Kanpur Organ Trade Crime : सुशासन के दावों वाले इस कानपुर शहर में लगता है कि अब इंसान नहीं बल्कि मांस के लोथड़े और उन की कीमत मायने रखती है. कानपुर में सामने आया कि किडनी रैकेट महज एक अपराध नहीं, बल्कि वहां के पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था पर एक तमाचा है. अस्पतालों की नाक के नीचे चंद रुपयों के लिए गरीबों के जिस्म को किस्तों में काटा जाता रहा, लेकिन संबंधित विभाग गहरी नींद में सोया रहा. आखिर क्यों?
30मार्च, 2026 की दोपहर कानपुर के थाना रावतपुर के एसएचओ कमलेश राय को मोबाइल फोन पर सूचना मिली कि केशवपुरम स्थित आहूजा अस्पताल में मानव अंगों का काला कारोबार होता है. बीती रात भी एक किडनी डोनर और मरीज को भरती किया गया था और गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया है.
औपरेशन के बाद डोनर और मरीज को अलगअलग अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया गया है. लेनदेन को ले कर डोनर और दलाल के बीच झगड़ा भी हुआ है.इंसपेक्टर कमलेश राय ने इस सूचना से पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल को अवगत कराया तो उन्हें लगा कि अब किडनी रैकेट का परदाफाश हो जाएगा.
दरअसल, मार्च 2026 के पहले हफ्ते में उन्हें सूचना मिली थी कि कल्याणपुर क्षेत्र के कुछ अस्पतालों में अवैध रूप से किडनी ट्रांसप्लांट का धंधा चल रहा है. इस के लिए उन्होंने क्राइम ब्रांच की टीम को लगाया था. तब से टीम पसीना बहा रही थी, लेकिन कोई सटीक जानकारी नहीं मिल पा रही थी.
अत: जैसे ही कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल को सूचना मिली, उन्होंने इस रैकेट का परदाफाश करने की कमान एसीपी विपिन ताडा तथा डीसीपी (पश्चिम) एस.एम. कासिम आबिदी को सौंपी. सीपी ने डीसीपी (पश्चिमी जोन) के निर्देशन में क्राइम ब्रांच, थाना रावतपुर पुलिस और सीएमओ की संयुक्त टीम बनाई गई.

पुलिस और स्वास्थ विभाग की इस संयुक्त टीम ने सब से पहले केशवपुरम स्थित आहूजा अस्पताल में छापा मारा. छापा पड़ते ही अस्पताल में भगदड़ मच गई. तीमारदार अपने मरीजों को ले कर भागने लगे. अस्पताल में उस समय आहूजा अस्पताल के संचालक डा. सुरजीत सिंह आहूजा व उस की पत्नी डा. प्रीति आहूजा मौजूद थी.
पुलिस टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया. उन के पास से पुलिस टीम ने 1.75 लाख रुपए नकद तथा दवाइयां बरामद कीं. अस्पताल परिसर से ही पुलिस ने एंबुलैंस चालक शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना को भी हिरासत में लिया. पुलिस ने उस के पास से 2 मोबाइल फोन बरामद किए.
टीम की अगुवाई कर रहे डीसीपी (पश्चिम) एस.एम. कासिम आबिदी ने डा. सुरजीत सिंह आहूजा व डा. प्रीति आहूजा से बीती रात हुए किडनी ट्रांसप्लांट के बाबत पूछा तो दोनों कुछ देर मौन रहे, फिर धीरेधीरे परतें उधेडऩी शुरू कर दीं.
डा. सुरजीत सिंह आहूजा ने बताया कि बीती रात उस के अस्पताल में एक महिला को किडनी ट्रांसप्लांट की गई थी. दिल्ली व मेरठ से आई डौक्टरों की टीम ने औपरेशन किया था. इस के बाद रात में ही टीम चली गई थी. औपरेशन के बाद किडनी डोनर को आवास विकास 3 स्थित मेडलाइफ हौस्पिटल तथा महिला को आवास विकास 1 स्थित प्रिया हौस्पिटल ट्रामा सेंटर में इलाज हेतु शिफ्ट किया गया है. किडनी डोनर को शिवम ने भरती कराया था.
इस के बाद पुलिस टीम ने मेडलाइफ व प्रिया हौस्पिटल पर छापा मारा. टीम ने मेडलाइफ के संचालक रामप्रकाश व राजेश कुमार को तथा प्रिया अस्पताल के संचालक डा. नरेंद्र सिंह को भी हिरासत में ले लिया. मेडलाइफ अस्पताल में किडनी डोनर बैड पर दर्द से तड़प रहा था. वहां इलाज का कोई उचित प्रबंध न था.
डोनर से खुली पोल
डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस का नाम आयुष चौधरी है. वह देहरादून के ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय से एमबीए अंतिम वर्ष का छात्र है. मेरठ में रह कर पढ़ाई कर रहा था. उस की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. कालेज की फीस भरने को पैसा न था. इसी के चलते उस ने किडनी बेच दी.
किडनी का सौदा 9 लाख रुपए में डा. शुभम ने किया था. लेकिन बाद में मुकर गया और कहा कि 6 लाख ही मिलेंगे. औपरेशन के बाद उस ने साढ़े 3 लाख रुपए ही उस के खाते में भेजे. शेष रुपया देने को ले कर वह झगड़ा करने लगा. उस का बकाया रुपया दिलवाने की मेहरबानी करें. आबिदी ने उस से पूछा कि तुम ने जिसे किडनी दी है, क्या तुम उसे जानते हो? आयुष ने पहले कहा कि वह रिश्ते में बहन लगती है, लेकिन दूसरे ही पल मुकर गया कि वह उसे नहीं जानता.
डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी प्रिया अस्पताल भी पहुंचे, जहां महिला मरीज भरती थी. वह बैड पर लेटी थी. उस की हालत गंभीर थी. वह बयान देने की स्थिति में नहीं थी. उस की देखरेख एक युवक कर रहा था. आबिदी ने उस युवक से पूछताछ की तो उस ने अपना नाम दिव्यांक, निवासी धामपुर बिजनौर बताया. मरीज महिला का नाम पारुल तोमर, पति का नाम विकास तोमर निवासी नार्थ सिविल लाइंस मुजफ्फरनगर बताया. दिव्यांक ने यह भी बताया कि पारुल उस की सगी बहन है.
मेरठ का डा. अफजाल अहमद उस की बहन को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए कानपुर लाया था. किडनी का सौदा 60 लाख रुपए में हुआ था. सुबह तक उस के बहनोई अस्पताल में थे, अब कहां हैं, पता नहीं.
स्वास्थ विभाग की टीम ने भी आहूजा, प्रिया व मेडलाइफ अस्पताल की कुंडली खंगाली. जांच से पता चला कि प्रिया व आहूजा अस्पताल तो पंजीकृत है, लेकिन मेडलाइफ अस्पताल पंजीकृत नहीं है. आहूजा व प्रिया अस्पताल में भी तमाम अनियमितताएं पाई गईं. दोनों अस्पताल गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए मान्य नहीं थे, फिर भी वहां गैरकानूनी ढंग से गुर्दा प्रत्यारोपण का काम होता था. टीम ने अस्पताल में नोटिस चस्पा कर जवाब मांगा.
मेडलाइफ अस्पताल को सील कर दिया गया. टीम ने कल्याणपुर क्षेत्र के अन्य अस्पतालों की भी जांच की और जिन अस्पतालों में अनियमितताएं पाई गईं, उन अस्पतालों को सील कर दिया. किडनी डोनर आयुष चौधरी और पारुल तोमर को उचित इलाज के लिए हैलट अस्पताल में स्पैशलिस्ट डौक्टरों की देखरेख में भरती कराया गया, लेकिन बाद में उन्हें लखनऊ के डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया.
इधर पुलिस टीम हिरासत में लिए गए अस्पताल संचालकों व एंबुलेंस चालक को थाना रावतपुर लाई. थाने में पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल, एसीपी विपिन ताड़ा व डीसीपी (पश्चिम) एस.एम. कासिम आबिदी ने उन सभी से विस्तृत पूछताछ की. आहूजा अस्पताल के संचालक डा. सुरजीत सिंह आहूजा व उस की पत्नी डा. प्रीति आहूजा ने बताया कि एंबुलेंस चालक शिवम अग्रवाल उन का खास आदमी है. उस के संबंध दिल्ली के डौक्टर रोहित व अन्य डौक्टरों से हैं.
शिवम ही किडनी डोनर लाता और उन के अस्पताल में औपरेशन थिएटर की मांग करता. ओटी की फीस उन्हें 2.75 लाख रुपए मिलती थी. डोनर को क्या मिलता व मरीज से कितनी रकम ली जाती, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है. डा. रोहित ही हर बार अपनी टीम के साथ फ्लाइट से आता था और औपरेशन के बाद चला जाता था.
क्या तुम डा. रोहित को जानते हो? सीपी रघुवीर लाल ने डा. सुरजीत सिंह आहूजा से पूछा. सर, डा. रोहित के विषय में मुझे जानकारी नही है. मैं ने उस का पूरा चेहरा कभी नहीं देखा. क्योंकि वह जब भी अस्पताल आता था, मुंह पर मास्क लगाए रहता था. उस की टीम के लोग भी मास्क लगाए रहते थे. देर शाम आता था और रात में ही वापस चला जाता था.
उस का फोन नंबर तो तुम्हारे पास होगा. फोन लगाओ और बात कराओ. डा. सुरजीत सिंह आहूजा ने फोन लगाया, लेकिन उस का मोबाइल फोन बंद था. इसी के साथ डा. आहूजा ने एक और रहस्य की बात बताई. उस ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि डा. रोहित औपरेशन करने के पहले सिम खरीदता और औपरेशन के बाद सिम तोड़ कर फेंक देता था, ताकि कोई उस से संपर्क न कर सके. वह अपने सदस्यों से भी सिम बदलबदल कर बात करता है.
तुम्हारे पास राज्य सरकार की अनुमति नहीं थी, फिर तुम मानव अंगों का काला कारोबार क्यों करते थे? आला अधिकारी के इस प्रश्न का आहूजा दंपति ने कोई जवाब नहीं दिया और सिर नीचे झुका लिया.
पूरा गैंग था सक्रिय
पूछताछ में मेडलाइफ के संचालक राजेश कुमार व रामप्रकाश ने बताया कि वह पिछले 2 साल से किराए पर अस्पताल का संचालन कर रहे हैं. हैलट के कर्मचारी अजय ने उन का परिचय एंबुलेंस चालक शिवम अग्रवाल से कराया था. शिवम किडनी डोनर को औपरेशन के पहले जांच आदि के लिए उन के यहां भरती कराता था.
आहूजा हौस्पिटल में औपरेशन होने के बाद डोनर को फिर अस्पताल में लाया जाता था. इस के एवज में उन्हें 50 हजार रुपए मिलते. किडनी डोनर आयुष को भी शिवम काना ने ही उन के अस्पताल में भरती कराया था. यह भी बताया कि उन के अस्पताल का लाइसैंस निरस्त हो चुका है. लालच में संचालन कर रहे थे.
प्रिया हौस्पिटल के संचालक नरेंद्र सिंह ने बताया कि शिवम ने फोन कर बताया था कि एक महिला का गाल ब्लैडर का औपरेशन हुआ है. इलाज के लिए भरती कर लो, शाम को डौक्टर देखने आएंगे. चूंकि शिवम पहले भी मरीज भरती करा चुका था, अत: उस के कहने पर महिला मरीज को भरती कर लिया था. दोपहर बाद 3 बजे छापा पड़ा, तब सच्चाई सामने आई.
चूंकि अस्पताल संचालकों ने एंबुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना का नाम लिया था, अत: पुलिस अधिकारियों ने शिवम अग्रवाल से कड़ाई से पूछताछ की. शिवम घबरा गया और किडनी रैकेट का सारा सच उस ने उगल दिया. उस ने बताया कि गाजियाबाद का रहने वाला डा. रोहित रैकेट का मुखिया है. उस के गिरोह में मेरठ का डा. अफजाल अहमद, डा. वैभव, डा. अमित कुमार तथा उत्तम नगर (दिल्ली) का डा. मुदस्सर अली है.
डा. अफजाल का एक खास दोस्त परवेज सैफी है. वह एक ट्रैवल एजेंसी की कार चलाता है. जरूरत पडऩे पर वही डा. अफजाल व उस के मरीज को एक शहर से दूसरे शहर ले जाता है. परवेज सैफी ही मरीज पारुल तोमर को कानपुर लाया था. 2 ओटी टेक्नीशियन कुलदीप राघव व राजेश कुमार भी डा. अली व रोहित के खास हैं. ये दोनों औपरेशन में सहयोग करते थे. प्रयागराज का रहने वाला नवीन पांडेय भी गिरोह का सदस्य है. वह दिल्ली व एनसीआर का काम देखता है. वह स्वयं भी दलाल है और कानपुर परिक्षेत्र का काम देखता है.
प्रदेश में फैला जाल
एसीपी विपिन ताडा ने शिवम से पूछा कि वह अब तक किडनी के कितने मामलों में शामिल रहा है? इस के जवाब में उस ने कहा कि 6 औपरेशन आहूजा में तथा एक मेडलाइफ में कराया है. हालांकि डा. रोहित व उन की टीम 40 से 50 मामले निपटा चुके हैं तथा करोड़ों रुपए कमा चुके हैं. उसे हर औपरेशन का 50 हजार रुपया मिलता था.
शिवम अग्रवाल ने यह भी बताया कि रैकेट के लोग गेमिंग ऐप व टेलीग्राम गु्रप के जरिए डोनर को फंसाते थे. वह स्वयं भी गेमिंग ऐप से जुड़ा है. इन्हीं गु्रपों के माध्यम से उस ने डोनर आयुष को फंसाया था. उस ने उस की किडनी का सौदा पहले 9 लाख फिर 6 लाख रुपए में किया था. लेकिन उसे साढ़े 3 लाख रुपए ही दे पाया. रुपयों को ले कर उस का आयुष से झगड़ा भी हुआ था.
डीसीपी (पश्चिम) एस.एम. कासिम आबिदी ने जब शिवम अग्रवाल के दोनों मोबाइल फोन को खंगाला तो अनेक चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. मोबाइल फोन में एक वीडियो में वह किसी महिला को गले में स्टेथेस्कोप (आला) डाल कर डौक्टर बन कर चैक कर रहा था. महिला पीड़ा से कराह रही थी और आंसू बहा रही थी. डीसीपी आबिदी ने उस महिला के संबंध में शिवम से पूछा तो उस ने बताया वह महिला दक्षिण अफ्रीका की अरेबिका है. डा. रोहित व नवीन उसे दिल्ली से कानपुर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लाए थे.
3 मार्च, 2026 को उस का औपरेशन आहूजा अस्पताल में हुआ था. उस का किडनी डोनर अभिषेक चटर्जी था, जो कोलकाता का रहने वाला था. डा. रोहित ने एक करोड़ का सौदा अरेबिका से किया था. डीसीपी आबिदी समझ गए कि किडनी के काले कारोबार का जाल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार व पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों तक में फैला है.
शिवम के मोबाइल फोन में एक दूसरा वीडियो भी था, जिस में एक व्यक्ति काला चश्मा पहने बैड पर लेटा था. बैड पर 500-500 रुपए की गड्डियां बिछी थीं. लेटा हुआ व्यक्ति 500 रुपए की एक गड्ïडी से चेहरे पर हवा कर रहा था. श्री आबिदी ने इस व्यक्ति के संबंध में पूछा तो एंबुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना ने बताया कि काला चश्मा लगाए बैड पर नोटों की गड्ïिडयों के साथ लेटा व्यक्ति मेरठ का डा. अफजाल अहमद है.
किडनी रिसीवर पारुल तोमर से उसी ने 60 लाख में सौदा तय किया था. वही उसे कानपुर ले कर आया था. उसे इस केस में 22 लाख रुपए मिले थे. ये वही रुपए हैं. डा. अफजाल कल्याणपुर के एक होटल में रुका था. यह वीडियो उसी होटल के रूम का है. वीडियो उस के दोस्त कार चालक परवेज सैफी ने बनाया था.
डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी को शिवम के मोबाइल से एक कौल रिकौर्डिंग भी मिली. इस में शिवम दिल्ली–एनसीआर के एजेंट नवीन पांडेय से बातचीत करता सुनाई दे रहा है. यह रिकौर्डिंग किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान एक महिला मरीज की मौत के बाद की है. रिकौर्डिंग के अनुसार नवीन शिवम से कहता है कि महिला को दिल्ली एंबुलेंस के बजाए स्कौर्पियो से क्यों भेजा? मैक्स अस्पताल में इमरजेंसी में भरती कराया. उस की मौत हो गई. किसी तरह से डिस्चार्ज कराया.
इस पर शिवम कहता है कि भाई सब संभाल लो. वरना हम सब फंस जाएंगे. रोहित सर ने (डा. रोहित) साइलेंट रहने को कहा है, लेकिन अब वह फोन नहीं उठा रहे हैं. श्री आबिदी ने इस काल रिकौर्डिंग की बाबत शिवम से पूछा तो उस ने बताया कि डा. रोहित व एजेंट नवीन एक महिला को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए कानपुर लाए थे. किडनी ट्रांसप्लांट के बाद महिला को मेडलाइफ अस्पताल में भरती किया गया था.
हालत बिगडऩे पर उसे स्कौर्पियो से दिल्ली के मैक्स अस्पताल भेजा गया था. वहां उस की मौत हो गई थी. फिर बिना कागज पत्रों के उसे डिस्चार्ज करा कर परिजनों को सौंप दिया गया था.
शिवम अग्रवाल से विस्तृत पूछताछ तथा उस के मोबाइल फोन खंगालने के बाद सीपी रघुवीर लाल ने रावतपुर थाने के एसएचओ कमलेश राय को आदेश दिया कि वह किडनी रैकेट में प्रकाश में आए लोगों के खिलाफ सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज करें.
आते थे फ्लाइट से
आदेश पाते ही एसएचओ कमलेश राय ने स्वयं वादी बन कर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 की धारा 18, 19, 20 तथा मानव अंग तस्करी की बीएनएस की धारा 143 व 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.
यह मुकदमा डा. सुरजीत सिंह आहूजा, उस की पत्नी डा. प्रीति आहूजा, अस्पताल संचालक डा. नरेंद्र सिंह, रामप्रकाश, राजेश कुमार, एंबुलेंस ड्राइवर व दलाल शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना, उस के साथी दलाल नवीन पांडेय, ओटी टेक्नीशियन कुलदीप सिंह राघव, राजेश कुमार, मेरठ के डा. रोहित, डा. अफजाल अहमद, डा. वैभव मुदगल, डा. अमित कुमार, दिल्ली के डा. मुदस्सर अली तथा कार चालक परवेज सैफी के खिलाफ दर्ज किया गया था. इस की विवेचना मनोज कुमार विश्वकर्मा को सौंप दी.
इन आरोपियों में से पुलिस ने 6 आरोपियों डा. सुरजीत सिंह आहूजा, डा. प्रीति आहूजा, डा. नरेंद्र सिंह, राजेश कुमार, रामप्रकाश तथा एजेंट व चालक शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. दूसरे दिन इन आरोपियों को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.
बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल ने क्राइम ब्रांच, एसटीएफ, एसओजी और सर्विलांस की 8 टीमों का गठन किया और इन्हें दिल्ली , नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, उत्तराखंड और प्रयागराज भेजा. इन टीमों ने आरोपियों की कुंडली खंगालनी शुरू कर दी और गिरफ्तारी के प्रयास में जुट गई.
इधर डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी की पुलिस टीम ने केशवपुरम स्थित आहूजा हौस्पिटल से जांच शुरू की. जांच से पता चला कि किडनी ट्रांसप्लांट के लिए डा. रोहित की टीम दिल्ली से कानपुर फ्लाइट से आई थी और फिर सभी 2 कारों से आहूजा अस्पताल से गए थे.
रात 2 बजे 2 कारें बुक कराई गई थीं. किया कार से 5 लोग तथा अर्टिगा कार से 3 लोग गए थे. इस की जानकारी टीम को आहूजा अस्पताल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच से हुई थी. पुलिस इन दोनों कारों के नंबरों की जांच कर चालकों तक पहुंची.
किया कार के ड्राइवर रेलबाजार निवासी अजय यादव ने बताया कि वह अपनी कार से 5 लोगों को रात 3 बजे आहूजा अस्पताल से लखनऊ ले गया था. वे पांचों मास्क लगाए थे. उन्हें लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर चौराहे पर छोड़ा था. अजय ने बताया कि वह दमन और दीव जाने की बात कर रहे थे.
अर्टिगा कार के चालक राजा ने बताया कि जब वह रात ढाई बजे आहूजा अस्पताल पहुंचा तो 3 लोग मास्क लगाए डौक्टर की वेशभूषा में बैठे थे. वे तीनों कार में सवार हुए और गाजियाबाद चलने को कहा. उस ने उन तीनों को गाजियाबाद के वैशाली स्थित एक हौस्पिटल के सामने उतारा था.
एक व्यक्ति ने किराए का औनलाइन भुगतान यूपीआई से किया था. उस ने यह भी बताया कि मास्क पहने एक अन्य व्यक्ति ने कार का फास्टैग अपने यूपीआई से रिचार्ज किया था. औनलाइन भुगतान की जांच करते पुलिस टीम गाजियाबाद स्थित बैंक पहुंची. बैंक में कुलदीप राघव के नाम खाता था और मोबाइल नंबर भी दर्ज था. मोबाइल नंबर को ट्रेस कर पुलिस टीम ने 2 अप्रैल, 2026 की शाम कुलदीप राघव को गिरफ्तार कर लिया.
कुलदीप राघव की निशानदेही पर पुलिस ने उस के साथी राजेश कुमार को भी दबोच लिया. दोनों को गाजियाबाद से कानपुर लाया गया. हालांकि पुलिस ने दोनों की गिरफ्तारी दलहन अनुसंधान केंद्र (कानपुर) के रेलवे क्रौसिंग के पास दिखाई.
थाना रावतपुर में डीसीपी एस.एम. कासिम आबिदी ने दोनों से पूछताछ की. कुलदीप राघव ने बताया कि वह हापुड़ के पिलखुआ का रहने वाला है. गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित शांतिगोपाल अस्पताल में टेक्नीशियन है. लगभग 18 महीने पहले उस की मुलाकात गाजियाबाद के वैशाली स्थित एक अस्पताल में आयोजित सेमिनार में डा. रोहित से हुई थी.
उस के बाद वह डा. रोहित के किडनी रैकेट से जुड़ गया. उसे प्रति केस 50 हजार रुपए मिलते थे. अब तक वह आधा दरजन केस में डा. रोहित के साथ रहा है. अभी हाल में आहूजा अस्पताल में हुए किडनी ट्रांसप्लांट केस में वह डा. रोहित के साथ था.
राजेश कुमार ने पूछताछ में बताया कि वह गाजियाबाद का रहने वाला है. नोएडा के सर्वोदय अस्पताल में वह ओटी इंचार्ज है. वैशाली स्थित अस्पताल में हुए सेमिनार के दौरान उस की जानपहचान डा. रोहित से हुई. दोनों के बीच बातचीत होने लगी. उस के बाद वह डा. रोहित से जुड़ गया और उस के साथ किडनी ट्रांसप्लांट केस में उस के साथ जाने लगा. एक ओटी का उसे 50 हजार रुपए मिलते थे.
3 अप्रैल, 2026 को कुलदीप राघव व राजेश कुमार को थाना रावतपुर पुलिस ने कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा, दिल्ली में डेरा डाले क्राइम ब्रांच व एसओजी टीम ने मेरठ के डौक्टरों की कुंडली खंगाली तो पता चला कि किडनी रैकेट का प्रमुख डा. रोहित गाजियाबाद के इंदिरापुरम न्यायखंड-1 में रहता है.
पुलिस वहां पहुंची तो वह फ्लैट में ताला लगा कर फरार था. उस के दोनों मोबाइल फोन भी बंद थे. फ्लैट के अन्य लोगों से पता चला कि वह शादीशुदा व एक बेटाबेटी का बाप है. फ्लैट में वह अपनी महिला साथी के साथ रहता है. उस का परिवार दूसरी जगह शिफ्ट है. वह अकसर बाहर रहता है. फ्लैट पर जबतब ही आता है.
डा. अफजाल अहमद के बारे में टीम को पता चला कि वह फिजियोथैरेपिस्ट है. मेरठ के मकबरा आबू से सटे मोहल्ला बजरिया का रहने वाला है. अपना क्लीनिक चलाता है और डा. रोहित के रैकेट से जुड़ा है.
मुख्य आरोपी फरार
टीम ने उस के घर और क्लीनिक पर छापा मारा तो वह परिवार सहित फरार था. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. उस का साथी कार चालक परवेज सैफी भी उसी के साथ फरार था. पता चला कि वह अपराधी प्रवृत्ति का है.
डा. अमित कुमार और वैभव मुदगल की तलाश में पुलिस टीम मंगल पांडे नगर स्थित अल्फा हौस्पिटल पहुंची तो पता चला कि डा. अमित कुमार फिजियोथैरेपिस्ट है और अस्पताल का संचालक है. डा. वैभव मुदगल इसी अल्फा अस्पताल में डेंटिस्ट है. दोनों ही डा. रोहित के साथी हैं. दोनों घर व अस्पताल से फरार थे. उन के मोबाइल फोन भी बंद थे. शायद उन्हें कानपुर में उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी हो गई थी, इसलिए फरार हो गए थे.

अल्फा अस्पताल शक के घेरे में आया तो कानपुर पुलिस टीम ने गहन जांच की, जिस से पता चला कि अल्फा अस्पताल का 28 नवंबर, 2025 को सीएमओ डा. अशोक कटारिया ने लाइसैंस निरस्त कर दिया था. बाद में डा. अमित ने मैडिकल थाना पुलिस से सांठगांठ कर अनियमितता की फाइनल रिपोर्ट लगवा दी थी. फाइनल रिपोर्ट के बाद लाइसैंस बहाल हो गया था. जांच से यह भी पता चला कि डेंटिस्ट डा. वैभव मुदगल भू्रण परीक्षण मामले में अपने साथी फुरकान के साथ 7 साल पहले जेल भी जा चुका था.
पुलिस टीम ने डा. मुदस्सर अली की खोज की तो पता चला कि वह दिल्ली के उत्तम नगर में रहता है. पुलिस ने उस के घर दबिश दी तो वह फरार था. उस की पत्नी आसिफा ने बताया कि उस के शौहर डौक्टर नहीं, बल्कि ओटी मैनेजर हैं. वह पहले आकाश हौस्पिटल में काम करते थे. अब काम छोड़ चुके हैं. वह 3 दिन से घर नहीं आ रहे हैं. उन का मोबाइल फोन भी बंद है. पुलिस प्रयागराज निवासी एजेंट नवीन पांडेय को भी नहीं तलाश पाई.
काफी मशक्कत के बाद भी जब पुलिस की टीमें किडनी रैकेट के आरोपित डाक्टरों को गिरफ्तार नहीं कर पाई तो पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल ने उन के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिया ताकि वे देश न छोड़ सकें. यही नहीं, उन्होंने डा. रोहित, डा. अफजाल अहमद तथा ओटी मैनेजर व कथित डा. मुदस्सर अली पर 25-25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया.
इसी बीच 8 अप्रैल को पुलिस टीम ने ट्रेवल एजेंसी चालक परवेज सैफी को बड़े नाटकीय ढंग से रावतपुर रेलवे क्रौसिंग के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से पुलिस ने 9.05 लाख रुपया बरामद किया.

दरअसल, परवेज सैफी अपनी व डा. अफजाल की जमानत के लिए वकील से मिलने कानपुर आया था. उस ने रावतपुर रेलवे क्रौसिंग के पास वकील से बात करने के लिए जैसे ही अपना मोबाइल फोन औन किया, वैसे ही सर्विलांस पर लगे उस के मोबाइल फोन की लोकेशन थाना रावतपुर पुलिस को लग गई.
थाने में पुलिस अधिकारियों ने परवेज सैफी से विस्तृत पूछताछ की. उस ने बताया कि वह टीम के सदस्यों को एक शहर से दूसरे शहर तक कार से ले जाने का काम करता है. उस के पास जो रुपया बरामद हुआ, वह डा. अफजाल ने अपनी व उस की जमानत के लिए दिया था. पूछताछ के बाद 9 अप्रैल, 2026 को परवेज सैफी को कानपुर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.
पुलिस की अब तक की जांच से पता चला कि किडनी रैकेट का हैड डा. रोहित है. उस के रैकेट का जाल विदेश तक फैला है. वह फ्लाइट से टीम के साथ कानपुर आता था. उस की टीम के हर सदस्य का अपना टास्क था. डा. रोहित औपरेशन के पहले किडनी डोनर व रिसीवर को बेहोश करने का काम करता था.

डा. मुदस्सर अली व डा. अफजाल अहमद डोनर व रिसीवर का इंतजाम करते थे. औपरेशन मुदस्सर अली ही करता था. टेक्नीशियन कुलदीप राघव व राजेश कुमार ओटी का काम संभालते थे. परवेज सैफी टीम को फ्लाइट तक छोडऩे व लाने का काम करता था. दलाल शिवम अग्रवाल व नवीन पांडेय का काम हौस्पिटल को मैनेज करने का था.
अल्फा अस्पताल में डा. अमित व वैभव की देखरेख में डोनर व रिसीवर की औपरेशन पूर्व जांच की जाती थी. किडनी रैकेट सोशल मीडिया, गेमिंग ऐप व टेलीग्राम गु्रप के माध्यम से डोनर व रिसीवर को अपने जाल में फंसाता था.
पुलिस की जांच, गिरफ्तार आरोपियों के बयानों एवं अन्य मिले साक्ष्यों के आधार पर इस हाईप्रोफाइल किडनी रैकेट की जो कहानी प्रकाश में आई, उस का विवरण इस प्रकार है.
ऐसे फंसे लालच में
उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के रावतपुर थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है केशवपुरम. इसी केशवपुरम में डा. सुरजीत सिंह का ‘आहूजा हौस्पिटल’ है. डा. सुरजीत सिंह आहूजा एमबीबीएस, डीएआरएस, एमडी (पैथोलौजी) है. यानी लैब टेस्ट, ब्लड, यूरिन, बायोप्सी के एक्सपर्ट.
पहले वह कानपुर के अलगअलग अस्पतालों में बैठता था. लेकिन 2 साल पहले जब अपना हौस्पिटल बना लिया तो उस ने अन्य अस्पतालों में बैठना बंद कर दिया और अपने ही हौस्पिटल का संचालन करने लगा. डा. सुरजीत के चारमंजिला आहूजा अस्पताल में 35 बैड की व्यवस्था है. हाईटेक आईसीयू, एनआईसीयू और औपरेशन थिएटर है. उन्होंने शहर के बड़े व नामी डौक्टरों से संपर्क किया और उन्हें अपने अस्पताल में बैठने को राजी किया.
विभिन्न रोगों के स्पैशलिस्ट 27 डौक्टर उस के अस्पताल में बैठते और रोगियों को देखते. कम समय में ही उस का आहूजा हौस्पिटल शहर के जानेमाने अस्पतालों में गिना जाने लगा.
डा. सुरजीत सिंह आहूजा की पत्नी डा. प्रीति आहूजा भी डौक्टर है. प्रीति एसबीबीएस, एमडी (मेडिसिन) है. अस्पताल में वह हार्ट पेशेंट्स देखती है. डा. प्रीति इंडियन मैडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की कानपुर यूनिट की उपाध्यक्ष है. स्टेट बैंक औफ इंडिया में मैडिकल औफीसर है. मैडिकल के आधार पर छुट्टी वगैरह वही बनाती है.

वह कानपुर की डायबिटीज एसोसिएशन की सचिव तथा स्पैशलिस्ट डाक्टरों के लिए बने फिजिशियन फोरम की सदस्य भी है. इतने संगठनों से जुड़े होने के कारण वह शहर की चर्चित डौक्टर बन गई.
डा. सुरजीत सिंह आहूजा का एक खास बंदा था शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काना. वह एंबुलेंस ड्राइवर था और कमीशन पर उन के अस्पताल में मरीज भरती कराता था. शिवम काना मूलरूप से जालौन जनपद के उरई कस्बा के सूर्यनगर मोहल्ले की छुटकन चाट वाली गली में रहता था.
उस के पिता कृष्ण कुमार अग्रवाल प्लास्टिक कारोबारी थे. उन के परिवार में पत्नी ममता देवी के अलावा एक बेटा शिवम व बेटी शिवानी थी. कृष्ण कुमार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी. शिवम का मन पढ़ाई में नहीं लगता था. उस ने जैसेतैसे 8वीं की परीक्षा पास की फिर उरई से कानपुर आ गया.
कानपुर शहर में उस ने कुछ दिन मजदूरी की, फिर प्राइवेट नौकरी भी की. उस के बाद उस ने ड्राइविंग सीखी. प्रशिक्षित होने के बाद वह एंबुलेंस चलाने लगा. कुछ समय बाद उस ने निजी एंबुलेंस खरीद ली और कमाई करने लगा.
शिवम तेजतर्रार था. उस ने मदद 24×7 नाम से वाट्सऐप ग्रुप बनाया, जिस में उस ने कल्यानपुर, रावतपुर क्षेत्र के कई अस्पतालों के संचालकों को जोड़ा. पहले ग्रुप बनाने का उस का उद्देश्य एंबुलेंस की जरूरत पूरी करना था.
लेकिन बाद में वह अस्पताल में मरीज भरती कराने के लिए अस्पताल संचालकों से कमीशन लेने लगा. अब वह अच्छी कमाई करने लगा. इसी कमाई से उस ने दूसरी एंबुलेंस भी खरीद ली.
डा. रोहित बढ़ाया गैंग
इसी ग्रुप के जरिए शिवम, आहूजा हौस्पिटल के संचालक डा. सुरजीत आहूजा व डा. प्रीति आहूजा से मिला. वह मरीजों को कमीशन पर आहूजा अस्पताल में भरती कराने लगा.
शिवम ने कल्याणपुर के प्रिया अस्पताल व मेडलाइफ हौस्पिटल के संचालकों से भी संपर्क किया और वहां भी मरीज कमीशन पर भरती कराने लगा.
एक रोज शिवम किसी मरीज को अपनी एंबुलेंस से ले कर दिल्ली के एम्स अस्पताल गया. अस्पताल के बाहर उस की मुलाकात डा. रोहित से हुई. बातचीत में डा. रोहित ने शिवम से कहा कि वह किडनी ट्रांसप्लांट टीम का हैड है. यदि वह उस की टीम से जुड़ जाए तो लाखों की कमाई कर सकता है.
इस के लिए उसे बस कानपुर शहर में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अस्पताल की व्यवस्था करनी है. अधिक कमाई के लालच में शिवम ने टीम से जुडऩे की हामी भर दी.वापस कानपुर आ कर शिवम ने इस बाबत डा. आहूजा दंपति से बात की और ओटी मुहैया कराने के लिए उन को अच्छी कमाई का भरोसा जताया.
अधिक कमाई के लालच में आहूजा दंपति राजी हो गए. शिवम ने प्रिया अस्पताल के संचालक नरेंद्र सिंह व मेडलाइफ अस्पताल के संचालक रामप्रकाश व राजेश कुमार को भी कमाई का लालच दे कर राजी कर लिया.
किडनी ट्रांसप्लांट मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 के तहत नियंत्रित होता है. अवैध अंग व्यापार की आशंका से सख्त नियम बनाए गए हैं. इसलिए हर ट्रांसप्लांट केस को औथराइजेशन कमेटी की मंजूरी जरूरी होती है. कमेटी यह सुनिश्चित करती है कि अंगदान किसी दबाव, लालच या धोखाधड़ी के लिए नहीं किया गया है. अस्पतालों को भी सरकार से मान्यता मिलने के बाद ही ट्रांसप्लांट की अनुमति होती है.
नियम के मुताबिक अस्पताल को हर ट्रांसप्लांट के पहले औथराइजेशन कमेटी से मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. डोनर और रिसीवर के बीच करीबी पारिवारिक संबंध हो जैसे मातापिता, भाईबहन, पतिपत्नी. यदि डोनर रिश्तेदार नहीं है तो जिला स्तरीय अथारिटी से विशेष अनुमति जरूरी होती है. डोनर और मरीज की मैडिकल जांच, काउंसलिंग और दस्तावेजों का सत्यापन भी अनिवार्य होता है.
लेकिन कानपुर के आहूजा हौस्पिटल को न सरकार से अनुमति की जरूरत थी और न ही कमेटी से. न काउंसलिंग होती न मैडिकल जांच. बिना सत्यापन के ही मरीज व डोनर भरती हो जाता.
वर्ष 2025 में आहूजा अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट के 5 केस हुए, जबकि मेडलाइफ हौस्पिटल में एक. 3 मार्च, 2026 को आहूजा अस्पताल में दक्षिण अफ्रीका की महिला अरेबिका का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था. महिला को रोहित व नवीन दिल्ली से लाए थे. रोहित ने अरेबिका से एक करोड़ की डील की थी. डोनर को क्या दिया, पता नहीं चला. डा. सुरजीत आहूजा नेे भी ओटी फीस 3 लाख से अधिक ली थी.
डा. सुरजीत सिंह आहूजा अमूमन अस्पताल ओटी फीस 2.75 लाख प्रति केस लेता था. जिस दिन औपरेशन की तारीख तय होती, उस के 2 दिन पहले ही मरीजों की भरती बंद हो जाती थी. अस्पताल कर्मचारियों की भी छुट्टी कर दी जाती.
अस्पताल के कैमरे भी बंद कर दिए जाते, ताकि कोई सबूत कैमरे में कैद न हो. औपरेशन के बाद डोनर और मरीज मेडलाइफ और प्रिया अस्पताल में शिफ्ट कर दिए जाते. इन दोनों अस्पतालों से शिवम की डील पहले से रहती थी.
आहूजा अस्पताल में अगला औपरेशन 29 मार्च, 2026 को होना था. इस में डोनर आयुष चौधरी और रिसीवर पारुल तोमर थी. आयुष को डा. रोहित की टीम के सदस्य डा. अफजाल अहमद, डा. मुदस्सर अली व एजेंट शिवम अग्रवाल ने गेमिंग ऐप व टेलीग्राम गु्रप के जरिए अपने जाल में फंसाया था. उस को फांसने की कहानी भी दिलचस्प है.
आयुष चौधरी बिहार के बेगूसराय जिले के भगवानपुर थाने के औगान गांव का रहने वाला था. उस के फादर राजेश चौधरी जमींदार थे. उन के पास 20 बीघा उपजाऊ भूमि व आवासीय जमीन थी. परिवार में पत्नी रीता देवी के अलावा 2 बेटे आयुष कुमार व ऋषभ कुमार थे. गांव में उन का दोमंजिला मकान था.
आयुष पढ़ाई के दौरान ही गलत संगत में पड़ गया और महंगे नशे के शौक में फिजूलखर्ची करने लगा. पिता राजेश चौधरी ने उसे कई बार गलत संगत से दूर रहने को कहा, लेकिन उस की करतूतें बढ़ती ही गईं. अंत में परेशान हो कर राजेश चौधरी ने वर्ष 2016 में आत्महत्या कर ली.
एयर होस्टेस से की शादी
पिता की डैथ के बाद आयुष और बिगड़ गया. वह मनमानी करने लगा. उस ने कई बीघा पुश्तैनी जमीन बेच दी और ऐशोआराम की जिंदगी जीने लगा. वह अपना जन्मदिन मनाने दोस्तों के साथ हवाई जहाज से मुंबई जाता और खूब खर्च करता.
इसी दौरान सोशल मीडिया के जरिए यूपी की रहने वाली एक एयर होस्टेस दीपाली से आयुष को प्यार हो गया. आयुष ने उस पर 5 लाख रुपया खर्च किया. फेमिली वालों ने उस पर दबाव डाला तो आयुष ने वर्ष 2018 में देवघर में प्रेमिका से शादी कर ली.
दीपाली गांव में एक माह तक रही. इस बीच आयुष की नशाखोरी और जमीन बेचने को ले कर दीपाली का उस से झगड़ा हुआ. फिर वह घर छोड़ कर चली गई.
वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में आयुष ने अपने दोस्त गौतम को बछवाड़ा विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़वाया और पूरा खर्च उठाया, लेकिन दोस्त चुनाव हार गया. उस के बाद उस ने कुछ जमीन और बेची, फिर गांव से चला गया. एक साल बाद वह फिर गांव आया, लेकिन इस बार भाई ऋषभ ने उसे टिकने नहीं दिया और भगा दिया.
गांव में आश्रय नहीं मिला तो वह उत्तराखंड के देहरादून आ गया. यहां वह डिलीवरी बौय का काम करने लगा. यहां भी आयुष एक युवती के प्यार में फंस गया और बची रकम उस पर लुटा दी. आर्थिक तंगी शुरू हुई तो आयुष परेशान हो उठा. वह देहरादून से मेरठ आ गया.
मेरठ रहने के दौरान ही आयुष गेमिंग ऐप और टेलीग्राम गु्रप से जुड़ गया. ग्रुप में शामिल डा. अफजाल व डा. मुदस्सर अली से उस की बात होने लगी. एक दिन आयुष ने अपनी आर्थिक स्थिति और अन्य समस्याएं बताईं तो उन दोनों ने उसे मदद का आश्वासन दिया.
आयुष के बारे में जानकारियां जुटाने के बाद उन दोनों ने उस की मजबूरियों का फायदा उठाना शुरू कर दिया. सब से पहले अफजाल व मुदस्सर अली ने आयुष को साइबर ठगी में शामिल किया. उस से कहा कि अगर वह बैंक खाता खुलवा लेता है तो उसे 20 हजार रुपया मिलेगा. उस खाते में कुछ लोग रुपया भेजेंगे और वे पैसे निकाल कर उसे देने हैं.
इस पर आयुष तैयार हो गया और उस ने दिल्ली की एक बैंक में खाता खुलवा लिया. हालांकि इस के बदले उसे फूटी कौड़ी भी नहीं मिली. इसी बीच टेलीग्राम ग्रुप पर अफजाल व अली ने किडनी डोनर का मैसेज डाला. जिस पर उस ने फिर मुदस्सर अली से बात की. इस के बाद आयुष, अफजाल व अली के बिछाए जाल में फंसता गया. कानपुर के एजेंट शिवम अग्रवाल को आयुष को तैयार करने के लिए लगाया गया.
शिवम ने ब्रेनवाश कर आयुष की किडनी का सौदा 9 लाख रुपए में किया. हालांकि बाद में वह मुकर गया और सौदा 6 लाख में हुआ. तारीख तय हुई 29 मार्च, 2026 आहूजा हौस्पिटल कानपुर. शिवम ने इस की सूचना रोहित को दे दी.
इधर डा. अफजाल ने किडनी रिसीवर पारुल तोमर से किडनी का सौदा 60 लाख रुपए में तय किया. पारुल तोमर का पति विकास तोमर मुजफ्फरनगर का रहने वाला था. उस की पत्नी पारुल की दोनों किडनियां खराब थीं. वह इलाज हेतु मेरठ के अल्फा अस्पताल आती थी.
इसी अस्पताल में विकास की मुलाकात डा. अफजाल अहमद से हुई. उस ने विकास से कहा कि पत्नी का साथ चाहते हो तो किडनी बदलवा दो. विकास तैयार हो गया. उस के बाद अफजाल ने ग्रुप में किडनी डोनर आवश्यकता का मैसेज डाला तो डोनर के रूप में आयुष मिल गया. विकास को भी औपरेशन की तारीख 29 मार्च, 2026 और स्थान आहूजा अस्पताल, कानपुर बताया गया.
प्लान के मुताबिक 28 मार्च, 2026 को डा. अफजाल अहमद, पारुल तोमर को मेरठ से कानपुर लाया और आहूजा अस्पताल में भरती करा दिया. उस के साथ पति विकास व भाई दिव्यांक भी आए थे.
आयुष को भी अस्पताल में भरती करा दिया. डा. अफजाल ने पूरी रकम विकास से ले ली. रात में वह अस्पताल के बजाय होटल में रुका. 29 मार्च, 2026 की देर शाम डा. रोहित अपनी टीम के साथ फ्लाइट से कानपुर आया और रात 10 बजे आहूजा अस्पताल पहुंचा. सभी मास्क लगाए ओटी में पहुंचे. इस के बाद रात 2 बजे तक औपरेशन चला.
डा. रोहित ने आयुष व पारुल को बेहोश किया और मुदस्सर अली ने पेट चीर कर आयुष की किडनी निकाली और पारुल का पेट चीर कर किडनी ट्रांसप्लांट कर दी. इस दरम्यान ओटी का काम संभाला टेक्नीशियन कुलदीप राघव व राजेश कुमार ने. सहयोगी के रूप में डा. अमित व वैभव मुदगल रहे. औपरेशन के बाद रोहित की टीम टैक्सी से वापस लौट गई.
30 मार्च की सुबह आयुष को मेडलाइफ और पारुल को प्रिया अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया. शिवम ने आयुष के खाते में 3.50 लाख रुपए भेजे थे. शेष रकम उस नेे मांगी तो शिवम झगड़ा करने लगा. इसी झगड़े की सूचना अस्पताल के किसी पूर्व कर्मचारी ने थाना रावतपुर पुलिस को दे दी ओर झगड़े का कारण भी बताया. इसी सूचना के आधार पर पुलिस ने आहूजा, प्रिया और मेडलाइफ अस्पताल पर छापा मारा और 6 आरोपियों को पकड़ कर किडनी रैकेट का खुलासा किया.
पंजाब के तरनतारन के देवगंाव निवासी मनजिंदर सिंह का भी एक वीडियो वायरल हुआ, जिस में वह आहूजा अस्पताल के सामने खड़े हो कर कह रहे हैं कि उन के साथ धोखाधड़ी हुई है. दलाल ने उन से 43 लाख रुपया ले लिया और किडनी मुहैया नहीं कराई. वह अब मौत के मुहाने पर खड़े हैं. 13 अप्रैल, 2026 की सुबह 8 बजे डीसीपी (पश्चिम) की क्राइम टीम को मुखबिर से सूचना मिली कि डा. रोहित इस समय जीटी रोड (कल्याणपुर) चौराहे पर मौजूद है. वह जमानत के लिए आया है और इंदिरानगर में रहने वाले किसी वकील से मिलने जा रहा है.

क्राइम ब्रांच की टीम ने रावतपुर थाने के एसएचओ कमलेश राय की पुलिस टीम के साथ घेराबंदी की और रोहित को गिरफ्तार कर लिया. उसे रावतपुर थाने लाया गया.
थाने में डीसीपी (पश्चिम) एस.एम. कासिम आबिदी ने रोहित से विस्तृत पूछताछ की. रोहित ने बताया कि वह मूलरूप से हरदोई जिले के कस्बा बिलग्राम (धामपुर) का रहने वाला है. वर्तमान में वह न्यायखंड इंदिरापुरम, गाजियाबाद के फ्लैट में अपनी महिला मित्र के साथ में रहता है. उस की पत्नी, बच्चों के साथ कन्नौज में रहती है. उस के फादर राजाराम तिवारी की मौत हो चुकी है. वह 5 भाई व 2 बहन है. बहनों की शादी हो चुकी है.
रोहित तिवारी ने एक चौंकाने वाला खुलासा यह भी किया कि वह डौक्टर नहीं है. केवल 12वीं पास है. यह परीक्षा उस ने बिलग्राम के एसडी स्कूल से वर्ष 2008 में पास की थी. वह कई साल तक बेरोजगार घूमता रहा फिर उस का दोस्त अमित उसे गाजियाबाद ले कर आया.
यहां पाली केबल बनाने वाली फैक्ट्री डिक्शन में काम किया. इस के बाद डेकी और फिर बारको में काम किया. बारको में रिंकू नाम के युवक से मुलाकात हुई. रिंकू ने अपने जीजा से मुलाकात करा कर उसे मेरठ भेज दिया.
यहीं पहली बार उस की मुलाकात डेंटिस्ट डा. वैभव मुदगल से हुई. वह उन के मधुकर क्लीनिक में रिसैप्शन का काम देखने लगा. डा. वैभव अल्फा अस्पताल में पार्टनर था. वहां से वह अल्फा अस्पताल के मालिक डा. अमित कुमार के संपर्क में आया. यहां भी किडनी ट्रांसप्लांट का काम होता था.
वर्ष 2022 में उस की मुलाकात कानपुर के एंबुलेंस ड्राइवर शिवम अग्रवाल, प्रयागराज के एजेंट नवीन पांडेय से हुई. इस के बाद ये दोनों उस के दाहिना हाथ बन गए.
अनट्रेंड करते थे सर्जरी
रोहित तिवारी ने पुलिस के हर सवाल का जवाब बेबाकी से दिया. उस से जब दक्षिण अफ्रीका की महिला अरेबिका के किडनी ट्रांसप्लांट के विषय में पूछा गया तो उस ने बताया कि उस की डील एजेंट नवीन पांडेय ने की थी. उसे 20 लाख रुपया मिला था.
रोहित तिवारी ने यह भी बताया कि मरीज को बेहोश करने का काम वह नहीं, बल्कि ओटी टेक्नीशियन कुलदीप राघव व राजेश कुमार करते थे. वही इंजेक्शन लगाते थे. वह साथ में रहता था. औपरेशन मुदस्सर अली सिद्दीकी उर्फ डा. अली करता था. अभी तक कानपुर में जितने भी औपरेशन हुए, सब अली ने ही किए थे. उस का नेटवर्क ‘कमांडो सर्जरी’ कोड वर्ड से चलता था.
पूछताछ के बाद पुलिस ने रोहित तिवारी को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.
कथा संकलन तक जेल भेजे गए किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी.
शेष आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस सक्रिय थी. डोनर आयुष को राम मनोहर लोहिया अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी, जबकि पारुल तोमर अभी भरती थी. आयुष को पुलिस सरकारी गवाह बनाना चाहती है.






