Family Betrayal Story: तुम्हारे आखिरी दाग की निशानी मेरे वजूद पर लग चुकी है और शायद इसी से मेरी बेनाम जिंदगी की शुरुआत हो. यही दाग मेरे जीने का बहाना बन जाए. तुम्हारी दलील अपनी जगह सही है कि एक वक्त में 2 इंसानों को एक जैसा, एक ही जितना प्यार किया जा सकता है.   जब मैं 9 साल की थी और मेरा भाई 3 साल का तो मेरी मां ने मेरे लखपति बाप जफर अली खां से तलाक ले कर अजीज मियां से शादी कर ली थी, जो नयानया दौलतमंद बना था. उस ने भी अपनी बीवी को तलाक दे कर मम्मी से

शादी की थी. मगर पहली बीवी से उस के कोई औलाद नहीं थी, जबकि मम्मी हम बहनभाई को छोड़ कर उस की बीवी बन गई थीं. अहमद को तो अब्बू ने अपने पास मुंबई में रख लिया था. वह वहीं बिजनैस करते थे, मुझे पूना भेज दिया गया था, जहां मेरी दादी और दादा रहते थे. मेरे अब्बू अपने मांबाप की एकलौती औलाद थे, इसलिए मुझे दादीदादा से भरपूर प्यार मिला. मगर वह प्यार भी मेरी शख्सियत में जगह बना लिए उस खालीपन को न भर सका, जो मांबाप से बिछुड़ने की वजह से पैदा हुआ था. दादाजान के पास भी दौलत की कोई कमी नहीं थी, मगर वह बड़े कठोर और उसूल वाले इंसान थे.

अगर मुझे नाश्ते या दोपहर और रात के खाने पर डायनिंग रूम में पहुंचने में एक मिनट की भी देर हो जाती तो मेरा कोर्टमार्शल हो जाता. इसी तरह अगर मैं क्लास में सेकेंड या थर्ड आ जाती तो दो ट्यूटर लगा दिए जाते. जब तक मैं जूनियर स्कूल में रही, मुझे चूडि़यांबुंदे तक पहनने की इजाजत नहीं थी. लेकिन दादी अपनी अलमारी खोल कर खूबसूरत जेवरात दिखातीं और कहतीं, ‘‘कंवल बेटी! यह सब कुछ तेरा है, मगर अभी नहीं.’’

हर ईद पर अहमद और अब्बू आ जाते तो मुझे अजीब सी वहशत होने लगती. अलबत्ता अहमद पर मुझे बहुत प्यार आता. अब्बू और अहमद एक हफ्ता हमारे साथ बिताने के बाद मुंबई चले जाते तो जिंदगी फिर उसी पुरानी डगर पर वापस आ जाती. स्कूल से वापस आती तो पौने 2 बजे तैयार हो कर खाने की उस खौफनाक मेज पर पहुंच जाती, जहां सिर्फ छुरीकांटों और चम्मचों की आवाज ही सुनाई देती, क्योंकि दादाजान को खाते वक्त बातें करना सख्त नापसंद था. हमारे यहां गोश्त और मुर्गामछली वाले पकवान ज्यादा बनते थे, जबकि मुझे दालचावल बहुत पसंद थे. मगर दादीजान मुझे गरीबों का यह खाना कभी न खाने देतीं. कहती थीं, ‘‘कंवल, चावल खाने से मोटी हो जाओगी और भला दाल भी कोई खाने की चीज है?’’

जब मैं हाईस्कूल में आई तो जवान होने लगी थी. स्कूल में एक लड़की लबना के सिवा कोई और सहेली न बन सकी. वह मेरे मिजाज से वाकिफ थी और मेरे घर आती थी. लेकिन मुझे उस के घर जाने की इजाजत नहीं थी. मैं ने दादीजान से शिकायत की तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे दादाजान ने तुम्हारी मां की हरकतों की वजह से यह पाबंदी लगाई है. वह नहीं चाहते कि…’’ इतना कह कर वह रुक गईं.

‘‘जी?’’ मैं ने उन की आंखों में झांक कर कहा तो वह नजरें चुरा गईं. तब मुझे बहुत अफसोस हुआ था, मगर मैं कुछ भी न कह सकी. जो कुछ मेरी मां ने हमारे साथ किया था, वह कोई ढकीछिपी बात नहीं थी. बाद में पता चला कि अजीज मियां अब्बू के दोस्तों में थे और मम्मी ने बाकायदा इश्क कर के उन से शादी की थी. कई बार मांबाप के किए की सजा औलाद को भुगतनी पड़ती है. इसीलिए मेरी नजर में हर रिश्ते की अहमियत खत्म हो गई थी. सीनियर कैंब्रिज का इम्तहान खत्म हुआ तो अब्बू ने मुझे मुंबई बुला भेजा. वह बुलावा इस टाइमटेबल की कैद जिंदगी से बाहर निकलने का अकेला रास्ता था, जो मुझे 7 साल के लंबे अरसे बाद मिला था.

दादाजान की ढेरों नसीहतों और अपने सूटकेस समेत मैं मुंबई पहुंची. यह देख कर मुझे न अफसोस हुआ, न ताज्जुब कि अब्बू मुझे लेने स्टेशन पर मौजूद नहीं थे. अहमद और ड्राइवर मुझे लेने आए थे. मैं अपने भाई से मिल कर बहुत खुश हुई. अहमद अब बड़ा हो गया था और 5वीं में पढ़ रहा था, मगर उस का कद अब्बू पर गया था. मुझ से कुछ ही छोटा था. उस ने बताया, ‘‘आपी, अब्बू के कुछ मेहमान बाहर से आए हैं. वह उन्हें ले कर डिनर पर गए हैं.’’

मैं उस की बात पर सिर्फ मुसकरा दी.

हम लौन में बैठे तारे गिन रहे थे. समुद्र की तरफ से आने वाली हवा मेरे बाल बिखरा रही थी. मैं ने अहमद से पूछा, ‘‘तुम यहां बोर नहीं हो जाते?’’

‘‘नहीं आपी, मुझे बोर होने का वक्त ही नहीं मिलता.’’ वह बोला.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘भई, सुबह पौने 8 बजे मेरा स्कूल लगता है. एक बजे मैं घर आता हूं. डेढ़ से 3 मैं पढ़ता हूं. 3 बजे मौलवी साहब आते हैं. साढ़े 3 से 5 बजे तक खेलता हूं. फिर अब्बू के दफ्तर जाता हूं. वहां से हम साथ वापस आते हैं और यों दिन खत्म हो जाता है.’’

‘‘वाकई तुम तो बड़े काम के आदमी हो यार.’’ मैं हंस पड़ी.

अब्बू अभी तक लौट कर नहीं आए थे. पौने 11 बजे अहमद ने कहा, ‘‘आपी, चलें सोने. सुबह मेरा स्कूल है.’’

‘‘चलो,’’ मैं भी उठ गई.

न जाने रात के किस पहर मुझे नींद आई. मैं ने सोच रखा था कि बहुत देर तक सोती रहूंगी. दादाजान के साथ तो सुबह 8 बजे नाश्ता करना जरूरी था. लेकिन न चाहने के बावजूद सुबह सात बजे मेरी आंख खुल गई. बिस्तर से उठने को जी न चाहा तो घंटी बजा कर वहीं ब्लैक कौफी मंगवाई. फिर नहाधो कर तैयार हो गई. नाश्ते की मेज पर अब्बू ने मुझ से बहुत चौंका देने वाला एक सवाल किया, ‘‘कंवल, तुम्हारी मम्मी चाहती हैं कि तुम उन के पास जा कर रहने लगो.’’

‘‘जी, कौन मम्मी?’’ टोस्ट पर जैम लगातेलगाते मेरे हाथ रुक गए.

‘‘जज्बाती न बनो कंवल, अब तुम्हें अख्तियार है कि तुम मेरे या खालिदा के साथ रहो.’’

‘‘अब्बू, जज्बात क्या होते हैं, मुझे नहीं मालूम. रहा साथ रहने का सवाल तो न तो मैं उन के साथ रहूंगी और न आप के साथ रह रही हूं. मैं दादाजान के पास हूं और वहीं रहना चाहती हूं.’’

‘‘अब्बाजान अब बूढ़े हो गए हैं कंवल. मगर खैर, तुम जब तक यहां रहना चाहो, रह सकती हो.’’ अब्बू बोले.

जब 15 दिन और बीत गए तो मैं बोर हो गई और वापसी का इरादा किया. अब्बू और अहमद मुझे बहुत रोकते रहे, मगर मैं वापस पूना आ गई. दादादादी उदास थे. मुझे सीने से लगा कर रो पड़े, मगर मेरे दिल में कोई जज्बात नहीं थे. न खुशी न गम और न मोहब्बत. दादीजान की इच्छा थी कि मैं आगे न पढ़ूं. मगर दादा मुझे पढ़ाना चाहते थे. और मैं? मैं कुछ नहीं चाहती थी. छुट्टियों के दिन थे. नवंबर का महीना था. मौसम बेहद खूबसूरत था. सुबह से बारिश हो रही थी. जब मैं अपना हुलिया सही कर के खाने की मेज पर पहुंची तो चौथी कुरसी को भी भरी हुई पाया. मेरे बैठ जाने के बाद दादाजान ने परिचय करवाया, ‘‘कंवल, यह अमीर है. मेरे दोस्त अल्ताफ हुसैन का बेटा. कुछ दिनों पहले ही अमेरिका से लौटा है.’’

‘‘आदाब.’’ मैं ने केवल इतना कहा और मेज पर खामोशी छा गई. सिर्फ कांटेछुरी की आवाजें थीं. खाने के फौरन बाद दादाजान अमीर को ले कर अपनी लाइब्रेरी में चले गए. दादी अपने कमरे में और मैं यूं ही बेमकसद लौन वाले चबूतरे की सीढ़ी पर बैठ गई.

सारे गुलाब धुल कर खूबसूरत हो गए थे और बारिश थम गई थी. न जाने कितनी देर मैं बैठी रही थी कि अमीर बाहर आया. उस की उम्र 30 के आसपास रही होगी. वह बेहद शानदार शख्सियत का मालिक था. उस ने मेरे चेहरे पर नजर डालते हुए पूछा, ‘‘आप यहां बैठी हैं? क्या मैं भी बैठ कर खूबसूरती का नजारा कर सकता हूं?’’

‘‘जरूर, शौक से.’’

वह मेरे बराबर सीढि़यों पर बैठ गया और पूछा, ‘‘आप क्या यूं ही आदम बेजार हैं?’’

‘‘जब आदम ही नहीं तो बेजारी किसे दिखाऊं?’’

‘‘मैं कल भी आया था, मगर आप नजर नहीं आईं. आज भी सिर्फ खाने की मेज पर दिखाई दीं. क्या आप तनहाईपसंद हैं.’’

‘‘कल मुझे आप के आने का पता न लग सका था और रही आज की बात तो आप दादाजान के मेहमान थे और इस घर के सख्त उसूलों में से एक यह भी है कि किसी अजनबी से बेतकल्लुफ न हुआ जाय.’’

‘‘ओह!’’ वह हंस पड़ा, ‘‘क्या आप मेरे साथ लांग ड्राइव पर चलेंगी?’’

‘‘जी?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उसे देखा, ‘‘आप शायद नहीं जानते कि दादाजान के पेनल कोड में इस की बहुत बड़ी सजा है.’’

‘‘चलिए उठिए, पूछ लेते हैं उन से.’’ वह उठा और हाथ बढ़ा कर मुझे भी उठाना चाहा तो मैं झिझक गई और खुद ही उठ खड़ी हुई.

दादाजान ने फौरन इजाजत दे दी तो मैं उस की कार में बैठ गई. हलकीहलकी बारिश हो रही थी. विंडस्क्रीन पर नजरें जमाए मैं चुपचाप बैठी रही. वह मुझे भरपूर नजरों से देखते हुए बोला, ‘‘मेरे वालिद ने मेरे लिए आप को पसंद किया है. क्या यह रिश्ता आप को मंजूर है?’’

मैं ने गहरी सांस ली. अपने यहां की लड़कियों की तरह न तो मैं बीरबहूटी बनी और न दुपट्टे का कोना अंगुली पर लपेटा. बेपरवाही से बोली, ‘‘दादाजान जो फैसला करेंगे, मेरे लिए वही कुबूल होगा.’’

‘‘क्यों? आप की अपनी पसंद कोई नहीं है?’’ अमीर ने जरा नाराज होते हुए पूछा.

‘‘मेरी पसंद या नापसंद का कोई फायदा नहीं.’’ मैं ने उसी तरह सामने देखते हुए कहा.

‘‘फिर भी मैं यानी अमीर हुसैन, अमेरिका से न्यूरो सर्जरी की डिग्री ले कर आया हूं और 30 साल मेरी उम्र है. देखने में भी बुरा नहीं हूं. फिर आप के इनकार की वजह?’’

‘‘मैं ने इनकार तो नहीं किया?’’ सीधे मैं ने उस की आंखों में झांका.

‘‘ऊंची सोसायटी में यूं ही इनकार करते हैं.’’

‘‘दरअसल, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘क्यों? अब आप इतनी छोटी भी नहीं हैं.’’ वह बोला, हालांकि मेरी और उस की उम्र में 15 साल का फर्क था.

‘‘बात यह है अमीर साहब, मुझे अपनी जिंदगी में बसे खौफ को दूर करना है. जीने का जोश पैदा करना है और मैं नहीं चाहती कि आप मेरे साथ बेसुकून हों.’’

‘‘अच्छा,’’ वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘अगर आप अभी शादी नहीं करना चाहतीं या तैयार नहीं हैं तो मैं आप का इंतजार करूंगा.’’

‘‘अब मैं ऐसी चीज भी नहीं कि आप एक उम्र मेरे लिए बिता दें.’’

‘‘आप अपनी तारीफ सुनना चाहती हैं?’’

‘‘हरगिज नहीं. अगर कोई मेरी तारीफ करता है तो मुझे वहशत होती है. दरअसल बात यह है अमीर साहब कि मैं रिश्तों की पहचान करना चाहती हूं. मेरी नजर में फिलहाल सभी रिश्ते खोखले और नापायेदार हैं. अपनेअपने मतलब की खातिर सब एकदूसरे से मोहब्बत करते हैं. मैं सच्चाई की खोज में हूं और शायद उसी का इंतजार कर रही हूं.’’

‘‘तुम तो फिलौस्फर हो कंवल.’’ अमीर हंस पड़ा.

‘‘मैं फिलौस्फर नहीं, हकीकतपसंद हूं.’’ मैं ने घड़ी देखी, हमें निकले हुए तकरीबन एक घंटा हो गया था, ‘‘अब वापस चलें.’’

‘‘दिल भर गया?’’

अमीर की इस बात पर मैं हंस पड़ी, ‘‘दिल क्या चीज होती है डाक्टर साहब, हम सब तकदीर के, वक्त के गुलाम हैं. दिल के चाहने, न चाहने से कुछ नहीं होता.’’

अमीर चुपचाप गाड़ी चलाता रहा, यहां तक कि घर आ गया.

‘‘फिर कब आऊं जवाब लेने?’’ अमीर ने आगे को झुक कर मेरी आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘मैं आप को खुद फोन करूंगी. खुदा हाफिज और थैंक्स.’’ यह कह कर मैं गाड़ी से  उतर गई. शायद दादाजान के कहने पर अमीर ने खुद यह बात की थी.

एक दिन मैं कालेज से लौटी तो खाने के बाद दादीजान ने याद फरमाया, ‘‘बिटिया, अगले हफ्ते तुम्हारी मंगनी है. अमीर की वालिदा आ रही हैं.’’

‘‘अच्छा!’’ मैं ने सिर्फ इतना कहा और सोचा कि यकीनन मेरी मरजी की कोई अहमियत नहीं है.

शाम को दादादादी कहीं डिनर पर चले गए थे. मैं वीसीआर पर कार्टून देख रही थी कि अमीर का फोन आ गया, ‘‘मैं ने तुम्हारे फोन का इंतजार किए बगैर मंगनी की तारीख तय कर दी है.’’

‘‘जी, मुझे पता है.’’

‘‘मेरे घर में तुम्हें सारी मोहब्बतें मिलेंगी कंवल, जिन की तुम तलाश में हो.’’ इस बात पर मैं चुप रही.

‘‘तुम्हें रंग कौन सा पसंद है कंवल?’’

‘‘रंगों, कपड़ों और पत्थरों से मुझे कोई दिलचस्पी नहीं अमीर.’’ यह कह कर मैं ने फोन बंद कर दिया.

मेरी मंगनी हुई. मैं ने अपनी सास को पहली बार देखा और न जाने क्यों उन का प्यार मुझे एक दिखावा लगा, जिस से मुझे शदीद नफरत थी. मेरी शादी पर डैडी और अहमद भी मुंबई से आए. बहुत धूमधाम से हुई मेरी शादी. वे सारे जेवरात, जो दादीजान के सेफ में बंद रहते थे, मुझे मिल गए और भी बहुत कुछ दहेज में मिला, जिस में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी. न तो मैं विदाई के समय रोई और न ही मुझे बाबुल का घर छोड़ने का कोई अफसोस हुआ. जब मैं विदा हो कर अमीर के घर आई तो एक नई दुनिया, एक नई जिंदगी मेरे इंतजार में थी. अमीर मुझ से बहुत मोहब्बत करते थे, इतनी कि मैं बयान नहीं कर सकती. उन की जिंदगी बहुत बिजी थी. वह सुबह क्लीनिक जाते, 2 बजे वापस आते, खाना खा कर आराम करते. फिर 5 बजे उठ कर वापस चले जाते.

हफ्ते में 2 दिन छुट्टी करते और इन 2 दिनों में हर मुमकिन कोशिश करते कि मेरे पास रहें, मुझे ले कर घूमने चलें. इसी दौरान मेरे ससुर का इंतकाल हो गया. उन की मौत पर मेरा देवर जावेद, जो लंदन में रहता था, बीवी रीटा के साथ घर आ गया. रीटा गैर मुसलमान थी. कुछ ही दिनों में मैं ने यह बात महसूस कर ली कि मेरी सास और रीटा के आपसी ताल्लुकात वाजिब से थे. मेरी तो शुरू से यह आदत थी कि कभी किसी के मामले में दखल नहीं देती थी. यह घर अमीर का था, जिसे अपनी सास के आने से पहले मैं चलाती थी. जब वह आईं तो मैं ने सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी. वह मुझ से बहुत खुश रहने लगीं. सब आनेजाने वालों के आगे मेरी तारीफ करतीं. मगर मैं बजाय खुश होने के डर जाती कि कहीं यह धोखा न हो.

मुझे अपने पास बिठा कर वह रीटा की बुराइयां करतीं. तब भी मैं चुप रहती, क्योंकि दादाजान की सीखों में किसी की बुराई शामिल नहीं थी. न जाने ‘फूट डालो और राज करो’ का उसूल बूढ़े लोग क्यों अपनाते हैं. रीटा बेचारी किसी अजनबी की तरह घर में रहती और घबराई सी घूमती. मैं उसे बहुत समझाती और दिलासा देती, ‘‘रीटा, यह घर तुम्हारा भी है. तुम मेरी छोटी बहन की तरह हो. जावेद ने तुम्हें प्यार किया. तुम मेरे लिए पाक हो.’’

मगर जो खौफ उस के दिल में था, वह दूर न हो सका. और तो और, अमीर भी उस से खिंचेखिंचे रहते. मैं ने उन्हें टोका, ‘‘अमी, वह लड़की तुम्हारे भाई की खातिर अपना मजहब छोड़ कर आई है. तुम उसे नफरत दे कर उसे अपने मजहब से नफरत करना सिखा रहे हो.’’

मेरे लेक्चर का उन पर असर हुआ. वह कुछ संभल गए. अब मैं अकसर सोचती और खुदा से दुआ मांगती, ‘‘ऐ खुदाया, आखिर कब तक मुझे रिश्तों की पहचान आएगी? कब से दुनियावी रिश्ते हकीकत में तब्दील हो कर मेरे दिल में भी मोहब्बत की जोत जगाएंगे?’’

हमारी शादी को 2 साल का समय बीत गया था, जब दादाजान पर फालिज ने हमला कर दिया और वह बोलने की ताकत खो बैठे. बुलंद आवाज वाले दादाजान चुप हो गए तो अब्बू और अहमद भी घर आए. मैं भी गई हुई थी. एक दिन अब्बू ने मुझ से कहा, ‘‘कंवल, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘जी.’’ मैं उन के सामने बैठ गई.

वह कुछ नर्वस हो गए थे. उन का सिर झुका हुआ था. वह आहिस्ता से बोले, ‘‘मैं शादी करना चाहता हूं.’’

इस बात ने मुझे हिला दिया, हालांकि मेरे बाप ने जवानी हमारे नाम कर दी थी. बाप होते हुए भी उन्होंने यह कुरबानी दी थी. इसलिए मैं खुदगर्ज बनना नहीं चाहती थी. मुझे पता था, अब वह उम्र के उस हिस्से में थे, जहां हर एक को किसी दोस्त, किसी सहारे की, एक हमदम की जरूरत होती है. कुछ लम्हे सोच कर मैं ने उन से कहा, ‘‘अब्बू, आप ने अहमद की खातिर जो कुरबानी दी है, उसे हम दोनों ताजिंदगी भुला नहीं पाएंगे. लेकिन अब जबकि अहमद 15 साल का हो गया है, क्या आप 2 बरस रुक नहीं सकते?’’

उन का झुका हुआ सिर उठा तो उन की आंखें नम थीं, ‘‘अगर तुम मुझे मना कर दो कंवल तो मैं कभी शादी नहीं करूंगा.’’

आज बरसों बाद मैं ने उन की आंखों में अपने लिए प्यार देखा था, शायद पहली बार. मगर मैं अपने अंदर वह कशिश, वह मोहब्बत पैदा न कर सकी, जो एक बेटी को बाप से होती है. मैं ने कुछ देर सोचा, फिर उन के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए बोली, ‘‘मैं अहमद को समझाऊंगी. अब्बू आप निकाह कर लें. मुझे आप की तनहाइयों का पूरा अहसास है. हम और खुदगर्ज नहीं बन सकते.’’

वह हौले से हंस दिए. मैं ने अहमद को बुला कर समझाया तो अंदाजा हुआ कि एक 15 साल के अल्हड़ लड़के से नहीं, बल्कि 30 साल के मर्द से बात कर रही हूं. वह सयाना हो गया था. उस के दिल में अपनी मां के लिए बेअंदाज नफरत थी. वह कैंब्रिज के बाद अमेरिका जाना चाहता था और मुझे पता था कि वह एक बार बाहर जाएगा तो फिर कभी लौट कर नहीं आएगा. अब्बू ने मुंबई लौट कर निगहत बट से शादी कर ली. निगहत बेवा थीं और बकौल अहमद बहुत नेक औरत थीं. अहमद ने फोन पर बताया कि वह उस का बहुत खयाल रखती थीं. दूसरी बात यह थी कि उन के कोई औलाद नहीं थी और न हो सकती थी.

इधर मेरी सास को मेरी गोद हरी न होने का गम खाए जा रहा था. हर किस्म के तावीजगंडे वह आजमा चुकी थीं. उन का बस नहीं चलता था, नहीं तो वह कहीं से एक बच्चा ला कर मेरी गोद में डाल देतीं. अमीर अपने क्लीनिक में मगन थे. उन्हें अब तक इस बात की कमी महसूस नहीं हुई थी. मैं ने उन से यह बात की तो वह हंस पड़े, ‘‘क्या तुम यह चाहती हो कि हमारा बच्चा जल्दी हो?’’

‘‘हां. हो सकता है, यही रिश्ता मुझे रिश्तों की पहचान करवा दे.’’

‘‘क्या तुम ने मेरे प्यार में कोई कमी महसूस की है कंवल?’’

‘‘जिस दिन करूंगी, बेझिझक कह दूंगी.’’

‘‘गुड गर्ल. मैं बहुत बिजी हूं. यहां नयानया सेट हो रहा हूं. फिर अब्बू की मौत के बाद कारोबार की भी देखभाल करना होता है. दूसरे जावेद ने परेशान कर रखा है.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘वह अलग रहना चाहता है. अब दुनिया वाले क्या कहेंगे कि मैं एक भाई की जिम्मेदारी भी नहीं उठा सकता. फिर आज वह अलग मकान लेगा, कल कारोबार में बंटवारा चाहेगा. यह कैसे मुमकिन है?’’ अमीर दूर की सोचते हुए मुझ से बातें कर रहे थे.

‘‘सुनो अमी, यह दुनिया क्या होती है भला? अगर जावेद अलग रहना चाहता है तो रहने दो. हर इंसान को अपनी जिंदगी जीने का हक है. देखो, बात साथ रहने और अलग रहने की नहीं है. सारी बात मोहब्बत की है. अगर दो अलगअलग मकानों में रह कर भी तुम उसे उस का हक और मोहब्बत दे रहे हो तो वह साथ रह कर मनमुटाव से हजार दरजे बेहतर है.’’ मैं ने उस की गहरी आंखों में झांकते हुए कहा और वह कुछ सोच कर रजामंद हो गए.

बच्चे की चाहत मेरे दिल में अपनी जड़ें मजबूत करती जा रही थी. मगर 10 माह बीत जाने के बाद भी खुशखबरी न मिल सकी तो मैं बहुत परेशान रहने लगी. अमीर मेरी उलझन पर हंस पड़े और बोले, ‘‘जल्दी क्या है कंवल? अपने आप को कुछ वक्त दो.’’

मैं उन के मना करने के बावजूद गाइनाकालौजिस्ट के पास गई. उस ने कई टेस्ट लिख दिए. सब से पहले उस ने मेरी डीएनसी की रिपोर्ट देखी और बताया कि तुम बच्चे पैदा करने के काबिल नहीं हो. शदीद मायूसी का एक दौरा मुझ पर पड़ा. अमीर ने मुझे बच्चा गोद लेने का मशविरा दिया, मगर मैं तो अपने खून जिगर से रिश्ता बनाना चाहती थी और मुझे पता था कि मैं किसी गैर के बच्चे के साथ इंसाफ न कर पाऊंगी. इस वाकये के बाद दादाजी एक दिन चुपचाप चल बसे और तब मुझे अहसास हुआ, जैसे मैं नंगे सिर सूरज की तेज तपिश में आ गई हूं. मेरे ऊपर से जैसे किसी ने साया खींच लिया हो. तब मुझे उन से अपनी मोहब्बत का अहसास हुआ. दादीजान अब्बू के पास मुंबई चली गईं और पूना की वह बड़ी हवेली बंद हो गई.

मरतेमरते दादाजान हवेली मेरे नाम कर गए थे. मैं ने उस में एक स्कूल खोल लिया और छोटेछोटे मासूम बच्चों को तालीम दे कर अपनी प्यास बुझाती रही. यह जान कर मुझे बड़ी हैरत होती कि कई मांओं ने अपने छोटेछोटे मासूम बच्चों को सिर्फ पीछा छुड़ाने की खातिर स्कूल में डाला हुआ था. कई बार बच्चे बुखार में तप रहे होते, मगर मांओं को इस का पता न होता. वे बुखार में तपते हुए बच्चों को आया और ड्राइवर के साथ स्कूल भेज देतीं. अगर यह नेमत इतनी सस्ती थी तो फिर मैं क्यों तड़प रही थी? क्यों बेचैन थी बच्चे के लिए? हम अल्लाहताला की नेमतों का शुक्रिया अदा नहीं करते. जब वह नहीं देता तो गिला करते हैं. देता है तो कद्र नहीं करते.

औरत और मर्द की शादीशुदा जिंदगी की बुनियाद उन की मोहब्बत और वफादारी पर टिकी होती है. मुझे ऐसा महसूस होने लगा था कि अब अमीर में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही. वह मेरा अब पहले जैसा खयाल नहीं रखते थे. रात को जल्दी से करवट बदल कर सो जाते. उन की मोहब्बत ठंडी पड़ गई थी. मैं उन से बात करने को तरसती रहती. मगर वह बेखबर गहरी नींद सोते रहते. शादी के 4 बरसों में मैं क्या इतनी बदसूरत और बासी हो गई थी कि अमीर को मुझ में किसी तरह की दिलकशी महसूस नहीं होती थी? मैं घंटों सोचती रहती. सुबह अमीर जल्दी चले जाते और बात आईगई हो जाती. औरत शादी के बरसों बाद भी अपने शौहर से यह सुनने की ख्वाहिश रखती है कि वह उस से मोहब्बत करता है. बिलकुल एक प्रेमी, एक आशिक की तरह, शौहर की तरह नहीं. और शादी वही कामयाब होती है, जिस में शौहर प्रेमी भी हो सिर्फ शौहर न हो.

उस दिन स्कूल की छुट्टी थी. मैं ने सोचा चलो, थोड़ा सा वक्त अपने आप को दूं. इसी खयाल से ब्यूटीपार्लर चली गई. बाल सेट करवाए. शाम को अच्छी सी साड़ी पहन कर अमीर का इंतजार करने लगी. कोई साढ़े 11 बजे अमीर आए. मैं कुरसी पर बैठेबैठे ऊंघ रही थी.

‘‘हैलो कंवल!’’ उन्होंने बिस्तर पर गिरने जैसे अंदाज में कहा. मैं ने अपने शौहर से कभी यह नहीं पूछा कि वह घर देर से क्यों आते थे. मैं इंतजार करती रही कि वह मुझे देखें और अपनी राय दें. मगर वह टाई की गिरह ढीली करते हुए बोले, ‘‘कंवल, जरा एसी तेज कर दो. मैं बहुत थक गया हूं.’’

‘‘क्या आज क्लीनिक में भीड़ ज्यादा थी?’’ मैं उन के नजदीक चली गई.

‘‘हां. और तुम खाना खा लो. मुझे भूख नहीं है.’’ उन्होंने आंखें बंद करते हुए कहा और जब कोई शौहर हर रोज यह कह कर सो जाए तो समझ लेना चाहिए कि उस ने पेट की भूख के साथसाथ जिस्म और रूह की भूख भी कहीं मिटा ली है.

सुबह नाश्ते की मेज पर मुझे देखते हुए अमीर ने कहा, ‘‘अरे वाह, यह हेयर स्टाइल कब तब्दील किया कंवल?’’

‘‘शुक्र है, आप ने देखा तो.’’ कार्न फ्लैक्स में दूध डालते हुए मैं ने कहा.

अचानक उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. मेज पर रखे हुए मेरे हाथ पर हाथ रखते हुए बोले, ‘‘अरे, तुम तो रूठती भी हो.’’

मैं ने इस बात पर नाराज नजरों से उन्हें देखा और उन के हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया और बहुत हौले से कहा, ‘‘याद है अमीर, मैं ने आप से क्या कहा था?’’

वह नजर उठा कर मुझे देखने लगे. न जाने क्यों अजनबियत का हलकाहलका धुआं उन की नजर से झांक रहा था.

‘‘मैं ने कहा था कि मेरे आगे सभी रिश्ते बेमतलब हैं. मैं रिश्तों की पहचान चाहती हूं.’’

‘‘हां, मुझे याद है.’’

‘‘मुझे अपनी जिंदगी के इस आखिरी खेल में मात न देना.’’

‘‘फिक्र न करो.’’ वह नैपकिन से मुंह साफ करते हुए लापरवाही से बोले तो मैं भी उठ खड़ी हुई.

‘‘आज रात का खाना मेरे साथ खा सकते हैं?’’

‘‘ओके.’’ वह कुछ सोचते हुए बोले और चले गए.

स्कूल में मेरा दिमाग उलझा रहा. मैं सोचती रही, क्या ऐसा मुमकिन है कि मेरा शौहर किसी दूसरी औरत के चक्कर में हो? घर आ कर मैं ने चिकन रोस्ट किया. रशियन सलाद और चाइनीज राइस बनाए. झींगों का सालन और फ्रूट ट्राफल बना कर जब कमरे में पहुंची तो शाम के साढ़े 5 बज गए थे. नहाधो कर तैयार हो रही थी कि मेरी सहेली लबना आ गई. उस के अब तक 3 बच्चे हो गए थे.

‘‘न जाने क्यों लबना, मुझे शिद्दत से तुम्हारी जरूरत थी.’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों, खैरियत तो?’’ फालसे का शरबत पीते हुए वह बोली.

‘‘यों अहसास होता है, जैसे मैं जिंदगी की बाजी हार रही हूं.’’

‘‘तुम्हारे पास सब कुछ है कंवल. फिर तुम ऐसा क्यों सोचती हो?’’

‘‘मेरे पास हमेशा ही सब कुछ था लबना, फिर भी मैं कंगाल थी. मैं ने अपनी मां से जिस शिद्दत से नफरत की है, उसी शिद्दत से उन्हें चाहा भी है. और उन्हीं की वजह से मेरे वजूद में बड़ेबड़े सूराख हो गए हैं, जो कभी नहीं भर सकते.’’

‘‘भूल जाओ सब कुछ.’’ लबना ने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रख दिए.

‘‘मैं भूलने की तरफ कदम बढ़ा रही थी लबना, मगर अब लगता है कई कदम पीछे हट गई हूं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मैं अमीर में एक बड़ी तब्दीली महसूस कर रही हूं. मेरे घर की बुनियादें हिल रही हैं. मुझे मशविरा दो, मैं क्या करूं?’’

‘‘क्या यह सिर्फ तुम्हारा शक है?’’

‘‘मेरे पास सुबूत नहीं है, मगर मुझे यकीन है.’’

‘‘शक की दीमकों से अपने घर की दीवारों को खोखली न करो कंवल.’’

‘‘नहीं लबना, मैं उन औरतों में हरगिज नहीं हूं, जो शौहर की हर हरकत की टोह में रहती हैं. मैं ने बहुत देखभाल और यकीन के बाद यह बात कही है.’’

‘‘फिर?’’

‘‘मैं चाहती हूं, वह मुझे धोखा न दें और खुद ही सब कुछ बता दें.’’

‘‘यह नामुमकिन है कंवल. कोई भी मर्द अपनी बेवफाई की दास्तान खुद नहीं सुनाता.’’

‘‘मगर अमीर अल्ताफ हुसैन को खुद ही सब कुछ बताना पड़ेगा.’’ मैं ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

लबना चली गई और मैं बेचैनी से अमीर का इंतजार करने लगी. वह साढ़े 10 बजे आए. मेज सजी देख कर वहीं बैठ गए. एक अजनबी सी खुशबू उन के कपड़ों से आ रही थी.

‘‘अमीर…’’

‘‘हूं.’’ सलाद खातेखाते उन का हाथ रुक गया.

‘‘यह अनजानी सी खुशबू की दीवार किस की है?’’

‘‘क्या मतलब?’’ उन के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘आप खूब जानते हैं कि मैं क्या कह रही हूं.’’

‘‘तुम्हारा वहम है कंवल. तुम कुछ दिनों के लिए अपने अब्बू के पास मुंबई चली जाओ.’’

‘‘मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए अमीर, मशविरा नहीं.’’

‘‘देखो कंवल,’’ खाना निकालतेनिकालते मेरे शौहर का हाथ रुक गया, ‘‘मुझे उन औरतों से सख्त नफरत है, जो अपने शौहर को कुरेदती हैं. अपने लंबेलंबे नाखूनों से अपने शौहर की खाल के नीचे घुसने की कोशिश करती हैं.’’ अमीर का लहजा तल्ख हो गया था.

मैं कुछ लम्हे उन की शक्ल देखती रही. मुझे यकीन हो गया था कि मैं ने अपना शौहर किसी दूसरी औरत के आगे हार दिया है. अब बहस से कोई फायदा नहीं था. मैं नार्मल अंदाज में अपनी प्लेट में पड़ा खाना खाती रही, यों जैसे कुछ भी न हुआ हो. फिर भी सारा वक्त मैं सोचती रही कि ऐसा क्यों हुआ? वह शख्स, जिसे मैं ने अपने तौर पर प्यार किया, चाहा, उस ने भी मुझे चाहा. फिर कैसे दूसरी औरत यह बाजी जीत गई? मुझ में, मेरे प्यार में क्या कमी थी? बहुत दिनों तक दिल बहुत उदास रहा. मेरे और अमीर के बीच ठंडी लड़ाई जारी थी. ऐसी लड़ाई, जिस की ठंडक से मेरी रीढ़ की हड्डी से गुजरने वाली सारी नसें जम गई हों और मेरे सारे जिस्म को लकवा मार गया हो.

एक दिन जब अमीर क्लीनिक से आए, तब मैं किताब पढ़तेपढ़ते ऊंघ गई थी. उन्होंने धीरे से मेरी गोद से किताब उठाई तो मैं अधखुली आंखों से उन्हें देखती रह गई. वह मेरी गोद में अपना सिर रख कर बोले, ‘‘कंवल, क्या ऐसा मुमकिन नहीं कि एक वक्त में एक मर्द दो औरतों से प्यार करे? एक उसे जिस्मानी राहत दे और दूसरी रूहानी. वह दोनों से प्यार करता है और उन में से किसी को भी छोड़ नहीं सकता. मैं क्या करूं? मुझे बताओ.’’

मर्द गलती कर के एक ऐसा छोटा बच्चा बन जाता है, जो टौफी न मिलने पर रूठा हुआ हो. इस दुनिया में मर्द को तो यह हक मिला है कि वह एक वक्त में अनेक औरतों से इश्क करे, मगर औरत को न तो समाज यह इजाजत देता है न खुद उस का जमीर. और अगर कोई ऐसी औरत है तो वह रखैल या वेश्या कहलाती है. उस रात बहुत सोचविचार के बाद मैं ने फैसला किया कि मैं किसी मनोवैज्ञानिक से मिलूंगी और उस की जरूरत मुझे यों पेश आई कि मुझे अपने तन से नफरत हो गई, घिन सी आने लगी. न जाने क्यों मुझे अपनी खाल के नीचे छोटेछोटे कीड़े रेंगते हुए महसूस हुए. मैं उन मनोवैज्ञानिक से मिली, जो दादाजान के दोस्तों में थे.

जब मैं ने उन्हें सब कुछ बता दिया तो उन्होंने कहा, ‘‘यह एक दौर है, जो गुजर जाएगा. फिर तुम अमीर के साथ यूं ही रहोगी, जैसे रहती आई हो.’’

‘‘नहीं डाक्टर अंकल, मुझे यह कहते हुए शर्म भी महसूस हो रही है, मगर बताए बिना उपाय भी नहीं. वह जब मेरे करीब आते या लेटते हैं तो मुझे मितली होने लगती है. मैं अपने आप पर कंट्रोल करती हूं, पर हो नहीं पाता.’’ यह कहतेकहते मैं रो पड़ी. उन्होंने मेरे आंसू खुश्क करते हुए कहा, ‘‘फिर तो अपने अंदर हिम्मत पैदा कर के फैसला कर डालो बेटी.’’

अभी मैं कोई फैसला नहीं कर पाई थी कि एक दिन मुंबई से अहमद का फोन आ गया. वह अमेरिका जा रहा था. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘आप अमेरिका कब आएंगी?’’

‘‘बहुत जल्दी.’’ मैं ने उसे यकीन दिलाया.

‘‘मेरे जाने से पहले आप मुंबई आ जाएं या फिर मैं पूना आ जाता हूं.’’

‘‘नहीं अहमद,’’ आंखों में आए आंसू साफ करते हुए मैं ने कहा, ‘‘मुझे बिछुड़ना पसंद नहीं मेरे भाई. खुदा हाफिज.’’

‘‘अपना खयाल रखिएगा.’’ यह कह कर उस ने फोन बंद कर दिया. अभी मैं रिसीवर रख कर पलटी ही थी कि जावेद आ गया.

‘‘कैसे हो जावेद?’’ हम वहीं लाउंज में बैठ गए.

‘‘ठीक हूं भाभी. मुझे आप से एक जरूरी बात करनी है.’’

‘‘कहो,’’ मैं गरम कौफी का मग होंठों से लगाते हुए बोली. फिर उस ने मुझे उस औरत का नामपता बताया, जिस के इश्क में अमीर अल्ताफ हुसैन यानी मेरे शौहर साहब गिरफ्तार थे. मैं हंस पड़ी, ‘‘मैं क्या करूं जावेद?’’

‘‘अगर आप नहीं कर सकतीं तो मुझे करने दें.’’

‘‘नहीं जावेद, यह मेरी लड़ाई है और यह मैं खुद ही लड़ूंगी.’’

‘‘भाभी, मैं और रीटा आप के साथ हैं. जिस तरह आप ने हमारा साथ दिया था, उसे मैं कभी भुला नहीं सकता.’’

‘‘क्या तुम ने यह बात अम्मी को बता दी है?’’

‘‘अगर आप कहें तो बता दूं?’’

‘‘नहीं जावेद.’’ मैं ने मुसकरा कर उसे देखा और हौले से उस का हाथ दबा कर बोली, ‘‘शुक्रिया मेरे भाई.’’

उस दिन रात के खाने पर अमीर मौजूद थे. खाने के बाद बोले, ‘‘कंवल, मुझे एक कौन्फ्रैंस में माल्टा जान पड़ेगा. करीब एक महीना लग जाएगा. मैं चाहता हूं कि तुम भी मेरे साथ चलो.’’

‘‘मुश्किल है अमीर, स्कूल में इम्तहान हो रहे हैं और फिर मैं अपने लिए कुछ वक्त चाहती हूं.’’

‘‘चली चलो. यह अच्छा मौका है और माल्टा अच्छी जगह है.’’

‘‘फिर कभी.’’ मैं हंस दी.

वह चले गए और मैं अकेली रह गई. उलझीउलझी फिरती रही. एक कसक, एक चुभन दिल के आरपार हो रही थी. एक सवाल मुझे बारबार परेशान कर रहा था, ‘‘क्या मैं और अमीर अब पहले की तरह रह सकते हैं? क्या मैं भी आम बीवियों की तरह अपने शौहर की बेवफाई का शिकवा न करूं? लेकिन मुझे पता था, यह नामुमकिन है. यह समझौता मुझ से न होगा. यह दोहरी जिंदगी कोई कैसे बिता सकता है?’’

उस दिन सुबह मुझे इस कदर जोर का चक्कर आया कि खड़े रहना मुश्किल हो गया. अंदर आई तो मितली सी महसूस हुई. खाली पेट का खयाल कर के एक बिस्कुट जो खाया तो वह भी बाहर आ गया. स्कूल के सामने ही एक छोटा सा खूबसूरत प्राइवेट अस्पताल था. वहां चली गई. टेस्ट वगैरह करवा कर वापस आई तो तबीयत बोझिल सी रही. दूसरे दिन सुबह मेरी मेज पर चपरासी मेरी रिपोर्ट रख गया था. मैं ने काम से फारिग हो कर छुट्टी से 10 मिनट पहले रिपोर्ट खोली और कुदरत के इस मजाक पर हंस पड़ी. यह कैसा करिश्मा था. रिपोर्ट के मुताबिक मैं अमीर के बच्चे की मां बनने वाली थी. मैं, जिसे मैडिकल साइंस ने बंजर जमीन बता दिया था.

अब मेरे फैसले की घड़ी आ पहुंची थी. बहुत सोचने के बाद उस दिन मैं जावेद के दिए हुए पते पर जा पहुंची. वह एक बहुत खूबसूरत कोठी थी. नौकर ने मुझे ड्राइंगरूम में बिठा दिया. थोड़ी देर बाद बिलकुल फिल्मी अंदाज में ड्राइंगरूम का परदा सरका. सफेद साड़ी पहने, कानों में हीरे और मोती के जेवर पहने, अपने कंधों पर बिखरे बालों पर हाथ फेरती हुई मेरे सामने मेरी वालिदा खड़ी थीं, जिन्हें 19 साल के लंबे अरसे के बाद मैं देख रही थी. वह अब भी वैसी ही थीं, उतनी ही खूबसूरत, जब वह मुझे छोड़ कर गई थीं. आंखों में अजीब सी जानपहचान की चमक लिए वह मुझे देख रही थीं.

‘‘कौन हैं आप?’’ उन्होंने धीरे से पूछा. जैसे जो कुछ वह देख रही थीं, उस की पुष्टि करना चाहती हों. मैं खामोश खड़ी अपने रहजन को देख रही थी. वह आगे बढ़ीं और इस से पहले कि वह मुझे छूतीं, मैं पीछे हट गई.

‘‘तुम कंवल हो?’’ उन्होंने हौले से कहा.

‘‘नहीं,’’ मैं बहुत आराम से उन के नरम, गद्देदार सोफे पर बैठ गई और उन की आंखों में देखते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम मिसेज अमीर अल्ताफ हुसैन है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जी, आप ने तो अपना नाम खालिदा से बदल कर गीता रख लिया है, मगर मैं अभी तक कंवल हूं.’’

वह दम साधे बैठी थीं. उन का रंग सफेद पड़ गया था.

‘‘मैं तो सिर्फ उस खूबसूरत औरत से मिलने आई थी, जिस के इश्क में मेरा शौहर गिरफ्तार है. आप हमारी जिंदगियों से निकल कर दोबारा क्यों आ गई हैं? एक बार हम आप की वजह से बिखर गए, तबाह हो गए. फिर आप दोबारा हमारी बरबादियों का सामान क्यों बन गई हैं?’’

‘‘सुनो कंवल, यह झूठ है.’’ वह बोलीं.

‘‘क्या झूठ है? यह कि आप मेरी मां हैं, या वह मेरे शौहर हैं या मैं आप की बेटी हूं? क्या झूठ है? बताइए न?’’ गम और सदमे ने मुझे निढाल कर दिया. मैं ने आगे बढ़ कर शीशे की मेज पर रखा अपना बैग उठाया. मगर इस से पहले कि मैं बाहर निकलती, उन्होंने बढ़ कर मुझे थाम लिया.

‘‘तुम इस तरह नहीं जा सकती कंवल. तुम्हें मेरी बात सुननी होगी.’’

‘‘हरगिज नहीं.’’

‘‘कंवल.’’ उन का हाथ उठा और पूरी ताकत से मेरे गाल पर अपना निशान छोड़ गया. आज इतने सालों बाद मुझे किसी ने थप्पड़ मारा था. मेरा गाल एक अजीब सा लज्जत से जल उठा. मैं कुरसी पर गिर पड़ी. आंसू मेरी आंखों से बह रहे थे. उन्होंने उठ कर मेरे हाथ से बाल हटाए और अपने होंठ उस पर रख दिए. मां के होंठों की गरमी से मेरा वजूद जलने लगा.

‘‘आज तक मुझे अपनी सफाई में कुछ कहने का कभी मौका नहीं दिया गया. न जाने तुम लोग मेरे बारे में क्या सोचते होगे. यह सोचसोच कर मैं ने ये साल गुजारे हैं, लेकिन आज तुम इस काबिल हो कि मुझे, मेरे हालात, मेरी बातों को समझ सको. जब मेरी शादी तुम्हारे अब्बू से हुई थी बेटी, तो मेरी उम्र उस वक्त सिर्फ 15 बरस थी.

‘‘मैट्रिक का इम्तहान दे कर मैं छुट्टियों में आराम कर रही थी. तुम्हारी दादी ने मुझे किसी समारोह में देखा और मुझ पर फिदा हो गईं. उन लोगों के पास दौलत की कमी नहीं थी और हमारे पास कुछ भी नहीं था. उन्हें एक खूबसूरत बहू चाहिए थी और मैं हसीन थी. सौदा तय हो गया और मेरी शादी तुम्हारे अब्बू से हो गई, जो मुझ से 14 साल बड़े थे.

‘‘मैं एक गरीब परिवार की लड़की, जब महलों में आई तो चकरा गई. तुम्हारे अब्बू लंदन से नएनए पढ़ कर आए थे. बेहद नए खयालात के मालिक थे. मेरे लंबेलंबे बाल कटवा कर उन्होंने मेरा हुलिया ही बदल डाला. वह मुझे पार्टियों में ले जाते, जहां गैरमर्द मेरे नजदीक आ कर मेरी कमर में बाहें डाल देते और तुम्हारे अब्बू खड़े हंस रहे होते. उन के लिए ये सब आम बातें थीं, जो ऊंची सोसायटी में रोजमर्रा होती थीं. लेकिन मुझे शुरूशुरू में अजीब सा लगा. साड़ी का पल्लू अपने बदन से लपेट लेती, ताकि कोई मेरा जिस्म न देख सके, मगर कुछ हासिल न होता.

‘‘मैं उम्र के कच्चे दौर से गुजर रही थी. बहुत जल्दी मुझ पर उन पार्टियों का जादू चल गया और मैं उस रंग में रंग गई, जिस में मेरे शौहर चाहते थे. फिर तुम पैदा हुई, जिस के बाद मेरी मुलाकात अजीज से हुई, जो तुम्हारे अब्बू के करीबी दोस्तों में थे. वह पहली ही नजर में मुझे पसंद करने लगे थे. हम दोनों घंटों बेतकल्लुफ बातें करते. फिर अहमद पैदा हुआ तो जफर और मेरे दरमियान दूरी बढ़ गई. शौहर और बीवी के बीच जिस्मानी रिश्ते के अलावा भी कुछ होना चाहिए बेटी, जो हम दोनों में नहीं था.

‘‘मुझे पता चल गया था कि अब मैं जफर के साथ नहीं रह सकूंगी. मैं ने तलाक की मांग की तो जफर ने तुम दोनों को मुझ से जुदा कर दिया. तलाक के फौरन बाद मेरी शादी अजीज से हो गई, जिस ने अपनी बीवी को तलाक दे दी थी. तुम पूछोगी बेटी कि यह गीता कौन है, तो गीता मेरी बेटी है. शादी के 2 साल बाद ही वह बेवा हो गई है. उस के शौहर को ब्रेन ट्यूमर था, जिस का इलाज अमीर ने किया था. वह बेहद दुखी है बेटी.’’

उन के बारबार यों बेटी कहने से न जाने क्यों मेरा खून खौल रहा था. उन्हें भला मुझे बेटी कहने का क्या हक था? उन्होंने मुझे जनम दिया था और बस. उन की बात खत्म होने पर मैं कुछ लम्हे उन्हें देखती रही. उन की खूबसूरत आंखों से आंसू बह रहे थे. मैं ने उन से कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि आप को क्या कह कर मुखातिब करूं? मां कहने का हक तो आप कब का खत्म कर चुकी हैं. बहरहाल आप मेरी मां हैं और जज्बात में बहने वाली लड़कियों में से मैं नहीं हूं, इसलिए मैं आप को मां ही कहूंगी. आप की कहानी सुन कर न तो मुझे अपने बाप से नफरत हो सकी है और न आप से हमदर्दी. खैर, अब्बू ने अपनी जवानी हमारे नाम कर दी थी. कम से कम अहमद के नाम. लेकिन मुझे आप से कोई शिकायत नहीं है. आप की अपनी जिंदगी थी और आप ने अपने लिए जिस जिंदगी को चुना है, उस पर आप को हक था. हो सकता है, आप को मुझ से ज्यादा गीता से प्यार हो, लेकिन यकीन जानें, मेरे जज्बात भी आप के लिए कोरे हैं.’’

‘‘नहीं कंवल,’’ उन्होंने मेरी बात काट कर कहा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए भी बहुत तड़पी हूं, रोई हूं. मुझे तुम भी उतनी ही प्यारी हो.’’

‘‘खैर, यह सब किताबी और जज्बाती बातें हैं अम्मी.’’ मैं हंस पड़ी, ‘‘क्योंकि जब प्यार देने का वक्त आया था तो आप ने हमें छोड़ दिया था. यों आप ने तो मुझे तोड़ दिया था अम्मी. मेरी शख्सियत को बनने के पहले ही तबाह कर दिया था. आप के लगाए हुए जख्म नासूर बन कर उसी तरह रिस रहे हैं. 9 बरस की उस मासूम लड़की पर जवानी न आ सकी और वह बूढ़ी हो गई अम्मी. बहुत ज्यादा ऐशोआराम में पलने के बावजूद मेरे वजूद में पड़ी इन दरारों को कोई न भर सका.’’

मेरी आंखों में मिर्चें सी लग रही थीं. आंसुओं का एक समंदर था, जो मेरे अंदर उमड़ रहा था. मैं भागती हुई बाहर निकली और वहां से चली आई. घर आ कर इतना रोई कि जिंदगी में कभी न रोई थी.

‘‘तो कंवल अमीर, तुम जिंदगी की आखिरी बाजी भी हार आई हो.’’ मैं ने खुद से कहा और वक्त के एक बहुत नाजुक लम्हे में वह फैसला कर लिया. फिर लबना को बुलाया. वह आई तो उसे सब कुछ कह सुनाया.

‘‘सब भूल जाओ कंवल,’’ उस ने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारा बच्चा होगा तो अमीर सब भूल जाएंगे.’’

‘‘हो सकता है कि ऐसा ही हो लबना, मगर मैं एक ऐसे इंसान के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती, जो बाकी सारी उम्र शर्मिंदा ही रहे और यह रिश्ता कानूनन यों भी जायज नहीं. विश्वास की डोर भी टूट गई है. अब कुछ नहीं हो सकता. मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं अमेरिका चली जाऊंगी. मेरा अपना पैसा है और मेरा भाई है वहां. तुम अपने शौहर नवेद भाई से कह कर मेरा पासपोर्ट वीजा बनवा सकती हो. आखिर उन की एजेंसी किस दिन काम आएगी?’’

‘‘कंवल, यह बहुत खतरनाक कदम है.’’

‘‘मैं अमीर के आने से पहले यहां से चली जाना चाहती हूं. पहले मुंबई और फिर अमेरिका. अगर तुम मेरी मदद कर सकती हो तो ठीक है, वरना…’’

‘‘ओके कंवल.’’ मेरे लहजे की संजीदगी ने उसे हथियार डालने पर मजबूर कर दिया.

स्कूल की चाबी मैं ने लबना के हवाले कर दी और भागदौड़ कर नवेद भाई ने मेरे जाने का प्रबंध कर दिया. जिस रात अमीर वापस आ रहे थे, उसी शाम मुझे मुंबई के लिए फ्लाई करना था. जाने से पहले अमीर के नाम मैं ने एक लंबा खत लिखा—

अमीर,

अब तुम्हें जान या डियर लिखते हुए बहुत अजीब लग रहा है. इसलिए कि तुम मेरी न जान हो और न मैं तुम्हारी. हम दोनों एकदूसरे के बगैर भी रह सकते हैं. यह सब दिखावे के खोखले रिश्ते हैं, जिन्हें हम निभाए जा रहे थे और जो अब कच्चे धागे की तरह टूट गए हैं. मैं जा रही हूं. तुम से कुछ नहीं चाहिए. मेरा कुछ पैसा है, वह साथ लिए जा रही हूं और जहां भी जाऊंगी, नौकरी कर के अपनी जिंदगी की गाड़ी चला लूंगी. जब तुम्हें इस बात का पता चलेगा कि तुम मेरी मां की बेटी, यानी मेरी सौतेली बहन से इश्क करते हो तो तुम शर्मिंदगी के बोझ तले दब जाओगे. अमीर, अगर मैं रह गई और तुम लौट आए तो भी एक ऐसे मर्द के साथ जिंदगी बितानी पड़ेगी, जो मुझ से मोहब्बत नहीं करता और सिर्फ अपनी शर्मिंदगी का बदला चुका रहा होगा, जो नामुमकिन है. मैं ने एक दिन तुम से कहा था न कि मेरे आगे सारे रिश्ते कोरे हैं, उन का कोई नाम नहीं, मुझे उन की पहचान करना है.

तो दोस्त, रिश्ते अब भी वैसे ही कोरे कागज की तरह हैं. उन का कोई नाम नहीं है और मैं बेनाम रिश्तों के साथ सारी उम्र अपने जिस्म पर दाग नहीं लगाना चाहती, क्योंकि यह दाग मेरे जिस्म पर नहीं, बल्कि मेरी रूह पर लगेंगे. तुम्हारे आखिरी दाग की निशानी मेरे वजूद पर लग चुकी है और शायद इसी से मेरी बेनाम जिंदगी की शुरुआत हो. यही दाग मेरे जीने का बहाना बन जाए. तुम्हारी दलील अपनी जगह सही है कि एक वक्त में 2 इंसानों को एक जैसा, एक ही जितना प्यार किया जा सकता है. मगर मेरे लिए यह एक मजाक की बात है. मेरे दोस्त, मैं जिंदगी में हमेशा तुम्हारी बीवी रहना चाहती हूं. मुझे तुम से कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ तुम्हारा नाम चाहिए, जिस की जरूरत मुझ से ज्यादा उस वजूद को होगी, जो मेरे वजूद में सांसें ले रहा है.

यह एक नरम, मुलायम सा समझौता होगा, जो मेरे और तुम्हारे दरमियान रहेगा और मुझे उम्मीद है कि तुम भी इसे तोड़ने की कोशिश नहीं करोगे. इसलिए कि यह बेनाम सा रिश्ता, जो हमारे दरमियान है, जिसे न तो  मोहब्बत के नाम से याद करूंगी और न दोस्ती से, न जाने क्या है? लेकिन उस आने वाले वजूद के लिए बहुत अहम है, जिसे तुम्हारी मैडिकल साइंस ने सिरे से खत्म कर दिया था. मगर यह जिंदगी एक स्टेज है और हम सब अदाकार हैं. इस करिश्मे को अपने वजूद में छिपा कर मैं तुम से बहुत दूर जा रही हूं. न जाने तुम मेरी बात समझे भी हो या नहीं? यह बात तुम्हें मालूम हो जाएगी कि गीता मेरी बहन है. इस मामले में जो तुम्हारी शरई जिम्मेदारी होगी, वह तुम समझ सकते हो.

—केवल कंवल

यह खत मैं ने टेलीफोन की मेज पर रखा और आखिरी बार उन बेजान चीजों की तरफ देखा, जो मेरी थीं. अपनी आंखों में आंसुओं के समंदर छिपाए एयरपोर्ट की तरफ रवाना हो गई. Family Betrayal Story

 

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