Emotional Story: मुगल बादशाह शाहजहां अपनी बेगम मुमताज महल को बहुत प्यार करते थे, उस प्यार की निशानी के रूप में उन्होंने ताजमहल बनवाया था. उसी तरह अपनी बीवी से मोहब्बत करने वाले कादरी भी गांव में छोटा सा ताजमहल बनवा रहे हैं. सफेद कुरतापाजामा और सिर पर गोल टोपी लगाए फैजुल हसन कादरी गांव पहुंचे तो उन से मिलने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा. उन से मिल कर गांव का हर आदमी खुश था. गांव वाले उन की बातें सुनने के लिए उत्सुक थे. इस की वजह यह थी कि कादरी प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिल कर गांव लौटे थे. उन से मिलने आने वालों में बच्चों से ले कर बुजुर्ग तक थे. उन में से किसी बुजुर्ग ने कहा, ‘‘कादरी भाई, तुम ने वाकई गांव का नाम रोशन कर दिया. ऊपर वाला तुम्हें लंबी उम्र बख्शे.’’

कादरी ने पलभर के लिए थकी आंखों से उन्हें देखा, उस के बाद आहिस्ता से बोले, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है अनवर मियां, मैं ने कुछ नहीं किया, जो कुछ किया है, ऊपर वाले ने किया है?’’

‘‘तुम ने क्या किया है कादरी भाई, यह हम लोगों से ज्यादा और कौन जान सकता है. तुम्हारी यही सादगी तो सब को पसंद है.’’ कादरी के एक हमउम्र ने आगे बढ़ कर उन के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आप ही हो, जिस की बदौलत आज हमारे गांव को एक नई पहचान मिली है, वरना हमारे इस अदने से गांव को कौन जानता था. विकास का रास्ता खुल गया है. अब हमारे गांव का तेजी से विकास होगा, यह कोई छोटी बात है. यह सब आप की वजह से ही हुआ है. आप न होते तो यह कतई मुमकिन न होता.’’

दरअसल, कादरी के मुख्यमंत्री से मिलने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गांव का विकास कराने की सरकारी घोषणा कर दी थी, इसलिए गांव वाले खुश थे और उन का हालचाल जानने आए थे. हालचाल जानने के बाद किसी ने कहा, ‘‘अब तो अपने कादरी भाई का नाम बदल देना चाहिए.’’

‘‘क्यों?’’ किसी ने हैरानी से पूछा.

‘‘कादरी भाई मुगल बादशाह शाहजहां भले न सही, लेकिन हमारे लिए तो यह आज के शाहजहां ही हैं. शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में जो काम किया था, आज वही काम यह भी कर रहे हैं.’’ उस आदमी ने कहा.

उम्र के आखिरी पड़ाव का सफर तय कर रहे 82 वर्षीय फैजुल हसन कादरी उत्तर प्रदेश के जिला बुलंदशहर के दिल्लीबदायूं राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 93 के किनारे बसे गांव कसेर कलां के रहने वाले हैं. यहां उन की चरचा इस वजह से की जा रही है, क्योंकि वह अपनी मरहूम बेगम तजुम्मली की याद में गांव में एक मिनी ताजमहल बनवा रहे हैं. अपनी जिंदगी भर की कमाई तो उन्होंने उस में लगा ही दी है, अपना ख्वाब पूरा करने के लिए वह गुजारे के लिए मिलने वाली पैंशन भी उसी पर खर्च कर रहे हैं. इस की मुख्य वजह यह है कि वह अपनी बेगम से बहुत मोहब्बत करते थे. इसीलिए उस की याद में वह कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिसे जमाना याद करे.

कादरी की कोई औलाद नहीं थी. लोगों ने उन से बहुत कहा था कि जब पहली बीवी से बच्चे नहीं हो रहे हैं तो वह दूसरा निकाह कर लें. उन का मजहब भी इस की इजाजत देता था, लेकिन उन्हें यह कतई मंजूर नहीं था कि उन की बीवी को उन से मिलने वाली मोहब्बत बंट जाए, इसलिए उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी. आज उसी बेगम की याद में वह ताजमहल बनवा रहे हैं. बेगम की मोहब्बत और ताजमहल बनाने को ले कर ही वह देशविदेश की सुर्खियों में ऐसे आए कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी एक बड़े समारोह में उन से मिल कर उन्हें सम्मानित किया और उन की बीवी के प्रति ऐसी मोहब्बत देख कर उन के मुरीद हो गए.

मुख्यमंत्री ने न सिर्फ कादरी के अधूरे ताजमहल को पूरा कराने का वादा किया, बल्कि गांव का विकास कराने की भी घोषणा कर दी. यह 28 अगस्त, 2015 की बात थी. फैजुल हसन कादरी के इस मुकाम पर पहुंचने की एक अलग ही कहानी है. कादरी परमाणु विद्युत उपकेंद्र के रूप में मशहूर नजदीकी कस्बा नरौरा के पोस्टऔफिस में नौकरी करते थे. वह सादगी पसंद नेकदिल इंसान थे. उन की इसी नेकदिली की वजह से उन्हें समाज में इज्जत की नजरों से देखा जाता था. लोगों की मदद करना और उन के दुखसुख में शामिल होना, उन की आदत में शुमार था.

सालों पहले उन का निकाह तजुम्मली के साथ हुआ था. तजुम्मली भी उन्हीं की तरह सीधीसादी थीं. आपस में दोनों एकदूसरे से बेहद प्यार करते थे. उन की जिंदगी में बस एक ही गम था कि शादी के 20 सालों बाद भी उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था. यह ऐसा गम था, जो कादरी को भी सालता था और तजुम्मली को भी. तजुम्मली जब भी उदासी के भंवर में होतीं तो अकसर कहती, ‘‘पता नहीं क्या बदनसीबी थी, जो मैं आप को एक औलाद नहीं दे सकी.’’

ऐसे में कादरी उसे दिलासा देते, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है तजुम्मली, औलाद न होने से मेरे लिए तुम्हारी अहमियत कम नहीं हो जाती. मैं तुम से बेइंतहा मोहब्बत करता हूं. फिर उदास होने से क्या फायदा.’’

मामला जब इस तरह का हो तो समाज के लोग, जानपहचान वाले और नातेरिश्तेदार भी बातें बनाने लगते हैं. लोग तरहतरह के मशविरे देने लगते हैं. कादरी और तजुम्मली के साथ भी ऐसा ही हुआ था, लेकिन उन्होंने उन बातों पर जरा भी गौर नहीं किया. सब से अहम बात यह थी कि कादरी हर सूरत में अपनी बेगम के साथ थे. कादरी जब उम्र में थे तो उन के नजदीकी अकसर उन्हें सलाह देते थे कि इस हालत में लोग तलाक दे कर या फिर बिना तलाक के ही दूसरा निकाह कर लेते हैं. औलाद के लिए उन्हें भी दूसरा निकाह कर लेना चाहिए. लेकिन उन का जमीर इस के लिए गवाही नहीं देता था. क्योंकि वह सचमुच तजुम्मली से मोहब्बत करते थे. इसलिए दूसरी शादी कर के वह उन का दिल कतई नहीं तोड़ना चाहते थे.

इस पर लोग उन्हें ताना भी मारते थे कि बीवी से मोहब्बत तो हर कोई करता है, क्या उन की मोहब्बत अनोखी है. लेकिन कादरी ने साफ कह दिया कि कुछ भी हो, वह दूसरा निकाह बिलकुल नहीं करेंगे. रही बात अनोखी मोहब्बत की तो यह उन का दिल जानता है. इसे जताने से क्या फायदा. वह पत्नी को कतई नहीं छोड़ सकते. नातेरिश्तेदार, गांव वालों ने इस तरह न जाने कितनी बार उन्हें निकाह की सलाह दी, लेकिन कादरी ने कभी किसी की न सुनी और न मानी.

कादरी जिस मजहब से थे, उन्हें निकाह की आजादी थी. इस के लिए पहली बीवी की रजामंदी भी कोई मायने नहीं रखती थी. वह ऐसे लोगों को जानते थे, जो शौकिया कई बीवियों के शौहर बनने का ख्वाब देखते थे. कादरी के पास माकूल वजह भी थी. बच्चे न होने पर वह दूसरा निकाह आसानी से कर सकते थे. यह डर तजुम्मली को सालता भी रहता था. कलेजे पर पत्थर रख कर वह भी कादरी से कहती थीं, ‘‘जब सभी दूसरे निकाह के लिए कह रहे हैं तो आप दूसरा निकाह कर क्यों नहीं लेते?’’

‘‘तुम्हारे ताल्लुक उन लोगों से नहीं, मेरे साथ हैं. मैं तुम्हारा शौहर हूं, तुम से मोहब्बत करता हूं. मुझे तुम्हारा दिल तोड़ने से बेहतर है मैं बेऔलाद ही रहूं.’’

‘‘फिर भी…’’ तजुम्मली ने आगे कुछ कहना चाहा तो कादरी ने उन्हें बीच में ही टोक दिया, ‘‘अब बस करो और आइंदा इस मसले पर कोई बात भी मत करना.’’

वक्त अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. इस मसले पर कादरी ने न कभी बेगम की सुनी और न दुनियाजहान की. वह अपने इरादों पर अटल रहे. जिंदगी को उस के असल रूप में स्वीकार कर के वह बेहद खुश थे. कई मौकों पर तजुम्मली के प्रति उन की मोहब्बत साफ झलकती थी, जिस की लोग मिसालें भी दिया करते थे. बच्चे न होने पर भी उन्होंने बीवी को नहीं छोड़ा था, यह छोटी बात नहीं थी. सरकारी मुलाजिम होने के चलते कादरी को ठीकठाक तनख्वाह मिलती थी, उस से आराम से उन की जिंदगी बसर हो रही थी. इस के अलावा उन के पास खेती की जमीन भी थी.

देखतेदेखते जिंदगी का लंबा सफर गुजर गया. बुढ़ापे की तरफ उन के कदम बढ़ चुके थे. कादरी नौकरी से रिटायर हो गए. इसी बीच तजुम्मली को गले के कैंसर की बीमारी ने घेर लिया. कादरी ने न सिर्फ उन का इलाज कराया, बल्कि खूब सेवा भी की. वक्त की अपनी चाल होती है. मौत एक कड़वी हकीकत है. तमाम कोशिशों के बाद दिसंबर, 2011 में तजुम्मली का इंतकाल हो गया.

तजुम्मली कादरी की जिंदगी का सब से बड़ा सहारा थीं. बेगम की रुख्सती ने उन्हें गमजदा कर दिया. अपनों का बिछड़ना सभी को बहुत दर्द देता है. वक्त ही धीरेधीरे इस की भरपाई करता है. कादरी भी धीरेधीरे इस से उबरे. उन्होंने तजुम्मली की यादों को जिंदा रखने और अपनी मोहब्बत जताने के लिए कुछ अलग करने की ठानी. कादरी जानते थे कि मुगल सल्तनत के शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में आगरा में संगमरमर का ताजमहल बनवाया था. दुनिया के अजूबों में शुमार ताजमहल मोहब्बत की बेजोड़ निशानी के रूप में दुनिया भर में मशहूर है. कादरी न शाहजहां थे, न उन के पास इतनी दौलत थी कि उस तरह का कोई अजूबा बनवा सकते. फिर भी वह इसी से मिलताजुलता ऐसा कुछ करना चाहते थे, जिस से जमाना उन्हें याद रखे.

बेगम की मौत ने उन्हें न सिर्फ तनहा, बल्कि मायूस भी कर दिया था. जिंदगी भर उन्होंने बेगम से पाक मोहब्बत की थी. लोग इस की मिसालें भी दिया करते थे. शायद इसीलिए कादरी ने मन ही मन ठान लिया कि वह भी अपनी बेगम की याद में शाहजहां की तरह ही ताजमहल बनवाएंगे. गांव के किनारे उन की 6 बीघा जमीन थी. वहीं तजुम्मली को दफन कर कब्र बनाई गई थी. वहीं पर 24 सितंबर, 2012 को कादरी ने ताजमहल की तरह छोटा ताजमहल बनवाना शुरू कर दिया. जब गांव वालों को इस का पता चला तो हौसलाअफजाई करने के बजाय वे उन का मजाक उड़ाने लगे. कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि वह अपनी कमाई बेकार में क्यों खर्च कर रहे हैं. जोड़ कर रखें, बुढ़ापे में दवादारू में काम आएगी.

कादरी का कहना था कि मौत तो बिना पैगाम के आती है. वह किस के लिए पैसे जोड़ कर रखें. उन के लिए तो बीवी ही दौलत थी, वह रही नहीं. अब उस की यादों के सहारे ही जिंदा हैं. उस के नाम पर जो भी करेंगे, वही कम है. कादरी ऐसी बातों पर बहुत कम ध्यान देते थे. क्योंकि उन्होंने अपने इरादों को मजबूत लहरों पर सवार कर दिया था. इंसान का जुनून ही उसे मनचाहे मुकाम तक पहुंचाता है. वह जो चाहता है, कर सकता है. कादरी का जिद और जुनून ही था कि पत्नी की याद में बनने वाले ताजमहल में उन्होंने अपनी जिंदगीभर की कमाई लगा दी थी. जमीन बेची और अपनी बेगम के गहने भी बेच कर लगा दिए. इस तरह करीब 15 लाख रुपए खर्च कर दिए.

लेकिन उन का सपना पूरा नहीं हुआ. इमारत तो बन कर तैयार हो गई, लेकिन उस में संगमरमर लगाने और फिनिशिंग का काम नहीं हो सका. कादरी की मोहब्बत का लोग लोहा मान गए थे. उन की मोहब्बत की मिसालें दी जाने लगीं. उन की मोहब्बत की निशानी मिनी ताजमहल चर्चा में आया तो लोग उसे देखने के लिए आने लगे. ताज को पूरा करने की उन की ख्वाहिश लोगों से छिपी नहीं थी. इसलिए कुछ लोगों ने उन के सामने प्रस्ताव रखा कि वे पैसों से मदद कर के रुका काम पूरा करा दें. लेकिन खुद्दारी दिखा कर उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि यह उन की मोहब्बत है, लिहाजा वह इस में किसी को शामिल नहीं करना चाहते.

कादरी की उम्र का आखिरी पड़ाव चल रहा है. ताजमहल पूरी तरह बनने से पहले वह खुद न चल बसें, इस आशंका के चलते उन्होंने ताजमहल के अंदर बनी तजुम्मली की कब्र के बराबर में अपने लिए कब्र खुदवा कर छोड़ दी. यही नहीं, लोगों से कह भी दिया कि उन के इंतकाल के बाद उन्हें तजुम्मली के बराबर में ही दफन किया जाए. कादरी को पेंशन मिलती है. खर्च से जो भी पैसा बचता है, वह उसे ताजमहल बनवाने में लगा देते हैं. उन्होंने अपने घर की बिजली का कनेक्शन भी कटवा दिया है, जिस से बिल के भी पैसे बच जाएं. वह उन पैसों को भी ताजमहल के निर्माण में लगा रहे हैं.

पत्नी की मोहब्बत में ताजमहल बनवाने की चर्चाएं मीडिया द्वारा देश में ही नहीं, विदेश तक पहुंच गईं. इस के बाद कादरी का ताजमहल देखने और कवरेज के लिए यूरोप के वेल्जियम से पत्रकार मैक्स, मिस विक्टोरिया, जर्मनी की पत्रकार क्लाडिया एंड्रिस ही नहीं, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज चैनल के अलावा ब्रिटेन और पाकिस्तान तक के पत्रकार आए. कादरी का ताजमहल मीडिया में सुर्खियां बन गया तो इस की जानकारी जिलाधिकारी बी. चंद्रकला को भी हुई. उन्होंने तमाम जानकारियां जुटाईं और उसी बीच प्रदेश सरकार ने विशिष्टता का प्रदर्शन करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित करने का एक कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया तो जिलाधिकारी ने कादरी का नाम भी शासन को भेज दिया.

जिलाधिकारी ने तहसीलदार विजय कुमार को मौकामुआयना करने के साथ कादरी से मिलने के भी निर्देश दिए थे. संयोग से शासन ने कादरी के नाम को स्वीकृति दे दी. इस के बाद जिलाधिकारी बी. चंद्रकला ने कादरी को मुलाकात के लिए बुलवाया. कादरी ने ख्वाहिश जाहिर की कि वह अपनी खेती की जमीन सरकार को दान दे कर वहां बालिकाओं के लिए एक इंटर कालेज बनवाना चाहते हैं. दरअसल, कादरी को यह बात हमेशा से खटकती रही थी कि उन के गांव की लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है. इसी वजह से लड़कियां चाह कर भी नहीं पढ़ पातीं. इसीलिए वह चाहते थे कि अगर उन के गांव में ही कोई कालेज बन जाए तो गांव की लड़कियां आराम से पढ़ाई कर सकेंगी. उन की इस बात को भी सरकार तक पहुंचा दिया गया.

एक दिन कादरी को सूचना मिली कि उन्हें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए लखनऊ जाना है तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. 28 अगस्त को कादरी लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे. कादरी की मोहब्बत का किस्सा सुन कर और उन के मिनी ताजमहल की तसवीर देख कर मुख्यमंत्री उन की मोहब्बत के कायल हो गए. मुख्यमंत्री ने कादरी को सम्मानित करने के साथसाथ, उन के अधूरे ताजमहल को पूरा कराने का भी आश्वासन दिया.

इसी के साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कसेर कलां गांव को श्री जनेश्वर मिश्र ग्राम योजना में शामिल करने की घोषणा भी कर दी. इस योजना के तहत गांव के विकास के लिए प्रतिवर्ष 40 लाख रुपए मिला करेंगे. इस के अलावा यह भी वादा किया कि गांव में बलिका इंटर कालेज के लिए आगामी वित्तीय वर्ष में बजट स्वीकृत कर दिया जाएगा. अब कादरी खुश हैं कि एक दिन उन की ताजमहल पूरा होने की तमन्ना जरूर पूरी हो जाएगी.

पूरी जिंदगी चाय से परहेज करने वाले कादरी बीवी की मौत के बाद से अपना खाना खुद ही बनाते हैं. अब कादरी की तबीयत ठीक नहीं रहती. लेकिन उन के सिर पर ऐसा जुनून सवार है कि वह हर वक्त ताजमहल के रूप में अपने ख्वाब को पूरा करने की ही सोचते रहते हैं. अपने आशियाने से वह हर रोज उसे देखते हैं और उस की खूबसूरती की उम्मीद किया करते हैं. कादरी को उम्मीद है कि एक दिन उन का भी ताज संगमरमर से चमकता नजर आएगा.

आगरा से लगभग 130 किलोमीटर दूर कादरी का ताज आज दुनिया में सुर्खियां बटोर रहा है. अब उन के ताजमहल को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी आने लगे हैं. जब कोई देशीविदेशी आदमी कादरी के ताजमहल को देखने आता है तो वह बहुत खुश होते हैं. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन की मोहब्बत को एक दिन इस तरह लोग जानने लगेंगे. Emotional Story

—कथा कादरी के साक्षात्कार पर आधारित.

 

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