Hindi Story: एमएलए राघव का भाई कैलाश और बेटा आर्यन अपने नाइट क्लब में गंदा खेल खेल रहे थे. उन के चंगुल में जो लड़की फंस जाती, चाह कर भी नहीं निकल पाती थी. क्लब की मैनेजर खुशबू ने उन के चंगुल से अपनी सहेली तमन्ना को निकालने की कोशिश की. इस प्रयास में खुशबू को जान से हाथ तो धोना पड़ा, लेकिन उस की स्मार्ट वाच इस खेल का ऐसा राज खोल गई कि…

उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद में रामगंगा नदी के किनारे एक कस्बा है बीसलपुर. यहां एक लड़की का शव मिलने से पूरा कस्बा सनसनी में आ गया था. रामगंगा के किनारे लड़की की लाश पड़ी है. इस की सूचना मिलने पर कस्बे के लोग गंगा किनारे पहुंचने शुरू हो गए. देखते ही देखते काफी भीड़ घटनास्थल पर जमा हो गई. तभी किसी व्यक्ति ने मोबाइल फोन से थाना बीसलपुर पुलिस को खबर कर दी.

कुछ ही देर में पुलिस फोर्स मौके पर पहुंच गई. इंसपेक्टर धनंजय ने अभी एक सप्ताह पहले ही बीसलपुर थाने का चार्ज संभाला था. घटनास्थल पहुंच कर उन्होंने लड़की की लाश को पानी से बाहर निकलवाया. डैडबौडी बिलकुल सुरक्षित थी. किसी तरह से किसी भी पानी के जानवरों ने लाश को कोई क्षति नहीं पहुंचाई थी. इस से लग रहा था कि लाश को आज सुबह तड़के ही ला कर डाला गया है. गले पर कुछ निशान थे, जिस से लग रहा था कि लड़की की हत्या गला घोंट कर की गई है.

पुलिस फोर्स ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल की. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. टीम ने कुछ सबूत इकट्ठे करने के लिए घटनास्थल के आसपास  छानबीन की और कुछ सैंपल भी एकत्र किए. लाश की शिनाख्त हो चुकी थी. लाश की शिनाख्त होते ही माहौल एकाएक और गमगीन हो गया.

कस्बे के बुजुर्ग आगे आए और टूटे हुए स्वर में बोले, ”ये खुशबू है. प्रेम प्रकाश की बेटी. उन की इकलौती संतान.’’

यह नाम सुनते ही भीड़ में एक अजीब सी सिहरन फैल गई. हवा जैसे ठहर गई हो. तभी दूर से एक हृदयविदारक चीख सुनाई दी.

”मेरी बच्ची!’’ प्रेम प्रकाश और उन की पत्नी लडख़ड़ाते कदमों से भीड़ चीरते हुए आगे आए. जैसे ही उन की नजर जमीन पर चादर से ढकी लाश पर पड़ी तो उन की सांसें थम गईं. महिला ने चादर हटाने की जिद की और जैसे ही खुशबू का चेहरा दिखाई पड़ा, वह वहीं गिर पड़ीं. रोतेरोते उन का गला सूख गया था, पर मातृत्त्व की पुकार अब भी कांपती हुई निकल रही थी.

”उठ जा बेटी, एक बार बोल दे, मैं ठीक हूं.’’

पिता प्रेम प्रकाश घुटनों के बल बैठ गए. उन की अंगुलियां कांपती हुई अपनी बेटी के माथे को छू रही थीं, जैसे यकीन न कर पा रहे हों कि उन की हंसतीखिलखिलाती खुशबू अब एक निर्जीव देह बन चुकी है. उन की आंखों से बहते आंसू लाश पर ढकी चादर पर गिर रहे थे. चारों ओर फैली खामोशी केवल मां की चीख और पिता की सिसकियों से टूट रही थी. कस्बे की औरतें दौड़ कर आईं, किसी ने मां को पानी पिलाने की कोशिश की, किसी ने उन का सिर सहलाया, लेकिन दिल पर आघात इतना गहरा था कि कोई शब्द, कोई सांत्वना मां को तसल्ली नहीं दे पा रही थी.

पास ही खड़े कुछ ग्रामीण आपस में फुसफुसा रहे थे, ‘इकलौती बेटी थी उन की, घर की जान थी, बस्ती की शान थी.’ आयु करीब 20 साल. माहौल में एक अनकही बेचैनी थी. हवा में गम का ऐसा बोझ था कि सांस लेना भी मुश्किल लग रहा था. हर किसी की आंखें नम हो रही थीं. खुशबू के साथ ऐसा हुआ कैसे? यह सवाल हर किसी को परेशान कर रहा था. यह क्षण कस्बे के लोगों की यादों में हमेशा के लिए दर्द बन कर दर्ज हो गया था. लाश का पंचनामा भरवाया गया. पुलिस ने पंचनामा भरने के बाद लाश को जिला मुख्यालय पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

खुशबू कस्बे में एक जानीपहचानी शख्सियत थी. बाल उस के काले मेघ बन कर कमर तक लहराते. चलते समय बालों की हलकी उछाल उस के व्यक्तित्त्व में युवा ऊर्जा जोड़ देती. खुशबू का चेहरा ओवल शेप का था, जिस में एक कोमल, हलकी मासूमियत झलकती है. चेहरा ऐसा कि आईना भी शरमा जाए. आंखें गहरी काली कजरारी, बड़ीबड़ी काली झील जैसी, जिन में गहराई और सहज विश्वास की चमक थी, जिन में डूबने का डर नहीं, बल्कि शौक जागता हो.

उस की कमर इतनी पतली कि एक बांह में समा जाए, फिर नीचे कूल्हों की लय जैसे नदी ने अचानक मोड़ लिया हो और उस मोड़ में सारी सौंदर्य की धारा समा गई हो. नाक सीधी और नाजुक, होंठ हलके गुलाबी और स्वाभाविक रूप से भरे हुए. पांव छोटे, जब चलती तो धरती पर नहीं, हवा पर पांव रखती और उस के पीछे रह जाता एक हलका सा इत्र का बादल, जिसे दुनिया वाले खुशबू कहते हैं. वह हंसे तो बसंत खिल जाए, चुप रहे तो कविता भी सांस थाम ले. खुशबू उस का नाम नहीं, उस का अस्तित्व था.

इंसपेक्टर धनंजय सिंह गाजियाबाद से ट्रांसफर हो कर यहां आए थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया कि रात 12 से 2 बजे के बीच गला दबा कर खुशबू की हत्या की गई थी. शरीर पर संघर्ष के निशान उस पर जुर्म और अत्याचार की कहानी बयां कर रहे थे. कातिल का कोई क्लू हाथ नहीं लग रहा था. एक रात धनंजय वहीं गंगा किनारे पहुंचे, जहां खुशबू की लाश मिली थी. नदी का पानी थपकियां दे रहा था, जैसे कह रहा हो सच्चाई यहां बह नहीं सकती, उसे निकालना पड़ेगा. और धनंजय ने वही किया. लाश के पास कीचड़ में एक टायर के निशान थे, लेकिन ये आम बाइक या कार के नहीं थे.

किसी छोटे ट्रक या मिनी टैंपो के या किसी और नई मौडल की कार के हो सकते थे. धनंजय ने तुरंत अपने अधीनस्थ एक दरोगा से कहा कि यहां रात में कौनकौन माल ढोने आता है, सब की लिस्ट ला कर दो. इंसपेक्टर ने जांच शुरू की और टायर के निशान के आसपास उन्हें एक झोपड़ी दिखाई दी. इंसपेक्टर धनंजय ने वहां जा कर देखा  तो उस में एक बुजुर्ग साधु तपस्या में लीन थे. इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने बूढ़े साधु से 2 मिनट बात करने की विनती की, महात्माजी रजामंद हो गए. इंसपेक्टर ने अपना परिचय देते हुए कहा कि हमें यह जानकारी करनी है कि 2 दिन पहले कोई गाड़ी चार पहिया वाली यहां आप ने आतेजाते देखी थी?

गंगा किनारे झोपड़ी में रहने वाले बूढ़े महात्मा ने कहा, ”बेटा, सुबह 4 बजे मैं ने एक गाड़ी की आवाज सुनी थी. मुझे भी हैरत हुई कि इस रात के अंतिम पहर में गंगाघाट पर कौन व्यक्ति यहां क्या करने आया है, लेकिन वो गाड़ी रुकी नहीं. मुझे ऐसा लगा कि गाड़ी में से किसी ने गंगा में जल्दी में कुछ फेंका हो.’’

इंसपेक्टर धनंजय ने पूछा, ”आप ने नंबर देखा?’’

बूढ़े महात्मा ने कहा, ”इस आशय से तो गाड़ी को नहीं देखा, लेकिन आखिरी 2 डिजिट 43 थे. कार जब आगे निकल गई तो पीछे की लाल लाइट में मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था.’’

इंसपेक्टर को महात्माजी की इस बात से काफी तसल्ली हुई. उन्होंने सोचा बस एक पतली डोर हाथ आ गई है. उधर दरोगाजी ने गंगा घाट पर आने वाली गाडिय़ों की जो लिस्ट ला कर दी थी, उस में ऐसा कोई नंबर नहीं था, जिन की आखिरी डिजिट 43 हो.

गंगा घाट की ओर आने वाली ऐसे सभी सीसीटीवी कैमरे खंगाले गए, उन की फुटेज देखी गई, जिस में एक आशा की किरण दिखाई दी. पता चला कि रात 2 बजे की रेंज में घाट के पास सिर्फ 3 छोटी ट्रांसपोर्ट गाडिय़ां गई थीं. उन में से एक का नंबर था यूपी14 बीटी 943. इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने डायरी खोल कर देखी, जिस में बूढ़े महात्मा द्वारा बताए गए अंतिम 2 अंक 43 लिखे देखे तो उन के चेहरे पर चिंता की जो शिकन थी, थोड़ी कम हुई. डिजिटल युग में किसी भी गाड़ी के मालिक का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है. इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने तकनीक का इस्तेमाल कर के पता लगाया कि गाड़ी का मालिक मनप्रीत ढाबे वाला है, जो रात में भी अपनी गाड़ी किराए पर देता था.

पूछताछ में उस ने कहा, ”सर, मेरी गाड़ी पिछले 3 दिनों से ड्राइवर सोनू ले जा रहा है. मैं तो ढाबे पर था.’’

इंसपेक्टर ने सोनू से संपर्क साधने की कोशिश की तो पता चला कि सोनू घर पर नहीं था. वह गायब था. फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा था. घर पर ताला लटका हुआ था. इंसपेक्टर ने अपने मुखबिरों का जाल बिछाया. मुखबिर ने सूचना दी कि सोनू का घर खुला हुआ है. उस में शायद फेमिली वाले आ गए हैं. पुलिस ने घर पर दबिश दी. जब सोनू को ढूंढने के लिए उस के घर में तलाशी ली गई, घर में सोनू कहीं नहीं था.

पता करने पर उस की मां ने बताया, ”साहब, वो तो 2 दिन पहले एक लड़की को ले कर गया था. कह रहा था दिल्ली छोडऩे जा रहा हूं.’’

इतना सुन कर धनंजय की रुह कांप गई, ‘कहीं वही लड़की तो नहीं?’

धनंजय सिंह (29 साल) लखनऊ के मूल निवासी हैं. उन का छोटा परिवार पत्नी अनामिका (28 साल) और 9 साल का बेटा आरव तीनों एक छोटे घर में खुश रहते थे. धनंजय की गिनती बहादुर पुलिस अधिकारी के तौर पर होती थी, लेकिन इत्तफाक से उन के साथ एक ऐसी रोचक घटना घटी कि पुलिस के आला अधिकारियों को भी आगे आना पड़ा था. यह उस समय की बात है जब उन की तैनाती गाजियाबाद में थी. वहां बदमाशों का ‘सुपरस्टार गैंग’ नए हथियारों के साथ आतंक मचा रहा था. गैंग पर बहुत सारे केस दर्ज हो चुके थे. मर्डर, लूट अपहरण जैसे संगीत अपराध कर के गैंग चर्चा में था.

पुलिस अफसर धनंजय सिंह की छवि ऐसी थी, जो कभी किसी बेगुनाह को मरने व फंसने नहीं देता और किसी गुनहगार को बचने नहीं देता. ऐसी छवि के चलते इंसपेक्टर धनंजय को इस सुपरस्टार गैंग के लीडर और उस के साथियों को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी सीनियर अधिकारियों ने दी थी. एक रात मुखबिर ने फोन पर इंसपेक्टर धनंजय को बताया, ”सर, सुपरस्टार गैंग आप की फेमिली के पीछे है.’’

धनंजय तुरंत घर की तरफ दौड़े. जा कर देखा तो दरवाजा आधा खुला था. अंदर पूरा घर अस्तव्यस्त था. उन की पत्नी अनामिका और बेटा आरव कहीं नहीं थे. धनंजय का दिमाग सुन्न हो गया. वह पागलों की तरह घर से बाहर निकल कर चीखते हुए आवाज देने लगे, ”आरव! आरव!!’’ लेकिन दोनों का कहीं कोई पता नहीं चला.

कुछ ही देर बाद फोन पर एक मैसेज आया, ”अपने परिवार को फिर देखना चाहते हो तो सुपरस्टार गैंग के खिलाफ केस बंद कर दो.’’

इंसपेक्टर धनंजय ने सीनियर पुलिस औफिसर्स को सूचना दे दी. देखते ही देखते घटनास्थल पुलिस छावनी में तब्दील हो गया.  मौके पर सभी सीनियर औफिसर्स भी पहुंच गए. घटना के खुलासे के लिए कई टीमें गठित की गईं. एसओजी को भी लगाया गया. पुलिस की जांच में सामने आया. घटना को अंजाम किसी प्रोफेशनल किलर्स ने दिया है. सब कुछ सुपरस्टार गैंग की तरफ इशारा कर रहा था.

उस समय मामले में एक अजीब मोड़ आया. सुपरस्टार गैंग ने घटना की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया. यह असामान्य था. सुपरस्टार गैंग के गुर्गे इतने क्रूर थे कि हर जुर्म पर डींगे मारते थे. जांच अधिकारी भी असमंजस में पड़ गए. धनंजय को लगा कि सुपरस्टार गैंग कोई साजिश कर रहा है या इस में किसी और का हाथ है. इंसपेक्टर की पत्नी और बच्चे के अपहरण की गुत्थी उलझती जा रही थी. इंसपेक्टर धनंजय सिंह बहुत परेशान थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, लेकिन उन की बहादुरी ने फिर जोर मारा. उन्होंने फैसला किया कि इस मामले को सुलझा कर ही दम लेंगे.

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने मामले की जांचपड़ताल अपने स्तर से शुरू कर दी. धनंजय सिंह अकेले ही सुपरस्टार गैंग के मुखिया राजन तक पहुंचे. धनंजय सिंह को देख कर राजन मुसकराते हुए बोला, ”साहब, हम से जितनी दुश्मनी है, वह अपनी जगह है, पर किसी महिला और बच्चे को हम लोग निशाना नहीं बनाते. आप के साथ जो हुआ, उस का हमें भी दुख है. साहब, यह काम हमारा नहीं है, यह किसी और का खेल है.’’

धनंजय ने गुस्से में उस का कालर पकड़ लिया, ”झूठ बोल रहा है तू!’’

स्टार की आवाज टूट गई, ”साहब, जिस ने किया है, वह बहुत रसूख वाला और सत्ता में पहुंच रखने वाला व्यक्ति है. आप अकेले उस से नहीं लड़ पाओगे.’’ स्टार ने बस एक शब्द कहा, ”फार्महाउस.’’

धनंजय समझ गए, क्योंकि सारा सस्पेंस खत्म हो चुका था. राजनीति, माफिया और पुलिस सिस्टम, सब की मिलीभगत है. सब से पहले इंसपेक्टर ने अपनी पत्नी अनामिका के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाई. अनामिका के फोन में एक आखिरी कौल मिली, जो किसी अज्ञात नंबर से थी.

धनंजय ने कौल ट्रेस करवाई. उस कौल की जो लोकेशन मिली, वो एक राजनेता के फार्महाउस के पास की थी. अब कहानी अचानक राजनीतिक हो गई थी. यह वही नेता था, जिस पर धनंजय ने कुछ दिन पहले अवैध कब्जे, अवैध कंस्ट्रक्शन और माफिया कनेक्शन पर केस दर्ज किया था. क्या यह बदले का खेल था? कई दरजन सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई. एक फुटेज से पता चला कि कई लोग मास्क लगाए अनामिका को खींच कर कर में जबरदस्ती घुसेड़ रहे थे, जबकि उस के बेटे को मास्क लगाए एक व्यक्ति गोद में ले कर कार में बैठता हुआ दिख रहा था.

एक आदमी ने अपना मास्क थोड़ी देर के लिए हटाया. वह चेहरा किसी और का नहीं, बल्कि उसी आईपीएस अधिकारी का था, जो धनंजय का सीनियर था और हमेशा उसे ‘परिवार जैसा’ कह कर संबोधित करता था. वह अपराधी राजनेता का ‘प्रोटेक्शन औफिसर’ था. धनंजय ने केस दर्ज करने की कोशिश की, लेकिन ऊपर से दबाव आया. सबूत गायब होने लगे. फाइल बंद कर दी गईं.

धनंजय को ‘दिमागी हालत खराब’ बता कर छुट्टी पर भेजा गया, लेकिन धनंजय ने हार नहीं मानी. वह अपने दम पर सबूत जुटाने निकले. उन्होंने फार्महाउस की सर्विलांस फुटेज गुप्त तरीके से प्राप्त की गई. एक धुंधली वीडियो में अनामिका को एक कार से उतारा जा रहा था. आरव को घसीटा जा रहा था. फार्महाउस के 3 गार्ड मौके पर मौजूद दिख रहे थे.

धनंजय सिंह ने एक योजना बनाई. कई दिनों तक वह इस योजना को तैयार करने में लगे रहे. उन्होंने अपने सब से भरोसेमंद कांस्टेबल रमेश को साथ लिया और रात के अंधेरे में वहां पहुंचे. फार्महाउस के बाहर पुलिस की 2 गाडिय़ां खड़ी थीं. नंबर देख कर धनंजय के हाथ कांप गए. दोनों गाडिय़ां विभाग की थीं. अंदर से आरव के रोने की आवाज आई. धनंजय  ने दरवाजे पर जोरदार धक्का मारा. दरवाजा खुल गया. साथ के सिपाही को बाहर ही खड़े रहने का निर्देश देते हुए इंसपेक्टर धनंजय अंदर घुसे. वहां उन का बेटा और पत्नी कुरसियों से बंधे थे. सामने खड़ा था, उन का अपना सीनियर एसपी युवराज सिंह.

धनंजय की बंदूक नीचे झुक गई. ”सर, आप?’’

युवराज के चेहरे पर ठंडी मुसकान दिखाई दी, ”हां धनंजय, मैं. तुम बहुत ईमानदार हो न? इतने ईमानदार कि नेताजी बलराज मेहता का सारा खेल चौपट कर दिया. उस ने मुझे 100 करोड़ का औफर दिया था. बस तुम्हें रास्ते से हटाने का. मैं ने सोचा, मारूंगा नहीं, बस डराऊंगा. लेकिन तुम हो कि डरते ही नहीं.’’

धनंजय की आंखें लाल हो गईं, ”आप पुलिस यूनिफार्म पहनते हैं सर. ये वरदी, ये विश्वास आप ने बेच दिया?’’

युवराज हंसा.

”विश्वास..? ये दुनिया पैसे से चलती है धनंजय. मैं ने 10 साल में जो कमाया, तुम पूरी सर्विस में भी नहीं कमा सकते.’’

धनंजय ने अपनी जेब में छिपा कर रखा रिकौर्डर औन कर रखा था. उन्होंने कहा, ”एक आखिरी सवाल सर. आप मेरे परिवार को यहां क्यों लाए?’’

”सुपरस्टार गैंग को फंसाने के लिए?’’ यह कह कर युवराज ने पिस्तौल अनामिका की कनपटी पर रख दी.

धनंजय ने धीरे से कहा, ”सर, आप ने गलती कर दी.’’

”क्या?’’

”मैं यहां अकेला नहीं आया हूं.’’

उसी वक्त बाहर से हजारों वाट की फ्लडलाइट्स जलीं. चारों तरफ से पुलिस की गाडिय़ां घेरा बनाते हुए आईं. डीआईजी साहब खुद उतरे.

धनंजय ने 2 दिन पहले ही उन से गुप्तरूप से संपर्क किया था, क्योंकि उन्हें शक हो गया था कि कोई ऊंचा अधिकारी शामिल है. युवराज के चेहरे का रंग उड़ गया. उस ने बंदूक फेंकी और घुटनों पर बैठ गया.

”धनंजय, मुझे माफ कर दो.’’

धनंजय ने हथकड़ी निकाली और उसे पहनाते हुए कहा, ”माफी सिर्फ अपराधी मांगता है सर. जब वह कानून के शिकंजे में फंस जाता है.’’

नेताजी और उन के 2 माफिया गुर्गे भी वहां मौजूद थे. वे भागने की कोशिश भी करते तो वहां कोई ऐसा मौका ही नहीं था. चारों तरफ से पुलिस ने घेरा बना रखा था. इंसपेक्टर धनंजय तीनों को भी गिरफ्तार कर थाने ले आए. फार्महाउस से भारी मात्रा में हथियार भी बरामद हुए थे. कौल रिकौर्डिंग, किडनैपिंग की सीसीटीवी फुटेज, माफिया के साथ युवराज की मीटिंग की वीडियो, अनामिका की गवाही इतने सारे सबूत इकट्ठा हो चुके थे. धनंजय शांत स्वर में बोला, ”कानून से ऊपर कोई नहीं.’’

सभी को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. उस के बाद पुलिस अधिकारियों ने युवराज को सस्पेंड कर दिया. अगले दिन सुर्खियां बनीं, ‘एसपी युवराज सिंह गिरफ्तार. माफिया का सफेदपोश साथी निकला. ईमानदार इंसपेक्टर ने अपने ही बौस को पहुंचाया जेल.’

बाद में धनंजय को वीरता पुरस्कार मिला, पर उन्होंने कहा, ”मेरी जीत सिर्फ यह है कि मेरा परिवार सुरक्षित है.’’

माफियाओं को संदेश जाता है कि ईमानदार इंसपेक्टर को झुकाने का रास्ता खतरनाक है.

20 वर्षीय खुशबू ग्रैजुएशन करने के बाद एक प्राइवेट होटल में मैनेजर का पद संभाल रही थी. पुलिस ने खुशबू के फोन की कौल डिटेल्स निकलवाई. पुलिस की जांच में एक अनजान नंबर बारबार मिला. इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने खुशबू के पापा प्रेम प्रकाश से जानकारी हासिल करने के लिए कुछ सवाल किए.

प्रेम प्रकाश ने घबराते हुए कहा, ”हमें तो कुछ पता ही नहीं. हमारी बेटी ने कभी कोई गलत बात नहीं की.’’

फिर भी पुलिस को शक हुआ कि मामला साधारण नहीं है. खुशबू की हत्या किस ने की? सुबह 4 बजे घाट पर कौन आया था? गाड़ी से गंगा में क्या फेंका गया था?

इंसपेक्टर धनंजय सिंह को ट्रांसपोर्ट की जानकारी के बाद लगा था कि चालक सोनू ही इस केस की कुंजी है. धनंजय ने सोनू की कौल डिटेल्स निकलवाई. एक नंबर बारबार सामने आ रहा था दिल्ली का. टेक टीम ने लोकेशन ट्रैक की.

सोनू दिल्ली के एक छोटे पीजी से पकड़ा गया. पूछताछ में वह घबराया, उस ने कहा, ”साहब, मैं कातिल नहीं हूं. मैं तो उसे बचाने ले गया था.’’

धनंजय ने तपाक से पूछा, ”किसे?’’

सोनू ने धीरे से कहा, ”रिया को, जो अपने घर से भाग आई थी.’’

अब रहस्य गहराया, जो लड़की सोनू के साथ थी, उस का नाम रिया था और वह जिंदा थी. रिया से वीडियो कौल पर बात की.

धनंजय ने शांत स्वर में उस से पूछा, ”क्या तुम सोनू के साथ अपनी मरजी से गई थीं?’’

रिया ने सिर हिलाया, ”हां सर, मेरे पिता जबरदस्ती एक विधायक के बेटे से मेरी शादी कराने वाले थे. मैं ने विरोध किया तो मुझे कमरे में बंद कर दिया. मैं किसी तरह उन की कैद से छूट कर बाहर निकली. सोनू ने मेरी मदद की. हम रात में भाग कर दिल्ली चले गए.’’

धनंजय ने एक गहरी सांस ली. इस का मतलब सोनू निर्दोष था, लेकिन एक बड़ा प्रश्न खड़ा था. फिर गंगा किनारे मिली मृत लड़की की हत्या क्यों हुई? फोरैंसिक टीम ने मृतका का दंत रिकौर्ड, डीएनए प्रोफाइल और आंखों में मिले कैमिकल के आधार पर झटका देने वाली जानकारी दी. रिया को उसी विधायक के बेटे से जबरन शादी के लिए कहा गया था. वह लड़का नाइट क्लब में गलत कामों के लिए मशहूर था.

सोनू और रिया के भागने के बाद मामला पौलिटिकल दबाव में आ गया. रिया के पिता एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे. बड़ा कारोबार था. करोड़ों की संपत्ति थी. विधायक उन से जबरदस्ती उन की बेटी की शादी अपने बेटे से करना चाहता था. उसी रात किसी और लड़की की हत्या हुई. यह कोई संयोग नहीं था. इंसपेक्टर धनंजय सिंह अपने 2 सिपाहियों के साथ विधायक राघव के घर पहुंचे. हवेली की तरह बड़ा घर, दरवाजे पर 2 सुरक्षा गार्ड, बाहर खड़ी चमचमाती काली एसयूवी, वही मौडल जिस के टायर जैसे निशान घाट पर मिले थे.

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने पूछा, ”राघव कुमार सिंह घर पर हैं?’’

गार्ड घबरा कर बोला, ”सर, साहब अंदर हैं, पर बिना अनुमति के आप अंदर नहीं जा सकते हैं. आप अपना परिचय बताएं. मैं विधायकजी से बात कर के आप के बारे में अंदर आने की अनुमति ले कर आता हूं.’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने कहा, ”कानून को किसी अनुमति की जरूर नहीं होती.’’

वे सीधे अंदर चले गए. ड्राइंग रूम में राघव बैठा था. सिर पीछे टिकाए, हाथ में महंगी घड़ी, चेहरे पर नकली सुकून. इंसपेक्टर को देख कर विधायक के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई. इंसपेक्टर तो क्या पुलिस के अफसर भी अकसर उन के दरबार में हाजिरी देने आते रहते थे. विधायक राघव ने कुरसी की तरफ इशारा किया. इंसपेक्टर बैठ गए.

राघव हलकी मुसकान के साथ बोला, ”सरजी, बताइए, मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’’

”आप का बेटा आर्यन सिंह कहां है?’’

”घर में ही है,’’ इतना कह कर विधायक ने अपने बेटे को मोबाइल फोन से कौल कर के बुलाया.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला और आर्यन सिंह अंदर दाखिल हुआ. उस के कदमों की आहट भी नहीं हुई, मानो फर्श भी उस से डरता हो.

सफेद लिनेन की शर्ट, ऊपर की 3 बटन खुली हुईं, काली पतलून इतनी परफेक्ट प्रेस कि उस में धार लगी हुई लगती थी, जैसे तलवार की. कमर में चमकती हुई बेल्ट की बक्कल पर सोने का शेर उभरा हुआ था, सिंह खानदान का निशान. दाहिने हाथ में प्लेटिनम की रोलैक्स कंपनी की घड़ी चमक रही थी, जिस के डायल पर डायमंड की सूइयां टिकटिक कर रही थीं, मानो सूइयां भी उस से डर कर धीरे चल रही हों.

बाईं कलाई पर काला धागा बंधा था, उसी हाथ की अंगुलियों में 2 अंगूठियां, एक में काला ओनेक्स और दूसरी में खून जैसा लाल रूबी. गले में पतली सोने की चेन, जिस के लौकेट में छोटा सा पिस्तौल का आकार बना था. जूते इतालवी लोफर, चमड़े की चमक ऐसी कि उस में अपना चेहरा देख कर भी लोग नजरें झुका लेते थे. चेहरे पर हलकी सी दाढ़ी 3 दिन पुरानी, होंठों पर हलकी मुस्कान, खानदानी घुमावदार मूंछें.

आर्यन ने इंसपेक्टर को ऊपर से नीचे तक देखा, बिना पूछे सोफे पर पिता के पास धम्म से बैठ गया. पैर ऊपर रख दिया, जूते की नोंक से टेबल को हलका सा ठोका, जैसे कह रहा हो, ”शुरू करो, मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है. अगला काम पेंडिंग है.’’

राघव ने प्यार से बेटे की तरफ देखा और मुसकराया, ”बेटा, इंसपेक्टर साहब तुम से कुछ पूछना चाहते हैं.’’

आर्यन ने सिगरेट का पैकेट निकाला, बिना फिल्टर वाली, कश लगाया और धुएं को छत की तरफ उड़ाते हुए बोला, ”पूछिए न साहब, मैं तो बचपन से ही पुलिस वालों की बातें सुनसुन कर बड़ा हुआ हूं.’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने सीधा सवाल दागा, ”खुशबू को आखिरी बार कब देखा था?’’

आर्यन का चेहरा एक पल को सख्त हुआ, फिर संभल गया.

‘कौन खुशबू?’’

धनंजय ने टेबल पर रूमाल पटका, ”ये रूमाल गंगा से मिला है. जिस बैग में मिला, उस में उस लड़की का फोन भी था और लड़की का नाम खुशबू था. अब बताओ, कौन खुशबू?’’

आर्यन की मुसकान अब गायब थी. आर्यन ने गहरी सांस ली, ”हां, मैं उसे जानता था. वो मेरे होटल में काम करती थी. सीधी थी और  स्मार्ट भी.’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने गाड़ी की तरफ इशारा किया, ”यह एसयूवी उस रात कहां थी?’’

राघव ने तुरंत कहा, ”घर पर थी. क्या सबूत चाहिए?’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह बोला, ”सबूत मैं दूं कि गाड़ी 4 बजे रामगंगा घाट पर थी तो..?’’

राघव चौंक गया. इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने आगे कहा, ”घाट के रेत में जो टायर के निशान मिले हैं, उन्हें मिला कर तुम्हारी एसयूवी के टायर से मैच होगा.’’

राघव ने पहली बार डर से पसीना पोंछा. राघव ने तुरंत ऊंचे सुर में कहा, ”हम कोर्ट में केस करेंगे, आप बेवजह हमारे बेटे को फंसाने की कोशिश कर रहे हैं. मेरा बेटा किसी गंदे काम में नहीं पड़ता.’’

इंसपेक्टर ने कहा, ”आप का बेटा गंदे काम में नहीं पड़ता, पर गंदा काम आप के बेटे तक जरूर पहुंच रहा है.’’

इतने में राघव ने अपनी बड़ीबड़ी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, ”इंसपेक्टर साहब, हमारे बेटे को परेशान करने से पहले अच्छी तरह सोच लेना. हमारी पहुंच कम नहीं है. इलेक्शन नजदीक हैं. हमारी पार्टी सत्ता में आ गई तो कहीं छिपने का ठिकाना तक नहीं मिलेगा.’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह ने कहा, ”मौत राजनीति नहीं देखती, एमएलए साहब.’’

एमएलए ने मेज पर चैकबुक फेंकी, ”कितना चाहिए? उतनी रकम चैक में भर लो. मेरे बेटे का मामला यहीं खत्म कर दो.’’

इंसपेक्टर धनंजय सिंह की आंखों में आग उतर आई. उन का खून खौल उठा. वह बोले, ”मैं इंसपेक्टर हूं, आप का मुनीम नहीं.’’

प्रेम प्रकाश की तसवीर उस की यादों में कौंधी. उस की बेटी बेरहमी से कत्ल की गई थी और ये लोग सौदेबाजी कर रहे थे. धनंजय ने सीधा पूछा, ”खुशबू को क्यों मारा?’’

आर्यन जोर से चिल्लाया, ”उसे मरना नहीं चाहिए था! वह सिर्फ बेहोश हुई थी.’’

बीसलपुर से 20 किलोमीटर दूर मुरादाबाद महानगर में एक हाईप्रोफाइल नाइट क्लब था. दिखने में यह क्लब शैंपेन और म्यूजिक से भरा था, लेकिन अंदर एक ऐसा खेल चलता था, जिसे कानून की रोशनी छू भी नहीं पाती थी. चमकदार नाइट क्लब में संगीत इतना ऊंचा था कि किसी की चीख भी उस में दब जाती. डांस फ्लोर पर घूमती रौशनियां और शराब की गंध मिल कर एक चकाचौंध पैदा कर रही थीं.

क्लब में कुछ लड़के ‘हनी ट्रैप एजेंट’ के रूप में काम करते थे. सोशल मीडिया पर लड़कियों की प्रोफाइल खंगालते, फिर दोस्ती करते, पार्टियों के मुफ्त पास का लालच दे कर बुलाते. ड्रग्स पीने के बाद लड़कियों के जब नाचतेनाचते पैर लडख़ड़ाते तो वो लड़के ‘केयरिंग दोस्त’ बन कर उसे बाहर ले जाते. इन रूम्स में कैमरे लगे होते थे.

बेहोश लड़की की तसवीरें ले कर वीडियो बना कर उस के खिलाफ ब्लैकमेल का खेल शुरू हो जाता. यहीं से असली रैकेट शुरू होता. बाहर ले जा कर बेहोशी में गलत काम करते, होटल में 2-3 दिन कैद रख कर परिवार को वीडियो भेज कर चुप रहने की धमकी देते और फिर लड़कियों को दूसरे शहरों के क्लबों, पार्टियों, फार्महाउस और क्राइम सिंडिकेट्स तक सप्लाई करते.

यह नेटवर्क दिल्ली, मुंबई, गोवा, जयपुर, बेंगलुरु, चंडीगढ़ तक फैला था. इस रैकेट की शिकार एक लड़की ने खुशबू को यह सब दास्तां सुनाई. खुशबू की वह क्लासफेलो रही थी. उस ने खुशबू से मदद करने को कहा. खुशबू वैसे तो इस होटल में मैनेजर थी, लेकिन इस डिपार्टमेंट से उस का कोई मतलब नहीं था.

खुशबू रात कभी होटल में रुकी भी नहीं थी. लेकिन आज उसे अपनी सहेली तमन्ना को उन के चंगुल से मुक्त कराना था. वह सीसीटीवी रूम के पास गई. उस ने आर्यन को फोन पर यह कहते सुना, ”आज की भी डील हो गई. इस बार राजस्थान भेजेंगे. पैसे तैयार रखना.’’

खुशबू समझ गई कि ये कोई मामूली केस नहीं. खुशबू ने मोबाइल में सब रिकौर्ड किया. सीसीटीवी स्क्रीन के वीडियो, आर्यन की कौल रिकौर्डिंग और वीआईपी रूम के बाहर की आवाजें. वीआईपी रूम का दरवाजा खोला, अंदर निर्वस्त्र लड़की थी. आर्यन और उस के 2 साथी वहां खड़े थे.

”गलत जगह आ गई हो, खुशबू. जो देख लिया है, वो भूल जाओ.’’ आर्यन बोला.

खुशबू ने फोन बाहर निकालते हुए कहा, ”मैं पुलिस को सब कुछ बता दूंगी!’’

आर्यन गुस्से से उबल पड़ा. वह चाहता था कि खुशबू सिर्फ डरे, चुप रहे. पर जब खुशबू भागने लगी, उस ने उसे धक्का दिया, खुशबू गिर पड़ी. सिर मेज के कोने से टकराया और वहीं बेहोश हो गई.

”मैं उसे सबक सिखाना चाहता था.’’

धनंजय ने गुस्से से मेज पर मुट्ठी दे मारी, ”बेहोश लड़कियों को ले जा कर तुम कौन सा सबक सिखाते हो?’’

कमरे में बैठा आर्यन पसीने में तरबतर था.

इंसपेक्टर धनंजय सिंह की आंखें लाल थीं. गुस्से से नहीं, सत्य की तपिश से. टेबल पर स्मार्ट वाच रखी थी खुशबू की. यही वो चीज थी, जिस ने इस पूरी मिस्ट्री का रुख बदल दिया.

धनंजय ने धीरे से कहा, ”तुम ने सोचा था, खुशबू का सच उस के फोन में था, लेकिन असली मामला तो कहीं और छिपा था.’’

आर्यन कांप कर बोला, ”कौन सा सच?’’

धनंजय ने वाच प्ले की. कमरे में खुशबू की टूटती सांसों की आवाज गूंजी, ”अगर मुझे कुछ हो जाए तो ये रिकौर्डिंग पुलिस तक पहुंचा देना. मैं अकेली नहीं लड़ रही हूं. अनाया को भी पकड़ लिया है. ये रैकेट बड़ा है. आर्यन, उस के चाचा और उन के आदमी…’’

रिकौर्डिंग वहीं टूट गई. एमएलए का चेहरा पीला पड़ गया.

सायरनों की आवाज बाहर गूंज रही थी.

क्राइम ब्रांच की टीम बाहर तैनात थी, लेकिन धनंजय अपना आखिरी वार खुद करना चाहते थे. धनंजय ने फाइल खोली.

वो सबूत दिखाए, जो इसी स्मार्ट वाच से मिले थे. खुशबू कमरे से भागने में सफल हो गई थी. वो मरने वाली नहीं थी.

आर्यन चौंक कर बोला, ”लेकिन वह बेहोश थी.’’

धनंजय ने चेहरा उस के बिलकुल पास ले जा कर कहा, ”बेहोशी से कोई नहीं मरता. उसे दोबारा कमरे में तुम ने नहीं, तुम्हारा चाचा खींच कर लाया था.’’

आर्यन की सांस अटक गई. धनंजय ने बात आगे बढ़ाई.

”तुम ने बस उसे धक्का दिया था. सिर टकराते ही वह बेहोश हो गई. तुम डर गए. पर तुम्हारे चाचा ने कहा कि ये लड़की अगर जिंदा रही तो हमारा खेल खत्म हो जाएगा.’’

एमएलए चिल्लाया, ”झूठ! ये सब झूठ है!’’

धनंजय मुसकराए, ”तुम्हारी आवाज में सच्चाई से ज्यादा डर है एमएलए साहब.’’

फिर उन्होंने आखिरी सबूत टेबल पर रखा. एक 2 मिनट की वीडियो. वीडियो में खुशबू बेहोश पड़ी थी और एमएलए का भाई उस की नब्ज टटोल कर बोला, ”जिंदा है. इसे खत्म करो.’’

आर्यन पीछे हट गया था. उस ने अपने गुर्गों को आदेश दिया, ”इसे खत्म कर दो.’’

एक शख्स चंद्रपाल आगे आया था. वह जिस ने खुशबू का गला दबा कर हत्या की. वीडियो में उस का चेहरा बिलकुल साफ था.

धनंजय ने हाथ पीछे किए और कहा, ”खुशबू ने जान दे कर भी एक लड़की को बचाया और उस के छोड़े सबूतों ने अब 100 से ज्यादा लड़कियों को मुक्त कराया है. अब तुम्हारे घर की बारी है. तुम सब को जेल भेजने की.’’

क्राइम ब्रांच अंदर घुसी. हथकडिय़ां क्लिक हुईं. एमएलए, उस का भाई कैलाश और आर्यन तीनों को पकड़ा गया. पुलिस कातिल की तलाश में निकल गई, उसे ढूंढने में ज्यादा समय नहीं लगा. जज के सामने गवाही के लिए जब इंसपेक्टर धनंजय सिंह खड़े हुए तो पूरा अदालत कक्ष खचाखच भरा था. एमएलए पहली बार असहाय लग रहा था, उस के चेहरे पर वही घमंड अब घबराहट बन कर चमक रहा था.

सरकारी वकील ने पूछा, ”इंसपेक्टर साहब, क्या यह सही है कि आप पर रिश्वत का दबाव डाला गया था?’’

धनंजय ने बिना झिझक जवाब दिया, ”जी हां, लेकिन उस दिन मेरे सामने सिर्फ 2 चीजें थीं. एक चैकबुक और दूसरे बाप की जलती हुई आंखें, जिस ने अपनी बेटी की लाश कंधे पर उठाई थी. इन दोनों में से किसी एक को चुनना था.’’

अदालत में सन्नाटा गहरा गया. एमएलए की आंखें झुक गईं और आर्यन की सांसें तेज हो गईं.

जज ने पूछा, ”आप ने रिश्वत क्यों नहीं ली, जबकि आप जानते थे कि इस के बाद आप के ऊपर राजनीतिक दबाव और ट्रांसफर का खतरा मंडराएगा?’’

धनंजय ने धीमी मगर ठोस आवाज में कहा,  ”जनाब, ये कुरसी रिश्वत लेने के लिए नहीं है. सरकार से हमें तनख्वाह मिलती है. खुशबू की लाश थाने में आई थी, लेकिन उस दिन हर बाप की बेटी मुझे उसी में नजर आई. अगर मैं चुप रह जाता, तो सिर्फ एक लड़की नहीं मरती, कानून भी उस के साथ मर जाता.’’

वह एक पल रुके, फिर बोले, ”मुझे पता है, मेरे खिलाफ साजिश होगी. मेरा ट्रांसफर होगा, शायद जान का भी खतरा हो. लेकिन अगर एक खुशबू की कुरबानी से बाकी बेटियां डर के बजाय भरोसे के साथ जी सकें तो यह सौदा बुरा नहीं है.’’

अदालत के एक कोने में बैठे प्रेम प्रकाश की आंखों से आंसू बह रहे थे. उस ने दोनों हाथ जोड़ कर इंसपेक्टर धनंजय को देखा, जैसे मन में ही दुआ दे रहा हो. सारे सबूतों और गवाहियों के बाद जज ने फैसला सुनाया, आर्यन, उस के चाचा कैलाश और खुशबू को गला दबा कर मौत के घाट उतारने वाले चंद्रपाल को उम्रकैद और एमएलए को 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई.

अदालत से बाहर निकलते वक्त मीडिया वाले माइक ले कर टूट पड़े, ”सर, आप को नहीं लगता कि आप ने अपनी नौकरी खतरे में डाल दी?’’

धनंजय हलका मुसकराए, ”नौकरी तो फिर मिल जाएगी, लेकिन अगर आज डर जाता तो आईने में खुद की आंखों में कभी नहीं देख पाता.’’

उसी शाम शहर की पुलिस लाइन में एक छोटा सा कार्यक्रम हुआ, जहां खुशबू के नाम पर ‘खुशबू महिला सुरक्षा प्रकोष्ठ’ की शुरुआत की गई, जिस में पहली नियुक्ति इंसपेक्टर धनंजय सिंह की हुई.

प्रेम प्रकाश आगे बढ़े, उन के हाथ में अपनी बेटी की एक पुरानी फोटो थी. उन्होंने वह तसवीर धनंजय को देते हुए कहा, ”साहब, अब यह सिर्फ मेरी बेटी नहीं, यह हर उस बेटी की अमानत है, जिस के लिए आप लड़ेंगे.’’

धनंजय ने फोटो को सलाम किया. थाने की दीवार पर एक नया बोर्ड लग चुका था, ‘इंसाफ बिकता नहीं, देर से मिलता है, पर जब मिलता है तो कई पीढिय़ों का सिर ऊंचा कर देता है.’’

उन्हें ले जाने के लिए पुलिस फोर्स के जवान जैसे ही मुजरिमों की तरफ बढ़े, आर्यन का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया. उस की आंखें इधरउधर भागने लगीं, जैसे कोई जाल में फंसा चूहा.

फिर अचानक वह फूटफूट कर रोने लगा. सिसकियां इतनी तेज थीं कि एमएलए साहब भी हड़बड़ा गए. रैकेट तबाह हो चुका था और अपराधी जेल में सजा काट रहे हैं. Hindi Story

 

 

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