Suspense Story Hindi: ड्रैकुला, पिशाच अथवा चुड़ैल जैसे शब्दों की अवधारणा सदियों से चली आ रही है. कहानियों के माध्यम से ये शब्द लोगों के मन में दहशत भी पैदा करते रहे हैं. लेकिन हकीकत में डै्रकुला, पिशाच या चुडै़ल जैसा कुछ नहीं होता. वैसे मानवीय खून पीने वाले ड्रैकुला आज भी इंसानों के बीच मौजूद हैं.
अगर आप मानते हैं कि इंसानी खून पीने वाले ड्रैकुला महज किस्सेकहानियों का हिस्सा हैं तोआप गलतफहमी में हैं. क्योंकि दुनिया में 1-2 नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा चलतेफिरते ऐसे जिंदा लोग हैं, जो रोज या अकसर चाय या काफी की तरह इंसानी खून पीते हैं. जिस तरह तमाम लोगों को शराब, स्मैक या अफीम की लत होती है, वैसे ही इन्हें रोजाना खून पीने की लत होती है. इन की सब से मुखर मौजूदगी उस अमेरिका में ही है जो आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक सोच का गढ़ माना जाता है.
खून पीने वाले ये बिलकुल आम लोग हैं. इन में कोई क्लर्क है तो कोई बेकरी वाला तो कोई इमीग्रेशन महकमे का अधिकारी है तो कोई नर्स. कोई किसी स्कूल में कविताएं पढ़ाने वाली अध्यापिका है तो कोई मसाज करने वाली या कालगर्ल. यहां तक कि नियमित खून पीने वाले इन पिशाचों में पूरे रस्मोरिवाज से धार्मिक अनुष्ठान कराने वाला किसी धर्म का कोई व्यक्ति भी हो सकता है.
एक और हैरान करने वाली बात यह है कि न केवल दुनिया में नियमित खून पीने वाले लोग मौजूद हैं, बल्कि नियमित रूप से खून पिलाने वाले लोग भी मौजूद हैं. खून पिलाने वाले लोग भी बिलकुल हमारे आप के जैसे आम लोग ही हैं. दुनिया भर की तमाम कहानियों में भले ही ड्रैकुला, पिशाच या चुड़ैलें लोगों को मार कर उन का खून पीते हों, लेकिन हकीकत से इस का कुछ लेनादेना नहीं है. स्थिति यह है कि अब तो ज्यादातर ड्रैकुलाओं को सहमति से खून पिलाने वाले उपलब्ध हैं. यह बात खून पीने और पिलाने वाले की आपसी रजामंदी से तय होती है कि खून शरीर में से सीधे चीरा लगा कर पीया जाएगा या फिर सक्शन पाइप से गिलास में निकाल कर सिप करते हुए पीया जाएगा.
बीबीसी फ्यूचर के लिए इस विषय पर एक रिसर्च लेख लिखने वाले डेविड राबसन कहते हैं, ‘‘एक दिन अमेरिका के न्यू आरलींस के फ्रेंच क्वार्टर इलाके में मैं ने पाया कि जान एडगर ब्राउनिंग के ‘रक्तदान’ का एक खास सत्र शुरू होने वाला था. इसे चिकित्सीय अंदाज में शुरू किया गया. उन के एक जानकार ने एल्कोहल से उन की पीठ का एक हिस्सा साफ किया. फिर उन की पीठ पर डिस्पोजेबल छुरी से एक कट लगाया, जिस से शरीर से खून निकलने लगा. फिर उस ने उस निकलते खून को पीना शुरू कर दिया. इस तथाकथित ड्रैकुला ने ब्राउनिंग का थोड़ा सा खून पीने के बाद, खून पीना बंद कर दिया. उस ने उन के शरीर को फिर एल्कोहल से साफ किया और कटी हुई जगह पर पट्टी लगा दी.
क्योंकि पीने वाले के मुताबिक ब्राउनिंग के खून में मैटेलिक तत्वों की मात्रा कम थी, जिस से वह उस के टेस्ट के मुताबिक नहीं था. कह सकते हैं कि ड्रैकुला यूं ही किसी का खून नहीं पी लेते, वह खून उन के टेस्ट के अनुरूप भी होना चाहिए.’’
वास्तव में हर किसी के खून का स्वाद उस के खानपान, शरीर में पानी की मात्रा और ब्लडग्रुप से तय होता है. दरअसल, ब्राउनिंग, लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हैं. वह न्यूआरलींस रियल वैंपायर समुदाय पर हो रहे शोध से जुड़े हैं. अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें खून पीने की लत है. पहले ब्राउनिंग मानते थे कि ब्लड फीडिंग महज एक तरह की तांत्रिक गतिविधि या कोई धार्मिक कर्मकांड है. लेकिन तब तक वह उन लोगों से नहीं मिले थे, जो सीधे किसी इंसान के शरीर से उस का खून पीते हैं. ऐसे में जब उन्होंने ब्लड फीडिंग के लिए खुद को डोनर के तौर पर पेश किया तो उन का नजरिया ही बदल गया.
यहां यह बता देना भी जरूरी है कि खून पीने वाले लोगों में से ज्यादातर का अलौकिक शक्तियों पर कोई भरोसा नहीं होता. कहने का मतलब यह कि ये लोग अपनी खुद की इच्छा के लिए खून पीते हैं. फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोग एक खास तरह की मन:स्थिति के शिकार होते हैं. क्योंकि नियमित रूप से खून पीने वाले लोगों को अगर कभी खून नहीं मिलता या मिलने में देर हो रही होती है तो इन की हालत बड़ी विचित्र हो जाती है. ये थकान, सिरदर्द और असहनीय पेट दर्द का शिकार होने लगते हैं. दरअसल खून पीते वक्त इन के दिलोदिमाग में पूरी ताकत से यह बात बैठी होती है कि उन्हें केवल इंसानों का खून पीने से ही राहत मिल सकती है.
दुनिया में मौजूद जीवित ड्रैकुलाओं का किस्से कहानियों के ड्रैकुलाओं से कोई संबंध नहीं है. वर्तमान में पूरी दुनिया में इंसानी रक्त पीने वाले जो लोग मौजूद हैं, वे वितृष्णाओं और विकृतियों की देन हैं. ऐसे लोगों ने आधुनिक वैज्ञानिक विकास को भी बहुत होशियारी से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. मसलन इंटरनेट से पहले के जमाने में ये लोग जहां अलगथलग पड़े हुए थे, वहीं आज इन लोगों के समूहों ने अपनी वेबसाइटें बना रखी हैं. वेब पन्ने बना रखे हैं. इन लोगों का नेटवर्क भी खासा विकसित है. इंसानी खून पीने के अपने अलगअलग तरीकों और अलगअलग तरह की आदतों की वजह से इन के कई रूप हैं.
मसलन खून पीने वाली नर्सें, बार स्टाफ, सेके्रटरी या फिर ऐसे ही कई अन्य पेशेवर लोग सामान्य नौकरियां करते हैं. दूसरी तरफ सेठ ड्रैकुला जो बहुत रईस हैं, जो अपने लिए हर दिन पसंदीदा किस्म के खून का इंतजाम करते हैं. खून पीने वाले पिशाचों या ड्रैकुलाओं में जहां कुछ शर्मीले स्वभाव के होते हैं, वहीं कई धार्मिक किस्म के होते हैं, जिन का संबंध अलगअलग धर्मों से होता है. ऐसे लोग अपना जीवन पूरे धार्मिक भाव से ईमानदारी के साथ गुजारते हैं. कई लोग हर रोज उसी तरह शाम को खून पीते हैं, जैसे कई दूसरे लोग शाम को शराब पीते हैं.
कइयों के बारे में किसी को पता भी नहीं चलता कि वे किसी ब्लड बैंक से चुपचाप ब्लड खरीदते हैं और आराम से घर बैठ कर पीते हैं. कई लोग खून को चाय में मिला कर पीते हैं तो कई इसे विभिन्न किस्म की जड़ीबूटियों के साथ पीते हैं. कई लोग ऐसे भी हैं, जो इंसान के साथसाथ कभीकभार जानवर का खून भी पी लेते हैं. खासकर तब जब इंसान का खून उपलब्ध नहीं हो पाता. कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो बहुत परोपकारी होते हैं. खून पीने वाले आज के ड्रैकुला माइथोलौजी की कथाओं की तरह न तो कब्रिस्तान जाते हैं और न वहां रहते हैं, बल्कि नाइट क्लब जाते हैं.
कई नाइट क्लबों में भी चुपचाप खून परोसा जाता है. ब्राउनिंग जैसे शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे कई ‘वैंपायर’ भी होते हैं, जिन के लिए खून पीना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है. अपने शोध के दौरान ब्राउनिंग की एक ऐसे किशोर से मुलाकात हुई, जो मुश्किल से 13-14 साल का था. उस ने ब्राउनिंग को बताया कि वह हमेशा कमजोर महसूस करता था, दोस्तों के साथ खेलते हुए थक जाता था. एक दिन उस का अपने किसी दोस्त से झगड़ा हो गया.
इस झगड़े में उस के दोस्त को चोट लग गई, खून बहने लगा और उसी दौरान वह खून उस के मुंह, दांतों में लग गया, जिस से उसे लगा कि अचानक उस के अंदर ताकत आ गई है. खून के स्वाद ने खून की भूख बढ़ा दी. अब वह नियमित खून पीता है. किसी शराबी की तरह जब तक वह खून नहीं पीता, उस के शरीर में वह स्फूर्ति नहीं आती. कुल मिला कर यह विकृति एक मनोवैज्ञानिक नशा ही है. मिलिए ब्लट से. 28 साल की ब्लट कैटशेन ड्रैकुलाओं को अपना खून पिलाती हैं. मगर यह ऐसा नहीं कहतीं. यह खुद को एक ब्लड डोनर बताती हैं. ब्लट अमेरिका के मैक्सिको प्रांत के लूसियाना शहर में रहती हैं. वह हमारे आप के जैसी ही बिलकुल सामान्य महिला हैं. भिखारियों के प्रति दयालु, बच्चों से प्यार करने वाली सभ्य महिला, अपने से बड़ों की इज्जत करने वाली.
कहने का मतलब बिलकुल सामान्य और खुशमिजाज. लेकिन वह टेक्सास में रहने वाले अपने एक वैंपायर दोस्त के घर भी जाती रहती हैं, ताकि उसे अपना खून पिला सकें. माइकल वैकमील नाम का उन का यह दोस्त नियमित रूप से उन का खून पीता है. यह जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि आखिर अलगअलग वैंपायरों को ब्लट अपना खून कैसे पिलाती होंगी? पीठ से निकाल कर या वह कहती होंगी कि सीधे चीरा लगा कर वह खून पी लें. हकीकत यह है कि ब्लट दोनों ही तरह से खून पिलाती हैं.
कई बार खून पीने के लिए वैंपायर उन की पीठ पर कट लगाते हैं. इस के बाद सीधे मुंह लगा कर खून पी लेते हैं तो कई बार पहले सक्शन कप की मदद से खून शरीर से निकाला जाता है, फिर आसानी से बातचीत करते हुए पीया जाता है. खून किस तरीके से पीया जाना है, यह दोनों की रजामंदी से तय होता है. Suspense Story Hindi
लेखक – निनाद गौतम






