Crime Stories: ताऊ और ताई तो शालू को पढ़ालिखा कर उस की जिंदगी रौशन करना चाहते थे जबकि वह कशिश के प्यार में पड़ कर अपने शुभचिंतक ताऊ और ताई को धोखा दे रही थी. इस के बाद उस ने क्या किया…
बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.
11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.
शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.
शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.
शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.
सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.
शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’
‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.
‘‘कहां हैं वह?’’
‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’
‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’
‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.
उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.
शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’
‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’
शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.
परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.
शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.
एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.
जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.
पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.
शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.
इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.
पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’
इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’
‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’
‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’
पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.
‘‘सोच कर बताओ?’’
‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’
सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.
पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.
तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.
निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.
लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.
इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.
निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.
निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.
शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.
देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.
कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.
कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.
उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’
शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.
इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’
कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.
योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’
‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’
दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.
इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.
शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित






