Hindi Stories: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ आई और सफल भी रही. निस्संदेह लोगों ने इस प्रेमकहानी को पसंद किया. लेकिन सच यह है कि बाजीराव और मस्तानी के प्रेम को उस जमाने में कोई समझ नहीं पाया था, इसीलिए उन के अपनों ने ही उन्हें एक नहीं होने दिया. फिर भी ये दोनों पात्र ऐतिहासिक आईने में अमर हैं.

प्रेम कहानियां मानव मन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं. कुछ प्रेम कहानियां तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर अमर भी हो गई हैं. लेकिन यह दुख की ही बात है कि मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उन की प्रेमिका मस्तानी की अद्भुत प्रेम कथा के बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए 18वीं सदी के इन ऐतिहासिक पात्रों ने भारत के भाग्य का फैसला किया था.

पेशवा बाजीराव मराठा साम्राज्य के ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने बहुत कम समय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र की सीमा से निकाल कर पूरे हिंदुस्तान में फैला दिया था. इस अजेय योद्धा के रणकौशल और वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 39 साल की उम्र में 41 युद्ध लड़े और किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए. बाजीराव की बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘इंडियन नेपोलियन’ कहना गलत नहीं होगा. वैसे नेपोलियन कई युद्धों में पराजित हुआ था, लेकिन बाजीराव प्रथम हमेशा अजेय रहे.

सन 1720 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत के बाद उत्तर भारत में ही नहीं दक्खिन में भी राजनीतिक शून्यता का आलम छा गया था, जिसे पेशवा बाजीराव ने एक झटके में दूर कर के दिल्ली पर मराठों का कब्जा कायम कर दिया था. मुगल सम्राट और सूबेदार जिन्हें अपनी बारूदी ताकत पर नाज था, बाजीराव प्रथम के रहमोकरम पर जीने को मजबूर हो गए थे.

मस्तानी के प्रेम में व्याकुल रहे बाजीराव इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने प्रेम को पवित्र रखा, उसे कभी वासना में नहीं डूबने दिया. वह ऐसा दौर था, जब ज्यादातर राजा, नवाब, रासरंग में डूब कर रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहते थे, लेकिन बाजीराव के लिए उन की प्रेमिका मस्तानी कभी भी उन की कमजोरी नहीं बनीं, बल्कि उन के अदम्य साहस, पराक्रम में पलपल की हमसफर और प्रेरणास्रोत रहीं.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी जानने से पहले हमें उन के बारे में जान लेना चाहिए. बाजीराव प्रथम चितपावन ब्राह्मण कुल के पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वंश परंपरा की उपलब्धियों में चार चांद लगा दिए थे. सन 1707 के बाद छत्रपति मराठा सम्राट की हैसियत दिनोंदिन गिरती जा रही थी. तभी अष्टप्रधान मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पेशवा सत्ता के सिरमौर बन गए. शिवाजी ने जिस मराठा स्वराज की नींव रखी थी, उन के बाद उन के उत्तराधिकारी उतने योग्य साबित नहीं हो सके. जबकि पेशवाओं ने इन कमियों को अपनी काबिलियत बना लिया था.

बालाजी विश्वनाथ ने जो सपना देखा था, उसे उन के योग्य पुत्र बाजीराव ने तूफान की गति से पूरा कर दिखाया. जब मुगल सत्ता पतन पर थी, तभी सन 1720 में बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उस समय की स्थिति को देखसमझ कर उन्होंने घोषणा कर दी कि मुगल वृक्ष अब पतन की ओर है, इस की शाखाओं को काटने के बजाय इस की जड़ों पर प्रहार कर के पूरे वृक्ष को ही उखाड़ फेंका जाए तो बेहतर होगा.

इस के बाद मराठा जांबाज सेनापतियों की सैनिक टुकडि़यों ने पूरे उत्तर भारत को रौंदना शुरू कर दिया. मराठा सैनिकों के घोड़ों के टापों से सुदूर उत्तर भारत की रियासतें धूल के गुबार से ढकती चली गईं. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला, हैदराबाद के पहले निजाम चिन किलीज खां, और अवध के नवाब ने बाजीराव की फौज को दिल्ली की ओर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. बात तब की है जब उत्तर भारत, खासकर मुगल दरबार, जो उस समय के कमजोर शासक की करतूतों से षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, की कमजोरी का फायदा उठा कर मुगल सेनापति अन्य रियासतों पर कब्जा करने के मंसूबे पाल रहे थे.

बाजीराव की प्रेमिका मस्तानी को ले कर इतिहास में तरहतरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि मस्तानी छत्रसाल की फारसी बेगम की बेटी थी. कुछ लोग उसे हैदराबाद के नवाब की दरबारी नर्तकी भी मानते हैं. मस्तानी उत्तर मध्यकाल की बहुत ही खूबसूरत शख्सियत थी, जिस की मिसाल कहीं नहीं थी. मस्तानी अपने अद्वितीय सौंदर्य, संगीत और नृत्यकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी तीरंदाजी, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणकौशल के लिए भी इतिहास में अमर है. बाजीराव के साथ उस ने तमाम युद्ध अभियानों में अपना पराक्रम दिखाया. युद्ध के मैदान में उस का साहस, वीरता और कौशल बाजीराव जैसा ही था, जो खुद असंभव रणनीति बना कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में माहिर था.

जाहिर है ऐसी काबिलियत की धनी मस्तानी बाजीराव के दिलोदिमाग में छा गई होगी. पहले परिचय के साथ ही प्रेम की जो कहानी शुरू हुई, वह मरते दम तक जरा भी मंद नहीं पड़ी. दोनों जैसे एकदूसरे को पा कर धन्य हो गए थे. बाजीराव का जीवन युद्धों में बीत रहा था. लेकिन मस्तानी ने महिला हो कर भी उन नाजुक घडि़यों में हमेशा बाजीराव का साथ दिया था. इस प्रेमकथा एक सच यह भी है कि बाजीराव का साथ निभाने के लिए मस्तानी को बहुत कष्ट उठाने पड़े थे.

प्यार अगर सच्चा हो तो उस में कष्ट कोई मायने नहीं रखते. कुछ ऐसी ही बातें बाजीराव और मस्तानी के प्रेम में नजर आती हैं. बारूदों की गंध, तलवारों की टंकारों और खून से लथपथ युद्ध के मैदानों में भी प्रेम की सुकोमल भावनाओं की उपस्थिति सचमुच बहुत विलक्षण लगती है. शायद ऐसे माहौल में भी बाजीराव और मस्तानी कुछ पल निकाल कर एकदूसरे को प्रेमिल सहारा देते थे. मस्तानी ने बाजीराव के सपनों में बाधा खड़ी करने के बजाय मराठा साम्राज्य के चमत्कारिक प्रसार में योगदान किया था. लेकिन 18वीं सदी का रूढि़वादी समाज और शाही सोच प्रेम की भावनाओं को समझने में कतई समर्थ नहीं रहे. इसीलिए उन के रास्तों में लोगों, खासकर करीबी लोगों ने अनगिनत बाधाएं खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

मस्तानी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि वह गुजरात के मुगल सूबेदार शुजाअत खां की दरबारी नर्तकी थी. 1724 में जब चिमनाजी अप्पा ने गुजरात पर हमला किया तो वह शुजाअत खां को मार कर मस्तानी को लूट लाया. बाद में मस्तानी को उस ने पेशवा बाजीराव की सेवा में सौंप दिया. गुजराती लोक गीतों में उसे अफगानी गुर्जर नर्तक जाति की माना जाता है. उसे ‘भवन कांचरी’ नृत्यांगना भी कहा जाता है. यहीं से वह छत्रसाल की रक्षा के लिए बाजीराव के साथ बुंदेलखंड गई. जैतपुर के युद्ध में उस के अदम्य साहस से खुश हो कर छत्रसाल ने उसे अपनी बेटी बना लिया था.

दूसरी मान्यता यह है कि मस्तानी राजपूत राजा छत्रसाल की ईरानी बेगम की बेटी थी. बचपन से ही उस ने नृत्य संगीत और शाही जिंदगी के हर रंग और अच्छेबुरे पहलुओं को जिया और सहा. सन 1728 में जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला कर के छत्रसाल के बेटे जगतराज को बंदी बना लिया. इस स्थिति में बुजुर्ग राजपूत शासक ने मुहम्मद खां बंगश के सामने घुटने टेकने के बजाय उसे सबक सिखाने के लिए पेशवा बाजीराव प्रथम को सहायता प्रस्ताव भेजा.

बाजीराव तुरंत अपनी सेना सहित छत्रसाल की मदद के लिए आए और जैतपुर के युद्ध में उन्होंने मुहम्मद खां बंगश को बुरी तरह हरा दिया. इसी युद्ध में पहली बार बाजीराव ने मस्तानी को लड़ते देखा था, उसी समय वह उस के रूपसौंदर्य के साथसाथ उस के हुनर और काबिलियत पर फिदा हो गए थे. पहली नजर का यह प्यार आजीवन चला. छत्रसाल ने झांसी, ओरछा, बांदा की जागीर के साथसाथ बाजीराव के शादी के प्रस्ताव पर अपनी बेटी का हाथ भी उन्हें थमा दिया.

बाजीराव और मस्तानी एकदूसरे पर मर मिटे थे. बाजीराव उसे अपने साथ पूना ले आए, लेकिन मजहब की दीवारों और षड्यंत्रोंकुचक्रों ने उन का जीना मुहाल कर दिया. दोनों का अटूट प्रेम किसी से बरदाश्त नहीं हुआ. सन 1739 में नाना साहेब, चिमना जी अप्पा, राधा देवी और काशीबाई के षड्यंत्र सफल हुए. परिणामस्वरूप पेशवा को युद्ध अभियान में अकेले पूना से बाहर जाना पड़ा. उन की अनुपस्थिति में इन लोगों ने मस्तानी को पूना के पार्वती बाग में कैद कर लिया. बाजीराव इस खबर से भले ही टूट गए, लेकिन मस्तानी ने हिम्मत नहीं हारी.

किसी तरह आजाद हो कर मस्तानी पटास पहुंची. बाजीराव उसे सामने देख कर बहुत खुश हुए. लेकिन यह अंतिम मिलन ज्यादा देर तक नहीं चल सका. मस्तानी के पीछेपीछे पेशवा की मां राधा देवी और पटरानी काशी बाई भी पटास पहुंच गए और बाजीराव प्रथम पर दबाव डालना शुरू किया. एक तरफ मां की डांटफटकार और मराठा साम्राज्य की सौगंध दिलाई जा रही थी तो दूसरी तरफ काशीबाई के अविरल आंसू बाजीराव को धर्मसंकट में डाल रहे थे. भारी मन से बाजीराव ने मस्तानी को खुद से दूर कर के पूना भेज दिया. इस बिछोह का बाजीराव पर गहरा असर पड़ा.

एक ओर युद्ध उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे, दूसरी ओर परिवार के लोग जिंदगी के खालीपन को बढ़ाने पर आमादा थे. जिन की वजह से बाजीराव को अपनी रूहानी प्रेरणा और ताकत मस्तानी को खुद से अलग करना पड़ा. बाजीराव मस्तानी की प्रेमकहानी ने भारतीय राजनीति को बहुत ही प्रभावित किया है लेकिन दुख की बात यह है कि यह प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर खो गई. मस्तानी नफरत की शिकार होती चली गई. पावल में बनी उस की खंडहरनुमा कब्र को देख कर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यहां वह शख्सियत चिर निद्रा में दफन है, जिस की जिंदगी ने हिंदुस्तान के इतिहास की दशा और दिशा को बदल कर रख दिया था.

बाजीराव की मां राधा देवी, पत्नी काशीबाई, भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र अंजाने में इस प्रेम के दुश्मन बन बैठे थे. सच्चा प्यार कभी आसान नहीं होता, इसलिए बाजीराव और मस्तानी ने इस चुनौती को हंसतेहंसते स्वीकार किया था. सभी जानते हैं कि बाजीराव, मस्तानी को बुंदेलखंड से पूना ले आए थे. उस समय पेशवा पूना से और छत्रपति सतारा से अपना काम संभालते थे.

चूंकि मस्तानी की मां छत्रसाल की फारसी मुसलिम बेगम थीं, इसलिए मस्तानी को मराठा समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया. स्वयं बाजीराव का कट्टर ब्राह्मण समाज इस विवाह को मान्यता देने को तैयार नहीं था. बाजीराव के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी. एक ओर घरसमाज का विरोध था, दूसरी ओर मराठा साम्राज्य की पूरी जिम्मेदारी. वह चक्की के 2 पाटों के बीच फंस कर तड़पते रहे. एक तरफ मस्तानी का अनन्य प्रेम था, तो दूसरी ओर मराठा साम्राज्य के सपने थे, जिन्हें पूरा करना उन की सब से बड़ी प्राथमिकता थी. सन 1734 ई में उन्होंने मस्तानी के लिए अलग महल बनवाया. जहां उन्होंने इबादत के लिए मसजिद भी बनवाई थी. यह आज भी देखी जा सकती है.

बाजीराव ने मस्तानी से विवाह कर के उसे ब्याहता पत्नी का सम्मान दिया था. पटरानी चूंकि काशीबाई थी, इसलिए वह अपने ईर्ष्यालु स्वभाव की वजह से बाजीराव के कंधे से कंधा मिला कर साथ नहीं दे पाईं. उस समय समाज को पूरी तरह से दरकिनार करना पेशवा बाजीराव जैसे शक्तिशाली पुरुष के लिए भी संभव नहीं था. अप्रैल 1740 में बाजीराव जब अपने 1 लाख सैनिकों के साथ युद्ध के लिए दिल्ली आ रहे थे तो उन की सेना ने इंदौर के पास खरगोन में पड़ाव डाला. वहीं पर बाजीराव को तेज बुखार आया, जिस की वजह से उन की मृत्यु हो गई. वहीं पर नर्मदा नदी के किनारे उन का अंतिम संस्कार किया गया. बाद में सिंधिया ने वहां उन की याद में छतरी बनवाई.

मातापिता की मौत के बाद शमशेर बहादुर की परवरिश उस की सौतेली मां काशीबाई ने की थी. शमशेर बहादुर ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में अपनी वीरता का परिचय भी दिया था. सिर्फ 39 साल की आयु में बाजीराव ने जीवन के सब रंग देख लिए थे. एक तरफ पेशवा के रूप में उन्होंने आकाश की बुलंदियों को छुआ तो दूसरी ओर पारिवारिक अंतर्कलह ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था.

बाजीराव की मौत की खबर को मस्तानी सहन नहीं कर सकी और फिर जल्दी ही उस की भी जीवनलीला समाप्त हो गई. कहा जाता है कि इस दुखद खबर से व्यथित हो कर उस ने हीरा निगल लिया था, जिस से उस की मृत्यु हो गई थी. कुछ इतिहासकार उस की मौत की वजह विषपान मानते हैं. पूना से 65 किलोमीटर दूर पावल में मस्तानी की कब्र आज भी देखी जा सकती है.

इस प्रेम कहानी का दुखद अंत यह साबित करता है कि समाज चाहे कितना भी विकसित हो जाए, लेकिन सोच अथवा नजरिए को बदलने का संघर्ष सभी को करना पड़ता है. योग्यता भी अक्सर दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक देती है. बाजीराव चाहते तो अन्य योद्धाओं की तरह भोगविलास का जीवन व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को सम्मान देने की कोशिश की और मरते दम तक इसी संघर्ष में बहादुरी से जूझते रहे.

यह भी दुख की ही बात है कि मस्तानी का चरित्र चित्रण अधूरा है. इतिहास में बहुत कम लोगों ने उस के बारे में लिखा है. उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज शायद इस घटना को मराठा गौरव के विपरीत मान कर इसे दबाने के लिए मौन रहे, लेकिन इश्क और मुश्क कब छिपे हैं? एक न एक दिन दुनिया उन की हकीकत से रूबरू हो ही जाती है. इसीलिए इतिहास में इन गुम पात्रों को फिल्मी रूपहले परदे पर साकार करने की कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन इस में इतिहास को किस तरह पेश किया जाता है यह अलग विषय है.

यहां काशीबाई के चरित्र की चर्चा किए बगैर यह कहानी अधूरी रहेगी. देखने में तो काशीबाई घोर स्वार्थी और षड्यंत्रकारी लगती थी, लेकिन इस में उस का क्या दोष था? वह बाजीराव की पटरानी थी. पति पर उस का हक था. वह अपने पति के प्रेम को पाने के लिए हमेशा तरसती रही. काशीबाई जिस हक की हकदार थी, वह उसे कभी नहीं मिला.

इसीलिए उस ने जो कुछ भी किया, वह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल ही था. काशीबाई में मानवीय चरित्र की अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि उस ने भी बाजीराव को दिल की गहराइयों से चाहा था. लेकिन उस की चाहत की कभी कद्र नहीं हुई. बाजीराव और मस्तानी नायकनायिका बन गए, जबकि काशीबाई खलनायिका बन कर इतिहास के अंधेरों में खो गई. Hindi Stories

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...