Property Dispute: देश के अन्य राजघरानों की तरह जयपुर राजघराना भी संपत्ति विवाद में उलझा हुआ है. भाईबहन आपस में कानूनी दांवपेंचों में उलझे हुए हैं. दौलत ने सारे रिश्तेनातों को अलगथलग कर दिया है. कई कारणों से जयपुर राजघराना दुनियाभर में हमेशा चर्चित रहा है. जयपुर की महारानी गायत्री देवी दुनिया की 10 सब से अधिक खूबसूरत महिलाओं में गिनी जाती थीं. इस के अलावा इस राजघराने के पास अकूत धनदौलत थी.
अब राजामहाराजा तो रहे नहीं, लेकिन उन की जो संपत्तियां थीं, अब वे पीढि़यां दर पीढि़यां बंटती जा रही हैं. संपत्ति के बंटवारे को ही ले कर इस राजघराने में भी विवाद पैदा हो गया है. देशदुनिया में सब से बड़े संपत्ति विवाद के कारण जयपुर राजघराना आजकल चर्चाओं में है. राजघराने की संपत्ति का विवाद क्या है और यह क्यों पैदा हुआ, यह जानने से पहले हमें अतीत में जाना होगा. जयपुर के पूर्व महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय ने 3 शादियां की थीं. उन की पहली शादी मरुधर कंवर से हुई थी, दूसरी शादी किशोर कंवर से और तीसरी शादी गायत्री देवी से. उन की तीनों पत्नियों में गायत्री देवी सब से सुंदर थीं.
23 मई, 1919 को जन्मी गायत्री देवी पश्चिम बंगाल के कूचबिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण एवं मराठा राजकुमारी इंदिरा राजे की संतान थीं. वह अप्रतिम सौंदर्य की मलिका थीं. युवावस्था में उन्हें दुनिया की सब से सुंदरतम महिला कहा जाता था. उन की शुरुआती शिक्षा लंदन में हुई थी. इस के बाद उन्होंने शांति निकेतन की विश्वभारती यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की. बाद में वह स्विटजरलैंड और इस के बाद लंदन में पढ़ने गईं. जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय से उन का विवाह 9 मई, 1940 को हुआ था.
भवानी सिंह महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय की बड़ी रानी मरुधर कंवर के बेटे थे. ब्रिगैडियर भवानी सिंह जयपुर के पूर्व महाराजा भी कहलाए. दूसरी पत्नी किशोर कंवर से 2 बेटे हुए- जयसिंह और पृथ्वी सिंह. जबकि गायत्री देवी से 15 अक्तूबर, 1949 को एक बेटा हुआ जगत सिंह. गायत्री देवी ने राजनीति में भी कदम रखा तो सन 1962 में सांसद बनीं. उस समय उन्होंने सर्वाधिक अंतर से चुनाव जीतने का रिकौर्ड बनाया था. सन 1967 में भी वह सांसद चुनी गईं. आपातकाल के दौरान वह करीब 5 महीने तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद रहीं. इस के बाद उन्होंने राजनीति छोड़ दी.
गायत्री देवी के बेटे जगत सिंह ने जयपुर और अजमेर के मेयो कालेज से पढ़ाई की. इस के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए. बाद में वह ईसरदा राजा के यहां गोद चले गए. 10 मई, 1978 को उन की शादी थाईलैंड की राजकुमारी प्रियनंदना रंगसित से हुई. प्रियनंदना थाईलैंड के महाराज पिया रंगसित और महारानी विभावदी रंगसित की छोटी बेटी थीं. कहा जाता है कि जगत सिंह और प्रियनंदना की मुलाकात लंदन के एक स्कूल में हुई थी. ब्रिटिश पब्लिक स्कूल में पढ़ी प्रियनंदना को घुड़सवारी का शौक था. जगत सिंह को भी घुड़सवारी से लगाव था. इसलिए दोनों साथसाथ ही घुड़सवारी करते थे.
उसी दौरान उन के बीच रिश्ते गहरे होते गए और बाद में वे विवाह के बंधन में बंध गए. जयपुर राजघराने की इस शाही शादी का रिसैप्शन लंदन में आयोजित किया गया था. बेहद भव्य तरीके और शानोशौकत से हुए इस आयोजन में लार्ड माउंटबेटन के साथ ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय भी शामिल हुई थीं. शादी के अगले साल सन 1979 में प्रियनंदना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम लालित्या रखा गया. 2 साल बाद एक बेटा हुआ, जिस का नाम देवराज रखा गया.
हालांकि जगत सिंह और प्रियनंदना ने एकदूसरे को जाननेसमझने के बाद ही शादी की थी, लेकिन उन के रोमांस की गरमाहट जल्दी ही ठंडी पड़ गई. उन के बीच वैचारिक मतभेद पैदा होने लगे. जिस का नतीजा यह निकला कि सन 1987 में उन दोनों के बीच तलाक हो गया. तलाक के बाद प्रियनंदना अपने बेटे और बेटी को ले कर थाईलैंड चली गईं. इस के बाद जगत सिंह ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सके. पत्नी और बच्चों के बिछोह ने उन्हें तोड़ दिया और सन 1997 में लंदन में उन की मौत हो गई.
जगत सिंह की मौत के करीब 10 सालों बाद उस समय विवाद पैदा हो गया, जब पूर्व राजमाता गायत्री देवी ने 23 जून, 1996 को लिखी एक वसीयत का हवाला देते हुए जगत सिंह की पूरी संपत्ति पर अपना अधिकार जताया. उस वसीयत के अनुसार, जगत सिंह ने अपनी संपत्ति का उत्तराधिकारी गायत्री देवी को बनाया था. थाईलैंड में रह रही जगत सिंह की तलाकशुदा पत्नी प्रियनंदना को जब इस वसीयत का पता चला तो वह बेटे देवराज एवं बेटी लालित्या के साथ भारत आ गईं और उस वसीयत को चुनौती दी. उन्होंने अदालत के सामने कहा कि उन के दोनों बच्चे जगत सिंह की जायदाद के वैध वारिस हैं और गायत्री देवी उन्हें उन के हक से वंचित कर रही हैं.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन के पति जगत सिंह की वसीयत गायत्री देवी ने बदल दी है. उन्होंने जाली वसीयत बना कर जयपुर रौयल स्टेट द्वारा संचालित निजी कंपनियों के शेयर से उन के दोनों बच्चों देवराज सिंह एवं लालित्या कुमारी को वंचित कर दिया है. देवराज सिंह ने कंपनी ला बोर्ड में जयमहल पैलेस में अपने पिता के शेयर्स पर भी दावा किया.
जयपुर राजघराने की संपत्ति पर वारिसों के हक की कानूनी लड़ाई को ले कर 14 नवंबर, 2008 को गायत्री देवी और देवराज सिंह के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते के तहत यह तय हुआ कि जगत सिंह की संपत्ति के 3 हिस्से होंगे यानी जगत सिंह की संपत्ति देवराज सिंह, लालित्या और गायत्री देवी में बराबरबराबर बांटी जाएगी. जयपुर के जिला एवं सत्र न्यायालय में हुए इस समझौते के तहत गायत्री देवी ने यह भी सहमति जताई कि वह जगत सिंह की 1996 की विवादित वसीयत में अपना दावा नहीं करेंगी. इस समझौते के बाद अदालत ने जगत सिंह की संपत्ति का तीनों के बीच बंटवारा कर दिया.
इस समझौते का किशोर कंवर के बेटे पूर्व महाराज पृथ्वी सिंह ने खुल कर विरोध किया. अपने भाई पृथ्वी सिंह का यह रवैया जयपुर के पूर्व महाराज भवानी सिंह को अच्छा नहीं लगा. समझाने के बावजूद भी पृथ्वी सिंह नहीं माने तो भवानी सिंह ने अपने भतीजे देवराज सिंह का साथ दिया. इस के बाद फरवरी, 2009 में देवराज सिंह ने न्यायालय में उत्तराधिकारी प्रमाणपत्र पाने की दरख्वास्त दी. मई, 2009 में अदालत ने देवराज सिंह एवं लालित्या को जगत सिंह की संपत्ति का उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी कर दिया.
देवराज सिंह को कामयाबी मिलती देख गायत्री देवी ने समझदारी दिखाते हुए पोते देवराज सिंह को अपने साथ महल लिलिपूल में बुला लिया. लेकिन 2 महीने बाद 29 जुलाई, 2009 को 90 साल की उम्र में गायत्री देवी की मौत हो गई. गायत्री देवी की मौत के बाद जयपुर राजघराने में एक बार फिर तूफान उठ खड़ा हुआ. यह विवाद इसलिए खड़ा हुआ, क्योंकि राजघराने की संपत्तियां अरबोंखरबों रुपए की थीं. गायत्री देवी के उत्तराधिकारी संपत्ति, वसीयत और लिलिपूल पर कब्जे के विवाद अभी अदालतों में लंबित चल रहे हैं.
जयपुर के राजपरिवार की ओर से शहर के बीच रनिवास एवं गैस्टहाउस के रूप में जयमहल पैलेस बनाया गया था. जयपुर की बेजोड़ स्थापत्य एवं वास्तुकला के लिए दुनियाभर में मशहूर रहे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के पुत्र महाराज सवाई माधोसिंह प्रथम ने 18वीं शताब्दी में सन 1751 से 1755 के बीच यह महल बनवाया था. अब यह महल फाइवस्टार होटल में तब्दील हो चुका है. गायत्री देवी की मौत से पहले ही इस महल को उन के बेटे जगत सिंह को सौंप दिया गया था. जगत सिंह ने ही इसे होटल में तब्दील किया था, साथ ही सौतेले भाई जयसिंह और पृथ्वी सिंह के साथ उन्होंने पार्टनरशिप कर ली थी. इस में जगत सिंह के 99 फीसदी और दोनों भाइयों व अन्य के एक फीसदी शेयर रखे गए थे.
जगत सिंह की मौत के बाद शेयरों में बदलाव कर के केवल 6 फीसदी शेयर जगत सिंह के दिखाए गए. बाद में यह हिस्सा भी जगत सिंह के बेटे देवराज सिंह एवं बेटी लालित्या को नहीं दिया गया. इस को ले कर मामला अदालत में पहुंचा. जयपुर रेलवे स्टेशन के पास 18 एकड़ जमीन पर बने इस महल के कंगूरे, बरामदे, खंभे, लौन, अहाते आदि जयपुर राजघराने के वैभव की कहानी कहते हैं. अभी यह महल ताज ग्रुप से एसोसिएट है.
जयमहल पैलेस अब पूरी तरह होटल में तब्दील हो चुका है. इस में 100 कमरे बने हैं. इस होटल में मुगल गार्डन है और मेहमानों के लिए हाथी पोलो की खास सुविधा है. जयपुर के इतिहासकार बताते हैं कि जयमहल पैलेस रनिवास के साथ राजपरिवार के मेहमानों और अंगरेजों के शासन के दौरान गवर्नर के रहने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था. मिर्जा इस्माइल भी इस महल में रहे थे. इतिहासकारों का कहना है कि जब इस महल का निर्माण किया गया था, तब मुद्रा के रूप में झाड़शाही के सिक्कों का प्रचलन था. कचनार का पेड़ राजपरिवार का राजवृक्ष माना जाता था.
ऐसे में चांदी के सिक्कों पर कचनार के पेड़ की झाड़ का अंकन होता था, इसलिए इन्हें झाड़शाही सिक्के कहते थे. उस समय राजस्थान के मकराना और किशनगढ़ से मार्बल ला कर जयमहल पैलेस में लगाया गया था. राजपरिवार के लिए यह महल बहुत महत्त्वपूर्ण था. मेहमानों व मित्रों के साथ राजपरिवार के सदस्यों की चौसर यहां खूब जमती थी. इस के साथ ही शतरंज के लिए महल के दाहिनी ओर अहाता बना हुआ था. इस महल में शतरंज के मोहरे आज भी मेहमानों को लुभाते हैं.
सवाई माधोसिंह के कला प्रेम को आज भी होटल में जीवित रखा गया है. महल में सब से ज्यादा बेहद कीमती मिनिएचर पेटिंग्स लगी हैं. इन में गोल्ड व सिल्वर की प्लेटिंग की हुई है. इन पेंटिंग्स में राजपरिवार की ओर से लड़े गए युद्ध, विवाह समारोहों, आयोजनों, तीतगणनौर आदि उत्सवों के साथ रामायण और महाभारत की कथाओं का चित्रांकन है. इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर, 2015 को एक अहम फैसला सुनाया, जिस में उस ने देवराज और लालित्या को पिता के शेयरों का हकदार माना. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ए.आर. दवे एवं न्यायाधीश ए.के. गोयल की खंडपीठ ने हाईकोर्ट द्वारा सन 2010 में देवराज और लालित्या के पक्ष में दिए गए आदेश को बहाल रखा.
साथ ही यह भी कहा कि कंपनी ला बोर्ड देवराज समूह के दावे को खारिज करना न्यायोचित नहीं होगा. सर्वोच्च अदालत ने गायत्री देवी के सौतेले पुत्र पृथ्वी सिंह एवं उन की बहन उर्वशी देवी तथा जयमहल होटल प्राइवेट लिमिटेड सहित 6 एसएलपी (अपीलों) को 30 लाख रुपए का जुरमाना लगाते हुए खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को सही माना, जिस में कंपनी रजिस्ट्रार को जगत सिंह के नाम की जगह देवराज सिंह एवं लालित्या का नाम दर्ज करने को कहा था. एसएलपी में पृथ्वी सिंह सहित अन्य ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि उन के सौतेले भाई जगत सिंह गोद गए थे और देवराज सिंह व लालित्या को जगत सिंह की वसीयत में उत्तराधिकारी नहीं माना गया था.
सुप्रीम कोर्ट के इस अहम फैसले से गायत्री देवी के पोतेपोती को जयमहल होटल्स, एसएमएस इनवैस्टमेंट कार्पोरेशन तथा सवाई माधोपुर स्थित जयपुर राजघराने की संपत्तियों में हक मिलेगा. इन के अलावा अब उन का जयपुर के सब से खूबसूरत महल रामबाग पैलेस पर भी दावा मजबूत हो गया है. सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला आने के बाद देवराज सिंह और लालित्या की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें दुनियाभर से बधाइयां मिलनी शुरू हो गई हैं. देवराज के एडवोकेट अभिषेक राव का कहना है कि गायत्री देवी ने अपने बेटे जगत सिंह को जयमहल पैलेस गिफ्ट किया था.
जगज सिंह की मौत के बाद देवराज सिंह ने जब अपना हक मांगा तो पृथ्वी सिंह ने उन्हें सक्सेशन सर्टिफिकेट लाने को कहा. यह सर्टिफिकेट बनवाने में काफी समय लग गया. इस मामले को देवराज सिंह सन 2006 में कंपनी ला बोर्ड नई दिल्ली ले गए. वहां पृथ्वी सिंह ने अनापत्ति दाखिल कर दी. उन के मुताबिक जगत सिंह एक वसीयत छोड़ कर गए थे, जिस में उन की सारी संपत्ति पूर्व राजमाता गायत्री देवी के नाम करने की बात थी. बाद में पृथ्वी सिंह देवराज सिंह की लीगल एज को ले कर दिसंबर, 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट चले गए. दिल्ली हाईकोर्ट ने देवराज को लीगल एज माना. इस से पृथ्वी सिंह को गहरा झटका लगा. फिर वह अपने बेटे के साथ फरवरी, 2013 में सुप्रीम कोर्ट चले गए.
पृथ्वी सिंह और उन की बहन उर्वशी ने गायत्री देवी की 10 मई, 2009 की वसीयत को फरजी बताते हुए जयपुर के एडीजे कोर्ट में दावा किया. पृथ्वी सिंह का कहना था कि गायत्री देवी की वसीयत में उन के हस्ताक्षर सही नहीं हैं. पृथ्वी सिंह ने एडीजे कोर्ट से वसीयत के क्रियान्वयन पर स्टे मांगा था, लेकिन कोर्ट ने उन के अनुरोध को नहीं माना. एडीजे कोर्ट के इस आदेश को पृथ्वी सिंह ने हाईकोर्ट में चुनौती दे रखी है. वहीं दूसरी ओर देवराज सिंह व लालित्या ने अपनी दादी गायत्री देवी की वसीयत को सही मानते हुए उस के अुनसार, उन्हें संपत्तियों में हकदार मानने के लिए प्रोवेट का दावा जयपुर महानगर की जिला एवं सत्र न्यायालय में कर रखा है.
पिछले दिनों अदालत ने इस मामले में देवराज सिंह व लालित्या की प्रोवेट को दावे में बदलते हुए जिला कलेक्टर जयपुर को गायत्री देवी की संपत्तियों का मूल्यांकन करने का आदेश दिया है. गायत्री देवी की मृत्यु के बाद देवराज सिंह व लालित्या ने लिलिपूल पर अपना हक जताया तो पृथ्वी सिंह ने रामबाग पैलेस की ओर से एडीजे-5 कोर्ट में दावा कर दिया. अदालत ने 21 जुलाई, 2011 को देवराज सिंह को पाबंद किया कि वह इस संपत्ति को न तो ट्रांसफर करें, न ही बेचें और न किसी को गिरवी रखें.
पृथ्वी सिंह के वकील रामजीलाल गुप्ता का कहना है कि लिलिपूल रामबाग पैलेस होटल की संपत्ति है और गायत्री देवी इस में किराएदार थीं. इस संबंध में उन्होंने मीन्स प्रौफिट का दावा कर रखा है. देवराज के वकील अभिषेक राव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब वह रामबाग पैलेस में जगत सिंह के शेयरों की हिस्सेदारी के लिए हाईकोर्ट में अरजी दायर करेंगे. राव के अनुसार, रामबाग पैलेस होटल में जगत सिंह के 27.06 फीसदी शेयर थे. पृथ्वी सिंह ने इन शेयरों को डायल्यूट कर 4.74 प्रतिशत कर दिया है. शेयर डायल्यूट का यह मामला कंपनी ला बोर्ड में 2006 से लंबित है.
गायत्री देवी की मृत्यु के बाद देवराज सिंह व लालित्या ने उन के पिता के रामबाग पैलेस होटल में शेयरों को उन के नाम ट्रांसफर कराने के लिए कंपनी ला बोर्ड में दावा किया था. बोर्ड ने जगत सिंह के शेयर ट्रांसफर नहीं किए, जिस के लिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. वकील के अनुसार, रामबाग पैलेस होटल का रजिस्टर्ड औफिस जयपुर में होने के कारण इस होटल में जगत सिंह के शेयरों को देवराज सिंह व लालित्या को दिलवाने का मामला राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में लंबित है.
बहरहाल, देश के अन्य राजघरानों की तरह जयपुर राजघराना भी संपत्ति विवाद में उलझा हुआ है. भाईबहन आपस में कानूनी दांवपेंचों में उलझे हुए हैं. दौलत ने सारे रिश्तेनातों को अलगथलग कर दिया है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट से देवराज व लालित्या को राहत मिल गई है, लेकिन अरबोंखरबों की संपत्तियों के ये पारिवारिक विवाद जल्द सुलझते नजर नहीं आ रहे हैं. Property Dispute






