Courtroom Murder. गवाहों के मुकर जाने पर एक बेरहम कातिल को भरी अदालत में होशियार पुलिस वालों के सामने ही जज आफाक अहमद ने मौत के घाट उतार कर सचमुच उस केस को यादगार बना दिया था.

अतिरिक्त जिला जज आफाक अहमद ने सामने बैठे डीएसपी खावर रंधावा पर गहरी नजर डाल कर कहा, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम्हारा आखिरी केस यादगार बन जाए, इसलिए खलील मंगी को कल जेल से अदालत लाने और फैसले के बाद हिफाजत से उस के घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपना चाहता हूं.’’

सामने बैठे डीएसपी खावर रंधावा ने पहलू बदलते हुए कहा, ‘‘इस में यादगार बनने वाली क्या बात है? यह तो मेरा फर्ज है, जिसे मैं और मेरे साथी बखूबी निभाएंगे.’’

जज आफाक अहमद और डीएसपी खावर रंधावा पुराने दोस्त तो थे ही, समधी बन जाने के बाद उन की यह दोस्ती रिश्तेदारी में भी बदल गई थी.

‘‘मैं ने मंगी को रिहा करने का फैसला कर लिया है.’’ आफाक अहमद ने यह बात कही तो डीएसपी रंधावा को झटका सा लगा. हैरानी से वह अपने बचपन के दोस्त का चेहरा देखते रह गए. जबकि वह एकदम निश्चिंत नजर आ रहे थे. जिस आदमी के बारे में मीडिया और कानून के जानकार ही नहीं, पूरे देश में मशहूर था कि उन्होंने आज तक किसी भी गुनहगार को नहीं छोड़ा, शायद उन्होंने जिंदगी का मकसद ही गुनाहगार को सजा देना बना लिया था, आज वही शख्स एक घिनौने और बेरहम अपराधी को छोड़ने की बात कर रहा था. उन्होंने कहा, ‘‘तुम उस घिनौने कातिल को छोड़ दोगे, जिस ने 15 साल की एक मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बना कर बेरहमी से मार डाला था. भई, मुझे तो यकीन नहीं हो रहा है कि तुम ऐसा काम करोगे. जिस आदमी की ईमानदारी और फर्ज अदायगी पर लोग आंख मूंद कर यकीन करते हों, वह भला ऐसा काम कैसे कर सकता है?’’

रंधावा की बातों में शिकायत थी. आफाक अहमद निराशा भरे अंदाज में अपना सिर कुरसी की पुश्त से टिकाते हुए धीरे से बोले, ‘‘जिस तरह मेरे आदेश पर तुम उस की हिफाजत करने के लिए मजबूर हो, उसी तरह कानूनी मजबूरियों की वजह से मैं भी उसे रिहा करने को मजबूर हूं.’’

रंधावा होंठ भींचे उन्हें देखते रहे तो आफाक अहमद ने आगे कहा, ‘‘तुम अदालती काररवाई के बारे में तो जानते ही हो. चश्मदीद गवाहों ने अपने बयान बदल दिए हैं, मैडिकल रिपोर्ट भी पैसे के बल पर बदलवा दी गई है, केवल घटना के आधार पर तो सजा नहीं दी जा सकती. फिर कोई मजबूत पक्ष भी नहीं है, इसलिए मुझे मजबूरन कल उसे रिहा करना होगा.’’

रंधावा के चेहरे पर निराशा के भाव साफ झलकने लगे. दोस्त वाकई बेबस था. मजबूत एफआईआर के साथ अगर गवाह अपने बयानों पर टिके रहते तो दुनिया की कोई भी ताकत खलील मंगी को फांसी पर चढ़ने से नहीं रोक सकती थी.

आफाक अहमद के कमरे में खामोशी छा गई. उस समय दीवार पर लगी आधा दरजन घडि़यों की टिकटिक की आवाज ही आ रही थी जो उन के कमरे की दीवारों पर चारों ओर लगी थीं. तरहतरह की नईपुरानी घडि़यों को जमा करना और उन्हें दीवारों पर लगाना आफाक अहमद का शौक था. रंधावा ने अचानक कहा, ‘‘फिर तो खलील के हाथों मारी गई दुआ के लिए दुआ ही की जा सकती है. उस का भाई शाद अली, जो कैप्टन था, अच्छा होगा वह अपने दावे में कामयाब हो जाए.’’

आफाक अहमद ने भी दुखी लहजे में कहा, ‘‘खुदा करे, वह अपने मकसद में कामयाब हो.’’

फौज में कैप्टन शाद अली ने 2 बार हिरासत के दौरान खलील मंगी पर कातिलाना हमला किया था. लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सका था. उस के बाद वह एकदम से गायब हो गया था.

इलेक्ट्रौनिक मीडिया के जरिए उस ने दावा किया था कि अगर खलील मंगी को अदालत से रिहा किया तो वह अदालत में जज के सामने ही उसे जान से मार देगा. इस तरह की बातों को उछालने में मीडिया को वैसे भी बड़ा मजा आता है. इसलिए न्यूज चैनलों ने इसे बारबार दिखा कर लोगों में एक अजीब तरह का एक्साइटमेंट पैदा कर दिया था. इसीलिए यह फैसला मीडिया, अवाम और कानून के लिए एक चुनौती बन गया था.

कमरे की सभी घडि़यों ने 9 बजने की घोषणा की तो तरहतरह के म्यूजिक ने कमरे के सन्नाटे को भंग कर दिया. चंद पलों के लिए आफाक अहमद ने अपनी आंखें बंद कर लीं. ये आवाजें उन्हें बड़ा सुकून देती थीं. आवाजों के बंद होने पर उन्होंने कहा, ‘‘दोस्त हमें अपना फर्ज अदा करना है और उस सिरफिरे कैप्टन से मंगी को बचाना है. अब देखना है कि आखिर कौन कामयाब होता है?’’

रंधावा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मेरी सारी दुआएं उस सिरफिरे कैप्टन के साथ हैं. खुदा करे वह अपने मकसद में कामयाब हो जाए. दिल तो चाहता है कि मैं ही उस की कोई मदद कर दूं. लेकिन अगले हफ्ते मैं खुद ही रिटायर हो रहा हूं. इसलिए अपने बेदाग कैरियर पर मैं कोई धब्बा नहीं लगने देना चाहता. इस इमेज को बनाने में मैं ने पूरी उम्र लगा दी है, अब उसे दांव पर नहीं लगा सकता. फिर भी दुआ तो कर ही सकता हूं कि शाद अली उस जालिम कातिल को बरी होने के बाद खत्म कर दे.’’

रंधावा के लहजे में नफरत साफ झलक रही थी.

आफाक अहमद ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘डीएसपी रंधावा, इसीलिए मैं ने तुम्हें इस काम के लिए चुना है, क्योंकि मुझे यकीन है कि यह मामला तुम्हारे लिए यादगार होगा.’’

डीएसपी रंधावा ने रात को ही अपने तेजतर्रार साथी इंसपेक्टर गुलाम भट्टी के साथ मिल कर अगले दिन की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी योजना बना डाली थी. अतिरिक्त पुलिस बल की भी व्यवस्था कर ली गई थी. खलील मंगी को बख्तरबंद गाड़ी से अदालत ले आने और ले जाने की व्यवस्था पहले से ही थी. सुरक्षा की पूरी योजना बना कर गुलाम भट्टी ने कहा, ‘‘सर, हम लोगों को अपना पूरा ध्यान अदालत के कमरे पर रखना होगा.’’

रंधावा ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘मुझे तो लगता है कि अदालत के कमरे में खलील मंगी को मौत के घाट उतारने वाली बात उस ने केवल हमें भटकाने के लिए कही है. कैप्टन अदालत के बाहर कहीं पर भी उस पर हमला कर सकता है.’’

‘‘फिर तो बख्तरबंद गाड़ी को हमें अदालत के अहाते के बजाय अदालत के कमरे तक ले जाना चाहिए.’’ गुलाम भ्टटी ने कहा.

अगले दिन खलील मंगी को बख्तरबंद गाड़ी से अदालत के कमरे तक लाया गया. और जज आफाक अहमद की मेज के दाईं तरफ बने मुल्जिमों के कटघरे में खड़ा किया गया. उस की आंखों में जीत की चमक साफ झलक रही थी. उसे पूरा यकीन था कि थोड़ी देर में उसे रिहा कर दिया जाएगा. उस ने ताजा शेव किया हुआ या और कौटन का सफेद सलवार कुरता पहने था.

खलील मंगी गहरे सांवले रंग का ऊंचापूरा सेहतमंद कसरती बदन का मालिक था. कहने को तो वह बिल्डर था, लेकिन असल में वह जमीन माफिया था. रोजाना शाम को वह एक आधुनिक ‘हेल्थ एंड फिटनेस’ क्लब में वर्जिश करने जाता था. उसी क्लब के एक हिस्से में महिलाएं भी वर्जिश करती थीं. दुआ अली भी इसी क्लब में वर्जिश के लिए आती थी, लंबीछरहरी, खूबसूरत, जवानी में कदम रख चुकी 15 साल की मासूम सी लड़की दुआ मंगी को पसंद आ गई.

मंगी ने उस से दोस्ती की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा. एक दिन पार्किंग में मंगी ने दुआ के कंधे पर हाथ रख दिया तो गुस्से में दुआ ने उसे एक थप्पड़ जड़ दिया. इस के बाद तो उस ने जबरदस्ती दुआ को बांहों में उठाया और अपनी गाड़ी में डाल कर भाग निकला. दुआ चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन उस की मदद के लिए कोई नहीं आया. अगले दिन दुआ का रौंदा बेजार शरीर शहर के मशहूर पार्क में पड़ा मिला. जिंदगी की डोर काटने से पहले उसे बड़ी ही बेरहमी से कई बार बेआबरू किया गया था.

दुआ को उठा कर कार में डालते हुए खलील मंगी को कई लोगों ने देखा था, इसलिए शकशुबहा की कोई गुंजाइश नहीं थी. दुआ का भाई शाद अली फौज में अफसर था इसलिए तुरंत काररवाई कर के मंगी को गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में मंगी ने रसूख व पैसे का जोर दिखाया, कुछ गवाह जान के खौफ से पीछे हट गए तो कुछ ने पैसे ले कर बयान बदल दिए यानी उन्हें खरीद लिया गया. पैसे के ही जोर पर मैडिकल रिपोर्ट भी बदलवा दी गई और अब वह जालिम कातिल किसी और दुआ के लिए बददुआ बनने के लिए रिहा हो कर आ रहा था.

जज आफाक अहमद आ कर अपनी सीट पर बैठ चुके थे. पेशकार ने पहले से ही टाइप की हुई फैसले की फाइल सामने रख दी थी. अदालत में दोनों ओर के वकीलों के अलावा बार काउंसिल के सदर कामरान पीरजादा, मीडिया के कुछ प्रतिनिधि, दुआ अली के कुछ रिश्तेदार, खलील मंगी का बड़ा भाई और सुरक्षा से जुड़े चंद लोगों के अलावा किसी अन्य को दाखिल होने की इजाजत नहीं थी.

अंदर आने वाले हर शख्स की बड़ी बारीकी से तलाशी ली गई थी. मीडिया वालों का हर सामान चेक किया गया था. बम डिस्पोजल स्क्वायड ने भी अदालत के कमरे को खूब अच्छी तरह से चैक किया गया था. डीएसपी रंधावा और इंसपेक्टर गुलाम भट्टी खुद भी काफी चौकन्ने थे.

दीवार पर लगी घड़ी ने 11 बजने की घोषणा की. जज आफाक अहमद ने मेज के सामने खड़े सफाई वकील को बैठने के लिए कह कर चश्मा ठीक किया. उस के बाद उन्होंने फैसला सुनाना शुरू किया, ‘‘हालात, वाकयात और गवाहों के बयानों से अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि खलील मंगी वल्द जलील मंगी बेगुनाह है.’’

यह फैसला नहीं, एक खंजर था, जिस ने दुआ के प्यारों की जान निकाल दी थी. उन की उम्मीदों का कत्ल कर दिया था. उन के चेहरों पर दुख और आंखों से आंसू उमड़ पड़े थे. जबकि मंगी के भाई का चेहरा खुशी से चमक उठा था.

दोनों भाइयों ने विजयी भाव से एक दूसरे को देखा. रंधावा और भट्टी की नजर वहां उपस्थित हर शख्स की हर हरकत पर थी. वह लम्हा आने ही वाला था, जिस का दावा किया गया था. वैसे तो हर तरफ सुकून था. उन्हें यकीन था कि कैप्टन शाद अली ने भटकाने के लिए वह दावा किया था. यकीनन वह वापसी पर मंगी पर हमला करेगा.

जज आफाक अहमद ने एक बार फिर चश्मे को ठीक किया. उस के बाद एक नजर मंगी पर डाल कर बोले, ‘‘इसी बुनियाद पर अदालत खलील मंगी वल्द जलील मंगी को बाइज्जत बरी करने का हुक्म देती है.’’

खलील मंगी ने खुशी से बेकाबू हो कर अपने दोनों हाथ ऊपर किए. उसी पल मीडिया वालों के कैमरे उस पर चमकने लगे. तभी वह अचानक लड़खड़ाया. बगल में खड़े सिपाही ने उस के मुंह से निकली सिसकारी सुनी. मंगी का एक हाथ सीने पर गया और उसी के साथ वह कटघरे की रेलिंग से टकराया. रेलिंग टूट गई और वह जज की मेज के सामने जा गिरा. पलभर के लिए जैसे सन्नाटा पसर गया. रंधावा ने हैरानी से पलकें झपकाईं. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह जो देख रहा है, वह हकीकत है या भ्रम हो रहा है.

एक साथ कई तरह की आवाजें गूंजी. लेकिन सब से अलग और तेज आवाज मंगी के भाई की थी. वह चीख कर अपने भाई की ओर दौड़ा. लेकिन इंसपेक्टर गुलाम भट्टी ने उसे बीच में ही पकड़ लिया, ‘‘खुद पर काबू रखो.’’

जज आफाक अहमद उठे और अदालत से लगे अपने चैंबर में चले गए. सुरक्षा में लगे लोग हरकत में आ गए. ऐंबुलैंस के लिए फोन किया जा चुका था. मंगी का भाई बेकाबू हो रहा था. उसे जबरदस्ती बाहर ले जाया गया. बाकी लोगों को उन की जगहों पर बैठा कर तलाशी ली जाने लगी.

दुआ के बूढ़े चाचा और बहनोई के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और सुकून था. उन के हाथ दुआ के लिए उठे हुए थे. वे दिल से खुद के शुक्रगुजार थे. मंगी का जिस्म कुछ झटके खा कर शांत पड़ गया था. होंठों पर नीला झाग उभर आया था. दुआ अली का मुजरिम खत्म हो गया था.

कैप्टन शाद अली अपने दावे में कामयाब हो गया था. मंगी के सीने पर दाईं ओर एक सुई जैसा बड़ा सा तीर घुसा था, जो बहुत घातक जहर में बुझा हुआ था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस तीर को वहां कैसे और किस ने उस पर चलाया था? ये दिमाग को चकराने वाले सवाल थे. ऐंबुलैंस आ चुकी थी. पुलिस हेडक्वार्टर से इन्वैस्टीगेशन टीम आने वाली थी, इसलिए अदालत के कमरे को बंद कर दिया गया था.

सभी लोगों की अच्छी तरह से तलाशी ले ली गई थी. इन्वैस्टीगेशन टीम की काररवाई के बाद मंगी की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. कुछ देर बाद आफाक अहमद अपना ब्रीफकेस ले कर निकलने लगे तो रंधावा के पास आ कर धीरे से बोले, ‘‘वह अपने मकसद में कामयाब हो गया. मैं ने कहा था न कि यह तुम्हारे लिए एक यादगार केस होगा.’’

रंधावा खामोश रहे. उन का दिमाग तेजी से चल रहा था. गाड़ी आई और आफाक अहमद बैठ कर चले गए. इंसपेक्टर भट्टी और डीएसपी रंधावा सिर जोड़े बैठे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. स्पेशल इन्वैस्टीगेशन टीम की भी शुरुआती रिपोर्ट आ गई थी. उस के अनुसार मंगी के सीने में वह जहरीला तीर, बिलकुल सामने से 6 फुट की ऊंचाई से चलाया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मंगी की मौत बेहद घातक जहर से हुई थी. मंगी का कद 6 फुट 1 इंच था. इस के अलावा मुल्जिमों का कटघरा जमीन से करीब 8 इंच ऊंचा था.

उस के सामने गवाहों वाला कटघरा था. उस के सामने दीवार थी, जिस पर एक घड़ी टंगी थी. कटघरे, दीवार घड़ी आदि सभी चीजों को अच्छे से चैक किया गया था. बाद में भी उन में किसी तरह की कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी. अब सवाल यह था कि क्या कैप्टन शाद अली जादू की टोपी पहन कर अदालत के कमरे में आया और मंगी को मार कर आराम से चला गया. इन सवालों ने पुलिस को परेशान कर दिया था.

रंधावा ने पता कर लिया था कि शाद अली उस जहर और हथेली की साइज की अल्ट्रामाडर्न एरोगन चलाने वाले दस्ते से जुड़ा था. जहरीले तीर के चलने के स्थान और ऊंचाई को देख कर अदालत में मौजूद सभी लोग शक के दायरे से बाहर हो गए थे.

सभी न्यूज चैनल्स मंगी की मौत और उस के आखिरी लम्हों की वीडियो की फुटेज दिखा रहे थे. पुलिस की काररवाई पर भी सवाल खड़े किए जा रहे थे. कातिल ने अपने दावे के मुताबिक मंगी को अदालत में पुलिस के सामने मार दिया था. डीएसपी रंधावा और इंसपेक्टर भट्टी बारबार मंगी के आखिरी लम्हों की वीडियो देख रहे थे, क्योंकि कोई सुबूत हाथ नहीं आ रहा था.

रंधावा पूरे 38 घंटे बाद बिस्तर पर लेटा तो सुबह 7 बजे के अलार्म मोबाइल की सुरीली आवाज से जागा. मोबाइल अलार्म के साथ उस के जेहन में भी एक घंटी बजी. चाय पी कर रंधावा औफिस के लिए निकल पड़े. औफिस में एक बार फिर उन्होंने मंगी के कत्ल की वीडियो देखी. इस बार वीडियो देख कर उन के होंठों पर एक रहस्यमय मुसकराहट आई.

रात 8 बजे रंधावा जज आफाक अहमद के कमरे में बैठे थे. दोनों के बीच मंगी के रहस्यमय कत्ल पर बातचीत चल रही थी. आफाक अहमद ने कहा, ‘‘इस मामले में सब कुछ रहस्यमय है.’’

रंधावा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘जज साहब, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’ इस के बाद दीवार पर नजर डालते हुए वह बोले, ‘‘इस पीतल की घड़ी के बगल में मार्क एंड बेंसन की स्विटजरलैंड मेड घड़ी लगी थी. वह नजर नहीं आ रही है?’’

‘‘वह खराब हो गई है.’’ जज साहब ने कहा.

दोनों दोस्तों की नजरें मिलीं. दोनों ही एकदूसरे के मिजाज और सोच के हर रंग से वाकिफ थे. रंधावा ने कौफी का घूंट भरते हुए कहा, ‘‘आफाक अहमद, तुम्हारी योग्यता का कोई जवाब नहीं. आखिर तुम ने इस केस को यादगार बना ही दिया.’’

रंधावा की इस बात से आफाक अहमद बिलकुल नहीं चौंके. उन्होंने कहा, ‘‘आखिर तुम्हें मेरा खयाल आ ही गया. लेकिन तुम्हारे पास सिर्फ थ्योरी है. कोई सुबूत नहीं कि यह सब कैसे हुआ?’’

रंधावा ने खुल कर हंसते हुए कहा, ‘‘बेशक कोई सुबूत नहीं है, मगर मैं जान गया हूं कि इस कारनामे को तुम ने कैसे अंजाम दिया?’’

‘‘जरा मैं भी तो सुनूं?’’ जज ने मजा लेते हुए कहा…

‘‘तुम्हें कैप्टन शाद अली की तकनीकी मदद हासिल थी.’’

पहली बार आफाक अहमद थोड़ा परेशान हुए. रंधावा ने आगे कहा, ‘‘मैं यह नहीं जानता कि तुम दोनों का गठजोड़ कैसे हुआ? पर यह जरूर जान गया हूं कि यह तुम दोनों की मिलीभगत थी.’’

जज आफाक अहमद ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारी मुश्किल आसान कर देता हूं. कैप्टन शाद अली को मेरे पास तुम्हारा भतीजा ले कर आया था.’’

रंधावा ने बात काटी, ‘‘और फिर उस मुलाकात में तुम दोनों ने मासूम दुआ अली के बेरहम कातिल को अदालत के कमरे में ही खत्म करने की योजना बना डाली. तुम्हें अपनी योजना की कामयाबी का सौ फीसदी यकीन था? इस दौरान तुम्हारे अंदर शरारत जाग उठी. तुम ने मुझे बीच में घसीट कर एक तरह से चुनौती दी कि तुम्हारे सामने मंगी मारा जाएगा और तुम कुछ कर सकते हो तो कर लो?’’

आफाक अहमद कहकहा लगाते हुए बोले, ‘‘बिलकुल ठीक जा रहे हो मेरे दोस्त.’’

‘‘योजना यकीनन तुम ने तैयार की थी. तुम्हारे कहने के मुताबिक कैप्टन शाद अली ने तुम्हारे कमरे की ‘मार्क एंड बेंसन’ घड़ी में जरूरी बदलाव कर के ‘एरोगन’ फिट कर दी और उस का ट्रिगर रिमोट कंट्रोल से जोड़ दिया.’’

रंधावा की इस बात से आफाक अहमद सन्न रह गए. उन की इस हालत का मजा लेते हुए रंधावा ने आगे कहा, ‘‘फैसले वाले दिन तुम उस खास घड़ी को ब्रीफकेस में रख कर अपने साथ ले गए. तुम उस समय अपने चैंबर में थे, जब मेरी टीम अदालत के कमरे को

चैक कर रही थी. हम ने दीवार पर लगी तुम्हारी खास घड़ी जैसी मार्क एंड बेंसन घड़ी को भी बारीकी से चैक किया था.

निश्चिंत हो कर हम ने अदालत के कमरे को बंद करवा दिया था. इस के बाद तुम्हारे लिए सब कुछ बड़ा आसान हो गया. अपने चैंबर से अदालत के कमरे में खुलने वाले दरवाजे के जरिए तुम ने अंदर से खुलने वाले दरवाजे के जरिए अंदर दाखिल हो कर उस घड़ी की जगह अपनी घड़ी लगा दी.

‘‘मंगी को तुम ने बरी नहीं किया बल्कि उसे मौत दे दी. मुलजिमों के कटघरे और घड़ी का दरम्यानी फासला, घड़ी की ऊंचाई और मंगी की 6 फुट से निकलती लंबाई, सब कुछ तुम्हारी नजर में था. तुम्हारी पूरी योजना तैयार थी. रिमोट का महज एक बटन दबा कर तुम ने उसे खत्म कर दिया. शायद यह शेर ऐसे ही कत्ल के बारे में कहा गया है –

‘न हाथ में खंजर न आस्तीन पर लहू,   तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो.’

जज आफाक अहमद ने बेआवाज ताली बजाई. एक पुलिस अफसर के तारीफी अल्फाज उन का रुतबा बढ़ा रहे थे. रंधावा ने कहा, ‘‘कत्ल के बाद जब हम ने दोबारा कमरा बंद किया तो तुम ने पहले की ही तरह जा कर घड़ी बदल दी और हमारे सामने से बड़े आराम से घर चले गए. उस के बाद हम बेचारे बने झक मारते रहे.’’

उन के इस अंदाज पर आफाक अहमद ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी कहानी बस अंदाजों पर टिकी है. तुम्हारे पास मेरे खिलाफ न कोई सुबूत है न कोई शहादत. तुम्हारी अंदाजों पर टिकी कहानी सुन कर हाईकोर्ट एक माननीय डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज के लिए गिरफ्तारी वारंट कभी जारी नहीं करेगा? बल्कि मुमकिन है कि ऐसी दरख्वास्त करने वाले पुलिस अफसर के स्टार ही मौके पर उतार लिए जाएं.’’

‘‘जानता हूं.’’ रंधावा ने कहा, ‘‘मेरा ऐसा कुछ करने का कोई इरादा भी नहीं है. और यकीनन वह खास कातिल घड़ी भी अब तक तुम ने ठिकाने लगा दी होगी.’’

आफाक अहमद ने तारीफी अंदाज में कहा, ‘‘यकीनन तुम एक काबिल और होशियार पुलिस अफसर हो. पर यह तो बताओ कि तुम्हें मेरा खयाल आया कैसे?’’

रंधावा ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मंगी के ठीक सामने दीवार पर लगी पुरानी घड़ी मेरे जेहन में चुभ रही थी. वैसी ही घड़ी मैं तुम्हारे इस कमरे में देख चुका था. सुबह अलार्म की घंटी ने याद दिलाया. नईपुरानी घडि़यां जमा करना तुम्हारा पुराना शौक रहा है. तुम्हारी तरफ ध्यान गया तो परदे हटते गए और फिर तुम ही अकेले ऐसे शख्स थे, जो अपने चैंबर के रास्ते से कभी भी अदालत के कमरे में जा सकते थे.

‘‘वारदात के पहले और वारदात के बाद बिना किसी की नजरों में आए तुम अदालत के कमरे में दाखिल हो सकते थे. इस के अलावा तुम ने फैसला सुनाने से पहले घड़ी और मंगी के बीच खड़े सफाई वकील को बैठने के लिए कहा था.

‘‘अगर सफाई वकील वहां खड़ा भी रहता तो कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन तुम ने खास तौर पर उसे बैठने को कहा था. उस वक्त की वीडियो देखने पर मुझे यकीन हो गया कि यह कारनामा सिर्फ तुम ही कर सकते थे.’’

आफाक अहमद ने सुकून से कहा, ‘‘तुम क्यों रिटायर हो रहे हो रंधावा? तुम्हारी काबलियत काबिले तारीफ है. 3-4 साल और नौकरी कर लो.’’

‘‘नहीं,’’ रंधावा ने कहा, ‘‘अपनी ईमानदारी और सच्चाई की साख बचातेबचाते अब मैं थक चुका हूं. वैसे एक बात और कहूंगा, तुम्हारी गुनहगार को सजा दिलाने की जिद और उसूल भी एक सुबूत है. मेरा आखिरी केस मेरे लिए सचमुच यादगार रहेगा. इस बात के साथ कि हर उलझे और मुश्किल केस की गुत्थियां सुलझाने वाला रंधावा अपने आखिरी केस को हल करने में नाकाम रहा. लेकिन मुझे खुशी है कि तुम्हारा उसूल अब भी कायम है. तुम्हारे बारे में जो मशहूर है कि तुम मुजरिम को छोड़ते नहीं, वह पूरा हुआ.’’

आफाक अहमद ने इत्मीनान और सुकून से सिर हिलाया. खड़े हो कर रंधावा को गले लगाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हार और मेरी जीत कोई मायने नहीं रखती दोस्त. सब से अहम बात तो यह है कि हम दोनों के दिल पर कोई बोझ नहीं है.’’

रंधावा ने मुसकरा कर हाथ मिलाते हुए कहा, ‘‘मैं भी इस बात से खुश हूं कि दुआ अली को इंसाफ मिला है, वह कैसे भी मिला है.’’    Courtroom Murder

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