Delhi Robbery Case: देश की राजधानी के भीड़ भरे इलाके से हुई सवा करोड़ रुपए के गहनों की लूट ने दिल्ली पुलिस की नींद उड़ा दी थी. लेकिन पुलिस ने भी ऐसा सूत्र ढूंढ निकाला कि लुटेरों के पूरे गैंग को दबोच लिया, जिस ने और भी कई चौंकाने वाले राज उगले.

सुबह के 8 बजे के करीब पुलिस कंट्रोल रूम से उत्तरी दिल्ली के थाना सदर बाजार पुलिस को सूचना मिली कि कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने चाकू मार कर किसी का बैग छीन लिया है. सदर बाजार, खारी बावली और चावड़ी बाजार आसपास हैं. यहां रोजाना बड़ेबड़े व्यापारियों का आनाजाना लगा रहता है. लुटेरे व्यापारियों व अन्य लोगों को यहां अपना निशाना बनाते रहते हैं. यहां ज्यादातर घटनाएं लूट की ही होती हैं.

जिस समय ड्यूटी अफसर को यह सूचना मिली थी, उस समय थानाप्रभारी अनिल कुमार औफिस में ही थे. ड्यूटी अफसर ने लूट की इस घटना के बारे में थानाप्रभारी को बताया तो उन के दिमाग में तुरंत आया कि लुटेरों ने किसी व्यापारी को शिकार बना लिया है. वह तुरंत एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश और कुछ अन्य स्टाफ को ले कर घटनास्थल की ओर चल पड़े. घटनास्थल थाने से उत्तर दिशा में आधा किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 5 मिनट में वहां पहुंच गए. वहां कुछ लोग जमा थे और एक औटो खड़ा था. उस में 30-35 साल का एक आदमी बैठा था, जिस के  दाहिने पैर के घुटने के पास से खून बह रहा था.

औटो के पास एक आदमी खड़ा था, जिस की उम्र 40-42 साल रही होगी. वह बहुत घबराया हुआ था. पूछने पर उस ने अपना नाम भरतभाई बताया. उस ने बताया कि बदमाश उसी का गहनों से भरा बैग ले कर फरार हो गए हैं. गहनों की कीमत कितनी थी, उसे पता नहीं था. उस का कहना था कि लूट का विरोध करने पर एक बदमाश ने उस के साथी प्रवीण को चाकू मार कर घायल कर दिया था.

अनिल कुमार ने घायल प्रवीण को कांस्टेबल सतेंद्र के साथ हिंदूराव अस्पताल भिजवाया और खुद भरतभाई से पूछताछ करने लगे. इस पूछताछ में उस ने बताया कि वह अहमदाबाद में मेसर्स राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या के यहां नौकरी करता है. उन की फर्म अहमदाबाद से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद गहने भेजने का काम करती है. दिल्ली के कूचा घासीराम, चांदनी चौक में उन का एक औफिस है, जिसे अमितभाई संभालते हैं.

भरतभाई ने आगे जो बताया, उस के अनुसार, वह अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से गहनों का एक बैग ले कर दिल्ली के लिए चला था. यह ट्रेन अहमदाबाद से एक दिन पहले शाम 5 बजे चली थी और उस दिन पौने 8 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची थी. प्रवीण दिल्ली वाले औफिस में काम करता था. जब भी वह माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन पहुंचता था, वही उसे लेने रेलवे स्टेशन पर आता था. उस दिन भी प्रवीण उसे लेने स्टेशन पर आया था. वहां से उन दोनों ने चांदनी चौक जाने के लिए एक औटो किया और बैग ले कर उस में बैठ गए. जैसे ही उन का औटो यहां पहुंचा, तभी पीछे से पल्सर मोटरसाइकिल पर आए 3 लोगों ने उन का औटो रुकवा लिया.

औटो के रुकते ही मोटरसाइकिल से 2 लोग उतरे. उन में से एक ने भरतभाई पर पिस्तौल तान दी, दूसरा चाकू ले कर प्रवीण के पास खड़ा हो गया. तभी एक अपाचे मोटरसाइकिल और आ गई. उस पर भी 3 लोग सवार थे. उस मोटरसाइकिल से भी 2 लोग उतर कर उन के पास आ गए. तभी पिस्तौल वाले ने उस से गहनों से भरा बैग छीनने की कोशिश की. उस ने बैग नहीं छोड़ा तो चाकू वाले ने प्रवीण के पैर में चाकू मार दिया. इसी के साथ औटोचालक को 2 थप्पड़ मार दिए. थप्पड़ लगते ही औटोचालक भाग कर सड़क के उस पार जा कर खड़ा हो गया. उसी समय पिस्तौल वाले ने भरतभाई से बैग छीन कर अपाचे मोटरसाइकिल से आए लड़के को दे दिया. इस के बाद वे सभी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ तेजी से चले गए.

भरतभाई से पुलिस को यह तो पता नहीं चला कि लूटे गए बैग में कितनी कीमत के गहने थे, पर यह जरूर पता चल गया था कि लुटेरे गहनों से भरा जो बैग लूट कर ले गए थे, उस का वजन 5, साढ़े 5 किलोग्राम था और उस बैग में जीपीएस डिवाइस भी लगा था. जीपीएस डिवाइस की बात सुन कर अनिल कुमार को लगा कि उस के सहारे लुटेरों तक पहुंचा जा सकता है. गहनों के वजन के आधार पर पुलिस ने अंदाजा लगाया कि बैग में लाखों रुपए के गहने होंगे.

लूट का यह मामला बड़ा था, इसलिए अनिल कुमार ने घटनास्थल से ही पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दे दी. डीसीपी मधुर वर्मा ने जिले की मुख्य सड़कों पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग के आदेश समस्त थानाप्रभारियों को दिए और खुद भी घटनास्थल पर पहुंच गए. भरतभाई ने लूट की सूचना दिल्ली और अहमदाबाद के अपने औफिसों को दे दी थी. यह खबर सुन कर दिल्ली औफिस से अमितभाई घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने डीसीपी को बताया कि लूटे गए गहनों की कीमत एक करोड़ से अधिक थी. गहने वाले बैग में जो जीपीएस डिवाइस रखा था, पुलिस ने अमित से उस का नंबर ले लिया. वह डिवाइस वोडाफोन कंपनी का था.

दिनदहाड़े हुई इस लूट को सुलझाने के लिए मधुर वर्मा ने 2 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम थाना सदर के थानाप्रभारी सतीश मलिक के नेतृत्व में बनाई गई, जिस में इंसपेक्टर मनमोहन, कमलेश, एसआई संजय कुमार सिंह, प्रकाश, निसार अहमद, आशीष शर्मा, एएसआई सुरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल ए.के. वालिया, अवधेश कुमार, अशोक, जितेंद्र सिंह, कांस्टेबल अमित, सुरेश, बलराम, समंद्र आदि को शामिल किया गया.

दूसरी पुलिस टीम औपरेशन सेल के इंसपेक्टर धीरज कुमार के नेतृत्व में बनी, जिस में एसआई सुखवीर मलिक, देवेंद्र, यशपाल, प्रणव, आनंद, एएसआई सतीश मलिक, हैडकांस्टेबल योगेंद्र, राजेंद्र, कांस्टेबल प्रमोद, चंद्रपाल दिनेश को शामिल किया गया था. दोनों टीमों का निर्देशन के एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम कर रहे थे. दोनों टीमें एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम की देखरेख में केस की छानबीन में जुट गईं.

पुलिस टीम ने जांच की शुरुआत जीपीएस डिवाइस से की. पुलिस पता करने लगी कि बैग किस क्षेत्र में है. पुलिस ने फर्म के अहमदाबाद औफिस में अरविंदभाई से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि वह जल्द ही दिल्ली पहुंच कर पुलिस से संपर्क करेंगे. डिवाइस के कोड नंबर से पुलिस ने जांच की तो पता चला कि वह डिवाइस अहमदाबाद से निकलने के कुछ देर बाद ही बंद हो गया था. इस से पुलिस को निराशा हुई. गहने वाले बैग में जीपीएस डिवाइस रखी होने की जानकारी भरतभाई को भी थी, इसलिए पुलिस को शक हुआ कि कहीं उसी ने लूट के लिए डिवाइस को बंद नहीं कर दिया था. इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. प्रवीण का हिंदूराव अस्पताल में इलाज चल रहा था. वहां भी पुलिस का पहरा लगा दिया गया.

भरतभाई को हिरासत में लेने की बात अरविंदभाई को पता चली तो उन्हें हैरानी हुई कि पुलिस लुटेरों को पकड़ने के बजाय उन्हीं के कर्मचारी को परेशान कर रही है. उन्होंने पुलिस से भरतभाई के खिलाफ कोई काररवाई न करने की सिफारिश की. उन्होंने कहा कि भरत पिछले 6 महीने से उन की फर्म में काम कर रहा है. वह बहुत ही ईमानदार और वफादार है. वह उसे अच्छी तरह जानते हैं. इस तरह का काम वह हरगिज नहीं कर सकता. जीपीएस डिवाइस के बारे में उन्होंने बताया कि वह किसी वजह से अपने आप ही कभीकभी बंद हो जाती है.

फर्म मालिक के कहने पर पुलिस ने भरतभाई को छोड़ जरूर दिया, लेकिन उसे यह हिदायत दे दी थी कि जांच में जब भी उस की जरूरत पड़ेगी, वह हाजिर होगा. अब पुलिस टीमों ने दूसरी दिशा में जांच शुरू की. जिस तांगा स्टैंड के पास लूट की गई थी, वहां पर मार्केट एसोसिएशन की ओर से 3 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस को उम्मीद थी कि उन कैमरों में लुटेरों की फोटो जरूर कैद हो गई होगी. लेकिन पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज के लिए मार्केट एसोसिएशन से सपंर्क किया तो पता चला कि 31 दिसंबर की रात 8 बजे से किसी वजह से सीसीटीवी सिस्टम बंद हो गया था. पुलिस को यहां भी शक हुआ कि यह सिस्टम इस घटना से कुछ घंटे पहले ही क्यों बंद हुआ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि इस सिस्टम की देखरेख करने वाले की लुटेरों से कोई सांठगांठ रही हो? लुटेरों के कहने पर उस ने सिस्टम को बंद कर दिया हो. पुलिस टीम ने इस बिंदु पर भी जांच की. मार्केट एसोसिएशन की तरफ से जो व्यक्ति सीसीटीवी सिस्टम को देखता था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ की. उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स भी खंगाली, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस को जांच में जिस बिंदु पर सफलता की उम्मीद नजर आती, उस पर भी जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

जांच का अगला पड़ाव पुलिस ने काल डिटेल्स पर केंद्रित किया. पुलिस टीम ने पता किया कि घटना वाले दिन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तांगा स्टैंड तक सुबह 6 बजे से 9 बजे तक कौनकौन से फोन नंबर सक्रिय रहे. यानी उस रूट पर उस दौरान कितने लोगों की फोन पर बातें हुईं. मोबाइल फोन कंपनियों के सहयोग से पुलिस ने यह डाटा इकट्ठा किया. इस डाटा को डंप डाटा कहा जाता है. इस डाटा में कई हजार नंबर निकले. उन हजारों फोन नंबरों से संदिग्ध नंबरों को छांटना आसान नहीं था. यह जिम्मेदारी उत्तरी जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर हेडकांस्टेबल ए.के. वालिया को दी गई.

ए.के. वालिया को डंप डाटा खंगालने का एक्सपर्ट माना जाता है. उन्होंने उस डाटा से करीब 300 संदिग्ध नंबर निकाले. इस के अलावा पुलिस ने अरविंदभाई की फर्म में जितने भी कर्मचारी काम करते थे, उन सभी के फोन नंबर ले कर यह जानने की कोशिश की कि उन में से किसी की डंप डाटा के नंबरों से किसी पर उस समय बात नहीं हुई थी. लेकिन कर्मचारियों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला. उन हजारों फोन नंबरों में जो 3 सौ संदिग्ध नंबर निकाले गए थे, उन में से भी कोई ऐसा सूत्र नहीं मिला, जिस से लुटेरों तक पहुंचा जा सकता. यह जांच भी जहां से चली थी, वहीं ठहर गई.

भरतभाई ने पुलिस को बताया था कि बदमाश पल्सर और अपाचे मोटर- साइकिलों से आए थे. इन के बारे में पता करने के लिए पुलिस ने यह पता लगाया कि घटनास्थल से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच कहांकहां सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. पता चला कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर, स्टेशन के बाहर स्थित कई दुकानों पर और उसी रोड पर रास्ते में पड़ने वाले थाना नबी करीम के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं. लुटेरों ने घटना को अचानक अंजाम नहीं दिया होगा. इस से पहले उन्होंने इस रूट पर रेकी की होगी. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस ने सभी कैमरों की 15 दिन पुरानी फुटेज देखी.

फुटेज में घटना वाले दिन एक औटो के पीछे पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिल जाती दिखाई दी. उस दिन से एक दिन पहले भी वे दोनों मोटरसाइकिलें उसी रूट पर जाती दिखाई दीं, लेकिन फुटेज में उन के नंबर स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे. 4-5 दिन पहले तक दोनों मोटरसाइकिलें उस रूट में कई बार आतीजाती दिखीं. उन मोटरसाइकिलों पर जो लोग बैठे थे, उन की कदकाठी भरतभाई और प्रवीण द्वारा बताए गए हुलिए से मेल खा रही थी.

इस के बाद पुलिस ने अपना ध्यान पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों पर लगा दिया. दिल्ली परिवहन विभाग की सभी अथौरिटियों में जितनी भी पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं, पुलिस ने उन की जानकारी निकलवाई. पता चला कि दिल्ली में 40 हजार पल्सर और 20 हजार अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड हैं. इतनी मोटरसाइकिलों की जांच करना आसान बात नहीं है. लिहाजा पुलिस ने अपने जिले की अथौरिटी से उक्त दोनों ब्रांड की मोटरसाइकिलों की डिटेल्स निकलवाई.

यहां 400 पल्सर और 150 अपाचे मोटरसाइकिलें रजिस्टर्ड थीं. इन सभी की डिटेल्स हासिल कर पुलिस ने जिन लोगों के नाम से गाडि़यां थीं, उन का उम्र के हिसाब से वर्गीकरण किया. ज्वैलरी का बैग लूटने वाले बदमाशों की जो उम्र थी, उस उम्र के मोटरसाइकिल वालों को छांटा गया. इस तरह के करीब 42 मोटरसाइकिल मालिक मिले. इन सभी के पतों पर जा कर पुलिस ने पता किया कि 2 जनवरी, 2016 को वे सुबह 7 से 9 बजे के बीच वे अपनी मोटरसाइकिल ले कर कहां थे. इस जांच में भी पुलिस के हाथ लुटेरों तक नहीं पहुंच सके.

उधर जिला पुलिस मुख्यालय में कंप्यूटर औपरेटर ए.के. वालिया डंप डाटा को खंगालने में जुटे थे. उस में से वोडाफोन के एक नंबर पर उन की नजर जम गई. वह नंबर उन्होंने एसीपी राजेंद्र प्रसाद गौतम को दिया. वह नंबर पश्चिमी दिल्ली के रघुवीरनगर की रहने वाली गुड्डी के नाम था. सबइंसपेक्टर संजय कुमार सिंह उस नंबर की जांच के लिए गए तो पता चला कि उस पते पर गुड्डी नाम की कोई महिला नहीं रहती. इस से साफ हो गया कि वह नंबर किसी फरजी आईडी पर लिया गया था.

जब किसी भी कंपनी का नया मोबाइल नंबर लिया जाता है तो कंपनियां फार्म पर ग्राहक का एक अल्टरनेट नंबर मांगती हैं. वोडाफोन कंपनी का जो नंबर लिया गया था, उस पर अल्टरनेट नंबर के रूप में रिलायंस कंपनी का एक नंबर लिखा था. वह नंबर महेंद्र सिंह का था, जो बी-492, मीतनगर, ज्योतिनगर, नंदनगरी, दिल्ली का रहने वाला था. एसआई संजय कुमार सिंह हैडकांस्टेबल अवधेश और अशोक को ले कर उस पते पर पहुंचे.

वहां महेंद्र सिंह मिल गया. पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर सदर बाजार में हुए गहनों की लूट के बारे में पूछा तो उस ने इस लूट से मना करते हुए बताया कि वह तो नंदनगरी की ईएसआई डिसपेंसरी में नौकरी करता है. उसे किसी लूट की कोई जानकारी नहीं है. उस ने भले ही खुद को ईएसआईसी डिसपेंसरी का कर्मचारी बताया था, पर उस के हावभाव से साफ लग रहा था कि वह कुछ छिपा रहा है. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो आखिर उस ने मुंह खोल दिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि 2 जनवरी को उसी ने अपने साथियों के साथ लूट की उस घटना को अंजाम दिया था.

पुलिस टीम पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. डीसीपी मधुर वर्मा को जब पता चला कि लूट वाला मामला खुल गया है तो वह भी थाने आ गए. उन के सामने जब महेंद्र सिंह से पूछताछ की गई तो गहनों के बैग की लूट का पूरा रहस्य उजागर हो गया. पता चला, उस में सवा करोड़ के गहने थे. गहनों के बैग की लूट की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी. महेंद्र सिंह दिल्ली के ज्योतिनगर के रहने वाले तेजू सिंह का बेटा था. वह नंदनगरी स्थित कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की डिसपेंसरी में अस्थाई सफाई कर्मचारी था. उसे वहां से जो वेतन मिलता था, उस से उस के परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसलिए वह हमेशा मोटी कमाई के बारे में सोचा करता था. इस के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था.

महेंद्र को कहीं से पता चला कि चांदनी चौक में ऐसे तमाम लोग हैं, जो यहां से लाखों रुपए के गहने गुजरात ले जाते हैं और वहां से भी उसी तरह गहने दिल्ली आते हैं. उस ने सोचा कि अगर उन्हीं में से किसी को शिकार बना लिया जाए तो एक ही झटके में लाखों रुपए हाथ लग सकते हैं. इस के बाद वह यह पता लगाने लगा कि यह काम कौनकौन करते हैं. किसी जानकार ने उसे बताया कि दिल्ली के कूचा घासीराम में कई आंगडि़ए हैं, जो दिल्ली से बाहर गहने भेजते हैं. वहीं एक सरजू पंडित नाम का आदमी है, जो उन आंगडि़यों के बारे में अच्छी तरह से जानता है. क्योंकि वह उन्हें चायपानी पिलाता है. अगर सरजू पंडित को विश्वास में ले लिया जाए तो मोटा माल हाथ लग सकता है.

महेंद्र कूचा घासीराम के सरजू पंडित के पास पहुंच गया. उस ने पहले तो किसी जरिए उस से जानपहचान की. इस के बाद वह रोजाना उस से मिलने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई. जब दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई तो एक दिन महेंद्र ने सरजू को अपनी योजना के बारे में बता कर पैसों का लालच दे कर कि जो भी माल हाथ लगेगा, उस में से एक हिस्सा उसे दिया जाएगा, के बाद आंगडि़ए के बारे में पूछा. सरजू पंडित लालच में आ गया. 60 वर्षीय सरजू पंडित ने महेंद्र को प्रवीण कुमार के बारे में बताया ही नहीं, उसे पहचनवा भी दिया. प्रवीण कूचा घासीराम स्थित राजेश कुमार अरविंद कुमार आंगडि़या की फर्म में काम करता था. यह फर्म गहनों की कूरियर का काम करती थी.

दिल्ली के कुछ ज्वैलर्स इस फर्म द्वारा पुराने गहने अहमदाबाद भेज कर वहां से नए डिजाइन के तैयार गहने मंगाते थे. यह काम इस फर्म का कूरियर बौय भरतभाई करता था. वह हर 2 दिन बाद दिल्ली आता था. सरजू पंडित ने महेंद्र को पूरी बात बता तो दी, लेकिन महेंद्र यह फैसला नहीं कर सका कि कूरियर बौय भरतभाई से माल कैसे झटका जाए. महेंद्र का एक दोस्त था रोशन गुप्ता, जो विवेक विहार की झिलमिल कालोनी में रहता था. वह पेशे से ड्राइवर था. उस के 2 बच्चे थे, जो बड़े हो चुके थे. उन की शादी को ले कर वह काफी परेशान था. कुछ दिनों पहले उस ने मकान बनवाया था, जिस से उस पर ढाई लाख रुपए का कर्ज हो गया था. उसे इस बात की भी चिंता रहती थी कि वह कर्ज कैसे चुकाएगा.

महेंद्र ने लूट की योजना रोशन को समझाई तो पैसों की सख्त जरूरत की वजह से वह भी उस के साथ यह काम करने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने एक महीने तक उस रूट की रेकी की, जिस रूट से भरतभाई और प्रवीण माल ले कर नई दिल्ली स्टेशन आतेजाते थे. रेकी में रोशन ने अपनी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल का उपयोग किया था. रूट को अच्छी तरह समझने के बाद बात हुई कि वारदात को कैसे अंजाम दिया जाए, क्योंकि इस में रिस्क था, इसलिए हथियारबंद लोगों का भी इस में शामिल होना जरूरी था. रोशन मनीष शर्मा और मोहम्मद आरिफ नाम के बदमाशों को जानता था. दोनों ही गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद के रहने वाले थे.

मनीष शार्पशूटर था तो मोहम्मद आरिफ शातिर चाकूबाज. रोशन ने दोनों से बात की. वे राजी हो गए तो उन्हें भी योजना में शामिल कर लिया. दोनों बदमाशों को शामिल करने के बाद उन के दिमाग में बात आई कि ज्वैलरी लूटने के बाद मोटरसाइकिल से तुरंत भागना होगा. इस के लिए उन्हें भीड़भाड़ वाली जगह में भी तेजी से मोटरसाइकिल चलाने वाले 2 लोग चाहिए. इस बारे में आपस में चर्चा हुई तो मनीष शर्मा ने बताया कि वह जसपालदास उर्फ रिंकू को जानता है. वह भी साहिबाबाद में रहता है. पहले वह दिल्ली में क्लस्टर बस चलाता था. कुछ दिनों पहले उस ने नौकरी छोड़ा है. वह एक अच्छा बाइक रेसर है.

जसपाल को एक खतरनाक जानलेवा बीमारी थी, उसी के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. मनीष ने उसे लूट की योजना बताई तो वह भी तैयार हो गया. उस के पास चोरी की एक पल्सर मोटरसाइकिल भी थी. उन्हें एक मोटरसाइकिल चलाने वाला मिल गया था, एक की अभी और जरूरत थी. इस के लिए जसपाल ने अरुण नागर उर्फ बौबी से बात कराई. अरुण नागर मोटरसाइकिल से स्टंट करता था. वह बेरोजगार था. पैसों के लालच में वह भी उन के साथ काम करने को तैयार हो गया. अरुण ने भी किसी की अपाचे मोटरसाइकिल चुरा रखी थी, जिस की नंबर प्लेट बदल कर वह उसे खुद ही चलाता था.

पूरी टीम तैयार हो गई तो सभी ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कूचा घासीराम बाजार तक का कई बार चक्कर लगाया. इस के बाद इस बात पर विचार किया जाने लगा कि घटना को किस जगह अंजाम दिया जाए, जहां से वे आसानी से भाग सकें. काफी सोचनेविचारने के बाद कुतुब रोड पर तांगा स्टैंड के पास वारदात को अंजाम देना निश्चित किया गया. क्योंकि वहां जो दुकानें बनी थीं, वे सुबह के समय बंद रहती थीं और सामने की पार्किंग भी खाली रहती थी. सुनसान रहने की वजह से वहां से यूटर्न ले कर भागना आसान था. वारदात की जगह निश्चित करने के बाद इस बात का भी कई बार रिहर्सल किया गया कि बैग को छीन कर किस तरह वहां से भागना है.

महेंद्र और रोशन गुप्ता को इस बात की पुख्ता जानकारी मिल गई थी कि अहमदाबाद से माल ले कर भरतभाई अहमदाबाद-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रैस से 2 जनवरी को नई दिल्ली स्टेशन पर उतरेगा. उसे पता ही था कि भरतभाई को लेने प्रवीण कुमार आता है. वहां से दोनों औटो से औफिस जाते हैं. पूरा प्लान तैयार कर के महेंद्र, मनीष शर्मा, अरुण नागर उर्फ बौबी, रोशन गुप्ता, जसपाल उर्फ रिंकू और मोहम्मद आरिफ पल्सर और अपाचे मोटरसाइकिलों से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए. महेंद्र ने सब से पहले रेलवे स्टेशन की इनक्वायरी से यह पता लगाया कि अहमदाबाद से नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस कब आ रही है.

वहां से उसे पता चला कि ट्रेन स्टेशन पर 8 बजे पहुंचेगी. भरतभाई को लेने के लिए सुबह 7 बज कर 40 मिनट पर प्रवीण स्टेशन पहुंच गया था. महेंद्र प्रवीण को पहचानता था, इसलिए वह कुछ दूरी से उस पर नजर रखने लगा, क्योंकि भरतभाई को ट्रेन से उतर कर उसी के पास आना था. कुछ देर बाद अहमदाबाद से चल कर नई दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रैस के दिल्ली पहुंचने की घोषणा हुई, महेंद्र सतर्क हो गया. स्टेशन से बाहर निकलने वाले यात्रियों को महेंद्र गौर से देख रहा था. जब उसे भरतभाई दिखा तो वह खुश हो गया. भरत के हाथ में एक बैग था. भरत को पहले से ही पता था कि प्रवीण कहां खड़ा हो कर उस का इंतजार करता है, इसलिए वह स्टेशन से बाहर सीधे उसी स्थान पर पहुंच गया, जहां प्रवीण खड़ा था.

प्रवीण ने एक औटो तय किया, जिस में दोनों बैठ गए. महेंद्र फुरती से उस जगह आ गया, जहां उस के साथी खड़े थे. महेंद्र ने उन्हें वह औटो दिखा दिया, जिस में भरत और प्रवीण बैठे थे. पल्सर को जसपाल उर्फ रिंकू चला रहा था और उस पर महेंद्र तथा मोहम्मद आरिफ बैठे थे. दूसरी मोटरसाइकिल अपाचे को अरुण नागर उर्फ बौबी चला रहा था, जिस पर मनीष शर्मा और रोशन गुप्ता बैठ गए. वे सभी उस औटो का पीछा करने लगे, जिस में भरतभाई और प्रवीण बैठे थे.

जैसे ही वह औटो तांगा स्टैंड के पास पहुंचा, जसपाल ने उसे ओवरटेक कर के रोक लिया. इस के बाद अरुण नागर ने अपाचे मोटर-साइकिल औटो के बराबर में खड़ी कर दी. औटोचालक सरोज पटेल समझ नहीं पाया कि उन लोगों ने ऐसा क्यों किया, क्योंकि उस से तो कोई गलती भी नहीं हुई थी. औटो रुकते ही आरिफ चाकू ले कर और मनीष शर्मा पिस्तौल ले कर भरतभाई और प्रवीण के पास पहुंच गए. महेंद्र ने भरत के हाथ से बैग छीनना चाहा तो उस ने बैग नहीं छोड़ा. तभी डराने के लिए आरिफ ने प्रवीण के पैर पर चाकू मार दिया. इसी के साथ महेंद्र ने ड्राइवर सरोज पटेल के 2 थप्पड़ जड़ दिए.

थप्पड़ लगते ही औटोचालक वहां से भाग कर सड़क के उस पार चला गया. प्रवीण और भरतभाई भी डर गए थे. महेंद्र ने भरतभाई के हाथ से बैग छीन कर रोशन को पकड़ाया तो वे फुरती से यूटर्न ले कर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चले गए. वहां से गलियों में होते हुए वे शीला सिनेमा के सामने फ्लाईओवर के पास पहुंचे. जसपाल ने वहां पल्सर मोटरसाइकिल रोकी और एक औटोरिक्शा तय कर के उस में महेंद्र और आरिफ के साथ बैठ कर सीमापुरी बौर्डर चला गया. उन के पीछेपीछे अपाचे मोटरसाइकिल पर मनीष, अरुण और रोशन आ रहे थे.

वहां से वे जनकपुरी, साहिबाबाद पहुंचे. जनकपुरी में मनीष का एक प्लौट था, जिस में एक कमरा बना हुआ था. वह जगह सुनसान थी. वहां उन्होंने बैग खोल कर देखा तो उस में अलगअलग डिब्बों में सोने के गहने भरे थे. कुछ अंगूठियां, टौप्स और पैंडेंट ऐसे थे, जिन में हीरे जड़े थे. हीरे जड़ी सारी ज्वैलरी उन्होंने आपस में बांट ली. अब उन के सामने समस्या यह थी कि उन गहनों को कैसे और कहां बेचा जाए, क्योंकि गहने को बेचने पर पकड़े जाने की आशंका थी, इसलिए वे असमंजस में थे कि उसे कैसे ठिकाने लगाया जाए. तभी जसपाल ने कहा, ‘‘मेरे एक मौसा हैं किशनलाल, जो यहीं शालीमार गार्डन के रहने वाले हैं. अंडमान निकोबार में उन की गहनों की दुकान हैं. इस समय वह किसी परिचित की शादी में दिल्ली आए हुए हैं. गहनों को बेचने में वह मदद कर सकते हैं.’’

इस बात पर सभी तैयार हो गए तो जसपाल उर्फ रिंकू ने किशनलाल से बात की. उसने बताया कि सारे गहनों को पिघला कर अगर छड़ें बना दी जाए तो उन छड़ों को बाजार में आसानी से बेचा जा सकता है. सभी को यह सुझाव पसंद आया तो अगले दिन किशनलाल ज्वैलरी पिघलाने के लिए गैस बर्नर और अन्य सामान ले कर जनकपुरी के उसी प्लौट पर बने कमरे में पहुंच गया. किशनलाल ने पांच साढ़े पांच किलोग्राम सोने की ज्वैलरी को पिघला कर एक गोला बना दिया. वह गोला सोने की तरह चमकता हुआ न हो कर कुछ काले रंग का था. किशनलाल ने बताया कि इसे रिफाइंड कर के छड़ें बनानी पड़ेंगी. तब उन सभी ने किशनलाल से कह दिया कि इस गोले को वह अपने साथ ले जाएं और छड़ें बना दें.

किशनलाल उस गोले को ले गया. 3 दिन बाद आ कर उस ने कहा, ‘‘मैं ने उस गोले से अभी एक छड़ बनाई है, जो साढ़े 12 लाख रुपए की बाजार में बिकी है. जैसेजैसे छड़ें बनती जाएंगी, मैं उन्हें बेच कर तुम लोगों को पैसे देता रहूंगा.’’

किशनलाल से मिले साढ़े 12 लाख रुपयों में से एक लाख रुपए महेंद्र ने सरजू पंडित को दे दिए, जिस की सूचना पर उन्होंने घटना को अंजाम दिया था. बाकी के पैसे उन्होंने आपस में बांट लिए. महेंद्र से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 9 जनवरी को मनीष शर्मा, मोहम्मद आरिफ, अरुण नागर उर्फ बौबी, जसपाल उर्फ रिंकू, रोशन गुप्ता और सरजू पंडित को उन के ठिकानों से गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने 2 पिस्तौलें, 7 जीवित कारतूस, साढ़े 12 लाख रुपए नकद, 18 डायमंड रिंग्स, 2 जोड़ी डायमंड टौप्स और एक डायमंड पैंडेंट के अलावा अपाचे मोटरसाइकिल बरामद कर ली थी.

किशनलाल को जब पता चला कि पुलिस ने जसपाल व अन्य लोगों को पकड़ लिया है तो वह फरार हो गया. पुलिस ने उस के ठिकाने पर भी छापा मारा था, लेकिन वह नहीं मिला. सभी अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि 6 सितंबर, 2015 को दिल्ली के कमला मार्केट इलाके में भी उन्होंने एक कूरियर बौय से 39 लाख रुपए के गहने लूटे थे. इस के अलावा 2 जुलाई, 2015 को देशबंधु गुप्ता रोड पर ढाई लाख रुपए की नकदी लूटी थी.

इन 2 मामलों के खुलासे के बाद पुलिस को लगा कि इस गैंग ने राजधानी में और भी वारदातें की होंगी, इसलिए पुलिस ने 10 जनवरी, 2016 को इन सभी अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में ड्यूटी एमएम श्री आर.के. पांडेय के समक्ष पेश किया. उस समय उन्होंने सभी अभियुक्तों को एक दिन के लिए जेल भेज दिया. अगले दिन सभी अभियुक्तों को महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश किया, जहां से पुलिस ने उन्हें 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. Delhi Robbery Case

कथा लिखे जाने तक पुलिस सभी अभियुक्तों से पूछताछ कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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