Crime Stories: मांबाप की उपेक्षा का शिकार बलदेव सिंह लोगों की सेवा कर के पैसा कमाना चाहता था, लेकिन सेवा से पैसा नहीं मिला तो उस ने 2 लोगों को मौत के घाट उतार दिया. इस के बाद तो उस ने हत्याओं का ऐसा सिलसिला चलाया कि…

कुछ दिनों पहले देश के प्रमुख अखबारों में एक समाचार प्रमुखता से छपा था कि देश में एक ऐसा सीरियल किलर गिरोह सक्रिय है, जो अब तक सौ से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार चुका है. आगे भी न जाने कितने लोगों की हत्याएं कर सकता है. गिरोह में कितने सदस्य हैं, इस की किसी को खबर नहीं थी. वे हत्याएं क्यों कर रहे थे, इस का भी कुछ पता नहीं चल रहा था. कहीं लगता था कि हत्या लूटपाट के लिए की गई है तो कहीं कुछ और ही नजर आ रहा था. कत्ल करने का तरीका जरूर पता चल गया था. पहले वे मारने वाले को विश्वास में लेते थे, उस के बाद उसे एकांत में ले जा कर उस का टेंटुआ दबा कर मौत के घाट उतार देते थे.

मजे की बात यह थी कि हत्यारों ने कहीं कोई सुराग नहीं छोड़ा था. उन्हें हत्या करते भी किसी ने नहीं देखा था. कहीं कैमरे में भी उन का यह कारनामा नहीं कैद हुआ था. मुंबई में इस गिरोह के एक सदस्य के पकड़े जाने की जानकारी जरूर मिली थी, लेकिन उस से भी विस्तार से कुछ पता नहीं चला था. शायद मुंबई पुलिस गिरोह के सभी सदस्यों को गिरफ्तार करने के बाद ही इस अमानवीय कांड के रहस्य से परदा हटाना चाहती थी. मुंबई पुलिस अपने हिसाब से मामले की जांच कर रही थी कि पंजाब की एक घटना ने अचानक इस पूरे रहस्य से परदा हटा दिया.

4 जून, 2015 को लुधियाना के थाना डिवीजन नंबर 6 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर कंवरजीत सिंह को उन के मुखबिर से सूचना मिली कि कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के मकान नंबर 5740 में रहने वाले बलवीर सिंह का बेटा इंदर सिंह देखने में तो सीधासादा साइकिल रिपेयर करने वाला गुरसिख है. लेकिन असलियत में वह बहुत खतरनाक अपराधी है. संदेह है कि वह कई हत्याओं में शामिल रहा है. मुखबिर की इस सूचना पर कंवरजीत सिंह को याद आया कि उस आदमी को तो उन्होंने कई बार थाने बुला कर उस से थोड़ीबहुत पूछताछ की थी.

इस पूछताछ में उन्हें कभी नहीं लगा था कि वह किसी हत्या में शामिल रहा होगा. धरमकरम की बातें करने वाले उस आदमी से जो छोटेमोटे अपराध हो गए थे, उस के लिए उस ने अफसोस जाहिर करते हुए यही कहा था कि अब उस ने अपनी जिंदगी वाहेगुरु को समर्पित कर दी है. किसी भी तरह का अपराध करने की कौन कहे, अब वह किसी का मन दुखाने की भी नहीं सोचता. वह सच्चाई की राह पर चलना चाहता है. कुछ भी था, मुखबिर की सूचना को न एकदम से झुठलाया जा सकता था और न ही इस बात को हलके में लिया जा सकता था. इसलिए कंवरजीत सिंह ने एसआई राजविंदर सिंह को भेज कर उस आदमी को थाने बुलवा लिया. वह आसानी से चला भी आया.

थाने में इंदर सिंह से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह पुलिस को बहकाता रहा, लेकिन जब पुलिस ने उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया तो अचानक उस ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘साहब, जब किसी आदमी का बुरा वक्त आता है तो उस के हाथों ऐसेऐसे काम हो जाते हैं, जिन्हें करने के बारे में उस ने कभी सोचा भी नहीं होता.’’

‘‘तो तुम्हारे हाथों ऐसे कौन से गलत काम हो गए, जिन्हें करने के बारे में तुम ने कभी सोचा भी नहीं था?’’ एसआई राजविंदर सिंह ने पूछा.

इंदर सिंह की इन बातों से राजविंदर सिंह को थोड़ी हैरानी हुई थी. उस समय वह 2 सिपाहियों के साथ उस से सहज रूप से बात कर रहे थे. शुरुआती पूछताछ चल रही थी.

इसी शुरुआती पूछताछ में राजविंदर सिंह उसे बातों में उलझा कर धीरेधीरे मनोवैज्ञानिक ढंग से मुद्दे की बात पर इस तरह ले आए कि उस ने ऐसा अपराध स्वीकार कर लिया कि सुन कर दोनों सिपाहियों सहित राजविंदर सिंह के पैरों तले से जमीन खिसक गई. राजविंदर सिंह के सवालों के जवाब में इंदर सिंह ने कहा था, ‘‘गलत तो गलत ही है साहब, हम आदमी पर आदमी मारते गए, जो भी हत्थे चढ़ा, टेंटुआ दबा कर उसे ऊपर पहुंचा दिया. कभी हिसाब लगाने की कोशिश ही नहीं की कि हम ने कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है.’’

इंदर सिंह के इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद राजविंदर सिंह उसे सिपाहियों की निगरानी में छोड़ कर सीधे थानाप्रभारी के पास पहुंचे. राजविंदर की बात सुन कर कंवरजीत सिंह भी सकते में आ गए. इस का मतलब मुखबिर की सूचना एकदम सही थी. उन्होंने तुरंत इस बात की जानकारी लुधियाना के डीसीपी नवीन सिंगला को दे कर उन से दिशानिर्देश मांगे. नवीन सिंगला ने कहा, ‘‘इस तरह की बातें करने वाले का या तो दिमाग हिला होता है या फिर वह बहुत शातिर किस्म का होता है. इसलिए उस आदमी से ज्यादा सख्ती करने के बजाय मनोवैज्ञानिक तरीके से ही पूछताछ जारी रखो. अगर वह लुधियाना के किसी हत्या के मामले के बारे में बताए तो उसे विधिवत गिरफ्तार कर लो.’’

कंवरजीत सिंह राजविंदर के साथ इंदर सिंह से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में इंदर सिंह ने जो बताया, उस से उस की कहानी इस तरह से सामने आई: इंदर सिंह, जिस ने अपना असली नाम बलदेव सिंह बताया, जिला लुधियाना की तहसील जगराओं की चुंगी नंबर 5 के पास स्थित मोहल्ला अगवाड़गुजरां का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हरभजन सिंह था. उस के मांबाप ने उस का नाम बलदेव सिंह रखा था. 4 भाइयों में बलदेव दूसरे नंबर पर था. बड़े भाई निहाल सिंह और उस से छोटे डिंपल सिंह का विवाह हो चुका था. लेकिन उस की और सब से छोटे जस्सा सिंह की शादी नहीं हुई थी.

सातवीं पास करने के बाद बलदेव ने वैल्डिंग का काम सीखा और एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगा. जब तक वह बाहर रहता, खुश रहता. लेकिन घर आते ही उस की खुशी गायब हो जाती. इसलिए उस का मन घर में बिलकुल नहीं लगता था. इस की वजह यह थी कि उस के पिता जराजरा सी बात पर उस की मां की पिटाई करते रहते थे, जो उस से बरदाश्त नहीं होता था. पिता ने घर में इस तरह अपना दबदबा बना रखा था कि घर में उस से कुछ कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी. कह तो बलदेव सिंह भी कुछ नहीं पाता था, लेकिन उसे यह बात खलती बहुत थी. एक दिन उस के पिता किसी बात पर उस की मां को मारनेपीटने लगे तो उस से बरदाश्त नहीं हुआ और उस ने आगे बढ़ कर पिता का हाथ पकड़ लिया.

इस बात पर पिता ने तो उसे मारापीटा ही, मां ने भी उसे ही डांट कर उस की गलती निकाली. यही नहीं, पिता ने घर से निकल जाने को कहा तो उस के इस फैसले में मां ने भी उसी का साथ दिया. इस के बाद उस घर में रहना बलदेव सिंह को ठीक नहीं लगा और उस ने हमेशा के लिए अपना घर छोड़ दिया. इधरउधर भटकता हुआ एक दिन वह हिमाचल प्रदेश के सुप्रसिद्ध मणिकर्ण गुरुद्वारा पहुंचा. वहां रहते हुए संगतसेवा में उस का मन कुछ इस कदर रमा कि उस ने वहीं रहने का मन बना लिया. उसे वहां रहते हुए धीरेधीरे 6 साल बीत गए.

एक बार वहां इस तरह का एक ऐसा धार्मिक जत्था आया, जो देश के सभी धर्मस्थलों की यात्रा पर निकला था. मणिकर्ण में रहते हुए बलदेव सिंह को काफी अरसा गुजर गया था, इसलिए अन्य धर्मस्थलों को देखने की चाह में वह उस जत्थे के साथ आगरा चला गया. वहां गुरु का ताज गुरुद्वारा उसे इस कदर पसंद आया कि वह वहीं रुक गया और संगतों की सेवा करने लगा. यहां मुंबई का रहने वाला एक लंगड़ा एक अन्य लड़के के साथ गुरुद्वारा के जानवरों की सेवा करता था. रोजरोज मिलने से बलदेव की उन से दोस्ती हो गई. कुछ ही दिनों में उन की यह दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई. इस की वजह यह थी कि तीनों की पारिवारिक स्थितियां करीबकरीब एक जैसी थीं.

बलदेव की तरह उन दोनों के घरों में भी उन के मांबाप के बीच झगड़ा रहता था. इन्हीं झगड़ों से परेशान हो कर वे भी घर से भाग आए थे. एक दिन तीनों ने सलाह की कि क्यों न वे मिल कर शहर में एक कमरा ले लें, जहां से आराम से सो सकें. इस के बाद उन्होंने आगरा शहर में वाजिब किराए पर एक कमरा ले लिया. इस के बाद वे दिन भर गुरुद्वारा में सेवाकार्य करते और खापी कर रात में अपने कमरे पर आ कर आराम से सो जाते. उन के पास जो थोडे़बहुत पैसे थे, उन से उन्होंने कमरे का पहले महीने का किराया दे दिया था. आगे के लिए उन के पास पैसे नहीं थे. गुरुद्वारा में उन की सेवा के बदले मुफ्त में खाने और ठहरने की सुविधा थी. इस के अलावा उन्हें वहां से कोई तनख्वाह वगैरह नहीं मिलती थी.

एक तरह से किराए का कमरा ले कर उन्होंने बेकार ही अपना खर्च बढ़ा लिया था. पैसों की दिक्कत आई तो सलाहमशविरा कर के उन्होंने उस का भी हल निकाल लिया. दरअसल, दिन भर तो गुरुद्वारा में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती ही थी, रात में भी बाहर से आए लोगों की अच्छीखासी संख्या वहां ठहरा करती थी. इसलिए वहां के सभी कमरे प्राय: भरे रहते थे. ऐसे में बलदेव और उस के दोस्तों को अक्सर गुरुद्वारा के प्रांगण में फर्श पर सोना पड़ता था. इसी वजह से उन्होंने शहर में किराए का कमरा लिया था. पैसे की दिक्कत हल करने के लिए उन्होंने योजना यह बनाई कि रात में गुरुद्वारा से चलते समय वह ऐसे 2-3 लोगों को अपने साथ कमरे पर ले आएंगे, जिन्हें वहां कमरा नहीं मिला हुआ होगा. कमरे पर ला कर वे उन की खूब सेवा करेंगे, जिस के बदले में वे उन से कुछ बख्शीश मांग लिया करेंगे.

इस के बाद उन्होंने एक दंपति को अपने साथ ले जाने के लिए राजी कर लिया. उन्होंने उन्हें अपने कमरे पर ला कर उन की खूब सेवा की. उस दंपति ने भी अपना हक मानते हुए उन से सेवा तो खूब करवाई, लेकिन सुबह चलते समय बख्शीश के नाम पर उन्हें कुछ नहीं दिया. जबकि उन के पास पैसों की कमी नहीं है, इस बात का अंदाजा बलदेव और उस के साथियों को हो गया था. दंपति के इस रवैए पर उन्हें गुस्सा आ गया. परिणामस्वरूप उन्होंने पतिपत्नी को पकड़ कर उन के टेंटुए दबा दिए. दोनों को मौत के घाट उतार कर उन का सारा पैसा और अन्य कीमती सामान ले लिया.

बिना किसी योजना के अचानक उन लोगों ने 2 कत्ल कर दिए थे. परेशान होना लाजिमी था. पुलिस पकड़ कर जेल में डाल देती. पुलिस से बचने के लिए लाशों को कमरे में बंद कर के उन्होंने बाहर से ताला लगाया और बस से मथुरा चले गए. वहां से पीलीभीत जाने के लिए उन्होंने बसअड्डे से एक टैक्सी की. अब तक कत्ल करने की उन की घबराहट पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. अब उन्हें लगने लगा था कि पैसा कमाने का यह बढि़या और आसान तरीका है. टैक्सी में लंगड़ा आगे ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था. बलदेव और दूसरा साथी पीछे वाली सीट पर बैठे थे.

तीनों में दोस्ती जरूर थी, लेकिन अभी तक वे एकदूसरे के निजी जीवन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. सही बात तो यह थी कि अभी उन्हें एकदूसरे के नाम तक पता नहीं थे. वे एकदूसरे को बाबाजी कह कर पुकारते थे. हालांकि बाद में बलदेव को एक का नाम बलजिंदर मालूम हो गया था. मथुरा के बसअड्डे से चल कर टैक्सी करीब एक किलोमीटर गई होगी कि तीनों ने एकदूसरे को आंखों का इशारा किया और टैक्सी रुकवा ली. बलजिंदर ड्राइवर के ठीक पीछे बैठा था. टैक्सी के रुकते ही उस ने ड्राइवर के गले में रस्सी डाली और कसना शुरू कर दिया. लंगड़े और बलदेव ने ड्राइवर को तब तक पकड़े रखा, जब तक वह मर नहीं गया. उस की तलाशी में उस के पास उन्हें मात्र 8 सौ रुपए मिले.

सुनसान जगह पर लाश को फेंक कर टैक्सी लंगड़ा चलाने लगा. कोई 7-8 किलोमीटर दूर जाने पर एक टै्रक्टर ट्रौली से कार का एक्सीडेंट हो गया. तब कार को वहीं छोड़ कर वे बस से अमरियां की ओर चल पड़े. अमरियां से करीब 20 किलोमीटर दूर एक कस्बे में बस रुकी तो उन्होंने बस छोड़ दी और एक टैक्सी किराए पर ले ली. इस के ड्राइवर को भी पहले की तरह रास्ते में मार कर लाश गड्डे में फेंक दी और कार ले कर चले गए. इस ड्राइवर की जेब से उन्हें मात्र 3 सौ रुपए मिले थे.अमरियां शहर में इन्होंने खायापिया. ये किसी छोटी जगह पर रुकना चाहते थे. अमरियां से थोड़ा आगे बढ़े होंगे कि टैक्सी का बोनट झटके से खुल गया और उस की विंडस्क्रीन टूट कर बिखर गई.

टैक्सी को उसी हालत में वहीं छोड़ कर वे एक ट्रक से अमरियां लौट आए और वहां से पीलीभीत की ओर चले गए. वहां से इन्हें कारसेवा वालों की बस मिल गई, जिस से ये पंजाब चले गए. पंजाब पहुंच कर लंगडे के कहने पर उसे मोरिंडा फतेहगढ़ रोड पर स्थित रेलवे फाटक पार करते ही खुले में पड़ने वाले संतों के एक डेरे पर उतार दिया गया. जबकि बलजिंदर और बलदेव पहले लुधियाना गए और फिर वहां से अमृतसर चले गए. अमृतसर में दोनों हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा में सेवा करते हुए अपना समय बिताने लगे. यहां एक दिन उन की मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई, जो उन दिनों मणिकर्ण गुरुद्वारे में सेवा किया करता था, जब ये भी वहां सेवा कर रहे थे.

वह आदमी पेशे से पेंटर था, शहर में उस की अपनी दुकान थी. एक दिन वह बलदेव और बलजिंदर को अपनी दुकान पर ले गया, जहां उन्होंने उसे लूटने की नीयत से उस का टेंटुआ दबा दिया. मारने के बाद उस की सोने की चेन, अंगूठियां और नकदी लूट कर उसी के स्कूटर से वे लुधियाना आ गए. यहां गिल चौक इलाके के एक आदमी को बलजिंदर ने वह स्कूटर बेच दिया, साथ ही यहीं पर रहने का तय कर लिया. लुधियाना के कोटमंगलसिंह इलाके में उन्होंने किराए पर कमरा ले लिया. मकान मालिक बुजुर्ग औरत थी. एक दिन उन्हें मौका मिला तो उन्होंने गला घोंट कर उसे भी मार दिया.

यहां लूटपाट करने के बाद दोनों एक संत के डेरे पर जा कर वहां आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा करने लगे. लुधियाना में ही बलदेव की एक दूर की रिश्तेदार रहती थीं. 15 दिनों बाद वह बलजिंदर को साथ ले कर उस से मिलने चला गया. पहले भी वह उन के यहां जाता रहता था. लेकिन तब उस की सोच इस तरह की नहीं थी. जिंदगी के प्रति अब उस का नजरिया बदल चुका था. बलदेव की उस रिश्तेदार देविंदर कौर के गले में पहनी सोने की मोटी चेन और कानों में लटकते कीमती झुमके देख कर बलजिंदर के हाथों में खुजली होने लगी. उस ने आव देखा न ताव, गले में डाल रखे दुपट्टे से ही देविंदर कौर का काम तमाम कर दिया. इस के बाद बलदेव ने उस के सारे गहने उतार लिए.

यहां से भाग कर दोनों हुजूर साहिब चले गए, जहां उन्हें पुराना सेवादार गुलजार सिंह मिल गया. इस के बाद तीनों एकसाथ मुंबई चले गए. वहां वे चूडि़यां बनाने वाली फैक्ट्री में काम करने लगे. एक महीने बाद बलदेव अकेला दिल्ली आ गया और फर्नीचर का काम करने लगा. दिल्ली में उसे किसी अखबार से पता चला कि मुंबई में बलजिंदर एक फैक्ट्री मालिक की हत्या के आरोप में गोरेगांव पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है. उस में छपे समाचार में यह भी लिखा था कि पुलिस की पूछताछ में उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर 105 लोगों से अधिक की हत्याएं करने की बात कबूली है. इस से बलदेव सिंह को यह सोच कर घबराहट होने लगी कि बलजिंदर ने कहीं उस का नाम तो नहीं ले लिया.

डर की वजह से वह गुरुद्वारा शीशगंज में जा कर रहने लगा. कुछ दिनों बाद उसे वहां एक ऐसा बुजुर्ग जोड़ा मिला, जिन का जवान बेटा कई सालों पहले उन से नाराज हो कर कहीं चला गया था. उस की तलाश में वे मारेमारे फिर रहे थे. आंखों से भी उन्हें कम दिखाई देने लगा था. कुदरत का खेल देखो कि बलदेव की शक्लसूरत और कदकाठी उन के बेटे से हूबहू मेल खा रही थी. उसे देखते ही उन्होंने जिद पकड़ ली कि वही उन का खोया बेटा है. पतिपत्नी बलदेव से मिन्नत करने लगे कि वह गुस्सा थूक दे और उन के साथ घर लौट चले. इस बुजुर्ग दंपति का नाम था बलबीर कौर और सरदार बलबीर सिंह. ये लुधियाना के कलगीधर रोड पर शिमलापुरी की गली नंबर 17 के म.नं. 5740 के रहने वाले थे. उन के बेटे का नाम था इंदर सिंह.

बलदेव सिंह उन्हें बिलकुल नहीं जानता था. लेकिन उसे लगा कि कुदरत ऐसा खेल खेल कर शायद उसे बचाना चाहती है. वह उस बुजुर्ग दंपति के साथ उन का बेटा इंदर सिंह बन कर लुधियाना आ गया. उस ने तय कर लिया था कि अब वह कभी कोई अपराध नहीं करेगा. यहां भी दुर्भाग्य ने उस का साथ नहीं छोड़ा. इंदर सिंह भी छोटेमोटे अपराधों में पुलिस में वांछित था. इसी डर से वह भगौड़ा हुआ था. उस के मांबाप के मन में न जाने कैसे यह बात बैठ गई थी कि वह उन की किसी बात पर खफा हो कर घर छोड़ कर चला गया था.

पुलिस को जब उस के घर आने की खबर मिली तो उसे थाने में बुलाया जाने लगा. इस बात का पुलिस को कभी अंदाजा नहीं था कि वह इंदर सिंह न हो कर उस का हमशक्ल है. चूंकि उस के खिलाफ दर्ज मामले ज्यादा गंभीर नहीं थे, इसलिए पुलिस उसे थाने बुला कर थोड़ीबहुत पूछताछ कर के समझाबुझा कर घर भेज देती थी. लेकिन जब उस के सीरियल किलर होने की जानकारी मिली तो पुलिस ने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से विस्तृत पूछताछ की. तब उस ने अपना अपराध स्वीकार करने में देर नहीं लगाई. इस पूछताछ से लुधियाना में हुए 2 कत्ल के मामले भी हल हो गए. जहां तक 105 से अधिक कत्ल करने संबंधी छपे समाचार का सवाल था तो इस बारे में उस ने पुलिस को यही बताया कि इस के विधिवत खुलासा बलजिंदर ही कर सकता है.

लुधियाना में हुए कत्ल के मामलों में बलजिंदर भी वांछित था, इसलिए पुलिस ने 22 अगस्त, 2015 को उसे ट्रांजिट रिमांड पर लुधियाना ले आने का प्रयास किया. लेकिन मुंबई पुलिस का कहना है कि इस बारे में जब तक महाराष्ट्र सरकार की अनुमति नहीं मिल जाती, इतने खौफनाक अपराधी को मुंबई से बाहर नहीं भेजा जा सकता. इस दौरान बलदेव सिंह को 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर रख कर गहन पूछताछ की गई. उस के बाद लुधियाना पुलिस ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से अन्य जगहों की पुलिस उस के द्वारा अपने यहां किए गए अपराध संबंधी पूछताछ करने के लिए ट्रांजिट रिमांड पर ले जा रही है.

पंजाब पुलिस बलदेव सिंह का डोजियर देश के अन्य तमाम राज्यों को भेज कर उन के यहां उस के बताए तरीके से हुई हत्याओं की सूची तैयार कर रही है. पुलिस का कहना है कि बलदेव सिंह ने जितने कत्ल किए हैं, उन सब का ब्यौरा सिलसिलेवार बताना, उस के लिए संभव नहीं है. वैसे उस का कहना है कि वह जिस भी शहर में गया है, वहां उस ने कम से कम 5-7 हत्याएं तो की ही हैं. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

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