Love Story: सईद जाफरी ने फिल्मों में भले ही कोई भी भूमिका निभाई हो, हकीकत में वह शाही मिजाज के अभिनेता थे. इतने शाही कि शराब पीने के लिए वह अपना चांदी का गिलास जेब में रखते थे. बड़ीबड़ी पार्टियों में वह उसी में शराब पीते थे. लेकिन यह सफल चरित्र अभिनेता अपने दांपत्य जीवन में असफल था.
सन 1985 में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘सागर’. इस फिल्म को काफी पसंद किया गया था, खासकर इस के गानों को. इस की कई वजहें थीं. इन में पहली वजह तो थी फिल्म ‘बौबी’ के बाद डिंपल कपाडि़या की ऋषि कपूर के साथ वापसी. दूसरी वजह थी प्रेमत्रिकोण, जिस में नायक रवि (ऋषि कपूर) विदेश से लौट कर एक मछुआरन लड़की मोना को चाहने लगता है. दरअसल उसे पता नहीं होता कि राजा यानी कमल हासन मोना से बचपन से प्यार करता है. बाद में जब हकीकत पता चलती है तो दोस्ती की खातिर वह अपने प्यार को कुरबान कर देता है.
इस फिल्म के हिट होने से यह बात साफ हो गई थी कि किसी घिसेपिटे कथानक पर भी अच्छी फिल्म बनाई जा सकती है. बशर्ते उस में अभिनय करने वाले कलाकार दमदार अभिनय करें. फिल्म में रवि की दादी कमलादेवी एक औद्योगिक घराने की मालकिन दिखाई गई थीं, जिन के चेहरे, वेशभूषा और हावभाव से संपन्नता साफ झलकती थी. यह बात उन की बरदाश्त के बाहर थी कि उन का एकलौता पोता एक गरीब मछुआरन से प्यार करे.
यही वजह थी कि रवि और मोना को अलग करने के लिए उन्होंने तरहतरह के हथकंडे अपनाए. यहां तक कि आखिर में उन के आदमी हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, जिस में ऋषिकपूर को बचाने में कमल हासन की जान चली जाती है. लेकिन मरतेमरते वह डिंपल का हाथ ऋषिकपूर के हाथों में दे जाते हैं.
फिल्म में कमला देवी यानी दादी का यह किरदार मधुर जाफरी ने निभाया था, जिन्हें दर्शक नाम से भले नहीं जानते थे, लेकिन उन के अभिनय से काफी प्रभावित हुए थे. मधुर जाफरी हिंदी फिल्मों का कोई खास जानापहचाना चेहरा नहीं था, लेकिन इस फिल्म में सशक्त अभिनय के चलते वह दर्शकों के दिल में बस गई थीं. आमतौर पर इस तरह के किरदार ललिता पवार या सुषमा सेठ जैसी अभिनेत्रियां निभाती आई थीं, ऐसी स्थिति में दर्शक खुद से यह सवाल पूछने से रोक नहीं पाए कि आखिर ऋषि कपूर की दादी का किरदार निभाने वाली यह ऐक्ट्रेस कौन है?
इस फिल्म में मधुर जाफरी ऐंग्लो इंडियन सी लगीं, जिन्हें अपनी दौलत पर काफी गुरूर और गुमान था. इसी के चलते वह गरीबों और गरीबी से नफरत करती थीं. यह मधुर जाफरी कोई और नहीं, हाल ही में दिवंगत हुए मशहूर अभिनेता सईद जाफरी की पहली पत्नी थीं, जिन्होंने एक संपन्न एवं क्रूर दादी की भूमिका इसलिए सहजता से निभाई, क्योंकि वह इस किरदार के लिए एकदम फिट थीं. सन 1933 में दिल्ली के एक संपन्न कायस्थ परिवार में पैदा हुईं मधुर परंपराओं और आधुनिकता का अद्भुत मेल थीं. उन के दादा को अंगरेजों से राय बहादुर का खिताब मिला था. वह शाही परिवार से भले नहीं थीं, लेकिन उन का रहनसहन और ठाठबाट किसी शाही परिवार से कम नहीं था.
यह वह दौर था, जब अंगरेज शासकों से नजदीकियां रखने वाले परिवारों की समाज में एक अलग पहचान हुआ करती थी. वे बड़ेबड़े बंगलों में शानोशौकत से रहते थे, बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमते थे. इस तरह के लोग आमतौर पर कला या साहित्य प्रेमी होते थे. उन की लड़कियां बौबकट बाल रख सकती थीं और स्कर्ट पहन कर सड़कों पर घूम सकती थीं, विदेशी कुत्तों को सड़कों पर घुमाया करती थीं. वे फर्राटे से अंगरेजी बोलती थीं. उन के लिए स्कूल और कालेज की शिक्षा इसलिए जरूरी होती थी, क्योंकि समाज में उन्हें अपनी अलग पहचान कायम करनी होती थी. इस तरह के परिवार मध्यमवर्गीय परिवारों के आदर्श हुआ करते थे. रिश्तेदारों और समाज में चर्चा का विषय होते थे.
मधुर इस का अपवाद इसलिए नहीं रह पाईं, क्योंकि बंदिशें न होते हुए भी उन्होंने कायस्थ परिवारों के संस्कार यथासंभव ढोए. वह बेइंतहा खूबसूरत और प्रतिभावान थीं. अभिनय और नाटकों के प्रति उन का लगाव बचपन से ही था, लेकिन बाद में वह एक इंटरनेशनल शैफ के रूप में जानी गईं. पहले कानपुर और फिर दिल्ली में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मधुर स्थाई रूप से दिल्ली में बस गईं. देश आजाद हो चुका था, लेकिन सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा नहीं बदला था, बल्कि विभाजन के वक्त हुए हिंदूमुसलिम दंगों की वजह से कड़वाहट बढ़ गई थी. मधुर को इस सब से कोई सरोकार नहीं था, उन की दुनिया तो नाटकों और पढ़ाईलिखाई तक सिमटी रहती थी. अपनी दोनों बड़ी बहनों ललिता और कमल के साथ वह दिल्ली की सड़कों पर घूमतीं तो किसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थीं.
मधुर के दादा राय बहादुर राजनारायण का अपना अलग रसूख और रुतबा था. लेकिन घर से बाहर और अंदर एक नई संस्कृति और संस्कार पनप रहे थे, जिन में शिक्षा के साथसाथ दीगर शौक पूरे करने की आजादी सभी सदस्यों को थी. दिल्ली के क्वीन मेरी हायर सैकेंडरी स्कूल की छात्रा रहते मधुर ने नाटकों में हिस्सा लेना शुरू किया तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा. जिस अभिजात्य वर्ग की वह थीं, वह अंगरेजी नाटकों खासतौर से विलियम शेक्सपियर को ज्यादा पसंद करता था. तब ऐसे ही नाटक ज्यादा खेले जाते थे. सन 1951 आतेआते वह एक कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाने लगी थीं.
18 साल की यह नवयौवना अभी तक प्यार के अहसास से अछूती थी. दिल्ली की कई नामी कला संस्थाओं के साथसाथ मधुर अब तक आकाशवाणी से भी जुड़ गई थीं, जो उस समय एक उपलब्धि की बात मानी जाती थी. सन 1953 में दिल्ली के मिरांडा हाउस कालेज से मधुर ने बीए कर लिया तो घर में उन की शादी की बात चलने लगी.
लेकिन इस बीच 2 सालों में मधुर काफी बदल चुकी थीं, क्योंकि उन्हें सईद जाफरी नाम के एक मुसलिम युवक से प्यार हो गया था. उन का यह प्यार एकदम या पहली नजर का नहीं था, बल्कि धीरेधीरे परवान चढ़ा था. खुद मधुर को भी इस का पता काफी बाद में चला था. पंजाब के मलेरकोटला में सन 1929 में पैदा हुए सईद की पहचान मूलत: ब्रिटिश अभिनेता की रही थी. मुसलिम पंजाबी परिवार के सईद भी उस समय दिल्ली में एक कलाकार के रूप में संघर्ष कर रहे थे. वह आकाशवाणी से जुड़े थे. वहीं उन की मुलाकात मधुर से हुई थी.
केवल मधुर और उन की रुचियों में ही समानता नहीं थी, बल्कि दोनों की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी मेल खाती थी. सईद के पिता डा. हामिद हुसैन जाफरी अपने जमाने के मशहूर फिजीशियन थे. वह उत्तर प्रदेश के कई शहरों के सरकारी अस्पतालों में पदस्थ रहे थे. सईद के नाना खान बहादुर फैजल ईमान मलेरकोटला रियासत के दीवान थे. इस नाते उन की भी नजदीकियां ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों से थीं.
सईद के पास भी न आत्मविश्वास की कमी थी और न पैसों की. स्कूली जीवन से ही वह रंगमंच से जुड़े हुए थे. वह भी एक खूबसूरत युवक थे, सुर्ख गुलाबी रंगत, चौड़ा माथा, झूलते घुंघराले बाल उन की शख्सियत में चार चांद लगाते थे. उन के बोलने का अंदाज भी हर किसी को लुभाता था. उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंगरेजी भाषाओं पर गहरी पकड़ रखने वाले सईद जाफरी ने स्कूल और कालेज में नाटक कर के खूब तारीफ हासिल की थी. तब के हिंदी फिल्मों के अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और मोतीलाल के वह मुरीद थे और उन की फिल्में देख उन की नकल उतारा करते थे.
सईद जाफरी बेशक महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभावान थे, लेकिन खुद को साबित करने के लिए उन्हें संघर्ष भी खूब करना पड़ा. कुछ कर गुजरने का जज्बा उन्हें दिल्ली ले आया, जहां उन के सामने रहने और खाने की समस्या थी. इस के लिए उन्होंने सन 1951 में आकाशवाणी में 250 रुपए महीने वेतन पर नौकरी कर ली. हालांकि यह वेतन उन के लिए पर्याप्त नहीं था, लेकिन इतना भी कम नहीं था कि वह गुजरबसर न कर पाते. शुरुआती दिनों में वह आकाशवाणी के पीछे पार्क में बनी बैंच पर सोते थे. एक दिन उन्हें इस हालत में देख कर आकाशवाणी के स्टेशन डायरेक्टर मसानी मेहरा ने उन्हें वाईएमसीए में 30 रुपए महीने पर एक कमरा किराए पर दिला दिया.
आकाशवाणी में नौकरी करते हुए ही ‘द ईगल हैज टू हैड्स’ नाटक के दौरान उन की मुलाकात मधुर से हुई थी. वह उन के साथ प्रमुख भूमिका में थीं. मधुर सईद के आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी थीं. सईद उन से ज्यादा पढ़ेलिखे थे. उन्होंने सन 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया था. उन के अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुला रहा था, जिस की वजह से वह सरकारी नौकरी में नहीं गए थे.
पहले मधुर और सईद की निकटता बढ़ी, फिर धीरेधीरे उन की यह निकटता कब प्यार में तब्दील हो गई, दोनों को ही पता नहीं चला. अभिनय में पारंगत दोनों युवा कलाकार अपनेअपने अव्यक्त तरीके से रोमांस कर रहे थे. संस्कारी परिवार से होने की वजह से मधुर पहल नहीं कर पा रही थीं. दूसरी ओर अपने पिता की गोरखपुर की नियुक्ति के दौरान महंतों और मठों में हिंदू धर्म को नजदीक से देख चुके सईद भी उन्हें प्रपोज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें पूरा विश्वास था कि मधुर के घर वाले इस रिश्ते के लिए कभी राजी नहीं होंगे.
लेकिन प्यार हो चुका था. मधुर और सईद दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित गेलार्ड रेस्टोरेंट, जिस में अनगिनत प्रेमकथाओं की पटकथा लिखी गई थी, में घंटों बैठ कर थिएटर, सिनेमा और दुनियाजहान की बातें किया करते थे. लेकिन इजहार की बात आते ही दोनों हिचकिचा जाते थे. इस में धर्म ही नहीं, समाज और देश के हालात भी आड़े आ रहे थे. दोनों एकदूसरे को जाननेसमझने लगे थे, पसंद करने लगे थे और प्यार भी करने लगे थे. यह सच है कि प्यार एक मियाद से ज्यादा खामोश नहीं रह सकता.
सन 1955 में मधुर को राडा (रायल एकेडमी औफ ड्रामेटिक आर्ट) में काम करने के लिए अमेरिका जाने का प्रस्ताव मिला तो सईद खुद को रोक नहीं पाए और एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने मधुर के घर वालों से शादी की इच्छा व्यक्त कर दी. उम्मीद के मुताबिक जवाब ना में मिला, लेकिन वजह धर्म नहीं, बल्कि कमाई बताई गई. मधुर के घर वालों, खासतौर पर पिता जो खुद पिता की मौत के बाद आर्थिक परेशानियां झेल चुके थे का खयाल था कि एक कलाकार इतना नहीं कमा सकता कि उन की बेटी को सुखी रख सके.
लेकिन उन के जवाब से सईद निराश नहीं हुए. वह भी अमेरिका चले गए और अपने दिल की बात, जिसे मधुर सालों से जानती थीं, कह दी. मधुर को पता था कि घर वाले तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने भी वही जवाब दिया. लेकिन सईद समझ रहे थे कि मधुर का यह इनकार दिल से नहीं है. प्रेमिका की दुविधा वह समझ रहे थे. अनमने मन से न कहने के बावजूद मधुर ने उन के सामने राडा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. बहुत कुछ हासिल करने से पहले सईद मधुर को पा लेना चाहते थे, जिन में उन्हें एक नेक और प्यार करने वाली उदार पत्नी दिख रही थी. बचपन से ही पिता के साथ उत्तर प्रदेश में शहरशहर भटक चुके सईद की ख्वाहिश अपना घर बसाने की थी, कमोवेश यही इच्छा मधुर की भी थी.
आखिर एक दिन हैरतअंगेज तरीके से दोनों ने शादी कर ली और हनीमून मनाने न्यूयार्क चले गए. मधुर सचमुच सईद को बहुत चाहती थीं और शायद इसीलिए उन्होंने अपना नाम सईद की इच्छा के मुताबिक बदल कर मेहरुन्निमा रख लिया था. एक औरत किस हद तक समर्पित होती है, इस से सईद पहली बार रूबरू हुए थे. औरत के समर्पण के बारे में कला और साहित्य की बड़ीबड़ी किताबों में उन्होंने काफी कुछ पढ़ा और सुना था, लेकिन उस सब को खुद की जिंदगी में उतरते देखा तो निहाल हो उठे. प्यार में एक औरत इतनी सहजता से अपना नाम, जाति, धर्म और पहचान सब कुछ बदलने को तैयार हो जाती है, यह उन्होंने मधुर के समर्पण भाव से ही जाना.
दोनों के पास काम की कमी नहीं थी. लंदन, अमेरिका और भारत घूम कर नाटक करते हुए इन का दांपत्य जीवन शुरू हुआ, जिस में वक्त की कमी के चलते रोमांस शायद उतना नहीं रह गया था, जितना एक नवदंपति में होना चाहिए. इस के बाद भी दोनों संतुष्ट और खुश थे और भविष्य के लिए बहुत सा पैसा कमा लेना चाहते थे. उसी दौरान दोनों मशहूर फिल्मकार इस्माइल मर्चेंट के संपर्क में आए, जिन्हें ऐसे ही प्रतिभाशाली कलाकारों की जरूरत थी. दोनों शिद्दत के साथ मर्चेंट से जुड़ गए और इस्माइल आइवरी प्रोडक्शन के लिए काम करने लगे.
शादी के एक साल बाद ही बेटी जिया पैदा हुई. 2 सालों के अंतर से मीरा और सकीना हुईं. लगातार मां बनने के कारण मधुर जितना थिएटर से दूर होती गईं, सईद उतना ही काम में व्यस्त होते गए. उन्हें पहले के मुकाबले नाम और पैसा ज्यादा मिलने लगा था. इस दौरान अमेरिका और लंदन में रहते हुए उन्हें मुकम्मल शोहरत और दौलत मिली, जिस के लिए वह कोशिश कर रहे थे.
बेटियों की परवरिश कर रहीं मधुर ने पूरी तरह से काम नहीं छोड़ा था. वह शौकिया ही सही, पहले की तरह यात्रा संस्मरण लिख रही थीं, इसी के साथ वह भारतीय व्यंजनों पर लिखने का काम भी करने लगी थीं. यह उन का बचपन से पसंदीदा काम था. जिंदगी एक ढर्रे पर आ कर ठहर गई थी, जिस में बेटियों की किलकारियां, मासूम शरारतें और जिया के पहली बार स्कूल जाने का अनुभव था. लेकिन इस बीच पति का साथ कम होता गया था. सईद लगातार व्यस्त होते जा रहे थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि वह कामयाब हो रहे थे.
सईद पत्नी, बच्चों और खुद पर खुले हाथों खर्च करने वालों में थे. उन के शौक अब परवान चढ़ते जा रहे थे, जिस में महंगे सूट, सिगरेट और महंगी शराब खास थे. लेकिन वह खुद समझ नहीं पा रहे थे कि ये साधारण सफलताएं उन्हें उदंड क्यों बना रही हैं? वह बेवजह चिड़चिड़े होते जा रहे थे. इंगलैंड और अमेरिका से उन का मन ऊबने लगा था, लिहाजा उन्होंने भारत वापस आने का फैसला ले लिया. मेहरुन्निमा इस फैसले से असहमत नहीं थी. सन 1961 में वे दिल्ली वापस आए और भारत सरकार के टूरिस्ट औफिस में बतौर पब्लिसिटी औफिसर नौकरी कर ली.
लेकिन सईद और मधुर के बीच अब सन्नाटा सा पसरने लगा था. सईद ब्रिटिश संस्कृति से प्रभावित थे, जबकि मधुर उन की तरह पाश्चात्य सभ्यता की दीवानी नहीं थीं. सईद पत्नी में बदलाव देखना चाहते थे और इस के लिए उन पर दबाव भी बना रहे थे. वैसे तो मधुर एक आज्ञाकारी पत्नी थीं, लेकिन उन्हें दबाव सहन करने की आदत नहीं थी. अपनी तरफ से उन्होंने पूरी कोशिश की कि कोई विवाद और कलह न हो, पर ऐसा होने लगा था.
कुछ दिनों बाद सईद और मधुर की मुलाकात एक बार फिर इस्माइल मर्चेंट और उन के सहयोगी आइवरी से हुई और फिल्मों पर काम शुरू हो गया. अब मधुर के पास ज्यादा वक्त था, लिहाजा मौके भी उन्हें ही ज्यादा मिले. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि मधुर का नाम सईद से ज्यादा चलने लगा था. हां, उन की पूछ जरूर बढ़ रही थी. इस के बावजूद सईद उन से पहले की तरह संतुष्ट नहीं थे. जबकि असंतुष्ट रहने की वजह भी उन की समझ में नहीं आ रही थी. मधुर से वह कुछ ज्यादा ही उम्मीदें रखने लगे थे, पर वे उम्मीदें किस तरह की हैं और उन से हासिल क्या होगा, यह वह नहीं समझ पा रहे थे.
अलगाव के बीज अंकुरित हो उठे थे. दोनों ही अभिजात्य और कुलीन पृष्ठभूमि से थे, लिहाजा उन के बीच का तनाव भी अभिजात्य और कुलीन था, जिस से बचने की वे जितनी ज्यादा कोशिश कर रहे थे, उतना ही ज्यादा उस की गिरफ्त में आते जा रहे थे. किशोरवय की मेलमुलाकातें, कनाट प्लेस का घूमनाफिरना, गेलार्ड में घंटों एकदूसरे के साथ बैठ कर बातें करना, दीवानों की तरह एकदूसरे को चाहना और डूब कर प्यार करना, गुजरे कल की बातें हो चली थीं.
खटपट शुरू हुई और मुंह खुले तो सन 1966 में दोनों का तलाक हो गया. यह सईद का पुरुषोचित अहं था या फिर शादी से पहले मधुर और उन के अभिभावकों के सामने शादी के लिए गिड़गिड़ाने का प्रतिशोध या ग्लानि, यह तय कर पाना मुश्किल था. उधर मधुर जैसी पत्नी के लिए जिंदगी के वे दिन बेहद कठिन दिन थे. क्योंकि पति ही उन के लिए सब कुछ था. बेटियां छोटी थीं और उन्हें मां के साथसाथ पिता की भी जरूरत थी. लेकिन बात नहीं बनीं. विधिवत तलाक के बाद दोनों अलग हो गए. बेटियां मां के साथ ही रहीं. हैरानी की बात यह थी कि इस तलाक से न सईद टूटे और न ही मधुर विचलित हुईं. इस के बजाए दोनों और ज्यादा ऊर्जा से अपनेअपने कामों में लग गए.
मधुर ने पाक कला पर लिखना शुरू किया तो अमेरिका और इंगलैंड में उन की रैसिपीज को हाथोंहाथ लिया गया. परंपरागत भारतीय व्यंजनों पर उन्होंने पूरी शृंखला लिख डाली, जिस का ताजा संस्करण भारतीय शाकाहारी करी है. पत्रपत्रिकाओं से ले कर टेलीविजन तक मधुर शैफ के रूप में दिखने लगीं. आज भी वह चर्चित और लोकप्रिय शैफों की रोल मौडल हैं. दूसरी ओर मधुर से तलाक के बाद सईद जाफरी जेनिफर ईरीन सोरेल नाम की अमेरिकन महिला से प्यार करने लगे थे, जो पेशे से फ्रीलांस कास्टिंग डायरेक्टर थी.
वह वैसी ही थी जैसी छवि जाफरी उस में देखना चाहते थे. इस बार उन्होंने प्रपोज करने और शादी का फैसला लेने में देर नहीं की. उन्होंने तलाक के तुरंत बाद शादी कर ली. सईद एक कलाकार जरूर थे, लेकिन उन के दिल में आममर्दों की तरह यह ख्वाहिश भी कहीं दबी थी कि अब मधुर पछताएगी, उन्हें याद करेगी और उन के पास आ कर गिड़गिड़ाएगी.
लेकिन हुआ इस का उलटा. शादी के चंद महीनों बाद ही जेनिफर ने जता दिया कि उसे पति की उतनी परवाह नहीं है, जितनी एक पत्नी को होनी चाहिए. महत्त्वाकांक्षी जेनिफर को अपने काम की फिक्र ज्यादा रहती थी, सईद की बिलकुल नहीं. भारतीय और पाश्चात्य पत्नियों में कितना फर्क है, यह बात सईद की समझ में आ गई थी, लेकिन अब पछतावे के सिवाय उन के पास कुछ नहीं था. फिर भी सईद ने हिम्मत नहीं हारी. सईद को स्टेज कलाकार के रूप में वह सब नहीं मिला था, जो व्यावसायिक हिंदी फिल्मों में काम कर के मिला.
70 के दशक से ले कर 2015 तक उन्होंने सौ से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और सभी में खासे सराहे गए. पैसा भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिला. गांधी फिल्म में वल्लभभाई पटेल की भूमिका में उन्होंने मानों पटेल के रौबीले व्यक्तित्व को साकार कर दिया था. शुरुआती फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ से ही उन्होंने जता दिया था कि वह बेहद मंझे और सधे अभिनेता हैं, जिस की संवाद अदायगी की अपनी खास शैली है, जिस के चेहरे के हावभाव किसी दूसरे पेशेवर ऐक्टर से ज्यादा बेहतर तरीके से बदलते हैं. शतरंज के खिलाड़ी में सईद जाफरी ने संजीव कुमार के सामने शतरंज खेलते हुए उन से कमतर अभिनय नहीं किया था. ‘हिना’ से ले कर ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा कर ही दम लिया.
सईद जाफरी ने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गजों के साथ काम किया और हर फिल्म में बेहतर से बेहतर अभिनय कर के पहले से ज्यादा वाहवाही लूटी. ‘चश्मेबद्दूर’ और ‘मासूम’ जैसी दर्जनों फिल्मों में वह एकदम अलग रोल में थे. इस के बावजूद वह हर चुनौतीपूर्ण भूमिका में खरे उतरे. सईद जाफरी बेशक बेहतरीन कलाकार थे. लेकिन उन के बारे में यह बात गिनेचुने लोग ही जानते थे कि वह एक असफल पति हैं. मधुर को तलाक दे कर वह जिंदगी भर पछताते रहे. खुद उन का मानना था कि जेनिफर की बेरुखी उन्हें अकसर मेहरुन्निमा की याद दिलाती रही, जो एक आज्ञाकारी नेक और उदार पत्नी थीं. तलाक के 7 सालों बाद उन्होंने कहीं शैफ मधुर जाफरी के बारे में पढ़ा और उन की तसवीर देखी तो चौंक पड़े और उन से मिलने अमेरिका जा पहुंचे, जहां मधुर सेनफोर्ड एलन से शादी कर के दोबारा घरगृहस्थी बसा चुकी थीं.
सईद से तलाक के करीब 3 सालों बाद उन्होंने दोबारा शादी का फैसला लिया था. इस की अहम वजह बेटियों को पिता का प्यार दिलाना था. इस मामले में सेनफोर्ड मधुर से किए अपने वादे पर एकदम खरे उतरे थे. मधुर का दूसरी शादी का फैसला सईद की तरह न गलत था, न चयन में कोई त्रुटि. सईद जब उन से मिलने पहुंचे तो मधुर ने मिलने से साफ मना कर दिया, पर तीनों बेटियों जिया, मीरा और सकीना ने एक बार उन से मिलना जरूर मुनासिब समझा. मुनासिब इसलिए नहीं कि उन्हें सईद से कोई लगाव था, बल्कि इसलिए कि वे सईद को बताना चाहती थीं कि उन के नए पिता दुनिया के बेहतरीन पिता हैं और वह जानते हैं कि सच्चा प्यार क्या होता है. मम्मी जैसी थीं, उन्हें वैसा ही उन्होंने स्वीकार कर लिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में पूरी मदद की.
यह सईद जाफरी की जिंदगी का सब से कड़वा दिन था. जब संतान पिता को अच्छाबुरा सिखाने और समझाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि दुनिया और रिश्तेनाते हमेशा आप के मुताबिक नहीं चलते, क्योंकि आप उन के मुताबिक नहीं चले थे. मधुर के प्रति अपनी क्रूरता को स्वीकारना बताता है कि सईद जाफरी में कन्फैशन की हिम्मत थी, जो आमतौर पर लोगों में नहीं होती. उस दिन सईद की समझ आया कि शायद वह किसी को प्यार नहीं करते, इसलिए कोई उन्हें प्यार नहीं करता.
एक कामयाब रंगमंचीय और फिल्मी कलाकार की इस हालत पर तरह खाया जा सकता है, जिस का जिम्मेदार भी वह खुद ही था. लेकिन दाद उन की चाहत को भी देनी पड़ेगी कि वह अपनी पहली पत्नी मधुर को कभी भुला नहीं पाए. सईद ने बेहद स्वस्थ मन से माना कि दांपत्य में जीवनसाथी को बदलने की कोशिश से ही रिश्ता टूटता है. शायद मधुर के प्रति इसी चाहत का नतीजा था कि फिल्म ‘सागर’, जिस में वह डिंपल कपाडि़या के पिता के रोल में थे. सेट पर आमनासामना होने पर मधुर ने कभी सिर उठा कर उन्हें देखने की जहमत नहीं उठाई, न ही जरूरत महसूस की. लेकिन सईद ने मधुर को जरूर जी भर के देखा होगा. ठीक वैसे ही, जैसे कभी आकाशवाणी और कनाट प्लेस में देखा करते थे. इसलिए अपनी तमाम फिल्मों में सागर उन के लिए ज्यादा अहम थी.
बीते 14 नवंबर को जब सईद की भतीजी शाईन अग्रवाल ने उन की मौत की खबर सोशल मीडिया के जरिए दी तो बौलीवुड में उन्हें नजदीक से जानने वाले कलाकारों ने यह जरूर सोचा होगा कि जरूरी नहीं कि एक सफल अभिनेता सफल पति भी हो. Love Story






