Builders Scam : पिछले 2-3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में तमाम बिल्डर कुकुरमुत्तों की तरह सामने आए. इन में से अनेक ने लग्जरी फ्लैट देने के नाम पर लोगों को खूब ठगा. गायत्री रियल एस्टेट का मालिक हरिओम दीक्षित भी उन्हीं में से एक है. अलगअलग हाउसिंग परियोजनाओं के नाम पर इस शातिर ठग ने लोगों के करोड़ों रुपए इतनी आसानी से डकार लिए कि…
गेट वे औफ उत्तर प्रदेश कहे जाने वाले नोएडा के सेक्टर-78 में रहने वाले विनोद कुमार गुप्ता पेशे से बड़े बिजनेसमैन हैं. एक जमाना था जब पुरानी दिल्ली में उन के खानदानी घर में पूरा परिवार एक ही छत के नीचे एक साथ रहता था. लेकिन वक्त के साथ जरूरतें और माहौल सब बदलते हैं. समय के साथ परिवार का भी विस्तार हो गया था, लिहाजा विनोद गुप्ता ने पुरानी दिल्ली की तंग गलियों से निकल कर आधुनिक और भव्य इलाके में अपना नया घरौंदा बनाने का विचार कर लिया.
उन्होंने अच्छीखासी रकम में पुरानी दिल्ली का मकान बेच दिया और नोएडा के सेक्टर 78 में एक कोठी बना ली. इसी आशियाने में विस्तार पा चुका परिवार विकसित होता रहा और बच्चे धीरेधीरे जवान होने लगे. नए जमाने की जरूरतों को समझते हुए विनोद कुमार ने सोचा कि क्यों न वक्त रहते सभी बच्चों और परिवार के सदस्यों को उन के लिए पसंद का आशियाना खरीद दिया जाए.
लेकिन तमाम उम्र परिवार के साथ बिताने वाले विनोद यह नहीं चाहते थे कि अलग आशियाना बसाने की चाह में परिवार बिखर जाए. इसलिए वह ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रही उन प्रौपर्टीज की खोज करने लगे, जिन में सुविधाओं के साथ आसान पहुंच भी हो. आखिर साल 2010 में उन की तलाश पूरी हुई. गायत्री हौस्पिटैलिटी एंड रियलकन नाम की बिल्डर कंपनी ग्रेटर नोएडा के सेक्टर–एक में गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना बना रही थी. करीब 500 फ्लैट वाले इस प्रोजेक्ट में आलीशान फ्लैट के साथ वे तमाम सुविधाएं भी बताई जा रही थीं, जिन का वह सपना देखते थे.
आशियाने की खोज पूरी हुई तो परिवार के लोगों के साथ प्रोजेक्ट को देखनेदिखाने का दौर शुरू हुआ. प्रोजेक्ट अपने शुरुआती दौर में ही था, इसलिए थोड़ा किफायती कीमत पर भी मिल रहा था. बिल्डर कंपनी के मालिक के अलावा सेल्स और मार्केटिंग टीम के लोगों से बातचीत का दौर शुरू हुआ. प्रोजेक्ट की वैधानिकता जांचने के लिए उन्होंने व उन के परिजनों ने जमीन के कागजों से ले कर अथौरिटी से प्रोजेक्ट की मंजूरी और नक्शे लेआउट प्लान तक सब देख डाले. कहीं कोई शंका नजर नहीं आई.
दरअसल, विनोद गुप्ता ने सुन रखा था कि नोएडा में बिल्डर मिट्टी को सोना बता कर और बंजर जमीन पर आलीशान बंगला बनाने का ख्वाब दिखा कर लोगों से उन की खूनपसीने की गाढ़ी कमाई लूट लेते हैं. विनोद गुप्ता ऐसे किसी लफड़े में नहीं पडऩा चाहते थे, इसीलिए उन्होंने कदम आगे बढ़ाने से पहले कागजों की सारी पड़ताल व सारी जांचपरख कर ली थी.
इस के बाद उन्होंने पहले परिवार के 7 सदस्यों के नाम पर 3 बैडरूम वाले 7 फ्लैट बुक करवा दिए और गायत्री बिल्डर को डिमांड की गई एडवांस रकम अलगअलग तरीके से दे दी. इस की उन्होंने बाकायदा लिखापढ़ी भी कर ली. बिल्डर की तरफ से वायदा किया गया था कि 2016 के अंत तक वह सभी फ्लैट का कब्जा उन्हें दे देगा. 1-2 साल का वक्त गुजरा तो अचानक उस इलाके में प्रौपटी के रेट तेजी से बढऩे शुरू हो गए.
इसी बीच गायत्री बिल्डर की मार्केटिंग टीम की तरफ से उन्हें औफर मिला कि अगर वे उन के प्रोजेक्ट में और निवेश करना चाहते हैं तो उन्हें पुराने रेट पर ही फ्लैट बुक करने का बेनिफिट मिल सकता है.
14 फ्लैट किए बुक
विनोद गुप्ता को लगा कि यह सुनहरा मौका है, इस से उन्हें बड़ा फायदा होगा. वैसे भी उन का व्यवसाय ठीक ही चल रहा था, पैसे की कोई कमी थी नहीं, लिहाजा उन्होंने परिवार के 7 और सदस्यों के नाम से 2 व 3 कमरे के 7 और फ्लैट बुक कर के उन की रकम भी एडवांस जमा करा दी.
इस तरह उन्होंने 2010 से 2015 के बीच सेक्टर एक के जीएच-11 भूखंड पर विकसित की जा रही गायत्री ओरा हाउसिंग परियोजना सोसायटी में विभिन्न आकार के कुल 14 फ्लैट बुक कराए. वे अब तक बिल्डर को करीब 3.35 करोड़ रुपए एडवांस दे चुके थे. बिल्डर ने तय समय में फ्लैट पर कब्जा देने और विक्रय पत्र अनुबंध करने का आश्वासन दिया था. वक्त तेजी से गुजरता गया और 2016 का वह समय भी आ गया, जब उन्हें उन के सभी 14 फ्लैट का कब्जा मिलना था.
उस से कुछ दिन पहले की बात है, जब विनोद कुमार ने सोचा कि फ्लैट बन कर तैयार हो गए होंगे. कब्जा लेने से पहले देख आते हैं कि काम कैसा हुआ है, लेकिन जब वे बिल्डर की साइट पर पहुंचे तो जिस जगह उन का ब्लौक बनना था, वहां तो खाली जमीन पड़ी थी. वहां फ्लैट तो क्या एक ईंट नहीं लगी थी.
विनोद कुमार यह देख कर भड़क गए. उन्होंने गायत्री बिल्डर के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने जवाब दिया कि जिस जगह उन का ब्लौक तैयार होना था, उस जगह पर कोर्ट में किसानों ने मुआवजा बढ़ाने की मांग को ले कर केस कर दिया था, जिस कारण कोर्ट ने जमीन के उस हिस्से पर निर्माण करने पर रोक लगा दी है.
गायत्री बिल्डर के अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि अब अदालती विवाद लगभग खत्म हो गया है और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा. बिल्डर की तरफ से जो कहा गया था, उस के मुताबिक एक से डेढ़ साल के भीतर उन्हें निर्माण करवा कर फ्लैटों को कब्जा दे दिया जाएगा.
मरता क्या न करता, गुप्ता परिवार ने सब्र कर लिया कि चलो एकडेढ़ साल बाद ही सही उन के फ्लैट उन्हें मिल जाएंगे, लेकिन जो कहा गया था, वैसा हुआ नहीं. क्योंकि एक तरफ उन से कहा गया था कि उन्हें डेढ़ साल के भीतर फ्लैट सुपुर्द कर दिए जाएंगे, दूसरी तरफ वे जब भी 1-2 महीने में गायत्री बिल्डर की ओरा परियोजना की साइट पर जाते तो उन के ब्लौक की खाली जमीन पर उन्हें वैसे ही हालात मिलते, जैसे पहले थे.
आखिर यह हो क्या रहा है? एक दिन गुस्से में आ कर जब बिल्डर ग्रुप के पदाधिकारियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि किसानों ने समझौता करने से इंकार कर दिया है और वे फिर से कोर्ट में चले गए हैं, लिहाजा जब तक मामला नहीं सुलटता, तब तक उस हिस्से में काम शुरू नहीं किया जा सकता. लेकिन इस बार उन्होंने जो आश्वासन दिया, उस से विनोद गुप्ता की उम्मीदें थोड़ा बढ़ गई थीं. उन्होंने विनोद गुप्ता से कहा कि अगर तय समय में कोर्ट से जमीन का विवाद नहीं सुलझा तो जो ब्लौक बन कर तैयार हो रहा है, उन्हें उस ब्लौक में फ्लैट आवंटित कर दिए जाएंगे.
जिस ब्लौक में फ्लैट देने का वायदा किया था, विनोद गुप्ता ने उस के मौडल फ्लैट देख भी लिए, सब कुछ वैसा ही था, जैसा उन को मिलने वाले फ्लैट में था. कुछ महीनों का इंतजार भी खत्म हो गया. इस दौरान बताए गए दूसरे ब्लौक के फ्लैट बन कर तैयार हो गए. उन्होंने गायत्री बिल्डर के औफिस जा कर उस ब्लौक में फ्लैट देने की बात पूछी तो उन से कहा गया कि वे सारे फ्लैट तो सेल आउट हो गए हैं. अब उन्हें बताया गया कि उन्हें तब तक इंतजार करना होगा, जब तक उन के ब्लौक की जमीन का विवाद खत्म नहीं हो जाता.
विनोद गुप्ता और उन के परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. आखिर यह क्या बात हुई कि 3.35 करोड़ रुपए की बड़ी रकम एडवांस लेने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं दिया जा रहा है, जबकि सालों गुजर चुके हैं. उन्होंने बिल्डर ग्रुप पर ब्याज सहित पैसा वापस करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. शुरू में तो उन से कहा गया कि जल्द ही उन का बुकिंग अमाउंट का पैसा रिटर्न कर दिया जाएगा. लेकिन टालमटोल करते हुए नित नए बहाने बनाते हुए इस बात को भी कई महीने गुजर गए.
आखिर एक दिन विनोद गुप्ता अपने परिजनों व कुछ जानकारों के साथ गायत्री बिल्डर के औफिस जा धमके और अपना पैसा लौटाने या फ्लैट देने की जिद पर अड़ गए. लेकिन उस दिन उन्हें पता चला कि बिल्डर की नीयत में ही खोट है. उस दिन साफ कह दिया गया कि बुकिंग अमाउंट वापस करना कंपनी की पौलिसी में नहीं है, अगर किसी वजह से फ्लैट नहीं दिया जाता तो कंपनी किसी दूसरे प्रोजेक्ट में पैसा एडजस्ट कर सकती है.
ठगी का हुआ अहसास
अब तक विनोद गुप्ता को यह बात बखूबी समझ आ चुकी थी कि वे और उन का परिवार गायत्री बिल्डर के हाथों ठगे गए हैं. उन्हें अपना करोड़ों रुपया डूबता नजर आने लगा. इसलिए अब उन्होंने बिल्डर को सबक सिखाने का मन बना लिया. विनोद गुप्ता ने अपने कुछ परिचित वकीलों के साथ मिल कर जब बिसरख थाने में गायत्री बिल्डर की वादाखिलाफी और धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की तो उन्हें पता लगा कि ऐसे दगाबाज बिल्डर के खिलाफ कानूनी काररवाई करने में पुलिस भी कितनी लाचार है.
सरकार ने ऐसे बिल्डरों पर लगाम लगाने के लिए रेरा नाम की संस्था बनाई हुई है. विनोद गुप्ता ने वहां भी बिल्डर कंपनी के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. यहां से वहां इस विभाग से उस विभाग तक धक्के खाते हुए विनोद गुप्ता को कई साल बीत गए, लेकिन कहीं से भी नतीजा अच्छा नहीं निकला.
उन की खूनपसीने की कमाई लगभग पानी में डूबती नजर आ रही थी. विनोद गुप्ता अमनपसंद और कानून में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे, लिहाजा उन्होंने तय कर लिया कि अब वे कानून से मदद लेने के लिए अदालत जाएंगे और पुलिस को विवश करेंगे कि वह बिल्डर के खिलाफ काररवाई करे. उन्होंने गौतमबुद्ध नगर की जिला अदालत में 156/3 में एक याचिका दाखिल कर दी ताकि पुलिस को उन की एफआईआर दर्ज करने का अदालती आदेश दिया जा सके. लेकिन यह काम भी उतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने समझा था.
कानून की पेचीदगियों के छेद भरतेभरते आखिरकार गौतमबुद्ध नगर के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रैट ने फरवरी, 2026 में कमिश्नरेट पुलिस को आदेश दिया कि विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर के खिलाफ बीएनएस की धारा 318, 406, 467, 468, 471, 120बी और 352 के तहत एफआईआर दर्ज कराई जाए, ताकि बिल्डर व संबंधित अधिकारियों के खिलाफ काररवाई कर के विनोद गुप्ता को फ्लैट अथवा उन की रकम वापस दिलाई जा सके. 20 फरवरी, 2026 को न्यायालय के आदेश पर बिसरख थाने के एसएचओ कृष्ण गोपाल शर्मा ने विनोद गुप्ता की शिकायत पर गायत्री बिल्डर व डेवलपर के मालिक हरिओम दीक्षित के खिलाफ जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर लिया और जांच भी शुरू कर दी गई.
विनोद गुप्ता के परिवार ने साल 2010 से 2015 तक कुल 3.35 करोड़ रुपए बिल्डर फर्म के निदेशक हरिओम दीक्षित को दे कर तय समय सीमा में न तो फ्लैट पाया न उन की रकम मिली. कुछ पाया तो काफी मेहनत– मशक्कत और सालों के इंतजार के बाद एक मुकदमा जिस के लिए भी उन्हें अदालत में लंबी लड़ाई लडऩी पड़ी. विनोद गुप्ता को इस लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पता चला कि बिल्डर ने उन्हें फ्लैट पर कब्जा इसलिए नहीं दिया और वह लगातार टालमटोल करता रहा, क्योंकि जिन ब्लौक में उन के फ्लैट बुक किए गए थे, वह वास्तविक निर्माण योजना में शामिल ही नहीं थे.
उन्हें फरजी नक्शा दिखा कर बुकिंग कर ली गई थी. उन्होंने कंपनी के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) में भी शिकायत की थी, जो आज तक लंबित है. एनसीएलटी में भी उन की शिकायत पर जवाब देते वक्त गायत्री बिल्डर कंपनी की तरफ से गलत जानकारी दी गई.
11 जनवरी, 2019 को एनसीएलटी में दाखिल कंपनी की सूची में 14 में से सिर्फ 7 फ्लैट ही दिखाए गए हैं. इन में भी 3 का उल्लेख नहीं था और 4 अन्य नामों से दिखाए गए हैं, जबकि 10 जुलाई, 2022 की सूची में सिर्फ एक फ्लैट दिखाया गया था. 4 को ‘अनएलाटेड एडवांस’ दिखाया है. 8 अन्य आवंटियों के नाम से दर्शाए गए और एक फ्लैट का जिक्र ही नहीं था.
…और भी फंसे जाल में
एनसीएलटी में कंपनी की तरफ से दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक परियोजना के आई और के ब्लौक को स्क्रैप कर उन की जमीन पर कामर्शियल निर्माण करा दिया गया, जबकि 4 फ्लैट इन्हीं ब्लौकों में बुक थे. विनोद कुमार गुप्ता समेत अन्य पीडि़तों को न तो वैकल्पिक फ्लैट दिए और न ही रकम वापस की गई.
दरअसल, विनोद कुमार गुप्ता अकेले ऐसे निवेशक नहीं हैं, जिन्हें आशियाने का सपना दिखा कर गायत्री बिल्डर के मालिक हरिओम दीक्षित ने करोड़ों रुपए हड़प लिए और न तो समय पर फ्लैट दिया न ही उन के पैसे लौटाए. ऊपर से पैसे लौटाने का दबाव बनाने पर धमकी तक दी गई. पिछले 2 से 3 दशकों में महानगरों खासकर दिल्ली एनसीआर में एक कहावत तेजी से प्रचलित हुई है कि शहरों में सिर्फ 2 चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं, जमीनों के और कमीनों के.
इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है कि तेजी से बढ़ती आबादी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण शहरों की सीमाओं में तेजी से विस्तार हुआ. लोगों के सपनों के घर व आशियाने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के विभिन्न प्राधिकरणों और निजी बिल्डरों ने नई आवासीय योजनाएं शुरू कीं. इन आवासीय योजनाओं को पूरा करने के लिए जमीनों की जरूरत थी. लिहाजा बिल्डरों व प्राधिकरणों ने किसानों व ग्रामीणों से खेती की जमीन को खरीद कर उन का लैंड यूज चेंज करा लिया.
शुरुआत में किसानों से आवासीय योजनाओं के लिए खरीदी गई जमीनें अपेक्षाकृत सस्ती थीं, लेकिन जब वक्त के साथ देशभर में किसानों को यह आभास हुआ कि उन से सस्ते दामों पर जमीन खरीद कर प्राधिकरण और बिल्डर बनाए गए फ्लैटों को बेहद महंगे दामों पर बेचते हैं तो उन्होंने भी अपनी जमीनों के दाम बढ़ाने शुरू कर दिए. हालात यह हो गए कि महानगर के आसपास जमीनें सोने के भाव बिकने लगीं और जमीनों के बढ़े दाम आसमान छूने लगे. ये तो हुई बढ़े हुए जमीनों के दाम की मूल कहानी. अब बताते हैं कमीनों के दाम कैसे बढ़े.
शुरुआत में जब सरकार के प्राधिकरण लोगों को पर्याप्त रूप से आवासीय सुविधाएं देने में नाकाम रहे तो सरकार ने निजी बिल्डरों व डेवलपरों को आवासीय परियोजनाएं बनाने की मंजूरी दी. बस यहीं से कमीनों के दाम बढऩे का सिलसिला शुरू हुआ. महानगरों में रहने वाले ऐसे लोग जिन के पास अपना थोड़ाबहुत पुश्तैनी पैसा था, उन्होंने बैंकों से मोटे कर्ज ले कर किसानों से औनेपौने दाम में जमीनें खरीदनी शुरू कर दी और वहां सरकार से आवासीय परियोजना बनाने की मंजूरी ले कर गगनचुंबी इमारतें बनानी शुरू कर दीं.
कुछ बिल्डर कंपनियां, जिन्होंने पैसे का ईमानदारी से उपयोग किया, वे फलीफूलीं और नामचीन कंपनी बन गईं. लेकिन इन में से अधिकांश लोग ऐसे निकले, जिन्होंने इस की टोपी उस के सिर और उस की टोपी इस के सिर पर रखने काम काम किया. मसलन, उन्होंने अपनी आवासीय अथवा कामर्शियल परियोजनाओं में एक मौडल फ्लैट, दुकान या औफिस बना कर लोगों को आशियाने और सपनों का घर देने का वायदा करना शुरू कर दिया.
ऐसे जुगाड़ू बिल्डर निवेशकों से 2 से 3 सालों में कब्जा देने का सब्जबाग दिखा कर बुकिंग अमाउंट के रूप में मोटी रकम जमा कराने लगे. कुछ बिल्डरों ने तो टोपियां घुमाने का ऐसा धंधा किया कि एक परियोजना से बुकिंग के रूप में मिली करोड़ों की धनराशि को प्रोजेक्ट शुरू करने के बजाय दूसरे प्रोजेक्ट के लिए किसानों से जमीन खरीदने में लगा दिया. जबकि पहले प्रोजेक्ट का काम ही शुरू नहीं हुआ.
ऐसे जुगाड़ू बिल्डर हर छोटेबड़े शहर खासकर दिल्ली एनसीआर में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए. ऐसे बिल्डरों को न तो लोगों के खूनपसीने की कमाई के नुकसान का डर था, न उन के सपनों के घर के टूटने की परवाह. उन्हें चाह थी तो रातोंरात शार्टकट से अमीर बनने की. बिल्डरों ने दिल्ली एनसीआर में आशियाने का सपना दिखा कर लोगों से पैसा ऐंठने के लिए ऐसेऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि रियल एस्टेट व्यवसाय में लगे लोगों को लोग कमीना मानने लगे.
इन के कारनामों से निवेशक और घर खरीदने की चाह रखने वाले इतने आजिज आ गए कि सरकार को ‘रेरा’ नाम की एक संस्था बनानी पड़ी, ताकि बिल्डर समय पर निवेशकों को उन की संपत्ति का कब्जा देने के लिए बाध्य हों. इतना ही नहीं, बैंकों व सरकारी संस्थाओं से कर्ज ले कर परियोजना बनाने वाले रियल एस्टेट समूह पर देनदारी सुनिश्चित करने के लिए एनसीएलटी जैसा प्राधिकरण भी बना दिया गया.
लेकिन हैरत की बात यह है कि रियल एस्टेट के धंधे से जुड़े लोगों ने धांधली इस कदर मचा दी है कि इन संस्थाओं के होते हुए भी हर रोज लोग लाखोंकरोड़ों खर्च करने के बावजूद अपने सपनों का आशियाना पाने का सपना सिर्फ आंखों में ही संजो कर रह गए हैं. क्योंकि रेरा जैसी संस्थाओं तथा एनसीएलटी जैसे प्राधिकरण में बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों के इतने अंबार लगे हैं कि लोगों को सालों तक अपनी सुनवाई का इंतजार करना पड़ रहा है. फैसला आने में तो हो सकता है दशकों बीत जाएं.
बहरहाल, गायत्री बिल्डर का मालिक हरिओम दीक्षित कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुए उन्हीं बिल्डरों में से एक है, जिस ने शार्टकट से पैसा कमाने के लिए न तो लोगों को झूठे सब्जबाग दिखाने में कोई भय है न ही लोगों का घर का सपना टूटने का कोई डर.
आगरा में बनी साख
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलपुरा के मिढ़ाकुर का मूल निवासी हरिओम दीक्षित वर्तमान में नोएडा के सेक्टर 121 की वीआईपी सोसायटी में रह रहा है. साल 2006 में हरिओम दीक्षित ने गायत्री बिल्डर व डेवलपर नाम से रियल एस्टेट कंपनी बना कर आगरा में अपने बिजनैस की शुरुआत की थी.
शुरू में उस ने आगरा में रियल एस्टेट के कई प्रोजेक्ट बनाए और लोगों को उन के घर व फ्लैट के कब्जे समय से दे कर अपनी साख बनाई. कुछ ही सालों में आगरा में उस की साख इतनी बढ़ गई कि उस के किसी भी प्रोजेक्ट से पहले सारे फ्लैटों की एडवांस बुकिंग होने लगी और प्रोजेक्ट के लिए मोटा पैसा इकट्ठा होने लगा.
कहते हैं लालच इंसान की सब से बड़ी कमजोरी होता है. हरिओम दीक्षित के साथ भी वही हुआ. रातोंरात दुनिया का सब से अमीर आदमी बनने की चाह में उस ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए. एनसीआर उन दिनों रियल एस्टेट का सब से तेजी से उभरता केंद्र था. लिहाजा हरिओम दीक्षित ने भी आगरा जैसे छोटे शहर से निकल कर दिल्ली एनसीआर के शहरों नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किए.
उस ने पहले अपनी पत्नी कल्याणी चतुर्वेदी के नाम से कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग नाम से एक नई कंपनी शुरू की. वैसे उस का आगे बढऩे का सिलसिला यहीं पर नहीं रुका. आगरा में कमाई गई अपनी साख को वह पूरी तरह भुनाना चाहता था. उस ने कुछ कारोबारी दोस्तों के साथ मिल कर और भी कई कंपनियां बनाईं और उन सभी में या तो वह खुद या उस की पत्नी कल्याणी पार्टनर बन गए. काम का फैलाव हुआ तो हरिओम दीक्षित ने बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं से अपने प्रोजेक्टों के लिए लोन भी लेना शुरू कर दिया.
फिर शुरू हुई हरिओम दीक्षित की ऊंची उड़ान और इस के लिए लोगों के सपने रौंद कर उन से पैसा ऐंठने का अंतहीन सिलसिला. हरिओम दीक्षित ने आगरा से ले कर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम में दरजनों कंपनियां बना कर नएनए प्रोजेक्ट बनाने शुरू कर दिए. हर प्रोजेक्ट आलीशान होने के दावों के साथ उस में भौतिक सुखसुविधाओं का ऐसा गुणगान किया जाता कि लोग आंखें बंद कर के उस के प्रोजेक्ट में फ्लैटों की बुकिंग के लिए लाखोंकरोड़ों रुपए एडवांस में दे देते.
2012 के बाद हरिओम दीक्षित की अलगअलग रियल एस्टेट फर्मों ने प्रोजेक्ट तो दरजनों शुरू किए, लेकिन शायद ही कोई ऐसा प्रोजेक्ट रहा होगा, जो समय से पूरा हुआ या निवेशकों को समय से डिलिवरी दी गई हो. ज्यादातर प्रोजेक्ट या तो पूरे ही नहीं हुए या निवेशकों को पुलिस और अदालतों की शरण लेनी पड़ी.
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर एक में गायत्री ओरा प्रोजेक्ट जहां विनोद गुप्ता के 14 परिजनों ने 14 फ्लैट बुक कराने के लिए 3 करोड़ 35 लाख रुपए एडवांस दिए थे, उसी प्रोजेक्ट में योगेश, कपिल और उन के 3 दोस्त भी निवेशक हैं, जिन्हें विनोद गुप्ता की ही तरह 2024 में अदालत का सहारा ले कर थाना बिसरख में एफआईआर दर्ज कराने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
उन चारों से भी लाखों रुपया फ्लैट बुक कराने के नाम पर ले लिया गया, लेकिन न तो समय से फ्लैट मिले, न ही काफी समय गुजरने के बाद कोई धनराशि लौटाई गई. गायत्री ओरा प्रोजेक्ट में निवेश करने वालों को तो कानोंकान इस बात की खबर नहीं लगी कि करीब एक माह पहले यानी 24 जनवरी, 2026 को आगरा प्रशासन ने गायत्री डेवलपर के निदेशक हरिओम दीक्षित की ग्रेटर नोएडा वेस्ट सेक्टर-1 के इस प्रोजेक्ट की 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्तियां कुर्क कर ली थीं.
आगरा प्रशासन के आदेश पर जिन प्रोजेक्ट की संपत्तियां कुर्क की गईं, उन में नोएडा के गायत्री ओरा, एपेक्स ओरा और गायत्री हौस्पिटैलिटी प्रोजेक्ट शामिल हैं. घर खरीदारों की बकाया राशि चुकाने के लिए इन संपत्तियों को नीलाम किया जाना है.
वैसे तो हरिओम दीक्षित व उस की रियल एस्टेट कंपनियों की पोल 2012 के बाद ही खुलनी शुरू हो गई थी. जब उस के खिलाफ निवेशकों ने एक के बाद एक शिकायतें पुलिस, अदालतों और रेरा में दर्ज करानी शुरू कर दी थीं. कोई प्रोजेक्ट ऐसा नहीं बचा था, जहां फ्लैट बुक कराने वाले निवेशकों ने समय से फ्लैट न देने पर बिल्डर ग्रुप के खिलाफ प्रदर्शन न किया हो.
पुलिस ने किया अरेस्ट
लेकिन हरिओम दीक्षित को सब से बड़ा झटका लगा 3 अक्तूबर, 2020 को जब आगरा की ताजनगरी पुलिस ने बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को जेल भेज दिया था. दरअसल, बुकिंग कराने के बाद भी लोगों को फ्लैट न देने और करोड़ों रुपए की ठगी मामले में दोनों को गिरफ्तार किया गया था.
उस समय हरिओम दीक्षित को गायत्री बिल्डर एवं डेवलपर्स के मालिक और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित को कल्याणी स्टोर एंड हाउसिंग की डायरेक्टर की हैसियत से गिरफ्तार किया गया. क्योंकि मेरठ रेंज के आईजी ए. सतीश गणेश ने आगरा जिले की समीक्षा के दौरान पाया था कि विगत 2 साल में आगरा के अलगअलग बिल्डरों के खिलाफ 40 से ज्यादा मुकदमे दर्ज होने पर भी पुलिस ने उन के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की.
आईजी ने जिम्मेदार अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए सख्त काररवाई करने का आदेश दिया था. जिस के बाद आगरा पुलिस ने लोगों से ठगी कर के फरार हुए बिल्डरों की एक सूची बनाई और उन के खिलाफ काररवाई शुरू की.
उन्हीं में एक बिल्डर हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी भी शामिल थे, जिन के खिलाफ कई मामले पुलिस व अदालतों में दर्ज थे, लेकिन स्थानीय पुलिस ने बिल्डर से मिले सुविधा शुल्क के कारण कभी उस के खिलाफ गैरजमानती वारंट नहीं लेने की जहमत ही नहीं उठाई. जबकि हरिओम दीक्षित के खिलाफ हरिपर्वत, सिकंदरा, न्यू आगरा, ताजगंज और रकाबगंज थानों में करीब एक दरजन शिकायतें दर्ज थीं, जिस में उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित भी नामजद थी.
बिल्डर हरिओम दीक्षित पर ज्यादातर मामलों में एक ही आरोप था कि लोगों के बुकिंग कराने के बाद भी उन्हें अभी तक फ्लैट नहीं दिए. कब फ्लैट मिलेंगे, यह भी नहीं बताया जा रहा है. बिल्डर के औफिस में न तो फोन उठाया जाता था, जिन मामलों में उस ने चैक दिए थे, वे बाउंस हो गए, लेकिन पुलिस ने कभी भी उसे गिरफ्तार करने की जहमत नहीं उठाई.
आगरा थाने की हरिपर्वत पुलिस ने बाद में झांसी के जल निगम में तैनात वीरेंद्र पाल सिंह की शिकायत पर हरिओम दीक्षित व उस की पत्नी के अलावा उस के भाई देवेंद्र दीक्षित को भी जेल भेजा था. इस मामले में उस की सास और साली समेत 12 लोग नामजद हैं. वीरेंद्र पाल से भी एडवांस बुकिंग के नाम पर 24 लाख रुपए की ठगी की गई थी.
हालांकि 2020 में आगरा की हरिपर्वत थाना पुलिस द्वारा हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी से पहले आगरा के ही रकाबगंज और ताजगंज थाने में दर्ज मुकदमों में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन जब आईजी सतीश गणेश की नजरें पुलिस की करतूत पर टेढ़ी हुईं तो इस की जांच भी शुरू की गई कि इन मुकदमों को किस आधार पर खत्म किया गया.
बिल्डर हरिओम दीक्षित के खिलाफ आगरा के अलावा नोएडा और गुरुग्राम में विभिन्न थानों में 2 दरजन से अधिक मुकदमे दर्ज हैं. हैरानी की बात है कि अधिकांश में पुलिस ने एक बिल्डर के खिलाफ किसी भी मुकदमे में गैरजमानती वारंट नहीं लिए. इसे ले कर पुलिस और बिल्डरों के गठजोड़ पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं.
2020 में हरिओम दीक्षित की गिरफ्तारी के बाद मामला गरमा गया तो उस वक्त आगरा पुलिस ने एक सूची बनाई, जिस में हरिओम दीक्षित की किस कंपनी के कौन से प्रोजेक्ट हैं, उन में अधिकांश पर विवाद है. जांच में पता चला कि हरिओम दीक्षित की गायत्री डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने वर्ष 2010 में 2 कंपनी एडोर्न इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड और मैसर्स राधारानी प्राइवेट लिमिटेड के नाम से भी कंपनी है, जिस ने 10 हजार वर्गमीटर जमीन खरीदी.
इस के बाद सिकंदरा क्षेत्र में अन्ना आइकोन रोड पर मनहर गार्डन सोसायटी के नाम से 200 फ्लैट तैयार किए. इस में केनरा बैंक एमजी रोड से भी लोन लिया. बाद में बैंक ने तकरीबन 59 फ्लैट्स लोन के बदले अपने कब्जे में लिए.
बैंक खाते हुए कुर्क
मैसर्स कल्याणी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के माध्यम से शमसाबाद रोड पर वर्ष 2007 में गायत्री उपवन के नाम से 6 बीघा जमीन खरीद कर प्लौट बेचे गए. गायत्री हौस्पिटैलिटी के माध्यम से नोएडा में गायत्री एडोरा के नाम से 36,000 वर्गफीट जमीन ले कर 1680 फ्लैट का निर्माण किया जा रहा है. कृष्णा मयूरी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम से वर्ष 2012 में रंगोली कालोनी में नीलामी के दौरान 8,000 वर्ग मीटर जमीन ली थी. इस पर आज तक कोई निर्माण कार्य नहीं किया गया.
हरिओम दीक्षित के स्वामित्त्व वाली मनहर इंफ्रा होम प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा वर्ष 2015 में फतेहाबाद रोड पर गायत्री रिट्रीट के नाम से प्रोजेक्ट्स में 72 फ्लैट तैयार कर के बेचे जा चुके हैं. नोएडा के सेक्टर 121 थाने में हरिओम दीक्षित और उस की पत्नी कल्याणी दीक्षित के खिलाफ 4 मुकदमे दर्ज हैं. इन में अपने प्रोजेक्ट में फ्लैट और प्लौट की बुकिंग कर के रुपए लेने और कब्जा नहीं देने के आरोप थे.
जांच में यह भी पता चला कि आगरा में फ्लैट देने के नाम पर धोखाधड़ी के चलते न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) गायत्री डेवलपमेंट बिल्डर्स के मालिक हरिओम दीक्षित के 11 खाते कुर्क कर दिए हैं. उस के 3 खातों से राजस्व टीम ने 18 लाख रुपए की वसूली की है. बाकी 8 खातों में राजस्व टीम को एक भी पैसा नहीं मिला.
गायत्री बिल्डर से भू संपदा विनियामक (रेरा) ने अप्रैल, 2021 में 69.16 लाख वसूली के आदेश डीएम को दिए दिए थे. बकाएदारी नहीं चुकाने और वसूली में लापरवाही बरतने पर 2 पीडि़त हाइकोर्ट की शरण में गए थे. जिस के बाद न्यायालय के आदेश पर एसडीएम (सदर) ने बिल्डर के 11 खाते कुर्क किए थे. बिसरख थाने की पुलिस को विनोद कुमार गुप्ता के मामले की जांच में पता चला है कि गायत्री बिल्डर को सेक्टर एक में 17.5 एकड़ जमीन अलौट हुई थी, जिस में गायत्री ओरा के तहत 1,500 फ्लैट बनाने थे.
इन में से कुछ टावरों को निर्माण तो हुआ, जिस की आड़ में बिल्डर ने करीब एक हजार फ्लैट बिना बने ही एडवांस रकम ले कर बेच डाले और अब इन के निवेशक या तो थानों के अथवा अदालतों के धक्के खा रहे हैं.
सुनीत अवस्थी ने भी 2011 में गायत्री ओरा में 1,195 वर्गफीट का एक फ्लैट बुक किया था, जिस के लिए अब तक 16 लाख रुपए का पेमेंट कर चुके हैं. इस के बाद भी डेवलपर के साथ कई बार मीटिंग और वादों के बावजूद, जमीन के उस टुकड़े पर कंस्ट्रक्शन का कोई काम शुरू नहीं किया गया.
उन्होंने भी पिछले साल गायत्री बिल्डर के खिलाफ 2 जुलाई को केस दर्ज किया था. गायत्री बिल्डर ने अपने ओरा प्रोजेक्ट में बुकिंग के बदले 30 से 90 फीसदी तक पेमेंट ले लिया है, जो सभी 2011 और 2015 में बुक की गई थीं, लेकिन आज तक बिल्डर ने जमीन की खुदाई तक नहीं की है.
हैरानी की बात यह है कि विनोद गुप्ता की तरह बिल्डर सभी इनवेस्टर्स को शिकायत करने पर यही कहानी सुनाता है कि किसानों ने अभी तक जमीन का कब्जा नहीं सौंपा है. लेकिन हकीकत यह है कि गायत्री डेवलपर ने वह प्लौट किसी और को बेच दिया था.






