Hindi stories: समाज की यही सोच है कि तवायफ सिर्फ पैसों से प्यार करती है, लेकिन कजरी अपने प्रेमी जावेद के बेटे को जिस तरह पालपोस कर बड़ा कर रही है, उस से साफ साबित होता है कि तवायफ के अंदर भी दिल होता है, जो किसी से प्यार भी कर सकता है.
शहर के बीच बने उस प्रमुख बाजार में काफी रौनक थी. सड़क किनारे दोनों ओर दुकानें बनी थीं तो उन के ऊपर रहने के लिए मकान बने थे. उन मकानों पर जाने के लिए दुकानों के बराबर सीढि़यां बनी थीं. यह बात अलग थी कि उन पर चढ़ने से ज्यादातर लोग कतराते थे. मकानों की रैलिंग और खिड़कियों पर रंगबिरंगी भड़काऊ पोशाक व चेहरोें पर गाढ़ा मेकअप पोते लड़कियां खड़ी रहती थीं. सड़क पर आनेजाने वाले लोग कनखियों से उन की ओर देखते तो आंखों व हाथों को नचा कर इशारे कर दिया करती थीं. जहां वे रह रही थीं, वहां की भाषा में वे तवायफों के कोठे थे.
नीचे जो बाजार थी, वहां कपड़े, राशन, हार्डवेयर, चाय आदि की दुकानें थीं. ये कोठे अंगरेजों के जमाने से भी पहले से आबाद थे. लोग समाज से नजरें चुराने की नाकाम कोशिश करते हुए सीढि़यां चढ़ जाया करते थे और उसी अंदाज में तेजी से उतर कर बाजार की भीड़ का हिस्सा बन कर ओझल हो जाया करते थे. मुद्दतों से यही सिलसिला चला आ रहा था. सीढि़यों से कोठे तक न जाने कितनी यादें, किस्से और कद्रदानों के राज दफन थे. उन कोठों की चारदीवारियों ने कई तवायफों की इठलाती जवानी और उन की रेशमी जुल्फों में बड़ेछोटे धन्नासेठों को उलझते देखा था. जिन चेहरों का आकर्षण लोगों को अपनी तरफ खींचता था, उन्हें वक्त के साथ बेरौनक होते हुए भी देखा था.
ऐसी जगहों की खास बात यह होती है कि जब सूरज अपनी रेशमी लालिमा बिखेरता है, तब एकदम उलट सुबह वहां अलसाई हुई होती है, लेकिन रातें इस तरह आबाद होती हैं, जैसे वहां सुबह का आगाज हुआ हो. शाम का धुंधलका जैसे ही दस्तक देता है, वैसे ही घुंघरुओं और सुरताल की आवाज फिजा में बहनी शुरू हो जाती है. तवायफों के नृत्य और उन के इर्दगिर्द दायरा बनाने के शौकीन खुदबखुद अपनीअपनी पसंद के कोठे पर चले जाते थे. ऐसे शौकीनों में रानी मौसी के कोठे पर कजरी का नाम खूब मशहूर था. जब वह खूबसूरत लिबास में आ कर महफिल में अपने चांद से चेहरे से घूंघट उठाती तो लोगों की सांसें थम जाया करती थीं.
वह बला की सुंदर थी. खूबसूरती के साथ वह सुरताल व नृत्य की कला के संगम में पूरी तरह पारंगत थी. वह नाचनागाना शुरू करती तो कद्रदानों की फरमाइशें बढ़ जाया करती थीं. इतना ही नहीं, वे खुश हो कर उस पर नोटों की जैसे बरसात करते थे. जितने भी नोट उस पर लुटाए जाते, वे उस की मौसी की थैली में समा जाते थे. यह बात उसे अखरती नहीं थी, क्योंकि रानी से उस का खून का रिश्ता था. वह उस की सगी मौसी थी. उस शाम भी साफसफाई के बाद कोठे के बरामदेनुमा कमरे को लड़कियों ने करीने से सामान लगा कर सजा दिया था. जगहजगह इत्र भी लगा दिया था, जिस की भीनीभीनी खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी. हारमोनियम वादक और तबला, ढोलक उस्ताद तयशुदा जगह पर बैठ कर रियाज में मशगूल हो गए थे.
कद्रदानों के बैठने के लिए सोफा था और नीचे सलीके से मैरून रंग का खूबसूरत कालीन बिछा दिया गया था. कमर व हाथ टिकाने के लिए सिरहाने पर मसनद लगा दिए गए थे. धीरेधीरे लोगों का आना शुरू हुआ तो रानी ने दिलकश मुसकान से उन का स्वागत किया.
‘‘तशरीफ लाइए, हुजूर.’’ रानी अपने पुराने चाहने वालों को ज्यादा तवज्जो दिया करती थी. इस की खास वजह भी थी. वे उस की आमदनी का बड़ा जरिया थे. ऐसे लोग शानोशौकत दिखा कर पैसे तो लुटाते ही थे, साथ ही खुश हो कर अलग से भी कुछ पैसे दे जाया करते थे. महफिल की तैयारी पूरी हो चुकी थी. एक पुराना कद्रदान रानी से मुखातिब हुआ, ‘‘कजरी को बुलाइए मौसी, सच पूछिए तो हम उसी के दीदार के लिए आते हैं.’’
‘‘मेहरबानी आप की. ऊपर वाला आप की हसरतों को बरकरार रखे.’’ मौसी ने शोखी से कहा और एक लड़की को इशारे से कजरी को बुलाने के लिए कह दिया.
कमरे में सरगोशियां थीं. कुछ लम्हों के बाद कजरी दाखिल हुई तो खामोशी पसरी और सभी की निगाहें उसी पर टिक गईं. कजरी ने लाल रंग का सुर्ख रेशमी लिबास पहना हुआ था. कमरे में जल रहीं लाइटों की रौशनी में उस के लिबास पर टांके गए सफेद, पीले व गुलाबी रंग के सितारे जगमगा रहे थे. धीरेधीरे चल कर कजरी बीच में आ कर खड़ी हो गई. एक लड़की ने आगे बढ़ कर पीतल के घुंघरुओं का जोड़ा उस के पैरों में बांध दिया. कजरी ने अपनी गोरी कलाइयों में कोहनी से आधा नीचे तक रंगबिरंगी चमकीली चूडि़यां पहनी हुई थीं.
अगले लम्हों में कजरी ने मोर की तरह पंख फैलाने के अंदाज में कलाइयों को आगे बढ़ा कर उन में कंपन कर के चूडि़यों को खनकाया तो एक पुरानी गजल के साथ सुरताल शुरू हो गई. सभी एकटक उसे ही निहार रहे थे. शबाबनुमा महफिल के आगाज से मौसी खुश थी, लेकिन चंद मिनटों में ही उस की खुशी मायूसी में बदल गई. क्योंकि पारखी मौसी ने यह बात पकड़ ली कि उस दिन कजरी की थिरकन में वह बात नहीं थी, जो और दिनों में हुआ करती थी. ढोलक व तबले की ताल तो बराबर थी, लेकिन कजरी के कदमों के साथ घुंघरुओं की खनक बदली सी लग रही थी.
उस की आवाज में भी उदासी थी. मौसी ने कद्रदानों के चेहरों पर गौर किया, वे भी उतने खुश नहीं थे. साफ लग रहा था कि कजरी का मन उस समय कहीं और था. गजल का दौर खत्म हुआ तो कजरी ने नए मेहमानों की तरफ रुख कर के दोनों हाथों से घूंघट पलट दिया. उस दिन उस का चेहरा बेनूर था. मानो सारे जहां की उदासी वहां सिमट आई थी. जल्दी से मेहमानों को सलाम कर के वह अपने कमरे में चली गई. अन्य लड़कियों ने भी नृत्य दिखाए, लेकिन उस दिन की महफिल बेरौनक ही रही. मेहमान नाखुशी से गए. मेहमानों की बेरुखी देख कर मौसी भी नाखुश थी. उस दिन पहली मर्तबा कजरी ने सभी को निराश किया था.
मेहमानों के रुखसत होते ही मौसी सीधे कजरी के कमरे में पहुंची. वह बिस्तर पर उदास बैठी नींद के आगोश में समाए मासूम बच्चे को निहार रही थी. मौसी उस के बराबर में बैठ कर बोली, ‘‘खुद को दर्द से उबार ले कजरी, तेरी वजह से आज पहली बार महफिल वीरान सी रही है.’’
‘‘कोशिश तो कर रही हूं मौसी.’’ कजरी ने उदासी से कहा.
‘‘जरा सोच इस तरह जिंदगी कैसे कटेगी? तू जो आज कमा लेगी, वह कल तेरे ही बुढ़ापे में काम आएगा.’’ मौसी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘मैं ने जमाना देखा है कजरी. तवायफ की जवानी तो सुंदर बगीचे जैसी होती है, जिस पर भंवरे दूरदूर से आ कर मंडराते हैं, लेकिन बुढ़ापा तो उजड़ा चमन किसी दोजख की तरह होता है.’’
‘‘मैं क्या करूं मौसी? जावेद की याद मेरे दिल से नहीं निकलती.’’ कजरी बोली.
‘‘बेटा, यादें जाने के लिए नहीं होतीं. फिर इस का मतलब यह भी तो नहीं कि हम अतीत को याद करकर के खुद को ही परेशान कर लें. जावेद की मोहब्बत की निशानी तो तेरे पास है.’’ मौसी ने फिर समझाया.
‘‘यही तो सहारा है मौसी.’’ कहते हुए कजरी ने बच्चे को उठा कर अपने सीने से चिपका लिया.
‘‘अपने लिए न सही, कम से कम इस बच्चे की खातिर तो दर्द से निकल जा. इसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बना. जिस दिन यह काबिल हो जाएगा, तू अपनी मोहब्बत पर नाज करेगी,’’ मौसी बोली, ‘‘अब तू आराम कर. इस बारे में हम कल सुबह बात करेंगे. इस के बाद कजरी उस 4 महीने के बच्चे के साथ सो गई.’’
अगले दिन दोपहर के वक्त कजरी रोजमर्रा की भांति खिड़की पर बैठी थी, लेकिन उसे बाजार सूना लग रहा था. जावेद को वह बाजार की भीड़ में दूर से पहचान लेती थी. उस के लिए निगाहों में बेकरारी होती थी. यादों के साए मंडराए तो उस ने खिड़की के कपाट बंद कर दिए और सिसकियां भरने लगी.
मौसी ने नजदीक आ कर उस के आंसू पौंछे और प्यार से गले लगा कर समझाया, ‘‘कब तक गम मनाएगी पगली. जाने वाले कभी लौट कर नहीं आया करते.’’ मौसी की बातें उस के दिल पर फाहा रख देती थीं, ‘‘हम तवायफें हैं बेटा. दर्द से हमारा करीब कर रिश्ता होता है. अब तू काम में मन लगा कर बच्चे की परवरिश की सोच.’’
मौसी की बातें ठीक थीं. चंद रोज में ही कजरी का उस बच्चे से गहरा रिश्ता हो गया था. उस का नाम अकरम था. वह हर तरह से उस का खयाल रखती और अपने से चिपकाए रखती. अकरम उस की मोहब्बत की निशानी था. कजरी ने सोच लिया था कि अब वह उस के लिए मां का हर फर्ज निभाएगी. 4 महीने का अकरम उस की मोहब्बत की निशानी तो था, लेकिन वह उस की अपनी औलाद नहीं था. वह बिन ब्याही मां भी नहीं थी. बावजूद इस के मां होने के सभी अहसास से वह रूबरू हो गई थी. वक्त की अजीब चाल से वह जिस किरदार में पहुंची थी, उस के पीछे भी एक रोचक कहानी थी—
दरअसल, कजरी खानदानी तवायफ थी. 15 साल पहले उस के घर वालों ने उसे उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर में उस की मौसी रानी के पास भेज दिया था. रानी का अपना कोठा था. किसी तवायफ का अपना कोठा होना बिरादरी में बड़ी बात होती है. पूरे तवायफ बाजार में रानी का रुतबा था. कजरी को वह बेटी की तरह मानती थी. रानी के चाहने पर ही कजरी को उस के पास भेजा गया था. कुछ ही दिनों में कजरी वहां के माहौल में रचबस गई थी. रानी के कोठे पर यूं तो और लड़कियां भी थीं, लेकिन कजरी उन में सब से ज्यादा खूबसूरत और नाचगाने की कला में पारंगत थी.
कुछ ही दिनों में कजरी कोठे के सारे तौरतरीके जान गई. जल्दी ही कजरी का जादू रानी के कोठे पर आने वाले लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगा. तवायफों की सच्ची मोहब्बत दौलत होती है. कजरी आई तो रानी की झोली में नोटों की जैसे बारिश होने लगी. कजरी उस की सगी बहन की बेटी थी, इसलिए पैसे का बंटवारा भी नहीं होता था. मौसी ने कह दिया था कि उस के कोठे की उत्तराधिकारी कजरी ही होगी. कजरी के चर्चे ऐसे हुए कि कद्रदान भी वहां आने लगे.
कजरी अपने पेशे की हकीकत जानती थी. ऐसा नहीं था कि वहां आने वाले सभी लोग नाचगाने के ही शौकीन होते थे. बहुतों की ख्वाहिश उस से आगे होती थी. तब मोटी रकम के बदले मौसी उन के कदमों को बढ़ा देती थी. कजरी जानती थी कि आज नहीं तो कल, उसे यह सब अपनाना ही पड़ेगा, क्योंकि यह उस के खानदान की परंपरा रही थी. रानी मौसी उसे अपने खानदान में नानी के जमाने तक के रोमांचक किस्से भी सुनाया करती थी.
रानी का ताल्लुक जिस जाति से था, वहां तवायफ होना कोई बुरी बात नहीं थी. वह बताती थी कि किस तरह धन्नासेठों से ले कर बड़े जमींदार तक उस के मुरीद थे. दरअसल उस की मां रेशमाबाई का ऐसा नाम था, जिन की महफिल में 5 सौ मील से भी लोग चल कर आते थे. उन्हें विशेष मौकों पर अपने यहां इज्जत से बुलाया जाता था. उन के लिए बैलगाड़ी या घोड़ाबग्गी भेजी जाती थी. उस जमाने में रईस लोगों के पास यातायात का यही साधन होता था. जिस के पास बैलों की जोडि़यां होती थीं, दूरदूर के गांवों तक उन का नाम होता था.
रेशमा के पास तबला व हारमोनियम वाले अपने उस्ताद थे. उन की उंगलियों की थिरकन से निकलने वाला संगीत महफिल में चारचांद लगा दिया करता था. मशालों, लालटेन व मिट्टी के तेल वाले हंडों की रौशनी में महफिल पूरे अदब से सजती थी. नक्काशीदार सुराहियों में मदिरा भर कर मेहमानों को पीतल के बेलुओं व कटोरों में परोसा जाता था. रेशमाबाई जब लहरा कर नाचती थी तो रात जैसे जवान हो जाती थी. लोगों के दिलों में चटक कर जैसे कलियां सी खिलती थीं. हर कोई बेसाख्ता कह उठता था, ‘‘वाह, रेशमाबाई, कमाल कर दिया तुम ने.’’
महफिल में फिर नाचगाने की फरमाइश होती तो रेशमा पानी पी कर फिर नए सुरताल पर थिरकने लगती. रेशमा ने जमाना देखा था. उन्होंने अपने सामने जवानों को बूढ़ा व बच्चों को जवान होते देखा था. दोनों ही पीढि़यां उन की कला की कद्रदान थी. रेशमा महफिलों से अशर्फियां ले कर निकलती थीं. खास बात यह थी कि इस तरह के चंद अवसरों को छोड़ कर महफिल में फूहड़ता नहीं होती थी. इस की वजह यह थी कि रईस लोग अमीराना तरीके से अदब से रहते थे. तवायफ होने का मतलब उन्हें बेइज्जत करना नहीं था. रेशमाबाई ने कला के दम पर ही दौलत और शोहरत कमाई थी. दरजनों तवायफों ने उन्हें अपनी उस्ताद मान कर कला के हुनर सीखे थे.
घुंघरू बांध कर तबले पर थिरक देना भर ही उन के लिए कला नहीं थी. कितनी थाप पर कितनी बार पैरों, कमर, गरदन व कलाइयों में थिरकन हो, इस तक का हिसाब पारखी नजरों व उंगलियों पर रखा जाता था. जरा सी गलती होने पर वह टोक देती थीं, ‘‘अपने कदमों को ताल से मिलाओ बेटियों, वरना मेरा नाम भी खराब कर दोगी. लोग कहेंगे कि रेशमा जैसी उस्ताद की चेलियां बढि़या नहीं नाचतीं.’’
वह समझाती थीं कि हुस्न के साथ कला भी जरूरी है. जो कला के फन में माहिर होता है वह कभी भूखा नहीं मरता. कुदरत कला को तब और भी निखार देती है, जब कोई उस के लिए दिल से जिए. बारबार गलती करने पर सजा भी दी जाती थी. दरअसल जिसे उस्ताद समझा जाता था, उसे बहुत इज्जत बख्शी जाती थी. दूसरे शब्दों में मातापिता से भी ज्यादा अधिकार उस्ताद या गुरु के पास होते थे. उस्ताद के कहे शब्द पत्थर की लकीर हुआ करते थे. उस के खिलाफ जाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता था.
रेशमा अपने साथ एक पानदान जरूर रखती थी. वह कांसे का बना था. उस पर खूबसूरत नक्काशी के साथ मूंगे भी जड़े थे, जिस में अलगअलग आकार के खाने बने थे. उस में पका कर फेंटा गया सुर्ख कत्था, छाली (सुपारी), खुशबूदार इलायची और गीले कपड़े में गोलाई से बांध कर पान रखे होते थे. जो लड़की नानी को उस्ताद मानती थीं, वे उस में साफ सुपारियां सरौते से कतर कर रख दिया करती थीं.
वह बताती थी कि पानदान उन की मां के जमाने का था. दूर कस्बे का एक पंसारी नानी की कला का मुरीद था. एक पोटली में वह ताजा सुपारियां दे जाया करता था. वह कहता था, ‘‘रेशमा तुम्हारे लिए ताजा सुपारियों के ढेर से ये नगीने निकाल कर लाता हूं. मैं ने अपने तिजारती को बोला हुआ है कि मुझे माल एकदम बेहतरीन चाहिए.’’
तब रेशमा खुश हो कर कहतीं, ‘‘हां, हां खूब समझती हूं. रेह लाए हो या नहीं?’’
‘‘गुस्ताखी माफ, वह तो भूल ही गया. अगली बार आऊंगा तो ले आऊंगा.’’ रेह दरअसल कपड़े धोने वाली मिट्टी थी. पहले साबुन नहीं था और देहात के इलाकों में लोग कपड़े धोने में इसी मिट्टी का इस्तेमाल किया करते थे.
रेशमा नामी पंसारी के आने का मकसद खूब समझती थी. वह ऐसे वक्त ही आता था, जब वह लड़कियों को कला सिखा रही होती थी. कुछ देर बैठ कर वह चला जाता था. तब के बड़े दुकानदार, तिजारत करने वाले सूदखोर भी हुआ करते थे, जो अपने बहीखातों में न जाने कितनों की मजबूरियां कैद किए रखते थे. रेशमा के पास आने वाले उस पंसारी की पहचान सूदखोर के रूप में भी थी. जातेजाते एक दिन उस ने कहा, ‘‘रेशमा, मेरे लायक कोई सेवा हो तो जरूर बताना.’’
‘‘सेवा तो है पंसारी बाबू.’’ रेशमा ने झट से कह दिया.
उस ने एकदम अधीर हो कर पूछा, ‘‘क्या?’’
‘‘तुम जितनी बार यहां आया करो, उतनी बार अपने बहीखाते से किसी गरीब की मजबूरियों को आजाद कर दिया करो.’’ रेशमा के इतना कहने पर उस व्यापारी को मानो झटका सा लगा. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरा पेशा ही ऐसा है तो क्या करूं.’’
‘‘पेशा तो हमारा भी है, लेकिन लोगों की दुआएं भी ले लिया करो. बुरे वक्त में काम आया करती हैं.’’ यह सुनते ही खिन्नतापूर्ण मौन धारण कर के वह चला गया था.
शादियों के मौकों पर रेशमा की व्यस्तता बढ़ जाती थी. दरअसल शादियां पहले महज एक रात या दिन की नहीं होती थीं. बारातें एकएक सप्ताह रुका करती थीं. इस दौरान उन की खूब आवभगत हुआ करती थी. खाना ढाक के चौड़े सूखे पत्तों से बनी पत्तलों पर परोसा जाता था. चावलकढ़ी के साथ मोटे अनाज की बनी रोटियों का चलन था. चावल के साथ गन्ने के रस से बनी शक्कर व खांड भी होती थी. उड़द की धुलवां दाल व गेहूं की रोटियां तो बिरले ही बनाते थे. एक तो उन की पैदाइश कम थी, दूसरे महंगे भी होते थे. मीठे में बूंदी के लड्डू, गन्ने के रस की खीर, कलाकंद और हलवा बनता था. खाने के साथ मट्ठे के सन्नाटे (रायते) का भी खूब चलन था.
बड़ा हो या छोटा, सभी लोग जमीन पर बैठ कर खाना खाते थे. उस जगह को पहले झाड़ू से बुहारा जाता था. फिर पानी के छींटे मार कर सूत या जूट से बुनी हुई पट्टियां बिछाई जाती थीं. कतारबद्ध बैठ कर खाना खाने वाले लोगों के इस समूह को पंगत कहते थे. सभी खाना एक साथ शुरू करते थे और एक साथ उठते थे. कोई अपना खाना खा कर बीच में ही उठ जाए तो इसे अच्छा नहीं माना जाता था. एक पंगत के उठने के बाद फिर से झाड़ू लगा कर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर पट्टियों को झाड़ कर बिछाया जाता था. मिट्टी के मटकों, शहतूत की टहनियों (शाखाओं) से बने टोकरों व कागज की रद्दी से बनी पल्लियों (बड़ेछोटे आकार के बरतन का रूप) से खाना परोसा जाता था. खाना भट्ठियों पर तांबे, पीतल के बरतनों व लोहे की कड़ाहियों में पकता था.
उस जमाने की सादगी में लोगों में इतना मेलजोल था कि सभी एकदूसरे के मेहमानों की सेवा में जुट जाते थे. पड़ोसियों के बीच मनमुटाव या कोई भेदभाव नहीं होता था. छलकपट से दूर लोगों में आपसी प्रेम बहुत होता था. बड़ेबुजुर्गों को इतनी इज्जत बख्शी जाती थी कि धमाचौकड़ी मचाते व गलती करते बच्चे छिप जाया करते थे या एकदम शरीफ बन कर दुआसलाम करते थे. उन्हें डांटे जाने व घर पर शिकायत होने का डर होता था. यदि कोई जना बच्चे की गलती की शिकायत उस के मांबाप से करता था तो मातापिता नाराज नहीं होते थे, बल्कि खुश होते थे कि कोई अपना ही बच्चों की गलतियां बता रहा है.
मेहमानों के मनोरंजन के लिए महफिलें सजाई जाती थीं. अपनीअपनी हैसियत के अनुसार तवायफों को बुलाया जाता था. रेशमा ऐसी ही महफिलों में व्यस्त हो जाती थी. समय के साथ नानी के कदम बुढ़ापे की तरफ बढ़ रहे थे. अब वह सिर्फ एक उस्ताद बन कर रह गई थीं. उन्होंने अपना पंसदीदा फूलों के छापे वाला चूड़ीदार लहंगा, जिस में रंगबिरंगे गोटे लगे थे, कोटी (कमर के ऊपर का ब्लाउजनुमा कपड़ा) व ओढ़नी (दुपट्टे का रूप) पुराने संदूक में सहेज कर रख दिया था. बरसात के बाद सीलन दूर करने के लिए वह उन्हें धूप दिखा दिया करती थीं. आभूषणों में कंठा, हार, कड़े, पायल, माथे का टीका व तगड़ी भी उन के पास थी. तगडि़यां अधिकांश चांदी की होती थीं, जिन्हें लहंगे के ऊपर कमर पर सजाते हुए पहना जाता था. अपनी बेटियों को उन्होंने कला सिखा दी थी. रानी मौसी भी उन में से एक थी.
कजरी नाचगाना बचपन से ही सीखती आई थी. वह जवानी की दहलीज पर पहुंची तो उसे मौसी के पास भेज दिया गया था. तवायफों को एक सबक यह भी दिया जाता था कि मोहब्बत जैसी गिरफ्त से दूर रहो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उन में दिल या नाजुक भावनाएं नहीं होती. यह बात अलग थी कि कजरी के दिल पर अब तक किसी ने दस्तक नहीं दी थी. जिंदगी के किसी मोड़ पर किस को किस से मोहब्बत हो जाए, इस बात को कोई नहीं जानता. कोठे पर आने वाले नए कद्रदानों में एक कद्रदान से उस की भी नजरें चार हो गईं. उस का नाम जावेद था. नौजवान जावेद उसी शहर का बाशिंदा था. एक दिन वह कजरी से बोला, ‘‘मेरे पास इतनी दौलत तो नहीं है, जो तुम्हें उस से खुश रखूं, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए चाहत है.’’
कजरी ने उस की बात हंसते हुए एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दी थी.
जावेद का कोठे पर आने का सिलसिला शुरू हो गया. कजरी समझ गई कि वह उस पर डोरे डालने की कोशिश कर रहा है. उस की आंखों में एक अजीब सी कशिश होती थी. इसी कशिश ने ताकीदों के बावजूद कजरी के दिल पर दस्तक दे दी. यह सोच कर परेशान भी थी कि तवायफों से लोग इस तरह तो दिली रिश्ता कायम नहीं करते. वह पैसा फेंक कर तमाशा देख कर चले जाते हैं. वह तवायफ थी. उस की शख्शियत किसी को इस कदर प्रभावित कर रही थी. यह अजीब सी ही बात थी. उलझन तब वाकई बहुत बढ़ जाती थी, जब आप को पता हो कि सामने वाला जान कर भी अंजान बन रहा है. कजरी ने उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की.
दूसरी तरफ जावेद ने सोचा कि कभी तो कजरी उस की चाहत कबूल कर लेगी. उस के पास जाते समय उस के दिल में उम्मीद का एक दीया रौशन होता था, लेकिन वापसी तक दिल में अंधेरा ही होता था. रौशनी और अंधेरे का यह खेल कई दिनों तक चलता रहा. जावेद के इस जुनून को देख कर कजरी उस से बातें कर लिया करती थी. बातों से ही उसे पता चला कि जावेद शादीशुदा है. यह बात साफगोई से जावेद ने उसे खुद बताई थी. कजरी ने उसे समझाया जरूर कि वह उस के ज्यादा चक्कर में न पड़े, लेकिन जावेद की भावनाओं ने उस पर ऐसा असर डाला कि वह भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी.
हालांकि वह यह भी जानती थी कि उस की मोहब्बत किसी मुकाम पर नहीं पहुंचेगी, क्योंकि न तो वह अपना पेशा छोड़ सकती थी और न जावेद समाज में उसे अपना सकता था. फिर भी वह जावेद को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही थी. दिलों में उठते अरमानों का सिलसिला चाहत के दरख्त के अंतिम छोर पर पहुंचा तो जावेद ने एक दिन उसे दिल की बात बताने का फैसला कर लिया.
एक दिन वह कजरी के पास आया. कुछ देर बातचीत कर के वह जाने लगी तो वह उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘कजरी मेरी बात सुनो.’’
‘‘फरमाइए?’’ कजरी ने अदा के साथ कहा.
‘‘मैं तुम से दिली मोहब्बत करता हूं.’’ जावेद ने एक ही बार में मन की बात कह दी.
कजरी ने नजाकत के साथ अपने होंठों पर प्यारी मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘यह तो हम बहुत पहले से जानते हैं. हम इसे कबूल कर लेते हैं, लेकिन…’’
‘‘लेकिन क्या?’’ वह आश्चर्य से उस का चेहरा देखते हुए बोला.
‘‘तुम निकाहशुदा शख्स हो.’’ कजरी बोली.
‘‘वह ठीक, लेकिन यकीन मानो मैं इस मोहब्बत की खातिर अपनी बीवी का दिल नहीं दिखाऊंगा.’’ जावेद ने साफसाफ बता दिया.
कजरी जानती थी, जावेद दिल से नेक इंसान है. वह उसे समझा कर भी थक चुकी थी. न जाने कौन से पल थे, जो सारी बातें जानने के बावजूद उस की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गई थी. कोई रास्ता न देख उस ने मोहब्बत कबूल कर ली थी.
इस के बावजूद उस ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘तवायफ के कोठे पर आते हो, जानते हो जमाना क्या कहेगा?’’
जावेद आशिकाना अंदाज में अपने सीने पर हाथ रख कर बोला, ‘‘जमाना चाहे कुछ भी कहे, मुझे इस की चिंता नहीं.’’ वह मुसकरा कर बोला, ‘‘एक और बात कहूं कजरी?’’
‘‘बिलकुल.’’ लंबी सांस लेते हुए कजरी ने कहा.
‘‘मैं अपनी मोहब्बत को ताजिंदगी आबाद रखूंगा.’’
उस की बातें सुन कर कजरी के पास कहने को कुछ नहीं रहा. क्योंकि जावेद की मोहब्बत में कोई स्वार्थ नहीं था. इसी तरह उन की मोहब्बत आगे बढ़ती रही. मोहब्बत के पक्षी की उड़ान कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नहीं जान पाया. वैसे तो जावेद रोजाना ही कजरी से मिलने आता था, पर एक बार कई दिनों तक वह उस के पास नहीं आया तो उसे चिंता सताने लगी. जावेद के इंतजार में वह हर रोज खिड़की के सामने बैठ जाया करती. सड़क पर आनेजाने वाले लोगों में उस की नजरें जावेद को तलाशती थीं. लेकिन उस की आंखें थक जाती थीं. वह दिखाई नहीं देता.
वह एक अजीब कशमकश के दौर से गुजर रही थी. उसे यह तक नहीं पता था कि जावेद रहता कहां है. उस ने अपने दिल को समझाया कि यदि पता भी होता तो भी वह शायद उस की दहलीज पर नहीं जा पाती. इस से उस की बीवी की नजरों में छिपा रिश्ता उजागर होने से तूफान खड़ा हो सकता था. तकरीबन 15 दिनों बाद उसे जावेद आता दिखाई दिया तो उस की आंखों को जैसे करार मिला. वह ऊपर आया तो वह अपनेपन से शिकायत लहजे में बोली, ‘‘कहां थे इतने दिन? मुझे कितनी फिक्र हो रही थी.’’
‘‘मेरी तबीयत खराब थी कजरी. तुम से मिलने की बेकरारी मुझे भी बेचैन करती थी, लेकिन बुखार ने जैसे शरीर की जान ही निकाल ली थी.अब चलने के काबिल हुआ तो चला आया.’’
‘‘पता है जावेद, मैं ने कभी किसी के लिए इतनी तड़प महसूस नहीं की, जो तुम्हारे लिए की है.’’
जावेद को उस की नरगिसी आंखों में बेपनाह मोहब्बत का दरिया तैरता नजर आ रहा था. वक्त के साथ उन की मोहब्बत का सिलसिला चलता रहा. एक दिन जावेद उस के पास आया तो दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं. जावेद ने मोहब्बत से कजरी को अपनी बांहों के दायरे में ले लिया. कजरी का सारा शरीर रोमांचित हो गया. मोहब्बत की पनाह में सिर रखा तो जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में खो गई. जावेद के प्यार की कशिश दिनबदिन उसे उस के नजदीक ले जा रही थी.
उस की मोहब्बत का किस्सा मौसी से छिपा नहीं रहा. वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘ऐसे चक्कर में ना पड़ कजरी.’’
तब कजरी सफाई देती, ‘‘मौसी वह दिल का अच्छा है और वाकई मुझ से मोहब्बत करता है.’’
इस पर मौसी ने हंस कर कहा, ‘‘देख बेटी, हम ठहरीं तवायफें. हमारे लिए दिल से की गई मोहब्बत किसी ग्रहण की तरह होती है. तुम यह ग्रहण अपनी जिंदगी में क्यों लगा रही हो. हमारे नसीब में पाक मोहब्बत नहीं होती.’’ मौसी इतने पर ही नहीं रुकी, ‘‘पहले मोहब्बत फिर शादी. अरे पगली हम सदा सुहागनें होती हैं. शादियां नहीं करतीं, लेकिन सोलह शृंगार करती हैं. वह इसलिए कि हमारे कद्रदान खुश रहें. हमारे पास आते रहें.’’
जावेद की मोहब्बत पा कर कजरी बेहद खुश थी. ऊपर वाले ने उसे जैसे खुशियों से नवाज दिया था. खुशियों के बीच कभीकभी अंधेरे साए भी मंडरा जाया करते हैं. अनहोनी जैसे शिद्दत से उन के पीछे आ रही थी. एक दिन कजरी को एक आदमी ने आ कर बताया, ‘‘जावेद का ऐक्सीडैंट हो गया है. अस्पताल में उस की हालत नाजुक है और तुम्हें अपने पास बुलाया है.’’
यह सुन कर एक लम्हे के लिए कजरी के हवास उड़ गए. उस का कलेजा धक्क से रह गया. उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. उस ने रानी मौसी को साथ लिया और बताए गए अस्पताल पहुंच गई. पता चला कि जावेद अपनी बीवी और 4 महीने के फूल से बेटे के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था, तभी दुर्घटना का शिकार हो गया था. जावेद और उस की बीवी बुरी तरह घायल थे, जबकि बेटा सहीसलामत था. यह हालत देख कर कजरी की आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था. जावेद की हालत बिगड़ती जा रही थी.
वह लगातार कजरी को निहारे जा रहा था. कुछ इस तरह जैसे अलविदा कहने से पहले कोई किसी को जी भर कर निहार लेना चाहता था. उस ने कजरी से कहा, ‘‘कजरी, मैं शायद न बच पाऊं, लेकिन तुम मुझ से एक वादा करो.’’
‘‘क्या?’’ कजरी ने पूछा.
‘‘मेरा अपना तो कोई नहीं है. मुझे व मेरी बीवी को यदि कुछ हो जाए तो तुम मेरे बेटे अकरम की हमारे मजहब के हिसाब से बेहतर परवरिश कर देना.’’
कजरी के लिए सब कुछ बुरे ख्वाब जैसा था. वक्त जैसे थम सा गया था. कुदरत को शायद कुछ और ही मंजूर था. कुछ देर बाद जावेद और उस की बीवी ने दम तोड़ दिया. जावेद की इस तरह हुई मौत कजरी पर बिजली बन कर गिरी थी. मौसी के शब्द भी जैसे कानों में गूंज रहे थे कि तवायफों के नसीब में पाक मोहब्बत नहीं हुआ करती. जावेद के दूरदराज के रिश्तेदार थे. खबर मिलने पर वे भी आ गए थे. उन्होंने ही जावेद और उस की बीवी को नमाज ए जनाजा के बाद सुपुर्द ए खाक कर दिया. जावेद ने जो आखिरी ख्वाहिश जाहिर की थी, उस पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं था.
कजरी ने अकरम को अपना लिया. जावेद की जुदाई के गम में ही वह आंसू बहाती थी. और तभी से रात की महफिल में घुंघरुओं की खनक जाती रही. गम दिलोदिमाग पर काबिज था, इसलिए महफिल बेरौनक हो गई थी. मौसी ने उसे समझाने की भरसक कोशिश की. कजरी ने किसी तरह खुद को संभाल लिया. इस के बाद उस के दिल में किसी शख्स के लिए मोहब्बत की धड़कन जैसे हमेशा के लिए बंद हो गई. कजरी तवायफ थी. यह उस का खानदानी पेशा था. उस के हिसाब से उसे छोड़ा नहीं जा सकता था और वह छोड़ना भी नहीं चाहती थी.
क्योंकि उस के पास कमाई का और कोई जरिया नहीं था. हालांकि वह नहीं चाहती थी कि कोठे के माहौल में अकरम की परवरिश हो. वह उसे पढ़ाना चाहती थी. इसलिए जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो कजरी ने उस का दाखिला शहर के एक नामी स्कूल में करा दिया. स्कूल में हौस्टल भी था, जहां दूरदूर से आए बच्चे रह कर पढ़ते थे. अपने माहौल से दूर रखने के लिए उस ने अकरम को हौस्टल में रख दिया. उस की मां के रूप में अपना नाम लिखाया. कजरी हफ्तापंद्रह दिन में अकरम से मिलने जाया करती थी. वह उसे घुमाने भी ले जाती थी.
वह उस की परवरिश मुसलिम रीतिरिवाज से कर रही थी. बाजारों की रौनक ईद की नजदीकी का ऐलान करती तो वह अकरम को बाजार भी घुमाती. अकरम की खुशियों में ही उस की खुशियों की दुनिया सिमटी हुई थी. अकरम के मनपसंद के कपड़े सिलवाए जाते और ईद पर सिवइयां बना कर मुंह मीठा कराया जाता. मुसलिम रस्मोरिवाज को अकरम अच्छे से समझ सके, इसलिए वह बीचबीच में उसे मदरसे में तालीम भी दिलाती. ईद पर ईदगाह पर अकरम कजरी के साथ ही नमाज अदा करने जाया करता.
समय अपनी गति से चलता रहा. वह अपने पेशे से जो कमाती, उसी से बेटे की फीस भरती और उस के बाकी खर्चे उठाती. समाज से वह यह राज छिपाने की कोशिश करती रही कि उस की मोहब्बत की निशानी नामी स्कूल में पढ़ रहा है. वह नहीं चहती थी कि अकरम की पढ़ाई में उस की वजह से कोई परेशानी आए. अकरम बड़ा हो गया था. वह सीबीएसई बोर्ड में पढ़ाई करते हुए हाईस्कूल में आ गया था.
अकरम का वार्षिक परीक्षाफल आया तो पता चला कि उस ने अपनी कक्षा में टौप किया है. बेटे की इस उड़ान से कजरी बेहद खुश थी. बेटा उस की उम्मीदों पर खरा उतरा था. खुशियों और नाखुशियों की दस्तक वक्त के हाथ में होती है. इंसान कठपुतली बनता है और वक्त सब तय कर देता है. कजरी भी वक्त की इस चाल का शिकार हुई. अकरम के स्कूल में कोई नहीं जानता था कि अकरम की मां कजरी का पेशा क्या है? लेकिन एक दिन यह राज बेपर्दा हुआ तो कजरी के पैरों तले से जमीन खिसक गई.
दरअसल, वह अकरम का रिजल्ट लेने उस के स्कूल गई थी. वहां छात्रों की भीड़ थी. अकरम टौपर छात्र था. उस की फोटो के साथ कब कजरी का फोटो भी खिंच गया. यह उसे पता ही नहीं चला. वह फोटो अखबार में छपा तो रात के अंधेरे में मुंह छिपा कर कजरी के कोठे पर जाने वाले उजले चेहरे वालों ने उसे पहचान लिया. बस, यहीं से जैसे कयामत की बुनियाद रख दी गई. लोगों की फितरत होती है, वह इस तरह की बातों को सामने लाने में पूरी जान लगा देते हैं. मनोविज्ञान के हिसाब से यह एक बीमारी है. यह बात स्कूल प्रबंधन तक पहुंचा दी गई.
कथित सभ्य समाज के लोगों के तर्क थे कि इस से उन के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा. वह किसी तवायफ के बेटे के साथ अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते. यह बात अलग थी कि ऐसी तवायफों के पहलू में ही हजारोंलाखों कथित सभ्य लोग समाज में मुंह छिपा कर अपने गम मिटाया करते हैं. नोटों की खनक पर उन्हें एक रात की दुलहन बना कर मोहब्बत बरसाते हैं.
कायदे से तो कजरी की तारीफ होनी चाहिए थी कि उस ने गलीच समझे जाने वाले ऐसे पेशे में रह कर भी बेटे की जिंदगी को रोशन कर दिया था. परंतु हुआ इस का उलटा. स्कूल प्रबंधन ने कजरी को स्कूल बुला कर कहा, ‘‘माफ करना, हमें आप के बेटे को स्कूल से निकालना होगा.’’
‘‘ऐसा मत कीजिए. मेरा बच्चा तो नर्सरी से आप के यहां पढ़ रहा है. वह होनहार है.’’ आहत कजरी ने हाथ जोड़ लिए.
‘‘तब हमें पता नहीं था.’’
कजरी की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या मैं इंसान नहीं हूं या मेरा बेटा इंसान नहीं है? कौन कहता है कि तवायफ के बेटे को पढ़ने का हक नहीं है? मैं उसे बड़ा आदमी बनाना चाहती हूं. मैं तो पहले ही अपने कलेजे के टुकड़े को दूर रखे हुए हूं. ऊपर से आप इस तरह की बात कह रहे हैं.’’
कजरी की बातें अपनी जगह ठीक थीं, लेकिन उन्हें मानने को कोई तैयार नहीं था. स्कूल प्रबंधन ने उस की एक न सुनी.
‘‘मुझे थोड़ा वक्त दीजिए.’’ कह कर कजरी वहां से चली आई. उस का अपमान हुआ था, लेकिन वह जिस पेशे में थी, उस में मानअपमान के उस के लिए कोई मायने नहीं थे. कजरी एक सामाजिक संस्था की संचालक को जानती थी. कजरी की वह बहुत इज्जत करती थी. अकरम के दाखिले में भी उन्होंने ही भूमिका निभाई थी. कजरी ने नई मुसीबत उन्हें बताई.
कजरी की समस्या बड़ी जटिल थी. फिर भी उन्होंने वादा किया कि उस का बेटा उसी स्कूल में पढ़ेगा. कोई भी उसे जबरदस्ती नहीं निकाल सकेगा. सामाजिक संस्था संचालिका स्कूल गई. तर्कवितर्क के बीच उन की स्कूल प्रबंधन के साथ हंगामा हुआ. स्कूल के पास टौपर छात्र को निकालने की कोई मजबूत वजह नहीं थी. एनजीओ की दखल के बाद उन्हें अपना निर्णय बदलना पड़ा. अकरम हौस्टल में ही रहा.
उम्र और वक्त ने अकरम को भी समझदार बना दिया था. उस ने कजरी से कभी अपने पिता का नाम नहीं पूछा. शायद उसे अंदाज हो गया था कि तवायफों के बच्चों के पिता नहीं हुआ करते. समय चक्र और स्कूल में हुई बेरुखी की घटना से आहत अकरम जान चुका था कि उस की मां का पेशा इज्जत का नहीं है. एक दिन वह कजरी की गोद में सिर रख कर बोला, ‘‘आप को पता है कि मैं काबिल बन कर सब से पहला क्या काम करूंगा.’’
‘‘क्या?’’ कजरी आश्चर्य से बोली.
‘‘आप को इस माहौल से निकालूंगा.’’
उस की बात और प्यार से कजरी की आंखें नम हो गईं, ‘‘मैं अपने हालात से खुश हूं अकरम. बस, तू कामयाब हो जा.’’
कजरी अकरम की हर वह ख्वाहिश पूरी करती है, जिस का वह तलबगार होता है. वह मातापिता दोनों का प्यार उसे दे रही है. उस की जिंदगी का एक ही बड़ा मकसद है कि अकरम बड़ा हो कर एक अच्छा इंसान बने. कजरी का किरदार वाकई बहुत ऊंचा है, लेकिन उस के पेशे की पहचान उसे आगे नहीं आने दे रही. वह जानती है कि समाज उसे स्वीकार नहीं करेगा. बेटे के भविष्य की फिक्र भी उस के कदमों को थामे रखती है. वह असल जिंदगी में मां नहीं बनी, लेकिन उस में एक मां का अहसास है. दिल में प्यार है और समर्पण भी.
कजरी अकरम को बताना नहीं चाहती कि वह उस की असल मां नहीं है. वह नहीं चाहती कि उस के बेटे का दिल टूटे. ढोलक की थाप और घुंघरुओं के शोर में जिम्मेदारी और मोहब्बत का वादा उस के कानों में गूंजता है. कजरी ने अपनी मोहब्बत और मां के फर्ज के लिए जो कर दिया, वह वाकई प्रशंसनीय है. जो लोग कजरी की इस हकीकत को जानते हैं, वे उस की दिल से इज्जत करते हैं. Hindi stories
—कथा सच्ची घटना पर आधारित, पात्रों के नाम परिवर्तित हैं. (सभी फोटो: मौडलिंग)






