Crime Story : फेसबुक की दोस्ती- जान का जंजाल

Crime Story : सोशल साइटों ने देशविदेश की दूरियां मिटा कर कितने ही दिलों को जोड़ा है. लेकिन सोशल साइटों से बने संबंधों के नतीजे हमेशा अच्छे ही निकलें, यह जरूरी नहीं है. रितेश संघवी और सोशलाइट वेंडी अल्बानो के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. सोशल साइटों पर दोस्ताना संबंध बनाते वक्त क्या सावधानी बरतना जरूरी नहीं है?

बैंकाक के जिला वात्ताना के शहर ख्लोंग तोई के सुखुमवित रोड नंबर 11 पर स्थित फाइवस्टार होटल फ्रेजर के मैनेजर 3 बजे के करीब होटल के रिसैप्शन पर खड़े कुछ कस्टमर्स से बातें कर रहे थे, तभी होटल के एक वेटर ने उन के पास आ कर बताया कि 17वीं मंजिल के कमरा नंबर 1701 का दरवाजा सुबह से बंद है. काफी कोशिशों के बाद भी न तो उस कमरे के कस्टमर ने दरवाजा खोला और न ही अंदर कोई प्रतिक्रिया हुई. होटल के उस कमरे के बारे में रिसैप्शन से जानकारी ली गई तो पता चला कि उस कमरे में एक अमेरिकी महिला एक भारतीय युवक के साथ ठहरी है.

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दोनों पिछले 4 दिनों से उस कमरे में ठहरे थे. रिसैप्शनिस्ट ने होटल मैनेजर को यह भी बताया कि दोनों सुबह अकसर घूमनेफिरने के लिए बाहर निकल जाते थे तो शाम को काफी देर से लौटते थे. लेकिन उस दिन वे वापस नहीं लौटे थे. होटल के रजिस्टर में उन के बाहर आनेजाने की कोई एंट्री भी नहीं थी. इस का मतलब दोनों होटल के कमरे में ही थे. होटल के कमरे में होने के बावजूद उन दोनों ने न तो कमरे का दरवाजा खोला था और न ही अभी तक होटल की कोई सेवा ली थी. यह बात होटल के मैनेजर और उन के स्टाफ की समझ में नहीं आई. होटल मैनेजर कुछ कर्मचारियों को साथ ले कर 17वीं मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंचे.

कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंच कर मैनेजर और रिसैप्शनिस्ट ने भी कमरे की डोरबेल बजाई, दरवाजा खटखटाया. इंटरकौम पर रिंग दी, आवाजें दीं. लेकिन कमरे के अंदर कोई हलचल नहीं हुई. इस से मैनेजर और कर्मचारियों के मन में तरहतरह की आशंकाएं होने लगीं. उन्हें लगा कि कमरे के अंदर कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. कोई रास्ता न देख मैनेजर ने कमरे की दूसरी चाबी मंगवाई. दरवाजा खोल कर जब वे कमरे में दाखिल हुए तो वहां का दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए. कमरे के बाथरूम में महिला कस्टमर का शव औंधे मुंह पड़ा था. शव के आसपास ढेर सारा खून फैला था. उस का साथी कस्टमर कमरे से गायब था.

होटल फ्रेजर बैंकाक का जानामाना होटल है. इस होटल में पहली बार इस तरह की घटना घटी थी, इसलिए होटल का सारा स्टाफ परेशान हो उठा. जाहिर तौर पर यह हत्या का मामला था. होटल मैनेजमेंट ने इस मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस को दे दी. लुंपीग थाने की पुलिस ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया. पुलिस चंद मिनटों में ही घटनास्थल पर पहुंच गई. बाथरूम में औंधे मुंह पड़ी अमेरिकी महिला को उठा कर सीधा किया गया तो पता चला कि उस के सीने और पेट पर कई गहरे घाव थे. हत्यारे ने उस की हत्या बड़ी बेरहमी से की थी. घटनास्थल और मृतका के शव का निरीक्षण करने के बाद लुंपीग थाने की पुलिस ने होटल मैनेजमेंट से पूछताछ की तो पता चला कि जिस कमरे में यह घटना घटी थी, उस कमरे की बुकिंग औनलाइन कराई गई थी.

कस्टमर ने 9 फरवरी, 2012 की शाम 5 बजे होटल आ कर कमरे की चाबी ली थी. कमरे की चाबी लेते समय महिला ने होटल के रजिस्टर में अपना नाम वेंडी अल्बानो और साथ आए युवक का नाम रितेश संघवी लिखवाया था. कमरे की तलाशी लेने पर मृतका वेंडी अल्बानो के समान में उस का पासपोर्ट, लैपटौप और मोबाइल फोन तो मिला, लेकिन उस के साथी रितेश संघवी का कोई सामान वहां नहीं मिला. इस से स्पष्ट हो गया कि रितेश संघवी अल्बानो की हत्या कर के फरार हो गया था. इसीलिए उस ने अपना कोई सुबूत भी वहां नहीं छोड़ा था.

होटल के रजिस्टर और मृतका के पासपोर्ट से जानकारी मिली कि वह फ्लोरिडा, अमेरिका की रहने वाली थी. रितेश संघवी कहां का रहने वाला था, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. लेकिन इस के लिए लुंपीग पुलिस को अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ी. रितेश संघवी का बायोडाटा वेंडी अल्बानो के मोबाइल फोन और लैपटौप में मिल गया. वेंडी के मोबाइल फोन और लैपटौप पर उस के फेसबुक पर जाने से रितेश संघवी की पूरी प्रोफाइल खुल कर सामने आ गई. यह भी पता चल गया कि वह मुंबई का रहने वाला था. रितेश के प्रोफाइल, होटल के कर्मचारियों के बयानों और सीसीटीवी कैमरे की फुटेज को देख कर उस की शिनाख्त हो गई. मृतका वेंडी अल्बानो के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद लुंपीग पुलिस थाने लौट आई.

घटना की प्राथमिक औपचारिकता पूरी करने के बाद लुंपीग पुलिस ने वेंडी एस. अल्बानो की हत्या की सारी कडि़यां जोड़ीं और इस मामले की जानकारी अमेरिका की एफबीआई और भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई को दे कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई का दबाव देख कर सीबीआई ने इस मामले को गंभीरता से लिया. सीबीआई ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से रितेश संघवी का गिरफ्तारी का वारंट जारी करवा कर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी.

रितेश संघवी चूंकि मुंबई का रहने वाला था, इसलिए सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी का वारंट मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह को भेज दिया. सत्यपाल सिंह ने यह वारंट क्राइम ब्रांच (सीआईडी) के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर हिमांशु राय को सौंप दिया. हिमांशु राय ने रितेश संघवी की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा को सौंप दी. इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने निर्देश पर रितेश संघवी की तेजी से तलाश शुरू हो गई. उस के हर उस ठिकाने पर छापे मारी की गई, जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी. लेकिन यह कवायद साइबर सेल के काम नहीं आई.

इस पर साइबर सेल ने रितेश संघवी के घर वालों से पूछताछ की. उन लोगों ने उस की एक अलग ही कहानी बताई. उन के बताए अनुसार, रितेश संघवी 8 फरवरी 2012 से लापता था. घर से निकलते वक्त वह महाबलेश्वर जाने की बात कह कर गया था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. जब वे उसे हर जगह तलाश कर के थक गए तो 13 फरवरी 2012 की शाम 6 बजे डीवी मार्ग के पुलिस थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करवा दी थी. सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने अपने स्टाफ के साथ बड़े उत्साह से रितेश संघवी की खोज शुरू की थी, लेकिन यह जानने के बाद उन का जोश ठंडा पड़ने लगा. साइबर सेल के भरपूर प्रयासों के बाद भी रितेश संघवी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. धीरेधीरे समय निकलता जा रहा था.

मुखबिरों का नेटवर्क भी फेल होता नजर आ रहा था. इस के पहले कि वह रितेश संघवी तक पहुंच पातीं अथवा नए सिरे से मामले की तफ्तीश शुरू करतीं, मुंबई पुलिस में एक बड़ा फेर बदल हो गया. जिस के चलते रितेश संघवी का मामला दब सा गया. दरअसल, मुंबई पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह अपने पद से इस्तीफा दे कर राजनीति में चले गए थे. उन की जगह मुंबई के नए पुलिस कमिश्नर के रूप में राकेश मारिया की नियुक्ति हुई. राकेश मारिया कई सालों तक मुंबई क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रह चुके थे. उन्होंने तमाम पेचीदा मामलों को सुलझाया था.

इस बीच रितेश संघवी के मामले को 19 महीने बीत चुके थे. इस केस में कोई प्रगति न होते देख बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई ने भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई पर दबाव बनाया. चूंकि बात एक अमेरिकन महिला की हत्या की थी, इस लिए अमेरिका के काउंसलर ने सिंघवी की गिरफ्तारी के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुंबई के मुख्यमंत्री को पत्र भेजा. जब मुंबई के पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया पर कई तरफ से दबाव पड़ा तो उन्होंने इस मामले की तफ्तीश की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को सौंप दी.

के.एम. प्रसन्ना ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने इस केस से जुड़ी सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की जांच अधिकारी शालिनी शर्मा को अपने औफिस बुला कर पूरे मामले और अब तक की तफ्तीश को समझा. केस की बारीकियों पर विचारविमर्श करने के बाद उन्होंने शालिनी शर्मा को मामले की तफ्तीश नए सिरे से शुरू करने को कहा. इतना ही नहीं, उन्होंने उन की मदद के लिए एक स्पेशल टीम का भी गठन किया. इस स्पेशल टीम में उन्होंने अपने स्टाफ के 4 अनुभवी अफसरों को नियुक्त किया. वे थे क्राइम ब्रांच यूनिट 1 के असिस्टैंट इंसपेक्टर कुंभार, कांस्टेबल जगदाले, यूनिट 2 के इंसपेक्टर प्रकाश कोकणे और कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा. सीआईडी और क्राइम ब्रांच की नई टीम ने इस मामले को अपनी नाक का सवाल बना कर काररवाई शुरू की तो 15 दिनों में रितेश सिंघवी पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

दरअसल, क्राइम ब्रांच की इस टीम ने अपनी तफ्तीश में रितेश के परिवार और उस के दोस्तों को रखा. वजह यह थी कि इस टीम को रितेश संघवी की गुमशुदगी की बात झूठी लग रही थी. कारण यह कि रितेश संघवी को गायब हुए 2 साल के करीब हो गए थे, पर उस के परिवार और उस के दोस्तों के चेहरों पर किसी तरह की शिकन तक नहीं थी. यही सोच कर जांच टीम ने उस के 4-5 करीबी दोस्तों को जांच के दायरे में लिया. जांच टीम उन लोगों के मोबाइल फोन, फेसबुक और बैंक एकाउंट्स पर नजर रखने लगी. जांच अधिकारियों ने जब उन के फेसबुक, वाट्सऐप और बैंक के एकाउंटों की गहराई से जांचपड़ताल की तो पता चला कि रितेश संघवी के गायब होने के कुछ दिनों बाद ही उस के दोस्तों के एकाउंट से उस के एकाउंट में लगभग ढाई लाख रुपए ट्रांसफर हुए थे.

ट्रांसफर हुए रुपए कुछ दिनों के बाद रितेश संघवी के एकाउंट से निकाल लिए गए थे. ये रुपए कहां गए थे, जब इस की जांच की गई तो पता चला कि सारे रुपए गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र की बैंकों से निकाले गए थे. इस से यह बात साफ हो गई कि रितेश संघवी गोवा स्थित परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कहीं छिपा हुआ था. लेकिन वह कहां छिपा था, यह पता लगाना समुद्र में मोती ढूंढ़ने की तरह था. फिर भी जांच टीम ने हिम्मत नहीं हारी. पुलिस टीम गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में जा कर वहां के होटलों और दुकानों में उस का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछताछ करने लगी.

पुलिस टीम जब परभणी गंगाखेड़ इलाके की गलियों में रितेश संघवी की तलाश में खाक छान रही थी, तभी कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा के मोबाइल पर एक मैसेज आया. यह मैसेज उन के एक मुखबिर का था. उस ने मैसेज में बताया कि रितेश संघवी परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान चला रहा है. मैसेज में इस बात का भी जिक्र था कि रितेश ने अपना नाम और हुलिया बदल कर उसी इलाके में रंजीत के नाम से किराए का मकान ले रखा है. इस सूचना से जांच टीम के सदस्यों के चेहरों पर चमक आ गई. टीम ने कावेरी नाम की उस मोबाइल शौप को खोज निकाला. वहां रितेश संघवी उर्फ रंजीत मिल गया तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

उस के गिरफ्तार होते ही जांच टीम ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को दे दी. 28 सितंबर, 2014 को जांच टीम ने गिरफ्तार अभियुक्त रितेश संघवी को मुंबई ला कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश कर दिया. एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना ने उस से खुद विस्तृत पूछताछ की. 25 वर्षीय रितेश नरपतराज संघवी स्वस्थ, सुंदर और स्मार्ट युवक था. वह महानगर मुंबई के ग्रांट रोड पर अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ रहता था. उच्चशिक्षित और मिलनसार स्वभाव के रितेश संघवी का स्टेनलैस स्टील का कारोबार था, जिसे वह अपने पिता के साथ चलाता था. खुले विचारों का रितेश नए जमाने के साथ चलने में यकीन रखता था.

उस ने अपना प्रोफाइल फेसबुक और वाट्सऐप पर डाल रखा था. वह फेसबुक और वाट्सऐप पर नएनए दोस्त बना कर उन के साथ चैटिंग किया करता था. करीब 4 साल पहले 2010 के अंत में एक दिन उस ने अपना एकाउंट खोला तो उस में कई लोगों की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई हुई थी. रितेश संघवी ने उन की रिक्वेस्ट पढ़ कर उन्हें स्वीकार कर लिया. इस के बाद वह उन लोगों द्वारा पोस्ट किए गए कमेंट्स को पढ़ने लगा. तभी उस के पास एक विदेशी महिला का औनलाइन मैसेज आया. उस महिला ने अपना नाम वेंडी एस. अल्बानो बता कर लिखा था कि उस ने उस का प्रोफाइल देखा, जो उसे बहुत अच्छा लगा. वह उस से फ्रैंडशिप करना चाहती है.

रितेश संघवी को उस विदेशी महिला का मैसेज पढ़ कर खुशी हुई. लेकिन कोई जवाब देने से पहले उस ने उस का प्रोफाइल चैक कर लेना ठीक समझा. उस ने जब अल्बानो का प्रोफाइल देखा तो चौंका. वह अमेरिका के फ्लोरिडा की रहने वाली थी. उस की उम्र 50 साल के आसपास थी और उस की 2 शादियां हो चुकी थीं. साथ ही उस की 2 बेटियां भी थीं, जिन की शादी हो चुकी थी. बेटियां अपने पति के साथ रहती थीं. अल्बानो के पहले पति की एक रोड ऐक्सीडेंट में मौत हो गई थी तो दूसरे पति से उस ने तलाक ले लिया था. वह अपने घर में अकेली ही रहती थी. अपने से दोगुनी उम्र की वेंडी अल्बानो की यह रिक्वेस्ट रितेश संघवी को कुछ अजीब सी लगी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

पहले तो उस के दिमाग में वेंडी अल्बानो की इस रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कर देने की बात आई. लेकिन फिर उस ने यह सोच कर उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली कि उम्र के जिस मुकाम पर वह तनहा खड़ी है, वहां उसे एक ऐसे दोस्त की जरूरत है, जिस से बातें कर के वह अपना मन बहला सके. अगर उसे दोस्त बना कर वेंडी के मन को सुकून मिलता है तो इस में बुराई क्या है? काफी सोचविचार कर रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद रितेश संघवी और वेंडी अल्बानो की औनलाइन चैटिंग शुरू हो गई. पहले दिन वेंडी अल्बानो ने खुद को पेशे से इंटीरियर डिजाइनर बताया था. वह सोशलाइट महिला थी और उस की स्वयं की एक इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी थी, जिस में कई लोग काम करते थे. रितेश संघवी वेंडी अल्बानो से काफी प्रभावित हुआ.

बदले में उस ने भी अपना बायोडाटा उसे बता दिया. इस के बाद दोनों नियमित रूप से एकदूसरे के साथ चैटिंग करने लगे. चैटिंग के जरिए दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए. दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर भी एकदूसरे को दे दिए थे, जिस से दोनों की नजदीकियां और बढ़ गई थीं. जब भी मौका मिलता था, दोनों फोन पर बातें कर लिया करते थे. इस तरह दोनों को मोबाइल पर बातें करते और फेसबुक पर चैटिंग करते लगभग 6 महीने का समय बीत गया. अब तक दोनों एकदूसरे के गहरे दोस्त बन गए थे. शुरूशुरू में रितेश संघवी का वेंडी अल्बानो से कुछ खास लगाव नहीं था. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे दोनों एकदूसरे से करीब आने के साथ खुलते गए. दोनों के बीच उम्र और मर्यादा जैसी कोई बात नहीं रह गई. दोनों एकदूसरे से खूब खुल कर हंसीमजाक करने लगे.

मार्च, 2011 में वेंडी अल्बानो रितेश संघवी को सरप्राइज देते हुए अचानक मुंबई आ गई. वह होटल ताज में ठहरी थी. उस ने रितेश संघवी को बुला कर पहली बार उस से मुलाकात की. मुंबई घूमने के बाद वह अमेरिका चली गई. इस बीच दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. रितेश संघवी को वेंडी अल्बानो का मुंबई आना, उस के साथ घूमनाफिरना और उस का व्यवहार काफी अच्छा लगा. यही हाल वेंडी अल्बानो का भी था. इस के बाद अक्टूबर, 2011 में वेंडी अल्बानो ने रितेश संघवी को फोन कर के बताया कि वह फिर से भारत आना चाहती है. इस बार उस का इरादा पूरा भारत घूमने का था. इस में रितेश को क्या ऐतराज हो सकता था. वह आई तो रितेश संघवी ने एयरपोर्ट पर जा कर उस का स्वागत किया.

घर वालों को यह बता कर कि कुछ दिनों के लिए वह एक बिजनैस पार्टी के साथ बाहर जा रहा है, रितेश वेंडी अल्बानो के साथ भारत की सैर पर निकल पड़ा. कुछ दिन भारत में गुजार कर अल्बानो अमेरिका लौट गई. वेंडी अपने घर तो पहुंच गई, पर रितेश संघवी के साथ बिताए क्षणों को वह भुला नहीं पा रही थी. वह पहली ही मुलाकात से उस से दिल लगा बैठी थी. इसी वजह से वह साल भर में 2 बार भारत आई थी और रितेश संघवी के साथ मिल कर मौजमस्ती में अपना समय बिताया था. लेकिन 9 फरवरी, 2012 का आगमन वेंडी अल्बानो के लिए उस की जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुआ. क्योंकि अगली बार वेंडी अल्बानो ने भारत न आ कर बैंकाक घूमने की योजना बनाई.

इस के लिए उस ने बैंकाक के जानेमाने होटल फ्रेजर में अपने और रितेश संघवी के ठहरने के लिए औनलाइन डबलबेड वाला कमरा बुक करवाया. इस की जानकारी उस ने रितेश संघवी को भी दे दी. यह जान कर रितेश इसलिए काफी खुश हुआ, क्योंकि बैंकाक जाने की योजना सीधे न जा कर मुंबई हो कर जाने की थी. इसीलिए उस ने रितेश संघवी को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बुला लिया था. वहां से दोनों बैंकाक चले गए. वहां होटल फ्रेजर में दोनों की पहले ही बुकिंग थी. पहले की ही तरह इस बार भी रितेश संघवी अपने परिवार वालों से झूठ बोल कर वेंडी अल्बानो के साथ बैंकाक चला गया. वह घर पर कह कर गया था कि वह एक पार्टी के साथ बिजनैस के सिलसिले में महाबलेश्वर जा रहा है, जल्दी ही आ जाएगा.

12 फरवरी, 2012 की रात वेंडी अल्बानो और रितेश संघवी के लिए काफी हसीन और रंगीन थी. उस दिन बैंकाक में घूमनेफिरने के बाद, दोनों जब अपने कमरे आए तो बहुत खुश थे. रात 10 बजे वेंडी अल्बानो ने पहले शराब पी, फिर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस ने रितेश संघवी से सैक्स की इच्छा जाहिर की. सैक्स की इच्छा पूरी होने के बाद उस ने रितेश संघवी के सामने जो प्रस्ताव रखा, उसे सुन कर उस के होश उड़ गए. उस का गला सूख गया. वह अपनी जगह से उठा और थोड़ा सा पानी पीने के बाद बोला, ‘‘यह क्या कह रही हैं आप? मेरी और आप की शादी? यह कैसे मुमकिन है. हम दोनों की उम्र में जमीनआसमान का फर्क है.

आप की 2-2 जवान बेटियां और उन के परिवार हैं. अपनी इज्जत की नहीं तो मेरे परिवार की तो सोचो, लोग क्या कहेंगे? हम दोनों की जितनी दोस्ती है, बहुत है. इस से आगे जाना ठीक नहीं है. न मेरे लिए और न आप के लिए.’’

रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो को काफी समझाया. लेकिन वह उस की एक भी बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. अब वह शादी के लिए धमकियों पर उतर आई थी. उस का कहना था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह इंडिया जा कर उस के परिवार वालों को अपने और उस के संबंधों के बारे में बता देगी. इस के साथ ही वह अपने और उस के सैक्स संबंधों को दुष्कर्म बता कर उस के खिलाफ बैंकाक पुलिस में शिकायत दर्ज करवा देगी और उसे जेल भिजवा देगी. वेंडी अल्बानो की इस धमकी से रितेश संघवी के होश उड़ गए. वह बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर उस के परिवार वालों को यह बात पता चल गई कि फेसबुक वाली अमेरिकन दोस्त से उस का अवैधसंबंध था और उसी चक्कर में वह बैंकाक पुलिस की हिरासत में है तो उन के दिलों पर क्या बीतेगी. उन की समाज में क्या इज्जत रह जाएगी. वह खुद भी किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

यह सब सोच कर रितेश मन ही मन काफी डर गया. उस ने सोचा भी नहीं था कि फेसबुक और वाट्सऐप की दोस्ती इंसान को कितनी महंगी पड़ सकती है. बहरहाल अब उसे वेंडी अल्बानो नाम की उस मुसीबत से किसी भी तरह पीछा छुड़ाना था. लेकिन कैसे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. आखिर काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने वेंडी अल्बानो से छुटकारा पाने के लिए एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. 12/13 फरवरी, 2012 की रात को जब उस ने घड़ी देखी तो सुबह के 2 बजे रहे थे. नशे में धुत वेंडी अल्बानो गहरी नींद में सो रही थी. रितेश संघवी अपने बिस्तर से उठा और रूम के किचन में जा कर फल काटने वाला चाकू उठा लाया. इस के बाद वह नशे में धुत वेंडी को उठा कर कमरे के बाथरूम में ले गया और चाकू से गोद कर उस की हत्या कर दी.

वेंडी अल्बानो को मारने के बाद उस ने अपने कपड़े वगैरह ठीक किए और अपना सामान ले कर सुबह के 4 बजे चुपचाप होटल से निकल गया. होटल से निकल कर वह सीधा बैंकाक एयरपोर्ट पहुंचा और बिजनैस क्लास का टिकट ले कर हवाई जहाज से कोलकाता आ गया. कोलकाता से घरेलू उड़ान पकड़ कर वह मुंबई स्थित अपने घर आया. घर आ कर उस ने अपने साथ घटी घटना की सारी जानकारी अपने घर वालों को दे दी. घर वालों ने उसे बचाने के लिए भागदौड़ कर के हाईकोर्ट के एक वकील से संपर्क किया. हकीकत जान कर उस वकील ने रितेश को फरार होने की सलाह दी. इस पर रितेश संघवी गोवा चला गया. रितेश के जाने के बाद उस के घर वालों ने उसी शाम 6 बजे डीवी पुलिस थाने में रितेश की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

रितेश संघवी गोवा के परभणी, गंगाखेड़ इलाके में रहने लगा. अपने परिवार और दोस्तों की मदद से उस ने अपने रहने के लिए किराए का एक मकान और बिजनैस के लिए कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान खोल ली. उस ने अपना नाम और अपना हुलिया भी बदल लिया था. काफी समय निकल जाने के बाद रितेश को यकीन हो गया था कि पुलिस अब कभी भी उस तक नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन उस के इस यकीन की दीवारें कुछ महीनों बाद ही ढह गईं. आखिर वह मुंबई क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की गिरफ्त में आ गया. रितेश संघवी की गिरफ्तारी और उस से पूछताछ करने के बाद इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा की टीम ने उसे अपनी कस्टडी में दिल्ली ला कर सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई ने उसे बैंकाक की लुंपीग पुलिस थाने की पुलिस के हवाले कर दिया.

मुंबई क्राइम ब्रांच सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और उन की स्पैशल टीम ने इस मामले को जिस सूझबूझ से सुलझाया, उस के लिए अमेरिकन कांउसलर ने उन्हें प्रशस्तिपत्र दिया. साथ ही मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने भी अपनी तरफ से इस टीम को 30 हजार रुपए का इनाम घोषित किया. Crime Story

कथा लिखे जाने तक अभियुक्त रितेश संघवी बैंकाक की जेल में बंद था.

Hindi Best Stories : प्यार की परख

Hindi Best Stories : फेमिली वालों की मरजी से अपने प्रेमी बैंक मैनेजर आशुतोष वर्मा से शादी कर के सुधा खुश थी. पति का मुंबई ट्रांसफर हो जाने के बाद सुधा एक एनजीओ खोल कर गरीबों व जरूरतमंदों की सेवा करने लगी. एनजीओ के सहयोग से पुलिस ने रेडलाइट एरिया में छापा मारा तो कोठे से बरामद नाबालिग लड़कियों के साथ माधुरी को देख कर सुधा चौंक गई. माधुरी कालेज में साथ पढऩे वाली उस की पक्की सहेली थी. माधुरी वेश्यावृत्ति के अड्डे तक आखिर कैसे पहुंची? पढ़ें, यह सस्पेंस से भरी रोमांटिक कहानी.

सुबह का सूरज आसमान में फैली लालिमा से निकल कर बाहर आया तो सुनहरी धूप खिल गई. सुधा 4 बजे ही बिस्तर से उठ कर स्नान आदि .से निवृत्त हो जाती थी. फिर घर के मंदिर में वह पूजा की थाली ले कर पहुंच जाती थी. यह उस का रोज का नियम था. उस के फेमिली वाले जानते थे कि सुधा संस्कारी लड़की है. मंदिर में उस का साथ देने के लिए वे सब भी नहाधो कर उपस्थित होते थे. उस दिन भी मंदिर की घंटी जैसे ही बजी, सुधा के दादा दीनानाथ, मम्मी जानकी और छोटी बहन कुसुम मंदिर में आ कर खड़े हो गए.

सुधा ने बड़े श्रद्धा भाव से राधाकृष्ण की पूजा की, आरती गाई, फिर मूर्ति के चरणों में नमन करने के बाद वह आरती की थाली ले कर दादाजी के पास आ गई. उस ने झुक कर एक हाथ से दादाजी के चरण स्पर्श किए, फिर पूजा की थाली उन के सामने बढ़ा दी.

दादाजी ने पूजा की थाली में जल रहे आशुतोष पर दोनों हथेलियां घुमा कर हथेलियों को आंखों से स्पर्श किया और सुधा के सिर पर हाथ रख कर प्यार से बोले, ”बेटी, सुबहसुबह तुम्हारी मधुर वाणी से आरती सुन कर मन को बहुत शांति मिलती है, मेरी आत्मा प्रसन्न हो जाती है.’’

सुधा मुसकरा कर मम्मी जानकी के करीब आ गई. पहले उस ने मम्मी के चरण छुए, फिर पूजा की थाली उन के सामने करते हुए बोली, ”आरती लो मम्मी.’’

जानकी ने आरती ली और दादाजी से बोली, ”सुधा में आप के ही संस्कार हैं पिताजी, आज अगर इस के डैडी जीवित होते तो वह अपनी संस्कारी बेटी को देख कर फूले नहीं समाते.’’

दीनानाथ की आंखें सजल हो आईं, वह ठंडी सांस भर कर बोले, ”हां बहू! इस तेजी से बदल रहे समाज में ऐसे बच्चे हर किसी को कहां नसीब होते हैं. तुम भाग्यवान हो जो इस प्यारी बेटी ने तुम्हारी कोख से जन्म लिया.’’

दीनानाथ कुछ और कहते कि तभी सुधा की सहेली माधुरी ने वहां प्रवेश किया. सुधा उसे देख कर चौंक गई. पूजा की थाली मेज पर रखते हुए पूछा, ”माधुरी, तुम इतनी सुबह यहां! सब ठीक तो है न?’’

”सब ठीक है,’’ माधुरी मुसकराई, ”तुम ने एक वादा किया था, कहो तो दादाजी के सामने बता दूं.’’ कहते हुए माधुरी ने अपनी दाईं आंख दबाई.

सुधा ने जल्दी से कहा, ”बता दो. तुम ने साथ में लाइब्रेरी चलने का वादा ही तो लिया था.’’

माधुरी हंसी, ”जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं तुम्हारे कमरे में बैठती हूं जा कर.’’

” ठीक है, मैं तुरंत तैयार होकर आती हूं.’’ कहते हुए सुधा ड्रेसिंग रूम की तरफ बढ़ गई. माधुरी उस के कमरे में चली गई.

थोड़ी देर में सुधा तैयार हो गई. मम्मी और दादाजी को बता कर वह माधुरी के साथ घर से निकल आई. थोड़ी दूर आने पर माधुरी ने सुधा की कमर में चिकोटी काटी, ”तुम ने मुझे आज अपने ‘वो’ से मिलवाने का वादा किया था और दादाजी के सामने लाइब्रेरी जाने की बात गढऩे लगी.’’

”तो क्या दादाजी के आगे कह देती कि मैं तुम्हें आशुतोष से मिलवाने वाली हूं.’’ अपनी कमर सहलाते हुए सुधा बोली.

मुसकरा पड़ी माधुरी, ”वाह! दादाजी की संस्कारी पोती, दादाजी से ही फ्लर्ट.’’

सुधा गंभीर हो गई, ”माधुरी, दादाजी से आशुतोष से मुलाकात करने की बात छिपा कर मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन मैं पहले आशुतोष को अच्छे से परख लेना चाहती हूं, फिर मैं दादाजी को सब कुछ बता दूंगी.’’

माधुरी हैरत से सुधा को देखने लगी, ”प्यार में परखना कैसा सुधा, जिसे चाहो उस की तनमन से प्रेयसी बन आओ, यही तो प्यार होता है.’’

”वाह! यह जाने बगैर कि उस के और हमारे विचार मिलते हैं या नहीं, वह हमें सुखी रख पाएगा, हम उसे मन में बसा लें. नहीं माधुरी, यह प्यार नहीं, यह तो प्रेमी को जबरन अपने ऊपर थोप लेने जैसा हुआ.’’

”तुम्हारा कहना है जिस से दिल लगाओ, पहले उसे मटके की तरह ठोंकबजा कर देख लो.’’

”हर्ज क्या है इस में. माधुरी, आखिर हम उसे जीवनसाथी के रूप में चुनने जा रहे हैं. आंख बंद कर के प्यार के फैसले नहीं लिए जा सकते.’’

”यह तुम्हारी सोच है सुधा.’’ माधुरी गंभीर हो गई, ”मैं प्यार में रोमांटिक हो कर जीना चाहती हूं, मरना नहीं.’’

सुधा ने हैरानी से माधुरी को घूरा, ”मैं समझी नहीं.’’

”सीधी सी बात है यार, प्यार इंजौय करने के लिए है, इसे दिल की गहराई से लगा कर आह! उफ!! करने और प्यार में आत्महत्या करने का समय नहीं है मेरे पास.’’

”ऐसी सोच वाली लड़कियों को एक दिन पछताना पड़ता है माधुरी.’’

”मैं पछताने वालों में से नहीं हूं सुधा. तू साथी को परखते हुए परेशान होती रहना, मैं प्यार में मौजमस्ती करती हुई बहुत आगे चली जाऊंगी.’’ माधुरी ने कहा और हंसने लगी. सुधा उस की बेफिक्री पर उसे देखती रह गई. कानपुर के महक रेस्टोरेंट में आशुतोष वर्मा नाम का युवक टेबल के सामने बैठा किसी का इंतजार कर रहा था. वह स्मार्ट था और देखने में किसी अच्छे घर का लगता था. आशुतोष के सामने टेबल पर कांच की नक्काशीदार प्लेट रखी थी, उस प्लेट में गुलाब का ताजा फूल रखा हुआ था.

तभी रेस्टोरेंट में एक अन्य युवक ने प्रवेश किया. उस ने लाल टी शर्ट और आसमानी रंग की जींस पहनी हुई थी. वह शक्ल से ही आवारा किस्म का लगता था, नाम था रोशन. उस ने दरवाजे पर खड़े हो कर अंदर हाल में नजर दौड़ाई. उस की नजर उस आशुतोष वर्मा पर चली गई, जो प्लेट सजाए किसी का इंतजार करता प्रतीत हो रहा था. रोशन के होंठों पर शरारती मुसकान फैल गई. वह लंबेलंबे कदम रखता हुआ आशुतोष की टेबल की तरफ बढ़ गया. टेबल के पास आ कर उस ने प्लेट में सजा कर रखे गुलाब के फूल को उठा लिया और नाक के पास ले जा कर संूघते हुए बोला, ”वाह! कितनी अच्छी खुशबू है इस गुलाब में.’’

आशुतोष गुस्से में बोला, ”यह क्या बदतमीजी है रोशन?’’

”मैं ने क्या बदतमीजी की यार, कहीं तुम गुलाब का फूल उठा लेने से तो खफा नहीं हो गए हो?’’

”यह फूल मैं ने किसी को देने के लिए खरीदा था रोशन.’’

”ओह, तो तुम्हें भी प्यार का रोग लग गया है.’’ रोशन कहते हुए शरारत से आगे झुका, ”कौन है वह बेबकूफ लड़की, जिस ने तुम जैसे गधे से दिल लगाया है.’’

”तुम्हारी जुबान बहक रही है रोशन.’’ युवक तीखे स्वर में बोला.

”बहकेगी ही आशुतोष बाबू,’’ रोशन लापरवाही से बोला, ”तुम ठहरे किताबी कीड़े, किताबों के अलावा तुम्हें कुछ नजर नहीं आता, फिर लड़की कैसे नजर आ गई तुम्हें. क्या मैं नाम जान सकता हूं उस का?’’

आशुतोष झल्ला कर बोला, ”तुम से मतलब.’’

”मत बता यार, यहां आ रही है, देख ही लूंगा.’’ रोशन मुसकरा कर बोला.

वह एक खाली टेबल पर टांग पसार कर बैठ गया. आशुतोष उसे फाड़ खाने वाली नजरों से देखने लगा. उसी समय एक वेटर रोशन के पास आ कर बोला, ”सर, आप को बार काउंटर पर कोई याद कर रहा है.’’

रोशन उठ खड़ा हुआ, ”चलो!’’

वेटर आगे बढ़ा, तब रोशन आशुतोष की टेबल पर झुक गया, ”घूरो मत यार, माना कि लड़कियां मेरी कमजोरी हैं, लेकिन मैं इतना भी कमाधुरी नहीं हूं कि यारों का माल ही डकार जाऊं. तुम्हारा फूल तुम्हें ही मुबारक.’’

कहने के बाद गुलाब का फूल टेबल पर रखी प्लेट में फेंक कर रोशन तेजी से बार काउंटर की तरफ चला गया. आशुतोष ने गहरी सांस ली, ”बला टली!’’

प्लेट में रखा गुलाब का फूल उठा कर आशुतोष ने डस्टबिन में डाल दिया और खाली पड़ी दूसरी टेबल पर जा कर बैठ गया. उस का मूड खराब हो गया था.

सुधा अपनी सहेली माधुरी के साथ महक रेस्टोरेंट में आई तो आशुतोष वर्मा को अपना इंतजार करते देख कर उस के होंठों पर मीठी मुसकान उभर आई. वह आशुतोष की तरफ बढ़ी. तभी पीछे आ रही माधुरी बार काउंटर की तरफ जा रहे रोशन से टकरा गई. उस के हाथ से पर्स छिटक कर फर्श पर जा गिरा. माधुरी पर्स उठाने के लिए झुकने को हुई तो रोशन भी झुक गया. माधुरी का पर्स उठा कर वह मुसकराता हुआ खड़ा हो गया.

”सौरी मिस… मैं जरा जल्दी में था, यह रहा आप का पर्स.’’

”कोई बात नहीं, ऐसा हो जाता है.’’ माधुरी मुसकरा कर बोली, ”मैं मिस माधुरी हूं.’’ कहने के बाद वह पर्स हिलाती हुई सुधा के पीछे लपकी. उस के कानों में उस युवक (रोशन) के शब्द सुनाई पड़े, ”वाह! क्या मस्त जवानी है.’’

माधुरी ने पलट कर युवक की तरफ कातिल मुसकान बिखेरते हुए हाथ की अंगुलियां नचाईं. फिर सुधा के पीछे उस टेबल पर आ गई, जहां सुधा का दोस्त आशुतोष बैठा हुआ था.

”गुड मार्निंग आशुतोष.’’ सुधा ने

मुसकरा कर अभिवादन करते हुए माधुरी की तरफ इशारा किया, ”यह मेरी सहेली

माधुरी है और माधुरी, यह हैं मेरे दोस्त आशुतोष वर्मा.’’

”हैलो!’’ माधुरी ने बड़ी अदा से हैलो कहते हुए आशुतोष की तरफ अपना हाथ बढ़ाया.

आशुतोष ने तुरंत दोनों हाथ सादगी से जोड़ते हुए कहा, ”नमस्ते जी, बैठिए.’’

माधुरी ने मुंह बनाया, ”आप एडवांस नहीं हैं. शायद आप नहीं जानते कि अब हाथ जोड़े नहीं जाते, पकड़े जाते हैं.’’

आशुतोष ने सुधा की तरफ देख कर बड़े शांत भाव से कहा, ”जिस का हाथ पकडऩा था, मैं पकड़ चुका हूं माधुरीजी. अब सुधा ही मेरी जीवनसंगिनी बनेगी. मैं इसे दिल की गहराई से सच्चा प्यार करता हूं.’’

”लेकिन यह तो आप को इस प्रेम कहानी में ठोंकबजा कर परखना चाहती है मिस्टर आशुतोष.’’ माधुरी ने कटाक्ष किया.

”अच्छी बात है.’’ आशुतोष इत्माधुरीन से बोला, ”मैं इस की कसौटी पर खरा उतरूंगा तभी तो यह मुझे अपना जीवनसाथी बनाएगी. यह तो हर लड़की को करना चाहिए.’’

”आशुतोष बाबू, मान लीजिए, यदि आप इस की कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो..?’’ माधुरी ने कनखियों से सुधा की तरफ देखते हुए प्रश्न किया.

सुधा ने आशुतोष से पूछे गए सवाल का जवाब खुद दिया, ”अगर ऐसा हुआ तो हम लाइफ पार्टनर नहीं बनेंगे, किंतु एक अच्छे दोस्त बने रहेंगे हमेशा. यह अपनी पसंद की पत्नी के साथ खुश, मैं अपने पति के साथ खुश.’’

माधुरी ने मुंह बिगाड़ा, ”ऊंह! तुम दोनों घिसेपिटे लोगों में से हो. काश! मेरा कोई बौयफ्रेंड होता तो मैं तुम को दिखाती. ये जवानी दूरदूर बैठ कर आहें भरने के लिए नहीं मिली है. यह तो एकदूसरे से लिपट कर प्यार करने के लिए मिली है.’’

सुधा मुसकराई, ”तो बना लो किसी

को अपना और मिटा लो अपने मन की हसरतें.’’

”कोई मिले तो यार.’’ माधुरी ने हाथ उठा कर अंगड़ाई ली. फिर एकाएक जैसे उसे कुछ याद आया, ”यार सुधा, अभी यहां आते हुए मैं जिस युवक से टकराई थी, वह कैसा रहेगा मेरे लिए?’’

”उस का नाम रोशन है, हमारे

कालेज का स्टूडेंट है, निकम्मा और फरेबी.’’ आशुतोष ने बताया. उस ने सुधा के पीछे आ रही माधुरी को रोशन से टकराते हुए देख लिया था.

माधुरी कुछ कहती, तभी रोशन वहां आ टपका. उस ने आशुतोष के आखिरी शब्दों को सुन लिया था. मुसकरा कर बोला, ”मुझ से जलने वाले मेरी तारीफ इसी तरह करते हैं माधुरीजी. अगर मैं तुम्हारी नजर में अच्छा हूं तो क्या तुम मुझ से दोस्ती करोगी?’’

माधुरी ने झट अपना हाथ रोशन की तरफ बढ़ाया और चहक कर बोली, ”तुम से दोस्ती करूंगी रोशन. सिर्फ दोस्ती ही नहीं, मैं दोस्ती के आगे की हदें भी पार कर के दिखाना चाहती है. मैं सुधा को दिखाना चाहती हूं कि प्यार रोनेतड़पने के लिए नहीं बना है, यह मौजमस्ती करने के लिए बना है.’’

रोशन ने माधुरी की नाजुक कलाई पकड़ कर अपनी ओर खींची और उस की पतली कमर में हाथ डाल कर लरजते स्वर में बोला, ”आओ माधुरी, इस पहली मुलाकात को हसीन और रंगीन बनाते हैं.’’

रोशन माधुरी को ले कर बार की तरफ बढ़ गया. सुधा ठगी सी खड़ी उसे देखती रह गई. आशुतोष ने गहरी सांस भर कर सुधा से कहा, ”तुम्हारी सहेली ने इस शैतान की तरफ हाथ बढ़ा कर अच्छा नहीं किया है सुधा.’’

सुधा ने सिर हिलाया, ”हां आशुतोष! यह लड़की अपनी बरबादी की पहली सीढ़ी पर पांव रख चुकी है. इस का अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

एक होटल के कमरे में रोशन सोफे पर बैठा हुआ था. रोशन के सामने शराब की बोतल रखी थी, जिस में से बना कर वह 2 पैग गले से नीचे उतार चुका था. अब वह तीसरा पैग बना रहा था. सोफे के पास ही पलंग बिछा था, जिस पर माधुरी सिर पकड़ कर बैठी हुई थी. वह अपने पूरे होशोहवास में नहीं थी. नशे से उस की पलकें मुंदी हुई थीं. वह बड़बड़ा रही थी, ”यह तुम ने मुझे क्या पिला दिया रोशन, मेरा सिर घूम रहा है.’’

रोशन कुटिलता से मुसकराया, ”व्हिस्की पीने के बाद सिर घूमता ही है जान, कुछ देर सो जाओ…’’

”लेकिन तुम ने तो मुझे बीयर पिलाने की बात की थी…’’

”बीयर बच्चे पीते हैं माधुरी डार्लिंग, तुम तो अब जवान हो गई हो रानी.’’

”रानी!’’ माधुरी ने जबरन अपनी आंखें खोलीं, ”तुम ने मुझ को रानी कहा?’’

”हां डार्लिंग, तुम मेरी रानी हो और मैं तुम्हारा राजा हूं. हम इस समय अपने राजमहल में जश्न मनाने के लिए बैठे हैं.’’

”जश्न! कैसा जश्न?’’ माधुरी लडख़ड़ाती आवाज में इतना ही बोली. उसे जोर का चक्कर आया तो वह पलंग पर लुढ़क गई.

तभी दरवाजे की बेल बजी. रोशन ने तीसरा पैग जल्दी से पी लिया और उठ कर दरवाजा खोल दिया. दरवाजे पर उस के 3 दोस्त खड़े थे. दरवाजा खुलते ही तीनों अंदर आ गए. रोशन दरवाजा लौक कर के सोफे पर आया तो उस ने तीनों को माधुरी की तरफ ललचाई नजरों से देखते हुए पाया. उस का एक दोस्त जयपाल जीभ होंठों पर फिराते हुए बोला, ”गजब की मछली फंसाई है रोशन, इस का जायका तो बहुत स्वादिष्ट होगा.’’

”रोशन नाम है मेरा, मेरी मक्कारी के जाल में ऐसी ही मछलियां खुद आ फंसती हैं.’’ रोशन बेहयाई से हंसते हुए बोला, ”एकदम ताजा माल है, कांटा एक भी नहीं है इस में. मांसल मास बहुत लजीज होगा खाने में.’’ तीनों दोस्त हंसने लगे.

अद्र्धबेहोशी में पड़ी माधुरी फिर बड़बड़ाई, ”कौन हंस रहा है यहां?’’

”मेरे दोस्त हैं जान. 3 हैं, यह जश्न में शामिल होने आए हैं.’’ रोशन दोस्तों की तरफ आंख दबा कर बोला, ”मैं ने इन्हें तुम्हारी जवानी की दावत दी है. लो दोस्तो, पहले मूड बना लो.’’

माधुरी कुछ समझ नहीं पाई. रोशन के दोस्त रोशन के साथ बैठ कर शराब के जाम छलकाने लगे. जब उन के हलक अच्छी तरह तर हो गए, तब उन्होंने पलंग पर बेसुध सी पड़ी माधुरी को घेर लिया और उस के बदन से छेड़छाड़ करने लगे. माधुरी को नशे में भी यह एहसास होने लगा कि उस की आबरू खतरे में है. वह सिर झटक कर आंखें खोलने का प्रयास करती हुई चिल्लाई, ”यह क्या कर रहे हो रोशन..?’’

रोशन बेहयाई से हंसा, ”तुम दोस्ती के आगे की हदें पार करने की बात कर रही थी जान, मेरे दोस्त और मैं तुम्हें उसी हद से आगे ले कर जा रहे हैं.’’

माधुरी के जिस्म से छेड़छाड़ बढ़ती चली गई. वह 4 पुरुष थे और वह नशे में डूबी बेबस नारी. कब तक उन का विरोध करती, कितना चीखपुकार मचाती. उन्होंने उसे बारीबारी से अपनी हवस का शिकार बनाना शुरू कर दिया. उधर सुधा का ग्रैजुएशन कंपलीट हो गया था. अब वह कालेज नहीं जाती थी. घर पर ही रहती थी. माधुरी 2 साल से लापता थी. जिस दिन सुधा उसे अपने दोस्त आशुतोष से मिलवाने के लिए महक रेस्टोरेंट में ले कर गई थी और वहां माधुरी ने रोशन की बाजू थाम ली थी, तभी से वह न घर लौटी थी, न कालेज में ही आई थी. आशुतोष से सुधा को मालूम हुआ था कि उस दिन से रोशन भी कानपुर शहर में नजर नहीं आया था.

फेमिली वालों ने माधुरी के गुम होने की पुलिस में सूचना भी दर्ज करवाई थी, किंतु पुलिस भी उस का पता नहीं निकाल पाई थी. यह मान कर कि माधुरी ने रोशन के साथ भाग कर किसी शहर में शादी कर ली है और वह उसी प्रेमी के साथ प्रेमपूर्वक रह रही है. फेमिली वाले और पुलिस चुप लगा कर बैठ गई थी. हकीकत से सभी अंजान थे. इधर आशुतोष भी अपना ग्रैजुएशन पूरा कर के सरकारी जौब की कोशिश करने लगा था. अभी तक सुधा ने घर में किसी को आशुतोष से प्रेम होने और उसी के साथ सात फेरे लेने का निश्चय करने की बात नहीं बताई थी. वह सही मौके का इंतजार कर रही थी.

एक दिन उसे यह मौका मिल गया. रात को आशुतोष ने उसे मैसेज कर के खुशखबरी दे दी थी कि उसे भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर के पद की नियुक्ति मिल गई है. वह 2 दिन बाद ही ड्यूटी जौइन कर लेगा. दूसरी सुबह नित्य की तरह जब घर के लोग मंदिर में आरती के लिए एकत्र हुए तो पूजाअर्चना के बाद नाश्ते की मेज पर सुधा ने धीरे से दादाजी से कहा, ”एक बात कहूं दादाजी, आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’’

”तुम हमारी समझदार बेटी हो, तुम ऐसी कोई बात ही नहीं कहोगी जो हमें बुरी लगे. निस्संकोच कहो, क्या कहना चाहती हो?’’ दादाजी ने स्नेह से कहा.

”दादाजी, मैं 3 साल से एक युवक से दोस्ती निभाती आ रही हूं, युवक अच्छे घर का है और नेकनीयत वाला है. मैं अब उस से शादी करने का आप लोगों से आशीर्वाद लेना चाहती हूं.’’

”यह हमारी बेटी का फैसला है तो हम इंकार नहीं करेंगे. हमारी बेटी किसी गलत जीवनसाथी का चुनाव अपने लिए नहीं करेगी, यह मैं जानता हूं.’’

”लेकिन पिताजी, इस से पूछिए 3 साल से यह उस युवक से दोस्ती करती रही है, हमें यह सस्पेंस पहले क्यों नहीं बताया?’’ सुधा की मम्मी जानकी ने पूछा.

”मम्मी, आशुतोष को मैं किसी अच्छी पोस्ट मिलने का इंतजार कर रही थी, अब उन्हें भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर की नौकरी मिल गई है.’’

”वाह! यह हुई न सोने पर सुहागे वाली बात.’’ दादाजी हंस कर बोले, ”तुम आज ही हमें आशुतोष से मिलवाओ. कल हम तुम्हारा रिश्ता ले कर खुद उस के घर जाएंगे. सुधा ने बहुत दिन इस घर के मंदिर में घंटी बजा ली है.’’ दादा दीनानाथ की बात पर सभी खुल कर हंस पड़े.

उसी दिन सुधा ने आशुतोष को घर बुला कर सभी से मिलवा दिया. आशुतोष सभी को पसंद आना था, क्योंकि यह सुधा की अपनी पंसद थी. दूसरे दिन जानकी और दीनानाथजी ने आ कर आशुतोष के मम्मीपापा से मुलाकात की और उन से सुधा के रिश्ते की बात की. आशुतोष के पापा ने यह रिश्ता स्वीकार कर लिया. फिर शादी की तारीख तय हुई और निश्चित दिन आशुतोष और सुधा की बड़ी धूमधाम से शादी संपन्न हो गई. शादी के 6 माह बाद ही आशुतोष को मुंबई की एसबीआई ब्रांच में भेज दिया गया. वहां उस के रहने के लिए फ्लैट भी दिया गया. आशुतोष जिद कर के सुधा को भी मुंबई ले आया. दिन गुजरते रहे.

आशुतोष सुबह जाता तो शाम को ही घर लौटता था. सुधा बोर हो जाती थी, इसलिए उस ने अपना ‘सहारा’ नाम से एनजीओ खोल लिया और गरीब, असहाय लोगों के लिए हर प्रकार की मदद करने लगी. उस के एनजीओ में कई पढ़ीलिखी युवतियां और बुद्धिजीवी, समाजसेवी लोग भी जुड़ते चले गए. थोड़े समय में ही ‘सहारा’ एनजीओ मुंबई भर में मशहूर हो गया. सहारा एनजीओ मुंबई के मालाबार हिल के क्षेत्र में था. एक दिन एक समाजसेवी विष्णु दत्ता ने सुधा को जानकारी दी कि पीला हाउस के रेडलाइट्स एरिया में कुछ नाबालिग लड़कियों से जबरन धंधा करवाया जा रहा है. जहां ये नाबालिग लड़कियां लाई गई हैं, वह रेशमा बाई का कोठा है.

सुधा यह सूचना पाते ही पीला हाउस के पुलिस स्टेशन में पहुंच गई. वहां का इंचार्ज एकनाथ कांबले था. सुधा ने उस से मिल कर अपना परिचय देते हुए रेशमा बाई के कोठे की सच्चाई बताई. इंचार्ज एकनाथ कांबले ने उस क्षेत्र के डीसीपी से रेशमा बाई के कोठे की हकीकत बताते हुए वहां रेड डालने की इजाजत मांगी तो उन्हें इजाजत मिल गई. आधी रात को इंचार्ज एकनाथ कांबले ने 15 महिला और पुरुष सिपाहियों के साथ रेशमा बाई के कोठे पर छापा मारा. उस वक्त सुधा और समाजसेवी विष्णु दत्ता उस पुलिस दल के साथ थे. कोठे पर पुलिस का छापा पड़ा तो कोठे पर बने छोटेछोटे केबिनों से देहबालाएं और उन के साथ हमबिस्तरी कर रहे पुरुष निर्वस्त्र ही निकल कर भागे. पुलिस ने उन्हें दबोच लिया.

कोठे की संचालिका रेशमा बाई और 2 दलाल भी इन के हाथ आ गए. कोठे की तलाशी ली गई तो एक बंद कोठरी से, जिस पर ताला लगा कर रखा गया था, 3 नाबालिग लड़कियां और एक युवती को आजाद किया गया. जो युवती उस कोठरी में से मिली, उस पर नजर पड़ते ही सुधा बुरी तरह चौंक पड़ी. यह कोई और नहीं माधुरी थी, जो 3 साल पहले कानपुर से लापता हो गई थी. सुधा को पहचान कर माधुरी उस के गले से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. सुधा की भी आंखें भर आईं. वह माधुरी की पीठ सहलाते हुए बोली, ”तुझे मैं ने कहांकहां तलाश नहीं किया माधुरी. तू यहां कोठे पर कैसे पहुंच गई?’’

”सब बताऊंगी मैं, पहले मुझे सुरक्षित इस नरक से मुक्ति दिलवा दो सुधा. यहां यह रेशमा नाम की डायन मुझे मांस का लोथड़ा समझ कर रोज जिस्म के भूखे कुत्तों के आगे फेंकती है. ये हवस के दङ्क्षरदे मुझे पूरी बात भभोड़ते हैं, मेरे जिस्म को नोंचते हैं…’’

”अब तुम्हें कोई छुएगा भी नहीं. तुम पुलिस और मेरी ‘सहारा’ एनजीओ के संरक्षण में हो. आओ, थाने चल कर बात करेंगे.’’ पुलिस दल सभी को साथ ले कर पीला हाउस पुलिस स्टेशन में लौट आया.

सुधा भी माधुरी को साथ ले कर पुलिस स्टेशन आ गई. यहां माधुरी की कोठे से बरामदगी के कागजात पूरे करा कर सुधा माधुरी को साथ ले कर अपने एनजीओ वापस लौट आई. सुबह होने वाली थी. सुधा ने आशुतोष को फोन कर के एनजीओ बुला लिया. नाश्ता लाने के लिए भी उस ने पति आशुतोष को कह दिया था. आशुतोष एनजीओ नाश्ता ले कर 7 बजे पहुंचा, तब तक सुधा ने माधुरी को फ्रेश करवा कर नए कपड़े पहनवा दिए थे. आशुतोष रास्ते भर हैरान था कि आज सुबहसुबह सुधा ने उसे नाश्ता ले कर एनजीओ क्यों बुलाया है. जब उस ने सुधा के औफिस में प्रवेश किया तो वहां बैठी माधुरी को देख कर वह बहुत हैरान हो गया.

”यह माधुरी मुंबई कब आ गई सुधा, तुम ने तो मुझे फोन पर बताया ही नहीं कुछ.’’ आशुतोष शिकायती लहजे में बोला.

”यह मुंबई कैसे पहुंची, मैं भी जानना चाहती हूं आशुतोष. फिलहाल तो यह जान लो मैं ने रात को इसे पीला हाउस के रेड लाइट्स एरिया से छुड़वाया है. माधुरी रेशमा बाई के कोठे में पुलिस छापा डालने के दौरान मुझे मिली है.’’

”ओह!’’ आशुतोष ने गहरी सांस ली, ”इसे बरबादी के नरक में उसी कमीने रोशन ने झोंका होगा.’’

”हां आशुतोषजी!’’ माधुरी ने भर्राए स्वर में कहा, ”गलती मेरी थी, मुझे सच्चे प्यार की परख नहीं थी. मैं प्यार को जिस्म की हसरतें पूरी करने का माध्यम मान कर रोशन के हाथों लुटी. उस दिन महक रेस्टोरेंट में मैं ने रोशन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा कर बहुत बड़ी भूल की थी. वह मुझे बार में ले गया और शराब पिलाई, फिर मुझे किसी होटल में ले कर गया, वहां पर रोशन ने अपने 3 दोस्तों के साथ मेरी अस्मत से खिलवाड़ किया. उस ने मेरी अश्लील फिल्म बना ली और डराधमका कर मुझे दोस्तों के आगे परोसता रहा.

”कई दिनों तक वह मेरे जिस्म की कमाई खाता रहा, फिर मुझे वह मुंबई में ले आया. यहां उस ने रेशमा बाई के कोठे पर मुझे मोटी कीमत में बेच डाला और उस गलीज धंधे में मुझे धकेल कर वह भाग गया. यदि रात सुधा रेशमा बाई के कोठे पर रेड ने डलवाती तो मैं उसी नरक में सड़सड़ कर किसी दिन मौत के मुंह में समा जाती.’’ माधुरी अपनी बात खत्म करके रोने लगी.

”मैं तुम से हमेशा कहती थी माधुरी, प्यार पूजा और इबादत का ही दूसरा नाम है. प्यार के लिए सच्चे मन से जीया जाता है.

आज के दौरान प्रेम पर वासना हावी हो गई है. आज प्रेमी प्यार की आड़ ले कर प्रेमिका के जिस्म को पाने की फिराक में लगा रहता है, जो लड़कियां प्रेमी के झांसे में आ जाती हैं, एक दिन शरम और अपमान में पछताती हैं. कुछ आत्महत्या कर लेती है, कुछ देह के धंधे में उतर कर समाज को गंदा करती रहती हैं.

”प्यार को सच्चे मन से पूजने वाले प्रेमी अब बहुत कम मिलेंगे. मुझे देखो माधुरी, मैं ने अपने प्यार आशुतोष को ठोंकबजा कर परखा था, यह मुझे सच्चा प्यार करते थे. आज परिवार की रजामंदी से हमारा विवाह हुआ और हम सुखी गृहस्थ जीवन जी रहे हैं.

”आशुतोष यहां मुंबई में एसबीआई बैंक में मैनेजर हैं. हमारा यहां मालाबार हिल में फ्लैट है. मैं यह ‘सहारा’ एनजीओ चलाती हूं. आज से तुम मेरे इस एनजीओ में असहाय लोगों की सेवा का भाव ले कर जिओगी. यूं समझो, आज से तुम्हें नया जन्म मिला है.’’

सुधा ने माधुरी के कंधे पर प्यार से अपना हाथ रखा तो माधुरी सुधा के गले से लिपट गई. उस की आंखों से अभी भी आंसू बह रहे थे. आशुतोष के होंठों पर मीठी मुसकान थी. Hindi Best Stories

 

 

लिपस्टिक की चोरी

लिपस्टिक की चोरी – भाग 4

निक उछल कर खिड़की की चौखट पर चढ़ गया. फिर पाइप पर लटक कर वह धीरेधीरे विलियम के औफिस की तरफ बढ़ने लगा. वह सोच रहा था कि अगर किसी ने उसे इस तरह लटकते देख लिया तो बचना मुश्किल होगा. इस से बड़ा खतरा एक और भी था. दरअसल एडगर के फ्लैट की खिड़की पर पाइप का सिरा 6 फुट अंदर था, जबकि विलियम के औफिस की खिड़की का छज्जा डेढ़-2 फुट चौड़ा था.

अगर पाइप छज्जे से हट जाता तो उस की हड्डियों का चूरा हो सकता था. तीसरी मंजिल से गिर कर बचना असंभव था. इसलिए वह बहुत सावधानी से बहुत धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था, ताकि पाइप को झटका न लगे और वह अपनी जगह पर टिका रहे.

आखिर वह दूसरे किनारे पर पहुंच गया. पाइप छोड़ कर वह छज्जे से लटक गया. ऊपर चढ़ने में उसे कोई खास मुश्किल नहीं हुई. यह उस की खुशकिस्मती थी कि खिड़की अंदर से बंद नहीं थी. अंदर पहुंच कर निक ने फूली सांसें दुरुस्त कीं, फिर कमरे का निरीक्षण करने लगा. इस के लिए उस ने अपनी पेंसिल टौर्च निकाल ली थी.

यह एक कमरे का औफिस था. दीवार में अलमारियां बनी हुई थीं, जिन में कानून की ढेरों किताबें रखी थीं.एक तरफ फाइल कैबिनेट थी. एक लोहे की तिजोरी लगी थी. निक वेल्वेट ने पहले दराजों की तलाशी ली, फिर तिजोरी पर ध्यान दिया. वालकाट कंपनी की तिजोरी का मेक देख कर निक खुश हो गया. इसे खोलना उस के बाएं हाथ का खेल था. वह अपने सामान के साथ तिजोरी पर झुक गया.

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3 मिनट में उस ने तिजोरी खोल ली. तिजोरी में कई खास केसेज की फाइलें रखी हुई थीं. एक खाने में उसे लिपस्टिक भी मिल गई. उस ने उसे संभाल कर जेब में रखा, फिर उसी खाने में रखी एक फाइल उठा कर पढ़ने लगा. यह किसी के कत्ल का केस था. निक को यह केस खासा दिलचस्प लगा. वह देर तक फाइल देखता रहा, पढ़ता रहा. फिर उस ने फाइल वहीं रख कर तिजोरी बंद कर दी और खिड़की से निकल कर जिस रास्ते आया था, उसी रास्ते वापसी का सफर तय करने लगा.

वह एडगर की खिड़की से करीब 4 फुट दूर था कि एक कार गली में दाखिल हुई. कार की छत पर जलने वाली नीली लाल बत्ती बता रही थी कि वह पुलिस की पैट्रोलिंग कार थी. कार गली में ठीक पाइप के नीचे रुक गई. निक को अपनी सांस रुकती हुई लगी. उस ने नीचे झांक कर देखा, 2 पुलिस वाले कार से निकल आए थे. उन में से एक के हाथ में रिवाल्वर था.

उन्होंने निक वेल्वेट को देख लिया था. एक ने चीख कर कुछ कहा पर निक की समझ में नहीं आया. एक पुलिस वाला इमारत के दरवाजे की तरफ दौड़ा. निक तेजी से आगे बढ़ने लगा, 4 फुट का फासला उसे इस वक्त जैसे 4 मील का लग रहा था. पाइप को झटके लग रहे थे. उसे डर था कि दूसरी खिड़की के छज्जे से पाइप सरक न जाए.

आखिरकार वह खिड़की तक पहुंच गया. उस ने जैसे ही पाइप को छोड़ा, एक जोरदार झटका लगा. दफ्तर वाली खिड़की के छज्जे से पाइप हट गया और वह नीचे गिरने लगा. निक चौखट पर चढ़ चुका था. उस ने जैसे ही कमरे में छलांग लगाई, गली में पाइप के गिरने की आवाज आई. पाइप शायद पुलिस की कार पर गिरा था.

निक वेल्वेट यूं ही दरवाजा बंद कर के फ्लैट से बाहर निकला तो नीचे सीढि़यों पर भारी कदमों की आवाज सुनाई दी. पुलिस वाले तेजतेज कदमों से ऊपर आ रहे थे. निक ने इधरउधर देखा और फौरन ऊपर जाने वाले जीने की तरफ दौड़ पड़ा. वहां से तीसरी इमारत में पहुंच कर पीछे के जीने से होता हुआ वह अपनी कार तक पहुंच गया. फिर उस ने इंजिन स्टार्ट कर तेजी से एक तरफ गाड़ी दौड़ा दी. अब वह पुलिस की पहुंच से बाहर था.

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मिस स्वीटी और निक वेल्वेट की मुलाकात एक रेस्टोरेंट में हुई. निक के साथ ग्लोरिया भी थी. बातचीत के बाद निक ने जेब से लिपस्टिक निकाल कर स्वीटी को थमाते हुए कहा, ‘‘अच्छे से चैक कर लो, वही लिपस्टिक है न?’’

‘‘हां, बिलकुल वही है. बहुत बहुत शुक्रिया. तुम ने मुझे बड़ी मुसीबत से बचा लिया.’’ स्वीटी ने लिपस्टिक को ध्यान से देख कर कहा.

‘‘अब की बार तुम बच गई, लेकिन आइंदा ऐसी हरकत मत करना, वरना…’’ निक ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘…वरना क्या?’’ स्वीटी ने उलझन भरी नजरों से निक की ओर देखते हुए कहा.

‘‘वरना यह भी हो सकता है कि फांसी का फंदा तुम्हारे गले में फिट हो जाए.’’ निक रूखे स्वर में बोला.

स्वीटी का चेहरा एकदम उतर गया. कुछ पल वह निक को देखती रही, फिर बिना कुछ कहे उठ खड़ी हुई और रेस्टोरेंट से बाहर निकल गई.

‘‘क्या मामला था निक?’’ ग्लोरिया ने पूछा तो निक बोला, ‘‘यह लिपस्टिक सुबूत के तौर पर एक कत्ल के मुकदमे में पेश होने वाली थी. अगर यह अदालत तक पहुंच जाती तो स्वीटी को सजा ए मौत नहीं तो उम्रकैद जरूर हो सकती थी.’’

‘‘मैं समझी नहीं.’’

‘‘बात दरअसल यह है कि स्वीटी जेम्स नाम के एक आदमी से मोहब्बत करती थी. बहुत दिनों बाद राज खुला कि उस की दोस्त क्लारा भी जेम्स को चाहती थी. एक रात जब स्वीटी जेम्स के घर पहुंची तो वहां कोई भी नहीं था. वहां उसे ड्रेसिंग टेबल पर क्लारा का एक खत मिल गया, जो जेम्स के नाम था.

उन दोनों ने किसी और जगह मुलाकात का प्रोग्राम बनाया था. स्वीटी जल कर रह गई. उस ने गुस्से में पर्स से लिपस्टिक निकाली और जेम्स की तसवीर पर, जो ड्रेसिंग टेबल पर रखी थी, कई आड़ीतिरछी लकीरें खींच दीं. तसवीर को उस ने क्रौस भी कर दिया.

‘‘यह लिपस्टिक प्रोडक्शन मैनेजर ने उसे उसी दिन दी थी, जो बदहवासी में उस ने ड्रेसिंग टेबल पर फेंक दी और पैर पटकती हुई बाहर निकल गई. इत्तफाक से थोड़ी देर बाद क्लारा वहां पहुंच गई. उस ने लिपस्टिक उठा कर अपने पर्स में डाली और वहां से चली गई.

‘‘उसी रात किसी ने जेम्स को कत्ल कर दिया. पुलिस के ख्याल में कातिल वही था, जिस ने लिपस्टिक से जेम्स की तसवीर पर क्रौस का निशान लगाया था. पुलिस को इस लिपस्टिक की तलाश थी, ताकि उस के मालिक का पता लगाया जा सके. जेम्स के भाई ने विलियम को वकील किया, विलियम को इस लिपस्टिक की तलाश थी, ताकि इसे सुबूत के तौर पर अदालत में पेश कर सके.

‘‘विलियम को स्वीटी पर शक था. किसी तरह उसे पता चल गया था कि स्वीटी को भी उस लिपस्टिक की तलाश है. उसे यह मालूम हो गया था कि वही लिपस्टिक मिस क्लारा के कब्जे में है. उसे यह भी पता चल गया था कि स्वीटी मेरे जरिए वह लिपस्टिक हासिल करना चाहती है. इस के बाद उस ने मेरे पीछे अपने आदमी लगा दिए.

‘‘मैं जैसे ही क्लारा के घर से लिपस्टिक चुरा कर निकला, विलियम के आदमियों ने मुझे घेर लिया और मुझे बेहोश कर के लिपस्टिक ले उड़े. गनीमत यही थी कि मुझे उस की गाड़ी का नंबर याद रह गया था. फिर मैं ने तुम्हारे जरिए उस गाड़ी के मालिक के बारे में मालूमात हासिल की और पिछली रात जुगाड़ कर उस के दफ्तर में जा घुसा, जहां से यह लिपस्टिक हासिल की.

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‘‘उस के दफ्तर में कत्ल के केस की एक फाइल मुझे दिखी, मैं ने उसे पढ़ा तो पता चला कि कत्ल किसी और ने किया था, पर विलियम और जेम्स का भाई जेम्स के कत्ल का इल्जाम स्वीटी पर लगा कर उसे फंसाना चाहते थे. वे उसी लिपस्टिक को सुबूत के तौर पर स्वीटी के खिलाफ पेश करना चाहते थे.

‘‘लेबोरेटरी टेस्ट से जब यह साबित हो जाता कि जेम्स की तसवीर पर लकीरें स्वीटी की लिपस्टिक से लगाई गई थीं तो उन के लिए यह प्रूव करना मुश्किल नहीं था कि नफरत और जलन की भावना से तैश में आ कर पहले उस ने उस की तसवीर बिगाड़ी, फिर उसे कत्ल कर दिया. यह स्वीटी की खुशकिस्मती थी कि वह लिपस्टिक मुझे मिल गई थी.’’

‘‘ओह तो यह चक्कर था.’’ ग्लोरिया ने ताज्जुब से कहा.

‘‘यह चक्कर तो अब खत्म हो गया, पर इस बार मुझे बहुत पापड़ बेलने पड़े. मेरी जान तक खतरे में पड़ गई.’’

बातचीत के बाद दोनों रेस्टोरेंट से निकल कर दरिया के किनारे सैर को निकल गए.

लिपस्टिक की चोरी – भाग 3

क्लारा ने पिछले दिन उसे बताया था कि उस के कमरे में बिना उस की इजाजत कोई नहीं आ सकता, इसीलिए निक ने यह रिस्क लिया था. क्लारा को ठीक से लिटाने के बाद उस ने कमरे का दरवाजा बंद किया और उस की ड्रेसिंग टेबल की तलाशी लेनी शुरू कर दी. ‘लीलाली’ वाली जामुनी रंग की लिपस्टिक ड्रेसिंग टेबल की दराज में मिल गई. उस ने लिपस्टिक का केस और पुराने टिकट की डिबिया अपने पास संभाल कर रख ली. पैसों को उस ने हाथ भी नहीं लगाया. वह चाहता तो 3 लाख डौलर ले सकता था, पर यह उस के उसूल के खिलाफ था.

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नीचे आ कर वह बिना किसी रुकावट के अपनी कार तक पहुंच गया. जब वह कार में बैठ रहा था तो क्लारा की मेड सैंड्रा ने उस की ओर देख कर हाथ हिलाया. उस ने भी खुशदिली से हाथ हिला कर कार स्टार्ट कर दी. गार्ड्स ने भी फौरन गेट खोल दिया. निक आराम से गाड़ी बाहर निकाल ले गया.

करीब 2-3 मील का फासला तय करने के बाद निक ने एक मोड़ पर गाड़ी घुमाई ही थी कि अचानक एक तेज रफ्तार कार ने पीछे से आ कर उस का रास्ता रोक दिया. निक ने फुरती से ब्रेक लगाया. इस के पहले कि निक संभल पाता, आने वाली गाड़ी से 2 आदमी उतरे और उस के दाईं और बाईं ओर खड़े हो गए. तीसरा आदमी स्टीयरिंग पर बैठा था. उन की सूरत देखते ही निक समझ गया कि मामला गड़बड़ है.

निक ने सोचा कि कहीं क्लारा की बेहोशी का राज तो नहीं खुल गया. हो सकता है उसी के आदमी पीछे आ गए हों. लेकिन उस ने यह खयाल दिमाग से निकाल दिया, क्योंकि क्लारा को इतनी जल्दी होश आना मुमकिन नहीं था.

आगेपीछे सड़क बिलकुल वीरान पड़ी थी. जो आदमी निक के पास खड़ा था, वह खिड़की पर झुका, उस के हाथ में भारी रिवाल्वर था. उस का दूसरा साथी भी पिस्तौल निकाल चुका था.

‘‘कौन हो तुम लोग, क्या चाहते हो?’’ निक ने पूछा.

‘‘मेरी तरफ देखो, मैं बताता हूं कि हम कौन हैं?’’ एक आदमी ने कहा तो निक ने गरदन घुमा कर उस की तरफ देखा. तभी उस के सिर पर जोरों से रिवाल्वर का दस्ता पड़ा और उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया.

होश में आते ही निक वेल्वेट ने अपनी जेबें टटोलीं. उस की जेबों में सब चीजें मौजूद थीं सिवाय ‘लीलाली’ वाली उस लिपस्टिक के, जिसे वह क्लारा के पास से चुरा कर लाया था. वह सोचने लगा, ‘अगर ये लुटेरे थे तो इन्हें लिपस्टिक में क्या दिलचस्पी हो सकती थी? जेब में करीब 4 हजार डौलर थे, घड़ी थी, लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं लिया था.’

उस ने घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 7 बज रहे थे. इस का मतलब वह करीब 2 घंटे बेहोश रहा था. वह सिर सहला ही रहा था कि अचानक दिमाग में धमाका सा हुआ. उसे उस गाड़ी का नंबर याद रह गया था, जिस ने रास्ता रोका था. उस ने जल्दी से वह नंबर अपनी डायरी में नोट किया और गाड़ी स्टार्ट कर दी. उस की वह रात सिर की सिंकाई में गुजरी.

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निक की जिंदगी का यह पहला मौका था, जब कोई उसे इस तरह चूना लगा गया था. उन लोगों के बारे में सोचसोच कर उस का दिमाग थक गया, पर कुछ समझ में नहीं आया. इस का मतलब वह लिपस्टिक बहुत महत्त्व की थी.

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के बाद वह सीधा मोटर व्हीकल रजिस्ट्रेशन के औफिस पहुंच गया. नंबर से पता चला कि वह गाड़ी किसी विलियम के नाम पर रजिस्टर्ड थी. यह जानकारी जुटा कर वह एक रेस्टोरेंट में घुस गया. वहां सुकून से बैठ कर उस ने ग्लोरिया को रेस्टोरेंट में आने को कहा. कौफी का और्डर दे कर वह उस की राह देखने लगा. ग्लोरिया 5-7 मिनट में पहुंच गई. निक ने उस से कहा, ‘‘ग्लोरिया, मुझे तुम से एक काम लेना है.’’

‘‘मैं पहले ही समझ गई थी कि कोई गड़बड़ है. इसलिए मैं लंच ब्रेक तक छुट्टी ले कर आई हूं.’’

‘‘यह तुम ने ठीक किया,’’ निक ने एक कागज उसे देते हुए कहा, ‘‘यह किसी विलियम का पता है. इस के बारे में पूरी मालूमात कर के आओ. मैं घर पर तुम्हारा इंतजार करूंगा. मेरा खयाल है कि तुम 12 बजे तक लौट आओगी.’’

‘‘ठीक है, अगर घर न आ सकी तो 12 बजे तक तुम्हें फोन कर दूंगी.’’ ग्लोरिया ने वादा किया.

कौफी पीने के बाद दोनों रेस्टोरेंट से निकल गए.

करीब 12 बजे फोन की घंटी बजी. निक ने लपक कर फोन उठाया. फोन ग्लोरिया का ही था. वह अपने औफिस से बोल रही थी. वह बोली, ‘‘मैं ने विलियम के बारे में मालूम कर लिया है. वह एक बड़ा वकील है और आमतौर पर क्रिमिनल केस लेता है. उस के 2 असिस्टेंट भी हैं, जो उस के साथ ही रहते हैं. इत्तफाक से मैं उन दोनों को भी देख चुकी हूं.’’

ग्लोरिया ने उन दोनों का हुलिया भी बयान कर दिया.

‘‘गुड.’’ निक ने मुसकराते हुए कहा. हुलिए के हिसाब से वे दोनों वही थे, जिन्होंने उस की कार रोकी थी. तीसरे को वह इसलिए नहीं देख सका था, क्योंकि वह कार के अंदर ही बैठा था. उस ने ग्लोरिया को शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘तुम ने काफी बड़ा काम कर दिखाया है.’’

निक ने टेलीफोन डायरैक्टरी के जरिए विलियम के औफिस का पता मालूम कर लिया. फिर वह फ्लैट से निकल गया. विलियम का औफिस एक तंग सी गली में तीसरी मंजिल पर था. निक ने कुछ आगे जा कर गली के मोड़ पर गाड़ी रोकी और पैदल ही विलियम के औफिस के ठीक सामने वाली इमारत में घुस गया. यह उस की खुशकिस्मती थी कि इस इमारत में रिहायशी फ्लैट थे. तीसरी मंजिल पर वह उस फ्लैट के दरवाजे पर रुक गया, जो गली के पार विलियम के दफ्तर के ठीक सामने था.

निक ने उस फ्लैट का दरवाजा खटखटाया. करीब 2 मिनट बाद दरवाजा खुला. दरवाजा खोलने वाला एक खस्ताहाल आदमी था, जिस ने पुराने मैले से कपडे़ पहन रखे थे. उसे देख कर निक समझ गया कि वह बड़ी गरीबी में दिन गुजार रहा है.

‘‘मिस्टर निक्सन?’’ निक ने सवालिया अंदाज में पूछा.

‘‘नहीं, मेरा नाम एडगर है.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘माफ करना मिस्टर एडगर, क्या तुम मुझे अंदर आने को नहीं कहोगे?’’ कहते हुए निक ने जेब से पर्स निकाला और उस में से 10 डौलर निकाले. डौलर देख कर एडगर की आंखों में चमक आ गई. उस ने जल्दी से कहा, ‘‘अरे आओ अंदर, मिस्टर…’’

निक ने अंदर आते ही नोट उस के हाथ में दे दिया. एडगर ने झट से दरवाजा बंद कर दिया. निक कमरा देखने लगा. फर्श पर फटापुराना कालीन बिछा था. फरनीचर काफी पुराना और सस्ता सा था. वह सिटिंग रूम था. निक दूसरे कमरे में गया, जिस की एक खिड़की सड़क पर खुलती थी. खिड़की पर मैला सा परदा पड़ा हुआ था. उस कमरे में एक बेड और अलमारी के सिवाय कुछ नहीं था.

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निक ने खिड़की का परदा उठा कर बाहर देखा. सामने ही विलियम के दफ्तर की खुली खिड़की थी. उस के औफिस में 4 लोग बैठे थे. उन में से 2 तो वही थे, जो उसे चोट पहुंचा कर लिपस्टिक ले गए थे. टेबल के पीछे रिवाल्विंग चेयर पर एक अजनबी आदमी बैठा था. वही शायद विलियम था.

निक एडगर की तरफ देख कर बोला, ‘‘तुम्हारी हालत बहुत खराब दिख रही है.’’

‘‘मैं एक रेस्टोरेंट में वेटर था, पर शराब की लत की वजह से मेरी नौकरी चली गई. 2 महीने से बेकार हूं. 2 दिनों से कुछ खाया भी नहीं है. तुम ने मेरी बड़ी मदद कर दी है.’’

‘‘निक्सन, मेरे बचपन के दोस्त का नाम है. 20 साल पहले उस से मेरी आखिरी मुलाकात इसी फ्लैट में हुई थी. पर अब वह यहां नहीं रहता. उसे कहीं और ढूंढने जाना होगा.’’

‘‘मुझे अफसोस है, तुम्हारे दोस्त से तुम्हारी मुलाकात नहीं हो सकी.’’

‘‘लेकिन मैं कुछ और ही सोच कर परेशान हूं. मैं ने यह जाने बगैर कि मेरा दोस्त यहां है या नहीं, अपने 2 दोस्तों को पुरानी यादें ताजा करने के लिए उन्हें भी यहां बुला लिया. आज रात वे यहां पहुंचने वाले हैं. हम यहां पुरानी यादें ताजा करना चाहते थे. पर सब गड़बड़ हो गया.’’ निक ने उदासी भरे स्वर में कहा.

‘‘अगर तुम्हारे दोस्त यहां आने वाले हैं तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है. मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करूंगा.’’ एडगर ने खुशीखुशी कहा.

‘‘गुड. क्या यह मुमकिन है कि हम तीनों दोस्त यहां मस्ती करें और तुम आज रात कहीं दूसरी जगह चले जाओ. मेरा मतलब है कि किसी होटल वगैरह में. बात दरअसल यह…’’

‘‘मैं समझ गया.’’ एडगर ने कहा, ‘‘दोस्तों के बीच अजनबी का क्या काम?’’ एडगर ने चापलूसी से कहा. निक ने 50 डौलर उसे थमाए तो मारे खुशी के उस के हाथ कांपने लगे. वह जल्दी से बोला, ‘‘यह लो चाबी, मैं जा रहा हूं. बहुत भूख लगी है. मैं कल दोपहर बाद फ्लैट पर आऊंगा. तुम ताला लगा कर चाबी पड़ोस में दे देना. अगर खुला भी छोड़ दोगे तो कोई बात नहीं. क्योंकि कुछ जाने का डर नहीं है.’’

एडगर ने चाबी निक को थमाई और खुद बाहर निकल गया. उसे डर था कि कहीं वह पैसे वापस न मांग ले.

निक उस की सादगी पर मुसकराया. उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी काम बन जाएगा. एडगर के जाने के बाद वह भी फ्लैट से बाहर निकल गया.

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इस इमारत में निक वेल्वेट की वापसी रात को साढ़े 11 बजे हुई. उस वक्त इलाके में पूरी तरह सन्नाटा छा चुका था. किसी किसी इमारत में हलकी सी रोशनी थी. इस बार भी निक ने अपनी गाड़ी फ्लैट से दूर ही खड़ी की थी. उस ने गाड़ी में से एक बंडल उठाया, जिस में 5-5 फुट के लोहे के 6 चूड़ीदार पाइप थे. ये पाइप निक ने आज दिन में ही खरीदे थे.

उस ने फ्लैट में पहुंच कर खिड़की खोल कर बाहर देखा. सड़क सुनसान थी. सामने वाली इमारत भी अंधेरे में डूबी थी. विलियम के औफिस में भी अंधेरा था. निक देर तक उस औफिस की खिड़की को ध्यान से देखता रहा. उस ने कुरसी पर बैठ कर एक सिगरेट सुलगा ली.

रात के करीब डेढ़ बजे उस ने पाइप निकाले और उन्हें सौकिट की मदद से जोड़ने लगा. हर पाइप में चूडि़यां थीं, इसलिए सब आसानी से जुड़ गए. इस तरह 30 फुट लंबा पाइप तैयार हो गया.

निक ने कमरे के बीच का दरवाजा भी खोल लिया था. पाइप तैयार होने के बाद उस ने ध्यान से बाहर देखा, कहीं कोई हलचल नहीं थी. अब मंसूबे पर काम करने का वक्त आ गया था. उस ने पाइप खिड़की से बाहर निकाला. एक इंच मोटा पाइप धीरेधीरे बाहर निकलने लगा. उसे संभालने के लिए निक को बहुत ताकत लगानी पड़ रही थी, जैसे तैसे उस ने पाइप का दूसरा सिरा विलियम के औफिस के छज्जे पर टिका दिया. फिर उस ने पाइप को अच्छे से सेट कर के एक बार फिर नीचे देखा. नीचे बिलकुल सन्नाटा था.

यह बात निक ने दिन में ही नोट कर ली थी कि गली करीब 20 फुट चौड़ी है. फिर भी उस ने सावधानी के लिए 30 फुट का पाइप लिया था. विलियम के औफिस तक पहुंचने का उसे बस यही एक रास्ता समझ में आया था. क्योंकि दिन में वह देख चुका था कि इमारत में 2-3 वर्दीवाले बंदूकधारी गार्ड्स रहते हैं और रात के वक्त उन्हें धोखा दे कर इमारत में दाखिल होना मुमकिन नहीं है. वह जो कर रहा था, उस में रिस्क तो था, पर रिस्क लिए बिना काम होना संभव नहीं था.

लिपस्टिक की चोरी – भाग 2

क्लारा के बारे में जानकारी हासिल करने के बाद निक ने स्वीटी के बारे में मालूमात की. वह वाकई कौस्मेटिक बनाने वाली कंपनी के रिसर्च डिपार्टमेंट में थी और प्रोडक्शन मैनेजर मिस्टर जैक्सन से उस का रोमांस चल रहा था. यह भी सच था कि कंपनी लीलाली नाम की एक नई लिपस्टिक बाजार में लाने वाली थी. इस से यह बात निश्चित हो गई कि स्वीटी झूठ नहीं बोल रही थी.

उसी रात निक ने अपने स्टोर में रखे ट्रंक में से टिकटों वाला एलबम निकाला. उस ने उन में से कुछ खास टिकट निकाले. उसे यकीन था कि ये टिकट क्लारा से मिलने का जरिया बनेंगे.

दूसरे दिन ग्लोरिया के दफ्तर जाने के बाद उस ने क्लारा को फोन किया. फोन किसी औरत ने उठाते ही कहा, ‘‘मिस्टर रेंबो स्मिथ बाहर गए हैं. एक हफ्ते बाद आएंगे.’’

निक जल्दी से बोला, ‘‘असल में मुझे उन की बेटी क्लारा से बात करनी है.’’

उधर से पूछा गया, ‘‘आप को मिस क्लारा से किसलिए मिलना है?’’

‘‘मेरे पास डाक टिकट के कुछ अनमोल नमूने हैं. इसी सिलसिले में मिस क्लारा से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘एक मिनट होल्ड करें प्लीज.’’ दूसरी तरफ से कहा गया, फिर फोन में आवाज आई, ‘‘यस प्लीज.’’

‘‘मिस क्लारा, मैं जैकब बोल रहा हूं. मेरे पास डाक के कुछ नायाब टिकट हैं. मेरे दोस्त ने सलाह दी है कि मैं आप को दिखाऊं.’’ निक ने जल्दी से कहा.

‘‘किन देशों के टिकट हैं तुम्हारे पास?’’

‘‘मेरे पास ईरान, इराक और बहावलपुर रियासत के अलावा कई देशों के टिकट हैं.’’

‘‘मैं तुम्हारा कलेक्शन देखना पसंद करूंगी, शाम को मेरे घर आ जाओ.’’ क्लारा की आवाज में उत्साह था.

‘‘शाम को मुझे इन्हीं टिकटों के संबंध में किसी और क्लाइंट से मिलना है. फिलहाल मैं फ्री हूं.’’

‘‘ठीक है, अभी आ जाओ. मैं इंतजार कर रही हूं.’’

निक ने डाक टिकट संभाल कर लिफाफे में रखे और क्लारा के घर के लिए रवाना हो गया. रास्ता करीब 40 मिनट का था. वह क्लारा के घर पहुंच गया. गेट पर 2 हथियारबंद गार्ड खड़े थे. निक ने उन्हें अपने आने का मकसद बताया तो उन्होंने उसे उस शानदार इमारत के अंदर जाने की इजाजत दे दी.

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निक ने अपनी कार आगे बढ़ा दी. करीब 50 कमरों की वह इमारत बहुत बड़ी और शानदार थी. बाहर शानदार लौन था. उस ने अपनी गाड़ी पोर्च के करीब रोक दी.

अधेड़ उम्र की एक औरत दरवाजा खोल कर बाहर आई और निक को अपने साथ अंदर ले गई. एक बड़ा कारीडोर पार कर के वह उस औरत के साथ शानदार लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में पहुंचा और एक आरामदेह सोफे पर बैठ गया. करीब 5 मिनट बाद क्लारा ड्राइंगरूम में दाखिल हुई. उस ने खुलाखुला सा महीन कपड़े का गाउन पहन रखा था.

वह आते ही बोली, ‘‘माफ करना मिस्टर जैकब, मेरा आज कहीं जाने का इरादा नहीं था. जब घर में रहती हूं तो हलकीफुलकी ड्रेस पहनना पसंद करती हूं.’’

क्लारा उस के सामने बैठ गई. निक ने उस के हुस्न से आंखें चुराईं. दोनों की बातचीत शुरू हुई तो निक को जल्द ही अंदाजा हो गया कि डाक टिकटों के बारे में उसे बहुत अच्छी जानकारी है. अभी वे लोग बातें कर ही रहे थे कि 10-12 छोटे बड़े बच्चे दौड़ते हुए ड्राइंगरूम में आ गए और शोर मचाने लगे. शोर इतना ज्यादा था कि बात करना मुश्किल था.

‘‘माइ गौड, मैं तो तंग आ गई डैडी के इन रिश्तेदारों से.’’ क्लारा ने दोनों हाथों से सिर थाम लिया.

‘‘क्या ये तुम्हारे डैडी के रिश्तेदार हैं?’’ निक ने हैरत से बच्चों को देखते हुए पूछा.

‘‘डैडी के रिश्तेदारों के बच्चे हैं. वह महीने में 2 बार अपने तमाम रिश्तेदारों को घर पर इनवाइट करते हैं. यहां उन पर कोई पाबंदी नहीं रहती. मिस्टर जैकब, मेरा खयाल है, हम लोग मेरे कमरे में चल कर बैठें तो बेहतर होगा. ये लोग हमें चैन से बातें करने नहीं देंगे.’’

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निक ने अपने एलबम संभाले और क्लारा के साथ ऊपर उस के कमरे में आ गया. उस का कमरा कीमती चीजों से भरा हुआ था, लेकिन साफसुथरा नहीं था. ड्रेसिंग टेबल पर मेकअप का सामान बिखरा पड़ा था. कमरे की अस्तव्यस्त हालत देखते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, तुम्हारे नौकर ठीक से काम नहीं करते.’’

क्लारा झेंपते हुए बोली, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं अपने कमरे में किसी को नहीं आने देती. मेरी इजाजत के बिना यहां कोई कदम भी नहीं रख सकता. अपनी बात करूं तो मुझे कमरा ठीक करने का टाइम नहीं मिलता.’’

निक मुसकरा कर पलंग पर बैठ गया. उस ने एक एलबम खोला और क्लारा को टिकट दिखाते हुए उन के बारे में बताने लगा. एलबम के तीसरे पन्ने में बहावलपुर रियासत के टिकट लगे थे. उन्हें देख कर क्लारा की आंखें चमकने लगीं. टिकट पर कुदरती मंजर के बीच एक बैलगाड़ी की तसवीर थी, जिस में आगे एक किसान बैठा था और पीछे गोद में बच्चा लिए एक औरत लकडि़यों पर बैठी थी. क्लारा ने टिकट देखते हुए कहा, ‘‘मैं यह टिकट लेना पसंद करूंगी. इस की कीमत बताओ.’’

‘‘मुझे अफसोस है, इस टिकट का सौदा हो चुका है. मैं बहावलपुर के 2 टिकट और दिखाता हूं.’’ निक ने पेज पलटते हुए कहा.

वह क्लारा को शाह ईरान की उलटी तसवीर वाला टिकट भी दिखाना चाहता था, पर उसे याद आया कि वह उस टिकट वाला एलबम तो घर भूल आया है. क्लारा शाह ईरान का उलटी तसवीर वाला टिकट किसी भी कीमत पर खरीदना चाहती थी. निक ने उस से कहा, ‘‘अगर मुझे कल शाम का टाइम दो तो मैं तुम्हारे लिए शाह ईरान का टिकट जरूर ले कर आऊंगा.’’

‘‘उस टिकट के लिए मैं तुम्हें मुंहमांगी कीमत दूंगी. याद रखना, कल शाम 5 बजे मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

‘‘निश्चिंत रहिए, मैं पहुंच जाऊंगा.’’ निक ने कहा.

‘‘तुम बेहिचक आ जाना, मैं गेट पर कह दूंगी. तुम्हें कोई नहीं रोकेगा.’’ क्लारा ने कहा.

निक जब क्लारा के घर से निकला तो उस के होठों पर हलकी मुसकराहट थी.

दूसरे दिन निक ठीक 5 बजे क्लारा के घर पहुंचा. इस बार किसी ने उसे नहीं रोका. क्लारा उसे ड्राइंगरूम के दरवाजे पर ही मिल गई. आज वह बड़े सलीके के कपड़े पहने हुई थी और बहुत अच्छी लग रही थी. उस के कमरे में पहुंच कर निक सोफे पर बैठ गया. उस से थोड़ी दूरी पर बैठते हुए क्लारा ने पूछा, ‘‘टिकट लाए हो?’’

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‘‘हां,’’ कहते हुए निक ने जेब से एक लिफाफा निकाल कर उस के सामने रख दिया. क्लारा ने बड़ी सावधानी से लिफाफे से टिकट निकाला. वह ईरान के शाह का वही टिकट था, जिस पर उस की उलटी तसवीर छपी थी. टिकट देख कर क्लारा का चेहरा चमक उठा. वह देर तक टिकट को देखती रही. फिर बोली, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए सुबह ही रकम का बंदोबस्त कर लिया था. उस ने उठ कर अलमारी से नोटों की मोटी सी गड्डी निकाल कर निक के सामने रख दी.’’

‘‘आज मैं तुम्हारे लिए एक और अनमोल चीज ले कर आया हूं.’’ निक ने मुसकराते हुए जेब से एक छोटी सी डिबिया निकालते हुए कहा, ‘‘यह एक अनोखा टिकट है. इस में प्राचीन सभ्यता को बताया गया है. पूरी दुनिया में यह बस एक ही टिकट है. मैं इसे तुम्हें सिर्फ दिखाने के लिए लाया हूं.’’

निक वेल्वेट ने डिबिया खोल कर क्लारा की तरफ बढ़ा दी. डिबिया में एक बहुत ही पुराना डाक टिकट रखा था. उस ने क्लारा को चेताया, ‘‘यह बहुत पुराना है, जर्जर हालत में. हाथ मत लगाना. इस में एक अजीब सी महक है, सूंघ कर देखो. खास बात यह है कि इस की प्रिंटिंग में जो स्याही इस्तेमाल की गई थी, उस में खुशबू थी, जो आज तक बरकरार है.’’

क्लारा टिकट देख कर हैरान थी. डिबिया को नाक के करीब ले जा कर वह उसे सूंघने लगी. एक मीठी सी खुशबू उस के नथुनों से टकराई तो उस ने 2-3 बार सूंघा. जरा सी देर में वह बैठेबैठे लहराने लगी और फिर बेहोश हो कर वहीं लेट गई. निक के होठों पर मुसकान आ गई. क्लोरोफार्म में डूबे टिकट ने अपना काम कर दिया था.

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लिपस्टिक की चोरी – भाग 1

निक वेल्वेट रात को एक क्लब से दूसरे क्लब में मारा मारा फिर रहा था. इस की वजह ऐश करना नहीं, बल्कि ग्लोरिया से उस की लड़ाई  हो जाना थी. दरअसल ग्लोरिया ने निक को किसी लड़की के साथ तनहाई में रंगे हाथों पकड़ लिया था. तभी से दोनों के बीच बातचीत बंद थी. इसी चक्कर में निक देर रात तब घर लौटता था, जब ग्लोरिया सो चुकी होती थी. सुबह को वह उस के उठने से पहले ही निकल जाता था. यह लड़ाई का तीसरा दिन था. निक बाहर अकेले खाना खाखा कर तंग आ चुका था.

उस दिन वह एक शानदार रेस्टोरेंट में बैठा खाना खा रहा था कि एक खूबसूरत लड़की उस से इजाजत ले कर उस के सामने आ बैठी. उस ने नीले रंग का चुस्त लिबास पहन रखा था.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद लड़की ने उस से कहा, ‘‘मेरा नाम स्वीटी है मिस्टर निक वेल्वेट. मुझे आप के बारे में जैक्सन वड्स ने बताया था और आप से मिलने की सलाह दी थी. मैं बहुत परेशानी में हूं. आप की मदद की सख्त जरूरत है.’’

‘‘कैसी मदद? तुम मेरे बारे में क्या जानती हो?’’

‘‘मैं समझी थी कि जैक्सन का नाम सुन कर आप समझ जाएंगे, आप उन के लिए काम कर चुके हैं.’’

‘‘तुम मेरी शर्तों के बारे में जानती हो?’’ निक ने कहा तो वह बोली, ‘‘हां, आप किसी कीमती चीज को हाथ नहीं लगाते. ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्त्व की कोई चीज भी नहीं चुराते. आप की फीस 25 हजार डौलर है, जो आप एडवांस में लेते हैं. मैं यह भी जानती हूं कि आप उसूलों के पक्के हैं.’’

निक ने उस लड़की को गौर से देखा, वह 24-25 साल की खूबसूरत लड़की थी. उस के चेहरे पर हलकी सी परेशानी थी.

निक ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हें कैसी मदद चाहिए? किस चीज की चोरी कराना चाहती हो?’’

‘‘एक लिपस्टिक की.’’ लड़की बोली.

‘‘बस एक लिपस्टिक…’’ निक ने हैरत से पूछा.

‘‘बात कुछ अजीब सी है, पर मेरे लिए यह बड़ी बात है, मेरी परेशानी भी समझ सकते हो. मैं काफी देर से तुम्हारा पीछा कर रही थी. अब जा कर तुम से बात करने का मौका मिला है.’’

पलभर रुक कर लड़की ने आगे कहा, ‘‘दरअसल मैं परफ्यूम और कौस्मेटिक बनाने वाली एक बड़ी कंपनी में काम करती हूं. मेरी कंपनी ‘लीलाली’ के नाम से एक नया प्रोडक्ट बाजार में लाने वाली है. यह प्रोडक्ट एक लिपस्टिक है, जो कई रंगों के अलावा हलके शेड्स में भी तैयार की जा रही है. मैं कंपनी के रिसर्च विभाग में काम करती हूं. अभी इस नए प्रोडक्ट को बाजार में आने में एक महीना बाकी है. माल की काफी बड़ी खेप तैयार हो चुकी है. एडवरटाइजमेंट भी शुरू हो गया है.

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‘‘चंद रोज पहले कंपनी के प्रोडक्शन मैनेजर ने इसी स्टाक में से एक लिपस्टिक मुझे गिफ्ट कर दी थी. यह गैरकानूनी और उसूल के खिलाफ हरकत थी, पर उस वक्त मुझे यह बात समझ में नहीं आई. उसूली तौर पर कोई चीज मार्केट में आने से पहले कंपनी से बाहर नहीं जानी चाहिए, पर प्रोडक्शन मैनेजर मेरी मोहब्बत में कुछ ज्यादा इमोशनल हो गया और यह गलत काम कर बैठा. उस ने चोरीछिपे एक लिपस्टिक मुझे गिफ्ट कर दी.

‘‘पता नहीं कैसे एक बड़े अफसर और डिपार्टमेंट को यह बात पता चल गई कि एक लिपस्टिक कंपनी से बाहर जा चुकी है. अभी तक किसी ने प्रोडक्शन मैनेजर पर शक नहीं किया है, लेकिन अगर हमारे नाम सामने आ गए तो हमें नौकरी से निकाल दिया जाएगा. मुमकिन है गैरकानूनी काम करने की वजह से मैनेजर को पुलिस के हवाले कर दिया जाए.’’

‘‘पर इस मसले में मैं कहां फिट होता हूं?’’ निक ने कहा.

‘‘प्रौब्लम यह है कि मेरी एक दोस्त है क्लारा. कुछ दिनों पहले क्लारा ही वह लिपस्टिक मेरे घर से ले कर गई थी. अगर इस प्रोडक्ट का नाम भी लीक हो गया तो कंपनी को लाखों डौलर का नुकसान उठाना पड़ेगा. क्लारा एक करोड़पति बाप की बेटी है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त है. मैं लिपस्टिक वापस मांग कर उसे नाराज नहीं करना चाहती. पर वह लिपस्टिक मैं हर कीमत पर वापस पाना चाहती हूं. 2 दिन पहले मैं ने मैनेजर जैक्सन से इस बात का जिक्र किया तो उस ने तुम्हारा नाम बताया. मेरा दोस्त प्रोडक्शन मैनेजर तुम्हारी फीस देने को तैयार है.’’ कह कर स्वीटी चुप हो गई.

‘‘ठीक है, इस लिपस्टिक की कोई खास पहचान है?’’

‘‘इस नाम की कोई और लिपस्टिक बाजार में मौजूद नहीं है. यह एक जामुनी शेड की लिपस्टिक है, जिस के ढक्कन पर खूबसूरती के लिए हीरे की तरह एक छोटा सा नगीना जड़ा है. यह इमिटेशन नगीना हर लिपस्टिक पर है और उस के नीचे आर्टिस्टिक ढंग से ‘लीलाली’ लिखा हुआ है,’’ स्वीटी ने बताया.

‘‘इस के लिए तुम मुझे कितना वक्त दोगी?’’ निक ने पूछा.

‘‘ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता, इस से ज्यादा देर हमारे लिए बहुत खतरनाक होगी. मैं तुम्हें क्लारा का पता दे देती हूं, तुम उस पते को आसानी से ढूंढ सकते हो.’’

स्वीटी ने क्लारा का पता और फोन नंबर लिख कर निक को देते हुए बताया कि वह 6 बजे के बाद घर पर ही होती है. उसे कभी भी फोन कर सकते हो.

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जाने से पहले स्वीटी ने एक मोटा सा लिफाफा निक वेल्वेट को सौंप दिया. उसी वक्त निक की नजर गेट पर पड़ी, जहां ग्लोरिया एक युवक के साथ दाखिल हो रही थी. चेहरे से ही वह बदमाश नजर आ रहा था. निक का खून खौल उठा. ग्लोरिया की नजर निक पर पड़ी तो वह एक पल के लिए ठिठक गई. फिर नजरें चुरा कर आगे बढ़ गई.

स्वीटी से इजाजत ले कर निक उठ खड़ा हुआ और तेजी से ग्लोरिया की तरफ बढ़ा. वह उस के पास जा कर बोला, ‘‘तुम इस वक्त यहां? और यह साहब कौन हैं?’’

‘‘तुम मनमानी करते फिरो. किसी के साथ भी ऐश करते रहो और मैं कहीं न जाऊं? मैं अपने दोस्त के साथ आई हूं. तुम्हें कोई ऐतराज है?’’

निक ग्लोरिया का हाथ पकड़ कर अपनी मेज की तरफ बढ़ गया. उस युवक ने बीच में आना चाहा तो निक ने उसे जोर का धक्का दे कर अलग हटा दिया. फिर ग्लोरिया से बोला, ‘‘आई एम सौरी, अब ऐसी भूल नहीं होगी. प्लीज मुझे माफ कर दो और लड़ाई भूल जाओ.’’

ग्लोरिया कुछ पल चुप रही, फिर मुसकरा कर निक के साथ उस की टेबल पर आ गई. निक ने ग्लोरिया को स्वीटी से मिलवाया. कुछ देर बैठ कर दोनों घर के लिए निकल पड़े. निक खुश था, क्योंकि ग्लोरिया से लड़ाई खत्म हो गई थी.

क्लारा का बाप रेंबो स्मिथ काफी मशहूर और बहुत दौलतमंद आदमी था. वह मेक्सिको में तेल के 4 कुओं का मालिक था. साथ ही कई बड़ी कंपनियों का प्रेसीडेंट भी. क्लारा की उम्र 22-23 साल थी, वह स्वीटी की क्लासफेलो और अच्छी दोस्त थी. क्लारा को उस के बाप ने पूरी आजादी दे रखी थी. वह जो चाहती थी, करती थी. मां न होने की वजह से बाप के बेजा लाड़ ने उसे बिगाड़ दिया था.

दिन भर उस की निगरानी करने के बाद निक इस नतीजे पर पहुंचा कि उस से मिलना आसान नहीं है. वह अजनबियों को अपने करीब नहीं आने देती थी. न ही हर किसी से बात करती थी. उस की हिफाजत के भी अच्छे इंतजाम थे. लेकिन निक ने उस की एक कमजोरी ढूंढ निकाली. उसे पता चला कि क्लारा को डाक टिकट जमा करने का शौक है. शौक क्या जुनून है.

एक जमाने में निक को भी डाक टिकट जमा करने का शौक था. यह क्लारा से मिलने का अच्छा बहाना हो सकता था. निक के पास डाक टिकट के कुछ नायाब और अनमोल नमूने थे, जिन की मुंहमांगी कीमत मिल सकती थी. एक टिकट तो भूतपूर्व शाह ईरान के जमाने का था, जिस पर शाह ईरान की तसवीर उलटी छपी थी. इस के अलावा एक और बहुत कीमती टिकट था. उसी टिकट जैसा एक टिकट न्यूयार्क में ढाई लाख डौलर में बिका था.

एक लड़की के कत्ल का राज – भाग 4

खाने के थोड़ी देर बाद वही दुबली पतली खूबसूरत लड़की कमरे में आई, जो थोड़ी देर पहले शादा के साथ डोली में आई थी. उस का हुलिया एकदम बदला हुआ था. खूबसूरत टाइट सूट, सलीके से काढ़े गए बाल, हलका सा मेकअप, पर उस के चेहरे पर उदासी और बेबसी पहले से ज्यादा बढ़ गई थी. उस के पीछे बुलडौग की शक्ल का एक नौकर था. उस ने कड़े लहजे में लड़की से कहा, ‘‘साहब के पास बैठ कर इन की खिदमत करो.’’

अपनी बात कह कर कुछ कमीनगी से मुसकराता हुआ बाहर चला गया. लड़की डरी सहमी सी पलंग पर बैठ गई.

मैं ने लड़की की तरफ देखा. वह डर से कांप रही थी. मैं ने उस के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘बेटी, घबराओ मत. तुम्हारे साथ कुछ गलत नहीं होगा. तुम आराम से बैठो और बताओ कि तुम कौन हो?’’

वही पुरानी कहानी थी, गरीब बाप ने पैसे की खातिर बेटी को शादा के हाथों बेच दिया था. उस का नाम कमला था. मुझे शादा की यह खातिरदारी किसी जाल की तरह लग रही थी. मैं लड़की से इधरउधर की बातें करने लगा. उसी वक्त कोठी के पोर्च में किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई. मैं ने खिड़की का परदा हटा कर देखा और फिर से बिस्तर पर लेट गया. मैं ने कमला से कहा, ‘‘कमला, अब भेडि़या आ रहा है.’’

वह और ज्यादा डर गई. मैं ने रिवाल्वर हाथ में थाम लिया. कमला ने घबरा कर पूछा, ‘‘अब क्या होगा?’’

मैं ने उसे दिलासा दिया, ‘‘तुम घबराओ मत, मैं हूं. तुम इस अलमारी के पीछे छिप जाओ.’’

अब तक कमला मुझ से खुल गई थी. वह चुपचाप अलमारी के पीछे छिप गई. मैं रिवाल्वर हाथ में थाम कर कंबल ओढ़ कर बैठ गया. चंद लम्हे बाद दरवाजा खुला. नौकर और श्याम कमरे के अंदर आ गए. मैं ने मुसकरा कर कहा, ‘‘आओ श्याम, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.’’

मुझे देख कर श्याम को गहरा झटका लगा. उस के साथ शादा और मुच्छड भी थे. शादा ने गुस्से से पूछा, ‘‘लड़की कहां है?’’

मैं ने मुसकरा कर कहा, ‘‘लड़की की फिक्र मत करो, वह यहीं है. उसे बीच में लाए बिना जो प्रोग्राम तय करना है, मुझ से करो.’’

‘‘कैसा प्रोग्राम?’’

‘‘वही प्रोग्राम, जो तुम ने अनिल के साथ बनाया था. तुम ने उसे बेहिसाब शराब पिलाई थी न? यहां तक कि बेचारे को उठा कर गाड़ी में बैठाना पड़ा था.’’ मेरा लहजा और अंदाज बेहद सख्त था, जो उन्हें परेशान कर रहा था.

शादा ने श्याम के कान में कुछ कहा और मुलाजिम के साथ बाहर निकल गई. श्याम ने सिगरेट जलाते हुए मुझ से पूछा, ‘‘क्या चाहते हैं आप?’’

‘‘तुम्हारी गिरफ्तारी.’’

‘‘कोई और बात करो.’’

‘‘मुझे कोई और बात नहीं आती.’’

‘‘मैं तुम्हें 5 हजार दूंगा.’’

‘‘5 लाख भी नहीं चाहिए.’’

‘‘मैं आप को एक बंदे की गिरफ्तारी भी दूंगा, वह इकबाले जुर्म भी कर लेगा.’’ उस ने धीमे लहजे में कहा.

‘‘मुझे जिस को गिरफ्तार करना है, वह मेरे सामने है.’’ एकाएक श्याम की आंखें गुस्से से चमकने लगीं. वह अचानक मुझ पर झपटा, मैं उसे मारना नहीं चाहता था, मैं ने उस के पैरों पर गोली चलाई, जो उस के घुटने को छूती हुई निकल गई. श्याम पूरी ताकत से मुझ से टकराया, मेरा सिर जोरों से दीवार से जा लगा. आंखों के आगे सितारे नाचने लगे.

मेरा कंधा पहले से चोटिल था. उस पर जबरदस्त मार पड़ी. मेरा सारा बदन झनझना गया. उस का दूसरा वार ज्यादा खतरनाक था. जबकि मेरा एक हाथ सिरे से काम नहीं कर रहा था. रिवाल्वर हाथ से गिर गई. उस के हाथ में पता नहीं कहां से बिजली का एक तार आ गया. उस ने उसे मेरी गदर्न में लपेट कर कसना शुरू किया. मैं ने गला छुड़ाने की बहुत कोशिश की, पर नाकाम रहा.

गोली की आवाज ने भगदड़ मचा दी थी. दरवाजा जोर से भड़भड़ाया जा रहा था. जिसे श्याम ने बंद कर दिया था. मेरा दम घुट रहा था. मेरे गले से खर्रखर्र की आवाजें निकल रही थी. तार का दबाव बढ़ता जा रहा था. तभी कमला एकदम से अलमारी के पीछे से चीखती हुई बाहर निकली और तांबे का एक वजनी गुलदान उठा कर पूरी ताकत से श्याम के सिर पर दे मारा.

श्याम कराह कर बाजू में गिरा. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. गुलदान की चोट लगने के बाद श्याम को संभलने का मौका नहीं मिला. एक मिनट में मेरे घूंसों और ठोकरों ने उस के कसबल निकाल दिए. जब श्याम बिलकुल ढेर हो गया तो कमला दौड़ कर किसी बच्ची की तरह मेरे कंधे से आ लगी.

उधर दरवाजे पर अब जोर के धक्के लग रहे थे. मैं ने कमला को श्याम पर नजर रखने को कहा और खिड़की से कूद कर बाहर निकल गया. मैं ने इमरान खां को आवाज दी तो वह अपने अमले के साथ पहुंच गया. हम सब कमरे में पहुंचे. श्याम और शादा की गिरफ्तारी के बाद यह बात साफ हो गई कि अनिल को मौत के घाट उतारने का सारा इंतजाम इसी सफेद कोठी में किया गया था.

शादा की अनिल से अच्छी पहचान थी. अनिल ने अपना हमदर्द समझ कर मुसीबत में शादा के यहां पनाह ली थी. पर उस ने धोखा दे कर उसे कातिलों के हाथों में सौंप दिया था. बिलकुल उसी तरह, जैसे उस ने मुझे पनाह दे कर श्याम को बुलवा लिया था.

अभी भी कहानी के कुछ हिस्से अंधेरे में थे. 3-4 दिनों में सारी सच्चाइयों के साथ पूरी कहानी पुलिस के सामने आ गई. श्याम का एक साथी अर्जुन सिंह सरकारी गवाह बन गया. उस के बयान से मेरे सारे अंदेशे सच साबित हुए.

कहानी की शुरुआत तब हुई, जब रत्ना को पता चला कि उस का मंगेतर श्याम किसी अंगे्रज लड़की में दिलचस्पी ले रहा है. उन दोनों को कई बार साथ देखा गया था. रत्ना श्याम को दिलोजान से प्यार करती थी.

किसी दूसरी लड़की की बात सुन कर वह बहुत दुखी हुई. जब अफवाहें ज्यादा जोर पकड़ने लगीं तो उस ने श्याम पर निगरानी रखनी शुरू कर दी. किसी तरह श्याम को यह बात पता चल गई. इसलिए वह रत्ना के डलहौजी आने पर सावधान हो जाता था. पर रत्ना तय कर चुकी थी कि वह सच्चाई जान कर रहेगी. मौत के पहले वह श्याम को दिखाने के लिए लाहौर स्थित अपने हौस्टल चली गई थी. एक रोज वहां रुक कर वह चुपचाप डलहौजी वापस आ गई.

उसे पता चला कि आज श्याम अपनी नई महबूबा से मूनलाइट क्लब में मिलेगा. यह पता चलने पर वह भी शाम को क्लब पहुंच गई. वहां उस ने श्याम को उस की अंगरेज महबूबा के साथ रंगरलियां मनाते देखा तो उस का पारा चढ़ गया. यह बात उस के बरदाश्त के बाहर थी.

बहुत ज्यादा दुखी हो कर रत्ना ने यह सोच कर कि उस धोखेबाज आदमी से वह ताल्लुक खत्म कर लेगी, वहां से लौटने का फैसला किया. लेकिन तभी उस पर श्याम की नजर पड़ गई. माजरा समझते ही वह दौड़ कर उस के पास आया. वह रत्ना जैसी खूबसूरत, दौलतमंद और पढ़ीलिखी लड़की को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था.

श्याम उस के पीछे दौड़ा और उसे समझाने की कोशिश करने लगा. पर रत्ना हकीकत जान चुकी थी. वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी. क्योंकि उस के शुभचिंतकों ने उसे पहले ही सब बता दिया था.

श्याम ने जब बात बिगड़ती देखी तो जबरदस्ती उसे अपने साथ गाड़ी में ले गया. रत्ना उस की सूरत भी नहीं देखना चाहती थी. श्याम उसे मनाने के लिए उसे अपने फ्लैट पर ले गया. वहां दोनों में खासी तकरार हुई. इस झगड़े से श्याम को अंदाजा हो गया कि उस ने रत्ना को हमेशा के लिए खो दिया है. अब यह मंगनी टूट जाएगी. रत्ना किसी कीमत पर उस से शादी नहीं करेगी.

बस, यहीं से रत्ना की बदकिस्मती की शुरुआत हो गई. श्याम के इरादे खतरनाक हो गए. उस ने रत्ना को डराया धमकाया, मारापीटा. फिर गुस्से में हैवान बने श्याम ने रत्ना की इज्जत तारतार कर डाली. लुटीपिटी हालत में रत्ना मांबाप के सामने नहीं जाना चाहती थी. श्याम के चंगुल से छूटते ही वह दूसरी मंजिल की खिड़की से नीचे कूद गई. नीचे पक्का फर्श था. रत्ना के सिर में गहरी चोटें आईं और वह बेहोश हो गई.

श्याम ने अपने राजदार दोस्तों के साथ मिल कर दम तोड़ती रत्ना को कार में डाला और रात 11 बजे उस के घर के सामने डाल आया. तब तक रत्ना दम तोड़ चुकी थी. अनिल सिन्हा इस जुर्म का चश्मदीद गवाह था. दरअसल जिस वक्त रत्ना और श्याम मूनलाइट क्लब की लौबी में झगड़ रहे थे, अनिल वहीं खड़ा था. एक खूबसूरत लड़की को इस तरह लड़ते देख उस की दिलचस्पी बढ़ गई थी. वैसे भी वह रत्ना को थोड़ाबहुत जानता था.

दरअसल, जिस बैंक में वह काम करता था, वहां रत्ना का एकाउंट था. वह अकसर बैंक आती रहती थी. उसे यह भी पता था कि वह डा. प्रकाश की बेटी है. जब श्याम खींचतान कर रत्ना को कार में बिठा रहा था, अनिल को लगा, उसे रत्ना की टोह लेनी चाहिए. यही सोच कर उस ने अपनी गाड़ी फासला रखते हुए श्याम की कार के पीछे लगा दी. बड़ी होशियारी से पीछा करते हुए वह श्याम के फ्लैट तक पहुंच गया.

रत्ना और श्याम के फ्लैट में जाने के कुछ देर बाद वह भी ऊपर पहुंच गया और एक छज्जे के सहारे उस फ्लैट की बालकनी में उतर गया. उसे लग रहा था कि उस लड़की के साथ कुछ गलत हो रहा है. बंद खिड़की की हलकी सी दरार से अंदर का थोड़ा सा मंजर दिख रहा था. अंदर से रत्ना के रोने की आवाज आ रही थी. साथ ही गुस्से और दुख से बोलने की आवाजें भी, जिस से पता चल रहा था कि उस के साथ कितना बड़ा जुल्म हो चुका है.

तभी उस ने रत्ना को बाजू की खिड़की से नीचे कूदते देखा. इस दिल दहलाने वाले हादसे को देख कर उस की चीख निकल गई. जरा सी गलती से वह उसी वक्त श्याम की नजर में आ गया. श्याम के इशारे पर उस के खतरनाक गुंडे उस के पीछे लग गए.

जैसे ही उस की कार बड़ी सड़क पर पहुंची, अर्जुन सिंह और उस का साथी जीप ले कर उस के पीछे लग गए.  जिंदगी और मौत की दौड़ काफी लंबी चली. आखिर उस ने अपनी कार एक बंद गली में छोड़ी और एक तंग गली से लंबा चक्कर काट कर रात 11 बजे हांफता कांपता घर पहुंचा.

वह यह देख कर हैरान रह गया कि श्याम के आदमी वहां पहले से मौजूद थे. दरअसल मौकाएवारदात पर उसे पहचान लिया गया था. इस से अनिल को लग रहा था कि उस की जान को खतरा है. उस ने पुलिस से संपर्क करना चाहा, पर नाकाम रहा. तभी न जाने कैसे उस के दिमाग में मेरा नाम आ गया. उस ने मुझे अमृतसर फोन कर के अपनी परेशानी बताई, पर बात पूरी न हो सकी.

दूसरे दिन सवेरे अमजद की साइकिल ले कर वह मुंह छिपा कर पीछे के रास्ते से पनाह की तलाश में सफेद कोठी पहुंचा. उसे मदद की उम्मीद वहां ले गई थी. शादा से उस के पुराने ताल्लुकात थे. उसे उम्मीद थी कि शादा उस की मदद करेगी.

उस को इस बात का जरा भी गुमान नहीं था कि शादा के श्याम से बहुत गहरे रिश्ते हैं. उस ने श्याम को बुलवा लिया. तब तक वह काफी हद तक आश्वस्त हो गया था कि शादा उस की पूरी मदद करेगी.

उस ने शादा के घर से मुझे दूसरा फोन किया था और बताया था कि वह अमृतसर आ रहा है. यही उस की आखिरी आवाज थी, जो मैं ने सुनी थी. उस के बाद वह दुश्मनों के चंगुल में फंस गया. उस की पनाहगाह उस की कत्लगाह बन गई. श्याम और उस के गुंडे साथियों ने पहले अनिल को खूब मारापीटा और फिर जबरदस्ती उसे अंधाधुंध शराब पिलाई. उस की कार वे लोग पहले ही हासिल कर चुके थे.

बेहोश अधमरे अनिल को उस की कार में डाल दिया गया और उस की कार कैंट रोड के एक खतरनाक मोड़ से खाई में लुढ़का दी गई. दोहरे कत्ल की इस संगीन वारदात के बड़े मुलजिम श्याम को सजाएमौत हुई. उस के 3 साथियों को 10-10 साल की सजा सुनाई गई. एक दो को हल्की सजाएं हुईं. शादा पर भी पेशा कराने के जुर्म में काररवाई हुई.

इस केस में मैं उस मासूम लड़की कमला को कभी न भूल सका. उस की बहादुरी ने मेरी जान बचाई थी. शायद उस ने मेरी शराफत और मोहब्बत का सिला इस तरह दिया था. इस केस में मैं ने उसे अलग कर के महफूज हाथों में सौंप दिया था, ताकि वह इज्जत से जिंदगी गुजार सके.

एक लड़की के कत्ल का राज – भाग 3

हम डा. प्रकाश के घर से निकल आए. मौसम काफी ठंडा था. रात के 8 बजे थे. उसी वक्त पास में एक लाल रंग की कार मोड़ काट कर आगे बढ़ गई. उस की ड्राइविंग सीट पर श्याम बैठा था. कुछ सोच कर मैं ने इमरान खां से फासला रख कर उस का पीछा करने को कहा. लाल रंग की वह कार मूनलाइट क्लब के सामने जा कर रुकी.

इस क्लब के ज्यादा मेंबर अंगरेज फौजी या अमीरों के लड़के थे. क्लब में काफी रश रहता था. इमरान खां ने मुझे बताया कि अनिल के कागजात में इस क्लब की मेंबरशिप का कार्ड भी था. हम दोनों अंदर क्लब में पहुंचे. अंदर काफी शोरशराबा था. लोग वहां की डांसरों के साथ डांस कर रहे थे. अंदर तंबाकू का धुआं और शराब की बू भरी थी.

मेरी नजर श्याम पर पड़ी. वह एक अंगरेज लड़की से हंसहंस कर बातें कर रहा था. उस के चेहरे पर गम की हलकी सी भी निशानी नहीं थी. वह उस श्याम से एकदम अलग लग रहा था, जिसे हम ने थोड़ी देर पहले देखा था. क्लब का मैनेजर इमरान का दोस्त था. उसे देख कर वह हमारे पास आया और हमें अपने कमरे में ले गया. दरवाजे के शीशे से श्याम साफ दिख रहा था.

मैं ने मैनेजर से उस के बारे में पूछा तो उस ने बताया, ‘‘इस का नाम श्याम है, अमीर घर का लड़का है.’’

‘‘इस के बारे में और कुछ बताइए. कोई वाकया, कोई झगड़ा या और कुछ.’’

वह कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘हां, कुछ दिनों पहले एक वाकया हुआ था. क्लब की लौबी में श्याम का एक लड़की से झगड़ा हुआ था. झगड़ा क्या तकरार हो रही थी. वह लड़की बिफरी हुई बाहर जा रही थी. जबकि श्याम मिन्नतें कर के उसे रोक रहा था. इस पर लड़की ने चीख कर गुस्से में कहा था, ‘तुम बहुत नीच इनसान हो, मैं तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहती.’ इस के बाद दोनों एकदूसरे से उलझते बाहर चले गए थे.’’

मैनेजर की इत्तला काबिले गौर थी. मैनेजर ने सोच कर जो दिन बताया था, वह अनिल की मौत के एक दिन पहले का था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘उस लड़की के बारे में कुछ बताओ, जिस से झगड़ा हो रहा था.’’

‘‘वह लड़की गोरी, खूबसूरत, लंबे बालों वाली थी और पहली बार क्लब आई थी. लहजे और अंदाज से वह उस की गर्लफ्रैंड लगती थी. क्लब में उसे शायद किसी और के साथ देख कर आपा खो बैठी थी. वह भले घर की शालीन लड़की थी.’’

इमरान खां ने कोट की जेब से रत्ना की फोटो निकाल मैनेजर को दिखाई. वह फोटो देखते ही बोल उठा, ‘‘हां, यही है वह लड़की, एकदम वही.’’

कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया. अगर मैनेजर के मुताबिक वह लड़की रत्ना ही थी तो निस्संदेह अनिल और रत्ना के साथ जरूर कोई हादसा पेश आया था. धीरेन पर से मेरा शक हट चुका था. पता नहीं क्यों श्याम शुरू से ही मुझे कुछ रहस्यमय लग रहा था. उस की आंखों में शातिराना चमक थी. क्लब में उसे बदले अंदाज में देख कर तो उस के प्रति मेरी सोच ही बदल गई थी.

क्योंकि मैनेजर के अनुसार जिस रोज श्याम क्लब की लौबी में रत्ना से झगड़ रहा था, उसी दिन उस का कत्ल हुआ था. मैं ने कहानी की कडि़यां मिलानी शुरू कीं. श्याम को किसी और लड़की के साथ देख कर रत्ना और उस की लड़ाई हुई होगी. जिस का अंजाम रत्ना की मौत के रूप में सामने आया. फिर अगले दिन अनिल वाला हादसा हो गया. निस्संदेह उलझा हुआ मसला था.

अब मेरे सामने दो ही रास्ते थे. एक तो यह कि श्याम को गिरफ्तार कर के कड़ाई से पूछताछ की जाए और दूसरा यह कि खामोशी से तफ्तीश कर मुलजिम के इर्दगिर्द शिकंजा कस कर उसे पकड़ा जाए.

दो दिन बाद की बात है. मैं इमरान खां के साथ थाने में बैठा था. एक अधेड़ उम्र का अमजद नाम का व्यक्ति मुझ से मिलने आया. उसे इमरान खां ने बुलवाया था. वह उन्हीं रामबाबू के घर काम करता था, जिन की कोठी के एक हिस्से में अनिल किराए पर रहता था. कभीकभी अमजद अनिल के लिए भी चायनाश्ता बना देता था. साथ ही उस के छोटेमोटे काम भी कर देता था. उस से अनिल के बारे में पूरी जानकारी मिल सकती थी. इस के लिए इमरान खां ने उसे थाने बुला लिया था.

बातचीत हुई तो अमजद ने बताया, ‘‘उस दिन इतवार था. अनिल साहब रात करीब 11 बजे घर लौटे. चाय के बारे में पूछने के लिए मैं उन के कमरे में गया. अचानक मेरी निगाह गैराज में चली गई. मुझे यह देख कर हैरानी हुई कि उन की कार गैराज में नहीं थी. उस वक्त अनिल गली में खुलने वाली खिड़की के पास खड़े थे और खासे परेशान व घबराए हुए से गली में कुछ देख रहे थे. मैं ने चाय के लिए पूछा तो कहने लगे, ‘हां…हां, चाय बना लो, जाओ जल्दी.’

‘‘जब मैं चाय ले कर आया तो वह किसी दूसरे शहर फोन कर रहे थे. आवाज रुंधी थी, एकाध जुमला भी मैं ने सुना था. वह कह रहे थे, ‘मैं खतरा महसूस कर रहा हूं, क्या आप यहां आ सकते हैं?’ उन्होंने यह भी कहा था कि कुछ लोग मेरे पीछे लगे हैं.

‘‘यह सुन कर मैं परेशान हो गया. कुछ पूछने की हिम्मत न हुई, मैं अपने कमरे में आ गया. पर नींद नहीं आई. मैं बारबार खिड़की से झांकता रहा. उस वक्त एक सफेद वैगन घर के सामने खड़ी थी. सुबह अजान के वक्त अनिल साहब ने मुझे बुलाया. कमरा सिगरेट के टुकड़ों से भरा पड़ा था. उस वक्त मैं साइकिल पर दूध लेने जा रहा था. उन्होंने मुझ से कहा, ‘‘तुम अपनी साइकिल और चादर मुझे दे दो. मुझे एक जरूरी काम से कहीं जाना है.’’

‘‘साहब, अगर कोई खतरा हो तो पुलिस को खबर कर दें?’’

मैं ने कहा तो वह बोले, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. बस एक आदमी से पीछा छुड़ाना है. कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं. तुम अपनी साइकिल गली नंबर 14 की सफेद कोठी के सामने से ले लेना.’’

इस के बाद अनिल साहब मेरी साइकिल ले कर चले गए थे.

‘‘मैं एक, डेढ़ घंटे बाद सफेद कोठी के सामने से अपनी साइकिल ले आया और उसी दिन रात को एक्सीडेंट में अनिल साहब चल बसे. वह बहुत अच्छे इनसान थे.’’ अमजद ने रुंधे लहजे में अपनी बात खत्म की.

मैं ने अमजद से पूछा, ‘‘तुम जानते हो, सफेद कोठी में कौन रहता है?’’

‘‘हां, वहां शादा रहती है. वह अच्छी औरत नहीं है. वहां सब अय्याश और आवारा मर्द लोग आते हैं.’’

‘‘क्या अनिल भी वहां जाता था?’’ मैं ने पूछा तो उस ने हिचकते हुए कहा, ‘‘पहले कभीकभी जाते थे. लेकिन पिछले 5-6 महीने से मैं ने उन्हें उधर जाते नहीं देखा था.’’

अमजद से काफी अच्छी जानकारी मिल गई. सोचने के लिए कई मुद्दे भी मिल गए. एक बात साफ हो गई थी कि इस मामले में श्याम का हाथ जरूर था और अगर अनिल शादा के यहां जाने के बाद मारा गया था तो वह भी इस जुर्म से जुड़ी थी. इन सब सवालों के जवाब शादा के यहां गली नंबर 14 की सफेद कोठी से मिल सकते थे.

मैं इस इलाके में अजनबी था. वहां मुझे कोई नहीं पहचानता था. इसलिए सफेद कोठी में जाने की जिम्मेदारी मुझ पर आई. इस के लिए मैं ने हुलिया बदल लिया. मैं ने पहाड़ी लिबास पहना. सिर पर रंगीन टोपी, साथ ही एक देसी रिवाल्वर भी कमीज के नीचे रख लिया. मैं शादा के यहां उसी तरह जाना चाहता था, जिस तरह अनिल गया था.

जब मैं सफेद कोठी में पहुंचा तो एक मूंछों वाले हट्टेकट्टे आदमी ने मुझे रोक लिया. मैं ने शादा से मिलने को कहा तो पता चला कि वह घर पर नहीं है. इत्तफाक से उसी वक्त चार कहार एक डोली ले कर वहां पहुंच गए. उन दिनों डलहौजी में सवारी के लिए लकड़ी की बनी डोली आम थी.

डोली से एक गोरीचिट्टी मोटी सी औरत उतरी. उस की उम्र करीब 40-42 साल रही होगी. वही शादा थी. उस के साथ 14-15 साल की एक दुबलीपतली खूबसूरत लड़की भी थी, जो डरीसहमी सी शादा के पीछे खड़ी थी. मैं ने कहा, ‘‘शादाजी, मुझे आप से जरूरी काम है.’’

उस ने कड़े तेवरों से पूछा, ‘‘कैसा काम?’’

मैं ने घबराए अंदाज में कहा, ‘‘मैं बैंक औफिसर अनिल का दोस्त हूं. मुझे आप की पनाह की जरूरत है.’’

अनिल का नाम सुन कर शादा के चेहरे की बेरुखी हवा हो गई. अपने पीछे आने को कह कर वह अंदर दाखिल हो गई. मुझे सजे सजाए खूबसूरत ड्राइंगरूम में बैठा कर उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, यहां क्यों आए हो?’’

‘‘शादाजी, अनिल की तरह कुछ लोग मेरे पीछे पड़ गए हैं, वे मेरी जान लेना चाहते हैं. मैं उन्हें बड़ी मुश्किल से चकमा दे कर यहां तक पहुंचा हूं. अनिल ने मुझ से कहा था कि कोई मुश्किल पड़े तो शादाजी के पास चले जाना.’’

वह मुझे हैरत से देखते हुए बोली, ‘‘किन आदमियों की बात कर रहे हो तुम?’’

मैं ने कहा, ‘‘श्याम के आदमी हैं.’’

अंधेरे में चलाया मेरा तीन निशाने पर लगा. उस ने पहलू बदला, उस की आंखों में उलझन थी. बहरहाल वह अपनी कैफियत छिपाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी बात मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है, अनिल ने कभी तुम्हारा जिक्र नहीं किया था.’’

मैं ने अपनी गोलमोल बातों से उस का शुबहा दूर करने की कोशिश की. ताबड़तोड़ अनिल के हवाले दिए. कुछ हद तक मुतमुइन हो कर वह मुझे वहीं छोड़ कर अंदर चली गई. शायद वह कहीं टेलीफोन कर रही थी. मैं सूरतेहाल का सामना करने को तैयार था. क्योंकि उस वक्त सफेद कोठी पूरी तरह पुलिस की निगरानी में थी. मैं ने इमरान खां को भी कह रखा था कि फायर होते ही अमले के साथ कोठी पर धावा बोल देना.

थोड़ी देर में शादा वापस लौट आई. कहने लगी, ‘‘अगर तुम अनिल के दोस्त हो तो हमारे भी दोस्त हुए. अपनी हिफाजत की फिक्र मुझ पर छोड़ दो. श्याम वगैरह बड़े खतरनाक लोग हैं. पर हम सब संभाल लेंगे.’’

मैं साफतौर पर महसूस कर रहा था कि फोन करने के बाद उस कर रवैया बहुत नरम और दोस्ताना हो गया था. वह थोड़ा रुक कर बोली, ‘‘तुम कमरे में जाओ और फ्रैश हो कर आराम करो. वहां कपड़े भी रखे हैं. अभी मेरे कुछ मिलने वाले आए हुए हैं. मैं उन के साथ मसरूफ हूं. खाना वगैरह मैं भिजवा दूंगी.’’

मैं कमरे में आ गया. बड़ा शानदार कमरा था. उस से लगा साफसुथरा बाथरूम था. वहां एक सलवारकमीज टंगी थी. मैं ने जी भर कर गरम पानी से नहाया और कपड़े पहन कर लेट गया. कुछ देर में गरम खाना आ गया. मछली, कबाब, बिरयानी. मैं ने डरडर कर सूंघसूंघ कर खाना खाया कि कहीं खाने में लंबा लिटाने का इंतजाम न हो. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था.