.
भारत सरकार ने इलेक्टोरल बौंड योजना की घोषणा 2017 में की थी. इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी, 2018 को लागू कर दिया था. योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक राजनीतिक दलों को धन देने के लिए बौंड जारी कर सकता था.
इस बौंड को कोई भी दान करने वाला खरीद सकता था, जिस के पास एक ऐसा बैंक खाता है, जिस की केवाईसी की जानकारियां बैंक को प्राप्त है. इलेक्टोरल बौंड में बौंड को कैश करने वाले का नाम नहीं होता था.
योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक की विभिन्न शाखाओं से भिन्नभिन्न मूल्यों जैसे 1,000 रुपए, 10,000 रुपए, एक लाख रुपए, 10 लाख रुपए और एक करोड़ रुपए में से किसी भी मूल्य के इलेक्टोरल बौंड खरीदे जा सकते थे.
पते की बात तो यह है कि इस इलेक्टोरल बौंड की समय सीमा मात्र 15 दिनों की थी, जिस के दौरान इस का इस्तेमाल सिर्फ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता था. केवल उन्हीं राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बौंड के जरिए चंदा दिया जा सकता था, जिन्होंने लोकसभा या विधानसभा के लिए पिछले आम चुनाव में डाले गए वोटों का कम से कम एक प्रतिशत वोट हासिल किया था.
योजना के तहत इलेक्टोरल बौंड जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर के महीनों में 10 दिनों की समय सीमा के लिए बैंकों में उपलब्ध कराए गए थे.
भारत में इलेक्टोरल चंदे के लिए ये बौंड 2018 में लाए गए थे. ये बौंड तयशुदा समय के लिए जारी किए जाते हैं, जिन पर ब्याज नहीं मिलता. इन्हें साल में एक बार तय समय सीमा के भीतर कुछ खास सरकारी बैंकों से खरीदा जा सकता था. भारत के आम नागरिकों और कंपनियों को यह अनुमति थी कि वो ये बौंड खरीद कर सियासी पार्टियों को चंदे के रूप में दे सकते थे.
दान मिलने के 15 दिनों के अंदर इन्हें कैश कराना होता था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 19 किस्तों में 1.15 अरब डालर मूल्य के इलेक्टोरल बौंड बेचे गए थे. इस का सब से अधिक फायदा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को हुआ था.
साल 2019 से 2021 के दौरान बीजेपी को कुल जारी हुए बौंड के दो तिहाई हिस्से दान में मिले. इस की तुलना में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को महज 9 फीसद बौंड पर संतोष करना पड़ा.
भारत में चुनावों और सियासी दलों पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फौर डेमोक्रेटिक रिफौम्र्स (एडीआर) के अनुसार, साल 2019 से 2021 के दौरान 7 राष्ट्रीय पार्टियों की 62 फीसदी से ज्यादा आमदनी इलेक्टोरल बौंड से मिले चंदे से हुई थी. चुनावी बौंड इसलिए लाए गए थे ताकि राजनीतिक चंदे में काले धन के लेनदेन को समाप्त कर के दलों के रकम जुटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके. जबकि असर इस के उलट हुआ.
हैरतअंगेज बात यह है इस बात का कोई सार्वजनिक रिकौर्ड नहीं है कि बौंड को किस ने खरीदा और उसे किसे दान दिया गया. एडीआर रिपोर्ट के अनुसार, इस कारण से इलेक्टोरल बौंड असंवैधानिक और अवैध थे, क्योंकि देश के करदाताओं को दान के स्रोत की जानकारी का पता नहीं था.
दूसरी बात यह भी है ये पूरी तरह से अनाम भी नहीं होते, क्योंकि सरकारी बैंकों के पास इस बात का पूरा रिकौर्ड था कि बौंड किस ने खरीदा और किस पार्टी को दान में दिया. एडीआर के सह संस्थापक जगदीप छोकर के अनुसार, इस तरह से इलेक्टोरल बौंड, सत्ताधारी पार्टी को अनुचित फायदा पहुंचाने वाले थे. ऐसे में करप्शन घटने की बजाय बढऩे की संभावना अधिक थी.