सोफे में छिपाई लाश का राज

मुंबई से सटे ठाणे स्थित चर्चित कालोनी डोंबीवली में ओम साईं रेजीडेंसी की एक बिल्डिंग में किशोर शिंदे का परिवार 14 फरवरी की सुबह तक काफी खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था. सुबहसुबह शिंदे अपने औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे. पत्नी सुप्रिया उन के लिए नाश्ता लगा चुकी थी.

नाश्ता कर निकलते समय जब सुप्रिया ने अपने पति शिंदे को लंच का टिफिन पकड़ाया, तब उन की नजर पत्नी के उतरे हुए चेहरे पर ठहर गई. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है सुप्रिया, तुम सुस्त दिख रही हो?’’

‘‘हां, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है.’’ सुप्रिया धीमी आवाज में बोली.

‘‘घर का काम ज्यादा करने की आज जरूरत नहीं है. तुम आराम कर लो, कपड़े मशीन में डाल कर छोड़ देना, ड्यूटी से आ कर चला दूंगा… रात को कपडे़ धुल जाएंगे,’’ शिंदे ने कहा.

‘‘लेकिन श्लोक स्कूल जा चुका है, दोपहर को उसे लाना होगा.’’ सुप्रिया बोली.

‘‘कोई बात नहीं, स्वाति को बोल देना वह उसे अपने बच्चों के साथ ही लेती आएगी.’’

‘‘ठीक है, वैसे एकडेढ़ घंटे की नींद ले लूंगी, तब ठीक हो जाएगा. सिर दर्द ही तो है,’’ सुप्रिया बोली.

‘‘ठीक है. कुछ खाना खा कर सिरदर्द की दवा ले लेना. मैं निकलता हूं,’’ कहते हुए शिंदे अपना बैग और टिफिन ले कर मुंबई के लिए निकल पड़े. पहले वह लोकल ट्रेन पकड़ कर चर्चगेट जाते, फिर उन्हें बस ले कर औफिस तक जाना होता था. परिवार में सदस्य के नाम पर सुप्रिया और उन का 10 साल का बेटा श्लोक था. बेटे का स्कूल हाल में ही खुला था. उसे लाने के लिए दोपहर में सुप्रिया उस के स्कूल तक जाती थी.

शाम के करीब साढ़े 4 बजे स्वाति ने शिंदे को फोन कर पूछा कि सुप्रिया श्लोक को लेने स्कूल क्यों नहीं आई? इस पर शिंदे अनमने भाव से बोले, ‘‘हां, सुबह उस ने बताया था कि उस की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है, इसलिए नहीं गई होगी. श्लोक घर आ गया न?’’

‘‘हां श्लोक तो मेरे साथ आ गया है, लेकिन घर पर मां को नहीं पा कर मुझ से ही उस के बारे में पूछने आया था. मेरे घर पर ही नाश्ता किया और अभी श्लोक दोस्तों के साथ ग्राउंड में खेलने गया हुआ है,’’ स्वाति बोली.

‘‘सुप्रिया घर पर नहीं है? वह कहां गई होगी?’’ शिंदे चिंतित हो कर बोले.

‘‘यही पूछने के लिए तो मैं ने आप को फोन किया है. उस का फोन भी नहीं मिल रहा है, मैं घर जा कर भी देख चुकी हूं. घर का दरवाजा भी बंद है. श्लोक का स्कूल बैग भी बाहर बरामदे में पड़ा है. भाईसाहब, मुझे तो डर लग रहा है, आप जल्द आ जाइए.’’ स्वाति घबराहट भरी आवाज में बोली.

‘‘घर पर भी नहीं है. फिर कहां गई होगी? दवा वगैरह लाने या डाक्टर के पास तो नहीं गई? कहीं तबीयत ज्यादा तो नहीं बिगड़ गई उस की? अभी मैं उसे फोन करता हूं.’’ शिंदे बोले और तुरंत सुप्रिया को मोबाइल पर फोन करने के लिए स्वाति का काल डिसकनेक्ट कर दिया.

शिंदे ने सुप्रिया को फोन मिलाया. लेकिन उस का फोन बंद आ रहा था. शिंदे चिंतित हो गए. तब उन्होंने पड़ोसी दोस्त को घर जा कर सुप्रिया का पता करने को कहा. दोस्त ने भी 5 मिनट में आ कर वही सब बताया जो स्वाति ने कहा था. शिंदे ने फटाफट औफिस का बचा काम निपटाया और शाम के 7 बजे तक घर आ गए.

घर का दरवाजा भीतर से बंद था. बेटा श्लोक ग्राउंड से खेल कर घर आ चुका था. बरामदे में कुछ पड़ोसी भी जमा थे. सुप्रिया बाहर जाने पर अकसर घर की चाबी अपने पड़ोसी के पास छोड़ जाती थी. लेकिन उस रोज सुप्रिया ने ऐसा नहीं किया था.

इसे ले कर एक सवाल सभी के मन में कुलबुला रहा था कि आखिर सुप्रिया कहां है? खैर, शिंदे ने अपने बैग से घर के इंटरलौक की एक्सट्रा चाबी से मेन दरवाजा खोला. अंदर कमरे में उन के साथ कई लोग दाखिल हुए. भीतर का माहौल सामान्य था. कमरे में लाइटें जल रही थीं.

कुछ पल वे कमरे में रुके. उन की आंखें सुप्रिया को तलाश रही थीं. उन्होंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से उस के बारे में पूछा. किसी ने भी सुप्रिया के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. यहां तक कि सभी ने कहा कि उन की उस रोज सुप्रिया से मुलाकात ही नहीं हुई थी. शिंदे को मामला कुछ संदिग्ध लगा. वह अधिक समय गंवाए बगैर अपने खास दोस्तों के साथ डोंबीवली मानपाड़ा पुलिस थाने गए. थानाप्रभारी के पास जा कर उन्होंने सुप्रिया की गुमशुदगी की सूचना लिखवा दी.

इधर शिंदे के घर पर कुछ पड़ोसियों की नजर एक सोफे पर टिक गई, जो खिसका कर दोबारा उसी जगह पर सेट किए जाने जैसा दिख रहा था. ऐसा जमीन पर बने ताजा निशान से पता चल रहा था. लोगों को वह निशान कुछ संदिग्ध लगा.

वे यह नहीं समझ पाए कि सोफे को दीवार से सटा कर क्यों लगाया गया है, जबकि सुप्रिया इस के खिलाफ रहती थी. वह हमेशा दीवार पर निशान पड़ने से बचाने के लिए दीवार से थोड़ी दूरी बना कर रखती थी. जमीन पर भी कुछ निशान ऐसे बने हुए थे, जो अधूरी सफाई लगते थे.

पड़ोसियों में से एक ने सोफे को खींचने का प्रयास किया. वह भारी महसूस हुआ, खिसक नहीं पाया. जबकि वह बैड कम सोफा आसानी से खिसकाया जाने वाला था. सोफा ऊपर से गीला भी दिख रहा था. उसे 2 लोगों ने ताकत से जैसे ही खिसकाया, उस के नीचे का हिस्सा एक झटके में अपने आप बाहर की ओर निकल आया. उसे देख कर सभी की आंखें फटी रह गईं. उस में सुप्रिया बेजान पड़ी थी. उसे सोफे में ठूंस कर डाला गया था. पैर मुड़े हुए थे. सिर आगे की ओर झुका और गरदन टेढ़ी थी. चेहरा आधा ही दिख रहा था.

इस की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई. संयोग से शिंदे भी वहीं थे. पुलिस जिसे गुमशुदा के रूप में तलाश कर रही थी, उस के घर में ही मिलने की सूचना मिल गई थी. पुलिस टीम 10 मिनट में ही शिंदे को साथ ले कर आ गई. पुलिस टीम में सीनियर इंसपेक्टर शेखर बागड़े, इंसपेक्टर अनिल पडवल, एपीआई मनीषा जोशी और अविनाश वनवे शामिल थे.

पुलिस के आला अधिकारियों की टीम के सामने सुप्रिया की लाश को सोफे से बाहर निकाला गया. उस के सिर पर चोट के निशान थे. मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. मौके की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. इस मामले की जानकारी एडिशनल पुलिस कमिश्नर (पूर्वी क्षेत्रीय संभाग) कल्याण के दत्तात्रेय कराले, डीसीपी सचिन गंजाल, और डोंबीवली डिवीजन के एसीपी जे.डी. मोरे को भी दे दी गई.

शिंदे और सभी पड़ोसियों समेत पुलिस के सामने कई सवाल खड़े हो चुके थे. उन में मुख्य थे कि सुप्रिया की हत्या किस ने की? उन की हत्या के पीछे कारण क्या हो सकता है? हत्यारा घर में घुस कर वारदत में सफल कैसे हो गया? क्या वह पहले से सुप्रिया को जानता था?

सुप्रिया की लाश को पोस्स्मार्टम के लिए भेजने से पहले की गई शुरुआती जांच में पुलिस ने हत्या के कुछ बिंदुओं को भी नोट किया.

प्राथमिक जांच रिपोर्ट के अनुसार पुलिस के सामने अनगिनत सवाल थे. सुप्रिया के सिर पर चोट के निशान थे. वहां खून फैला नजर आया था. गरदन नायलोन की रस्सी और केबल से टाइट बंधी हुई थी. गरदन पर छिलने जैसे जख्म के निशान थे.

इसी तरह पुलिस ने कमरे की जांच में पाया कि सोफे को अपनी जगह से हटाया गया था. सिर पर लगे चोट से निकले खून के निशान को फर्श से साफ कर दिया गया था. अपराधी ने वैसा एक भी निशान नहीं छोड़ा था, जिस से उस की पहचान हो सके. घर का दरवाजा बंद होने का मतलब था कि अपराधी वारदात के बाद आराम से घर को बंद कर चला गया होगा. यानी अपराधी घर की बहुत सी जानकारियों से वाकिफ रहा होगा.

पुलिस ने जांच के सिलसिले में 37 वर्षीय किशोर शिंदे से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र में सतारा जिले के रहने वाले हैं. उन का पैतृक गांव सतारा जिले के कराड तहसील में है. उन की उसी जिले की सुप्रिया से 12 साल पहले शादी हुई थी. वे पिछले साल ही इस रेजीडेंसी के फ्लैट में रहने आए थे. उन्होंने हाल में ही इसे खरीदा था. इस से पहले भी किशोर इसी इलाके में एक कमरे के मकान में किराए पर रहते थे.

इसी के साथ किशोर ने यह भी बताया कि उन का इलाके में किसी के साथ कभी कोई मतभेद नहीं हुआ था. उन की पत्नी शिक्षित महिला थी. उन का स्वभाव काफी मिलनसार था. पासपड़ोस के लोगों के साथ अच्छे मधुर संबंध थे. किशोर को ड्यूटी से घर लौटते हुए अकसर देर हो जाती थी. घर का अधिकतर काम सुप्रिया ही संभालती थी.

पुलिस का ध्यान अपराधी के घर में घुसने की दिशा में जांच की ओर भी गया. कालोनी के परिसर में बिल्डिंग के पास लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवाई गई. इसी दरम्यान बिल्डिंग के ही एक व्यक्ति ने पुलिस को सुप्रिया के घर के बाहर एक जोड़ी चप्पलें देखने की बात भी बताई. उस का कहना था कि शिंदे परिवार के लोग अपनी चप्पलें हमेशा स्टैंड पर रखते रहे हैं. स्टैंड भी बरामदे में एक कोने में था. बरामदे के बाहर चप्पल होने का मतलब किसी बाहरी व्यक्ति का घर में आना था.

पुलिस के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी कि शिंदे के घर के बाहर एक से डेढ़ बजे के बीच जो चप्पलें देखी गई थीं, उस की पहचान की जाए. इस की जानकारी देने वाले व्यक्ति को तरहतरह के चप्पलों की तसवीरें दिखाई गईं. उस ने कुछ तसवीरें देख कर शिंदे के घर के बाहर पाए गई चप्पलों की पहचान कर ली. यह भी बताया कि ऐसी चप्पलें इस इलाके में एक व्यक्ति पहनता है.

इसी के साथ जांच कर रही पुलिस को ध्यान आया कि थाने में किशोर शिंदे के साथ सुप्रिया की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने आया युवक भी इसी तरह की चप्पलें पहने हुए था. शिंदे से उस युवक के बारे में जानकारी ली गई. वह शिंदे की बिल्डिंग से कुछ दूरी पर रहने वाला विशाल था. उस का शिंदे के घर पहले भी 2-3 बार आना हुआ था. उसे उसी वक्त पूछताछ के लिए थाने लाया गया.

युवक ने अपना नाम बताने से पहले बताया कि उसी ने तो शिंदे को पत्नी के लापता होने की शिकायत लिखवाने के लिए कहा था. पुलिस ने जब पूछा कि उसे कैसे पता था कि सुप्रिया लापता ही है? इस सवाल पर वह सकपका गया. उस के चेहरे के उड़ते रंग को देख कर पुलिस ने जबरदस्त डांट लगाई. उस का पूरा नामपता पूछा. तब युवक ने अपना नाम विशाल भाऊ भाट बताया. उस के बाद सुप्रिया हत्याकांड के बारे में उस ने जो चौंकाने वाली कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

दरअसल, 27 वर्षीय विशाल ठाणे जिले में मुरवाड़ी तहसील के घावसड़ी गांव का रहने वाला था. उस के मातापिता और भाईबहन गांव में ही रहते थे. ओम रेजीडेंसी के इलाके में ही वह किराए का कमरा ले कर रहता था. उस की नवी मुंबई में प्राइवेट नौकरी थी. उस की कई बुरी आदतों में मोहल्ले की लड़कियों और औरतों पर नजर गड़ाए रखना भी था. वह उन्हें कामुक निगाहों से निहारता रहता था. उन से संपर्क बनाने के मौके भी ढूंढने की कोशिश करता था.

उस ने पुलिस को बताया कि उस की नवी मुंबई में ही एक प्रेमिका भी थी, जो किसी दूसरे शहर की रहने वाली थी. बीते 3 माह से वह अपने घर चली गई थी, उस के बाद से वह नहीं लौटी थी. उसे याद कर विशाल की रातें तन्हाई में गुजरती थीं. उस की कल्पनाओं में खोया रहता था.

इन्हीं दिनों उस की निगाह सुप्रिया पर पड़ी थी. वह कई दिनों से उस की दैनिक गतिविधियों पर नजर गड़ाए हुए था. विशाल सुप्रिया से अकेले में मिलने को व्याकुल हो गया था. एक दिन विशाल को तब मौका मिल गया, जब वह एक मैगजीन की दुकान पर पुरानी सरिता और गृहशोभा पत्रिकाओं की मांग कर रही थी.

दुकानदार के पास उस समय वे पत्रिकाएं नहीं थीं. संयोग से विशाल भी वहीं था. विशाल ने झट कहा कि पुरानी मैगजीन की दुकान के बारे में वह जानता है. नवी मुंबई में जहां वह काम करता है, उस के पास ही है. सुप्रिया ने उस की बात पर विश्वास कर के सरिता और गृहशोभा के उन अंकों की लिस्ट उसे दे दी, जिन की उसे जरूरत थी और कहा कि इन में से जो भी मिल जाएं, वह ले आए. यह बात घटना के ठीक 2 दिन पहले की है.

विशाल 14 फरवरी, 2022 की दोपहर को किताबों का एक पैकेट ले कर सुप्रिया के घर आ गया. कालबेल की 3-4 आवाज सुन कर सुप्रिया ने दरवाजा खोला. वह अलसाई हुई थी. अपना दुपट्टा संभालती हुई उस ने पूछा, ‘‘आप?’’

बरामदे से बाहर विशाल खड़ा था. सुप्रिया चार कदम चलती हुई उस के पास आ गई.

‘‘यह लीजिए मैडम, आप की मैगजीन. सारी की सारी मिल गईं, जिन की आप को जरूरत थी,’’ विशाल ने हाथ में पकड़ा पैकेट सुप्रिया की ओर बढ़ा दिया.

‘‘थैंक्यू, आप मेरी वजह से कितने परेशान हुए.’’ विशाल के हाथ से पैकेट लेते हुए सुप्रिया बोली.

पैकेट ले कर अंदर जाने के लिए मुड़ते हुए विशाल से उस ने कहा, ‘‘आइए न, इस का पैसा भी तो देना होगा न.’’

विशाल बरामदे की सीढि़यां चढ़ कर अपनी चप्पलें उतार कर सुप्रिया के पीछे हो लिया. कुछ सेकेंड में सुप्रिया और विशाल हाल में थे. उन के हाल के गेट में आटोमेटिक लौक लगा हुआ था.

सुप्रिया ने विशाल को सोफे पर बैठने को कहा और उस के लिए पानी लाने चली गई. तुरंत ही पानी का गिलास भी ले आई. विशाल धीरेधीरे पानी पीने लगा और सुप्रिया मैगजीन का पैकेट खोलने लगी. पैकेट के खुलते ही सुप्रिया चौंक पड़ी. उस के हाथ से कुछ पत्रिकाएं नीचे जमीन पर गिर गईं. विशाल कुटिलता से बोला, ‘‘क्यों पसंद नहीं आईं? इस से भी अच्छी किताबें वहां मिलती हैं.’’

‘‘बदतमीज, निकल जा यहां से. तूने क्या समझ लिया, मैं यह लाने को बोली थी?’’ सुप्रिया चीखती हुई बोली.

विशाल सरिता और गृहशोभा के बजाय अश्लील मैगजींस लाया था. उसे देखते ही सुप्रिया नाराज हो गई थी.

‘‘ज्यादा सती सावित्री मत बनो. मैं सब जानता हूं, तुम जैसी सैक्स की भूखी औरतों के बारे में. नाटक करती हैं हरामजादी.’’ यह कहते हुए विशाल ने सुप्रिया का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया. इस तरह विशाल के बदले हुए तेवर और अचानक हुए हमले से सुप्रिया अनजान थी. वह उस के ऊपर गिर पड़ी. पास रखा कांच का गिलास जमीन पर गिर कर टूट गया. कुछ पानी भी फैल गया.

सुप्रिया विशाल को धकेलती हुई उठ खड़ी हुई. जमीन पर बिखरा कांच उस के पैर में चुभ गया. जिस से खून निकल आया. वह वहां से भाग कर दूसरे कमरे में जाने लगी. तब तक विशाल और भी सैक्स का उन्मादी बन  चुका था. वह सुप्रिया को फिर से दबोचने की कोशिश करने लगा, लेकिन वह उस की पकड़ से बचती रही. अंतत: उस की गरदन विशाल की पकड़ में आ गई.

विशाल ने सुप्रिया को काबू में लाने के लिए नायलोन की रस्सी उस के गले में फंसा दी. वह रस्सी अपनी जेब में रख कर लाया था. गले में फंसी रस्सी दोनों हाथों से कस दी, जिस से जल्द ही सुप्रिया बेजान हो गई और गिर पड़ी. उसी अवस्था में उस ने उस के शरीर के साथ छेड़छाड़ की. तब तक सुप्रिया की सांसें थम चुकी थीं. यह देख कर विशाल घबरा गया और आननफानन में अपने बचाव का रास्ता निकालने लगा.

उस ने पाया कि उस की सुप्रिया के साथ हाथापाई बैड कम सोफे पर हो रही थी. उस के दिमाग में आइडिया कौंध गया. उस ने तुरंत सोफे को खोला और सुप्रिया की लाश उस के अंदर ठूंस दी. सोफे को करीने से पहले की तरह लगा दिया, लेकिन वह भूल गया कि सोफा पहले दीवार से थोड़ा अलग था. जमीन पर गिरे पानी और सुप्रिया के कुछ खून को साफ करने के बाद गेट की चाबी ढूंढी. चाबी उसे किचन में फ्रिज के ऊपर रखी मिल गई.

इस तरह वारदात को अंजाम देने के बाद विशाल बड़े आराम से अपने कमरे पर चला आया. खुद को बचाने के लिए डोंबीवली थाने भी गया और किशोर शिंदे का हितैषी होने का ढोंग किया. लेकिन उस की ही चप्पलों ने उस के अपराध की चुगली कर दी.

आरोपी विशाल भाऊ भाट से विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से जेल भेज दिया गया.

 

सनकियों की साजिश : हत्या की अनोखी कहानी

ब्रिटेन के पूर्वी क्षेत्र लिंकनशायर स्थित उपनगरीय इलाके स्पालडिंग में एक पौश कालोनी है डा. वसन एवेन्यू. इसी कालोनी में स्थित एक 2 मंजिले मकान से 15 अप्रैल, 2016 की दोपहर को मांबेटी की खून से लथपथ लाशें मिलने से कालोनी में सनसनी फैल गई थी. लोगों को इस बात पर हैरानी हो रही थी कि किस ने मांबेटी की हत्या कर दी?

उन्हें तब और हैरानी हुई, जब पुलिस ने मकान से एक किशोर प्रेमी जोड़े को हिरासत में लिया. पुलिस को पड़ोसियों से पूछताछ में पता चला कि मरने वाली महिला 49 वर्षीया एलिजाबेथ एडवर्ट उर्फ लिज और उन की 13 साल की बेटी केटी थी, जो एक स्कूल में खाना परोसती थी. मांबेटी इस मकान में लंबे समय से रह रही थीं.

लिज के पति पीटर एडवर्ट उस से अलग रहते थे. उन की विवाहिता बड़ी बेटी मैरी काट्टिंघम भी दूसरे इलाके में अपने परिवार के साथ रहती थी. 15 अप्रैल, 2016 को जब पुलिस उस 2 मंजिला मकान का दरवाजा तोड़ कर अंदर दाखिल हुई तो निचले तल पर एक किशोर जोड़ा गद्दे पर आराम फरमाते मिला. पुलिस ने उस से पूछा, ‘‘एलिजाबेथ कहां है?’’

लड़के के साथ मौजूद लड़की ने बगैर किसी हड़बड़ाहट और डर के हाथ से सीढि़यों की तरफ इशारा करते हुए धीमे से कहा, ‘‘ऊपर.’’

पुलिस ने लड़के से पूछा, ‘‘उन के साथ क्या हुआ है?’’

लड़के ने भी लड़की की तरह शांत भाव से कहा, ‘‘ऊपर जा कर देख क्यों नहीं लेते?’’

पुलिस को उन का व्यवहार कुछ अटपटा सा लगा. कुछ पुलिसकर्मी सीढि़यों के जरिए ऊपरी मंजिल पर पहुंचे तो वहां एलिजाबेथ उर्फ लिज और उन की बेटी केटी की लाश उन के कमरों में पड़ी मिलीं. लिज के शरीर पर तेजधार हथियार के गहरे निशान थे, जो गले के अतिरिक्त शरीर के दूसरे ऊपरी हिस्से पर भी थे. इसी तरह के जख्म केटी के भी शरीर पर थे. ऐसा लग रहा था, जैसे उन पर हत्यारे ने चाकू से ताबड़तोड़ वार किए हों.

पुलिस ने मकान में मौजूद लड़की और लड़के को हिरासत में ले लिया था. दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने मां बेटी की हत्या का अपराध आसानी से स्वीकार कर लिया था. वह पुलिस से इतने इत्मीनान से बात कर रहे थे, जैसे इन्होंने कोई अपराध किया ही न हो. उन्होंने अपने बारे में बताया कि उन का इरादा नींद की ज्यादा गोलियां खा कर आत्महत्या करने का था.

पुलिस ने उन के पास से एक डायरी बरामद की थी, जिस में उन्होंने एक स्यूसाइड नोट भी लिखा था. उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की थी कि खुदकुशी के बाद उन की लाशों को जला कर उस की राख उन के पसंदीदा जगहों पर बिखेर दी जाए. लिखे गए कुछ अन्य वाक्यों से लग रहा था कि उन्हें न तो जीवन से प्यार था और न ही भविष्य की कोई योजना थी. न जीने की तमन्ना थी और न ही कोई महत्त्वाकांक्षा. दोनों लाशों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया था कि उन की हत्या धारदार चाकू से गला रेत कर की गई थी.

पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले कर अदालत में उन के बयान कराए तो लड़के ने तो अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन लड़की हत्या में शामिल होने से इनकार कर रही थी. वारदात के समय उन की उम्र महज 14 साल थी. पुलिस के सामने लड़की की भूमिका काफी अस्पष्ट होने से तहकीकात करना एक चुनौती बन गई थी.

पुलिस को उन पर जघन्य हत्या का दोष लगाने के साथसाथ उन के नाबालिग होने का भी खयाल रखना था. उन के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन की पहचान भी पुलिस छिपा रही थी. जांच करने वाली टीम ने पाया था कि दोनों एक किस्म के मनोरोगी और जीवन से हताश प्रेमीयुगल थे. उन की हरकतें जितनी बचकानी थीं, उतने ही वे इस उम्र में ही सब कुछ हासिल करने की तमन्ना रखते थे.

इस मनोविज्ञान की गुत्थी के साथ दोहरे हत्याकांड को सुलझाने में जासूसी और फोरैंसिक जांचकर्ताओं की खास टीम के अतिरिक्त मनोचिकित्सक तक की मदद ली गई. पुलिस ने छानबीन में पाया कि लिज और आरोपी लड़की के बीव किसी बात को ले कर कोई पुराना विवाद चल रहा था.

उसी विवाद ने उस लड़की को इस कदर सनकी बना दिया था कि उस ने मांबेटी की हत्या की साजिश रच डाली. उस ने अपने साथ पढ़ने वाले प्रेमी को हत्या के लिए राजी कर लिया. इस संबंध में कुल 12 विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों में 7 पुरुष और 5 महिलाओं द्वारा जुटाए गए तथ्यों और तर्कों की मदद से मामले की तह तक पहुंचना संभव हो सका था.

पुलिस की प्राथमिक रिपोर्ट और अदालत में दिए गए उन के बयानों के आधार पर लड़के को 8 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में ले कर ट्रायल पर भेज दिया गया था. बाद में पूरी तहकीकात की जिम्मेदारी मुख्य जांचकर्ता इंसपेक्टर मार्टिन हैल्वे को सौंप दी गई थी. जांच जब आगे बढ़ी तो नाबालिग लडकी को भी आरोपी बना दिया गया. इस के बाद लड़की के बयान के आधार पर हत्याओं की गुत्थी परतदरपरत उधड़ने लगी. यह जान कर सभी को हैरानी हुई कि हत्याएं बहुत ही साधारण अपमान का बदला लेने के लिए की गई थीं. इस से पहले हम उन परिस्थितियों पर गौर करना चाहेंगे, जिन की वजह से हत्यारा लडका और उस की प्रेमिका कू्रर बनी.

बात सितंबर, 2013 की है. हायर सैकेंडरी स्कूल की एक 12 वर्षीया छात्रा एक दिन अपनी कक्षा में काफी आक्रामक थी. उस ने स्कूल के अनुशासन को नजरअंदाज करते हुए आक्रोश में एक कुरसी इस कदर धकेली कि उस से एक सहपाठी छात्र को जोर की टक्कर लग गई. इस से लड़का तमतमाया हुआ उस पर उबल पड़ा.

लड़की साथियों के बीच तमाशा बन गई. स्थिति को भांप कर उस ने झट से सौरी बोल दिया. लड़का भी दूसरे सहपाठियों के समझानेबुझाने पर शांत हो गया. बात आईगई हो गई, लेकिन इस घटना ने दोनों के बीच आकर्षण के बीज अंकुरित कर दिए. बाद में उन के बीच दोस्ती हो गई, जो जल्द ही एकदूसरे पर अथाह विश्वास करने वाली गहराई तक पहुंच गई.

इसी बीच वे एकदूसरे से प्रेम करने लगे, जिस का अहसास उन्हें जल्द हो गया. वे साथसाथ घूमनेफिरने लगे. हालांकि लड़का जितना गंभीर और शांत स्वभाव का था, लड़की उतनी ही चुलबुली और अपनी मनमर्जी की मालकिन थी. अपनी बातें मनवाना और इच्छा पूरी करना वह भलीभांति जानती थी. आगे बढ़े कदम को पीछे हटाना तो जैसे उस ने सीखा ही नहीं था. यही कारण था कि जल्द ही उस ने लड़के को अपने रंग में रंग लिया. उन के बीच प्रेम पनपा तो वे पढ़ाई के प्रति असहज और लापरवाह हो गए. स्कूल परिसर में उन की अनुशासनहीनता की कई शिकायतें आईं. जिस ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की, वे उस से उलझ पडे़. लड़का भी अपनी प्रेमिका के प्रभाव में आ कर आक्रामक तेवर वाला बन गया.

यही वजह थी कि एक दिन लड़का अनियंत्रित हिंसक प्रवृत्ति दिखाने और अनुशासनहीनता के आरोप में स्कूल से निकाल दिया गया. यह बात लड़की के दिल में चुभ गई, क्योंकि उसे लड़के से मिलनेजुलने में परेशानी होने लगी थी. लड़की 6 साल की उम्र से ही अपने परिवार के लिए सिरदर्द बनी रहती थी. तब उस के असामान्य व्यवहार को देखते हुए उस का मनोचिकित्सक से इलाज भी कराया गया था. डाक्टर ने उस की अच्छी देखभाल की सलाह दी थी.

हत्याकांड की घटना से ठीक एक साल पहले भी उसे मानसिक उपचार के लिए स्थानीय मानसिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र में भरती कराया गया था. कुछ महीने तक उस का उपचार चला. उस में सुधार होने के बावजूद मनोचिकित्सक ने उस की मनोस्थिति के स्तर को 10 में से 2 अंक दे कर चिंता का विषय बताया था. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उस की अच्छी देखभाल और विशेषज्ञ की मदद लेने की सलाह दी गई. उस के पिता वेल्डर थे. वह ड्रग लेता था और इस कारण वह पत्नी और 2 साल की बेटी को छोड़ कर कहीं चला गया था. बड़ी होने पर वही लड़की अकेलेपन की भावना से भर गई थी, जिस से उस में आक्रामक तेवर आ गए थे.

लड़के की परवरिश भी असामान्य तरीके से हुई थी और उस का बचपन काफी अशांत किस्म का था. उस की मां की आकस्मिक मौत हो गई थी. तब वह मात्र 5 साल का था और उस ने अपने पिता को घर में रहते हुए शायद ही कभी भरी नजरों से देखा हो. उस के पिता हमेशा काम के सिलसिले में यात्राओं पर रहते थे, जिस से उस का बचपन भी एकाकीपन में गुजरा था. अदालत में केस चला तो वकीलों ने भी इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि के 2 मुख्य कारणों की ओर संकेत किए.

पहले कारण में सामाजिक और पारिवारिक संस्कार के साथ मानवीयता को पोषित करने वाले मनोवैज्ञानिक विकास की समस्या को रेखांकित किया. जबकि दूसरा कारण नाबालिग लड़की के मन में गहराई तक बैठ चुकी डिनर लेडी लिज के साथ पुराने विवाद से संबंधित था.

पूछताछ में आरोपी लड़की ने बताया था कि एक बार उस की लिज के साथ जबरदस्त बहस हो गई थी. लड़की का व्यवहार और स्कूल में अनुशासनहीनता लिज को पसंद नहीं थी. उस ने उसे कड़ी फटकार लगाई थी. तभी लड़की ने खुद को बेहद अपमानित महसूस किया था और उस ने लिज से हर कीमत पर बदला लेने की ठान ली थी.

जांच और हत्यारे द्वारा अदालत में दिए गए बयान के मुताबिक प्रेमी युगल ने हत्या की योजना मैकडोनाल्ड के एक आउटलेट में बैठ कर 11 अप्रैल, 2016 को बनाई थी. उसी दिन उन्होंने हत्या के बाद खुदकुशी करने की शपथ भी ली थी. योजना को अंजाम देने के लिए दोनों 13 अप्रैल की रात को लिज के घर के एक अलग हिस्से में चोर की भांति जा घुसे थे.

लड़के ने पीठ पर टांगने वाले बैग में एक टीशर्ट में लपेट कर तेज धार के 4 चाकू रख लिए थे. उन में 8 इंच के 2 चाकुओं में काला हत्था लगा था, जबकि 2 मध्यम आकार के चाकू थे. लड़की ने बताया था कि उस का प्रेमी जब लिज की हत्या को अंजाम दे रहा था, तब अपने बचाव के लिए वह काफी संघर्ष कर रही थी. वह शोर मचा रही थी.

लड़के ने उस की आवाज को रोकने के लिए चाकू से गले की नली काट दी ताकि दूसरे कमरे में सो रही उस की बेटी तक उस की आवाज न पहुंचे. लिज की हत्या करने के बाद उन्होंने उस की बेटी केटी को भी मौत की नींद सुला दिया था. विशेषज्ञों ने इसे उस की अपरिपक्व मानसिकता और मन में दबे आक्रोश को दर्शाने वाला मनोविज्ञान बताया था.

उस के बारे में जांच करने वालों ने पाया था कि उसे बचपन से ही किसी भी तरह की रोकटोक पसंद नहीं थी. वह हमेशा अपनी मनमरजी की मालकिन बनी रहना चाहती थी. वह लिज से बदला लेना चाहती थी. इस के लिए उस ने अपने सहपाठी को उकसाया. जांच के बाद लड़की भी हत्या की आरोपी करार दे दी गई थी. जबकि पक्ष के वकीलों द्वारा उसे विक्षिप्त और सनकी साबित करने की भी कोशिश की गई थी.

इस के बावजूद फोरैंसिक मनोचिकित्सक के एक सलाहकार डा. फिलिप जोसेफ ने अदालत में तर्क दिया था कि उस के दावे के मुताबिक वे मानसिक विकार से पीडि़त नहीं थे. अगर वे अपने मन में जहरीले रिश्ते, भावना और विचार नहीं रखते तो बहुत संभव था कि ये हत्याएं नहीं होतीं. पर कुटिल मन वाले 2 व्यक्ति एक साथ होते हैं, तब ऐसी घटनाओं को बढ़ावा मिलता है.

अदालत ने विभिन्न बयानों के आधार पर पाया था कि लड़की और लड़का सितंबर, 2013 से गाहेबगाहे मिलतेजुलते रहे, लेकिन मई 2015 तक उन के संबंधों में मधुरता नहीं बन पाई थी. इस दौरान वे बातबात पर उलझते भी रहते थे, जो एक तरह से नाबालिगों में होता है. उन के व्यवहार में हमेशा आक्रोश बना रहता था. लड़की ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा था कि उसी ने लड़के को हत्या के लिए प्रेरित किया था.

उस ने यह भी माना था कि लड़के के साथ उस ने केवल एक बार यौनसंबंध बनाया था, वह भी हत्या के बाद. उस का कहना था कि हत्या की रात वह उस से बहुत प्रभावित हुई थी, क्योंकि उस ने उस की इच्छा पूरी कर दी थी. न्यायाधीशों की बेंच ने पाया था कि दोनों के संबंधों में एकदूसरे के प्रति विश्वास की भावना नवंबर, 2015 से मार्च 2016 के बीच पनपी थी.

यह भी स्पष्ट हुआ था कि हत्या में उस की भूमिका पूरी तरह से बदले की भावना से ग्रसित थी. तमाम गवाहों के बयान, तहकीकात के सभी जांच बिंदुओं, तर्कों, तथ्यों और आरोपियों के बयानों के आधार पर 18 अक्तूबर, 2016 को नाटिंघम क्राउन कोर्ट में ढाई घंटे तक लंबी बहस चली. कोर्ट में न्यायाधीशों की बेंच द्वारा इसे बहुत ही असाधारण मामला बताया गया.

न्यायाधीश जस्टिस हड्डन ने प्रेमी युगल को हत्या का दोषी ठहराते हुए उन्हें आजीवन कैद की सजा सुनाई थी. वे 9 नवंबर, 2016 को 20 साल के लिए जेल भेज दिए गए. फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस मामले में कई पहलू एकदूसरे से अलग थे और यह असाधारण ढंग से एक सुनियोजित साजिश के तहत की गई हत्या थी. दोनों हत्यारे सजा के वक्त भले ही नाबालिग थे, लेकिन जब वे जेल से छूटेंगे, तब उन की उम्र 35 साल हो जाएगी.