
पूछताछ और जांच में जो फरजी 3 हजार कंपनियां पता चली हैं, उन में 800 ऐसी कंपनियों के बारे में जानकारी मिली है, जिन्हें किन्हीं कारणों से अभी तक जीएसटी नंबर नहीं मिल पाया है. जिन फरजी कंपनियों की जानकारी मिली है, वह देश के अलगअलग पतों पर बनाई गई थीं.
इस मामले को ले कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने वित्त मंत्रालय दिल्ली में बैठक की. मुख्यमंत्री ने पुलिस, एसटीएफ, जीएसटी, इंटेलिजेंस के बड़े अधिकारियों के साथ बैठक कर जांच में तेजी लाने और आरोपियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने को कहा. दिल्ली में हुई बैठक में केंद्रीय जीएसटी समेत अन्य एजेंसियों के अधिकारी भी शामिल हुए थे.
टेरर फंडिंग और हवाला ऐंगल से जांच
फरजी कागजों के सहारे असली जीएसटी नंबर ले कर कंपनी बनाने वाले मामले में पुलिस व एजेंसियों की जांच टेरर फंडिंग और हवाला के ऐंगल से भी की जा रही है. आशंका जाहिर की जा रही है कि इस में कई कारोबारियों सहित अन्य लोगों की भी संलिप्तता है. फरजी कंपनियों के जरिए काले धन को सफेद किया जा रहा था. टेरर फंडिंग और हवाला की जांच से जुड़ी हुई एजेंसी की मामले पर पैनी नजर है.
नोएडा सेक्टर-20 थाने की पुलिस ने पकड़े गए आरोपियों के कब्जे से अब तक 12 लाख 66 हजार रुपए नगद, 3,088 फरजी तैयार की गई जीएसटी फर्म की सूची, 32 मोबाइल फोन, 24 कंप्यूटर सिस्टम, 4 लैपटाप, 3 हार्ड डिस्क, 118 फरजी आधार कार्ड, 140 पैन कार्ड, फरजी बिल, 3 लग्जरी कारें बरामद की हैं.
पुलिस ने जीएसटी घोटालेबाज यासीन शेख और अश्विनी पांडेय, आकाश सैनी, विशाल, राजीव, अतुल सेंगर, दीपक मुरजानी और विनीता को गौतमबुद्ध नगर के सीजेएम कोर्ट में पेश कर 10 दिनों की पुलिस रिमांड पर लिया गया. सेंट्रल नोएडा के डीसीपी हरीश चंद्र अब यूपी एसटीएफ की नोएडा यूनिट के अधिकारियों के साथ इस घोटाले की जांच को आगे बढ़ा रही हैं.
उन के बाकी साथियों की तलाश की जा रही है और जीएसटी विभाग के साथ केंद्रीय एजेंसियां जांच में सहयोग कर रही हैं.
इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का खेल आखिर है क्या
इस खेल को एक उदाहरण के साथ समझाते हैं. मान लीजिए, एक व्यापारी रवि कुमार हैं. उन्होंने 100 रुपए का माल खरीदा, जिस पर उन्होंने 18 रुपए का जीएसटी पेमेंट दिखाया. अब आगे 150 रुपए में वही माल बेचा गया. जिस पर जीएसटी 27 रुपए होता है. लेकिन, 18 रुपए पहले ही पेमेंट कर चुका है. ऐसे में अब रवि कुमार को 9 रुपए ही जमा करने हैं. जबकि व्यापारी पिछले ट्रांजैक्शन के 18 रुपए का इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) अप्लाई कर के भुगतान लेगा.
कुछ इसी तरह से फरजी कंपनियों के लाखों के ट्रांजैक्शन दिखा कर जालसाज आईटीसी अप्लाई कर के पेमेंट लेते रहे. जीएसटी डिपार्टमेंट को धोखाधड़ी का पता इसलिए नहीं चला, क्योंकि इस चेन में कई कंपनी रहती थीं. सब से आखिरी की कंपनी डिफाल्टर दिखाई जाती थी. बस शेल कंपनियां बना कर उन के नाम से फरजी इनवायस बना कर सरकार से जीएसटी का इनपुट टैक्स क्रेडिट वसूल कर करोड़ों का नुकसान करने वाले इस गिरोह की यही थ्योरी थी.
चैक करें कि आप के पैन कार्ड पर तो नहीं चल रही कोई फरजी कंपनी
जब हम किसी आपूर्तिकर्ता या विक्रेता से कोई माल या सेवा लेते हैं तो उस की ओर से हमें एक जीएसटी बिल दिया जाता है. इस बिल में खरीदार और विक्रेता की पहचान, उत्पाद का नाम, विवरण, खरीदी गई वस्तुओं/सेवाओं की मात्रा/आपूर्तिकर्ता का विवरण, खरीद की तारीख, छूट आदि सहित सभी जानकारियां शामिल होती हैं. ये तो रही जीएसटी बिल की जानकारी. अब आप को बताते हैं कि नकली और असली जीएसटी बिल के बीच अंतर कैसे किया जा सकता है.
नकली जीएसटी बिल की पहचान करने के लिए आप को कुछ स्टेप्स फालो करने की जरूरत होगी. इस के लिए आप बिल पर लिखे इनवाइस नंबर, जीएसटीआईएन और एचएसएन/एसएसी कोड की मदद से बिल के असली या नकली होने की पहचान कर सकते हैं. नीचे दिए गए बिंदुओं से पता चल जाएगा कि ये असली है या फिर नहीं.
जीएसटी बिल पर लिखे 15 अंकों के जीएसटीआईएन नंबर को सरकार के जीएसटी पोर्टल पर चैक करें. सप्लायर के वैध नाम और पते का जीएसटी बिल से मिलान करें. ध्यान दें कि जीएसटी बिल पर लिखा गया इनवाइस नंबर किसी पुराने बिल से कौपी तो नहीं किया गया है. ये देखें कि जीएसटी बिल में कर राशि सहित सही चालान मूल्य का उल्लेख है या नहीं.
अगर आप को ऊपर सुझाए गए उपायों से पता लगता है कि क्रेता द्वारा दिया गया जीएसटी बिल नकली है तो इस की शिकायत करें. इस के लिए आप contact.gstcouncil@gov.in, gst.actionroom@gov.in, helpdesk@gst.gov.in, cbecmitra.helpdesk@icegate. gov.in पर मेल शेयर कर सकते हैं. इस के अलावा आप टोलफ्री नंबर 1800 12002, 011-23094160/61/62, 011-23094168169, 011-23762656, 0124-4688999 पर काल भी कर सकते हैं. वहीं आप सरकार के आधिकारिक ट्विटर हैंडल @askGST_GoI/@cbic_india पर भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
यह जानना बेहद आसान है कि आप के नाम से कोई शेल कंपनी तो नहीं चल रही है और वो किसी तरह का जीएसटी स्कैम तो नहीं कर रही है. इस के लिए आप को services.gst.gov.in वेबसाइट पर जा कर अपने पैन कार्ड संबंधी जानकारी भरनी होगी, जिस से पता चल जाएगा कि आप के पैन कार्ड के आधार पर कोई कंपनी बनी है या नहीं.
जिन लोगों को शक है कि उन के पैन कार्ड का गलत इस्तेमाल हुआ है तो वे जीएसटी की वेबसाइट पर जा कर अपने पैनकार्ड की डिटेल्स को डाल कर पता कर सकते हैं कि उन के नाम से कोई फर्म या कंपनी देश के किसी हिस्से में पंजीकृत तो नहीं है.
—शक्ति मोहन अवस्थी (एडिशनल डीसीपी, नोएडा)
इस टीम का दूसरा प्रमुख सदस्य है मोहम्मद यासीन शेख. संदीप मुरजानी प्रथम टीम का अहम किरदार था. यासीन शेख फर्म रजिस्टर्ड कराने की टेक्नोलौजी और उस फर्म का जीएसटी बनाने की प्रक्रिया का विशेषज्ञ है. यह पहले मुंबई में वेबसाइट तैयार करने का काम करता था. यह अपने साथ कुछ युवकों को रखता था, जिन्हें समयसमय पर ट्रेनिंग देता था. इस के द्वारा जस्ट डायल के माध्यम से डेटा ले कर फरजी तरीके से फर्म बनाई जाती थी.
इसी गिरोह में गिरफ्तार हुआ विशाल भी प्रथम टीम का प्रमुख सदस्य था. यह अनपढ़ एवं नशा करने वाले लोगों को रुपयों का लालच दे कर एवं भ्रमित कर अपने फरजी नंबरों को आधार कार्ड में अपडेट कराने का कार्य करता है.
आकाश भी पहली टीम का प्रमुख सदस्य था. यह अशिक्षित एवं नशा करने वाले लोगों को रुपयों का लालच दे कर एवं भ्रमित कर अपने फरजी नंबरों को आधार कार्ड में अपडेट कराने का काम करता है.
राजीव पहली टीम का ऐसा सदस्य था, जो बिना माल के आदानप्रदान किए ही अपने सहयोगी अतुल सेंगर के साथ औन डिमांड फरजी बिल तैयार करता और विक्रय करता था. अतुल सेंगर राजीव के कहने पर ही फरजी बिल तैयार करने का काम करता था.
अश्विनी पांडेय टीम के नंबर 2 सदस्य मोहम्मद यासीन शेख के संपर्क में रह कर फरजी फर्म के लिए फरजी बैंक अकाउंट खुलवाता था. वह एक खाता खुलवाने का 10 हजार रुपया लेता है.
विनीता मुरजानी पेशे से सीए थी और पहली टीम के लीडर और इस स्कैम के मास्टरमाइंड दीपक मुरजानी की पत्नी है. वह पहली टीम द्वारा तैयार की गई फरजी फर्म जीएसटी नंबर सहित को बेचने वाली टीम के द्वारा संचालित फरजी फर्म में, फरजी बिलों को लगा कर जीएसटी रिफंड (आईटीसी इनपुट टैक्स क्रेडिट) से होने वाली इनकम का लेखाजोखा रखती थी और टीम के सदस्यों का उन का कमीशन व खर्चे आदि के प्रबंधन का काम करती थी.
रिक्शे और ठेले वालों के नाम पर फरजी कंपनियां
अब जानते हैं कि ये पूरा गिरोह कैसे इस स्कैम को अंजाम देता था. पूरा गिरोह दिल्ली के मधु विहार, शाहदरा और पीतमपुरा से औफिस संचालित करता रहा था. हांलांकि इन के और भी कई औफिस होने की बात कही जा रही है, जिस का खुलासा जल्द होने की उम्मीद है. ये गिरोह 2 टीमों में काम करता था. पहली टीम के सदस्यों का काम अनपढ़ व कम जागरूक लोगों के पैन कार्ड और आधार कार्ड हासिल करना होता था.
पहले वे जस्ट डायल के माध्यम से डेटा कलेक्ट करते थे. इस के अलावा बाजार में कई ऐसी फर्म भी हैं जो अवैध तरीके से डाटा बेचने का काम करती हैं. इन कंपनियों से भी डाटा खरीदा गया. फिर टीम के सदस्य ऐसे लोगों की तलाश करते थे, जिन के पैन कार्ड और आधार कार्ड का इस्तेमाल कर फरजी कंपनी बनाई जा सके. इस के लिए वे कालोनियों में ऐसे बेरोजगार व नशेड़ी लोगों को फंसाते थे. जो उन्हें रेंट एग्रीमेंट और बिजली के बिल दे सकें. खरीदे गए डाटा के पैन व आधार का इस्तेमाल कर के एक कागजी कंपनी बना ली जाती.
फरजी कंपनी बनाते समय रेंट एग्रीमेंट, आधार आदि का इस्तेमाल किया जाता. जिन लोगों से रेंट एग्रीमेंट खरीदे जाते, उन के नाम पर नया सिम कार्ड भी ले लिया जाता था, ताकि उन के मोबाइल पर ओटीपी आए तो उसे ले कर हर जगह दर्ज करने में परेशानी न हो.
आधार कार्ड, पैन कार्ड, रेंट एग्रीमेंट, इलेक्ट्रिसिटी बिल आदि का उपयोग कर जीएसटी नंबर सहित फरजी फर्म (कंपनी) तैयार कर हो जाती थी. उस के बाद बैंक अकाउंट से ले कर ठगी के लिए जरूरी सभी कागजात भी तैयार कर लिए जाते थे. यह सब काम गिरोह के लोगों के बीच बंटा हुआ था.
अब दूसरी टीम फरजी कंपनी की पहली टीम से खरीद करती थी. कंपनियों को 3 से 4 लाख रुपए नकद में खरीदा जाता था. फिर फरजी बिल का उपयोग कर जीएसटी रिफंड (आईटीसी इनपुट टैक्स क्रेडिट) के रूप में सरकार से करोड़ों रुपए प्राप्त कर लिए जाते थे. इस तरह हर कंपनी के लिए हर महीने 2-3 करोड़ रुपए का ई-बिल जेनरेट करते थे.
15 महीने यूज करते थे फरजी कंपनी को
ये गिरोह फरजी कंपनी बनाने और इस के जरिए क्रेडिट इनपुट ले कर सरकार को चूना लगाने में कितना एक्सपर्ट थे, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गिरोह के सरगना दीपक मुरजानी और उस की पत्नी विनीता ने यासीन शेख के साथ ठगी का संगठित गिरोह बना कर पिछले साल पहली कंपनी जून, 2022 में रजिस्टर्ड कराई थी.
इस के बाद महज 11 महीने के भीतर तीनों ने करीब 3 हजार कंपनियां कागजों में खड़ी कर दीं. यासीन ने अपने ड्राइवर और नौकर को भी कईकई कंपनियों का मालिक बना दिया. इस गिरोह में 50 से 100 लोगों के शामिल होने की आशंका है. खास बात यह है कि दीपक, विनीता और यासीन को छोड़ कर कम ही लोग ऐसे थे जो एकदूसरे को जानते थे.
पुलिस ने जब शुरुआती जांच की थी तो एम.एस. ट्रेडर्स, अरोरा इंटरप्राइजेज, डी.के. ट्रेडर्स, एम.एम. इंटरप्राइजेज, कोरिया इंटरप्राइजेज, रतन ट्रेडर्स, मनोज ट्रेडर्स, विपुल ट्रेडर्स, पटेल ट्रेडर्स और अर्चना ट्रेडर्स नाम की फर्मों की जांच की गई थी. ज्यादातर कंपनियां कपड़े के इंपोर्ट, एक्सपोर्ट, लोहे के सामान, खिलौने, तेल, चिप्स, अचार और प्लास्टिक का सामान बनाने के लिए पंजीकृत की गई थीं. लेकिन जांच में कहीं भी कोई कंपनी धरातल पर नहीं मिली थी.
इसीलिए पुलिस को शक हुआ और कडिय़ों से कडियां जोड़ते हुए पुलिस पूरी स्कैम की जड़ तक पहुंच गई. पूछताछ में खुलासा हुआ कि आरोपी एक कंपनी से एक महीने में 10 से 20 करोड़ रुपए की फरजी बिलिंग दिखा रहे थे. 25 कंपनियों में एक महीने के अंदर 50 करोड़ की जीएसटी बिलिंग दिखाई गई.
इस के अलावा गिरोह के लोग फरजी कंपनियों को महज 15 महीने तक ही ठगी के लिए इस्तेमाल करते थे. इन कंपनियों का पता ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से तैयार होता था. आरोपी किराने की दुकान चलाने वाले और आढ़ती तक को उन की मांग पर फरजी जीएसटी बिल दे रहे थे. इस से वे टैक्स अधिकारियों से बच जाते थे.
जांच में सामने आया है कि दीपक मुरजानी ने अपनी सीए पत्नी विनीता के दिमाग की उपज से खड़े किए इस ठगी के साम्राज्य के लिए इस साल के अंत तक 4 हजार शेल कंपनियां रजिस्टर्ड कराने का लक्ष्य बनाया हुआ था. ज्यादातर फर्म और कंपनी 3 से साढ़े 4 लाख रुपए के बीच में बेची गईं. फरजी कंपनियों में जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया.
3 हजार फरजी कंपनियों से 15 हजार करोड़ का चूना
पुलिस की गिरफ्त में आए जालसाजों ने फरजी फर्म बना कर जीएसटी रिफंड आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) प्राप्त कर सरकार को अब तक करीब 15 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाया. उस में जांच के आधार पर पुलिस आंछित गोयल, प्रदीप गोयल, अर्चित, मयूर उफ मणि नागपाल, चारू नागपाल, रोहित नागपाल, दीपक सिंघल व अन्य की तलाश कर रही है.
नोएडा पुलिस की 4 टीमें प्रकाश में आए लोगों के अलावा अज्ञात आरोपियों को पकडऩे के लिए देश के अलगअलग हिस्से में दबिश दे रही हैं.
15 हजार करोड़ के जीएसटी घोटाले की जांच के दौरान पुलिस को ऐसे कई लोग मिल रहे हैं कि उन के पैन कार्ड का गलत इस्तेमाल किया गया. उत्तराखंड के एक पीडि़त के पैन कार्ड का गलत इस्तेमाल कर खोली गई कंपनी से तो 150 करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन कर लिया है. इस का पता तब चला, जब एक काल में व्यक्ति ने बताया कि जीएसटी नोटिस मिलने के बाद उन्हें इस की जानकारी हुई.
हैरानी की बात है कि ठेली वाले से ले कर इंजीनियर और डाक्टर जैसे पेशे से जुड़े लोगों के नाम से फरजी कंपनियां खोली गई थीं और उन्हें इस की भनक तक नहीं थी.
बात 10 मई, 2023 की है. गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी अपने औफिस में बैठे एक फाइल को देख रहे थे, तभी उन के कमरे में पत्रकार संदीप कुमार पहुंचे. वह नोएडा फिल्म सिटी सेक्टर-10 में स्थित एक मीडिया संस्थान से जुड़े थे. पत्रकार को देखते ही उन्होंने अपने सामने रखी फाइल को एक तरफ सरका कर मुसकराते हुए कहा, “आइए संदीपजी.”
उन से हाथ मिलाने के बाद संदीप कुमार कुरसी पर बैठ गए तो एडिशनल डीसीपी बोले, “क्या लेंगे चाय या कौफी और आज हमारी कैसे याद आ गई?”
“बस सर, एक गिलास पानी पिलवा दीजिए. एक मुसीबत में पड़ गया हूं इसीलिए आप की मदद लेने के लिए आना पड़ा.”
“ऐसी क्या प्राब्लम आ गई संदीपजी, आप लोग तो दूसरों की मदद करते हो. ऐसी कौन सी परेशानी है, जिस के लिए हमारी मदद की जरूरत पड़ गई.” एडीसीपी शक्ति मोहन ने कहा.
“सर, प्राब्लम तो बहुत छोटी सी थी, लेकिन अब बड़ी हो गई है…”
संदीप कुमार ने एडिशनल डीसीपी से मुलाकात कर के जो कुछ बताया, उसे सुन कर अवस्थी के कान खड़े हो गए. उन्होंने उसी वक्त सेक्टर-20 थाने के एसएचओ मनोज कुमार सिंह को फोन कर के कुछ दिशानिर्देश दिए और इस मामले की जांच के लिए विशेष टीम गठित करने का आदेश दिया.
दरअसल ये मामला ही ऐसा था. संदीप कुमार का पैन कार्ड कुछ समय पहले कहीं गिर गया था. इस मामले में उन्होंने पैन कार्ड गुम होने की रिपोर्ट दर्ज कर डुप्लीकेट कार्ड तो बनवा लिया, लेकिन इस दौरान उन्हें पता चला कि उन के पैन कार्ड का इस्तेमाल कर 2 फरजी कंपनियां चलाई जा रही हैं.
एक कंपनी पंजाब के लुधियाना में और दूसरी महाराष्ट्र के सोलापुर में चलाई जा रही है. उन के पास कोई ऐसी अथौरिटी तो थी नहीं कि वे आगे की जांच कर पाते कि वे कंपनियां किस की हैं और उन में क्या चल रहा है. लिहाजा उन्होंने इसी की शिकायत के लिए एडीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी से मदद मांगी थी.
टीमों में बंटे हुए थे घोटालेबाज
एडीसीपी के निर्देश पर थाना सेक्टर-20 में शिकायत कर के मामले की जांचपड़ताल शुरू कर दी गई. एसीपी (नोएडा सेंट्रल) रजनीश वर्मा की निगरानी में नोएडा सेक्टर-20 थाने के एसएचओ मनोज कुमार सिंह ने साइबर एक्सपर्ट के साथ आर्थिक और जालसाजी से जुड़े अपराधों की जांच में महारथ हासिल करने वाले पुलिसकर्मियों की टीम तैयार की.
इस टीम ने अपने काम की शुरुआत की रजिस्ट्रार औफ कंपनीज के डाटा खंगालने से. सब से पहले उन 2 कंपनियों का डाटा हासिल किया गया, जो संदीप सिंह के पैन कार्ड पर बनी थी और लुधियाना व सोलापुर में थी. पुलिस की एक टीम इन दोनों पतों पर पहुंची तो जानकारी मिली कि इन दोनों पतों पर कोई कंपनी या उस का दफ्तर ही नहीं है.
इस जानकारी के सामने आते ही पुलिस के कान खडे हो गए और इन कंपनियों का पूरा डाटा, आर्थिक लेनदेन की जानकारी बैंकों और संबंधित विभागों से निकाली गई. जल्द ही पुलिस के सामने वे नाम और बैंक खाते भी आ गए, जिन में इन दोनों कंपनियों के नाम से कागजी लेनदेन तो हो रहे थे, मगर इस कंपनी को चलाने वाले और उन के द्वारा संचालित किए जा रहे बैंक खातों को खंगाला गया तो धीरेधीरे कडिय़ां जुडऩी शुरू हो गईं.
करीब 20 दिनों तक पुलिस की कई टीमें अलगअलग विभागों से दस्तावेज हासिल कर जांच को आगे बढ़ाती रहीं. पुलिस के पास इस दौरान इतनी जानकारी एकत्र हो चुकी थी कि अब आगे बढऩे से पहले उन लोगों को दबोचना जरूरी था, जिन का चेहरा इस गोरखधंधे में सामने आ चुका था. एसएचओ मनोज कुमार सिंह और एसीपी रमेश चंद्र पांडे ने एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन और डीसीपी हरीश चंद्र को यह बात बताई.
डीसीपी हरीश चंद्र के सामने जो जानकारी थी, वो ऐसी थी कि उस पर पुलिस एक्शन की शुरुआत तो कर सकते थी, लेकिन उस की जांच को मुकाम पर पहुंचाने के लिए न जाने कितने विभागों के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. लेकिन इस पूरे गोरखधंधे से मुंह भी तो नहीं फेरा जा सकता था. लिहाजा उन्होंने गौतमबुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट की मुखिया पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह के सामने पेश हो कर इस पूरे मामले की जानकारी दी.
पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह का नाम पुलिस के उन अधिकारियों में शुमार हैं, जो बड़े से बड़े कठोर फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं. पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को जैसे ही फरजी कंपनियों के इस रैकेट की जानकारी मिली उन्होंने सेंट्रल नोएडा जोन के डीसीपी हरीश चंद्र, एडीशनल डीसीपी शक्ति मोहन अवस्थी, एसीपी रजनीश वर्मा और एसएचओ सेक्टर-20 मनोज कुमार सिंह को अपने औफिस में बुला कर उन की ब्रीफिंग की. उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि कई टीमें बना कर इन सभी कंपनियों पर एक साथ काररवाई की जाए.
पुलिस आयुक्त की तरफ से हरी झंडी मिल चुकी थी सबूत पहले ही एकत्र हो चुके थे, टीमें तैयार होने में ज्यादा देर नहीं लगी.
डेढ़ दरजन टीमों ने की विभिन्न शहरों में छापेमारी
2 जून, 2023 नोएडा के सेक्टर-20 थाने से पुलिस की करीब डेढ़ दरजन पुलिस टीमें एक साथ नोएडा ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद व दिल्ली की अलगअलग लोकेशन के लिए निकलीं. पूरे एनसीआर में पुलिस की टीमों ने छापेमारी की. पुलिस ने कुल 8 लोगों को पकड़ा. जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उन में दिल्ली के रहने वाले दीपक मुरजानी और उस की सीए पत्नी विनीता मुरजानी सब से प्रमुख थे. इन के अलावा यासीन शेख दूसरा प्रमुख व्यक्ति था.
उस के अलावा 5 अन्य लोगों में साहिबाबाद के आकाश सैनी, हाथरस के अतुल सेंगर, नोएडा की अवनी, दिल्ली के ही विशाल और राजीव को दिल्ली के मधु विहार स्थित उन के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया. इन सभी लोगों के घर व औफिसों की तलाशी में जो भी दस्तावेज और बैंक के खातों की डिटेल मिली, उन्हें जब्त कर लिया गया.
पुलिस की जांचपड़ताल और पूछताछ के बाद देश में जीएसटी रिफंड के जरिए साइबर अपराध के एक ऐसे खेल का खुलासा हुआ, जिस से सरकार को अब तक 15 हजार करोड़ रुपए की चपत लगाई जा चुकी है. पुलिस ने इस से पहले कभी भी आर्थिक अपराध के ऐसे साइबर मामले का खुलासा नहीं किया था. पूछताछ में खुलासा हुआ कि 15 हजार करोड़ रुपए के इस महाघोटाले में शामिल करीब 3 हजार फरजी फर्म ‘कागजी’यानी शेल कंपनियां थीं. जो लोग पकड़े गए, उन से 6 लाख 35 हजार लोगों के पैन कार्ड का डाटा मिला था, जिस से ये कंपनी रजिस्टर्ड कराते थे.
फरजी कंपनी बना कर ये गिरोह सरकार को चूना लगाता था. फरजी बिल का उपयोग कर जीएसटी रिफंड आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) के रूप में सरकार से करोड़ों रुपए प्राप्त कर लिए जाते थे. इस तरह हर कंपनी के लिए हर महीने 2-3 करोड़ रुपए का ई-बिल जेनरेट करते थे. इस तरह इन लोगों ने पिछले डेढ़ साल में करीब 15 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाया.
नोएडा सेक्टर-20 थाना पुलिस ने पत्रकार संदीप कुमार की शिकायत पर आधारित मुकदमे को जालसाजी, साइबर अपराध, अमानत में खयानत, चोरी और ठगी की संगीन धाराओं में परिवर्तित कर सभी आरोपियों से कड़ी पूछताछ शुरू कर दी. जिस के बाद हैरान कर देने वाले एक घोटाले की कहानी सामने आई—
गैंग के सभी सदस्यों के बंटे हुए थे काम
जीएसटी रैकेट के इस गड़बड़ घोटाले की कहानी को पूरा समझने के लिए पहले उन किरदारों के बारे में जानना जरूरी है, जो इस घोटाले को अंजाम दे रहे थे. उन का क्या काम था और वे कैसे इस पूरे औपरेशन को अंजाम देते थे.
संदीप मुरजानी नाम का शख्स इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड है. यह गैंग को संचालित करता था. इस पूरे रैकेट को 2 टीमें मिल कर अंजाम देती थीं. संदीप मुरजानी पहली टीम का लीडर होता था. वह फरजी दस्तावेज, आधार कार्ड, पैन कार्ड, रेंट एग्रीमेंट, इलेक्ट्रिसिटी बिल आदि की व्यवस्था कर के उन से फरजी फर्म और जीएसटी नंबर तैयार कराता था.
तैयार की गई फरजी फर्म को बेचने के लिए क्लाइंट तलाश करने का काम दूसरी टीम करती थी. वह मोटी रकम ले कर फर्म बेच देता था. इन फर्मों में फरजी पैन कार्ड लिंक होते थे और उस पैन कार्ड से जीएसटी नंबर बनाए जाते थे.