Emotional Crime Story: जिंदगी में अच्छे लोग भी मिलते हैं और बुरे भी. जिस लड़की ने अपनी हरकतों से मेरी नींद हराम कर दी थी, वह रिया निकलेगी, मैं ने सोचा भी नहीं था. लेकिन रिया के साथ जो हुआ था, उस ने ही कहां सोचा होगा. बहरहाल, हम मिले तो अच्छाई और बुराई दोनों सामने आ गई.  ट्रेन फुल स्पीड में दौड़ रही थी. बाहर हलकीहलकी बूंदाबांदी हो रही थी. मैं खिड़की के पास ही बैठा था. कुछ देर तक तो रिमझिम फुहार अच्छी लगी,

पर जब पानी की बूंदें मेरी सीट पर गिरने लगीं तो मैं ने शीशा गिरा दिया. लोगों को मुझ से शिकायत रही है कि मुझे बोलना नहीं आता. ठीक ही कहते थे लोग. मैं 4 घंटे से चुपचाप बैठा था. आसपास बैठे यात्री आपस में बातें कर रहे थे. मैं या तो अपनी डायरी उलटपलट कर देखता था या फिर बीचबीच में न्यूजपेपर पढ़ लेता था. मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला बैठी थी. मैं ने उस की साड़ी से ही समझ लिया था कि कोई महिला या लड़की है, अभी तक उस की शक्ल नहीं देखी थी. बात करने का तो सवाल ही नहीं था. जबकि वह सब से घुलमिल कर बातें कर रही थी.

इसी बीच वह उठ कर मेरी खिड़की के पास आ कर बोली कि थोड़ी सी खिड़की खोल देती हूं, घुटन सी महसूस हो रही है. मैं अपनी डायरी में कुछ लिखने की सोच रहा था, सो बिना सिर उठाए या उस की तरफ देखे मैं ने हूं कह दिया. खिड़की खोल कर वह अपनी सीट पर जा बैठी. थोड़ी देर में चाय वाला आया तो उस ने अपने लिए चाय ली और औपचारिकतावश आसपास के यात्रियों से भी चाय के लिए पूछा, मुझ से भी. मैं ने बिना उस की ओर देखे ना कह दिया.

खैर, उस ने 3 या 4 कप चाय ली. कितनी, मुझे ठीक से पता नहीं, पर सब के पैसे उसी ने दिए. मैं ने कनखियों से उसे पैसे देते देखा था. इस बीच मैं बाथरूम गया. लेकिन जब लौटा तो वह लड़की सीट पर नहीं थी. मैं यह तो बताना ही भूल गया कि मैं कोलकाता से पटना जा रहा था. जब तक मैं बाथरूम से निकल कर अपनी सीट पर आता, ट्रेन आसनसोल पर खड़ी थी और वह लड़की वहीं उतर गई थी.

थोड़ी देर में ट्रेन चली तो फिर मैं फिर से अपनी डायरी उठा कर पढ़ने लगा. उस में एक परची रखी थी. मैं ने पढ़ना शुरू किया तो दिमाग के तवे पर वैसे ही एक जोरदार छींटा सा लगा, जैसे डोसा बनाने वाले गरम तवे पर पानी के छींटे मारते वक्त होता है. उस पर लिखा था, ‘गिड्डू, तू घोंचू ही रहा. डायरी में जिंदगी को कैद करता है, इस से बाहर निकल कर जिंदगी जीना सीख ले.’

मेरी समझ में नहीं आया कि वह लड़की कौन हो सकती है. गिड्डू विशेषण मुझे हाईस्कूल में मिला था और घोंचू कालेज में. हालांकि दोनों में किसी का सही अर्थ आज तक मुझे खुद नहीं मालूम. पटना में स्कूल के कुछ दोस्तों ने मुझे बताया था कि नाटे को गिड्डू कहते हैं, हालांकि मैं उतना छोटा भी नहीं था. मैं ने उस के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई टाटा से की थी. इस का मतलब वह लड़की मेरे साथ स्कूल और कालेज दोनों में रही थी. मेरे बगल में बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि क्या मैं उस लड़की को जानता हूं तो मैं ने सिर हिला कर ना कहा. पर वह बोला कि वह तो बारबार आप की ओर देख कर मुसकरा रही थी, लेकिन आप ने एक बार भी उस की ओर नहीं देखा. न ही उस की चाय ली थी. मैं क्या कहता, इसलिए चुप रह गया.

खैर, मैं अपने घर पटना आ गया. मैं कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी जौइन करने के बाद कुछ दिनों के लिए पटना आया था. कोलकाता में फ्लैट लेने के बाद मुझे अपना बाकी सामान कोलकाता शिफ्ट करना था. पर मेरे जेहन में वह लड़की बैठी थी, कौन हो सकती थी वह? मैं ने ट्रेन में उस से बात तो नहीं की थी, अलबत्ता उसे बातें करते जरूर सुना था. इस बीच मेरे सेल पर 3 बार फोन आया और मेरे हैलो कहने पर उधर से भी एक लेडी हैलो बोलती थी, फिर फोन कट जाता था.

एक बार मैं ने हिम्मत कर के उस नंबर पर डायल किया तो उधर से आवाज आई, ‘‘गिड्डू, सौरी दीपक! मुझे फोन करने की हिम्मत कैसे कर ली? खैर, फोन किया है तो बताओ, तुम कोलकाता कब और किस ट्रेन से लौट रहे हो?’’ बिना कोई बात किए इस बार मैं ने फोन काट दिया. एक बार जब मैं घर पर नहीं था तो घर की लैंडलाइन पर फोन आया था. पिताजी ने फोन उठाया तो उस लड़की ने बताया, ‘‘अंकल, मैं दीपक के औफिस से बोल रही हूं. औफिस में कुछ अरजेंट काम है. आप बता सकते हैं वह कब आ रहे हैं?’’

अब तक मेरा नाम आप भी जान गए होंगे. जी हां, सही पकड़ा आप ने, मेरा नाम दीपक ही है. पिताजी ने तो मेरे बारे में बता दिया था, पर लड़की का नाम नहीं पूछा था. वह लड़की मेरे लिए पहेली बनती जा रही थी. बहरहाल, चौथे दिन मैं कोलकाता लौट आया था. मैं ने अपना सामान ट्रांसपोर्ट से बुक करा दिया था. मैं जब औफिस में पहुंचा तो थोड़ी देर बाद मेरे सेल पर फोन आया. उसी लड़की की आवाज थी.

‘‘क्यों, औफिस पहुंच गया?’’ और फोन कट गया. अब मुझे गुस्सा आने लगा था. मैं ने ठान लिया था कि इस लड़की तक किसी भी कीमत पर पहुंच कर रहूंगा. इसी उलझन में मुझे नींद भी नहीं आ रही थी कि एक बार फिर लड़की ने फोन कर के कहा, ‘‘क्यों, नींद नहीं आ रही है न?’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया था.

हर शुक्रवार को कंपनी के मैनेजिंग डाइरेक्टर मीटिंग ले कर सप्ताह भर में हुए काम या उन में आने वाली कठिनाइयों की समीक्षा करते थे. उस मीटिंग में सभी इंजीनियर्स को जाना पड़ता था. इस बार की मीटिंग में मुझे थोड़ी डांट पड़ी थी, क्योंकि मेरे काम की प्रगति संतोषजनक नहीं थी. उसी दिन रात में उस लड़की ने फोन किया, ‘‘क्यों, मीटिंग में तैयारी कर के क्यों नहीं आते हो? कभीकभी मैनेजमेंट को ओवर रिपोर्टिंग कर के बचना सीखो. और हां, जो कमी रह गई है, अगले हफ्ते पूरी करो. अब ज्यादा तंग नहीं करूंगी. मेरा कोटा पूरा हो गया. जितना तुम ने तंग किया, उस का बदला ले लिया है.’’

‘‘जहां तक मुझे याद है मैं ने किसी को तंग नहीं किया, पर मेरा फोन नंबर तुम्हें कहां से मिला?’’ मैं ने कहा. संयोग से इस बार उस ने फोन काटा नहीं.

कुछ पल की खामोशी के बाद उस ने कहा, ‘‘फोन नंबर तो तुम्हारी डायरी में ट्रेन में ही मिल गया था. और हां, तुझे बोलना ही कहां आता था, जो मुझे तंग करता? अच्छा मैं ही बोलती हूं. कल दोपहर पार्कस्ट्रीट में ब्लू फौक्स में आ जाना, बोका कहीं का.’’ और फोन कट गया. अगले दिन शनिवार था. छुट्टी का दिन. इस आखिरी शब्द ‘बोका’ पर मेरा माथा ठनका. यह शब्द तो बंगाली बोलते हैं. एक तरह से यह उन का तकियाकलाम होता है. इस का मतलब यह लड़की बंगालिन है और मेरी ही कंपनी में है. हो सकता है, एमडी सचिवालय में ही हो. उस की बातों की टोन बंगाली थी. जबकि मेरे सेक्शन में एक भी बंगाली लड़की नहीं थी. एक रिया नाम की बंगाली लड़की दूसरे सेक्शन में थी.

पटना में हम लोग किराए के एक मकान में रहते थे. रिया भी पास वाले मकान में ही रहती थी. उस के पिता रेलवे में थे और उन की पोस्टिंग पटना में थी. हम दोनों की छत के बीच बस एक 3 फुट की रेलिंग थी. गरमियों में बहुत बार देर रात तक दोनों का परिवार छत पर ही रहता था. कभी सिर्फ हम दोनों ही रहते थे. वह बहुत चुलबुली और खुराफाती थी. कभी अकेले छत पर होता तो कमेंट्स करती थी. कभी होली में रंग फेंकती थी. एक बार जब छत पर अकेला था, उस ने एक पर्ची भी फेंकी थी, लिखा था ‘ना समझे वो अनाड़ी है.’ दूसरे दिन पर्ची पर लिखा था, ‘तेरी बनियान में 2 छेद हैं.’ मेरे कपडे़ छत पर सूखते वक्त देखा होगा उस ने.

एक बार तो लिखा, ‘लव यू बेबी’. पर मेरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी. 11वीं कक्षा के बाद उस के पिता का आसनसोल ट्रांसफर हो गया था. इस के अतिरिक्त मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानता था. उस का चेहरा भी मुझे याद नहीं था. यह तो स्कूल की बात हुई. मैं सोचने लगा, कालेज में मुझे जो घोंचू विशेषण मिला, उस की जानकारी इस लड़की को कैसे मिली? फिर सोचा कल तो मिल ही रहे हैं, फिर माथापच्ची क्या करना. शनिवार को ठीक 12 बजे मैं ब्लू फौक्स के सामने खड़ा था. तभी टैक्सी से एक लड़की उतर कर मेरी ओर आई और उस ने पास आ कर कहा, ‘‘हाय, मैं रिया. मैं जानती हूं, तुम मेरा ही इंतजार कर रहे हो. चलो, अंदर बैठ कर बातें करते हैं. मैं ने एक टेबल बुक कर रखी है.’’

रिया ने एक एकांत कोने में टेबल बुक करा रखी थी. अब पहली बार मैं ने उस के चेहरे को देखा. मुझे धूमिल सा रिया का चेहरा याद आया. पर अब वह मैच्योर्ड और सुंदर लग रही थी. मैं ने कहा कि अब मैं अपना इंट्रोडक्शन दूं तो उस ने बीच में ही टोका, ‘‘नो मिस्टर दीपक.’’

मैं मुसकरा कर रह गया. वेटर और्डर लेने आया तो उस ने पहले कोल्डड्रिंक लाने को कहा, साथ में लंच भी और्डर कर दिया.

फिर रिया ने कहा, ‘‘शुरू तो मुझे ही करना होगा, तुम से तो हो नहीं सकेगा. तुम सोच रहे होगे, तुम तक मैं पहुंची कैसे?’’

मेरे हां कहने पर उस ने कहा, ‘‘बता चुकी हूं कि ट्रेन में तुम्हारी डायरी से तुम्हारा नंबर मिला था. मैं ने भी इसी कंपनी में एमडी सचिवालय में तकनीकी सहायक के पद पर हाल ही में जौइन किया है. वीकली मीटिंग में भाग लेने वालों में तुम्हारा नाम देखा था. इस तरह तुम तक आसानी से पहुंच गई.’’

तब तक वेटर कोल्डड्रिंक दे गया. हम दोनों ने साथसाथ कोल्डड्रिंक की सिप ली. इस बार मैं बोला, ‘‘तुम्हें मेरे स्कूल और कालेज के विशेषण कहां मिले? तुम तो मेरे सेक्शन में नहीं थी और न ही कालेज में?’’

‘‘घोंचू! सौरी अब नो मोर. तुम्हारे सेक्शन की लड़कियां मेरी भी सहेली थीं. मैं ने भी टाटा से ही इंजीनियरिंग की है. पर पहले अटेंप्ट में कंपीट नहीं कर सकी थी, पर दूसरे साल कंपीट कर गई थी और तुम से एक साल जूनियर हो गई. पर मैं आंखकान दोनों खुले रखती हूं.’’

इस बार मैं खुल कर हंसा. मैं ने पूछा कि मैं ने तो कभी तुम्हें तंग नहीं किया, तुम कैसे कहती हो कि मुझ से बदला ले रही हो. वह हंस कर बोली, ‘‘खाना आ चुका है. शुरू करो, साथ में बातें भी होती रहेंगी.’’ और हम ने खाना शुरू कर दिया.

रिया बोली, ‘‘यही तो शिकायत है तुम से. मैं तो चाहती थी कि तुम मुझे बारबार देखते और छेड़ते. जवाब में मैं भी तुम्हें छेड़ती. इस तरह हम करीब आ सकते थे. पर मैं तुम्हारा मौनव्रत नहीं तुड़वा सकी थी. पहल मैं ने ही की थी, पर तुम उदासीन रहे थे. जहां तक मुझे याद है, तुम ने एक बार भी मेरी तरफ ठीक से नहीं देखा होगा. मुझे लगा, तुम मुझे इग्नोर कर रहे हो. दूसरे लड़कों की तरह मुझे देख कर तुम ने न कभी आंख मारी, न सीटी बजाई. तुम्हारी इसी अदा पर मैं फिदा थी. तब मैं ने सोचा कि तुम्हें मैं ही ठीक करूंगी, पर तब तक पिताजी का ट्रांसफर हो गया था. अब जा कर आखिर पकड़े ही गए.’’

और वह इतना जोर से हंसी कि पास की टेबल पर बैठे लोग हमारी ओर देखने लगे थे. बाद में सौरी बोल कर वह झेंप गई थी. पता नहीं क्यों अब मेरा मन भी रिया के पास आने का करने लगा था. हमारा खानापीना खत्म हुआ, वेटर बिल ले आया. जब मैं ने जेब से पर्स निकाला तो रिया बोली, ‘‘नो..नो, मैं ने तुम्हें यहां बुलाया है तो बिल भी मैं ही दूंगी.’’

होटल से बाहर आ कर उस ने टैक्सी बुलाई तो मैं ने कहा, ‘‘चलो, कुछ देर विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क में बैठते हैं.’’

‘‘ये कौन बोला, चलो अच्छा हुआ, डायरी के पन्नों से बाहर निकल आए.’’ कह कर उस ने मेरा मजाक उड़ाया. खैर, हम विक्टोरिया मेमोरियल के पार्क के एक वीरान कोने में जा बैठे. जब रिया ने पूछा कि बीवीबच्चे यहीं हैं कि पटना में तो मैं ने कहा कि अभी तो बैचलर ही हूं. फिर मैं ने पलट कर पूछा, ‘‘तुम ने शादी की?’’

रिया ने कहा, ‘‘नहीं, पर करीब एक साल तक जिस के साथ लिवइन में रही, उस से ब्रेकअप हो गया है. यही कोई एक सवा महीने पहले.’’

मैं कुछ देर खामोश रहा और सोचने लगा कि यह लड़की किस चीज की बनी है. इतना कुछ होने पर भी जिंदगी को खुशीखुशी जिए जा रही है. मैं ने महसूस किया कि रिया खामोश थी. इस के आगे मुझे उस के निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ. मैं ने उस से कहा कि मेरा कोलकाता का मशहूर बोटैनिकल गार्डन देखने का मन है तो उस ने खामोशी तोड़ते हुए कहा, ‘‘नो प्रौब्लम, कल संडे है. पूरा दिन हम जहां चाहें घूम सकते हैं. कल सुबह नाश्ता कर के 10 बजे यहीं मिलते हैं. मैं सैंडविच और कौफी बना कर साथ ले आऊंगी. वहीं गार्डन में लंच करेंगे, कैसा रहेगा?’’

‘‘परफेक्ट. तुम ने तो मेरे मन की बात कह डाली.’’ मैं ने कहा. इस के बाद मैं अपने फ्लैट पर आ गया. ब्रेकअप के बाद रिया अपनी ही कंपनी की एक लड़की के साथ फ्लैट शेयर करती थी. संडे को हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में गंगा के किनारे जा बैठे. मैं ने रिया से परिवार के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि परिवार में बस पिताजी हैं. मां का देहांत हो चुका है. जब उस ने मेरे बारे में पूछा तो मैं ने भी बता दिया कि मां ही है, जो मेरे साथ कोलकाता में रहेगी.

इस के बाद मैं ने ही उस से पूछा कि क्या ब्रेकअप पर पुनर्विचार की संभावना नहीं है. उस ने थोड़ा मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम्हें बोलना आ गया है.’’ और आगे भी उसी ने कहा, ‘‘मुझे कायर और धोखेबाज आदमी से सख्त नफरत है. उस से तो बेहतर है, मैं अकेली ही जी लूंगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘अकेले का सवाल क्यों? हो सकता है उस से बेहतर साथी मिल जाए. बुरा न मानो तो क्या मुझे बता सकती हो वह कौन है? मैं उस से मिल कर फिर से सब ठीक करने का प्रयास कर सकता हूं.’’

रिया ने मुझे ऐसा करने से मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं तो खुली किताब हूं. मुझे तुम्हें बताने में कोई संकोच नहीं है.’’

उस ने बताया कि कंपनी ने उसे 6 महीने की ट्रेनिंग के लिए जर्मनी भेजा था. उसी बैच में मैनेजिंग डाइरेक्टर का बेटा रवि भी गया था. वहीं उस से दोस्ती भी हुई. भारत लौटने पर दोनों की पोस्टिंग नासिक में थी. वहां दोस्ती प्यार में बदल गई और उस के साथ रहने लगी थी. उस ने भरोसा दिलाया था कि जल्द ही दोनों शादी कर लेंगे. इसी बीच रिया को गर्भ रह गया था. रवि ने उस से कहा कि वह शादी बाद में कर लेगा, पर उसे गर्भपात कराना होगा. लेकिन रिया को यह मंजूर नहीं था. यह बात एमडी साहब तक पहुंची तो आननफानन में पिछले माह रिया का ट्रांसफर कोलकाता ब्रांच में कर दिया गया.

रिया ने बताया कि कोलकाता में उसे डायरेक्टर ने अपने सेक्रेटरिएट में रखा था. उसे बुला कर काफी डांटा भी था. कहा था कि वैसे भी किसी दूसरे प्रांत और जाति की लड़की उन की बहू नहीं बन सकती. रिया ने भी दो टूक कह दिया था कि उसे रवि जैसे कायर की जरूरत नहीं है. जब हम दोनों बोटैनिकल गार्डन में बैठे थे, तभी एमडी का पर्सनल सेक्रेटरी भी घूमता हुआ हमारे पास आ गया था. वह 2 मिनट इधरउधर की बातें कर के चला गया था. उस ने बौस को हम दोनों के बारे में बता दिया था. उन्होंने मुझे और रिया को एक साथ अपने चैंबर में बुलाया. उन्हें शायद गलतफहमी थी कि हम दोनों प्यार करते हैं.

वैसे अब मैं खुद उस से प्रभावित था और उसे चाहने लगा था. उन्होंने कहा कि अगर हम लोग शादी कर लें तो एकदो साल के लिए हमारी पोस्टिंग विदेश में करवा सकते हैं. रिया को यह बात बुरी लगी और वह बौस पर ही बरस पड़ी, ‘‘मैं समझ सकती हूं कि आप अपने बेटे की घिनौनी करतूत का ठीकरा दीपक के सिर फोड़ना चाहते हैं.’’

इतना सुन कर एमडी ने आगबबूला हो कर कहा, ‘‘मैं चाहूं तो तुम दोनों को नौकरी से निकाल सकता हूं.’’

इस बार न जाने मुझ में कहां से इतना साहस आ गया कि मैं बोला, ‘‘और अगर रिया चाहे तो आप और आप के बेटे दोनों को हवालात की हवा खिला सकती है. आप भूल जाएं कि आप बौस हैं तो जो जी में आए, कर सकते हैं. आप को इतनी सी समझ आ जाए तो आप का ही भला होगा.’’

रिया आश्चर्यचकित हो कर मेरी ओर देखे जा रही थी. मैं ने इशारे से उसे बाहर निकलने को कहा और हम दोनों बौस के औफिस से बाहर आ गए. रिया मुझे औफिस में ले गई. पहले तो उस ने पानी पीने को कहा, फिर 2 कप चाय और्डर की. फिर उस ने कहा, ‘‘तुम्हें बौस से उलझने की क्या जरूरत थी?’’

मैं ने कहा, ‘‘तो मैं उस खूसट को मनमानी करने देता? अब हमें बड़ा फैसला लेना होगा.’’

वह बोली, ‘‘हमें मतलब? मुझ से क्या चाहते हो?’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसी हालत में लड़कियों को मां की सख्त जरूरत होती है. मुझे पूरा यकीन है कि मेरी मां मेरा साथ अवश्य देगी. हम दोनों 15 दिन की नोटिस के साथ इस्तीफा दे देते हैं. इस बीच हम लोग छुट्टी पर रहेंगे. अगर तुम्हें आजीवन साथ पसंद हो तो सब ठीक हो जाएगा. जब मैं फोन करूं, मेरे फ्लैट पर आ जाना. मैं इस हाल में तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता. तुम्हें मुझ पर भरोसा है या नहीं?’’

‘‘पहले तो यह बता दूं कि मुझे तुम्हारा अचानक बदला रूप बहुत अच्छा लगा. पर सब कुछ जानते हुए भी तुम इस पचड़े में क्यों पड़ रहे हो?’’

मैं ने सिर्फ इतना कहा कि मेरी बात स्वीकार हो तो मेरे फोन करने पर मेरे फ्लैट पर आ जाना, तब तक मां भी आ जाएगी. और अपना त्यागपत्र दे कर मैं औफिस से निकल गया. घर आ कर मैं ने मां को फोन पर सारी बात बता कर कहा कि वह कल की गाड़ी से कोलकाता आ जाए. मां के आने पर मैं ने रिया को फोन कर के कल आने को कहा. अगले दिन सुबह रिया आई तो मैं ने उसे मां से मिलाया. मां ने मुझ से कहा कि मुझे थोड़ी देर अकेले में रिया से बात करने दो. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं. मैं ने देखा कि दोनों की आंखें गीली थीं.

मां ने उसे कल फिर आने को कहा और वह चली गई. मैं ने रिया से फोन पर पूछा कि मां से क्या बातें हुईं तो उस ने कहा, ‘‘पहले तो मेरे परिवार के बारे में बात की. फिर कहा तुम तो हमें पंसद हो, पर इस बच्चे के कारण थोड़ी उलझन में हूं. मैं ने कहा कि आप एक मां हैं, भला कोई मां अपनी कोख गिराना चाहेगी? मुझे तो एक मर्द ने धोखा दिया है. मैं चाहती भी नहीं थी कि दीपक इस झंझट में पड़े. हो सके तो आप ही उसे समझाइए. इस पर मां भी रो पड़ी थीं. पता नहीं कल क्यों बुलाया है?’’

रिया के जाने के बाद मां ने मुझ से भी पूछा, ‘‘सब कुछ जान कर तुम रिया को अपनाने को तैयार हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बाद में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.’’

मैं ने फिर फोन कर के मां की बात रिया को बताई और उस से पूछा कि उसे तो कोई प्रौब्लम नहीं है. इस पर वह बोली, ‘‘दीपक मेरे लिए तो विन विन सिचुएशन (चित भी मेरी पट भी मेरी) है. पर तुम मेरी खातिर क्यों नौकरी छोड़ रहे हो?’’

रिया ने बताया था कि उस ने भी रूममेट से अपना इस्तीफा भिजवा दिया है. मैं ने कहा कि 3-4 दिनों के अंदर ही मंदिर में हम शादी कर लेंगे और घर पर ही 15-20 दोस्तों के साथ पार्टी करेंगे. रिया मेरे कंधे पर सिर रख कर सिसकने लगी. मैं ने उसे थपथपाते हुए अलग किया तो बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा था कि सब मर्द एक से होते हैं, बल्कि मर्द को दर्द ही नहीं होता है.’’

मैं ने कहा, ‘‘मर्द को भी दर्द होता है.’’

और चौथे दिन हमारी शादी हो गई. उस के अगले दिन हम ने घर पर पार्टी दी. मेरे नहीं चाहने पर भी रिया ने बौस को निमंत्रित किया था. उस ने कहा कि वह बौस को अहसास दिलाना और शर्मिंदा करना चाहती है कि इस दुनिया में उन के बेटे जैसा शैतान भी है तो दीपक जैसा इंसान भी. वे आए भी और उन्होंने बेटे की करतूत के लिए हम लोगों से माफी भी मांगी. साथ ही कहा भी, ‘‘तुम दोनों का इस्तीफा नामंजूर हो गया है और हां, मेरी तरफ से यह उपहार है.’’

वे 2 लिफाफे थे. एक लिफाफे में ट्रैवल एजेंट के नाम का चैक था, ताकि वह हमारे स्विट्जरलैंड टूर का वीसा, टिकट व अन्य खर्चों की व्यवस्था हमारी सुविधानुसार कर सके. दूसरे लिफाफे में काफी महत्त्वपूर्ण पेपर थे, जिन में रवि और उस के मातापिता के हस्ताक्षर थे. लिखा था कि रिया के होने वाले बच्चे पर उन का भविष्य में कोई अधिकार नहीं होगा. जातेजाते बौस ने एक बार फिर माफी मांगी और कहा, ‘‘दीपक, तुम ने 2 बड़े काम किए हैं. एक तो दोनों परिवारों की इज्जत बचाई और दूसरे समाज के लिए एक असाधारण मिसाल पेश की. इसलिए तुम्हें इनाम तो मिलना ही चाहिए. तुम्हारा प्रमोशन और्डर भी मैं ने साइन कर दिया है. इसे अन्यथा नहीं लेना.’’

और बौस ने हम सब को बाय कह कर विदा ले ली. पर रिया सोच रही थी कि यह इनाम था या ब्लैकमेल. Emotional Crime Story

 

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